delhi bus girl gangbang chudai
गैंगबैंग वाली बात रुक्मणी ने उस रात फोन पर कही थी, और मैंने सोचा था कि दो-चार दिन में बात आगे बढ़ेगी। लेकिन रुक्मणी जिस चीज़ पर उतरती थी, उसे अधूरा नहीं छोड़ती थी।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की दिल्ली बस में मिली लड़की को जमकर चुदाई किया
अगले ही हफ़्ते उसने एक नोटबुक खोली — असली कागज़ वाली नोटबुक, जिसे वो पर्स में रखकर घूमती थी — और उसमें चार कॉलम बनाए। पहला कॉलम “नाम”, दूसरा “कद”, तीसरा “उम्र”, और चौथे कॉलम के ऊपर उसने बड़े अक्षरों में लिखा — “लंड (अंदाज़ा)”।
जब मैंने वो नोटबुक देखी, तो हँसते-हँसते पेट दुख गया।
“तुमने इसे साइंस प्रोजेक्ट बना दिया है,” मैंने कहा।
“क्यों नहीं?” उसने कहा, बिल्कुल गंभीर चेहरे से। “सात महीने से तुम्हारे नौ इंच पर जी रही हूँ। अब अगर बाक़ी दुनिया आ रही है, तो तैयारी तो होनी चाहिए।”
उसकी बात सही थी। हम दोनों समझ रहे थे कि ये कोई छोटी चीज़ नहीं है। एक औरत, जिसने सिर्फ़ एक आदमी के साथ सब कुछ सीखा हो, अगर एक ही रात में चार लोगों के बीच जाने वाली है, तो तैयारी चाहिए — शरीर की भी, दिमाग की भी।
हमने ऑनलाइन ढूँढना शुरू किया। पहले हमने उन लोगों को देखा जो इस काम के लिए जाने जाते थे — यानी वो लड़के जो शहर में बैकग्राउंड चेक कराकर, हेल्थ रिपोर्ट दिखाकर, एक “प्रोफाइल” की तरह उपलब्ध होते हैं।
रुक्मणी ने तीन साइट्स और दो ग्रुप्स देखे, और फिर तय किया कि हम सिर्फ़ ऐसे लड़कों से मिलेंगे जो साफ़-सुथरे हों, बोलने वाले हों, और जिन्होंने पहले गैंगबैंग किया हो।
कोई फ्रेशर नहीं — आज रुक्मणी की रात थी, प्रैक्टिस की नहीं।
तीसरे हफ़्ते हमने चार नाम शॉर्टलिस्ट किए। चारों काले — दो नाइजीरियाई, एक घाना से, एक अमेरिका से आया हुआ।
चारों पाँच फुट ग्यारह से छह फुट दो इंच तक के। चारों भरे हुए, बाजू मोटी, कंधे चौड़े। उम्र में सब तीस के आसपास।
रुक्मणी ने उनकी फोटो देखकर एक-एक को टिक किया, और फिर नोटबुक बंद करके मेरी तरफ़ देखा।
“सूरज,” उसने कहा, “तुम्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं?”
“किस बात का?”
“कि तुम्हारी रुक्मणी को चार और आदमी चोदेंगे।”
मैंने सोचा, और सच बोला — “ऐतराज़ नहीं है। बस एक चीज़ का डर है।”
“क्या?”
