शादी एप से मिली लड़की ग्रुप में चुदवाई

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मेरा नाम संतोष जैसवाल है। मैं लखनऊ का रहने वाला हूँ। मेरी उम्र बत्तीस साल है और मैं अभी तक कुँवारा हूँ।

मेरी हाइट पाँच फुट सात इंच है। और मेरे लंड की साइज़ साढ़े चार इंच है — जो कि थोड़ी छोटी है, ये बात मुझे अच्छी तरह पता है, और सच कहूँ तो यही बात मुझे अंदर से खाती रहती थी।

लखनऊ की गलियों में बड़ा हुआ, चिकन के होटलों की गंध में बड़ा हुआ, गोमती के किनारे की हवाओं में बड़ा हुआ — पर प्यार मुझे अब तक नहीं मिला था।

घरवाले रोज़ पूछते, “संतोष, कब करेगा शादी?”

और मैं हर बार वही जवाब देता, “बस अब्बा, बस हो जाएगी।” पर अंदर ही अंदर मैं जानता था कि रिश्ते की तलाश जितनी आसान दिखती है, उतनी है नहीं।

एक दिन दफ़्तर में मेरे साथी रमन ने कहा, “यार, तू मैट्रिमोनियल ऐप क्यों नहीं डाउनलोड करता? अब वही ज़माना है। लड़कियाँ भी वहाँ हैं, लड़के भी। बात कर, देख, समझ, फिर आगे बढ़।”

पहले तो मुझे हँसी आई। मैट्रिमोनियल ऐप — क्या इनसे शादी भी होती है?

पर उस रात जब बिस्तर पर लेटा, फ़ोन में उंगलियाँ घुमाते-घुमाते मैंने ऐप डाउनलोड कर लिया।

प्रोफ़ाइल बनाई। नाम — संतोष जैसवाल। उम्र — 32। कद — 5’7″। पेशा — प्राइवेट कंपनी में अकाउंट्स। शहर — लखनऊ। पसंदीदा — घूमना, फ़िल्में, शांत शामें।

फ़ोटो लगाई — वो फ़ोटो जो मुझे सबसे अच्छी लगती थी, जिसमें मैं नीली शर्ट में गोमती के किनारे खड़ा मुस्कुरा रहा था। और फिर शुरू हुआ एक अजीब-सा इंतज़ार।

दो दिन तक कोई ख़ास मैच नहीं मिला। कुछ प्रोफ़ाइलें आईं, कुछ भेजी गईं, कुछ मिलीं भी। पर वो चिंगारी नहीं थी। वो नहीं था जिसे देखकर दिल कहे — “यही है।”

और फिर तीसरे दिन हुई।

वो प्रोफ़ाइल स्क्रीन पर आई और मैं एकदम रुक गया।

फ़ोटो में एक लड़की थी। और वो लड़की किसी हीरोइन से कम नहीं लग रही थी।

पाँच फुट दो इंच की हाइट, बाल बहुत लंबे और घने — ऐसे जैसे रात का आसमान बह गया हो।

आँखें बड़ी-बड़ी, काजल से भरी, जैसे काजल ने आँखों में डेरा डाल लिया हो। होठ गुलाबी और भरे हुए।

और उसकी बॉडी… भगवान! बॉडी बिल्कुल 36-30-34 — कमर पतली, छाती भरी, कूल्हे गोल और बाहर निकले हुए।

साड़ी पहनी हुई थी उस फ़ोटो में — लाल साड़ी, सुनहरा बॉर्डर — और उस साड़ी में उसका रूप ऐसा लग रहा था जैसे किसी राजा की रानी ने लखनऊ की हवा में कदम रखा हो।

नाम था — राशी।

उम्र — 27। शहर — कानपुर। पेशा — टीचिंग।

मैंने उसकी सारी फ़ोटो देखीं। एक में वो कुर्ती-जींस में, एक में फ़्रॉक में, एक में दीवार से टेक लगाए मुस्कुरा रही थी।

और हर फ़ोटो में उसकी बॉडी, उसका रूप, उसकी मुस्कान — सब कुछ ऐसा था कि दिल बस कहता रहा — “यही, यही, यही।”

बिना सोचे, बिना देर किए, मैंने उसे रिक्वेस्ट भेज दी। ऊँगली काँप रही थी।

और अगली सुबह, फ़ोन की स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन चमका:

“राशी ने आपकी रिक्वेस्ट स्वीकार की।”

मैं उठकर बैठ गया। सुबह की चाय ठंडी हो गई। दिल की धड़कन ऐसी थी जैसे क्लास टेन का रिज़ल्ट आ गया हो। और उसी वक़्त एक मैसेज आया —

राशी: “हैलो संतोष जी।”

संतोष: “नमस्ते राशी जी। सच कहूँ तो आपकी प्रोफ़ाइल देखकर हिम्मत करके रिक्वेस्ट भेजी थी।”

राशी: “अच्छा? और हिम्मत क्यों करनी पड़ी? 😄”

संतोष: “क्योंकि आपकी फ़ोटो देखकर लगा — इस लड़की के सामने मैं तो बहुत साधारण हूँ।”

राशी: “साधारण कौन कहता है? सादगी में ही असली बात होती है। बाक़ी फ़ोटो में तो सब सजे-धजे लगते हैं।”

संतोष: “आप तो सजी हुई भी बहुत सुंदर लगती हैं। सच में, आपकी आँखें… बहुत सुंदर हैं।”

राशी: “शुक्रिया। और आप? लखनऊ में क्या करते हैं?”

