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मेरा नाम राधा है। मैं मुरादाबाद से हूँ, लेकिन अब दिल्ली में रहती हूँ। उम्र है तेईस साल, और दिल्ली जैसे शहर में अकेले रहकर काम करना अपने आप में एक कहानी है।
मैं एक कॉल सेंटर में जॉब करती हूँ, रात की शिफ्ट में बैठकर अंग्रेज़ी में बातें करती हूँ, हेडफ़ोन लगाकर मुस्कुराती हूँ, और जब कॉल कट जाती है तो मेरी मुस्कान भी साथ कट जाती है।
क्योंकि असल ज़िंदगी में कोई मुझे देखने वाला नहीं था। बस स्क्रीन, बस आवाज़ें, बस घंटे।
मगर भगवान ने मुझे ऐसा शरीर दिया था कि दिल्ली की भीड़ में भी लोग मुड़कर देखते थे।
मैं देखने में बहुत सेक्सी और हॉट हूँ — यह मेरा अपना अहंकार नहीं, यह सच्चाई है। मेरे गालों पर जब हल्की लाली आती है, तो आसपास के मर्दों की नज़रें भटक जाती हैं।
मेरी आँखें बड़ी-बड़ी, भौंहें घनी, और होंठ ऐसे जैसे किसी ने गुलाब की पंखुड़ियाँ तराश दी हों। लेकिन असली जादू तो मेरे शरीर में था।
मेरी चूचियों का साइज़ चौंतीस है। यह साइज़ अपने आप इतना नहीं बना — इसे बनाया है मेरे गाँव के लड़कों ने।
जब मैं किशोरी थी, तब भी ये उभर रही थीं, और गाँव के लड़के मुझे देखकर फुसफुसाते थे।
फिर जो हुआ, वह धीरे-धीरे हुआ — किसी ने खींचकर, किसी ने चूसकर, किसी ने दबाकर। मेरी चूचियाँ उनके हाथों में खेल-खेल में बड़ी हो गईं।
आज जब मैं ब्रा पहनती हूँ, तो वह भी कसकर पहननी पड़ती है, वरना सब कुछ हिलता-डुलता साफ़ दिख जाता है।
और मुझे अच्छा लगता है जब दिखता है। मुझे अच्छा लगता है जब मर्द मेरी चूचियों को देखकर अपनी जीभ से होंठ गीले करते हैं।
मेरी कमर बहुत पतली है, अट्ठाईस इंच की। इतनी पतली कि जब मैं साड़ी या कुर्ती पहनती हूँ तो मेरे कूल्हों और चूचियों के बीच एक ऐसा घुमाव बनता है जिसे देखकर आदमी का दिमाग़ घूम जाता है।
और फिर मेरी गांड — छत्तीस इंच की, बाहर की तरफ़ निकली हुई, गोल, भरी हुई, ऐसी जिसे देखकर किसी का भी लंड खड़ा हो जाए।
मेरी गांड पर जब दिल्ली की धूप पड़ती है, तो जींस भी कसकर बैठती है, और पीछे से देखने वाला आदमी एक बार नहीं, दो बार देखता है। मैंने कई बार ऑफिस की लिफ़्ट में पीछे से आँखें महसूस की हैं।
मुरादाबाद से दिल्ली आना मेरे लिए बड़ा कदम था। घर में पिताजी सख़्त थे, माँ धार्मिक थीं, भाई जल्दी में रहता था।
मेरी सहेलियाँ कहती थीं, “राधा, तू इस गाँव की नहीं है, तेरा शरीर तो शहर का है।” और मैं हँसती थी।
लेकिन सच यह था कि मेरे अंदर एक ऐसी भूख थी जिसे गाँव की मिट्टी ने जगाया था और शहर की रोशनी ने बढ़ाया था।
मुझे मर्दों के हाथ पसंद थे। मुझे उनकी बाँहें, उनकी पीठ, उनका पसीना, और उनकी नज़रें पसंद थीं।
दिल्ली में मेरा एक छोटा-सा कमरा था। एक खिड़की, एक पंखा, एक चारपाई, और एक आयरन का दरवाज़ा।
रात को जब मैं कपड़े बदलती थी, तो अपने ही शरीर को देखकर मुझे कभी-कभी गर्व होता था और कभी-कभी अकेलापन सताता था।
मेरे चूचियों के निप्पल छूने के लिए तरसते थे, मेरी बुर गर्मी में पसीने से भीग जाती थी, और मेरी गांड तकिये को दबाकर सोना मुझे अच्छा लगता था। लेकिन असली आदमी का लंड तो अभी मिलना बाकी था।
फिर आया वह दिन।
उस दिन सुबह मैं स्नान करके निकली, तो आईने ने मुझे देखा और मैंने भी उसे देखा। मैंने सफ़ेद कुर्ती पहनी थी, ऊपर से हल्का काला दुपट्टा, और नीचे जींस।
कुर्ती थोड़ी कसी हुई थी, इसलिए मेरी चूचियों के निप्पल कपड़े से हल्के-हल्के दिख रहे थे — ठीक उसी तरह जैसे कोई फल अपने छिलके से झाँकता है।
मैंने बाल खोले रखे, होंठों पर हल्का गुलाबी लिपस्टिक लगाई, और जैसे ही कमरे से बाहर निकली, गली के नौजवानों ने एक साथ देखा।
एक लड़का साइकल पर था, उसकी साइकल लगभग रुक गई। मैं मन ही मन मुस्कुराई।
आज मुझे एक बड़े कॉल सेंटर में इंटरव्यू देना था। नाम था — ब्राइटलिंक सर्विसेज़, नोएडा के पास, एक बड़ी ग्लास वाली बिल्डिंग।
मैंने ऑटो पकड़ा, ऑटो वाले ने पहले पीछे देखा, फिर आगे मुड़कर देखा, फिर आईने में देखा।
उसने कहा, “मैडम, कहाँ जाना है?” मैंने कहा, “ब्राइटलिंक।”
वह मुस्कुराया और बोला, “आज तो वहाँ बहुत भीड़ है, इंटरव्यू का दिन है।”
मैंने कहा, “हाँ, मुझे भी वहीं जाना है।” उसने आईने से एक बार फिर मुझे देखा और ऑटो चला दिया।
रास्ते भर मैंने सोचा — कैसा होगा इंटरव्यू? क्या पूछेंगे? कितने राउंड होंगे? लेकिन जब मैं बिल्डिंग के सामने पहुँची, तो मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
