लॉकडाउन के दौरान मॉम को दोस्तों के साथ मिलकर चोदा

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मेरा नाम रवि वर्मा है। मैं भोपाल, मध्य प्रदेश का रहने वाला हूँ। यह कहानी उस कोरोना काल की है — उस समय की जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था, सड़कें सूनी थीं, बाज़ार बंद थे, और हर घर में एक अजीब-सी खामोशी बसी हुई थी।

उस खामोशी में कुछ घरों की दीवारों ने ऐसी-ऐसी बातें सुनीं जो शायद ही कभी सुनने को मिलती हैं।

मेरी लंबाई 6 फीट है। मेरी उम्र 23 साल है। मैं नए ज़माने का लड़का हूँ — मुझे सिर्फ़ एंजॉय करने से मतलब है।

पढ़ाई-लिखाई तो चलती रहती है, लेकिन असली ज़िंदगी मेरे लिए जिम की है, बॉडी बनाने की है, और लड़कियों को पटाने की है।

पिताजी कहते हैं कि तेरे जैसा लापरवाह लड़का तो उन्होंने पहली बार देखा है, लेकिन मैं जानता हूँ कि वो अंदर से मुझ पर फ़ख़्र करते हैं।

मेरे पिता जी का नाम राघवेंद्र वर्मा है। भोपाल में वो एक बहुत बड़े सुनार हैं — सोने-चाँदी का बड़ा कारोबार है, बड़ी दुकान है, और इज़्ज़त भी।

पैसे की कोई कमी नहीं है हमारे घर में। तीन-चार गाड़ियाँ हैं, बड़ा बंगला है, नौकर-चाकर हैं।

पिताजी की उम्र 50 के आसपास है, लेकिन उनका काम का बोझ उन्हें घर से दूर रखता है — दिन भर दुकान, दिन भर कस्टमर, दिन भर हिसाब-किताब।

और मैं? मैं जिम जाता हूँ, तांबे जैसा शरीर बनाता हूँ, बाज़ुओं में दम लाता है और लड़कियों के साथ रातें गुज़ारता हूँ।

मेरे लंड की साइज़ 9.4 इंच है — मोटा, लंबा, और सख़्त। दोस्त मज़ाक में कहते हैं कि रवि तो इंसान नहीं, बल्कि चलती-फिरती बरदाश्त की परीक्षा है।

मेरी माँ का नाम सुनीता वर्मा है। उनकी लंबाई 5 फीट 4 इंच है। देखने में वो बहुत ही सेक्सी हैं। उनका बॉडी साइज़ 36-34-40 है।

उम्र अभी 45 साल की है, लेकिन ख़ूबसूरती ऐसी है कि कोई उन्हें तीस से ज़्यादा नहीं बताएगा।

उनका रंग गोरा है, बाल घने और कमर तक लंबे, आँखें बड़ी-बड़ी और बोलने वाली। जब वो साड़ी पहनकर घूमती हैं तो घर के आईने भी सोच में पड़ जाते हैं।

माँ का शरीर वैसा ही है जैसा एक पुराने ज़माने की हीरोइन का होता है — भरे हुए दूध, जो चलने पर हल्के-हल्के काँपते हैं, चौड़ी गांड जो साड़ी के पल्लू के नीचे एक पूरी दुनिया छुपाए रखते हैं, और एक गहरी नाभि जो कमर की मोटाई की गवाही देती है।

उनकी बुर बहुत सुंदर है — मुलायम, गुलाबी, और ऐसी जगह बसी हुई जहाँ एक बार नज़र पड़ जाए तो हटती नहीं।

पिताजी ने उन्हें पटाकर शादी की थी। उन्हें बहुत प्यार करते थे, आज भी करते हैं। लेकिन पिताजी का काम और उनकी थकान ऐसी थी कि बिस्तर की बातें धीरे-धीरे पुरानी होती चली गईं।

जब से कोरोना आया और लॉकडाउन लगा, पिताजी घर पर ज़्यादा थे, पर दुकान का हिसाब और तनाव भी साथ लेकर आए। माँ अकेली-सी लगती थीं — रसोई, पूजा, टीवी, और फिर बिस्तर। बस।

छोटी उम्र से मैंने माँ को हमेशा घर की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ माना था। लेकिन उन्हें “माँ” के नाते देखता था, “औरत” के नाते नहीं। यह बात बदलने में जो चीज़ लगी, वो थी — एक गाँव, एक अंकल, और एक गाली।

कोरोना के पहले चरण में जब हालात थोड़े खुले, तो मैं अपने दोनों दोस्तों के साथ मामा के गाँव गया था।

मामा का गाँव भोपाल से कुछ घंटे की दूरी पर है — एक छोटा-सा गाँव, जहाँ हर आदमी एक-दूसरे को जानता है, और हर आँगन की कहानी पूरे गाँव को पता होती है।

मेरे दोनों दोस्त — बंटी और शेखर — मेरे ही जिम के साथी थे। दोनों कसरत में मेरे बराबर, दोनों के शरीर पत्थर जैसे, और दोनों की नीयत भी मेरी तरह ही खराब।

हम तीनों मिलकर गाँव की गलियों में घूम रहे थे, नारियल पानी पी रहे थे, और हँसी-मज़ाक कर रहे थे।

तभी रास्ते में एक अंकल मिले। उम्र कोई पचास-पचपन, पगड़ी बाँधे, चेहरे पर गाँव की धूप जमी हुई। उन्होंने मुझे घूरकर देखा और पूछा —

“अरे, तू सुनीता का लड़का है क्या?”