संतोष: “अकाउंट्स की नौकरी है। सुबह दफ़्तर, शाम घर। शांत आदमी हूँ, ज़्यादा मिलने-जुलने वाला नहीं। पर सच कहूँ तो अकेलापन अब बहुत सालों से साथ है।”

राशी: “यही हाल मेरा भी है। कानपुर में पढ़ाती हूँ। दिनभर बच्चों के बीच रहती हूँ, पर शाम को जब घर लौटती हूँ तो चारदीवारी बहुत चुप हो जाती है।”

संतोष: “तो चलिए, उस चुप्पी में एक-दूसरे की आवाज़ भर लें।”

राशी: “वाह। अकाउंट्स वाले साहब तो शायर निकले। 😄”

संतोष: “लखनऊ का हूँ ना, थोड़ा तो नज़ाकत आएगा ही।”

राशी: “अच्छा जी, तो नज़ाकत का दम है? दिखाइए फिर।”

और बस, उस दिन से हमारी बातें चल पड़ीं। दिन में दो-तीन बार, रात में देर तक।

कभी सुबह की चाय के साथ, कभी रात की चाँदनी के साथ। हमने एक-दूसरे की पसंद, नापसंद, बचपन, सपने — सब बाँटे।

मैंने उसे बताया कि कैसे छोटे लंड की वजह से मुझे हमेशा एक हीन-भावना रही — और वो हँसी थी, बोली, “अरे ये तो बाद में देखेंगे, पहले दिल देखिए।”

हम रोज़ रात नौ बजे से बात करने लगे। वो मेरी आदत बन गई। उसकी आवाज़ — भारी नहीं, हल्की, मीठी, जैसे कानों में शहद डाल दे।

जब वो हँसती, तो लगता कि चारों तरफ़ घंटियाँ बज गईं। और जब वो “संतोष जी” कहती, तो लगता कि दुनिया में मेरा नाम सबसे सुंदर शब्द है।

दो हफ़्ते बाद पहली बार हमारी फ़ोन कॉल हुई। उसने बोला था, “टाइपिंग से आवाज़ की गर्मी नहीं मिलती। कॉल करो।” और मैंने किया।

पहली कॉल में हम दो घंटे बात करते रहे। उसकी हँसी, उसकी साँसें, उसकी बात करने का अंदाज़ — सब मेरे अंदर बस गया।

रात ग्यारह बजे थे। रोज़ की तरह मैसेज चल रहे थे, और बातें धीरे-धीरे शरीर की तरफ़ मुड़ने लगीं।

राशी: “संतोष, तुमने मुझे अब तक देखा तो फ़ोटो में ही है। बताओ, तुम्हें सबसे ज़्यादा क्या पसंद है मुझमें?”

संतोष: “सच कहूँ?”

राशी: “बिल्कुल सच। झूठ बोलो तो पकड़ लूँगी।”

संतोष: “तुम्हारी आँखें, तुम्हारे बाल, और… तुम्हारी साड़ी में जो तुम्हारी कमर है ना — वो।”

राशी: “हम्म। और?”

संतोष: “और तुम्हारी छाती। भगवान, तुम्हारी छाती तो किसी पहाड़ की ढलान जैसी है।”

राशी: “हाहा, कवि जी। ठीक कहा। 36 है ना मेरी। और तुम्हें पता है, दिनभर टीचिंग में ब्रा खींच-खींच के थक जाती हूँ। रात में खोलते ही जो सुकून मिलता है ना…”

संतोष: “अच्छा, तो रात में तुम क्या पहनती हो?”

राशी: “अभी तो नाइटी पहनी है। पतली वाली। और अंदर… कुछ नहीं।”

संतोष: “बिल्कुल कुछ नहीं?”

राशी: “बिल्कुल कुछ नहीं। और तुम?”

संतोष: “मैं तो पजामा-बनियान में हूँ। पर अब ठीक से बैठने पर तुम्हारे बारे में सोचकर… कुछ और भी बदल रहा है।”

राशी: “अच्छा?! तो क्या तुम्हारा लंड खड़ा हो गया?”

संतोष: “बहुत खड़ा है राशी। और सच कहूँ, तुम्हारे बारे में सोचते ही ऐसा हो जाता है।”

राशी: “मुझे देखना है। एक फ़ोटो भेजो।”

और मैंने भेज दी। कमरे की रोशनी में, पजामे के ऊपर से जो उभार दिख रहा था, वो मेरी सच्ची साइज़ से थोड़ा ज़्यादा ही लग रहा था।

राशी: “ओहो! इतना खड़ा? और तुमने कहा था तुम्हारा छोटा है। संतोष, ये तो गर्म हो गया है पूरा।”

संतोष: “बता दिया ना, तुम्हारी वजह से।”

राशी: “तो अब नाप कब लेंगे? 😄”

संतोष: “जब मिलेंगे। पर राशी, तुम भी तो भेजो कुछ।”

और उसने भेजी — अपनी एक फ़ोटो, जिसमें वो नाइटी में बिस्तर पर लेटी थी, बाल बिखरे हुए, और उस पतली नाइटी के अंदर उसके दूध की गोलाई और निप्पल साफ़ झलक रहे थे। मैं फ़ोन देखता रह गया।

संतोष: “राशी, तुम तो जान लेने वाली हो। तुम्हारे निपल्स इतने उभरे हुए हैं।”

राशी: “तुम्हारी बातें करते हुए खुद ही उभर आए। और नीचे भी गर्मी है। बुर में हल्की-हल्की झनझनाहट हो रही है।”

संतोष: “अरे, मुझे लगा सिर्फ़ मेरे साथ होता है।”

राशी: “नहीं संतोष, तुम्हारी आवाज़ सुनते ही मेरा शरीर जवाब देता है। तुम्हें पता है, आज तुम्हारी कॉल के बाद मैंने सोचा — काश तुम यहाँ होते। और मैं तुम्हारी छाती पर सिर रखकर सो जाती।”

संतोष: “और मैं तुम्हारे बाल सहलाता, और तुम्हारी गर्दन पर चूमता।”

राशी: “और फिर?”

