दिल्ली बस में मिली लड़की को जमकर चुदाई किया

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मेरा नाम सूरज सिंह है। उम्र है मेरी पूरे उनतीस बरस की। गुरुग्राम की एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता हूँ, सुबह नौ बजे ऑफिस, शाम छह बजे घर।

पैकेज ठीक-ठाक है, गाड़ी है, किराए का फ्लैट है सेक्टर बावन में, और बस एक चीज़ की कमी है — अभी तक शादी नहीं हुई। घरवाले रोज़ फोन पर दबाव डालते हैं, रिश्ते आते हैं, तस्वीरें दिखाई जाती हैं, लेकिन मन किसी में नहीं रमता।

सच कहूँ तो मन में एक अजीब सी बेचैनी रहती है — किसी ऐसी लड़की की तलाश जिसे देखकर लगे कि अब बस यही है, अब बस यही।

कद मेरा पाँच फुट दस इंच है। जिम जाता हूँ, शरीर दुबला-पतला नहीं, भरा हुआ है। कंधे चौड़े हैं, बाजू मोटी हैं, और जो चीज़ मुझे सबसे ज़्यादा भरोसा देती है, वो है मेरा लंड। नौ इंच लंबा, और चार पॉइंट तीन इंच मोटा।

इतना मोटा कि जब जींस पहनता हूँ तो उभार साफ़ दिख जाता है, और जब कॉटन की पैंट पहनता हूँ तो लगता है कि कोई छुपा ही नहीं सकता। दोस्त मज़ाक करते हैं कि सूरज तू तो चलता-फिरता हथियार है, लेकिन मज़ाक अब तक मज़ाक ही रहा था।

असली इस्तेमाल किसी ने किया ही नहीं था। और यही बात मेरे अंदर एक खालीपन भरती रहती थी — इतना सब होते हुए भी, इतनी देर तक कोई ऐसा नहीं मिला जो इसे महसूस कर सके, जो इसका हक़ माँग सके।

उस दिन सोमवार था। ऑफिस से हाफ-डे लेकर निकला था, क्योंकि महारानी बाग में एक पुराने क्लाइंट से मिलना था — पेपर साइन करने थे, कोई बैंक का काम था।

गुरुग्राम से निकलकर पहले मेट्रो, फिर बदरपुर, फिर ऑटो — और आखिर में मुझे दिल्ली की एक बस पकड़नी पड़ी।

जब तक बस पकड़ी, दोपहर ढल चुकी थी और शरीर पसीने से तर था। अक्टूबर की गर्मी अजीब तरह से चिपचिपी थी, हवा में धूल और आम की मिठास घुली हुई थी।

बस आई तो लगा कि पहियों पर कोई डिब्बा चला आ रहा है। पूरी तरह से भरी हुई। दरवाज़े पर लोग लटके थे, खिड़कियों से हाथ बाहर, अंदर चीख-पुकार, कंडक्टर “आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, पीछे जगह है” चिल्ला रहा था।

मैंने एक हाथ से रॉड पकड़ी और किसी तरह बस में चढ़ गया। अंदर घुसते ही लगा कि हवा कहीं बाहर रह गई है। सीटों पर कोई नहीं बैठा, सब खड़े, कंधे से कंधा टिका हुआ।

मैं एक तरफ़ किसी तरह खड़ा हो गया — बस की बाईं खिड़की के पास, पीठ रॉड से टिकाकर।

सामने की तरफ़ लोगों का जंगल था। कंडक्टर चिल्ला रहा था, ब्रेक लगती थी तो सब एक-दूसरे पर गिरते थे, फिर संभलते थे, फिर गिरते थे। ऐसे ही कुछ मिनट बीते। और तभी — दरवाज़े से एक लड़की चढ़ी।

देखते ही आँखें अटक गईं। काफ़ी सेक्सी, काफ़ी भरी हुई, काफ़ी वो औरत जिसे देखकर लगे कि शरीर को भगवान ने फुर्सत से बनाया है। उसकी उम्र पच्चीस-छब्बीस के आसपास लगी।

रंग गेहुँआ सा, बाल काले घने जो कंधे तक आ रहे थे, और आँखें ऐसी कि एक बार देख लो तो बस। उसने कुर्ता पहना हुआ था हल्के गुलाबी रंग का, और नीचे लेगिंग्स। चलने पर शरीर में जो लहर दौड़ रही थी, उसे देखकर बस का शोर भी कम लगने लगा।

