randi hr ki group mein chudai
उस शनिवार से पहले पूरा हफ़्ता घर में भूकंप जैसा रहा।
रिया तीन बार रसोई से बाहर आईं और तीन बार बोलीं — “आदित्य, तेरे पापा को शाकाहारी खाना पसंद है ना?” और तीन बार मैंने वही जवाब दिया — “हाँ, पर वो कभी शिकायत नहीं करते।”
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे नई इंटर्न के साथ एचआर की ग्रुप में चुदाई
नैना दो बार होटल गई — मेन्यू देखने। इशिता ने तीन ड्रेस ट्राय कीं और तीनों बार पूछा — “बहुत ज़्यादा नहीं लग रही?” कबीर ने कहा — “तू शादी में नहीं जा रही, मिलने जा रही है।” और इशिता ने कहा — “तो?”
मैंने पूरे हफ़्ते खुद को यही समझाया कि कुछ नहीं होगा। पर अंदर कुछ चल रहा था।
क्योंकि ये सिर्फ़ डिनर नहीं था। ये वो पल था जब दो परिवार एक टेबल पर बैठकर पूछेंगे — ‘लड़की कौन है, लड़का कौन है, और ये सब क्या है?’
और सबसे बड़ा सवाल जो किसी ने ज़ोर से नहीं पूछा था, पर सबके दिमाग़ में था — ‘अगर उन्हें सच पता चल जाए तो?’
गुरुवार रात रिया मेरे पास बैठीं और बोलीं — “आदित्य, एक बात तय कर ले।”
“बोलो।”
“अगर पापा पूछें कि कबीर कौन है, तो हम क्या कहेंगे?”
“सच कहेंगे?”
“पहले डिनर में?”
मैंने सोचा। “नहीं,” मैंने कहा। “पहले डिनर में सिर्फ़ इतना कि ‘अच्छे दोस्त हैं।’ बाक़ी वो खुद पूछें तो बताएँगे।”
रिया ने सिर हिलाया। “और अगर मेरी माँ पूछे — जो वो पूछेगी?”
“तो तुम सच बताओ,” मैंने कहा। “माँ से झूठ नहीं।”
रिया ने मेरी तरफ़ देखा — लंबा, गहरा। फिर बोलीं — “तू अच्छा लड़का है।”
“तुमने बनाया,” मैंने कहा।
और वो हँस पड़ीं, और मेरे कंधे पर सिर रख दिया।
होटल के प्राइवेट रूम में सात बजे सब आ गए।
दरवाज़े पर मैं खड़ा था, और जब मेरे माता-पिता आए, तो मेरी माँ ने पहले पूरे कमरे पर नज़र डाली, और फिर रिया को देखा।
रिया उस दिन मैरून रंग की साड़ी में थीं — सादी, पर उन पर जो लग रही थी, वो किसी दुकान से नहीं आती थी। बाल जूड़े में, माथे पर छोटा सा बिंदी, गले में उनकी माँ का हार। कोई ज़्यादा श्रृंगार नहीं। बस इतना कि जो देखे, रुक जाए।
मेरी माँ ने उन्हें देखा, फिर मुझे देखा, और फिर मुस्कुरा दीं।
रिया के माता-पिता भी आए — पापा ऊँचे कद के, चश्मे वाले, शांत; माँ — छोटी, गोल-मटोल, आँखों में हँसी, और हर चीज़ पर नज़र रखने वाली।
और फिर आए कबीर, नैना और इशिता।
कबीर सफ़ेद शर्ट में, इस्तरी किए हुए, बाल सँभाले हुए — ऑफिस वाले कबीर नहीं, एक बंदा जो जान-बूझकर सीधा-सादा आया था। उसने सबसे मिलकर हाथ जोड़े। नैना ने हल्के हरे रंग की कुर्ती पहनी थी, बाल पीछे, और वो बिल्कुल पढ़ाई-लिखाई वाली लड़की लग रही थी। और इशिता ने आसमानी रंग का सूट पहना था और बाल सीधे कर लिए थे — जिससे वो एकदम बदल गई थी।
मेरे पिता ने तीनों को देखा, और फिर मुझसे पूछा — “ये कौन हैं?”