संतोष: “और फिर तुम्हारे कंधों से नाइटी की पट्टी सरकाता।”

राशी: “और मेरे दूध निकल आते। और तुम्हारे हाथ उन पर… ओह संतोष, बताओ ना आगे।”

और उस रात हमने ऐसी बातें कीं जो अब तक सिर्फ़ आँखों की भूख थीं, आवाज़ की भूख बन गईं। रोज़ रात यही होता।

कभी वो बोलती, “आज मैंने तुम्हें याद किया और नहा रही थी तो पानी की बूँदें निप्पल्स पर गिर रही थीं और सोचा — काश तुम्हारी जीभ होती।” और मैं पागल हो जाता।

कभी मैं बोलता, “राशी, आज दफ़्तर में बैठा था और अचानक तुम्हारी आवाज़ याद आई, और नीचे खड़ा हो गया। बॉस सामने बैठा था, किसी तरह छिपाया।”

वो हँसती, “हाहा, बेचारे बॉस।” और फिर पूछती, “अच्छा बताओ, तुम्हारा लंड जब खड़ा होता है तो कितना?”

मैं सच बोलता, “साढ़े चार इंच राशी। मोटाई ठीक है पर लंबाई कम।”

वो बोलती, “देखो, लंबाई से फ़र्क़ नहीं पड़ता। असली बात है — तुम कैसे चोदते हो। और मुझे लगता है तुम जानते हो।”

ये बात सुनकर मेरा सीना चौड़ा हो जाता। पर अंदर एक डर भी था — कहीं वो मिलकर निराश न हो जाए।

एक रात, बातों के दौरान, मैंने सारी झिझक तोड़ दी।

संतोष: “राशी, सच बताऊँ? अब बातें करते-करते दो महीने हो गए। और मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता।”

राशी: “क्या कहना चाहते हो, कहो।”

संतोष: “मुझे तुमसे मिलना है। मुझे तुम्हें छूना है। और सच कहूँ तो… मुझे तुम्हें चोदना है, राशी।”

कुछ सेकंड की चुप्पी। फिर आया —

राशी: “संतोष, सच बताऊँ? मैं भी यही सोच रही थी। पर एक बात है।”

संतोष: “बोलो ना, क्या बात?”

राशी: “तुम्हारा लंड साढ़े चार इंच है। मुझे कोई दिक्कत नहीं, मैंने कहा ना। लेकिन मैं चाहती हूँ कि पहली बार… ख़ास हो। एक बार पूरा भर जाए।”

संतोष: “तो क्या करें?”

राशी: “एक काम करो। अपने किसी ऐसे दोस्त को साथ बुला लो जिसका लंड नौ इंच से बड़ा हो। फिर हम तीनों मिलते हैं। पहले तुम्हारे साथ, फिर उसके साथ — और फिर दोनों के साथ।”

मैं चौंक गया। “तीनों?”

राशी: “हाँ संतोष। एक लंबे लंड की चाह हर औरत के अंदर होती है। और एक तुम्हारे जैसे प्यारे, समझदार आदमी की भी। तो दोनों एक ही रात में क्यों नहीं?”

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। “पर राशी, एक बात साफ़ करो — जलसा कैसा होगा?”

राशी: “जलसा नहीं, संतोष। ये हमारी शुरुआत होगी। पहले तुम मुझे पूरा चोदोगे। फिर वो। और जब मैं दोनों की गोद में हूँ… तो जो होगा, वो देख लेंगे। तुम तो मेरे हो, बाक़ी तो मेहमान है।”

उस रात सो नहीं पाया। अगली सुबह मैंने रोहित को फ़ोन किया।

रोहित वर्मा मेरा बचपन का दोस्त है। लंबा-तगड़ा, छह फुट का, जिम जाने वाला, छाती चौड़ी और बाज़ुओं में दम।

और सच कहूँ तो उसके लंड की भी खूब चर्चा रही है — लगभग नौ इंच से भी ज़्यादा, बेलन जैसा मोटा।

जब भी हम साथ होते, मज़ाक में वो मुझे छेड़ता रहता, “छोटे लंड वाले, कब बड़ा दिखाएगा?”

फ़ोन उठाते ही बोला, “हाँ भाई, क्या हाल?”

संतोष: “रोहित, एक काम की बात है। पर पहले एक बात साफ़ करना — मुझे नाराज़ नहीं होना।”

रोहित: “बोल ना यार।”

संतोष: “एक लड़की से बात चल रही है, राशी। शादी की नीयत से। बहुत पसंद है दोनों को। अब मिलने का प्लान बना रहे हैं। पर उसने एक शर्त रखी है।”

रोहित: “कैसी शर्त?”