इमारत बहुत बड़ी थी, शीशे की, जिसमें पूरा आसमान और पूरी सड़क दिख रही थी। अंदर घुसते ही ठंडी हवा ने मेरे शरीर को छुआ, और मेरे निप्पल और कड़े हो गए।
मैंने जल्दी से दुपट्टा आगे करके छिपाया, लेकिन छिपाने का फ़ायदा क्या, जब कपड़े के नीचे उभार साफ़ था।
लॉबी में लगभग तीस लोग बैठे थे — लड़के, लड़कियाँ, सब रिज़्यूमे लिए, सब घबराए हुए। मैं एक कोने में बैठ गई और फ़ॉर्म भरने लगी।
तभी मेरी नज़र चार लड़कों पर पड़ी, जो दूसरी तरफ़ खड़े हँस-हँसकर बातें कर रहे थे। वे बाक़ी लोगों से अलग थे।
उनके चेहरे पर घबराहट नहीं, बल्कि मज़ा था। वे जैसे यहाँ इंटरव्यू देने नहीं, बल्कि किसी पार्टी में आए थे।
मैंने ध्यान से देखा।
पहला लड़का लंबा था, चौड़े कंधे, गहरे रंग की त्वचा, और बाँहों की नसें साफ़ दिख रही थीं। उसने काली टी-शर्ट पहनी थी जिसमें उसकी छाती और पेट की मांसपेशियाँ उभर रही थीं।
नाम — सुनील। वह जब हँसता था, तो उसकी गर्दन की नसें तन जाती थीं, और मुझे लगा कि इस आदमी की बाँहों में कोई भी लड़की पिघल जाएगी।
दूसरा लड़का थोड़ा गोरा था, चिकने बाल, तेज़ आँखें, और शरारती मुस्कान। उसने नीली शर्ट पहनी थी, आस्तीन चढ़ी हुई, और उसकी बाँहों पर भी मांसपेशियाँ थीं। नाम — साहिल।
वह बातें करते हुए अपनी उँगलियाँ चटकाता था और बार-बार इधर-उधर देखता था, जैसे हर चीज़ उसके लिए खेल हो।
तीसरा लड़का सबसे भारी-भरकम था, चौड़ी छाती, मोटी गर्दन, और ऐसी बाँहें जैसे लोहे की।
उसका नाम — राकेश। वह कम बोलता था, लेकिन जब बोलता तो सब सुनते थे। उसने ग्रे रंग की शर्ट पहनी थी, जो उसकी छाती पर खिंची हुई थी।
और चौथा — बबलू। सबसे छोटा उम्र में, लेकिन सबसे तेज़-तर्रार। घुँघराले बाल, मोटी भौंहें, और ऐसी मुस्कान जो सीधे दिल में उतर जाए।
उसने सफ़ेद टी-शर्ट और जींस पहनी थी। उसकी कलाइयाँ मोटी थीं, और जब वह हँसा, तो मुझे लगा जैसे कोई बच्चा और आदमी एक साथ हँस रहे हों।
मैंने मन ही मन सोचा — ये चारों तो किसी फ़िल्म के हीरो लगते हैं।
और फिर मैंने अपनी जाँघों को कसकर दबाया, क्योंकि मेरी बुर के अंदर कुछ हलचल हो रही थी। मुझे पता चल गया था कि यह दिन सिर्फ़ इंटरव्यू का दिन नहीं है।
फ़ॉर्म जमा करने के बाद हमें एक बड़े हॉल में बैठाया गया, जहाँ सबका इंतज़ार था।
मैंने देखा कि वे चारों भी वहीं आकर बैठ गए — ठीक मेरे पीछे की कुर्सियों पर।
मैंने सुना, सुनील ने कहा, “यार, इंटरव्यू में जो लड़की आगे बैठी है, उसे देखा?”
और साहिल ने कहा, “कौन, सफ़ेद कुर्ती वाली? अरे भाई, उसे देखकर तो मेरा मन कर रहा है कि इंटरव्यू छोड़कर इसी से बात करूँ।”
और बबलू हँसकर बोला, “बात तो करेंगे ही, पहले इंटरव्यू दे लें।” राकेश ने बस इतना कहा, “बॉडी कमाल की है।”
मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। मैंने पलटकर एक बार पीछे देखा — नहीं, दो बार।
और जब चौथी बार मैंने पलटकर देखा, तो सुनील ने आँख मिला ली और हाथ हिलाकर कहा, “हाय, आप भी इंटरव्यू के लिए आई हैं?”
मैंने कहा, “हाँ।”
साहिल झट से बोला, “अरे, हम तो समझे आप यहाँ की मैनेजर हैं, इतनी तो आप कॉन्फ़िडेंट लग रही हैं।” मैं हँस दी। और यहीं से बातचीत शुरू हो गई।
बातों-बातों में पता चला कि चारों इसी कॉल सेंटर में पहले से जॉब करते हैं — सुनील और राकेश टेक्निकल सपोर्ट में, साहिल सेल्स में, और बबलू कस्टमर केयर में।
वे आज यहाँ नए बैच के इंटरव्यू में मदद करने आए थे।
मैंने कहा, “तो फिर आप मुझे अंदर से बता सकते हैं, क्या पूछते हैं?”
बबलू ने कहा, “बिल्कुल, लेकिन शर्त है — इंटरव्यू के बाद चाय आपकी।”
मैंने कहा, “चाय तो ठीक है, लेकिन सिर्फ़ चाय?” और चारों एक साथ हँस पड़े।
सुनील ने कहा, “मैडम, आप तो शुरू से ही शरारती निकलीं।”
हम चारों बातें करने लगे, धीरे-धीरे इंटरव्यू का डर गायब हो गया। साहिल ने अपने काम के किस्से सुनाए — किस तरह विदेशी कस्टमर गुस्सा करते हैं, किस तरह वह उन्हें हँसाकर मनाता है।
बबलू ने बताया कि वह रात की शिफ्ट में काम करता है और दिन में जिम जाता है। राकेश ने कम शब्दों में बताया कि वह सुबह पाँच बजे उठता है और दौड़ता है।
और सुनील ने कहा, “हम चारों एक ही जिम जाते हैं, इसलिए हमारी दोस्ती और मज़बूत है।”
मैंने कहा, “इसीलिए चारों की बॉडी एक जैसी है?”
