aunty gangbang sex story
मेरा नाम वेद प्रकाश है। उम्र तेईस साल, कद पाँच फुट छह इंच, और जो चीज़ आदमी की असली पहचान होती है — वो भी ठीक-ठाक है, सात इंच लंबी और चार इंच मोटी।
बुरी नहीं है, कह सकते हैं कि काम चलाऊ से ज़्यादा है। लेकिन मेरे साथ एक दिक्कत हमेशा रही — मेरा दोस्त सोनू।
उम्र मेरी ही, तेईस साल, लेकिन भगवान ने उसे जो दिया था, वो देखकर हर लड़की एक बार रुक जाती थी।
उसका लंड पूरे दस इंच का था। दस इंच! मोटाई में भी मेरे से बड़ा, एकदम तगड़ा, ऐसा लगता था जैसे किसी बैल का हो।
जब हम दोनों साथ नहाते, तो मुझे अपना सात इंच का लंड छोटा लगने लगता था।
सोनू हमेशा हँसकर कहता, “वेद, तेरा भी ठीक है, तू क्यों मरता है? मेरा बड़ा है तो क्या, तेरा सही जगह पे लगेगा तो असर करेगा।”
लेकिन सच यही था कि दोनों को पता था — बड़ा लंड औरत को पागल कर देता है, और हमारी नज़र में इस वक़्त कोई औरत मौसी से बड़ी नहीं थी।
मौसी का नाम नीलम था। तैंतालीस साल की, लेकिन जिस्म ऐसा कि उम्र भूल जाओ।
छत्तीस का बस्ट, चौंतीस की कमर और बयालीस की गांड — एकदम रंडियों जैसी गोल, भारी और झूलती हुई।
जब वो चलती, तो उसकी गांड ऐसे मटकती जैसे किसी नाचने वाली की हो।
उसकी चूचियाँ दूध से भरी हुई थीं, इतनी भारी कि ब्लाउज़ से बाहर निकलने को मचलती रहतीं।
उसके निप्पल बड़े और कुछ काले थे, और निपल्स जब कपड़े से छू जाते, तो साफ़ उभर आते थे।
मैं बचपन से उसे देखता आ रहा था, लेकिन जवान होने के बाद जब-जब उसे देखता, लंड खुद-ब-खुद खड़ा हो जाता।
उसकी आँखों में एक ऐसी नशीली चमक थी कि लगता कोई भी उसके जाल में फँस सकता है।
उस दिन की बात है।
दोपहर के करीब बारह बजे मम्मी ने हम दोनों को बुलाया और कहा, “वेद, सोनू, मौसी के घर जाओ, कुछ सामान दे आओ। मौसी अकेली है, उससे मिल भी आना।”
मौसी का घर हमारे घर से चार किलोमीटर दूर था, एक पुराने मोहल्ले में।
सोनू और मैंने बाइक निकाली और निकल पड़े। दोपहर की धूप ऐसी तेज़ थी कि सड़कें तवे जैसी तप रही थीं।
हवा में वो मार्च-अप्रैल वाली गर्मी थी जो आदमी के अंदर एक अजीब सी बेचैनी भर देती है।
रास्ते में सोनू ने चुटकी लेते हुए कहा, “वेद, सच बता, मौसी पे तेरा लंड उठता है न?”
मैं हँसा, “उठता तो क्या, खड़ा हो जाता है पूरा। तू देखता नहीं उसकी चूचियाँ कैसे झूलती हैं?”