वो कुछ कदम बढ़ी, फिर ठीक मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। मुझे देखकर मुस्कुराई नहीं, बस एक बार नज़र मिलाई और फिर खिड़की की तरफ़ देखने लगी। कुछ सेकंड बाद उसने एक बात नोटिस की — और यही से कहानी शुरू हुई।

थोड़ी देर बाद बस में और भीड़ आ गई। पीछे से धक्का लगा, आगे से धक्का लगा, और ये लड़की मेरी तरफ़ पीछे हट आई।

फिर उसने वो किया जो हर अनुभवी लड़की करती है — उसने अपनी गांड को मेरे लंड के पास करके दूसरी तरफ़ घूम गई। यानी अब उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी, और उसका नितंब ठीक मेरे लंड के सामने।

देखने से अंदाज़ा लगाया — उसके चूचियान यानी दूध चौंतीस के लग रहे थे, भरे हुए, कुर्ते के नीचे हल्के से हिलते हुए। कमर बत्तीस की, पतली और लचीली।

लेकिन गांड — अरे बाप रे, गांड छत्तीस से ऊपर की थी। इतनी गोल, इतनी भरी, इतनी फूली हुई कि लेगिंग्स उसके नाप से ज़ूँ-सी लग रही थी। जैसे कोई दो गोले सिलाई में कसकर बंद कर दिए हों।

बस हिलती थी, और हर हिलने पर उसकी गांड मेरे लंड पर आकर रगड़ खाती थी।

मैंने उस दिन कॉटन की पैंट पहन रखी थी — वो हल्की पतली कॉटन जिसमें शरीर की हर लकीर साफ़ उभर आती है।

और मेरे लंड का तो कहना ही क्या। पतली पैंट के नीचे वो पूरी तरह से पता चल रहा था — लंबाई भी, मोटाई भी।

जब-जब उसकी गांड मेरे सामने आती, मेरा लंड अपने आप ऊपर उठ जाता और उसके नितंबों के बीच के नर्म हिस्से को छूता।

थोड़ी देर बाद भीड़ इतनी बढ़ गई कि पीछे से किसी ने धक्का दिया और वो लड़की पूरी तरह से मुझसे चिपक गई।

उसकी पीठ मेरे सीने पर, और उसकी गांड ठीक मेरे लंड पर। अब कोई दूरी नहीं थी, कोई शर्म नहीं थी।

मेरा लंड उसकी गांड के दोनों पटों के बीच गहराई में जा घुसा — बिल्कुल ठीक उस जगह, जहाँ दोनों गोल पाट मिलकर एक गड्ढा बनाते हैं।

बस एक बार हिली। मेरा लंड उसकी गांड की दरार में सरक गया। वो लड़की अचानक सीधी हो गई, जैसे किसी ने उसे हल्का सा झटका दिया हो। फिर कुछ सेकंड रुकी, और फिर उसने गर्दन घुमाकर मेरी तरफ़ देखा।

उस एक नज़र में बहुत कुछ था — हैरानी, गर्मी, और एक सवाल। जैसे वो पूछ रही हो — “ये क्या चीज़ है तेरे पास?”

मैंने अपनी नज़र नहीं हटाई। बस की छत की तरफ़ देखता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन अंदर-अंदर मेरा दिल ढोल बजा रहा था।

फिर काफ़ी देर तक मैंने बस उसकी गांड का मज़ा लेता रहा। बस हर ब्रेक पर आगे झुकती, हर गड्ढे पर उछलती, और हर बार मेरा लंड उसकी गांड की दरार में अंदर-बाहर होता रहता।

वो भी अब कम नहीं थी — बस के हिलने के साथ वो भी अपनी गांड को हल्का-हल्का पीछे धकेलती, जैसे मज़ा ले रही हो।

कभी-कभी इतना दबाव पड़ता कि मेरे लंड की नोक उसकी गांड के गड्ढे में घुसती सी लगती।

कपड़े के बीच से भी गर्मी महसूस हो रही थी — उसकी गांड की गर्मी, और मेरे लंड की गर्मी, दोनों कपड़ों के पार एक-दूसरे से बातें कर रही थीं।

किसी ने उससे पूछा “कहाँ जाना है?” तो उसने कहा “महारानी बाग।” मेरे कान खड़े हो गए। यही तो मेरी स्टॉप थी। मैंने मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया।

बाक़ी सफ़र ऐसे ही बीता। मैंने उसकी कमर को कोहनी से हल्का सा छुआ — बस इतना कि वो समझ जाए कि हम दोनों एक ही रस्सी पर बंधे हैं।