मैंने कहा, “हाँ अंकल, मैं रवि हूँ, सुनीता वर्मा का बेटा।”

वो ठहाका लगाकर हँसे, दाँत चमकाए, और बोले —

“कैसी है तुम्हारी रंडी माँ?”

यह सुनकर मैं हक्का-बक्का रह गया। “रंडी माँ”? माँ को हमेशा घर की लक्ष्मी कहते देखा था, यह “रंडी” शब्द कहाँ से आया?

मैंने तमाचा मारने के लिए हाथ उठा दिया, पर बंटी और शेखर ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले —

“अरे पगला, सुन तो सही।”

अंकल ने हँसते हुए कहा —

“बेटा, जब तेरी माँ की शादी नहीं हुई थी, तब हम चार — मैं और मेरे तीन दोस्त — उसे चोदकर उसका ख़याल रखते थे। वो हमारी रखैल नहीं, हमारी साझी औरत थी। हम उसे चोदते थे, और वो हमें। कोई पैसा नहीं लेती थी — बस जिस्म की प्यास बुझाती थी। तेरी माँ की बुर हम चारों ने मिलकर चोदी है।”

यह सुनकर मेरा मूड ख़राब हो गया। मतलब मेरी माँ, जिसे मैं हमेशा सती-सावित्री समझता था, गाँव में चार आदमियों से चुदवाती थी? और वो भी शादी से पहले? मैंने बंटी-शेखर से और कुछ नहीं पूछा, बस गाड़ी उठाई और सीधा भोपाल वापस आ गया।

घर पहुँचकर मैंने जूते फेंके, हाथ धोए, और सीधा माँ के पास गया।

माँ रसोई में थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, माथे पर पसीना, और गरम रोटियाँ बना रही थीं।

उनकी पीठ कमान की तरह मुड़ी हुई थी, और पसीने से चिपके बाल गर्दन पर लिपटे थे।

मैं पीछे से आया और बोला —

“माँ, एक बात पूछनी है।”

उन्होंने बिना मुड़े कहा, “पूछ ना।”

मैंने सीधा सवाल दाग दिया —

“आज गाँव में एक अंकल मिले थे। वो कह रहे थे कि आप पहले गाँव की रंडी थीं। सच है क्या?”

माँ के हाथ रुक गए। रोटी तवे पर रह गई और उन्होंने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। पहले शरमाईं, फिर हँसीं। उस हँसी में एक पुरानी याद का नशा था।

उन्होंने कहा —

“रंडी की तरह तो धंधा नहीं करती थी बेटा। रंडी वो होती है जो पैसे लेकर चुदवाए। मैं तो बस फ्री में गाँव के बड़े लंडों से चुदवाती थी। जिस्म की भूख थी, सो बुझा लेती थी। उसमें कोई खोट नहीं।”

फिर उन्होंने रोटी पलटी, तवे पर घी डाला, और शांति से कहा —

“शादी से पहले की बात है। उस वक़्त गाँव में चार-पाँच लड़के थे — बड़े-बड़े, हट्टे-कट्टे। उनमें से जो मुझे पसंद आया, उसके साथ सो गई। फिर जो अच्छा चोदता था, उसके साथ बार-बार सोई। उन्होंने मेरी बुर को वैसे ही बनाया जैसे कोई बाग़ में पौधा पालता है। जब तक तुम्हारे पिताजी से शादी हुई, तब तक वो चारों ही मेरे जिस्म के हमराह हो चुके थे।”

मैं सुनता रहा, और अंदर कुछ गरम-सा फैलने लगा। माँ की तरफ़ देखा — अब वो मुझे सिर्फ़ माँ नहीं लग रही थीं। एक औरत लग रही थीं। एक ऐसी औरत जिसका जिस्म जानता है कि चोदना क्या होता है।

मैंने फिर पूछा, हिम्मत करके —

“माँ, मेरा लंड भी बड़ा है। 9.4 इंच का। आप मुझसे भी चुदवाएँगी क्या?”

माँ ने पलटकर देखा। एक लंबा पल। फिर होंठों पर वो मुस्कान आई जो शायद किसी पुराने रात की याद थी।

उन्होंने कहा — “हाँ क्यों नहीं। जिस्म का रिश्ता खून से बड़ा नहीं होता, बेटा। पर एक शर्त है — हम किसी को बताएँगे नहीं। और जब तक चुदेंगे, तब तक सिर्फ़ चोदने वाले और चुदने वाले रहेंगे, माँ-बेटे नहीं।”

मैंने कहा, “ठीक है माँ।”

और उसी रात हमने पहली बार एक-दूसरे को नए नज़र से देखा। बस। अब बस इंतज़ार था एक मौक़े का।

वो मौक़ा ज़्यादा दिनों तक नहीं आया, क्योंकि कोरोना का दूसरा लहर शुरू हो गया। फिर लॉकडाउन लगा।

पिताजी को दुकान की फ़िक्र थी — सोने का कारोबार, कारीगर, कस्टमर के ऑर्डर। वो दिन-रात फ़ोन पर लगे रहते। माँ और मैं घर में अकेले। बंटी और शेखर भी अपने-अपने घरों में बंद।

एक दिन मैंने बंटी को फ़ोन किया। बोला — “यार, घुट गया हूँ। निकल आते हैं।”

बंटी बोला, “लॉकडाउन है, कहाँ निकलें?”

