xxx baba chudai kahani
मेरा नाम साधना है। मैंने शादी को सात साल हो चुके थे, लेकिन मेरी बुर में से अब तक कोई बच्चा नहीं निकला था। यह बात न केवल मेरे लिए, बल्कि मेरे पूरे परिवार के लिए एक बड़े दुख का कारण बन गई थी।
मेरे पति रोहित बहुत अच्छे हैं। उन्होंने कभी भी मुझे इस बात के लिए दोषी नहीं ठहराया, लेकिन मैं जानती थी कि वह भी अंदर ही अंदर टूट रहे थे।
हमने हर तरह के इलाज़ करवाए—बड़े-बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों से लेकर गाँव के हकीमों तक, हर किसी के यहाँ हमने दवाइयाँ खाईं, लेकिन सब व्यर्थ रहा।
मेरी सास, सरिता जी, शुरू में तो मुझे बहुत प्यार करती थीं, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनके चेहरे पर निराशा के भाव साफ दिखने लगे।
वह भी एक पोते-पोती की कामना रखती थीं, और मैं उनकी इस इच्छा को पूरी नहीं कर पा रही थी।
“साधना बेटी, तुमने कितने डॉक्टरों को दिखा लिया, लेकिन कुछ फर्क नहीं पड़ा,” एक दिन सासु माँ ने मुझे अपने कमरे में बुलाकर कहा।
मैं चुपचाप सिर झुकाए खड़ी रही। मेरी आँखों में आँसू थे, लेकिन मैं रोना नहीं चाहती थी।
“माँ, मुझे माफ़ कर दीजिए… मैं…” मैं कुछ कह नहीं पाई।
सासु माँ ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, “नहीं बेटी, मैं तुम्हें दोषी नहीं मानती। लेकिन मैंने एक बाबा के बारे में सुना है। वे बहुत सिद्ध पुरुष हैं। कहते हैं, उनके आश्रम में जो भी बांझ औरत आती है, वह कुछ ही दिनों में गर्भवती हो जाती है।”
मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा, “कौन से बाबा, माँ?”
“बाबा गोविंदानंद,” सासु माँ ने धीरे से कहा। “वे शहर से दूर, पहाड़ों के बीच अपने आश्रम में रहते हैं। उनके पास दिव्य शक्तियाँ हैं। मैंने सुना है, वे रात भर मंत्र जपकर और विशेष पूजा करके बांझपन दूर कर देते हैं।”
मैंने सोचा, इतने सालों से हम कितने इलाज़ कर चुके हैं, एक बार और कोशिश करने में क्या हर्ज है?
“माँ, अगर आप चाहें तो हम जा सकते हैं,” मैंने हिम्मत करके कहा।
सासु माँ के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आई। “हाँ बेटी, हम कल ही निकलेंगे।”
अगले दिन सुबह, मैं और मेरी सासु माँ बाबा गोविंदानंद के आश्रम की ओर निकल पड़े। रास्ता बहुत लंबा था—पहले ट्रेन से फिर बस से और फिर पैदल चलकर पहाड़ी रास्तों से होते हुए।
शाम को हम आश्रम पहुँचे। वह एक बड़ा सा परिसर था, जहाँ हरियाली थी, फूल थे, और एक अलग ही शांति थी। आश्रम के बीच में एक बड़ा हॉल था, जहाँ भक्तों की भीड़ लगी हुई थी।
हमने इंतज़ार किया और शाम को करीब छह बजे हमें बाबा से मिलने का मौका मिला।
बाबा गोविंदानंद लगभग ४५-५० साल के लग रहे थे। उनकी लंबी सफेद दाढ़ी थी, लंबे बाल थे जो गंदे में बंधे हुए थे, और उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी।
उन्होंने केवल एक नारंगी रंग का धोती पहना हुआ था, और उनका शरीर काफी गठीला और तंदुरुस्त दिख रहा था—जैसे वे रोज योग और व्यायाम करते हों।
जब हम अंदर गए, तो बाबा ने मुझे देखा और मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मेरे दिल को छू गया।
“आओ, बेटी,” बाबा ने मुझे अपने पास बुलाया।
मैं डरी-सहमी सी उनके सामने बैठ गई।
सासु माँ ने सारी बात बताई—कि मुझे सात साल हो गए हैं, कितने डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
बाबा ध्यान से सुनते रहे।
फिर उन्होंने मेरी आँखों में देखा और कहा, “तुम्हारे भाग्य में संतान का योग है, बेटी। लेकिन तुम्हारे शरीर में कुछ रुकावटें हैं जिन्हें दूर करना होगा।”
“क्या करना होगा, बाबा?” मेरी सासु माँ ने पूछा।
बाबा ने गंभीरता से कहा, “इसे ठीक करने के लिए एक विशेष साधना करनी होगी। बेटी को रात भर यहीं आश्रम में रहना होगा। मैं मंत्र जप करूँगा, पूजा करूँगा, और दिव्य ऊर्जा को उनके शरीर में स्थानांतरित करूँगा।”
मेरी सासु माँ थोड़ी चिंतित दिखीं, “अकेले? रात भर?”