और साहिल ने गर्व से कहा, “एक जैसी नहीं, पर एक जैसी मेहनत से बनी है।”
मैंने उनकी बातें सुनीं और मन ही मन तय कर लिया — इन चारों से हर हाल में चुदवाना है।
इनकी बाँहें देखकर मेरी बुर में गर्मी बढ़ रही थी। इनकी आवाज़ सुनकर मेरे निप्पल कड़े हो रहे थे।
और जब बबलू ने हँसते हुए मेरी तरफ़ झुककर कहा, “आपकी आँखें बहुत खूबसूरत हैं,” तो मेरी साँस एक सेकंड के लिए रुक गई।
इंटरव्यू का नाम लिया गया। मैं अंदर गई, और सच कहूँ तो मुझे इतना अच्छा इंटरव्यू पहले कभी नहीं मिला।
सुनील ने मुझे पहले ही बता दिया था कि कौन-से सवाल आते हैं और किस तरह जवाब देना है।
मैंने आत्मविश्वास से सब जवाब दिए।
मैनेजर ने कहा, “आपका कॉन्फ़िडेंस बहुत अच्छा है, आप सेलेक्ट हो गई हैं।”
बाहर निकलते ही चारों ने मुझे घेर लिया और पूछा, “क्या हुआ?” मैंने मुस्कुराकर अंगूठा दिखाया।
साहिल ने ताली बजाई, बबलू ने कहा, “चलो फिर चाय पक्की!”
लेकिन चाय तो बहाना था।
हम पाँचों पास के एक कैफ़े में गए। शाम हो चुकी थी, लाइटें जल रही थीं, और कैफ़े में हल्का संगीत चल रहा था।
हमने कोने की एक बड़ी मेज़ पकड़ी। सुनील मेरे दाईं तरफ़ बैठा, बबलू बाईं तरफ़, सामने साहिल और राकेश।
चारों ने मिलकर मुझे बीच में बिठा दिया, जैसे मैं उनकी रानी हूँ। और मैं मन ही मन सोच रही थी — आज तो मैं इनकी रानी ही बनूँगी, और कल से इनकी रखैल भी।
कॉफ़ी आई, और बातें गहरी होने लगीं।
साहिल ने पूछा, “राधा जी, आप दिल्ली में अकेली रहती हैं?”
मैंने कहा, “हाँ।”
बबलू ने कहा, “अकेले रहना मुश्किल होता है न?”
मैंने कहा, “बहुत मुश्किल। रात को पंखा भी साथी नहीं लगता।”
राकेश पहली बार पूरे वाक्य में बोला, “तो हम आपके साथी बन जाएँ, क्या कहती हैं?”
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें शांत थीं, लेकिन उनके अंदर एक पक्का वादा था।
मैंने कहा, “आप चारों?” सुनील ने कहा, “हम चारों एक हैं, राधा। जो एक का है, वो चारों का है।” और मैं समझ गई कि उसका मतलब सिर्फ़ दोस्ती नहीं था।
बातें करते-करते शाम ढल गई। बबलू ने अपनी कुर्सी मेरे और करीब खिसका दी, और अब उसका घुटना मेरे घुटने से टकरा रहा था।
उसने माफ़ी माँगने के बजाय अपना घुटना वहीं टिका दिया। मेरे शरीर में एक झटका-सा गया।
सुनील ने मेरे हाथ की तरफ़ हाथ बढ़ाया, जैसे कुछ कहने के लिए, और उसकी उँगलियों ने मेरी उँगलियों को छू लिया।
वह स्पर्श इतना गर्म था कि मेरी बुर के अंदर एक झुरझुरी दौड़ गई।
साहिल ने मेरे बालों की एक लट पकड़कर पीछे की तरफ़ की, और बोला, “इतने घने बाल, राधा, इन्हें कोई खोलकर रखता है तो आदमी पागल हो जाए।”
मैंने कहा, “आप तो पहले से पागल लग रहे हैं।” और सब हँसे।
फिर साहिल ने मेरे कान के पास धीरे से कहा, “राधा, सच बताओ, हमें देखकर कुछ महसूस हुआ या नहीं?”
मेरे कान में उसकी गर्म साँस पड़ी, और मेरे निपल्स कपड़े से रगड़ खाने लगे।
मैंने कहा, “क्या बताऊँ, आप लोग तो सब समझते हो।”
बबलू ने कहा, “हम समझते हैं, लेकिन सुनना भी चाहते हैं।”
मैंने हिम्मत करके कहा, “हाँ, महसूस हुआ। बहुत हुआ।”
और फिर जो हुआ, वह किसी बिजली की तरह था — चारों की आँखों में एक साथ चमक आ गई, जैसे चारों को एक ही वक़्त पर एक ही जवाब मिल गया हो।
राकेश ने धीरे से कहा, “तो फिर आज ही?”
और मैंने कहा, “आज ही।”
हम कैफ़े से निकले। बाहर रात की हवा ठंडी थी, लेकिन मेरे शरीर के अंदर आग जल रही थी।
सुनील ने कहा, “मेरा फ़्लैट पास ही है, वहाँ चलते हैं, कोई नहीं होगा।”
मैंने हाँ कह दिया। रास्ते भर बबलू मेरे साथ चला, उसका कंधा मेरे कंधे से टकराता रहा, और हर टक्कर पर मेरी गांड में एक अजीब-सी सिहरन होती रही।
साहिल आगे-आगे चल रहा था और बार-बार पलटकर मुझे देख रहा था, जैसे कोई बच्चा मिठाई देखता हो।
राकेश सबसे पीछे था, शांत, लेकिन उसकी नज़रें मेरी कमर पर टिकी थीं।
फ़्लैट में घुसते ही माहौल बदल गया।
सुनील ने लाइट जलाई, और मैंने देखा — एक साफ़-सुथरा कमरा, बड़ा बिस्तर, और दीवार पर जिम की तस्वीरें।
साहिल ने दरवाज़ा बंद कर दिया। और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, चारों ने मुझे घेर लिया।
किसी ने कुछ नहीं कहा। बस चारों मुझे देख रहे थे — मेरी कुर्ती, मेरी जींस, मेरे बाल, मेरे होंठ, मेरे निप्पल।
मैंने दुपट्टा उतारकर कुर्सी पर रख दिया। अब मेरी कुर्ती में निपल्स और भी साफ़ दिख रहे थे।
सुनील ने आगे बढ़कर मेरे कंधों पर हाथ रखा और कहा, “राधा, एक बार बता दो, तुम चाहती हो न?”