मैंने कहा, “हमारे घर आ जा। पिताजी दुकान पर हैं, माँ घर पर। खाना भी मिलेगा और जिम भी।”

शेखर को भी बुलाया। दोनों आ गए। पहले दो-तीन दिन हमने बस खाया, सोया, और जिम के बहाने वज़न उठाया। लेकिन मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी — माँ।

माँ भी बदल गई थीं। जब से उन्होंने मुझसे वो बात कही थी, वो थोड़ा और खुल गई थीं।

घर में साड़ी थोड़ी और ढीली बाँधतीं, ब्लाउज़ की डोरी थोड़ी और खुली रखतीं, और जब बंटी-शेखर आते तो उनकी तरफ़ देखकर हल्का मुस्कुरा देतीं। शायद वो भी समझ गई थीं कि अब कुछ होने वाला है।

चौथी रात को हम तीनों बैठे थे — ड्राइंग रूम में, हल्की रोशनी में, और बाहर बारिश की फुहार।

माँ ने चाय बनाकर लाईं और हमारे सामने बैठ गईं। बंटी ने चाय का कप उठाया, शेखर ने संगीत लगाया, और मैंने मौक़ा देखकर बात शुरू की।

“माँ, ये दोनों भी मेरे जिम के साथी हैं। दोनों का शरीर भी मेरे जैसा है।”

माँ ने दोनों को देखा। बंटी के सीने पर टाइट टी-शर्ट चिपकी थी, शेखर के बाज़ू नसों से भरे हुए थे। माँ की नज़र उनके जिस्म पर फिसली, फिर नीचे, फिर ऊपर।

मैंने आगे कहा, “आज रात आप बताइए — पुरानी याद ताज़ा करें?”

माँ ने चाय की चुस्की ली, कप रखा, और बोलीं —

“तुम लोग तैयार हो?”

बंटी बोला, “आंटी, हम तो तैयार ही हैं।”

शेखर बोला, “आंटी, आप तैयार हैं क्या?”

माँ हँसीं और बोलीं — “चलो, फिर देखते हैं।”

बस। इतना कहना था। पूरे घर की हवा बदल गई। बारिश की बूँदें खिड़की पर बज रही थीं, और अंदर तीन जवान जिस्म और एक पकी हुई ख़ूबसूरत औरत — और बीच में एक अधूरी प्यास।

हम चारों ड्राइंग रूम से उठकर पिताजी के कमरे की तरफ़ बढ़े। पिताजी रात भर दुकान पर रहते थे, तो कमरा खाली था। बड़ा बिस्तर, मोटा गद्दा, ठंडी हवा, और मद्धिम रोशनी।

माँ ने दरवाज़ा बंद किया। क्लिक की आवाज़ गूँजी और दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

मैं आगे बढ़ा। माँ के सामने खड़ा हुआ। उनकी आँखों में देखा — वही आँखें जो सुबह रोटी बनाती थीं, अब रात की भूख से चमक रही थीं।

मैंने उनका चेहरा दोनों हाथों में लिया। अंगूठों से गाल सहलाए। माँ ने आँखें बंद कर लीं। और मैंने उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

पहला चुम्बन धीमा था — बस एक स्पर्श। फिर दूसरा, थोड़ा गहरा। फिर तीसरा, और माँ के होंठ खुल गए।

उनका हाथ मेरी गर्दन पर आ गया, उँगलियाँ मेरे बालों में फँस गईं। उनकी जीभ मेरी जीभ से टकराई, और दोनों लिपट गए।

पीछे से बंटी आया। उसने माँ की गर्दन पर होंठ रखे। शेखर उनके कान के पीछे लगा — और जहाँ-जहाँ होंठ पड़ते, वहाँ माँ का जिस्म काँपता।

मैंने माँ के कान में धीरे से कहा —

“माँ, आज पूरा जिस्म तेरा ही है।”

माँ ने फुसफुसाया — “आज जो चाहो करो, बस रुकना मत।”

अब मैंने उनकी साड़ी का पल्लू पकड़ा और खींच लिया। पल्लू फिसलकर नीचे आ गया।

उनका ब्लाउज़ दिख गया — टाइट, भीतर से भरे हुए दूध की लकीरें साफ़। ब्लाउज़ की बटनें एक-एक करके खोलीं। पहली, दूसरी, तीसरी। ब्लाउज़ खुल गया।

भीतर काला ब्रा। और ब्रा के ऊपर उनके दूध उठे हुए — भारी, गोल, और दोनों के बीच एक गहरी दरार।

बंटी ने पीछे से ब्रा का हुक खोला। क्लिक। ब्रा ढीली हो गई। मैंने ब्रा खींची और फेंक दी।

और सामने आ गए — उनके दूध।

गोरे, भरे, भारी, और सिरों पर गुलाबी-भूरे निप्पल जो सख़्त होकर खड़े थे।

निपल्स के चारों तरफ़ छोटे-छोटे दाने उभर आए थे। मैं झुका और बाएँ दूध को मुँह में ले लिया। जीभ से निप्पल को सहलाया, फिर दाँतों से हल्का दबाया। माँ ने “आह” कहा और सिर पीछे कर लिया।

बंटी दाएँ दूध पर लगा। शेखर ने उनकी कमर पर हाथ रखा और पेट सहलाने लगा। मैं दूध चूसता, बंटी कुतरता, और माँ दोनों हाथों से हमारे सिर पकड़कर दबाती — मानो और गहरा चाहिए।

मैंने बीच-बीच में कहा —

“माँ, तेरे दूध कितने भरे हैं। निप्पल इतने सख़्त क्यों हैं?”