“कि तुम्हें इतना अच्छा लगेगा कि मेरे नौ इंच कम पड़ जाएँ।”
वो हँसी, और फिर मेरे पास आकर मेरी गर्दन में हाथ डाल दिए।
“पगला,” उसने कहा, “तुम तो हर रात पहले से हो। तुम्हें तो देखना है कि तुम्हारे अलावा कोई और जब मेरे अंदर हो, तो मेरे चेहरे पर क्या आता है। वो चेहरा तुम्हारे लिए ही होगा।”
यही बात मुझे क़ायल कर गई। यही बात समझा गई कि रुक्मणी ये सब मुझसे दूर जाने के लिए नहीं, मेरे पास और आने के लिए कर रही है।
जगह हमने एक सर्विस अपार्टमेंट चुनी — दिल्ली के बाहरी इलाक़े में, एक ऐसे कॉर्नर पर जहाँ शोर भी कम और पर्दा भी भारी।
रुक्मणी ने खुद उसे देखा, खुद पसंद किया। उसने एक बड़ा-सा कमरा माँगा, जिसमें एक बड़ा पलंग हो, एक सोफ़ा हो, और एक लंबा आईना हो — यह उसका खास इंतज़ाम था।
“आईना क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि मुझे देखना है,” उसने कहा। “अपने आप को देखना है जब मैं बीच में होऊँ। और तुम्हें भी देखना है।”
उसकी तैयारी देखकर मुझे गर्व भी हो रहा था और हैरानी भी। वो इस रात को एक इवेंट की तरह ले रही थी — शरीर को तैयार करना, खाना ठीक रखना, नींद पूरी लेना, उस दिन काम से छुट्टी।
दो दिन पहले से उसने मसाज कराई, वैक्सिंग कराई, और उस रात के लिए एक नई ड्रेस खरीदी — काला, बहुत हल्का, इतना हल्का कि लगे कि पहनने की ज़रूरत भी नहीं थी, बस इसलिए पहना है कि उतारने में मज़ा आए।
हमने चार नियम तय किए। पहला — सब कंडोम लगाएँगे, कोई अपवाद नहीं। दूसरा — शुरुआत में एक-एक करके, जल्दबाज़ी नहीं। तीसरा — रुक्मणी जब “रुको” कहे, सब रुकेंगे। और चौथा — जो रुक्मणी कहेगी, वही होगा। वो बीच में होगी, इसलिए उसका हुक्म आख़िरी होगा।
चौथा नियम पढ़कर रुक्मणी मुस्कुराई और बोली — “ये चौथा नियम मेरा है, या सज़ा है?”
“दोनों,” मैंने कहा।
उस शाम हम साढ़े छह बजे पहुँचे। रुक्मणी ने पहले शॉवर लिया, फिर अपना काला लिबास पहना, और आईने के सामने खड़ी हो गई।
मैं पीछे से आया, उसकी कमर पकड़ी, और आईने में हम दोनों को देखा — मैं उसके पीछे, वो आगे, बाल गीले, गर्दन पर उसका ख़ास इत्र।
“तैयार हो?” मैंने पूछा।
“तैयार थी बस से ही,” उसने वही पुराना जुमला दोहराया, और दोनों हँस पड़े।
साढ़े सात बजे पहला दरवाज़ा बजा।
पहला था — मार्कस, छह फुट एक इंच, नाइजीरियाई, जिम ट्रेनर। शरीर ऐसा कि कमीज़ भी उससे छोटी लगे। हाथ मिलाया तो हथेली इतनी बड़ी कि मेरी हथेली पूरी उसमें छिप गई। वो अंदर आया, रुक्मणी को देखा, और विनम्रता से मुस्कुराकर हाथ मिलाया।
फिर आया केविन — घाना से, सॉफ़्टवेयर इंजीनियर, थोड़ा दुबला-पतला लेकिन लंबा, पाँच फुट ग्यारह। बोलने वाला, हँसाने वाला। उसने अंदर आते ही कमरे का माहौल हल्का कर दिया।
तीसरा आया सैमुअल — अमेरिका से आया हुआ, बास्केटबॉल खिलाड़ी जैसा शरीर, छह फुट दो इंच। चुपचाप अंदर आया, सोफ़े पर बैठ गया, और चुपचाप सब देखने लगा। रुक्मणी ने उसे देखा, और उसकी नज़र में वो जोर था जो शब्दों की जगह नहीं लेता।
और चौथा — टूंडे, छह फुट, भरा हुआ, तगड़ा, हँसता हुआ, हाथ मिलाते ही बोला — “तो ये वो लड़की है जिसने बस में सूरज का दिमाग खा लिया था?”