मैंने उसकी आँखों में देखा और कहा, “सुनील, इतनी देर से इंतज़ार कर रही हूँ।” और उसने धीरे से मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर मेरे होंठ चूम लिए।
पहला चुंबन। इतना धीमा, इतना गहरा, जैसे कोई नदी किसी प्यासी ज़मीन को चूम रही हो।
उसके होंठ मोटे थे, गर्म थे, और उसने मेरे होंठों को चूसकर खोल दिया। मेरी साँस उसकी साँस से मिल गई।
पीछे से बबलू आया और उसने मेरी गर्दन पर होंठ रख दिए।
बाईं तरफ़ साहिल ने मेरे कान की लौ को दाँतों से पकड़कर हल्का खींचा, और दाईं तरफ़ राकेश ने मेरी बाँह पकड़कर अपनी तरफ़ खींच लिया।
मैं पाँच हाथों के बीच फँसी थी, और मुझे बचना ही नहीं था।
सुनील ने मेरी कुर्ती के बटन खोलने शुरू किए।
एक, दो, तीन — और कुर्ती खुल गई। अंदर से लाल रंग की ब्रा दिखी, जिसमें मेरी चूचियाँ भरी हुई थीं, और निप्पल ब्रा से झाँक रहे थे।
साहिल ने एक सीटी बजाई और कहा, “उफ़ राधा, ये तो कमाल है।”
बबलू ने पीछे से मेरी ब्रा का हुक खोला, और ब्रा ढीली पड़ गई। सुनील ने उसे खींचकर नीचे कर दिया, और मेरी चूचियाँ आज़ाद हो गईं।
चौंतीस का साइज़ — भारी, गोल, और निप्पल कड़े, गुलाबी। हवा ने उन्हें छुआ और वे और कड़े हो गए। साहिल पहले झुका। उसने अपनी जीभ निकालकर मेरे बाएँ निप्पल को धीरे से छुआ, फिर उसे मुँह में लेकर चूसने लगा।
मेरी आँखें बंद हो गईं। जो एहसास था, वह शब्दों में बयान नहीं होता — जैसे मेरे पूरे शरीर की तारें एक साथ खींच दी गई हों।
उसने निप्पल को दाँतों के बीच दबाया, फिर छोड़ा, फिर जीभ से गोल-गोल घुमाया।
दूसरी तरफ़ बबलू ने मेरे दाएँ निप्पल को मुँह में लिया और खींचने लगा। दोनों तरफ़ से दो मुँह, दो जीभें, और मैं बीच में तड़पती रही।
सुनील मेरे पीछे खड़ा होकर मेरी कमर पकड़कर मेरी गर्दन और कंधे चूम रहा था।
राकेश ने मेरी जींस की चेन खोली। उसकी उँगलियाँ मेरे पेट पर फिसलीं, और फिर उसने जींस नीचे खींच दी।
मैं सिर्फ़ लाल पैंटी में बची थी। मेरी गांड पैंटी में कसी हुई, गोल, उभरी हुई थी।
राकेश ने पीछे से हाथ बढ़ाकर मेरी गांड को दोनों हाथों से पकड़ा और दबाया।
मैंने कराहकर कहा, “आह्ह राकेश।” उसने कहा, “इतनी भरी हुई गांड, राधा, इसे देखकर लंड खड़ा हो जाता है।”
और उसने मेरी गांड के गोल हिस्सों को चूमना शुरू कर दिया — पहले बाएँ, फिर दाएँ, फिर बीच में।
साहिल ने मेरी पैंटी नीचे खींची। अब मैं पूरी नंगी थी, सिर्फ़ मोज़े पहने हुए। मेरी बुर सामने थी, घनी और गर्म, और उससे एक हल्की झील-सी बह रही थी।
चारों ने मुझे देखा और एक पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया, जैसे कोई पवित्र चीज़ देख रहे हों।
फिर बबलू घुटनों के बल बैठ गया, मेरी जाँघें खोलीं, और अपना चेहरा मेरी बुर के पास ले गया।
उसने पहले होंठों से चूमा — बुर के ऊपरी हिस्से को, धीरे-धीरे। फिर जीभ निकालकर नीचे से ऊपर तक एक लंबी लकीर खींची।
मेरा पूरा शरीर काँप गया। मैंने सुनील की बाँह पकड़ ली, वरना गिर जाती। बबलू ने जीभ को मेरी बुर के अंदर घुसाया, फिर बाहर निकालकर ऊपर वाले दाने पर घुमाया।
साहिल मेरे पीछे आकर मेरी गांड की दरार में जीभ फेरने लगा।
राकेश ने मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर पीछे किया और मेरे होंठ चूमे। सुनील ने मेरी चूचियाँ दबाते हुए निपल्स को उँगलियों से रगड़ा।
चार आदमी, चार तरफ़ से, और मैं बीच में पिघलती जा रही थी। मेरी बुर से रस बह रहा था, बबलू का पूरा चेहरा भीग गया था, और वह और तेज़ी से चाट रहा था।
मैंने कराहकर कहा, “और… और करो… यहीं मर जाऊँगी।”
साहिल हँसा और बोला, “अभी तो शुरुआत है, राधा। आज तुझे पता चलेगा कि चार लंड क्या होते हैं।”
अब बारी उनके कपड़ों की थी। मैंने कहा, “अब आप लोग भी दिखाओ, वरना मैं अकेली नंगी रहूँगी।”
सुनील हँसा और बोला, “ठीक है, रानी, तेरी मर्ज़ी।” और फिर चारों ने अपने कपड़े उतारने शुरू किए।
साहिल ने पहले शर्ट उतारी। उसकी छाती चौड़ी थी, पेट पर सिक्स-पैक की लकीरें, और बाँहों में नसें जैसे नक़्शा।
फिर उसने जींस खोली और नीचे खींच दी। उसके लंड ने बॉक्सर को तंबू-सा बना दिया था।
बॉक्सर उतारते ही लंड बाहर कूदा — मोटा, सीधा, और लंबा। मैंने अंदाज़ा लगाया, कम से कम नौ इंच।