उसने भी कोई शिकायत नहीं की। बल्कि एक बार उसने अपनी गांड को इतना पीछे धकेला कि मेरे लंड की नोक उसके नितंबों के बीच गहरे जा बैठी और मुझे अपनी हालत पर काबू रखना मुश्किल हो गया। कहीं ये बस कभी न रुके, यही मन करता रहा।

फिर स्टॉप आ गई। “महारानी बाग!” कंडक्टर चिल्लाया। भीड़ हिली। वो लड़की आगे बढ़ी, सीढ़ियों से उतरी। और मैं भी उतरा — ठीक उसके पीछे-पीछे।

सड़क के किनारे खड़े होकर उसने बाल झटके, कुर्ते को ठीक किया, और फिर पलटकर मेरी तरफ़ देखा। मैं भी रुक गया। दोनों कुछ सेकंड चुप खड़े रहे, जैसे कोई पहला शब्द कौन बोले।

“आप भी यहीं उतरे?” उसने पूछा। आवाज़ भरी हुई, मीठी, जैसे गुड़ की चाय।

“हाँ,” मैंने कहा, “यहीं कुछ काम था।”

“अच्छा।” वो हल्की सी मुस्कुराई।

फिर कुछ देर दोनों खड़े रहे। लगा कि बातचीत वहीं ख़त्म हो जाएगी, दो अजनबी जो बस में एक-दूसरे से चिपके थे, और अब हमेशा के लिए अलग हो जाएँगे।

यही सोचकर मैंने हिम्मत करके पूछ लिया — “आपका नाम क्या है?”

उसने एक सेकंड रुककर कहा, “रुक्मणी।”

“रुक्मणी,” मैंने दोहराया, जैसे नाम को जीभ पर रखकर तोल रहा हूँ। “बहुत सुंदर नाम है।”

“और आपका?”

“सूरज सिंह।”

वो हँसी। “सूरज… और मैं रुक्मणी। नाम भी आपस में लड़ते हैं।”

“लेकिन बस में तो लड़े नहीं,” मैंने कहा।

वो शरमाकर नीचे देखने लगी, और उसके गालों पर एक गुलाबी रंग दौड़ गया, जो उसके गेहुँए रंग पर और भी खूबसूरत लग रहा था।

“आप… आपने बस में बहुत परेशान किया,” उसने कहा, आँखें मिलाते हुए।

“मैंने परेशान किया? या आपने?”

वो फिर हँसी। “दोनों ने।” फिर थोड़ा रुककर बोली, “चलिए, एक चाय पी लें, गला सूख रहा है।”

वहीं पास में एक छोटी सी चाय की दुकान थी। हम दोनों वहाँ गए। चाय आई, दो कुल्हड़, गरम-गरम। पीते-पीते बातें शुरू हुईं।

पता चला कि रुक्मणी फरीदाबाद की रहने वाली है, अब दिल्ली में एक बुटीक में काम करती है, और महारानी बाग अपनी सहेली से मिलने आई थी।

उसने बताया कि वो साल भर पहले एक रिश्ते से टूटी थी, और अब अकेली रहना सीख रही है। उसकी बातों में एक सीधापन था, कोई दिखावा नहीं।

“आपने मुझे बस में देखा था?” उसने पूछा।

“देखा था,” मैंने कहा। “और जब आप मेरे सामने खड़ी हुईं, तो लगा कि बस की भीड़ वरदान है।”

“हाँ, आप तो पूरे रास्ते मुझसे चिपके रहे।”

“बस गाड़ी ऐसे ही चलती है,” मैंने बहाना बनाया।

“अच्छा? तो पीछे धकेलने वाला कंडक्टर था?”

अब मेरी बारी थी शरमाने की।

चाय ख़त्म हुई। दोनों को अपने-अपने काम जाना था। निकलते वक़्त मैंने फ़ोन निकाला। “नंबर दे दूँ?” पूछा।

उसने मेरा फ़ोन लिया, अपना नंबर डाला, फिर अपने फ़ोन में मेरा नंबर सेव किया।

सेव करते वक़्त मैंने देखा — उसने मेरे नाम के आगे एक इमोजी लगाया। पता नहीं क्यों, वो छोटी सी हरकत मेरे दिल में उतर गई।

“मिलते हैं,” उसने कहा, और ऑटो पकड़कर चली गई। जाते-जाते एक बार पलटी और हाथ हिलाया। मैं वहीं खड़ा रहा, उसके जाने के बाद भी काफ़ी देर तक।

उस रात मैंने पहला मैसेज भेजा — “घर पहुँच गईं?”

जवाब आया — “हाँ, आप?”