रुक्मणी शरमाकर हँसी, और फिर उसने सबको बिठाकर चाय पिलाई — जैसे घर की बहू हो और सब मेहमान हों।
पंद्रह मिनट तक हम सब हँसते-बोलते रहे। बातें सामान्य थीं — काम, शहर, दिल्ली की ट्रैफ़िक। कोई भी जल्दी नहीं कर रहा था। और यही बात कमरे को भारी नहीं होने दे रही थी।
फिर मार्कस ने चाय का कप रखा, और रुक्मणी की तरफ़ देखा। बस इतना ही काफ़ी था।
कमरे की लाइट धीमी कर दी गई। रुक्मणी बीच में खड़ी थी, और चारों उसके आसपास।
मैं किनारे पर खड़ा होकर देख रहा था — जैसा उसने चाहा था, पहले वो खुद चखेगी, फिर मुझे बुलाएगी।
मार्कस पीछे आया, उसके बाल एक तरफ़ किए, और गर्दन पर होंठ रख दिए।
केविन सामने आया, उसका चेहरा दोनों हाथों में लेकर धीरे से चूमा। सैमुअल एक तरफ़ से उसका हाथ पकड़कर सहलाने लगा। और टूंडे ने उसके कुर्ते की ज़िप खींची।
चार हाथ, चार तरफ़ से। रुक्मणी की आँखें बंद हो गईं।
कुर्ता उतरा। नीचे उसकी ब्रा थी — उस रात काली, सिल्क जैसी, जिसमें उसके दूध पूरी तरह भरे हुए थे।
चौंतीस के दूध, ऊपर से गोल, बीच की दरार गहरी। जब ब्रा खुली, तो चारों की साँसें एक साथ रुक गईं।
सैमुअल ने धीमे से कहा — “बाप रे।”
रुक्मणी की आँखें खुलीं और वो मुस्कुराई। वो मुस्कान ये बताती थी कि उसे पता है कि वो क्या है, और उसे ये जानकर मज़ा आ रहा है कि चार आदमी उसे देखकर बेकाबू हो रहे हैं।
मार्कस ने उसके दूध को हाथ में लिया। उसकी हथेली इतनी बड़ी थी कि पूरा दूध उसमें समा गया, और फिर भी उसने उसे धीरे-धीरे दबाया, जैसे कोई फल तोल रहा हो।
रुक्मणी ने एक नर्म सी आह निकाली। केविन झुका और दूसरे दूध के निप्पल को मुँह में ले लिया।
टूंडे ने उसके दूध के नीचे होंठ फेरे, और सैमुअल ने उसकी कमर से होते हुए हाथ नीचे सरकाया।
पहली बार रुक्मणी के दूध एक साथ चार लोगों के हाथों में थे। एक हाथ नीचे से सहला रहा था, एक ऊपर से दबा रहा था, एक निपल को जीभ से छू रहा था, और एक निप्पल को उँगलियों से घुमा रहा था।
दोनों निपल्स कुछ ही सेकंड में कठोर, लाल और गीले हो गए। रुक्मणी की साँसें तेज़ हो गईं, और उसने दोनों हाथ ऊपर उठाकर किसी-किसी के बाल पकड़ लिए — किसका, उसे भी पता नहीं था।
फिर उसकी पैंट उतरी। नीचे उसी की मैचिंग काली पैंटी। और वो पैंटी पहले से गीली थी — इतनी गीली कि कपड़े पर साफ़ नक़्शा बन गया था।
जब पैंटी भी उतरी, तो रुक्मणी पूरी नंगी खड़ी थी — बुर चमकती हुई, गांड भरी हुई, दूध लटकते हुए, निपल्स खड़े हुए। आईने में उसने खुद को देखा और एक गहरी साँस ली।
टूंडे घुटनों के बल बैठ गया और उसकी बुर पर जीभ रख दी।
रुक्मणी पूरी तरह झटके से उठी, जैसे करंट लगा हो। टूंडे की जीभ पहले ऊपर-नीचे लंबी लकीरें खींच रही थी, फिर ऊपर वाली कली पर गोल-गोल घूमने लगी।
मार्कस पीछे से आया और उसकी गांड को दोनों हाथों में भरकर फैलाया।
उसकी गांड के दोनों पाट इतने भरे थे कि मार्कस के हाथ भी छोटे लग रहे थे। उसने एक पाट को ऊपर उठाया और नीचे से जीभ फेरी।
रुक्मणी अब दो जगह से चाटी जा रही थी — आगे टूंडे, पीछे मार्कस।
केविन उसके दूध चूस रहा था, और सैमुअल उसके पीछे खड़े होकर उसके कान में धीरे-धीरे गंदी बातें कह रहा था।
मैंने सुना — “देख रुक्मणी, तेरी बुर कैसे पानी छोड़ रही है। चार लंड आने वाले हैं, तैयार है?”