साहिल ने मुस्कुराकर कहा, “देख लिया? अब आगे क्या?” मैंने कहा, “देख लिया, और पसंद भी आया।”
बबलू ने टी-शर्ट उतारी। उसका शरीर दुबला-सुडौल था, लेकिन मांसपेशियाँ साफ़ थीं।
उसका लंड भी कम नहीं था — नौ इंच से ऊपर, थोड़ा मुड़ा हुआ, जो देखकर मन करता था कि हाथ में लेकर सहलाऊँ। उसने अपने लंड को हाथ में लेकर हिलाया और कहा, “राधा, ये तेरे लिए ही खड़ा है।”
राकेश ने शर्ट उतारी और मैं चौंक गई — उसका शरीर पत्थर जैसा था, छाती पर बाल, और पेट पर साफ़ लकीरें।
जब उसने पैंट खोली, तो उसका लंड सबसे मोटा था — मोटाई ऐसी कि मैंने सोचा, यह कैसे अंदर जाएगा। लंबाई भी नौ इंच से ऊपर, और इतना मोटा कि मेरी बुर पहले से गीली होकर भी थोड़ी घबरा गई।
और आख़िर में सुनील। उसने अपनी टी-शर्ट एक ही झटके में उतारी।
उसका शरीर चारों में सबसे ज़्यादा गठा हुआ था — चौड़े कंधे, मोटी बाँहें, सपाट पेट, और जाँघों में ऐसी ताक़त जैसे कोई खिलाड़ी हो।
उसने पैंट खोली, और उसका लंड बाहर निकला — सबसे लंबा, सीधा, गर्व से ऊपर उठा हुआ, और नौ इंच से भी ज़्यादा। उसका लंड देखकर मेरी बुर में एक लहर दौड़ गई।
चार लंड, चारों नौ इंच से कम नहीं, चारों मोटे और सीधे, और चारों मेरी तरफ़ इशारा करते हुए।
मैंने सोचा — हे भगवान, आज मेरी बुर को क्या होगा। और मैंने खुद ही अपनी बुर को छूकर देखा, वह भीगी हुई थी, और अंदर से खुद को तैयार कर रही थी।
सुनील ने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। चारों ने मेरे चारों तरफ़ घेरा बना लिया।
सुनील ने मेरी जाँघें खोलीं, अपना लंड हाथ में लिया, और मेरी बुर के मुँह पर रख दिया।
उसने पहले सिर्फ़ सिरे से रगड़ा — ऊपर-नीचे, धीरे-धीरे। मेरी बुर के रस से उसका लंड चिकना हो गया।
मैंने कराहकर कहा, “सुनील, अंदर डालो न।”
उसने कहा, “इतनी जल्दी क्या है, राधा? पूरी रात पड़ी है।” और फिर उसने धीरे से अपना लंड आगे बढ़ाया।
पहला इंच। मेरी बुर ने उसे कसकर पकड़ लिया। दूसरा इंच। मैंने गहरी साँस ली। तीसरा, चौथा, और फिर वह पूरा अंदर चला गया।
इतना भरा हुआ, इतना गहरा, जैसे मेरे पूरे शरीर में उतर गया हो।
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और नाख़ून सुनील की पीठ में गड़ा दिए।
उसने धीरे-धीरे आना-जाना शुरू किया — पहले सावधानी से, फिर थोड़ा तेज़।
बबलू मेरे पास बैठकर मेरी चूचियाँ सहला रहा था, और बारी-बारी से निपल्स चूस रहा था।
साहिल ने मेरे पैर उठाकर मेरी पिंडलियों को चूमना शुरू किया।
राकेश मेरे सिर के पास बैठकर मेरे बालों को सहला रहा था और मेरे होंठ चूम रहा था।
मैं चारों के बीच ऐसी फँसी थी कि किसी एक पर ध्यान देना मुश्किल था — और यही सबसे अच्छा था।
सुनील की गति बढ़ने लगी। अब वह ज़ोर से अंदर-बाहर हो रहा था, और हर धक्के पर मेरी चूचियाँ हिलती थीं, मेरी गांड बिस्तर पर दबती थी, और मेरी बुर से चट-चट की आवाज़ आने लगी।
मैंने कराहना शुरू किया — पहले धीमे, फिर तेज़। “आह्ह… सुनील… ऐसे ही… और ज़ोर से…” वह मुस्कुराया और बोला, “तेरी बुर कितनी गर्म है राधा, जैसे आग।” और उसने गति और तेज़ कर दी।
फिर उसने मेरी कमर पकड़ी और मुझे घुमाकर चारों के हाथों-पैरों वाले स्थान पर लिटा दिया, जहाँ मेरी गांड ऊपर उठी थी।
अब वह पीछे से अंदर आया — इस बार और गहरा, और इस बार मेरी गांड भी उसकी जाँघों से टकराने लगी।
हर टक्कर पर मेरी गांड की गोलाई काँपती थी।
साहिल ने कहा, “सुनील, तेरे बाद मैं।”
और सुनील ने कहा, “हाँ भाई, अभी तो मैं ख़त्म भी नहीं हुआ।”
कुछ मिनट बाद सुनील ने गति तेज़ की, और फिर एक गहरी कराह के साथ रुक गया।
मुझे लगा जैसे उसका पूरा शरीर मेरे अंदर उतर गया।
वह मेरे ऊपर झुक गया, मेरे कंधे चूमे, और बोला, “राधा, तू तो कमाल है।” फिर वह हटा और साहिल आगे आया।
साहिल ने मुझे करवट से लिटाया — मेरी एक जाँघ सीधी, दूसरी मोड़ी हुई। इस पोज़ में मेरी बुर पूरी खुली हुई थी और मेरी गांड भी उभरी हुई।
साहिल ने पहले अपना लंड मेरी बुर में डाला, फिर धीरे-धीरे गति बढ़ाई। उसकी गति सुनील से तेज़ थी, और वह हर धक्के के साथ मेरी गांड पर हाथ मारता था।
हर मार से मेरी बुर कस जाती थी।
मैंने कराहकर कहा, “आह्ह साहिल, तेज़… और तेज़…”