माँ ने हाँफते हुए कहा —

“क्योंकि बहुत दिनों से किसी ने ठीक से दबाया नहीं। पिताजी को फ़ुरसत ही कहाँ।”

बंटी बोला — “आंटी, आज फ़ुरसत खूब है।”

मैंने माँ के दूधों को दोनों हाथों में भरा। दबाया, मसला, ऊपर-नीचे किया।

दूध मेरी उँगलियों के बीच से फिसलते रहे। फिर मैंने निपल्स को अंगूठे और तर्जनी के बीच पकड़कर हल्का-हल्का खींचा और घुमाया। माँ की साँस तेज़ हो गई। उनके होंठ खुले रह गए।

शेखर ने उनकी नाभि पर होंठ रखे। माँ का पेट काँपा।

वो उनकी कमर के नीचे, पेट के किनारों पर चूमता गया — बाएँ से दाएँ, दाएँ से बाएँ। माँ की कमर लचकने लगी।

मैंने पीछे से माँ की कमर पकड़ी और उन्हें बिस्तर की तरफ़ धकेला। तीनों मिलकर उन्हें गद्दे पर लिटाया।

साड़ी अब सिर्फ़ कमर तक लिपटी थी। मैंने उसे खींचकर खोल दिया। नीचे पेटीकोट। वो भी खींचा। और फिर बचा सिर्फ़ काला पैंटी।

काला पैंटी — और उसके भीतर उनकी बुर। पैंटी पर ही एक गीली लकीर दिख रही थी।

मैंने उँगली उस लकीर पर फेरी, फिर उँगली उठाकर चखी। मीठी, गरम, और नशीली।

मैंने माँ के घुटनों को फैलाया। दोनों हाथों से उनकी जाँघों को सहलाया — ऊपर से नीचे, अंदर से बाहर।

जाँघों का मांस मुलायम था, और अंदर की तरफ़ गरम। मैंने दोनों जाँघों पर होंठ रखे, चूमा, फिर धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा। बुर के ठीक ऊपर आकर रुक गया। पैंटी की कपड़े के ऊपर से जीभ फेरी।

माँ ने हाँफकर कहा —

“रवि, पैंटी हटा दे… अब बर्दाश्त नहीं होता।”

मैंने पैंटी दोनों हाथों से नीचे खींची। माँ ने कमर उठाकर मदद की। पैंटी फिसलकर पैरों से बाहर आ गई।

और सामने थी — माँ की बुर।

भरी हुई, मुलायम, गुलाबी, और भीतर से चमकती हुई। ऊपर के बाल साफ़ किए हुए, और भीतर की दीवारें गीली।

बुर के ऊपर छोटी-सी गुलाबी कली उभरी हुई थी। नीचे से रस बहकर गुदे की तरफ़ जा रहा था।

बंटी और शेखर भी पास आ गए। तीनों ने मिलकर माँ के जिस्म पर हमला किया — कोई दूध चूसता, कोई जाँघ चूमता, कोई बुर के ऊपर जीभ फेरता।

मैंने बुर के होंठों को उँगलियों से खोला और भीतर की गुलाबी दीवारें देखीं। फिर जीभ बुर के भीतर घुसाई।

माँ ने कमर उठा दी और चीखी —

“आह… रवि… ऐसे ही… जीभ और अंदर डाल… हाँ…”

मैंने जीभ भीतर-बाहर की। ऊपर की कली पर अंगूठा रखकर गोल-गोल घुमाया।

माँ की जाँघें मेरे कानों को दबाने लगीं। उनकी बुर से रस बहकर मेरी ठुड्डी तक आ गया।

लगभग बीस मिनट तक हम तीनों ने उन्हें फोरप्ले में पूरा खोल दिया — चूमना, दूध दबाना, निप्पल चूसना, नाभि चाटना, जाँघें सहलाना, बुर चूसना। माँ अब पूरी तरह पिघल चुकी थीं।

उनका जिस्म पसीने से चमक रहा था, बाल बिखरे हुए, होंठ सूजे हुए, और आँखों में बस एक ही माँग।

तब मैंने कहा —

“माँ, अब तेरे हाथ में तीन लंड हैं। संभाल ले।”

मैं, बंटी और शेखर — तीनों बिस्तर के किनारे खड़े हो गए। तीनों ने अपनी-अपनी पैंट खोली। एक-एक करके लंड बाहर आए।

मेरा 9.4 इंच, मोटा और सख़्त। बंटी का कोई 8 इंच, शेखर का 8.7। तीनों खड़े हुए, नसें तनी हुईं, सिरे चमकते हुए।

माँ ने बिस्तर पर घुटनों के बल बैठकर तीनों को देखा। पहले हँसीं, फिर एक गहरी साँस ली, और बोलीं —

“वाह… तीनों बड़े लंड। गाँव की याद दिला दी।”