“हाँ…” रुक्मणी हाँफी, “तैयार हूँ…”
कुछ मिनट में ही उसकी साँसें बेतरतीब हो गईं। उसने टूंडे के सिर को दोनों हाथों से पकड़ा और अपनी बुर पर दबाया — जैसे कहे कि रुको नहीं।
टूंडे की जीभ तेज़ हुई, और रुक्मणी के पैर काँपने लगे। फिर वो चीखी — लंबी और फटी हुई — और उसके शरीर ने एक के बाद एक कई झटके लिए।
पहला झड़ापा, चार आदमियों के सामने। उसके पैर लड़खड़ाए, और मार्कस ने उसे कमर से पकड़कर गिरने से बचाया।
वो हाँफ रही थी, चेहरा लाल, आँखें भरी हुईं। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा — मैं किनारे पर खड़ा था — और बोली, “सूरज, अब आ जाओ।”
अब कोई नियम नहीं था। बस रुक्मणी थी, और उसके चारों तरफ़ चार लंड, और मैं — पाँचवाँ।
पहले कमरे का इंतज़ाम बदला। हमने बड़ी चादर बिछाई, तकिये इकट्ठे किए, और रुक्मणी को बीच में लिटाया।
उसने सिर के नीचे तकिया रखा, ताकि वो सब देख सके — जो हो रहा है, और जो होने वाला है।
आईने में उसका पूरा शरीर दिख रहा था, और वो आईने को ही देखकर मुस्कुरा रही थी।
कंडोम के पैकेट खुले। चारों ने लगाए। मैंने भी लगाया।
मार्कस पहले आया। वो रुक्मणी के पैरों के बीच बैठा, अपना लंड उसकी बुर के मुँह पर रखा, और रुक्मणी ने खुद देखकर आँखें फैलाईं।
मार्कस का लंड बहुत मोटा था — शायद लंबाई में मेरे बराबर या थोड़ा कम, लेकिन मोटाई में कहीं ज़्यादा।
रुक्मणी ने धीमे से कहा, “ये तो मोटा है…”
“अंदर आने दो,” मार्कस ने मुस्कुराकर कहा, “फिर देखो।”
वो धीरे से आगे बढ़ा। नोक अंदर गई, और रुक्मणी ने होंठ कस लिए। मार्कस रुका, फिर और आगे बढ़ा, और और, और।
जब पूरा अंदर गया, तो रुक्मणी की साँस फूली हुई थी, और उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं।
वो मुझे देख रही थी — जैसा उसने कहा था, वो चेहरा मेरे लिए ही था।
फिर मार्कस ने धक्के शुरू किए। धीमे, गहरे, तोलकर — जैसे पहले सबका हिसाब कर रहा हो।
रुक्मणी की बुर हर धक्के पर फैलती, कसती, छोड़ती। उसकी गांड मार्कस की जाँघों से टकराती और टकराने की आवाज़ कमरे में गूँजती।
तभी केविन आया और उसके सिर के पास बैठ गया। रुक्मणी ने गर्दन घुमाई, और समझ गई कि क्या करना है। उसने केविन का लंड मुँह में लिया।
अब वो एक साथ दो जगह भरी हुई थी — नीचे मार्कस, ऊपर केविन। केविन ने उसके बाल पकड़े और धीरे-धीरे सिर हिलाने लगा।
रुक्मणी की आँखों से पानी आने लगा, लेकिन उसने मुँह नहीं हटाया।