और वह हँसकर बोला, “रानी की मर्ज़ी सबसे ऊपर।” फिर उसने इतनी तेज़ी से धक्के मारे कि मेरी आँखों से पानी आ गया — आनंद के आँसू।
इस बार मेरे निपल्स को बबलू और राकेश दोनों मिलकर चूस रहे थे। दोनों तरफ़ से दो मुँह, और मैं बीच में तड़पती रही।
मेरी चूचियाँ लाल हो गईं थीं, निपल्स सूज गए थे, और हर चूसने पर मेरी बुर में एक झटका जाता था।
यही तो चार लंडों का जादू था — जब एक बुर में था, तो दो निपल्स पर थे, और एक होंठों पर।
साहिल के बाद राकेश आया। वह सबसे शांत था, इसलिए सबसे ख़तरनाक।
उसने मुझे बिस्तर के किनारे लिटाया, मेरी टाँगें उठाकर अपने कंधों पर रखीं, और अपना मोटा लंड धीरे से रखा।
जैसे ही उसने पहला धक्का दिया, मुझे लगा कि मेरी बुर फट जाएगी — इतना मोटा था।
मैंने कराहकर कहा, “राकेश… धीरे… बहुत मोटा है।”
उसने शांति से कहा, “धीरे ही कर रहा हूँ, राधा। तू बस छोड़ दे खुद को।” और उसने मुझे छोड़ने दिया।
धीरे-धीरे उसकी मोटाई मेरे लिए आरामदायक हो गई, और फिर मज़ेदार। उसके धक्के भारी थे, गहरे थे, और हर धक्के में एक पूरा एहसास था।
वह मेरी बुर के अंदर तक पहुँच रहा था, वहाँ तक जहाँ पहले कोई नहीं पहुँचा था। मैंने आँखें बंद कर लीं और पूरे शरीर से उसे महसूस किया।
बबलू ने मेरे कान में फुसफुसाया, “राधा, तू तो चारों की रानी बन गई।”
मैंने कहा, “रानी नहीं, बबलू… आज मैं तुम चारों की रखैल हूँ।” और चारों एक साथ हँसे।
राकेश के बाद बबलू। बबलू ने मुझे गोद में उठाकर बिस्तर के बीच में बैठा दिया, और फिर मेरे नीचे लेटकर मुझे अपने ऊपर बिठा लिया। अब मैं ऊपर थी, और उसका लंड मेरे अंदर।
इस पोज़ में मेरी चूचियाँ झूल रही थीं, और मेरी गांड उसकी जाँघों पर दब रही थी। बबलू ने मेरी कमर पकड़ी और मुझे ऊपर-नीचे करने लगा। मैं खुद भी हिलने लगी — धीरे-धीरे, फिर तेज़।
मेरी चूचियाँ उछल रही थीं, और साहिल व राकेश दोनों तरफ़ से उन्हें पकड़कर चूस रहे थे। सुनील मेरे पीछे खड़ा होकर मेरी गांड के गोल हिस्सों को दबा रहा था।
बबलू की गति तेज़ हो गई। मैं ऊपर-नीचे हो रही थी, और हर बार जब नीचे आती, तो उसका लंड मेरी बुर में गहरे तक जाता।
मैंने सिर पीछे किया और कराही, “आह्ह बबलू… ये पोज़… ये पोज़ बहुत अच्छा है…”
वह हँसा और बोला, “तो रुक क्यों, चलती रह।” और मैं चलती रही।
अब माहौल और भी गहरा हो गया। चारों ने तय किया कि अब सब एक साथ होंगे। सुनील ने मुझे घुटनों के बल बैठाया — मेरी गांड ऊपर, चेहरा नीचे।
सुनील पीछे से मेरी बुर में आया, और उसी वक़्त साहिल मेरे सामने आया और अपना लंड मेरे मुँह में दिया।
मैंने उसे जीभ से चूसा, ऊपर-नीचे किया, और सुनील पीछे से धक्के मारता रहा। फिर राकेश और बबलू दोनों तरफ़ आकर मेरे निपल्स चूसने लगे।
चारों तरफ़ से चार आदमी — एक बुर में, एक मुँह में, दो निपल्स पर। मैं ऐसी घिरी कि समय का पता ही नहीं रहा।
मेरी बुर से रस बह रहा था, मेरे होंठ भीगे हुए थे, मेरे निपल्स लाल थे, और मेरी गांड लगातार थपथपाई जा रही थी। कमरे में बस चट-चट की आवाज़ें, कराहें, और पसीने की गंध थी।
फिर चारों ने बारी-बारी से अपना-अपना आख़िरी दौर शुरू किया। सुनील ने पीछे से ज़ोरदार धक्के मारे और एक गहरी कराह के साथ अंदर ही ख़त्म हुआ।
फिर बबलू आया और उसने मुझे लिटाकर इतनी तेज़ी से चोदा कि मेरी चूचियाँ बिस्तर पर हिलती रहीं।
फिर राकेश — भारी, धीमे, गहरे धक्के, और मैं उसके हर धक्के के साथ कराहती रही।
और आख़िर में साहिल, जिसने मुझे गोद में उठाकर खड़े-खड़े चोदा, और मेरी गांड उसकी बाँहों पर टिकी रही।
जब साहिल ख़त्म हुआ, तो मैं बिस्तर पर गिर पड़ी, पसीने से लथपथ, हाँफती हुई, और पूरी तरह भरी हुई।
चारों मेरे चारों तरफ़ लेट गए। सुनील ने मेरा हाथ पकड़ा, बबलू ने मेरे बाल सहलाए, राकेश ने मेरे माथे पर होंठ रखे, और साहिल ने मेरी गर्दन चूमी।
मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरा शरीर थका हुआ था, लेकिन मेरा दिल भरा हुआ था। मुझे पता था कि यह सिर्फ़ एक रात नहीं थी। यह शुरुआत थी।
उस रात के बाद मेरी ज़िंदगी बदल गई। अगले दिन सुबह मैं उनके बीच से उठी, और कपड़े पहनते हुए मुस्कुरा रही थी।
बबलू ने आँख खोलकर कहा, “कहाँ जा रही है रानी?”