“हाँ।”

फिर “गुड नाइट”।

अगले दिन फिर मैसेज। फिर उसके बाद हर दिन। बातें छोटी थीं, लेकिन रोज़ होती थीं।

सुबह “उठ गए?”, रात को “सो गए?”। बीच में ऑफिस की शिकायतें, दिल्ली की गर्मी, माँ के फोन, कभी कोई मीम, कभी कोई गाना।

धीरे-धीरे बातें लंबी होने लगीं, और धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं।

एक रात हमने चार घंटे बात की। कैमरे पर बात करते-करते वो सो गई, और मैं स्क्रीन देखता रहा — उसकी बंद आँखें, उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान, और उसके सीने की धीमी हलचल। लगा कि दुनिया में सबसे सुंदर चीज़ यही है।

हमने एक-दूसरे के बारे में सब बताया। उसने बताया कि उसे गाना बहुत पसंद है, पर किसी के सामने नहीं गाती।

मैंने बताया कि मुझे खाना बनाना पसंद है, और बनाता भी अच्छा हूँ।

उसने कहा — “तो एक दिन मुझे बनाकर खिलाइए।” यही वो वाक्य था जिसने हमारी पहली मुलाक़ात की नींव रखी।

हमने तय किया कि अगले रविवार मिलेंगे। जगह?

उसने कहा — “आपके घर। खाना आप बनाएँगे, और मैं…” वो रुकी।

“और आप क्या करेंगी?”

“मैं देखूँगी कि आप बनाते कैसे हैं,” कहकर हँस दी।

मैं समझ गया। वो सिर्फ़ खाना देखने नहीं आ रही थी।

पूरा हफ़्ता बड़ी मुश्किल से कटा। हर घंटा साल लग रहा था। रविवार की सुबह मैं छह बजे उठ गया — जबकि वो बारह बजे आने वाली थी।

फ्लैट की सफ़ाई की, बिस्तर के चादर बदले, कमरे में एयर फ्रेशनर छिड़का, किचन में सामान ले आया।

सोचा क्या बनाऊँ — पनीर, रोटी, दाल, और उसकी पसंद का राजमा चावल। उसने किसी दिन कहा था कि उसे घर का बना राजमा-चावल बहुत पसंद है। याद रख लिया था।

बारह बजे से ठीक दस मिनट पहले घंटी बजी। मैंने दरवाज़ा खोला।

सामने रुक्मणी खड़ी थी — आज उसने हल्के पीले रंग का सूट पहना था, बाल खुले, हाथ में छोटा सा बैग। चेहरे पर वो मुस्कान, जिसके लिए मैं पूरे हफ़्ते जी रहा था।

“अंदर आइए,” मैंने कहा।

वो अंदर आई, फ्लैट को देखा, चारों तरफ़ नज़र घुमाई, और फिर बोली — “अकेले रहते हैं? इतना साफ़ कैसे रखते हैं?”

“आप आने वाली थीं,” मैंने कहा, “इसलिए।”

वो फिर शरमाई। ये उसकी सबसे प्यारी आदत थी — जब भी दिल की बात सुनती, तो नज़र नीचे कर लेती, जैसे ज़मीन में जवाब ढूँढ रही हो।

हमने खाना खाया। राजमा-चावल बना था, और वो इतना पसंद आया कि दो बार प्लेट भरी।

खाते-खाते बातें होती रहीं, हँसी होती रही, कभी हाथ टकराते तो बात एक सेकंड के लिए थम जाती। खाना ख़त्म हुआ, बर्तन रसोई में रखकर हम लिविंग रूम में आ गए।

टीवी पर कुछ चल रहा था, पर दोनों को देखना नहीं था। सोफे पर दोनों बैठे थे, बीच में एक इंच की दूरी। फिर वो इंच धीरे-धीरे घटने लगी।

“सूरज,” उसने कहा, आवाज़ धीमी।

“हाँ?”

“बस वाला दिन याद है?”

“हर दिन याद है,” मैंने कहा।

वो मेरी तरफ़ मुड़ी, और अब बीच में दूरी नहीं थी। उसने मेरी आँखों में देखा, और मैंने उसकी। कमरे में टीवी की आवाज़ भी फीकी पड़ गई।

“तब से सोच रही हूँ,” उसने फुसफुसाया, “कि ये आदमी बस में इतना तंग कर रहा था, तो बाहर क्या करेगा।”

यही मेरा इशारा था।

मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और धीरे से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए।

पहला चुंबन धीमा था, तोलने वाला, जैसे गरम चाय का पहला घूँट। फिर दूसरा, और तीसरा। कुछ सेकंड में ही वो चुंबन गहरे हो गए।