“ऑफिस के लोग,” मैंने कहा। “कबीर मेरा टीम लीड है। नैना और इशिता टीम में हैं।”
“और रिया?” मेरे पिता ने पूछा।
“रिया मैम…” मैंने कहा, और अटक गया। “रिया HR थीं। अब नहीं हैं।”
मेरे पिता ने कुछ सेकंड मुझे देखा। फिर बोले — “अच्छा।”
बस इतना। और मेरी छाती धक-धक करने लगी।
खाना शुरू हुआ। और शुरू के आधे घंटे सब ‘औपचारिक’ रहे — बड़े लोग बड़ों से बात कर रहे थे, और हम चारों चुपचाप खा रहे थे।
फिर रिया की माँ ने पहला तीर चलाया।
“आदित्य,” उन्होंने कहा, और मुझे सीधा देखा। “आप बताइए, रिया में क्या अच्छा लगा?”
कमरे में सब चुप हो गए।
मैंने गिलास रखा। और फिर बोला — “आंटी, ये सवाल आसान है, जवाब मुश्किल।”
“तो मुश्किल जवाब दे दीजिए,” वो हँसीं।
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वो मुझे देख रही थीं — न डर, न हिम्मत देने का इशारा, बस देख रही थीं।
“रिया में अच्छा ये लगा,” मैंने कहा, “कि वो जैसी हैं, वैसी हैं। ऑफिस में एक रिया हैं, घर में वही रिया हैं। वो बदलती नहीं। और आजकल लोग बदल जाते हैं।”
रिया की माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें थोड़ी नरम हो गईं।
“अच्छा जवाब है,” उन्होंने कहा।
फिर रिया के पापा बोले — “आदित्य, आपकी उम्र?”
“बीस, अंकल।”
“और रिया तीस की है,” उन्होंने कहा। “नौ साल का फ़र्क़। कभी सोचा है?”
“सोचा है,” मैंने कहा। “और आपसे एक बात पूछूँ?”
“पूछिए।”
“अंकल, आप और आंटी में कितना फ़र्क़ है?”
रिया के पापा एक पल चुप रहे। फिर मुस्कुराए। “ग्यारह साल,” उन्होंने कहा। “और आज तीस साल हो गए।”
“तो फिर?” मैंने कहा।
रिया की माँ हँस पड़ीं और बोलीं — “इसने मुझे भी इसी तरह पटाया था।”
और पूरे कमरे में हँसी फूट पड़ी। और फिर कमरे की हवा हल्की हो गई।
पर असली चीज़ अभी बाक़ी थी।
खाने के बाद, चाय के वक़्त, मेरे पिता उठकर खिड़की के पास गए। मैं उनके पीछे गया।
“पापा।”
“हाँ।”
“सब ठीक है?”
वो एक पल खिड़की से बाहर देखते रहे। फिर बोले — “आदित्य, एक बात बताओ। सच बताओ।”
“पूछिए।”
“उस कमरे में तीन लोग हैं — कबीर, नैना, इशिता। ये सिर्फ़ ऑफिस के लोग हैं?”
मेरा दिल एक पल रुक गया।
“क्यों पूछ रहे हैं?” मैंने कहा।
“क्योंकि,” पापा ने कहा, “इन तीनों ने रिया को चार बार ‘रिया’ कहा, और एक बार भी ‘मैम’ नहीं कहा। और कबीर ने जब रिया को पानी दिया, तो बिना पूछे दे दिया। और रिया ने उसे बिना देखे हाथ बढ़ा दिया।”
मैं चुप रहा।
“और इशिता ने जब रिया की साड़ी का पल्लू सँभाला,” पापा ने कहा, “तो वो ऐसे सँभाला जैसे घर की लड़की सँभालती है।”
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा।
“तो बताओ, आदित्य। सच क्या है?”