मैंने कहा, “नहाने।” उसने कहा, “अकेले?” और चारों हँस पड़े।
उसके बाद हम चारों दोस्त बन गए — और सिर्फ़ दोस्त नहीं। हफ़्ते में दो-तीन बार हम मिलते, कभी सुनील के फ़्लैट में, कभी मेरे कमरे में, कभी किसी होटल में।
कभी चारों साथ, कभी दो साथ, कभी एक। लेकिन जब भी चारों मिलते, वह रात वही होती — मैं उनकी रानी, और वे मेरे चार राजा।
मेरी चूचियाँ उनके हाथों से और बड़ी हो गईं, मेरी कमर उनकी पकड़ से और पतली लगने लगी, और मेरी गांड उनकी थपकियों से और उभर आई।
मेरे निपल्स अब उनके दाँतों के निशान जानते थे, और मेरी बुर उनके लंडों की नाप जानती थी।
मैं कभी-कभी सोचती — क्या कोई औरत इतनी ख़ुशनसीब होती है कि उसके चार आदमी हों, चारों नौ इंच से लंबे, चारों उसे प्यार करने वाले, और चारों उसे पूरा करने वाले?
और हाँ, मैं उनकी रखैल बन गई थी, लेकिन ऐसी रखैल जो चारों की रानी थी। वे मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ते थे।
रात की शिफ्ट के बाद जब मैं थकी होती, तो कोई न कोई मेरे कमरे पर आ जाता, चाय बनाता, मेरे पैर दबाता, और फिर मुझे गोद में लेकर सुला देता। और फिर हम दोबारा वही करते जो हमें सबसे अच्छा लगता।
आज साल दो हज़ार छब्बीस की एक ठंडी रात है। हम चारों पाँच कॉल सेंटर की शिफ्ट ख़त्म करके सुनील के नए फ़्लैट में आए हैं — यह फ़्लैट पहले से बड़ा है, बड़ा बिस्तर, बड़ा बाथरूम, और बड़ा शीशा।
बबलू ने अपने फ़ोन पर म्यूज़िक लगाया, और सुनील ने रोशनी धीमी कर दी। आज हमारे पास कोई जल्दी नहीं है। आज हम आराम से करेंगे।
साहिल ने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा और मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया।
उसने मेरे कान में कहा, “आज तेरी मर्ज़ी, राधा। जैसे चाहे, जितनी देर चाहे।”
मैंने कहा, “आज मैं चारों को एक-एक करके पूरा करूँगी, और फिर सबको एक साथ।”
राकेश ने कहा, “चारों को एक साथ? हिम्मत है?”
मैंने कहा, “तुम चारों की हिम्मत देखनी है मुझे।” और चारों हँस पड़े।
मैंने पहले सबको नहलाया। बाथरूम में पाँचों गए, गर्म पानी चलाया, और फिर मैंने एक-एक की पीठ पर साबुन मला, एक-एक के लंड को साबुन से सहलाया, और देखा कि चारों फिर खड़े हो गए।
मैंने चारों के लंडों को हाथ में लेकर धीरे-धीरे सहलाया, फिर घुटनों के बल बैठकर बारी-बारी से चूसा — सुनील का पहले, फिर साहिल का, फिर राकेश का, फिर बबलू का।
हर लंड मोटा, गर्म, और मेरे मुँह में भरने वाला था। मेरी जीभ चारों की नसों पर फिसलती रही, और मेरे होंठ चारों के सिरों को चूमते रहे।
फिर हम बिस्तर पर आए। आज का फोरप्ले पहले से भी लंबा था।
साहिल ने मेरी पूरी पीठ को तेल से मालिश किया — कंधों से कमर तक, और फिर कमर से नीचे गांड तक।
उसकी उँगलियाँ मेरी गांड की दरार में फिसलीं और मैंने कराहकर कहा, “आह्ह साहिल, वहाँ भी?”
उसने कहा, “वहाँ भी, राधा, और अंदर भी।” फिर उसने अपनी जीभ मेरी गांड पर फेरी, और मेरा पूरा शरीर सिहर उठा।
बबलू ने मेरी बुर पर तेल लगाया और उसे दोनों अंगूठों से खोलकर देखा।
उसने कहा, “राधा, तेरी बुर आज और गुलाबी लग रही है।”
और फिर उसने अपनी जीभ से मेरी बुर को चूमना शुरू किया — धीरे-धीरे, गहरे-गहरे, ऊपर के दाने पर, फिर अंदर की दीवारों पर।
मैंने उसके बाल पकड़ लिए और उसका सिर अपनी तरफ़ दबा दिया। वह और गहरे चाटने लगा।
राकेश ने मेरी चूचियों को दोनों हाथों में लिया और उन्हें गोल-गोल घुमाया।
फिर उसने निपल्स को उँगलियों से दबाया और मुझे एक अजीब-सी गुदगुदी हुई।
सुनील मेरे सिर के पास आकर मेरे होंठ चूमने लगा, और मैंने उसकी जीभ अपने मुँह में ले ली।
फिर शुरू हुआ असली खेल। सुनील पहले आया, लेकिन इस बार उसने पोज़ बदला — उसने मुझे बिस्तर के किनारे लिटाया, मेरी टाँगें ऊपर उठाईं, और खड़े होकर मेरी बुर में डाला।
इस पोज़ में हर धक्का मेरी बुर की सबसे गहरी जगह पर लगता था।
उसने धीरे से शुरू किया, फिर तेज़ किया, और मैं उसकी हर हरकत पर कराहती रही। मेरी चूचियाँ ऊपर-नीचे झूल रही थीं और बबलू उन्हें बारी-बारी से चूस रहा था।
फिर साहिल आया। उसने मुझे करवट से लिटाया और पीछे से मेरी बुर में डाला, और उसी वक़्त मेरी गांड पर उँगली फेरने लगा।
मैंने कहा, “साहिल, दोनों जगह?”