संतोष: “उसने कहा — तुम्हारे साथ तो ठीक है, पर एक दोस्त भी बुला लो जिसका लंड नौ इंच से बड़ा हो। पहले तुम्हारे साथ, फिर उसके साथ, और फिर तीनों।”

रोहित ज़ोर से हँसा। “क्या बात! भाभी तो नंबर वन निकलीं।”

संतोष: “हाँ यार, पर मज़ाक नहीं — तू आएगा?”

रोहित: “बिल्कुल आऊँगा। पर एक बात, संतोष — अगर भाभी मेरी तरफ़ ज़्यादा झुक गई तो नाराज़ नहीं होना।”

संतोष: “देखेंगे। पहले तो मैं अपना काम करूँगा।”

रोहित: “अच्छा, तो सुन। होटल बुक कर ले, अच्छा-सा, प्राइवेट। एक रात का। कोई जल्दबाज़ी नहीं। और हाँ, तेल, कंडोम, तौलिया — सब रख ले। हम सीधे सामने मिलेंगे।”

संतोष: “ठीक है।”

रोहित: “और संतोष — मज़ा आएगा यार। सच में।”

फ़ोन रखकर मैंने राशी को मैसेज किया: “बात हो गई। रोहित राज़ी है।”

राशी: “ये तो अच्छी ख़बर है। अब बताओ, कब मिल रहे हैं? और कहाँ?”

संतोष: “अगले शनिवार। लखनऊ में। मैं होटल बुक कर रहा हूँ।”

राशी: “ठीक है। और संतोष…”

संतोष: “हाँ?”

राशी: “एक बात याद रखना। जब हम मिलेंगे, तो पहले तुम मेरे पास आओगे। रोहित तो बाद में आएगा। सबसे पहले मुझे तुम्हारी बाँहों में आना है। समझे?”

संतोष: “समझ गया।”

उस रात मैंने होटल बुक किया।

मैंने लखनऊ के गोमती नगर में एक अच्छा होटल चुना। चौथी मंज़िल, कोना वाला कमरा — ताकि कोई शोर न हो, कोई डिस्टर्ब न करे। कमरे का नाम — सुइट 401।

मैं दोपहर में पहुँच गया। कमरे को देखा — बड़ा बेड, साफ़ सफ़ेद चादर, खिड़की से गोमती की तरफ़ खुला नज़ारा।

मैंने गुलाब की पंखुड़ियाँ मँगाईं और बिस्तर पर बिखेर दीं। मोमबत्तियाँ रख दीं। फूलों का फूलदान मँगाया।

कमरे में हल्की खुशबू फैला दी। और रोशनी इतनी धीमी रखी कि चेहरे साफ़ दिखें पर आँखों में नशा बना रहे।

शाम सात बजे राशी आई।

जब दरवाज़ा खुला, तो दो महीने की आवाज़ अचानक आमने-सामने आ गई।

उसने लाल रंग की साड़ी पहनी थी — वही वाली, जिसमें मैंने पहली बार उसे देखा था।

बाल खुले, होंठों पर हल्की लाली, आँखों में काजल। और वो खड़ी थी — पाँच फुट दो इंच की, पर उस पल लगी कि सारा आसमान सामने खड़ा है।

वो मुस्कुराई। बोली, “तो ये है मेरा शायर।”

मैं कुछ बोल नहीं पाया। बस आगे बढ़ा और उसे बाँहों में भर लिया।

उसने सिर मेरी छाती पर रख दिया। और फुसफुसाई, “दो महीने से इस पल का इंतज़ार था।”

मैंने उसके बालों में मुँह डाल दिया। खुशबू — चमेली जैसी, बारिश के बाद की मिट्टी जैसी।

मैंने फुसफुसाया, “राशी, तुम और भी सुंदर हो आमने-सामने।”

वो हँसी। “और तुम?” उसने नज़र ऊपर-नीचे दौड़ाई, “तुम भी ठीक हो। सच में, तुम्हारी आँखें फ़ोटो से भी ज़्यादा प्यारी हैं।”

कमरे में मोमबत्तियाँ जल रही थीं। गुलाब की खुशबू हवा में तैर रही थी। और हम दोनों खड़े थे — एक-दूसरे की बाहों में, जैसे सारी दुनिया बाहर रह गई हो।

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

रोहित आ गया था।

वो अंदर आया, छह फुट का, सफ़ेद शर्ट में, बाल पीछे किए। राशी को देखा और ठिठक गया।

फिर हाथ जोड़कर बोला, “नमस्ते भाभी।”

राशी हँस पड़ी। “अभी तो भाभी नहीं बनी, रोहित। पर नमस्ते।”

रोहित ने मेरी तरफ़ देखा और आँख से इशारा किया — जैसे कहे, “वाह यार, क्या माल है।”

तीनों बैठे। थोड़ी बातें हुईं। चाय आई। रोहित अपनी हँसी-मज़ाक से माहौल हल्का करने लगा।

राशी भी खुलने लगी। और मैं — मैं दोनों को देख रहा था और समझ रहा था कि आज रात कुछ ऐसा होगा जो हम तीनों ज़िंदगी भर याद रखेंगे।

रोहित ने सबसे पहले तौलिया उठाया और बोला, “अच्छा, मैं थोड़ी देर के लिए बाथरूम जाता हूँ। तुम दोनों… तुम दोनों शुरू करो। मैं बाद में आऊँगा।”