“हाँ,” बाबा ने कहा। “यह साधना रात के समय ही होती है, जब सारी शक्तियाँ सक्रिय होती हैं। आप चिंता न करें। कल सुबह तक सब ठीक हो जाएगा।”
सासु माँ ने मेरी तरफ देखा। मैंने हामी भर दी। हम कितने सालों से इसी उम्मीद में थे।
अगर इससे मेरा बांझपन दूर हो सकता था, तो मैं कुछ भी करने को तैयार थी।
“ठीक है, बाबा,” सासु माँ ने कहा। “मैं कल सुबह आकर इसे ले जाऊँगी।”
सासु माँ के जाने के बाद, आश्रम में शांति छा गई। अन्य भक्त भी जा चुके थे।
बाबा ने मुझे अपने निजी कमरे में ले जाने का इशारा किया।
वह कमरा बड़ा था, साफ-सुथरा, और सुगंधित अगरबत्तियों की खुशबू से महक रहा था।
बीच में एक बड़ा बिस्तर बिछा हुआ था, और चारों ओर मोमबत्तियाँ जल रही थीं।
“बैठो, बेटी,” बाबा ने कहा।
मैं बिस्तर के किनारे बैठ गई। बाबा मेरे पास आए और मेरे सामने फर्श पर बैठ गए।
“तुम बहुत सुंदर हो, साधना,” बाबा ने अचानक कहा।
मैं चौंक गई। यह पहली बार था जब किसी पुरुष ने मुझे इतनी सीधे तारीफ की थी—वो भी एक साधु ने।
“बाबा, आप…” मैं शर्मा गई।
“डरो मत, बेटी,” बाबा ने कहा। “मैं तुम्हें देख रहा हूँ। तुम्हारे चेहरे पर उदासी है, तुम्हारे शरीर में तनाव है। यही वजह है कि तुम माँ नहीं बन पा रही हो।”
वे उठे और मेरे पीछे आकर खड़े हो गए। उन्होंने धीरे से मेरे कंधों पर हाथ रखा।
उनके हाथ गर्म थे, और उनके स्पर्श से मेरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
“आँखें बंद करो, बेटी,” बाबा ने फुसफुसाते हुए कहा।
मैंने आँखें बंद कर लीं। बाबा के हाथ मेरे कंधों से होते हुए मेरी गर्दन तक गए।
वे धीरे-धीरे मेरी गर्दन को दबाने लगे, मालिश करने लगे।
“तुम बहुत तनाव में हो, साधना,” बाबा ने कहा। “यह तनाव तुम्हारे शरीर को बांझ बना रहा है। इसे दूर करना होगा।”
उनके हाथ इतने सौम्य थे, इतने कुशल थे, कि मैं धीरे-धीरे आराम महसूस करने लगी। वे मेरी गर्दन के पीछे के हिस्से को दबा रहे थे, और मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।
“बाबा, यह…” मैंने कहना चाहा।
“शhhh… बस महसूस करो,” बाबा ने मेरे कान के पास फुसफुसाया।
उनकी साँसें मेरे गाल को छू रही थीं, और मेरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी पैदा हो रही थी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा था, लेकिन मुझे यह अच्छा लग रहा था।
बाबा ने धीरे से मेरे बालों को एक तरफ किया और मेरी गर्दन पर हल्के-हल्के चूमने लगे।
मैं काँप उठी, लेकिन मैंने विरोध नहीं किया। कुछ तो था जो मुझे रोक रहा था—शायद उनकी आँखों में वह चमक, या फिर माँ बनने की इच्छा।
“साधना, तुम्हें समझना होगा,” बाबा ने कहा। “तुम्हारे शरीर में ऊर्जा का संचार बंद हो गया है। इसे फिर से जागृत करना होगा। और इसके लिए… तुम्हें शारीरिक रूप से पूरी तरह से खुलना होगा।”
मैंने आँखें खोली और उनकी तरफ देखा। उनकी आँखों में वासना और करुणा का अजीब संगम था।
“मैं कुछ समझा नहीं, बाबा,” मैंने कहा।
बाबा ने मेरे हाथ पकड़े और मुझे खड़ा किया। “तुम्हारे पति से तुम्हारा शारीरिक संबंध कैसा है?”