और मैंने सच बताया।
नहीं, पूरा सच नहीं। पहले डिनर में पूरा सच नहीं होता। मैंने कहा — “पापा, ये सब अच्छे दोस्त हैं। बहुत अच्छे। और हाँ, हम सब एक-दूसरे के बहुत करीब हैं। बस इतना।”
पापा ने मुझे देखा। फिर बोले — “बस इतना?”
“बस इतना,” मैंने कहा।
और फिर पापा ने वो कहा जो मैंने उम्मीद नहीं किया था।
“आदित्य,” उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ। तुम्हारी माँ और मेरे बीच भी शुरू में एक और था।”
“क्या?”
“हाँ,” पापा ने कहा, “तुम्हारी माँ की सहेली। दो साल तक हम तीनों घूमते रहे, बैठते रहे, सब एक-साथ। और फिर वो अपनी नौकरी में दूसरे शहर चली गई। तब तक हम दोनों एक-दूसरे के आदी हो चुके थे।”
“तो माँ को पता था?”
“पता था,” पापा ने कहा। “और उन्हें पता था कि मुझे पता है।”
“और कभी बात की?”
“नहीं,” पापा ने कहा। “और ज़रूरत भी नहीं पड़ी। जो चीज़ अच्छी हो, उसे तोड़ना नहीं चाहिए।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा — लंबा, गहरा।
“पापा, आपने ये सब कब से सोच लिया था?”
“आज शाम को,” उन्होंने कहा। “जब कबीर ने रिया की कुर्सी खींची।”
और फिर वो हँस पड़े, मेरे कंधे पर हाथ रखा, और बोले — “बाक़ी सब बाद में बताओ। अभी चाय ठंडी हो रही है।”
उधर रसोई में दूसरी बातचीत हो रही थी।
रिया की माँ चाय लेने आई थीं, और रिया भी पीछे आ गईं। मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा था, और सब सुनाई दे रहा था।
“रिया,” माँ ने कहा।
“हाँ, माँ।”
“वो कबीर,” माँ ने कहा। “वो कौन है?”
रिया एक पल चुप रहीं।
“माँ…”
“मुझे पता है,” माँ ने कहा। “मैंने देखा। जब तुम बोल रही थीं, वो तुम्हारी तरफ़ देख रहा था — आदित्य की तरह नहीं।”
रिया ने चाय का कप हाथ में लिया, और फिर रख दिया।
“माँ, एक बात बताऊँ?”
“बता।”
“वो मेरा है,” रिया ने कहा। “दो साल से।”
माँ ने एक पल उन्हें देखा। फिर बोलीं — “और आदित्य?”
“आदित्य मेरा है,” रिया ने कहा। “एक साल से।”
“और दोनों को पता है?”
“पता है,” रिया ने कहा।
कुछ सेकंड की चुप्पी।
और फिर माँ ने वो कहा जो रिया ने उम्मीद नहीं किया था —
“और तुमने मुझे बताया तक नहीं?”
“डर था,” रिया ने कहा।
“किस बात का?”
“कि आप कहेंगी — ‘एक चुन ले।'”
माँ हँस पड़ीं। और फिर बोलीं — “रिया, तेरी दादी के तीन भाई थे, और उनकी शादी एक ही लड़की से हुई थी। नहीं, मज़ाक कर रही हूँ।”
फिर उन्होंने रिया का हाथ पकड़ा और कहा —
“बेटा, जो तुझे खुश रखे, वो रख। एक रखे या दो, ये तेरा काम है। मेरा काम सिर्फ़ ये है कि तू खुश रहे।”
और रिया की आँखें भर आईं।
“और वो दो लड़कियाँ — नैना, इशिता?” माँ ने पूछा।
रिया ने एक पल सोचा।
“वो भी मेरी हैं,” उन्होंने कहा।
माँ ने तीन सेकंड लिए। फिर होंठ भींचकर बोलीं — “चार?”