फिर वो आगे बढ़ीं। पहले मेरे लंड को दोनों हाथों में लिया। अंगूठे से सिरे को सहलाया। ऊपर-नीचे हिलाने लगीं। उनकी उँगलियाँ लंड की नसों पर फिसलती रहीं। मैंने आँखें बंद कर लीं।

फिर उन्होंने बंटी का लंड पकड़ा — बाएँ हाथ से। दाएँ हाथ से शेखर का। और दोनों को साथ-साथ हिलाने लगीं। तीनों लंड एक साथ हवा में — मेरा उनके सामने, बंटी का बाएँ, शेखर का दाएँ।

माँ हँसते हुए बोलीं —

“ऐसे लग रहा है जैसे कोई पूजा की थाली सजा रही हूँ।”

फिर उन्होंने मेरे लंड को मुँह के पास लाया। पहले होंठों से चूमा, फिर जीभ से सिरे पर गोल घुमाया। फिर पूरा सिरा मुँह में ले लिया। गरम, गीला मुँह। जीभ नीचे की तरफ़ लिपटी हुई। गाल भीतर से दबे हुए। माँ ने ऊपर-नीचे करना शुरू किया — धीमे, फिर तेज़।

मैंने कहा —

“माँ… क्या मुँह है तेरा… ऐसे ही… और अंदर ले…”

माँ ने गले तक ले लिया। मेरा सिरा उनके गले में टकराया। वो “ग़म” की आवाज़ करती रहीं। फिर मुँह निकालकर बंटी की तरफ़ मुड़ीं और उसे भी वैसे ही चूसने लगीं। फिर शेखर। फिर मेरी तरफ़।

और जब मुँह किसी एक लंड पर होता, तो दोनों हाथ बाक़ी दोनों को हिलाते रहते। कभी दाएँ हाथ से मेरा, बाएँ से बंटी का। कभी दोनों हाथ मेरे लंड पर और मुँह शेखर पर।

लगभग पंद्रह मिनट तक वो इसी तरह हमारे लंडों को चूसती और चाटती रहीं।

हम तीनों खड़े थे, हमारे हाथ उनके बालों में, उनके कंधों पर, उनके दूधों पर। कभी हम उनका निप्पल दबाते, तो माँ और ज़ोर से चूसतीं। जब मैं उनके बाल पकड़कर थोड़ा दबाता, तो वो और गहरा ले जातीं।

माँ बीच-बीच में रुककर लंडों को चेहरे पर फेरतीं, गालों पर, होंठों पर। फिर सिरे से निकलने वाली पहली बूँद चाटतीं और मुस्कुरा देतीं।

शेखर ने कहा —

“आंटी, आप तो प्रोफेशनल लग रही हैं।”

माँ बोलीं — “गाँव में चार लड़कों ने पाला था। तब सीखा। बेटे को भी आज़मा रही हूँ।”

बंटी हँसा — “आंटी, आज पूरे शहर को पता चल जाएगा।”

मैंने कहा — “चुप रहो, आज रात सिर्फ़ हमारी है।”

पंद्रह मिनट के बाद माँ ने मुँह निकाला, होंठ पोंछे, और बोलीं —

“अब बस। अब चोदो। तीनों मिलकर। जितना चोद सको, चोदो।”

बस यही इंतज़ार था।

माँ बिस्तर पर पीठ के बल लेटीं। घुटने मोड़े, जाँघें फैलाईं। बुर खुली हुई, गीली, और बुला रही थी।

मैं ऊपर आया। अपने लंड को बुर के होंठों पर रखा। सिरा भीतर धकेला — बस आधा इंच। फिर रुक गया। माँ ने आँखें खोलीं और देखा।

“रवि… अंदर डाल ना…”

मैंने कहा — “माँ, पहले बता तू क्या है मेरे लिए?”

माँ बोलीं — “तेरी… औरत।”

“और क्या?”

“तेरी… चुदने वाली… अब डाल दे ना रवि…”

मैंने ज़ोर से अंदर धकेला। पूरा लंड एक झटके में भीतर। माँ ने लंबी चीख निकाली — “आआआह… ओह रवि… इतना बड़ा…”

उनकी बुर ने मेरे लंड को कसकर पकड़ लिया। भीतर गरम, गीला, और टाइट। मैं ठहरा रहा, भीतर की दीवारों को महसूस करता रहा। माँ ने कमर उठाकर और अंदर लिया।

फिर मैंने चोदना शुरू किया — धीमी, गहरी थाप। हर धक्के पर माँ का पूरा जिस्म आगे-पीछे हिलता। उनके दूध लहराते। मैंने झुककर निप्पल मुँह में लिया और चोदते रहा।

बंटी पास आया। उसने माँ की गर्दन चूमी। शेखर उनकी जाँघें पकड़कर और फैलाईं। माँ तीनों के बीच एक मछली की तरह तड़प रही थीं — पर आनंद से।

माँ बोलीं — “रवि… तेरा लंड… इतना गहरा जाता है… आह… बुर फाड़ देगा…”

मैंने कहा — “फाड़ दूँगा माँ। आज तेरी बुर याद रखेगी।”

“हाँ… फाड़ दे… तेरी माँ की बुर पर हक़ है तेरा… चोद, बेटा चोद…”

बंटी हँसा — “आंटी, बेटा-बेटा कह रही हैं, पर चुदाई देखो।”