मैं शर्मा गई। “वो… वो ठीक है, बाबा।”
“सच कहो, साधना,” बाबा ने मेरी ठोड़ी उठाई। “क्या वह तुम्हें पूरी तरह से संतुष्ट कर पाते हैं? क्या तुम्हें वो आनंद मिलता है जो एक स्त्री को मिलना चाहिए?”
मैंने सिर झुकाया। सच तो यह था कि रोहित बहुत अच्छे थे, लेकिन वे जल्दी खत्म हो जाते थे।
मुझे कभी वह पूरा आनंद नहीं मिला था जिसके बारे में मेरी सहेलियाँ बताती थीं।
“नहीं, बाबा,” मैंने धीरे से कहा।
“तो फिर सुनो,” बाबा ने कहा। “मैं तुम्हें वह आनंद दूँगा जो तुमने कभी महसूस नहीं किया। मैं तुम्हारे शरीर की हर कोशिका को जगाऊँगा। और जब तुम पूरी तरह से खुल जाओगी, तभी मेरी दिव्य ऊर्जा तुम्हारे भीतर प्रवेश करेगी और तुम गर्भवती हो जाओगी।”
यह सुनकर मेरे मन में दो भाव आए—एक तरफ शर्म थी, दूसरी तरफ उत्सुकता।
लेकिन मैंने खुद को शांत रखा। मैं माँ बनना चाहती थी, और अगर यह रास्ता था, तो मैं इसे अपनाने को तैयार थी।
“मैं तैयार हूँ, बाबा,” मैंने कहा।
बाबा ने मुस्कुराते हुए मेरे चेहरे को अपने हाथों में लिया। “तुम बहुत बहादुर हो, साधना।”
फिर उन्होंने धीरे से मेरे गाल पर चूमा। उनके होंठ गर्म थे, नरम थे। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
बाबा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से मेरे सूट की चेन नीचे खींची। मैं काँप रही थी, लेकिन मैंने उन्हें रोका नहीं।
“डरो मत, बेटी,” बाबा ने कहा। “यह एक पवित्र क्रिया है। तुम्हारे शरीर को मुक्त करना जरूरी है।”
वे धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारने लगे। पहले मेरा दुपट्टा गिरा, फिर उन्होंने मेरे कुर्ते के बटन खोले।
मैंने केवल एक सादा सफेद ब्रा पहनी हुई थी, और मेरे दुध उसमें कसे हुए थे।
“वाह, कितना सुंदर शरीर है तुम्हारा,” बाबा ने आश्चर्य से कहा।
उन्होंने मेरे पीछे हाथ फेराया और मेरे ब्रा की हुक खोल दी। ब्रा ढीली हो गई और बाबा ने उसे आगे से खींचकर उतार दिया।
मेरे दुध आज़ाद हो गए। वे गोल, मुलायम और भरे हुए थे।
बाबा ने उन्हें देखते हुए कहा, “तुम्हारे दुध तो किसी कुंवारी लड़की जैसे कड़क और सुडौल हैं।”
मैं शर्म से लाल हो गई। “बाबा, प्लीज…”
“नहीं, साधना,” बाबा ने कहा। “शर्माओ मत। अपने शरीर को स्वीकार करो। यह तो ईश्वर का वरदान है।”
वे आगे बढ़े और धीरे से मेरे एक दुध को अपने हाथ में ले लिया।
उनका स्पर्श इतना नरम था कि मैं सिहर उठी। वे मेरे दुध को धीरे-धीरे मसलने लगे, जैसे कोई आटा गूँथ रहा हो।
“आह्ह्ह…” मुझसे एक हल्की सी आवाज़ निकल गई।
“अच्छा लग रहा है?” बाबा ने पूछा।
“हाँ, बाबा,” मैंने कहा।
वे मेरे दूसरे दुध को भी उसी तरह सहलाने लगे। फिर वे नीचे झुके और मेरे दुध के निप्पल को अपने मुँह में ले लिया।
“ओह्ह्ह…” मैंने सिर पीछे करते हुए कहा।
बाबा धीरे-धीरे मेरे निप्पल को चूसने लगे, कभी हल्के से काटते, कभी जीभ से चाटते।
मेरे शरीर में आग लगने लगी थी। मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक रही थी।
“बाबा… यह…” मैं हाँफ रही थी।
बाबा ने मेरे दुधों से खेलना जारी रखा। वे एक-एक करके दोनों को बराबर ध्यान दे रहे थे।
मेरे निप्पल कड़े हो गए थे, और मुझे अपने शरीर में एक अजीब सी खिंचाव महसूस हो रही थी—नीचे की ओर, मेरी बुर की ओर।