सैमुअल उसके पास आया और उसके दूध को मुँह में ले लिया। एक दूध उसने हाथ में भरा, और निप्पल को दाँतों से पकड़कर खींचा।
रुक्मणी ने गले से आवाज़ निकाली, पर मुँह भरा होने की वजह से वो आवाज़ और भी मीठी लगी।
टूंडे उसकी कमर के पास बैठा और उसकी गांड को दोनों हाथों से फैलाने लगा।
उसकी उँगली धीरे-धीरे उसके गुदा के मुँह पर फिर रही थी। रुक्मणी ने आँखें खोलकर उसे देखा और सिर हिलाकर हाँ कह दी।
अब रुक्मणी की हालत वो थी जो हर औरत की आख़िरी इच्छा होती है — मुँह में एक, बुर में एक, गांड पर एक की उँगली, दूध में एक का मुँह। चारों तरफ़ से भरी हुई।
और मैं — मैं किनारे पर खड़ा था, और अपनी ही औरत को इस हाल में देखकर पागल हो रहा था। मेरा लंड ऐसा खड़ा था कि लगा फट जाएगा।
मार्कस ने रफ़्तार बढ़ाई। अब धक्के तेज़ थे, गहरे थे, और हर धक्के पर रुक्मणी की गांड पलंग से उठती।
केविन ने उसका सिर पकड़कर अपनी लय में चलाया। सैमुअल उसके दूध चूसता रहा, और टूंडे की उँगली अब उसके गुदा के अंदर तक जाने लगी।
कुछ मिनट में ही रुक्मणी फिर चीखी — मुँह में केविन का लंड डाले हुए, दबी हुई चीख।
उसका शरीर झटके खाने लगा, और मार्कस ने और तेज़ कर दिया। रुक्मणी का दूसरा झड़ापा।
उसके पैर मार्कस की कमर पर कस गए, और वो पलंग पर पूरी तरह फैल गई।
मार्कस कुछ देर और चला, फिर उसने गति बढ़ाई, कमर कसी, और छोड़ दिया। कंडोम के अंदर गरम-गरम।
वो कुछ सेकंड ऊपर ही टिका रहा, साँस भरता हुआ, फिर धीरे से बाहर आया।
रुक्मणी हाँफ रही थी। उसकी बुर खुली हुई, लाल, चमकती हुई। और अभी बस पहला आदमी ख़त्म हुआ था।
“और…” उसने फुसफुसाया।
अब क्रम बदला। केविन ने उसके पैरों के बीच जगह ली। वो लंबा था और पतला — लंड भी लंबा, पतला, सीधा।
उसने बिना जल्दी किए अंदर डाला, और रुक्मणी की साँस फूली। फिर उसने पूरे नाप के साथ धक्के शुरू किए — लंबे, गहरे, और हर बार आख़िर तक।
रुक्मणी की आँखें बंद हो गईं। ये अंदाज़ उसके लिए नया था — लंबा और सीधा, जो हर बार उसके अंदर की आख़िरी दीवार को छूता।
वो हर धक्के पर हल्का सा उठती और फिर गिरती। उसने अपनी गांड नीचे से मिलानी शुरू की, और अब वो भी धक्के दे रही थी।
तभी सैमुअल आया और उसके पीछे की तरफ़। उसने रुक्मणी को करवट दिलाई — एक तरफ़, आधा लेटा हुआ, एक पैर ऊपर।
केविन आगे से अंदर रहा, और सैमुअल पीछे से उसकी गांड के मुँह पर अपना लंड रखकर धीरे से दबाने लगा।
रुक्मणी ने चौंककर आँखें खोलीं।