उसने मेरी गर्दन में हाथ डाल दिए, और मैंने उसकी कमर खींच ली। उसके होंठों से एक नर्म सी आह निकली, और वही आह मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई।

अब बिस्तर की तरफ़ बढ़े। मैंने उसे गोद में उठा लिया। वो हल्की थी, पर भरी हुई — जिसे उठाने में मज़ा आए।

कमरे में ले जाकर पलंग पर धीरे से लिटाया। वो नीचे लेटी, बाल तकिये पर बिखरे, आँखों में वो चमक जो सिर्फ़ इस पल में होती है।

मैंने उसके सूट का दुपट्टा धीरे से सरकाया। फिर कुर्ते के बटन एक-एक करके खोले। हर बटन पर वो गहरी साँस लेती, जैसे कोई पर्दा उठ रहा हो।

जब आखिरी बटन खुला, तो सामने उसकी ब्रा दिखी — गहरे मैरून रंग की। और उस ब्रा के अंदर, उसके दूध भरे हुए, ऊपर उठे हुए।

चौंतीस का नाप वहीं साबित हो रहा था। दूध इतने भरे थे कि ब्रा उन्हें पूरी तरह क़ैद नहीं कर पा रही थी — ऊपर से गोलाई साफ़ झलक रही थी, और बीच की दरार गहरी।

मैंने उसके कुर्ते को पूरा उतार दिया, फिर ब्रा की तरफ़ हाथ बढ़ाया। हुक पीछे था, पर मैंने उसे पीछे से खोला।

जैसे ही ब्रा ढीली हुई, उसके दूध अपने असली आकार में आ गए — भारी, कोमल, और पूरी तरह मेरे सामने। निप्पल गहरे भूरे रंग के, और अभी से खड़े हुए, कठोर। मैंने हाथ से एक दूध को थामा — वज़न था उसमें, गर्मी थी।

दूध को हल्का सहलाया, फिर निप्पल को अंगूठे और उँगली के बीच लेकर धीरे से दबाया। वो एकदम सिकुड़ गया, और रुक्मणी की साँस तेज़ हो गई।

“आह… सूरज…” उसने आँखें बंद करके कहा।

मैंने पहले एक निप्पल को मुँह में लिया। जीभ से उसे गोल-गोल घुमाया, फिर दाँतों से बहुत हल्का दबाया। उसका शरीर एक झटके में ऊपर उठा। दूसरे हाथ से दूसरा दूध दबाता रहा।

निपल्स पर जीभ फेरता रहा, और जब वो लगभग बेहोश सी होने लगी, तो दूसरे दूध पर आ गया।

दोनों निपल्स अब लाल-लाल, कठोर, और गीले थे। रुक्मणी की कमर पलंग पर बल खा रही थी, हाथ मेरे बालों में घुसकर मुझे ऊपर खींच रहे थे, मानो और चाहिए।

फिर मैं नीचे की तरफ़ बढ़ा। उसकी लेगिंग्स और सूट की पैंट एक-एक करके उतारी।

अब वो सिर्फ़ मैरून रंग की पैंटी में थी — उसी मैचिंग सेट का हिस्सा। उस पैंटी के ऊपर से ही साफ़ पता चल रहा था कि वहाँ क्या हाल है — पैंटी के बीच में गीला धब्बा बन चुका था।

मैंने पैंटी को उतारा। और सामने उसकी बुर आ गई — घनी, काले बालों से घिरी, होंठों जैसे गुलाबी-भूरे, और अंदर से गीली, चमकती हुई। पूरी तरह तैयार।

मैंने उसकी जाँघें धीरे से फैलाईं और सबसे पहले नज़र से ही उसे पी लिया।

फिर मुँह झुकाया। पहले बाहरी होंठों पर हल्का चुंबन, फिर जीभ से ऊपर से नीचे की तरफ़ एक लंबी लकीर।

रुक्मणी पूरी तरह झटके से उठी, हाथों से चादर मुट्ठी में भर ली।

“अरे… रुको…” वो हाँफी।

“रुकूँ?” मैंने पूछा।

“नहीं… मत रुको…” और वो फिर पलंग पर गिर गई।

मैंने उसकी बुर पर जीभ का काम शुरू किया। पहले ऊपर वाली कली पर हल्के-हल्के घेरे, फिर नीचे चलकर उसके छेद के मुँह पर जीभ, फिर अंदर तक जीभ डालकर उसका अमृत चखा।

उसका स्वाद मीठा-नमकीन था, जैसा सिर्फ़ तैयार औरत का होता है। एक हाथ से उसकी गांड को सहलाता रहा, दूसरे से उसकी कमर को थामे रखा, ताकि वो बार-बार ऊपर न उठे।