और वो चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ।

अब बस मैं और राशी। कमरा। मोमबत्तियाँ। और वो रात।

राशी बिस्तर के किनारे बैठी। मैंने उसके सामने घुटने टेके।

उसके हाथ पकड़े। उसकी हथेलियाँ गरम थीं। मैंने एक-एक उँगली चूमी — अंगूठा, तर्जनी, मध्यमा — धीरे-धीरे, जैसे किसी मंदिर की पीठ पर दीया रख रहा हूँ।

फिर उसके घुटनों पर हाथ रखा। साड़ी के नीचे उसकी टाँगें गरम थीं।

मैंने धीरे से साड़ी का पल्लू उठाया, और उसकी गर्दन पर पहला चुंबन रखा — ठीक उस जगह, जहाँ नस फड़क रही थी।

राशी ने आँखें बंद कर लीं और हल्की-सी आह भरी — “हम्म…”

मैंने उसके कान के नीचे चूमा, फिर जबड़े की रेखा पर, फिर ठुड्डी पर, और फिर उसके होंठों पर।

पहला चुंबन धीमा था — जैसे दरवाज़ा खटखटाया जाए। दूसरा गहरा — जैसे अंदर आ गए हों। तीसरे में हमारी जीभें मिलीं और राशी ने मेरी गर्दन पकड़ ली।

वो काँप रही थी। और मैं भी।

मैंने उसे उठाकर बिस्तर पर लिटाया। वो हँसी — “इतना ताक़तवर?”

“तुम्हारे लिए।” मैंने कहा।

फिर मैंने उसकी साड़ी का पल्लू धीरे-धीरे खोला। साड़ी सरकती गई, जैसे कोई नदी का किनारा उतर रहा हो।

और नीचे से निकला — लाल ब्लाउज़, बहुत पतला, जिसमें उसके दूध की गोलाई साफ़ दिख रही थी। और निप्पल — दोनों उभरे हुए, कपड़े के नीचे साफ़ नक़्शे जैसे।

मैंने पहले ब्लाउज़ के ऊपर से हथेली रखी। राशी ने पीठ मेहराब-सी बना दी। मैंने धीरे से दबाया — भरा हुआ, भारी, गरम। “ओह संतोष…” वो फुसफुसाई।

फिर मैंने उसके ब्लाउज़ की हुक्स खोलनी शुरू कीं। एक-एक करके।

राशी ने मेरे हाथ पर हाथ रख दिया, जैसे कहे — “धीरे, आराम से।”

आख़िरी हुक खुली। ब्लाउज़ हटा। और फिर वही जो हर आदमी की कल्पना होती है — उसके दूध बिना ब्रा के सामने आ गए।

गोल, भरे, चमकते, और ऊपर उठे हुए। निपल्स — गुलाबी-भूरे, तने हुए, जैसे सुबह की कली। उसने शरमाकर हाथ से ढकना चाहा, मैंने रोक दिया।

“नहीं, देखने दो।” मैंने कहा।

मैंने अपनी जीभ उसके कॉलरबोन से नीचे चलाई। धीरे-धीरे। घाटी में। फिर बाएँ दूध की तरफ़ बढ़ा।

पहले उसके चारों तरफ़ चक्कर लगाया — अंदर से बाहर, बाहर से अंदर। राशी की साँसें तेज़ हो चली थीं। उसने मेरे बाल पकड़ लिए।

फिर मैंने उसका निप्पल मुँह में लिया।

जैसे ही जीभ ने उस पर चक्कर लगाया, राशी ने ज़ोर से आह भरी — “आहह्ह संतोष!” उसकी कमर बिस्तर से उठ गई।

मैंने धीरे-धीरे चूसा — पहले कोमल, फिर गहरा। दूसरे दूध को हाथ में लिया, दबाया, निप्पल को अंगूठे और तर्जनी के बीच सहलाया।

“तेरा निपल्स इतना सख़्त हो गया है।” मैंने फुसफुसाया।

“तेरे मुँह से है।” वो हाँफी।

मैंने बारी-बारी दोनों दूध चूसे। एक-दूसरे के बीच झूलता रहा — जैसे प्यासा आदमी कुएँ के दो छोरों से पानी पी रहा हो। और राशी — राशी बस मेरे बालों में हाथ फेरती रही, कभी खींचती, कभी दबाती।

उसकी साड़ी अब ढीली पड़ चुकी थी। मैंने उसे पूरा खींचकर निकाल दिया।

उसकी कमर पतली, नाभि गहरी, और नीचे — पेटीकोट। फिर वो भी हटा। और अब सामने था — उसका बुर।

लाल पैंटी में लिपटा हुआ, पर उभार साफ़। और पैंटी पर एक गीला धब्बा — उसकी गर्मी का सबूत।

मैंने पैंटी के ऊपर से हथेली रखी। राशी ने टाँगें थोड़ी खोल दीं। मैंने धीरे से दबाया, फिर ऊपर-नीचे सहलाया। “तू इतनी गीली है राशी।”

“तेरे लिए।” उसने आँखें खोलकर कहा, “सिर्फ़ तेरे लिए।”

मैंने पैंटी उतारी। राशी ने पैर ऊपर करके मदद की। और फिर वो पूरी खुली — मेरे सामने, मोमबत्ती की रोशनी में।

उसका बुर भरा हुआ, चिकना, और भीतर की तरफ़ मोड़ा हुआ। ऊपर की तरफ़ एक छोटा-सा उभार — उसका क्लिट।