“दोनों?” उसने हाँफते हुए पूछा।
“दोनों,” सैमुअल ने कहा।
“सूरज…” उसने मेरी तरफ़ देखा, “दोनों…”
“हो जाएगा,” मैंने कहा, “धीरे से।”
सैमुअल ने धीरे से आगे बढ़ाया। रुक्मणी की गांड ने पहले विरोध किया, फिर फैली, फिर नरम पड़ी। एक इंच, दो इंच।
रुक्मणी की साँसें बेतरतीब हो गईं। फिर पूरा अंदर। और अब वो एक साथ दो जगह से भरी हुई थी — बुर में केविन, गांड में सैमुअल।
दोनों के बीच सिर्फ़ एक दीवार, और वो दीवार दोनों तरफ़ से दबी हुई।
सैमुअल ने पहला धक्का दिया। रुक्मणी चीखी — और ये चीख पहले वाली चीखों से अलग थी, ज़्यादा गहरी, ज़्यादा फटी हुई।
फिर दूसरा, फिर तीसरा। दोनों की लय धीरे-धीरे एक हो गई — जब केविन अंदर, तब सैमुअल बाहर।
रुक्मणी के शरीर में लगा कि कुछ चल रहा है जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया।
टूंडे उसके सामने घुटनों के बल आया और उसके दूध को पकड़कर मुँह में ले लिया।
उसके दाँत निपल्स पर बहुत हल्के दबाव डाल रहे थे, और उसके हाथ दोनों दूध को एक साथ मसल रहे थे।
मार्कस उसके सिर के पास बैठकर उसके बाल सहला रहा था।
मैं पलंग के सिरे पर आ गया और उसके चेहरे के पास खड़ा हो गया।
रुक्मणी ने मुझे देखा, और मुस्कुराई — बीच में, दो लंडों के बीच में, तीन हाथों के नीचे, और वो मुस्कुराई।
उसने अपना हाथ बढ़ाकर मेरा लंड थामा और मुझे अपनी तरफ़ खींचा।
“अंदर डालो,” उसने कहा।
“मुँह में?”
“हाँ। तीनों जगह चाहिए।”
मैंने अपना लंड उसके मुँह में डाला। अब रुक्मणी पूरी तरह भरी हुई थी — मुँह, बुर, गांड, तीनों में लंड।
उसके दूध किसी और के हाथ में, उसके निपल्स किसी और के दाँतों में, और उसके अंदर दो लय एक साथ चल रही थीं।
कुछ मिनट तक यही चला। फिर उसका शरीर तन गया, उसकी गांड और बुर दोनों एक साथ कस गईं, और उसने तीसरा झड़ापा लिया — इस बार सबसे लंबा, सबसे तेज़।
उसके पैर काँपे, हाथों ने चादर मुट्ठी में भर ली, और मुँह से वो आवाज़ निकली जो सिर्फ़ तीन जगह भरी होने पर निकलती है।
सैमुअल पहले टूटा। उसने गहरा धक्का दिया, कमर कसी, और छोड़ दिया।
फिर केविन ने भी रफ़्तार बढ़ाई और कुछ देर में ख़त्म हुआ। फिर मैंने भी उसके मुँह में छोड़ा।
हम तीनों हटे, और रुक्मणी पलंग पर पसर गई — पसीने से तर, दूध ऊपर-नीचे, बुर खुली हुई, गांड लाल। और अभी टूंडे बाक़ी था।
टूंडे ने कुछ देर उसे ऐसे ही देखा। फिर वो उसके पास आया, उसे उठाकर बिठाया, और उसकी पीठ अपने सीने से लगाई।