कुछ मिनट में ही उसकी साँसें बेतरतीब हो गईं। वो बड़बड़ाने लगी — “आ रहा है… सूरज… रुक मत… आ…” और फिर उसने पूरे शरीर को कस लिया।

जीभ पर उसकी बुर ने कई बार सिकुड़कर धक्के दिए, और वो पहली बार झड़ी।

मैंने पूरा अमृत पी लिया, और फिर चेहरा ऊपर उठाकर उसे देखा। वो पलंग पर पसरी थी, आँखें बंद, चेहरा लाल, साँसें भारी।

पर ये बस शुरुआत थी।

मैंने अपनी टी-शर्ट उतारी, और फिर पैंट। जब बेल्ट खोली, रुक्मणी ने आँखें खोलकर देखा।

जब पैंट नीचे गई, तो उसकी नज़र ठीक उसी जगह अटक गई जहाँ सब अटकती हैं।

मेरे बॉक्सर के अंदर लंड पहले से पूरी तरह खड़ा था, और बॉक्सर भी उसे क़ैद नहीं कर पा रहा था — ऊपर निकल आया था, नोक तक बाहर।

जब मैंने बॉक्सर उतारा, तो उसने होंठ खोल दिए और बेसाख़्ता बोली — “हे भगवान।”

नौ इंच लंबा, चार पॉइंट तीन इंच मोटा। मोटाई ऐसी कि उँगली भी पूरी न घूमे। नसें उभरी हुईं, सिर चमकदार, और वो पूरा तना हुआ, जैसे ग्यारहवीं क्लास का लड़का पहली बार सहेली को देख रहा हो।

रुक्मणी ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ। उँगलियों से नापा, फिर मुट्ठी बनाकर उसे थामा, और हल्का सा सहलाया।

उसका चेहरा देखकर लगा कि वो बस में जो महसूस हुआ था, वो अब आँखों से तस्दीक कर रही है।

“बस में लगा था बड़ा है,” उसने कहा, “लेकिन इतना?”

“अब पता चला?” मैंने कहा।

उसने मुट्ठी में और कसा। मेरी भी साँस फूल गई।

मैंने उसे पलटकर घुटनों और हाथों पर लाया, फिर उसकी कमर थामकर थोड़ा ऊपर उठाया। उसकी गांड अब हवा में, गोल, भरी, ऊपर उठी हुई।

मैंने उस पर हाथ फेरा, दोनों पाटों को थामा, फिर फैलाया। बीच में उसकी बुर और नीचे उसका गुदा दोनों दिख रहे थे।

गांड इतनी भरी थी कि हाथ भर न आए। मैंने उस पर हल्का थप्पड़ मारा — न आवाज़ के लिए, न मज़े के लिए — और वो एकदम से हिल गई, गांड को और ऊपर उठा दिया, जैसे कहे कि और मारो।

मैंने कंडोम लगाया। आजकल सब लोग करते हैं, और मैं भी सोच-समझकर तैयार आया था — अल्ट्रा-थिन, उसका मज़ा भी कम न हो और सुरक्षा भी रहे। पैकेट फाड़कर लगाया, फिर अपने लंड की नोक उसकी बुर के मुँह पर रखी।

“तैयार है?” मैंने पूछा।

“तैयार थी बस से ही,” उसने हाँफते हुए कहा।

मैंने धीरे से आगे बढ़ाया। नोक अंदर गई, और उसकी गर्मी ने मुझे लपेट लिया। फिर और आगे।

चार इंच तक जाते-जाते उसने एक नर्म सी चीख निकाली — न दर्द की, न मज़े की, दोनों के बीच की।

मैंने थोड़ा रुककर इंतज़ार किया। फिर आगे बढ़ा। छह इंच। सात। और फिर आठ, नौ। पूरा लंड अंदर जाते-जाते मुझे लगा कि उसकी बुर ने मुझे पूरा निगल लिया।

“ओह माँ,” रुक्मणी ने साँस रोककर कहा, “पूरा… पूरा अंदर है?”