माँ ने बंटी की तरफ़ देखकर कहा — “आज सिर्फ़ चोदने वाले हो तुम तीनों। माँ-बेटा कहाँ रहा।”

पाँच मिनट में मैंने गति बढ़ाई। धक्-धक्-धक्। माँ के दूध ऊपर-नीचे कूदने लगे। उनकी बुर से सफ़ेद झाग बनने लगा। मैंने अंगूठे से उनकी कली दबाई और माँ चीख पड़ीं —

“आह… वहीं… वहीं रख… रुक मत रवि…”

मैं बाहर निकला। माँ को करवट दिलाई, फिर घुटनों पर खड़ा किया। उन्होंने हाथ बिस्तर पर टिकाए, कमर ऊपर उठाई, और नितंब ऊँचे कर लिए। पीछे से उनकी बुर और गुदा दोनों साफ़ दिख रहे थे।

बंटी पीछे आया। अपने लंड को बुर पर रगड़ा, फिर एक झटके में अंदर धकेला।

माँ ने चीखी — “ऊह… बंटी… तेरा भी मोटा है…”

बंटी बोला — “आंटी, आपकी बुर ने पकड़ लिया है। कस के।”

“तो चोद… कस के चोद… जितना ज़ोर लगा सकता है लगा…”

बंटी ने कमर पकड़कर चोदना शुरू किया — तेज़, लंबे झटके। हर धक्के पर माँ आगे को झुकतीं और फिर पीछे। उनके नितंब की थाप बंटी की जाँघों से टकराती — थप-थप-थप।

मैं सामने आया। माँ के सिर को उठाकर अपना लंड मुँह में दिया। अब माँ एक साथ दो जगह चुद रही थीं — आगे मुँह में, पीछे बुर में। वो “ग़म-ग़म” करती रहीं।

शेखर ने पीछे से उनके दूध पकड़कर झुलाए। निपल्स को उँगलियों के बीच दबाया। माँ ने और ज़ोर से मेरा लंड चूसा।

बंटी हाँफते हुए बोला — “आंटी… आपकी बुर… जन्नत है… क्या चुदती हैं…”

माँ मुँह निकालकर बोलीं — “तू भी तो… कम नहीं… साला… मेरी बुर का दाना-दाना जानता है…”

“क्योंकि आज पूरी रात यही करूँगा आंटी। आपकी बुर को इतना चोदूँगा कि बैठ न पाओ।”

“हाँ… बैठ न पाऊँ… चोद मुझे… कुतिया बना दे…”

मैंने कहा — “माँ, तू तो रंडी निकली।”

माँ हँसकर बोलीं — “बेटे, रंडी वो जो पैसा ले। मैं तो मुफ़्त में चुदने वाली हूँ।”

शेखर बोला — “आंटी, फिर तो हमें हर रात आना चाहिए।”

“आओ… रोज़ आओ… मेरी बुर रोज़ तैयार रहेगी…”

पाँच मिनट तक बंटी ने उन्हें पीछे से चोदा। माँ की बुर लाल हो गई, सूज गई, और रस टपकने लगा। मैं उनके दूध दबाता रहा।

बंटी बाहर आया। माँ पलटीं, बैठीं, और शेखर को बिस्तर पर लिटाया। उन्होंने अपनी जाँघें उसके ऊपर फैलाईं, बुर को उसके लंड पर रखा, और धीरे-धीरे बैठ गईं।

शेखर का लंड पूरा भीतर गया। माँ ने सिर पीछे किया और आँखें बंद कर लीं।

फिर वो ऊपर-नीचे हिलने लगीं — धीमे, फिर तेज़। उनके दूध उछलने लगे। शेखर ने नीचे से कमर उठाकर झटके दिए। माँ ने हाथ उसके सीने पर टिकाए और पूरी ताक़त से कूदने लगीं।

मैं पीछे आया। माँ की पीठ पर होंठ रखे। गर्दन से लेकर कमर तक चूमता गया। फिर उनके कान में कहा —

“माँ, तेरी कमर कितनी लचीली है।”

माँ बोलीं — “तूने ही तो बनाई… अब बर्बाद भी तू ही कर।”

शेखर ने कहा — “आंटी, ऐसे ही कूदो… ऐसे ही… आपकी बुर मेरे लंड को चूस रही है…”

माँ हाँफती हुईं — “तू भी नीचे से धक्का दे… साला… आराम क्यों कर रहा है…”

“लो, फिर।”

शेखर ने नीचे से ज़ोरदार झटके दिए। माँ ऊपर उठकर गिर पड़ीं। दोनों की टकराहट से गद्दा चरमराया।

बंटी ने पीछे से आकर माँ के दूध पकड़े और मुँह में निप्पल ले लिया। माँ ने एक हाथ बंटी के सिर पर रखा, दूसरा शेखर के सीने पर। मैं पीछे उनके नितंब सहलाता रहा।

पाँच मिनट इसी तरह। माँ पसीने से लथपथ। उनके बाल चेहरे पर चिपक गए। आँखों में पानी। होंठ काँपते हुए।

अब हमने उन्हें बिस्तर से उठाया। माँ को दीवार के सहारे खड़ा किया। मैं सामने आया, उनकी एक जाँघ उठाई, और लंड भीतर डाल दिया। माँ ने मेरे कंधे पकड़ लिए।