“अब तुम्हारे नीचे के वस्त्र भी उतरने चाहिए,” बाबा ने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा। बाबा ने मेरे हाथ पकड़े और मुझे बिस्तर पर बैठने के लिए कहा। मैं बैठ गई।
वे मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गए और धीरे से मेरे सलवार का नाड़ा खोलने लगे।
“उठो थोड़ा,” बाबा ने कहा।
मैंने अपने कूल्हे उठाए और बाबा ने मेरी सलवार और साथ में मेरी पैंटी भी नीचे खींच ली।
मैं पूरी तरह से नंगी हो गई थी। मेरा शरीर उनके सामने खुला था—मेरे दुध, मेरी बुर, मेरी जाँघें—सब कुछ।
बाबा ने मेरी जाँघों को चूमा। “कितनी सुंदर जाँघें हैं तुम्हारी, साधना। इतनी मुलायम, इतनी गोरी।”
उनके होंठ मेरी जाँघों पर चल रहे थे, ऊपर की ओर बढ़ रहे थे। मैं काँप रही थी, मेरी साँसें तेज हो गई थीं।
“खोलो अपने पैर, बेटी,” बाबा ने कहा।
मैंने धीरे-धीरे अपने पैर फैलाए। बाबा ने मेरी बुर को देखा। मेरी बुर पर हल्के-हल्के बाल थे, और वह गुलाबी रंग की थी।
“बहुत सुंदर,” बाबा ने कहा। “पूरी तरह से खिली हुई, जैसे कोई गुलाब का फूल।”
वे नीचे झुके और मेरी बुर पर हल्का सा चूमा। मैं सिहर उठी।
“बाबा, आप क्या…” मैं घबराई।
“यह पवित्र चुंबन है, साधना,” बाबा ने कहा। “यह तुम्हारी बुर को पवित्र करेगा।”
उन्होंने अपनी जीभ बाहर निकाली और मेरी बुर की फाँकों पर चलाने लगे। मैं पागल होने लगी थी। यह अनुभव मेरे पति ने कभी नहीं दिया था।
“ओह्ह्ह… अह्ह्ह… बाबा…” मैं कराहने लगी।
बाबा मेरी बुर को चाट रहे थे, और मैं बिस्तर पर पीछे की ओर झुक गई। मैंने अपने हाथों से बिस्तर पकड़ लिया और अपने पैर और फैला दिए।
“क्या मज़ा आ रहा है, साधना?” बाबा ने पूछा, उनकी जीभ अभी भी मेरी बुर पर थी।
“हाँ, बाबा… बहुत अच्छा…” मैंने हाँफते हुए कहा।
“यह तो अभी शुरुआत है,” बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा।
वे उठे और अपनी धोती खोलने लगे। जब उन्होंने अपनी धोती हटाई, तो मैं उनके शरीर को देखकर चौंक गई। बाबा का शरीर बहुत गठीला था—उनकी छाती चौड़ी थी, पेट एकदम सपाट था, और उनके नीचे…
उनका लंड बहुत बड़ा था। वह काफी मोटा और लंबा दिख रहा था, और वह पूरी तरह से खड़ा था, मेरी ओर तने हुए।
“बाबा, यह तो बहुत…” मैंने घबराते हुए कहा।
“डरो मत, बेटी,” बाबा ने कहा। “यह दिव्य शक्ति है। यही तुम्हें माँ बनाएगी।”
वे बिस्तर पर आए और मेरे पास लेट गए। उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और मेरे होंठों पर चूमा।
“तुम्हारे होंठ बहुत रसीले हैं, साधना,” बाबा ने कहा।
वे मुझे कसकर पकड़े और मेरे होंठों को चूसने लगे। उनका लंड मेरी जाँघों के बीच में टिका हुआ था, और वह गर्म था, बहुत गर्म।
“बाबा, मुझे डर लग रहा है,” मैंने कहा।
“मैं हूँ ना,” बाबा ने कहा। “मैं धीरे-धीरे करूँगा। तुम्हें दर्द नहीं होगा, सिर्फ आनंद मिलेगा।”
वे मेरे ऊपर आ गए। उनका वजन मुझ पर था, लेकिन वह बोझिल नहीं लग रहा था। उन्होंने अपने हाथों से मेरे दुधों को सहलाना शुरू किया और मेरे होंठों पर चूमना जारी रखा।
“तुम बहुत कोमल हो, साधना,” बाबा ने कहा। “जैसे कोई मखमल का कपड़ा हो।”