“पाँच,” रिया ने कहा।
माँ ने एक लंबी साँस ली। फिर चाय का ट्रे उठाया और बोलीं —
“चल, अंदर। बाक़ी बाद में।”
रात सवा दस बजे सब विदा हुए। रिया के माता-पिता की टैक्सी आई। मेरे माता-पिता मेरे साथ चले, क्योंकि वो मेरे फ्लैट पर रुकने वाले थे।
गाड़ी में पीछे बैठे पापा ने कुछ नहीं कहा। माँ ने भी कुछ नहीं कहा। और फिर, जब हम लगभग घर पहुँच गए, पापा ने कहा —
“आदित्य।”
“हाँ, पापा।”
“वो लड़की अच्छी है।”
“हाँ,” मैंने कहा।
“और वो तीन भी।”
मैं हँस पड़ा।
“पापा, आपको पता है?”
“नहीं,” पापा ने कहा। “पर लगता है पता हो जाएगा।”
और माँ ने कहा — “बहुत सोचने की ज़रूरत नहीं। शादी कर लो। बाक़ी अपने आप सँभल जाएगा।”
और मैंने गाड़ी चलाते हुए कहा — “माँ, ये पहला मौक़ा है जब आपने मुझे कुछ करने को कहा और मैंने सोचा भी नहीं।”
माँ हँस पड़ीं। और पापा ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा — “ये लड़का बिगड़ गया है।”
“अच्छा बिगड़ा है,” माँ ने कहा।
उस रात पापा-माँ मेरे फ्लैट पर सोए, और हम चार — रिया, कबीर, नैना, इशिता — रिया के घर गए। हम पाँच होना चाहते थे, पर पापा-माँ की वजह से रात हमारी नहीं हो सकती थी।
तो हमने बस बैठकर बात की।
सोफ़े पर, चारों, और रिया बीच में। और पहली बार रिया थकी हुई लग रही थीं — अच्छे वाले थके हुए।
“कैसा रहा?” कबीर ने पूछा।
“अच्छा रहा,” रिया ने कहा। “माँ को पता चल गया।”
कबीर ने उनकी तरफ़ देखा। “क्या पता चला?”
“सब,” रिया ने कहा। “तुम, आदित्य, नैना, इशिता। और उसने कहा — ‘जो तुझे खुश रखे, वो रख।'”
कमरे में चुप्पी छा गई।
और फिर इशिता ने कहा — “तो तय है?”
“तय है,” रिया ने कहा।
“और आदित्य के घर वाले?” नैना ने पूछा।
“उन्होंने कुछ नहीं कहा,” रिया ने कहा। “पर पापा को शक़ है। और उन्होंने कहा कि ‘लड़की अच्छी है।'”
“तो बुरा नहीं है,” कबीर ने कहा।
“नहीं,” रिया ने कहा। “बुरा नहीं है।”
और फिर उन्होंने आसपास देखा — चारों को — और बोलीं —
“एक बात सुनो। आज के बाद, ये सब सिर्फ़ बिस्तर की बात नहीं है। ये घर की बात है। और घर में झगड़े भी होते हैं।”
“होते हैं,” नैना ने कहा।
“तो झगड़ेंगे,” रिया ने कहा। “पर बाहर नहीं जाएँगे।”
“नहीं जाएँगे,” कबीर ने कहा।
और इशिता ने हाथ बढ़ाकर रिया का हाथ पकड़ लिया। और नैना ने मेरा।
और हम चारों ने उस रात बिना एक-दूसरे को छुए, बस हाथ पकड़े, बातें कीं — शादी की तारीख़, घर, काम, और आगे का साल।
शादी फ़रवरी में हुई।
दोनों घर तैयार हो गए थे। मेरी माँ ने रिया को बेटी मान लिया, और रिया की माँ ने मुझे बेटा। और किसी ने भी उम्र का ज़िक्र दूसरी बार नहीं किया — पहली बार भी बस पूछा, और फिर भुला दिया।