“अरे भाई, उसकी गांड देखी है? जब वो पानी भरने झुकती है ना, तो लगता है बयालीस इंच का पहाड़ झुक गया। मेरा तो लंड दस इंच का उसके लिए छोटा पड़ जाएगा।”
हम दोनों हँसने लगे और बाइक भगाते हुए मौसी के घर पहुँच गए।
घड़ी देखी — ठीक दोपहर का एक बज रहा था। चारों तरफ़ सन्नाटा था, जैसे पूरा मोहल्ला सो रहा हो। कुत्ते भी छाया में पड़े थे।
मौसी का घर एक पुराना, दो मंज़िला मकान था, आँगन के चारों तरफ़ कमरे थे।
गेट खुला था, लेकिन अंदर जाकर हमें कोई दिखा नहीं। सिर्फ़ भिनभिनाने जैसी हल्की आवाज़ें आ रही थीं, और हवा में एक अजीब सी गंध थी — पसीने और फूलों की मिली-जुली।
दरवाज़ा हल्का-सा खुला हुआ था, जैसे किसी ने जल्दी में बंद किया हो और ठीक से बंद भी न किया हो। हम दोनों चुपचाप अंदर घुसे।
आँगन में चप्पलें रखी थीं, और एक जोड़ी पुरुष की चप्पल भी — जो मौसी की नहीं थी।
सोनू ने मेरी तरफ़ देखा और आँखों से इशारा किया, जैसे कह रहा हो, “कोई है अंदर।”
मैं चुपचाप मौसी के कमरे की तरफ़ बढ़ा। कमरे की खिड़की के पर्दे पूरे नहीं ढके थे, बीच से एक झिरी खुली थी।
मैंने झुककर उस झिरी से अंदर झाँका — और जो देखा, वो मेरे होश उड़ा गया।
अंदर मौसी नीलम चारपाई पर घुटनों के बल झुकी थी, और उनके पीछे खड़ा था रोहन काका — उनका माली, जो कभी-कभी बगीचे का काम करने आता था।
चालीस साल का आदमी, काला-साँवला, तगड़ा, मज़बूत बदन और हाथ-पैर में किसानों जैसी ताकत।
उसकी पीठ पसीने से चमक रही थी, और वो मौसी की गांड पर दोनों हाथ रखकर ज़ोर-ज़ोर से पेल रहा था।
मौसी के बदन से पसीना टपक रहा था, बाल खुले हुए चेहरे पर बिखरे थे, और वो बार-बार कराह रही थी, “आह रोहन… ज़ोर से… और ज़ोर से… मेरी चूत फाड़ दे… ऐसे ही… ऐसे ही…”
रोहन काका हर ठोकर पर पूरी ताकत से मौसी की गांड पकड़कर अपनी तरफ़ खींचता और फिर पेल देता।
मौसी की भारी चूचियाँ झूलकर लटक रही थीं, निप्पल चारपाई से रगड़ खा-खा कर सख़्त हो गए थे।
निपल्स पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। मौसी की गांड जो बयालीस इंच की थी, हर झटके पर काँपती और लहराती थी।
उनकी बुर से ऐसी आवाज़ आ रही थी जैसे गीली मिट्टी में लाठी घुसे।
रोहन का लंड मोटा और लाल-भूरा था, और हर बार पूरा अंदर जाकर फिर बाहर निकल आता, चमकता हुआ, मौसी के रस से लथपथ।
मेरा और सोनू का लंड पैंट के अंदर तम्बू बनाकर खड़ा हो गया।
सोनू ने मेरे कान में फुसफुसाया, “साले, मौसी तो कमाल की माल निकली। देख उसकी गांड कैसे मटक रही है।”
मैंने मुँह से इशारा किया कि चुप रह, और हम दोनों झिरी से चिपके देखते रहे।
अंदर मौसी करवट बदलने लगी।
रोहन काका ने उसे उलटकर चारपाई पर पीठ के बल लिटा दिया और उसकी टाँगें फैलाकर अपना लंड फिर अंदर घुसा दिया।
मौसी ने कराहते हुए अपनी बाहें उसके गले में डाल दीं और उसके होंठों को चूमने लगी।
रोहन ठोकते-ठोकते मौसी के दूध भरे दूध के बर्तन जैसी चूचियों को दबाता, और उसके निप्पल चूसता।
मौसी की चूचियाँ उसके हाथों में से बाहर निकल आतीं, इतनी भारी थीं।
रोहन बार-बार कहता, “नीलम, तेरी चूत कितनी गरम है। तेरी चूचियाँ तो लड़की जैसी हैं। तू तो पूरी रंडी है।”
और मौसी हँसती हुई कहती, “तो तू चोद ना रोहन, चोद अपनी रंडी को।”
यह सब देखकर मेरे अंदर का आदमी जाग गया।
मैंने सोनू को इशारा किया और हम दोनों ने कमरे का दरवाज़ा धीरे से धक्का देकर खोला।
दरवाज़े की चरमराहट से मौसी और रोहन दोनों एकबारगी रुक गए और मुड़कर देखने लगे।
मौसी की आँखें फैल गईं, चेहरा शरम से लाल हो गया, और वो हड़बड़ाकर चादर खींचने लगी, लेकिन रोहन काका ठहाका लगाकर हँस पड़े।
“अरे, वेद और सोनू! कब आए? कुछ सुना?” रोहन काका ने बेझिझक होकर कहा, जैसे चुदाई करना कोई पाप न हो।
मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, “काका, हम तो दस मिनट से खिड़की से सब देख रहे थे। मौसी तो कमाल कर रही हैं।”
मौसी ने चादर सँभालते हुए कहा, “हाय राम, तुम दोनों ने मुझ बेचारी को शरमा दिया। तुम्हारी मम्मी को पता चल गया तो सारी इज़्ज़त खत्म।” लेकिन उनकी आवाज़ में शरम से ज़्यादा एक मीठी बेचैनी थी।
रोहन काका ने मेरी तरफ़ देखा, फिर सोनू की तरफ़, और मुस्कुराते हुए बोले, “नीलम जी, अब इन्हें शरमाने का क्या? ये दोनों भी जवान मर्द हैं। तेरे घर आए हैं, तेरी चुदाई देख ली, अब इन्हें भी तेरा स्वाद लेने दो।”
फिर मेरी तरफ़ मुड़कर बोले, “वेद, तेरा लंड खड़ा है? निकाल। मौसी को अकेले-अकेले चोदना है या सब मिलकर गैंगबैंग करना है?”