बाबा ने अचानक मुझे नीचे की ओर धकेल दिया। “अब तुम्हें भी मेरी दिव्य शक्ति को स्पर्श करना होगा, बेटी,” उन्होंने कहा।
मैं समझ गई कि वे क्या चाहते हैं। वे अपने पैर फैलाकर बैठ गए और उनका लंड मेरी ओर तना हुआ था।
“चूसो इसे, साधना,” बाबा ने कहा। “अपने मुँह से इसे पवित्र करो।”
मैंने कभी ऐसा नहीं किया था। रोहित ने कभी नहीं माँगा था। लेकिन बाबा की आँखों में वह चमक देखकर मैं मना नहीं कर सकी।
मैं धीरे-धीरे नीचे झुकी और उनके लंड को अपने हाथ में लिया। वह गर्म था, कड़ा था, और तने हुए नसों से भरा हुआ था।
“डरो मत,” बाबा ने कहा। “बस अपना मुँह खोलो।”
मैंने अपने होंठ खोले और उनके लंड के सिरे को अपने मुँह में ले लिया। वह इतना बड़ा था कि मुझे अपना मुँह पूरा खोलना पड़ा।
“ओह्ह्ह… हाँ… बहुत अच्छा, साधना…” बाबा ने कराहते हुए कहा।
मैं धीरे-धीरे उनके लंड को अपने मुँह में आगे-पीछे करने लगी। उनका लंड मेरे थूक से गीला हो गया, और वह और भी चिकना हो गया।
“चूसो और ज़ोर से, बेटी,” बाबा ने कहा। “अपनी जीभ से चाटो।”
मैंने उनकी बात मानी। मैंने अपनी जीभ से उनके लंड के सिरे को चाटना शुरू किया, फिर नीचे की ओर, फिर ऊपर। बाबा की साँसें तेज हो गईं।
“बहुत अच्छा कर रही हो, साधना,” बाबा ने कहा। “तुम प्राकृतिक प्रतिभा हो।”
मैं उनके लंड को और गहराई तक अपने मुँह में लेने लगी। कभी-कभी मुझे घुटन होती, लेकिन मैं रुकी नहीं। मैं चाहती थी कि बाबा खुश हों।
“बस… बस… अब रुको,” बाबा ने कहा। “अभी मुझे तुम्हारी बुर में जाना है।”
बाबा ने धीरे से अपने एक हाथ से अपने लंड को पकड़ा और मेरी बुर के मुँह पर रखा। मेरी बुर गीली थी, और उनके लंड का अगला हिस्सा गीला हो गया।
“तैयार हो, साधना?” बाबा ने पूछा।
मैंने हामी भरी। मैं उस क्षण के लिए तैयार थी, भले ही मुझे डर लग रहा था।
बाबा ने धीरे से अपने कूल्हे आगे किए। उनके लंड का सिरा मेरी बुर में प्रवेश कर गया।
“आह्ह्ह…” मैंने हल्की सी चीख भरी।
“दर्द हो रहा है?” बाबा ने पूछा।
“थोड़ा… लेकिन चलिए,” मैंने कहा।
बाबा ने धीरे-धीरे और अंदर धकेलना शुरू किया। उनका लंड मेरी बुर को फैलाता हुआ अंदर जा रहा था। मैंने अपने नाखून बिस्तर में गाड़ दिए।
“कितनी टाइट हो तुम, साधना,” बाबा ने कहा। “जैसे कोई कुंवारी हो।”
“सात साल हो गए शादी को, बाबा… फिर भी…” मैंने कहा।
“तुम्हारा शरीर इंतज़ार में था असली पुरुष का,” बाबा ने कहा। “अब मिल गया ना।”
वे पूरी तरह से अंदर आ गए। उनका लंड मेरी बुर को पूरी तरह से भर चुका था। मैंने ऐसा भराव महसूस किया जो पहले कभी नहीं हुआ था।
“कैसा लग रहा है?” बाबा ने पूछा।
“बहुत अच्छा, बाबा,” मैंने सच कहा। “पूरी तरह से भरी हुई महसूस कर रही हूँ।”
बाबा ने धीरे-धीरे अपने कूल्हे हिलाना शुरू किया। वे अंदर-बाहर कर रहे थे, लेकिन बहुत धीरे-धीरे, बहुत प्यार से।
“यह साधना है, साधना,” बाबा ने कहा। “जल्दबाज़ी नहीं। धीरे-धीरे, प्यार से, ऊर्जा को स्थानांतरित करना होगा।”
मैंने अपने पैर उठाए और उनकी कमर के चारों ओर लपेट लिए। यह मदद कर रहा था—वे और गहराई तक मुझे महसूस हो रहे थे।
“ओह्ह्ह… बाबा… यह…” मैं बोल नहीं पा रही थी।
“बोलो, साधना,” बाबा ने कहा। “क्या महसूस कर रही हो?”