शादी दिल्ली से बाहर एक छोटे से लॉन में हुई। दो सौ लोग। मेरे दोस्त, उनके रिश्तेदार, और हमारे लोग।
कबीर शादी में ‘दोस्त’ बनकर आया — पर उसने पूरे समय सबसे ज़्यादा काम किया। मंडप की लाइट ठीक करवाई, बारात की बस में सबको बिठाया, और मेरी माँ के साथ फेरे के फूल सँभाले। मेरी माँ ने बाद में कहा — “आदित्य, ये कबीर बहुत अच्छा लड़का है। इसे भी घर में रख।”
और मैंने कहा — “रखा हुआ है, माँ।”
नैना और इशिता ने शादी में लड़कियों की सहेली बनकर सब कुछ चलाया — मेहंदी, हल्दी, सब। नैना ने मेहंदी के दिन रिया के हाथ पर ‘तीन’ लिख दिया था, और इशिता ने फ़ोटोग्राफ़र को हिदायत दी थी कि वो ‘दोस्तों’ की अलग फ़ोटो ले।
और रिया?
रिया उस दिन लाल लहंगे में थीं, और उन पर चढ़कर वो लहंगा उतरा हुआ था। जब वो मंडप की तरफ़ आईं, तो मैंने उन्हें देखा और पहली बार लगा कि अब ये सच है। कि ये अब मेरी है। काग़ज़ पर, दुनिया के सामने, सबके सामने।
वो आईं, मेरे सामने खड़ी हुईं, और धीरे से बोलीं — “आदित्य, हाथ काँप रहे हैं?”
“हाँ,” मैंने कहा।
“मेरे भी,” उन्होंने कहा। “तो चलो, दोनों काँपते हुए फेरे ले लें।”
और हमने लिए।
शादी के बाद दो रात हम होटल में रुके। पर सुहागरात वाली रात — जो मैंने सोची थी, वैसी नहीं थी।
क्योंकि रिया ने दरवाज़ा खोलते ही कहा — “आदित्य, एक बात।”
“बोलो।”
“आज रात सिर्फ़ हम दोनों। कबीर, नैना, इशिता कल आएँगे।”
मैंने उन्हें देखा। और मुझे हैरानी हुई।
“तुमने ये किया?” मैंने पूछा।
“हाँ,” रिया ने कहा। “पहली रात जो मेरी तुम्हारे साथ हो, वो सिर्फ़ हमारी हो। बाक़ी सब कल।”
और मैंने उन्हें गले लगा लिया।
हमने पहले आराम किया। नहाया — एक-साथ, टब में, बिना जल्दी। फिर खाना मँगाया, और बिस्तर पर बैठकर टीवी देखा, और रिया ने मेरी शर्ट पहनी, और उनके गीले बाल तकिये पर फैल गए।
और फिर, ग्यारह बजे, रिया ने टीवी बंद किया।
और मेरी तरफ़ मुड़ीं।
“आदित्य।”
“हाँ।”
“आज पहली बार, तुम मेरे पति हो।”
“हाँ,” मैंने कहा। “और आप मेरी पत्नी।”
“तो आज,” उन्होंने कहा, और मेरा हाथ पकड़कर अपनी कमर पर रखा, “धीरे करना। कोई तेज़ी नहीं। कोई नया नहीं। बस हम।”
और मैंने वही किया।
उस रात हमने बहुत धीरे किया। पहले चुंबन — बहुत लंबा, बहुत धीमा। फिर गर्दन, फिर कंधे, फिर कॉलरबोन। मैंने उनकी शर्ट के बटन खोले — एक-एक करके, बिना जल्दी — और उनके दूध बाहर आए। और मैंने उन्हें देखा, लंबे समय तक, बिना छुए।
“क्या हुआ?” रिया ने पूछा।
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस पहली बार लग रहा है कि ये मेरी है।”