मैंने उसे देखते ही अपनी ऊँगली वहाँ रखी। राशी ने हल्की चीख दी।

मैंने टाँगें फैलाकर बीच में बैठ गया। पहले बुर के चारों ओर जीभ घुमाई — बाहर के होंठों पर, फिर भीतर। राशी की टाँगें मेरे कंधों पर थीं और वो मेरे सिर को नीचे दबा रही थी।

फिर मैंने जीभ भीतर डाली। अंदर की दीवारें गरम, चिकनी, और फड़कती हुई थीं। मैंने ऊपर-नीचे, अंदर-बाहर, धीमी और गहरी। फिर निकलकर उसके क्लिट पर चक्कर — हल्के, तेज़, फिर हल्के।

“ओह मेरे भगवान… संतोष, रुक नहीं सकता ना?” वो हाँफी।

“रुकना क्यों है? आ जाने दे।” मैंने बुर के भीतर उँगली डाली — पहले एक, फिर दो। अंदर ढूँढा, और वो जगह मिल गई — ऊपर की दीवार पर वो खुरदरी जगह। जैसे ही उँगली वहाँ टिकी और जीभ क्लिट पर लगी, राशी की टाँगें काँपने लगीं।

“आ रहा है… आ रहा है संतोष… मत रुकना…”

और फिर वो आ गई। उसका पूरा शरीर ऐंठ गया। बुर ने मेरी उँगलियों को जकड़ लिया, जैसे कभी छोड़ना नहीं चाहता। वो लंबी, धीमी आह के साथ बिस्तर पर ढीली पड़ गई। आँखें बंद, होठ खुले, साँस भारी।

“संतोष…” वो फुसफुसाई, “तूने पहली बार में ही मार डाला।”

अब मैंने अपने कपड़े उतारे। शर्ट, पैंट — सब। जब पैंटी उतरी, तो मेरा लंड सामने था — साढ़े चार इंच का, पर पूरा खड़ा, सख़्त, और ऊपर की तरफ़ झुका हुआ। सिरे पर चमक।

राशी ने उसे देखा। फिर हाथ बढ़ाकर पकड़ा। धीरे-धीरे ऊपर-नीचे किया। “बिल्कुल सही है।” उसने कहा, “नाप नहीं, गरमी मायने रखती है। और ये तो आग है।”

उसने मुझे खींचकर ऊपर बुलाया। मैं उसके ऊपर आ गया। हमने चुंबन किया — लंबा, गहरा। और तभी मेरा लंड उसके बुर के दरवाज़े पर टिका। राशी ने टाँगें फैलाईं, कूल्हे थोड़े ऊपर उठाए।

मैंने अपने लंड का सिरा अंदर सरकाया। गरम, चिकना, और तंग। राशी ने हल्की आह भरी। और फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर।

“ऊँह्ह्ह्ह…” दोनों ने एक साथ साँस छोड़ी।

मैं अंदर था — पूरा। उसके बुर ने मुझे गले लगा लिया था। मैंने कुछ सेकंड रुका, महसूस किया — दीवारों की फड़कन, गरमी, गीलापन।

फिर शुरू किया। धीमा, गहरा, पूरा बाहर निकालकर फिर पूरा अंदर। हर धक्के पर राशी की साँस छूटती। मैंने उसकी गर्दन में मुँह दबा दिया, और उसकी कमर पकड़ ली।

पहले हम मिशनरी में रहे। मैं ऊपर, वो नीचे। उसकी टाँगें मेरी कमर के चारों तरफ़ लिपटी थीं। हर धक्के के साथ बिस्तर हल्का चरमराता। मोमबत्तियों की लौ हिलती। मैं धीरे-धीरे तेज़ होता गया।

फिर मैंने उसके कूल्हों के नीचे तकिया रखा — कामसूत्र का सबसे सरल उपाय। इससे बुर ऊपर उठ गया और मेरा लंड उसकी सबसे संवेदनशील दीवार पर सीधा लगने लगा।

राशी चीख पड़ी, “यही! वहीं लग रहा है!”

मैंने गति बदली — अब गहरे धक्के, हर बार उसी जगह। राशी ने मेरी पीठ पर नाख़ून गड़ा दिए। उसकी साँसें तेज़, उसकी आहें बेकाबू।

“संतोष, तू… तू छोटा नहीं है। बिल्कुल नहीं।”

“क्यों, अच्छा लग रहा है?”

“बहुत अच्छा… ऐसे ही… मत रुक।”

फिर मैंने उसे पलटा। राशी ने घुटने टेके, हाथ बिस्तर पर, पीठ मेहराब में। ये पोज़ उस पर जैसे बना ही था — कमर पतली, कूल्हे गोल, और बुर पीछे से पूरी खुली।

मैंने पीछे से अंदर डाला। इस बार कोण बदल गया था और गहराई और बढ़ गई।

राशी ने सिर झुकाकर आह भरी। मैंने उसके बाल एक तरफ़ कर दिए और कंधे पर चूमा। फिर कमर पकड़कर धक्के देने लगा।

उसके दूध पीछे लटक कर झूल रहे थे। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उन्हें पकड़ लिया — भरे, भारी, गरम। निप्पल अंगूठे के नीचे सख़्त। जैसे ही मैंने उसे सहलाया, राशी की बुर ने मुझे और जकड़ लिया।