“पूरा,” मैंने कहा।

वो कुछ कहना चाहती थी, पर फिर चुप हो गई, जैसे भीतर के दबाव को सह लिया हो।

फिर शुरू हुआ — धीमा, गहरा, तोलकर। बाहर खींचता, फिर अंदर धकेलता। हर धक्के में उसकी गांड मेरे पेट से टकराती, और टकराने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजती।

उसकी बुर हर बार लंड को कसकर पकड़ती, जैसे जाने न देना चाहती हो।

मैंने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ी, दूसरे से उसके दूध को नीचे लटकते हुए थामा। दूध हर धक्के पर हिल रहे थे, और उनका वज़न मेरी हथेली में बह रहा था।

“तेज़… सूरज… तेज़ करो,” उसने बड़बड़ाया।

मैंने रफ़्तार बढ़ाई। अब हर धक्का पहले से गहरा, पहले से तेज़।

कमरे में सिर्फ़ चार आवाज़ें थीं — हमारी साँसें, त्वचा की टकराहट, उसका धीमा विलाप, और पलंग का बजना।

उसने अपनी गांड को मेरी तरफ़ धकेलना शुरू किया, हर धक्के का जवाब देने लगी। अब चुदाई दोनों तरफ़ से हो रही थी।

कुछ देर ऐसे ही चला। फिर मैंने उसे घुमाया। अब वो पलंग पर पीठ के बल लेटी, पैर मेरे कंधों पर।

इस पोज़िशन में मेरा लंड उसकी बुर में और गहरा जाता था, और हर धक्के पर उसके दूध ऊपर-नीचे लहराते थे, निपल्स कठोर खड़े।

मैंने झुककर उनमें से एक को मुँह में लिया, दाँतों से पकड़कर खींचा, फिर छोड़ दिया। वो कराह उठी।

“और… और…”

मैंने उसके पैर और फैलाए। अब पूरी तरह खुली हुई थी — बुर, गांड, सब मेरे सामने।

मैंने हाथ से उसके निपल्स को मसलते हुए धक्के जारी रखे। रुक्मणी की आँखें अब बंद नहीं, खुली थीं — मुझे देख रही थी, और मेरे अंदर झाँक रही थी।

“सूरज… एक बात पूछूँ?”

“पूछो।”

“बस वाला दिन… आपने मेरी गांड पर जो किया… वो जान-बूझकर था?”

“जान-बूझकर,” मैंने हाँफते हुए कहा।

“कमीना,” उसने मुस्कुराकर कहा, और फिर मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया।

अब हमने गति तेज़ कर दी। वो मेरी गर्दन में हाथ डालकर लटक गई, और हम दोनों एक लय में चलने लगे।

हर धक्के पर पूरा पलंग हिलता। मेरी पीठ पर पसीना, उसके दूध मेरे सीने से रगड़ खा रहे थे, उसके निपल्स मेरे सीने पर गोल-गोल फिर रहे थे, और उसकी साँसें मेरे कान के पास गरम हवा छोड़ रही थीं।

“आ रहा है,” उसने फुसफुसाया, “रुको मत… साथ आओ…”

मैंने गति और बढ़ाई। लगभग बीस-पच्चीस तेज़ धक्के। फिर उसका शरीर पूरी तरह तन गया, पैर मेरी पीठ पर कस गए, बुर ने मेरे लंड को मुट्ठी की तरह भींच लिया।

वो चीखी — लंबी, फटी हुई, और मीठी। और उसी झटके में मैंने भी पूरा छोड़ दिया। कंडोम के अंदर गरम-गरम, बार-बार। दोनों कुछ सेकंड तक हिलते रहे, फिर थम गए।

मैं उसके ऊपर ही पसर गया। दोनों की साँसें मिल रही थीं। दोनों पसीने से तर। उसने मेरे बालों को हटाया और मेरे माथे पर चूम लिया।

“इतना मत रुकना,” उसने धीमे से कहा, “अभी और भी करना है।”

मैं हँसा। “पूरी रात पड़ी है,” कहा।

उस रात हमने तीन बार और किया। दूसरी बार बाथरूम में, दीवार से टिकाकर — वो मेरी तरफ़ पीठ करके, और मेरे हाथ उसके दूध पर।

तीसरी बार रसोई के काउंटर पर, और चौथी बार सुबह होते-होते पलंग पर, बहुत धीरे, बहुत कोमल, जैसे दोनों थक गए हों पर अलग न होना चाहते हों।

जब वो सुबह चली गई, तो बिस्तर पर उसकी खुशबू रह गई थी, और मेरे अंदर एक चुप्पी — अच्छी वाली।

उस दिन के बाद हम अलग नहीं हुए। सात महीने बीत गए — और ये सात महीने किसी फिल्म की तरह थे।

हर वीकेंड मिलना, कभी मेरे फ्लैट में, कभी उसके कमरे में, कभी किसी होटल में बहाना बनाकर।