रिया मुस्कुराईं, और मेरा चेहरा हाथों में लेकर मुझे अपने पास खींच लिया।
मैंने उनके निप्पल को होंठों में लिया — धीरे से। वो काँपीं, और मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने लगीं। मैंने एक चूसा, फिर दूसरा। और वो लगातार मेरा नाम ले रही थीं — धीमे, हल्के, जैसे कोई गाना।
फिर नीचे। उनकी नाभि पर होंठ, फिर जाँघों पर, और फिर उनकी बुर पर।
उनकी बुर पहले से गीली थी। मैंने जीभ से पहला स्पर्श किया, और उनका पूरा शरीर झटका खा गया। और फिर मैंने धीरे-धीरे चाटना शुरू किया — ऊपर-नीचे, फिर गोल-गोल, फिर ऊपर वाले हिस्से पर टिककर। और साथ में उँगली अंदर।
रिया ने मेरा सिर पकड़ लिया। उनकी साँस टूट गई।
“आदित्य…”
“बोलो।”
“अंदर आओ।”
“अभी नहीं,” मैंने कहा। “पहले एक बार आ जाओ।”
“नहीं…” उन्होंने कहा। “साथ चाहिए।”
तो मैं ऊपर आया।
उनके पैर फैलाए। अपने लंड को उनकी बुर के होंठों पर रखा, दो-तीन बार रगड़ा — ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। और वो तड़प उठीं।
“अंदर,” उन्होंने कहा।
और मैंने धीरे से अंदर डाला।
उनकी आँखें बंद हो गईं। उन्होंने होंठ भींचे। और फिर, जब पूरा अंदर गया, उन्होंने आँखें खोलकर मेरी आँखों में देखा।
“अब तुम मेरे हो,” उन्होंने कहा।
“और तुम मेरी,” मैंने कहा।
और फिर हम चलने लगे — धीरे, बहुत धीरे। लंबे धक्के, पूरे निकलकर पूरे अंदर। कोई जल्दी नहीं। हर धक्के पर वो एक छोटी आवाज़ निकालतीं, और मेरी गर्दन पकड़कर मुझे अपने पास खींच लेतीं।
उनका दूध मेरी छाती से रगड़ रहा था। उनके निपल्स मेरे सीने पर सख़्त होकर चुभ रहे थे। और मैंने उनके निपल्स को अँगूठे और उँगली के बीच दबाया, और वो और ज़ोर से कराहीं।
फिर वो ऊपर आईं।
उन्होंने मुझे लिटाया, मेरे ऊपर बैठीं, और अपनी बुर मेरे लंड के ऊपर रखकर धीरे से नीचे बैठ गईं। और फिर ऊपर-नीचे होने लगीं — धीरे, अपनी मर्ज़ी से, अपनी रफ़्तार से। और वो उस रात सबसे सुंदर लग रही थीं — गीले बाल, खुले होंठ, झूलते हुए दूध, और आँखें मेरी आँखों में।
“आदित्य,” उन्होंने हाँफते हुए कहा। “बोलो कुछ।”
“क्या बोलूँ?” मैंने कहा।
“बोलो कि तुम मुझसे प्यार करते हो।”
“रिया,” मैंने कहा, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ। और हमेशा करता रहूँगा।”
उनकी आँखें भर आईं। और उन्होंने रफ़्तार बढ़ा दी।
पाँच मिनट बाद वो आईं — धीरे, लंबे, हाँफते हुए — और उनके अंदर का सिकुड़न मेरे लंड को पकड़ गया। और मैंने भी उनके अंदर छोड़ दिया।
कुछ देर हम वैसे ही रहे। मैं अंदर ही था। और उनका सिर मेरी छाती पर था।
“आदित्य।”
“हाँ।”
“अच्छा हुआ?”