खड़े-खड़े चोदने में एक अलग ही मज़ा था। माँ की बुर तंग हो गई, और मेरा लंड और गहरा जाने लगा। हर धक्के पर माँ दीवार से चिपक जातीं और फिर मुझ पर झूल जातीं।

बंटी पीछे आया। उसने माँ की गर्दन चूमी, कंधे चूमे, और उनकी पीठ पर हाथ फेरे।

शेखर ने आगे झुककर उनके दूध मुँह में लिया। माँ ने चीखी —

“आह… तीनों… एक साथ… मर जाऊँगी…”

मैंने कहा — “मर नहीं माँ, आज रात जीना है।”

“तो चोद रवि… जान ले ले मेरी… चोद…”

माँ ने मेरी गर्दन पर होंठ रख दिए। जीभ से मेरा गला चाटा। फिर मेरे होंठों पर। और हम चोदते-चोदते चूमते रहे। मेरी कमर चलती रही, माँ के होंठ चलते रहे।

बंटी ने माँ के नितंब पकड़कर अलग किए और गुदा पर उँगली फेरी। माँ काँपी।

“बंटी… वहाँ मत कर… बेचैन कर देगा…”

बंटी बोला — “आंटी, एक दिन वहाँ भी चोदेंगे।”

“आज भी चोद… बाद में सोचेंगे…”

फिर माँ ने मेरे कान में फुसफुसाया — “रवि, तू सबसे अच्छा चोद रहा है… तू मेरा… सिर्फ़ आज रात का नहीं, हमेशा का।”

मेरा दिल भर आया। मैंने और ज़ोर से चोदा।

माँ थक गई थीं। हमने उन्हें बिस्तर पर करवट दिलाई। मैं पीछे लेटा, और स्पून पोज़ में उनके भीतर घुसा। धीमी, लंबी धाप। माँ की आँखें बंद। शेखर सामने आकर उनका चेहरा सहलाने लगा। बंटी पैरों की तरफ़ बैठकर उनकी जाँघें दबाने लगा।

अब रफ़्तार धीमी थी, पर गहरी। हर धक्का बुर के भीतर तह तक जाता। माँ हल्के-हल्के कराहती रहीं।

शेखर ने माँ के होंठ चूमे और बोला —

“आंटी, आप सच में बहुत ख़ूबसूरत हैं।”

माँ ने आँखें खोलकर देखा और मुस्कुराईं — “पहले क्यों नहीं बताया?”

“डर लगता था। अब लगता है कि हम बहुत देर आए।”

माँ ने उसका हाथ पकड़कर अपने दूध पर रख दिया — “देर तो हो गई, पर आ गए ना।”

मैंने पीछे से माँ की कमर पर हाथ रखा और धीमे-धीमे चोदता रहा। हर धक्के के साथ उनके भीतर एक गरम लहर दौड़ती। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी बुर पर रख दिया, जहाँ मेरा लंड भीतर जा रहा था।

“महसूस कर रवि… कैसे अंदर आ-जा रहा है… यही तो सुख है।”

मैंने कहा — “माँ, आज तेरी बुर ने मुझे बाँध लिया।”

“तो बँधा रह। कहीं जाना नहीं।”

बंटी ने कहा — “आंटी, हम तो रोज़ आएँगे।”

माँ हँसीं — “रोज़ आओ, पर एक बात याद रखना — रवि पहले चोदेगा, फिर तुम दोनों।”

मैंने पूछा — “क्यों माँ?”

“क्योंकि वो मेरा बेटा है… और बेटे का हक़ पहले।”

अब आख़िरी दौर। माँ ने कहा — “अब मुझे ऊपर आने दो।”

वो उठीं, मेरे ऊपर बैठीं, पर पीठ मेरी तरफ़। रिवर्स काउगर्ल।

उन्होंने मेरा लंड पकड़कर भीतर डाला और कूदने लगीं। उनकी पीठ, उनके नितंब, और उनकी चोटी — सब सामने। बंटी और शेखर दोनों तरफ़ से उनके दूध पकड़कर दबाने लगे।

माँ ने पूरी ताक़त से कूदना शुरू किया। उनकी बुर मेरे लंड को कसकर पकड़े हुए।

हर बार वो ऊपर तक आतीं और फिर पूरे ज़ोर से नीचे बैठ जातीं। मेरी जाँघों पर थप-थप की आवाज़।

माँ बोलीं — “रवि… तेरा लंड… बुर के सिरे को छू रहा है… आह…”

मैंने कहा — “माँ, तेरे अंदर आना है।”

“हाँ… अंदर आ… भर दे मेरी बुर को…”

बंटी ने कहा — “आंटी, मुझे भी डालना है।”

माँ ने कहा — “अभी नहीं। पहले रवि। फिर तुम दोनों अपनी बारी देखना।”

शेखर हँसा — “आंटी, बारी-बारी पूरी रात चलेगी।”

“चलेगी। आज रात तुम्हारी है।”

माँ ने गति और बढ़ाई। उनकी बुर मेरे लंड पर सरकती, चिपकती, और छोड़ती। मेरे पेट पर उनका रस बहने लगा। पसीना दोनों के जिस्म से टपक रहा था।

माँ अब काँप रही थीं। उनकी साँस फूली हुई, आँखें भीगी हुईं, और जिस्म लाल। बोलीं —

“रवि… आ जा… अब बर्दाश्त नहीं… आ जा अंदर…”