“ओह… ये और अच्छा है।” वो हाँफी।

मैंने गति तेज़ की। अब कमरा सिर्फ़ दो आवाज़ों से भरा था — त्वचा की थाप, और राशी की आहें। मैंने झुककर उसकी पीठ पर चुंबन किए, कंधे से गर्दन तक जीभ चलाई।

फिर मैं पीठ के बल लेटा और राशी को ऊपर बुलाया। “तू चला।”

वो हँसी और ऊपर चढ़ गई। उसने मेरे लंड को पकड़ा, सिरे को अपने बुर पर रखा, और धीरे-धीरे नीचे बैठ गई।

पूरा अंदर जाते ही वो आँखें बंद करके ऊपर को देखने लगी। फिर वो हिलने लगी — पहले धीमे, फिर तेज़।

उसके दूध ऊपर-नीचे झूल रहे थे, निपल्स तने हुए। मैंने दोनों हाथ बढ़ाकर उन्हें पकड़ा, दबाया, निपल्स को अंगूठे से सहलाया।

“तू तो कमाल कर रही है।” मैंने कहा।

वो आगे झुकी, हाथ मेरी छाती पर। अब हम आमने-सामने थे।

उसने मेरे होंठ चूमे — भूख से, जैसे कुछ देर और जीना है। और फिर वो फिर हिलने लगी, इस बार आगे-पीछे, अपनी क्लिट को मेरी जड़ पर रगड़ती हुई।

मैंने उसकी कमर पकड़ी और नीचे से धक्के देने लगा। दोनों की गति मिल गई।

राशी की आहें फिर बढ़ने लगीं — “आ रहा है… दोबारा आ रहा है…”

“आ जा राशी। मेरे ऊपर आ जा।”

और वो आ गई। इस बार उसने मेरा नाम पुकारा — ऊँची आवाज़ में, बेझिझक।

उसका शरीर ऐंठा, फिर ढीला पड़ा। वो मेरी छाती पर गिर गई, हाँफती हुई।

मैंने उसे कसकर पकड़ा। “एक बार और?” मैंने फुसफुसाया।

“तेरे साथ तो सौ बार।” वो मुस्कुराई।

मैंने उसे फिर पलटा — इस बार उसकी टाँगें मेरे कंधों पर रखीं। कामसूत्र का गहरा पोज़। इस कोण में मेरा लंड उसकी सबसे गहरी जगह छू रहा था। राशी ने आँखें बंद कर लीं।

अब मैं तेज़ था, बेकाबू। दो महीने की बातें, दो महीने की भूख, दो महीने का इंतज़ार — सब एक-एक धक्के में उतर रहा था। राशी की आहें मेरी आहों में मिल गईं।

“राशी, अब मैं रुक नहीं सकता।”

“रुक मत। अंदर ही…”

कुछ और धक्के। और फिर वो पल — मेरी कमर जकड़ गई, टाँगें काँपीं, और मैं उसके अंदर छूट गया। गहरा, लंबा, और पूरा। राशी ने मेरी गर्दन पकड़कर खुद को मुझसे चिपका लिया।

हम वैसे ही रहे — जुड़े हुए, हाँफते हुए, पसीने में भीगे हुए। उसकी छाती मेरी छाती पर। मेरी साँस उसके गालों पर।

“संतोष…” वो फुसफुसाई, “तूने बहुत अच्छा चोदा। सच में। छोटा-बड़ा कुछ नहीं। तूने पूरा भर दिया।”

मैं हँसा। “तुम्हारे साथ तो मैं सब भूल जाता हूँ।”

थोड़ी देर बाद बाथरूम का दरवाज़ा खुला। रोहित बाहर आया — सिर्फ़ तौलिया लपेटे। छह फुट का शरीर, चौड़ी छाती, और उसकी टाँगों के बीच — जो तौलिये के नीचे उभरा था — वो सच में बहुत बड़ा था।

राशी ने उसे देखा और आँखें बड़ी कर लीं। “रोहित, तुम्हारा तो… ये तो सच में नौ इंच है क्या?”

रोहित शरमाकर हँसा। “नौ से ऊपर, भाभी। पर नाप से काम नहीं चलता — देखिए तो।”

वो बिस्तर के पास आया। राशी अभी भी नंगी थी, चादर उसकी कमर तक थी।

रोहित ने बिस्तर के किनारे बैठकर उसके पैर छुए — धीरे-धीरे, पंजों से घुटनों तक। फिर पिंडली पर चुंबन।

मैं साथ में लेटा रहा। देखता रहा।

रोहित ने चादर हटा दी। राशी ने फिर से खुद को नंगा कर लिया। उसकी नज़रें मेरी तरफ़ और रोहित की तरफ़ बदल रही थीं — जैसे तय न कर पा रही हों कि किसे देखे।

रोहित ने उसके दूध पर हाथ रखा। उसके हाथ बड़े थे। पूरा दूध हथेली में समा गया। राशी ने आह भरी।

फिर उसने निपल को अंगूठे से सहलाया और फिर उसे मुँह में ले लिया। राशी की कमर ऐंठ गई — पहले संतोष, अब रोहित। दो जोड़े होंठ, दो जोड़े हाथ।

मैंने भी बढ़कर उसके दूसरे दूध को अपने मुँह में लिया। अब राशी के दोनों निपल्स दो आदमियों के मुँह में थे। वो बस आहें भरती रही — “ये तो… ये तो बहुत है…”

रोहित ने उसके बुर की तरफ़ हाथ बढ़ाया। राशी ने टाँगें फैला दीं। उसने दो उँगलियाँ अंदर डालीं — आसानी से, क्योंकि राशी अभी भी मेरे आख़िरी चुदाई से गीली थी।

“भाभी, तुम तो अभी भी तैयार हो।” रोहित ने हँसकर कहा।

“तुम्हारे लिए तैयार हूँ।” राशी ने मेरी तरफ़ देखकर कहा, फिर रोहित की तरफ़, “दोनों के लिए।”

रोहित ने तौलिया खोला। उसका लंड पूरा खड़ा था — बेलन जैसा मोटा, और इतना लंबा कि राशी ने हाथ से नापा और सिर्फ़ मुस्कुरा दी।

“भाभी, तैयार हो?”