“मुझे लग रहा है… जैसे कोई आग जल रही है अंदर… और वह आग बढ़ रही है…” मैंने कहा।
“वह आनंद की आग है, बेटी,” बाबा ने कहा। “उसे बुझने मत दो। उसे बढ़ने दो।”
वे अपनी गति थोड़ा तेज कर दी, लेकिन फिर भी धीमी थी। वे हर धक्के के साथ मेरी बुर की दीवारों को छू रहे थे, और मुझे एक अलग ही दुनिया में ले जा रहे थे।
“बाबा, मैं… मैं कुछ अजीब सा महसूस कर रही हूँ…” मैंने कहा।
“ओर्गेज्म आने वाला है, साधना,” बाबा ने कहा। “छोड़ दो खुद को। आ जाने दो।”
बाबा ने एक हाथ से मेरे दुधों को पकड़ लिया और उन्हें मसलने लगे। वे चुचियाना कर रहे थे—मेरे दुधों को नीचे से ऊपर की ओर दबाते, फिर निप्पलों को घुमाते।
“तेरे दुध बहुत मस्त हैं, साधना,” बाबा ने कहा। “इतने बड़े, इतने मुलायम।”
मैंने खुद को बहा दिया। मेरे शरीर में एक लहर सी उठी, जो पेट से शुरू होकर पूरी बुर में फैल गई। मैं काँपने लगी, मेरे पैर अकड़ गए, और मैंने एक लंबी साँस छोड़ी।
“आह्ह्ह्ह्ह… बाबा… ओह्ह्ह…”
मैं झड़ गई थी। यह मेरा पहला असली ओर्गेज्म था, और यह बहुत तेज़ था, बहुत लंबा। मैं बिस्तर पर तड़प रही थी, और बाबा मुझे पकड़े हुए थे, मुझे सहारा दे रहे थे।
“बहुत अच्छा, साधना,” बाबा ने कहा। “अब तुम पूरी तरह से खुल गई हो। अब असली साधना शुरू होगी।”
वे अभी भी मेरे अंदर थे, और वे फिर से धीरे-धीरे हिलने लगे। मेरी बुर अभी भी संवेदनशील थी, और हर धक्के से मुझे एक नया झटका लग रहा था।
“बाबा, मैं फिर से…” मैंने कहा।
“हाँ, आ जाने दो,” बाबा ने कहा। “जितनी बार आएगा, उतनी बार तुम्हारा शरीर शुद्ध होगा।”
मैंने खुद को उनकी गति के साथ छोड़ दिया। मैं ऊपर-नीचे होने लगी, उनके हर धक्के का जवाब देने लगी। हम एक साथ गति में आ गए थे, जैसे कोई नृत्य हो।
“क्या मज़ा आ रहा है, साधना?” बाबा ने पूछा।
“बहुत, बाबा… बहुत ज़्यादा…” मैंने कहा। “मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया…”
“तुम्हारे पति कभी तुम्हें ऐसा महसूस नहीं करा पाए ना?” बाबा ने पूछा।
“नहीं, बाबा… वे जल्दी खत्म हो जाते हैं…” मैंने कहा।
“आज रात मैं तुम्हें पूरा आनंद दूँगा,” बाबा ने कहा। “जब तक तुम थक न जाओ, मैं रुकूँगा नहीं।”
हम लगातार एक दूसरे में जुड़े हुए थे। बाबा ने मुझे अलग-अलग तरह से चोदा—कभी मैं ऊपर आ जाती, कभी वे पीछे से आते, कभी हम खड़े होकर करते।
हर बार वे मुझे नए आनंद की सीमा पर ले जाते। मैं बार-बार झड़ रही थी, और हर बार मेरा शरीर और ज़्यादा शिथिल हो रहा था, और ज़्यादा खुला हो रहा था।
“बाबा, मैं थक गई हूँ…” एक समय पर मैंने कहा।
“थोड़ी देर और, साधना,” बाबा ने कहा। “मेरी ऊर्जा अभी तुम्हारे भीतर पूरी तरह से नहीं गई है।”
वे मुझे पीछे से चोद रहे थे। मैं घुटनों के बल थी, और वे मेरे पीछे खड़े होकर मुझे पकड़े हुए थे। उनके हाथ मेरे दुधों पर थे, और वे मुझे कसकर पकड़े हुए थे।
“बाबा, आपकी ऊर्जा कैसे आएगी?” मैंने पूछा।
“जब मैं तुम्हारे अंदर झड़ूँगा,” बाबा ने कहा, “तब मेरी दिव्य शक्ति तुम्हारी बुर में प्रवेश करेगी। और वह शक्ति तुम्हें गर्भवती बनाएगी।”