“बहुत,” मैंने कहा।
“कल तीन आएँगे,” रिया ने कहा।
“हाँ।”
“तो कल वो बोलेंगे — ‘आज तो सुहागरात वालों को अकेला छोड़ दें।'”
“और हम क्या कहेंगे?”
रिया ने सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा। और फिर बोलीं —
“हम कहेंगे कि रात लंबी है।”
अब एक साल हो गया है।
और चीज़ें बदल गईं, और कुछ नहीं बदला।
मैंने नौकरी बदल ली — बड़ी एजेंसी, बड़ा काम, तीन गुना पैसा। रिया का कंसल्टिंग चल निकला; अब उनके पास तीन क्लाइंट हैं और एक जूनियर है। कबीर उसी कंपनी में है, अब हेड बन गया है। नैना ने अपना छोटा डिज़ाइन स्टूडियो खोल लिया। और इशिता ने इंटर्नशिप पूरी की, नौकरी मिल गई — दूसरी कंपनी में, जो उसने खुद चुनी थी। “अब किसी के नीचे नहीं रहूँगी,” उसने कहा था।
और हम पाँचों ने मिलकर एक बड़ा फ्लैट लिया — तीन बेडरूम, दिल्ली के बाहरी इलाक़े में, हरे-भरे इलाके में, बालकनी से पेड़ दिखते हैं।
तीन बेडरूम। पाँच लोग। तो एक कमरा अब भी खाली है।
“किसके लिए?” नैना ने पूछा था, जब हम शिफ़्ट हो रहे थे।
“देखेंगे,” रिया ने कहा था।
और इशिता ने कहा था — “सोफ़ा बड़ा ले लो।”
हमारा हफ़्ता कुछ यूँ चलता है।
सोमवार से बुधवार काम, काम, काम। रात को सब घर आते हैं, कोई रसोई में, कोई बालकनी में, कोई सोफ़े पर पड़ा। खाना साथ। और कोई ज़रूरी नहीं कि हर रात कुछ हो।
गुरुवार कबीर की रात है। और अब ये रात मुझसे कोई छीनता नहीं। हमने एक-दूसरे को जगह दी है।
शुक्रवार नैना और इशिता की रात। और उस रात रिया और मैं बाहर खाना खाने चले जाते हैं — डेट की तरह। हाथ पकड़े, फ़िल्म, और आइसक्रीम।
शनिवार का दिन घर का दिन है — सफ़ाई, मार्केट, खाना बनाना, और रात को सब साथ। कोई नियम नहीं, कोई हिसाब नहीं। जिसका मन हो, जिसके पास जाए।
रविवार। रविवार सबसे बड़ा दिन है।
रविवार सुबह देर से उठते हैं। इशिता बैडमिंटन खेलकर आती है। नैना नाश्ता बनाती है। कबीर चाय बनाता है। और मैं और रिया बिस्तर में देर तक पड़े रहते हैं, और वो मेरे बालों में उँगलियाँ फिराती हैं।
और फिर रविवार की रात — जिसे अब हम ‘रविवार’ ही कहते हैं, जैसे कोई त्योहार।
पिछले रविवार की बात करता हूँ।
रात आठ बजे सब तैयार थे। बड़ा बिस्तर — अब हमने सुपर किंग लिया है, और उसके आगे फ़र्श पर तीन गद्दे भी रखे हैं, क्योंकि पाँच लोग एक बिस्तर में कभी ठीक से नहीं फ़िट होते, और हमें ये भी सीखना पड़ा कि किसी को कोहनी न लगे।
रिया उस रात बीच में थीं। उन्होंने कहा — “आज मैं बीच में रहूँगी। और आज सब कुछ धीरे। कोई दौड़ नहीं।”
और हमने वही किया।
पहले नैना ने रिया की शर्ट के बटन खोले, और इशिता ने उनकी पैंट। और कबीर उनके पीछे बैठकर उनकी गर्दन चूमने लगा। और मैं उनके सामने बैठकर उनके पैर दबाने लगा।