मैंने कमर उठाई और ज़ोर-ज़ोर से चोदा — ऊपर से नीचे, तेज़, लंबे झटके। माँ ने सिर पीछे किया और चीखीं —

“आआआह… रवि… आ गया… मैं आ गई…”

उनकी बुर ने मेरे लंड को कसकर पकड़ा, फिर फड़कने लगी। माँ का पूरा जिस्म काँपा और वो मेरे ऊपर गिर पड़ीं। उनके भीतर गरम रस बह निकला, जो मेरी जाँघों तक आ गया।

मैंने दो-तीन और धक्के दिए और फिर ख़ुद भी छूट गया। गरम, मोटी धार उनके भीतर भर गई। माँ ने महसूस किया और फुसफुसाईं —

“अंदर ही… अंदर ही रहने दे… बहुत अच्छा लगा रवि…”

मैं उनके ऊपर लेटा रहा। हम दोनों की साँसें मिल रही थीं। माँ ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और माथे पर चूमा।

“तू सच में बाप का बेटा है।”

फिर बंटी आगे आया। माँ ने करवट बदली, मुझसे अलग हुईं, और बंटी की तरफ़ देखा।

“अब तेरी बारी, आ जा।”

बंटी ने माँ को घुटनों पर लिटाया और पीछे से अंदर डाल दिया। अब माँ के भीतर मेरा वीर्य भी था और बंटी का लंड भी। हर धक्के पर चट-चट की आवाज़।

माँ बोलीं — “ऊह… भीतर गरम है… रवि का भरा हुआ है… और तेरा भी…”

बंटी हँसा — “आंटी, फिर तो डबल मज़ा है।”

बंटी ने पूरी ताक़त लगाई — तेज़, कठोर, और लगातार।

माँ के नितंब हिलते रहे, दूध झूलते रहे। शेखर ने सामने आकर उनका मुँह अपने लंड से भर दिया। अब माँ एक साथ दोनों जगह चुद रही थीं — आगे और पीछे।

पाँच मिनट बाद बंटी भी छूट गया। उसने भी भीतर ही भर दिया। माँ ने कराहकर कहा — “और… और अंदर… सब अंदर…”

फिर शेखर। माँ ने उसे अपने ऊपर लिटाया और वो भी चोदने लगा।

अब माँ के भीतर तीनों का वीर्य जमा हो चुका था। हर धक्के पर गीला-गीला सफ़ेद झाग बनता और टपकता।

शेखर ने आख़िरी में ज़ोर लगाया और छूट गया। माँ ने तीनों को अपने चारों तरफ़ लिटा लिया। बिस्तर की चादर पूरी भीग चुकी थी।

कमरे में सिर्फ़ साँसों की आवाज़ थी। बारिश अब भी हो रही थी। माँ तीनों के बीच लेटी थीं — एक तरफ़ मैं, दूसरी तरफ़ बंटी, और सिरहाने शेखर।

माँ ने धीरे से कहा —

“पता है रवि, गाँव वाली बात सच थी। पर आज जो लगा, वो गाँव में भी नहीं लगा था।”

मैंने पूछा — “क्यों माँ?”

“क्योंकि गाँव में वो सिर्फ़ जिस्म का सौदा था। और आज… आज तीनों ने प्यार से चोदा। फ़र्क़ यही है।”

बंटी ने माँ का हाथ पकड़कर कहा — “आंटी, हम आते रहेंगे।”

शेखर बोला — “हर लॉकडाउन रात।”

माँ हँसीं — “अब तुम लोग बोलो — कल भी आओगे?”

मैंने कहा — “रोज़ आऊँगा।”

माँ ने मेरे होंठों पर फिर से एक धीमा चुम्बन रखा और फुसफुसाईं —

“तो कल फिर। और कल तीनों नए पोज़ लाएँगे।”

बाहर बारिश रुक गई। अंदर कमरे में एक गरम-सी खुशबू बस गई। और मैं सोच रहा था — कोरोना ने शायद सब कुछ छीन लिया, पर मुझे तो इसने ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत रात दी।

अगली सुबह जब मैं उठा, माँ रसोई में थीं। साड़ी वैसी ही, चेहरा वैसा ही, पर चाल में एक अलग-सी झिझक थी। बैठते हुए उन्होंने हल्का-सा मुँह बनाया।

बंटी ने देखा और कहा — “आंटी, बैठने में तकलीफ़?”

माँ ने आँख बचाकर कहा — “चुप रह।”

मैं हँस दिया। शेखर ने चाय का कप उठाते हुए कहा — “आंटी, आज रात फिर?”

माँ ने पलटकर देखा, और वो ही मुस्कान दी —

“आओ। पर आज थोड़ा आराम से। कल वाले पोज़ बहुत लंबे थे।”

हम चारों हँस पड़े। और उस हँसी में पता चल गया कि यह कहानी अब ख़त्म नहीं होगी — यह तो बस शुरू हुई है।

क्योंकि जब एक बार माँ की बुर, बेटे के लंड से टकरा जाए, और पिताजी को पता न चले — तो फिर यह सिलसिला लॉकडाउन से आगे भी चलता है। और चलता रहा।

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

1 thought on “लॉकडाउन के दौरान मॉम को दोस्तों के साथ मिलकर चोदा”

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