“तो प्लीज, बाबा… अब कर दीजिए…” मैंने कहा।
“अभी नहीं,” बाबा ने कहा। “पहले तुम और खुलो। पहले तुम पूरी तरह से तैयार हो जाओ।”
बाबा ने अचानक अपना लंड बाहर निकाल लिया। “अब फिर से चुसो, बेटी,” उन्होंने कहा। “अपने मुँह से इसे और मज़बूत करो।”
मैंने बिना सोचे उनका लंड अपने मुँह में ले लिया। वह मेरी बुर के रस से गीला था, लेकिन मुझे कोई परवाह नहीं थी। मैं उसे जीभ से चाटने लगी, फिर गहराई तक चूसने लगी।
“हाँ… हाँ… बहुत अच्छा…” बाबा ने कराहते हुए कहा।
मैं उनके लंड को पूरा अपने गले तक लेने की कोशिश कर रही थी। मेरा मुँह पूरा खुला हुआ था, और मैं उसे आगे-पीछे कर रही थी।
“बस… बस… अब बहुत हो गया,” बाबा ने कहा। “अब मुझे तुम्हारी बुर में वापस जाना है।”
वे मुझे फिर से बिस्तर पर लिटाया। इस बार उन्होंने मेरे पैर अपने कंधों पर रखे और मेरी बुर के सीधे ऊपर आ गए।
“अब तुम्हें और गहराई तक मिलेगा,” बाबा ने कहा।
उन्होंने अपना लंड मेरी बुर में डाला और एक ज़ोर का धक्का लगाया। मैं चीख उठी।
“आह्ह्ह… बाबा… यह बहुत अंदर जा रहा है…”
“यही तो चाहिए, बेटी,” बाबा ने कहा। “मेरा लंड तुम्हारी बुर के सबसे गहरे कोने तक जाना चाहिए।”
वे तेज़ी से धक्के लगाने लगे। अब वे धीरे नहीं कर रहे थे—वे पूरी तेज़ी से मुझे चोद रहे थे।
लगभग दो घंटे बाद, जब मैं पूरी तरह से थक चुकी थी, जब मेरा शरीर पूरी तरह से खुल चुका था, बाबा ने कहा, “अब समय आ गया है, साधना।”
वे मुझे फिर से अपनी गोद में लिटाया। मेरे पैर फैले हुए थे, और वे मेरे ऊपर थे। उनका लंड अभी भी मेरी बुर में था, और वे धीरे-धीरे हिल रहे थे।
“बाबा, मैं तैयार हूँ,” मैंने कहा।
“देखो मेरी आँखों में, साधना,” बाबा ने कहा।
मैंने उनकी आँखों में देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, एक दिव्य प्रकाश था।
“अब मैं तुम्हें अपनी ऊर्जा दे रहा हूँ,” बाबा ने कहा।
वे अपनी गति तेज करने लगे। वे अब तेज़ी से अंदर-बाहर हो रहे थे, और मैं फिर से उसी चरम सीमा पर पहुँचने लगी थी।
“आह्ह्ह… बाबा… मैं फिर से आ रही हूँ…” मैंने कहा।
“मैं भी, साधना… मैं भी…” बाबा ने कहा।
“अंदर ही छोड़ दीजिए, बाबा… प्लीज…” मैंने कहा।
“हाँ… अभी…”
बाबा ने एक ज़ोर का धक्का लगाया, और वे मेरी बुर के सबसे गहरे हिस्से में पहुँच गए।
फिर मैंने महसूस किया कि उनका लंड मेरी बुर में फड़क रहा है, और गर्म तरल मेरी बुर में भर रहा है।
“ओह्ह्ह… बाबा… यह…” मैंने कहा।
बाबा का वीर्य मेरी बुर में बह रहा था। वह इतना ज़्यादा था कि वह बाहर बहकर मेरी जाँघों पर आ गया।
वह गर्म था, बहुत गर्म, और मैं महसूस कर सकती थी कि वह मेरी बुर की गहराइयों तक पहुँच रहा था।
बाबा थककर मेरे ऊपर गिर पड़े। हम दोनों हाँफ रहे थे, पसीने से तर थे, लेकिन पूरी तरह से संतुष्ट थे।
जब सुबह हुई, तो मैं उठी और अपने आप को देखा। मेरा शरीर हल्का महसूस कर रहा था, और मेरी बुर में अभी भी बाबा के वीर्य का एहसास था।
बाबा जाग चुके थे। उन्होंने मुझे मुस्कुराते हुए देखा और कहा, “कैसा लग रहा है, साधना?”