रुक्मणी अब बैठी हुई थी, उसकी गांड टूंडे की जाँघों के बीच, और उसकी बुर खुली हुई।
टूंडे ने पीछे से अपना लंड उसकी बुर में डाला। रुक्मणी ने सिर पीछे टिका दिया, टूंडे के कंधे पर।
और फिर टूंडे ने नीचे से धक्के दिए — उठते-गिरते, ऊपर की तरफ़। ये पोज़िशन सबसे गहरी थी, और रुक्मणी की आँखें बार-बार ऊपर जाती थीं।
सैमुअल उसके सामने बैठ गया और उसके दूध पकड़कर चूसने लगा। मार्कस उसके पैरों को फैलाए हुए था।
केविन पीछे खड़ा होकर उसकी गांड पर हाथ फेर रहा था। मैं आईने के पास खड़ा था — और रुक्मणी आईने में खुद को देख रही थी।
बैठी हुई, भरी हुई, चार लोगों के बीच, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो सिर्फ़ पूरी तरह समर्पित होने पर आता है।
टूंडे ने गति बढ़ाई। अब धक्के तेज़ थे, और हर धक्के पर रुक्मणी की आवाज़ निकलती।
कमरे में पाँच आदमियों की साँसें, एक औरत की चीखें, और त्वचा की टकराहट। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। सिर्फ़ शरीर बोल रहे थे।
फिर टूंडे ने उसे पलटकर घुटनों और हाथों पर लाया — उसकी गांड हवा में, ऊपर उठी हुई। और पीछे से अंदर डाला। अब रुक्मणी की गांड पूरी तरह झूल रही थी, हर धक्के पर हिलती हुई।
मार्कस ने उसके नीचे हाथ डालकर उसके दूध थाम लिए, जो हर झटके पर ऊपर-नीचे हो रहे थे। केविन ने उसकी बुर पर उँगली फेरी, और निप्पल्स को दबाया।
रुक्मणी अब लगभग बेहोश थी। उसने बार-बार “और… और…” कहा, फिर “रुको मत…”, फिर “मर जाऊँगी…”, फिर “सूरज… सूरज…”
टूंडे ने आख़िरी बार तेज़ किया, और फिर छोड़ दिया। उसके साथ ही रुक्मणी का चौथा झड़ापा आया, जो पहले तीनों से लंबा चला।
उसके पूरे शरीर ने काँपते हुए झटके लिए, और फिर वो चादर पर गिर गई।
कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ़ साँसों की आवाज़।
रुक्मणी चादर पर पसरी थी। उसकी गांड अब भी लाल, उसकी बुर अब भी खुली हुई, उसके दूध एक तरफ़ झुके हुए, निपल्स अब भी खड़े हुए।
पसीने की परत उसके पूरे शरीर पर चमक रही थी, और उसके बाल चेहरे पर चिपके हुए थे।
मार्कस पानी ले आया। केविन ने पंखा तेज़ कर दिया। टूंडे ने उसके पैरों को सहलाया। सैमुअल चुपचाप उसके माथे पर हाथ फेर रहा था।
रुक्मणी ने कुछ देर बाद आँखें खोलीं। उसने पहले मुझे ढूँढा — कमरे में चारों तरफ़ देखा — और मुझे पास बैठा पाया। फिर वो हल्की सी हँसी।
“पूरा हुआ?” उसने पूछा।
“तुमने पूरा कर लिया,” मैंने कहा।
“सब?”