हर मुलाक़ात में एक ही चीज़ तय थी — चुदाई। कभी दो बार, कभी चार बार, कभी पूरी रात।

हमने एक-दूसरे को पूरा सीख लिया था। मुझे पता था कि उसके निपल्स को कब और कैसे दबाना है, कि उसकी बुर पर जीभ कहाँ रखने से वो तुरंत झड़ती है, कि उसकी गांड पर थप्पड़ पड़ते ही वो कैसे गीली हो जाती है।

और उसे पता था कि मेरा लंड कहाँ-कहाँ छूने से खड़ा होता है, कि मैं किस पोज़िशन में सबसे जल्दी छोड़ता हूँ, कि मुझे धीमा करके तंग करने में मज़ा कितना आता है।

कभी हमने रोल-प्ले किया — मैं बॉस, वो नई इंटर्न। कभी हमने कार में किया, पार्किंग में, ऑफिस की गाड़ी के पीछे।

एक बार हम बारिश में भीगे, और गीले कपड़ों के साथ ही दरवाज़ा खोलते-खोलते एक-दूसरे पर टूट पड़े।

हर बार पहले से बेहतर, पहले से गहरा, पहले से पागल।

उसने मुझे गाना सुनाया — वो गाना जो किसी को नहीं गाती थी। मैंने उसके लिए राजमा-चावल बनाया, हर बार।

हमने एक-दूसरे के सपने जाने, डर जाने, माँ-बाप से बात करने की हिम्मत जुटाई। सब कुछ ठीक चल रहा था। मुझे लगा कि यही है, यही सब है।

और फिर एक दिन रुक्मणी ने फोन किया। आवाज़ में एक अजीब सी चमक थी, जैसे कुछ कहने की हिम्मत जुटा रही हो।

“सूरज, एक बात पूछूँ?”

“पूछो।”

“तुम्हें पता है, मैं कभी तुम्हारे अलावा किसी से नहीं की… पर एक ख्वाहिश है।”

“क्या?”

वो एक सेकंड चुप रही। फिर बोली — “एक बार गैंगबैंग करना है। और वो भी… कालों से। नीग्रो लड़कों से। तीन-चार, एक साथ।”

मैंने फोन पकड़कर बैठ गया। सात महीने का हमारा इतिहास अचानक छोटा लगने लगा।

“सिर्फ़ मेरे साथ?” मैंने पूछा।

“तुम भी होंगे,” उसने कहा, “पर तुम्हारे साथ और भी। चार, पाँच, जितने हो सकें। मुझे देखना है कि जब एक साथ कई लंड मेरी बुर में हों, तो मेरा क्या होता है। और तुम्हें देखना है कि जब तुम्हारी रुक्मणी को और लोग चोद रहे हों, तो तुम कैसे पागल होते हो।”

उस रात मैं सो नहीं पाया। दिमाग में सिर्फ़ एक तस्वीर थी — रुक्मणी, बीच में, और उसके चारों तरफ़ चार बड़े, काले, तगड़े लंड।

उसकी गांड फैली हुई, उसकी बुर भरी हुई, उसके दूध किसी और के हाथों में, उसके निपल्स दबे हुए, और उसकी आवाज़ गूँजती हुई — “और… और… सब एक साथ…”

अगले हफ़्ते हमने प्लान बनाना शुरू किया। किस शहर में, कब, कितने लोग, कहाँ।

रुक्मणी ने एक लिस्ट बनाई — नाम, फोटो, ऊँचाई, और (उसके मज़ाक में) “साइज़”। हम एक-एक को शॉर्टलिस्ट करने लगे।

उसकी आँखों में जो चमक थी, वो सिर्फ़ एक लड़की की नहीं थी — वो एक ऐसी औरत की थी जिसने सात महीने में एक आदमी को पूरा चख लिया था, और अब दुनिया को चखना चाहती थी।

और मुझे पता था, दिल की गहराई से पता था — कि अब बस में मिली वो लड़की, जिसने पहले दिन मेरी पैंट के नीचे का पूरा नक़्शा महसूस कर लिया था, अब मुझसे कह रही है कि चलो, इस बार दुनिया को गवाह बनाते हैं।

अगले भाग में पढ़िए: रुक्मणी की गैंगबैंग की तैयारी, चार काले लड़कों की एंट्री, उसका पहला असली “भरा हुआ” अनुभव, एक के बाद एक लंड, उसकी बुर और गांड की हालत, दूध-निपल्स पर सबके हाथ, और सूरज जो बीच में खड़ा देखता रहता है कि उसकी रुक्मणी कैसे टूटती और बनती है — और उसी शाम सब तय हो जाता है।

NEXT PART: मेरी गर्लफ्रेंड चार काले लंडों से चुदवाई

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

2 thoughts on “दिल्ली बस में मिली लड़की को जमकर चुदाई किया”

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