रिया बीच में बैठी थीं — चार लोगों के बीच — और उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
“आज बस महसूस करना है,” उन्होंने कहा। “कुछ नहीं करना।”
और फिर नैना ने उनके दूध चूमे, और इशिता ने उनकी जाँघों पर होंठ रखे, और कबीर ने उनके कान। और मैंने उनके पंजे।
रिया के शरीर पर होंठ हर जगह थे। और वो बस काँपती रहीं।
फिर धीरे-धीरे सब आगे बढ़ा। नैना ने उनकी बुर पर मुँह लगाया — धीरे, बहुत धीरे — और इशिता ने उनके निप्पल चूसे। और रिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बहुत ज़ोर से दबाया।
“ओह…” वो बस इतना कह पा रही थीं।
और फिर वो आईं — धीरे, लंबे, और नैना के मुँह पर।
फिर रिया ने आँखें खोलीं और आसपास देखा। और फिर बोलीं —
“अब बारी-बारी। और आज कोई जल्दी नहीं करेगा।”
पहले नैना। फिर इशिता। और फिर कबीर। और मैं आख़िर में — क्योंकि रिया ने कहा था — “तू आख़िर में। क्योंकि तेरे बाद मैं सो जाऊँगी।”
और जब मैंने उनके अंदर आया, तो वो मेरी छाती पर सिर रखकर बोलीं —
“आदित्य।”
“हाँ।”
“तुम्हें पता है, आज मुझे किस बात की खुशी है?”
“क्या?”
“ये,” उन्होंने कहा। “कि हम अब अकेले नहीं हैं। कोई भी अकेला नहीं है।”
और मैंने उनके माथे पर होंठ रखे।
कभी-कभी मैं पुरानी बात सोचता हूँ।
वो जुलाई का दिन। तेज़ धूप। तिलक नगर की वो छोटी बिल्डिंग, तीसरा फ़्लोर, और एक लड़का जिसके हाथ काँप रहे थे।
और दरवाज़ा खुला, और एक औरत अंदर आईं, हाथों में क्लिपबोर्ड, और बोलीं — “आदित्य?”
अगर उस दिन मैं ठीक से जवाब न दे पाता, अगर मेरी आवाज़ और अटक जाती, अगर वो हँस न पड़तीं — तो क्या होता?
पता नहीं।
पर शायद इसीलिए अच्छी चीज़ें अच्छी होती हैं। क्योंकि वो बनती नहीं, हो जाती हैं।
आज मैं इक्कीस का हूँ। रिया इकतीस की। हम शादीशुदा हैं, एक घर में रहते हैं, और हमारे घर में हर हफ़्ते पाँच लोग आते हैं, कभी-कभी पाँच से ज़्यादा।
और लोग जब पूछते हैं — “आदित्य, तुम्हारी बीवी क्या करती है?” — तो मैं कहता हूँ — “कंसल्टिंग।”
और जब पूछते हैं — “और तुम्हारे घर में कौन-कौन है?” — तो मैं कहता हूँ — “पाँच।”
और जब पूछते हैं — “पाँच कौन?” — तो मैं कहता हूँ — “घर के लोग।”
और ज़्यादातर लोग सिर हिलाकर मान लेते हैं। और कुछ लोग पूछते हैं — “घर के लोग कौन?”
और तब मैं मुस्कुराकर कहता हूँ —
“एक दिन आ जाइए। मिल जाइएगा।”
तीन जुलाई को शुरू हुई एक कहानी, जो एक बिल्डिंग के तीसरे फ़्लोर पर खत्म नहीं हुई — और एक घर के बड़े बेडरूम में आकर रुक गई।
या रुकी नहीं।
क्योंकि उस बेडरूम के बग़ल वाला कमरा अब भी खाली है।
और रिया अब भी कहती हैं — “देखेंगे।”
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