उसने कहा, “हाँ राधा, आज दोनों जगह।” और उसने धीरे-धीरे अपनी उँगली मेरी गांड में डाल दी।
दो जगह भरा हुआ महसूस करके मैं पूरी तरह पिघल गई। साहिल के धक्के तेज़ थे और उसकी उँगली मेरी गांड में लय से हिल रही थी।
फिर राकेश। उसने मुझे बिस्तर पर पीठ के बल लिटाया, अपनी मोटी छाती मेरी चूचियों पर दबाई, और अपना मोटा लंड अंदर डाला।
भारी धक्के, गहरे धक्के, और हर धक्के पर मेरी बुर की दीवारें उसकी मोटाई से रगड़ खाती थीं।
मैंने उसकी पीठ पर नाख़ून गड़ा दिए और कहा, “राकेश… तू तो… आह्ह…” वह बस मुस्कुराया और धक्के जारी रखे।
और फिर बबलू, जिसने मुझे ऊपर बिठाकर खुद नीचे लेट गया। मैं ऊपर-नीचे होने लगी, और सुनील पीछे से मेरी गांड दबा रहा था, साहिल मेरे निपल्स चूस रहा था, और राकेश मेरी जाँघें सहला रहा था।
चारों तरफ़ से चार हाथ, चार मुँह, और मेरी बुर में एक लंड जो लय में ऊपर-नीचे हो रहा था।
अब आख़िरी दौर। चारों ने तय किया कि एक साथ होंगे। सुनील पीछे से मेरी बुर में आया और धीरे-धीरे धक्के मारने लगा।
साहिल मेरे मुँह में आया और मैंने उसे चूसना शुरू किया। राकेश और बबलू दोनों तरफ़ आकर मेरे निपल्स चूसने लगे।
मैं चारों के बीच ऐसी फँसी कि मेरा शरीर चार हिस्सों में बँट गया — बुर, मुँह, और दो निपल्स। और हर हिस्सा अलग-अलग कराह रहा था।
सुनील की गति बढ़ी, साहिल का लंड मेरे मुँह में गहरा गया, राकेश और बबलू के दाँत मेरे निपल्स पर कसने लगे।
मेरी बुर से चट-चट की आवाज़ें आ रही थीं, मेरे गले से कराहें, और कमरे में म्यूज़िक के साथ हमारी साँसें मिल गई थीं।
सुनील ने आख़िरी धक्के मारे — तेज़, गहरे, और फिर अंदर ही ख़त्म हुआ। फिर साहिल ने मेरे मुँह में ख़त्म होकर मेरे होंठ चूमे।
राकेश ने मुझे पलटकर पीछे से चोदा और भारी धक्कों के साथ ख़त्म हुआ। और आख़िर में बबलू ने मुझे गोद में उठाकर, खड़े-खड़े, मेरी गांड पकड़कर चोदा, और आख़िरी कराह के साथ ख़त्म हुआ।
जब सब ख़त्म हुआ, तो मैं बिस्तर पर गिर पड़ी। मेरा पूरा शरीर पसीने से भीगा था, मेरी बुर भरी हुई थी, मेरे होंठ भीगे थे, और मेरे निपल्स पर चारों के निशान थे। चारों मेरे चारों तरफ़ लेट गए।
किसी ने कुछ नहीं कहा, बस साँसें भर रहे थे और मुझे छू रहे थे — कोई मेरा हाथ, कोई मेरे बाल, कोई मेरी कमर, कोई मेरी गांड।
कुछ देर बाद साहिल ने धीरे से कहा, “राधा, तू तो कमाल है।”
बबलू ने कहा, “चारों को एक रात में पूरा कर दिया।”
राकेश ने कहा, “हम चारों को एक-एक करके।”
और सुनील ने मेरा हाथ पकड़कर कहा, “राधा, तू हमारी रानी है। हमेशा रहेगी।”
मैंने आँखें बंद कर लीं और मुस्कुराई। मुझे पता था कि यह सिर्फ़ चुदाई नहीं थी। यह प्यार था — चार लंडों का प्यार, चार दिलों का प्यार, और एक ऐसी औरत का प्यार जिसे आख़िरकार वह मिल गया जिसकी उसे तलाश थी।
मेरी चूचियाँ उनके हाथों में सुरक्षित थीं, मेरी बुर उनके लंडों की आदी हो गई थी, और मेरी गांड उनकी थपकियों की इंतज़ार करती थी।
बाहर दिल्ली की रात जाग रही थी, गाड़ियाँ चल रही थीं, लाइटें जल रही थीं। लेकिन उस कमरे के अंदर बस हम पाँच थे — और हमारे पास पूरी रात पड़ी थी।
मैंने सुनील की बाँह में सिर रखा, बबलू ने मेरी पीठ पर हाथ फेरा, राकेश ने मेरा पैर अपनी जाँघ पर रखा, और साहिल ने मेरे माथे पर होंठ रखे।
और मैं सोचने लगी — कल फिर शिफ्ट होगी, फिर कॉल आएँगी, फिर हेडफ़ोन लगेंगे।
लेकिन शिफ्ट के बाद फिर यही कमरा होगा, यही बिस्तर, यही चार लंड, और यही मेरी चूचियाँ, मेरी बुर, मेरी गांड।
और यही मेरा सुख है। यही मेरी कहानी है। यही मेरी ज़िंदगी है।
मुरादाबाद की एक लड़की, दिल्ली की एक कॉल सेंटर वाली, और चार जिम वाले लड़कों की रानी।
राधा।…………… तो कैसी लगी आप लोगो को मेरी चुदाई….
- सलमान मुझे 5 साल तक रंडियों की तरह चोदा
- सुहागरात पर अपनी बीवी को दो काले लंड गिफ्ट किया
- कुंवारी छात्रा की बुर टीचर के बड़े लंड से फट गई
- मोटी गांड वाली भाभी ने घर बुलाकर चुदवाया और लंड चूसा
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