“बहुत अच्छा, बाबा,” मैंने कहा। “जैसे कोई बोझ उतर गया हो।”
“वह बोझ तुम्हारी बांझपन थी,” बाबा ने कहा। “अब वह चली गई है। तुम्हारी बुर अब पवित्र हो गई है, और वह गर्भधारण के लिए तैयार है।”
मैंने उनके पैर छुए। “धन्यवाद, बाबा।”
“जाओ अब,” बाबा ने कहा। “तुम्हारी सासु माँ आती होंगी। और याद रखना, यह रात तुम्हें किसी से नहीं बतानी। यह हमारे बीच का रहस्य है।”
“मैं वादा करती हूँ, बाबा,” मैंने कहा।
मैंने अपने कपड़े पहने और बाहर आ गई। कुछ ही देर में मेरी सासु माँ आईं। उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराईं।
“तुम्हारे चेहरे पर एक अलग सी चमक है, बहू,” उन्होंने कहा।
“हाँ, माँ,” मैंने कहा। “बाबा ने मुझे ठीक कर दिया है।”
घर लौटने के बाद, मैंने अपने पति से शारीरिक संबंध बनाए। रोहित ने भी नोटिस किया कि मैं बदल गई हूँ—मैं और ज़्यादा उत्साहित थी, और ज़्यादा भागीदार थी।
दो हफ्ते बाद, जब मुझे माहवारी नहीं आई, तो मुझे शक हुआ। मैंने एक प्रेग्नेंसी टेस्ट किट खरीदी और जाँच की।
पॉजिटिव।
मैं रोने लगी—खुशी के आँसू। मैं माँ बनने वाली थी।
जब मैंने यह खबर घर में दी, तो सब खुश हो गए। रोहित ने मुझे गले लगा लिया, और मेरी सासु माँ ने मेरे पैर छुए।
“बाबा की कृपा है,” सासु माँ ने कहा। “उन्होंने हमारी बहू को माँ बना दिया।”
मैंने उनकी तरफ देखा और मुस्कुराई। मुझे पता था कि यह सच में बाबा की कृपा थी—उनकी उस रात की चुदाई की कृपा, जिसमें उन्होंने मेरी बुर चाटी, मेरे दुध चुचियाए, मुझसे लंड चुसवाया, और फिर मुझे इतनी बार चोदा कि मैं पूरी तरह से खुल गई।
नौ महीने बाद, मैंने एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया। जब मैंने उसे पहली बार अपनी गोद में लिया, तो मेरी आँखों में आँसू थे।
मैंने अपने बेटे को देखा और धीरे से कहा, “तेरी माँ को एक बाबा ने चोदकर माँ बनाया है, बेटे। तू उस बाबा की देन है।”
और मैंने आसमान की ओर देखा, जहाँ कहीं बाबा गोविंदानंद अपने आश्रम में होंगे, और मुस्कुराई।
मेरी ज़िंदगी पूरी हो गई थी। मैं एक माँ थी, और यह सब उस रात की कमाल थी जब बाबा ने मेरी बुर चाटी, मेरे दुध दबाए, मुझसे लंड चुसवाया, और फिर मुझे चोदकर प्रेग्नेंट किया था।
- मेरे बेटे ने मुझे और अपनी सगी बहन को एकसाथ चोदा
- मैंने माला को अपने बड़े लंड से चोदकर इलाज किया
- 6 शराबियों ने मुझे पकड़ कर अरहर के खेत में ग्रुप में चोद दिए
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