“हाँ। धीरे से।”

रोहित ने सिरा टिकाया। राशी ने गहरी साँस ली। फिर धीरे-धीरे अंदर — पहले आधा, फिर थोड़ा और, फिर पूरा। राशी ने मुँह से एक लंबी आह निकाली — जैसी आज तक न निकली थी।

“ओह रोहित… ओह मेरी जान… ये तो पूरा अंदर है…”

रोहित हिलने लगा — धीमा, गहरा, पूरा। और मैं साथ में उसके दूध चूसता रहा, उसके निपल्स सहलाता रहा। राशी का शरीर दो आदमियों के बीच ऐसे हिचकोले ले रहा था जैसे तूफ़ान में नाव।

कुछ देर बाद रोहित ने गति बढ़ाई। राशी की आहें लगातार। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और वो मुझे कसकर जकड़े रही — जैसे कहे, “तू तो मेरा ही है, ये तो बस मज़ा है।”

फिर रोहित ऊपर आ गया, राशी उसके नीचे। मैं किनारे बैठकर देखता रहा, और कभी उसके होंठ चूमता, कभी उसके दूध दबाता।

फिर राशी ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। “संतोष, आ जाओ। दोनों।”

और हमने वो किया जो कामसूत्र में “दो पुरुष, एक स्त्री” का सबसे सुंदर रूप है — राशी बीच में, एक की गोद में पीठ टिकाए, दूसरे की बाँहों में आगे झुकी। मैं नीचे लेटा, राशी मेरे ऊपर, और रोहित पीछे से। राशी के बुर में एक बार मैं, और ऊपर उसके दूसरे में रोहित। दोनों एक साथ हिलते, और राशी — राशी तो जैसे सातवें आसमान पर थी।

हर धक्के पर उसका शरीर झूलता, निपल्स मेरी छाती पर रगड़ते, और उसके होंठ मेरे होंठों पर। रोहित पीछे से उसकी कमर पकड़कर धक्के देता। और मैं नीचे से उसकी कूल्हों को थामे हुए।

“मैं मर जाऊँगी…” राशी हाँफी, “ये तो बहुत है… ये तो बहुत है…”

फिर वो आई — लंबी, झटकों भरी, बेकाबू। और उसके साथ पहले रोहित छूटा, फिर मैं। तीनों एक-दूसरे से चिपके, पसीने में भीगे, साँसें फूलती हुईं।

कमरा चुप हो गया। सिर्फ़ मोमबत्तियों की लौ फड़फड़ा रही थी। बाहर गोमती की हवा खिड़की से आ रही थी।

रात ख़त्म हुई। रोहित देर रात चला गया — हँसते हुए, मुझे शाबाशी देते हुए, और राशी को हाथ जोड़कर “भाभी, फिर मिलेंगे” कहते हुए।

अब बस मैं और राशी थे। हम फिर नहाए, साथ। गरम पानी में उसने सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने उसकी पीठ पर साबुन लगाया — धीरे-धीरे, बिना जल्दी के।

फिर हम बिस्तर पर लौटे और बातें करते रहे। उसने कहा, “संतोष, आज पता चला — बड़ा-छोटा सिर्फ़ नाप नहीं होता। तुमने मुझे जितना महसूस कराया, वो कोई नौ इंच नहीं करा सकता। और रोहित ने जो दिया, वो भी सुंदर था। पर तुम… तुम मेरे हो।”

मैंने उसे कसकर जकड़ लिया। “और तुम?”

“मैं भी। बस तुम्हारी। बाक़ी सब बहाना था।”

सुबह जब धूप खिड़की से आई, तो राशी अभी सो रही थी — बाल बिखरे, होंठ हल्के खुले, चेहरे पर वो शांति जो सिर्फ़ पूरे प्यार के बाद आती है। मैं उसे देखता रहा। और सोचा — काश ये सुबह हर रोज़ हो।

उसी शहर में, उसी कमरे में, उसी बिस्तर पर, उसी लड़की के साथ।

और शायद हो भी गई।

क्योंकि तीन महीने बाद हमने रिश्ता पक्का कर लिया। और आज जब भी राशी रात में मेरे पास आती है, वो कभी-कभी मुस्कुराकर पूछती है — “संतोष, रोहित को फिर बुलाएँ?”

और मैं हँसकर कहता हूँ — “बुला लें।”

क्योंकि प्यार नाप से नहीं, दिल से होता है। और जब दिल पूरा हो, तो शरीर भी पूरा हो जाता है — चाहे चार इंच हो, चाहे नौ।

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

2 thoughts on “शादी एप से मिली लड़की ग्रुप में चुदवाई”

  1. Very nice story……… main aapki kahaaniyana roz padhta hun.
    koi ladki gorakhpur se ho aur jise 11 inch ke laude se chidwana ho to mujhe message kare.

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