“सब।”
उसने आँखें बंद करके एक लंबी साँस ली, और फिर धीमे से बोली — “सूरज, मुझे नहीं पता था कि शरीर इतना कुछ सह सकता है।”
“अब पता चल गया,” मैंने कहा।
“अब पता चल गया,” उसने दोहराया, और फिर मेरा हाथ पकड़ लिया।
चारों लड़के थोड़ी देर और रुके। पानी पिया, बातें कीं, हँसे। केविन ने कहा कि उसने ऐसी औरत कम देखी है जो पहली बार में ही इतना खुल जाए।
टूंडे ने कहा कि रुक्मणी का नाम अब उसके फ़ोन में “बस वाली” सेव होगा। सब हँसे। फिर सब विदा हुए, और दरवाज़ा बंद हुआ।
कमरे में फिर हम दोनों।
रुक्मणी उठकर बैठी। शरीर अकड़ा हुआ था, चलने में तकलीफ़ हो रही थी, और वो इस तकलीफ़ पर गर्व कर रही थी।
उसने शॉवर लिया, और मैं साथ गया — बस उसे पकड़े रहने के लिए। गरम पानी में उसने आँखें बंद कर लीं और मेरे सीने पर सिर टिका दिया।
“सूरज,” उसने कहा, “एक बात बताओ।”
“बताओ।”
“आज तुम्हें बुरा तो नहीं लगा? मतलब, चार आदमी…”
“बुरा नहीं लगा,” मैंने कहा। “अच्छा लगा। बहुत अच्छा लगा। जब तुम चीख रही थीं और मुझे देख रही थीं, तब लगा कि ये रात हमारी है, सिर्फ़ हमारी। बाक़ी चार सिर्फ़ मेहमान थे।”
वो चुप रही, और फिर मेरी छाती पर एक चुंबन रख दिया।
“तुम अच्छे हो,” उसने कहा। “इसलिए तुम्हें छोड़ना मुश्किल है।”
बाहर निकलते वक़्त सुबह की पहली किरण आ रही थी। हम कार में बैठे। रुक्मणी ने खिड़की खोली, ठंडी हवा अंदर आई, और उसने आँखें बंद कर लीं।
“याद है,” उसने कहा, “उस दिन बस में तुम्हारी कॉटन की पैंट?”
“याद है।”
“तब लगा था कि ये आदमी कुछ ज़्यादा ही ठीक है,” उसने कहा। “और अब लगता है कि बस वाला दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा दिन था।”
“सबसे अच्छा दिन अभी आया है,” मैंने कहा। “और आगे और आएँगे।”
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में थकान थी, संतुष्टि थी, और एक शांति — जो सिर्फ़ उस औरत के चेहरे पर आती है जिसने अपने शरीर को पूरी तरह जी लिया हो।
“तो अगला क्या?” उसने पूछा।
“अगला तुम बताओ,” मैंने कहा।
वो हँसी। “अभी सोचने दो। शरीर तो ठीक हो ले।”
“ठीक हो जाएगा,” मैंने कहा। “तुम्हारा शरीर कुछ भी सह लेता है।”
“तुम्हारी वजह से,” उसने कहा, और फिर मेरा हाथ पकड़कर अपनी जाँघ पर रख दिया।
कार चल पड़ी। दिल्ली की सड़कें खाली थीं, हवा ठंडी थी, और दोनों चुप थे — वो अच्छी चुप्पी, जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।
सात महीने पहले एक भरी हुई बस में एक लड़की ने अपनी गांड मेरे लंड से टकराई थी।
और आज वो लड़की मेरे पास बैठी थी, थकी हुई, भरी हुई, मुस्कुराती हुई — और मेरी।
और मन में एक बात बार-बार आ रही थी — कि ये कहानी बस वाली नहीं थी, न ही पलंग वाली थी, न ही उस रात वाली थी।
ये उस भरोसे की कहानी थी, जो एक औरत तभी देती है जब उसे लगे कि आदमी उसे सिर्फ़ चोदना नहीं, रखना भी जानता है।
रुक्मणी ने सोते-सोते मेरा हाथ अपनी गांड पर रख दिया। बिना आँखें खोले बोली — “आगे भी चलती रहेगी ना?”
“चलती रहेगी,” मैंने कहा।
और वो मुस्कुराकर सो गई।
आगे क्या: रुक्मणी की अगली ख्वाहिश में सिर्फ़ चार नहीं, छह लोग हैं — और इस बार वो खुद तय करेगी कि कौन, कहाँ, और कितनी बार। साथ ही एक नया सवाल भी उठेगा — क्या सूरज और रुक्मणी सिर्फ़ शरीर के साथी रहेंगे, या उस “बस वाली मुलाक़ात” का कोई बड़ा अंजाम भी होगा।
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- अपने पड़ोसी और उसके दो दोस्तों के साथ ग्रुप में चुदी
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