यह सुनकर मेरे अंदर की झिझक गायब हो गई। मैंने कमर से बेल्ट खोली और पैंट नीचे गिरा दी।
मेरा सात इंच का लंड, जो अब तक पैंट में कैद था, झटके से बाहर निकला और हवा में सीधा खड़ा हो गया, सिरा लाल और चमकता हुआ।
सोनू ने भी अपनी पैंट खोली — और जब उसका दस इंच का लंड बाहर निकला, तो मौसी की आँखें सचमुच बड़ी हो गईं।
वो बेसाख्ता बोल पड़ीं, “हे भगवान, इतना बड़ा? सोनू, ये तो बैल का है।”
सोनू शरमाकर मुस्कुराया, “मौसी, अब तो सब तेरा है।”
रोहन काका ने चादर खींचकर मौसी को पूरा नंगा कर दिया।
मौसी के भारी दूध के चूचियाँ, गोल गांड, चौंतीस की पतली कमर, और बीच में घनी काली झाँट से ढकी उनकी बुर — सब खुला पड़ा था।
मौसी की बुर गीली चमक रही थी, अभी-अभी चुदी थी, होंठ फूले हुए, और रस की धार उसकी जाँघों तक बह आई थी।
उसके निपल्स अब भी सख़्त खड़े थे।
मौसी ने अपने बाल पीछे किए, गहरी साँस ली और बोली, “तो चलो, आज तीनों मिलकर इस बेचारी को चोदो। एक-एक करके आओ, मेरी चूत में ताक़त है।”
यह सुनते ही रोहन काका ने मौसी को अपनी गोद में खींच लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
दोनों की जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं।
रोहन मौसी के मुँह को ऐसे चूम रहा था जैसे प्यासा पानी पी रहा हो, और मौसी भी बराबरी से जवाब दे रही थी, “म्म्म… म्म्म…” की आवाज़ करती हुई।
स्मूच-स्मूच की आवाज़ें पूरे कमरे में गूँज रही थीं।
मैंने आगे बढ़कर मौसी की गर्दन पर होंठ लगाए और धीरे-धीरे चूमते हुए उसके कंधे तक पहुँचा।
मौसी ने सिर पीछे किया और आँखें बंद कर लीं, “आह वेद… तेरे होंठ कितने नरम हैं…”
सोनू ने मौसी के पीछे से उसकी कमर पकड़ ली और उसकी गांड पर होंठ लगाने लगा।
वो गांड जो बयालीस इंच की थी, उसे चूमते-चूमते सोनू बोला, “मौसी, तेरी गांड तो मखन जैसी है। इसे तो चूम-चूम कर खा जाऊँ।”
और मौसी हँसकर कहती, “खा ले सोनू, आज सब कुछ तुम्हारा है।”
अब मैं मौसी के सामने बैठ गया और उसकी भारी चूचियों को अपने हाथों में ले लिया।
दूध के इतने भारी थे कि एक हाथ में पूरी तरह सँभलते ही नहीं थे।
मैंने उन्हें दबाया, ऊपर-नीचे किया, और फिर उनके बड़े-बड़े निपल्स को अपने होंठों में ले लिया।
निपल्स मुँह में आते ही ऐसे लगे जैसे किसी रसीले फल का सिरा हो।
मैं चूसने लगा, जीभ से उन्हें सहलाने लगा, और मौसी पूरी तरह पिघल गई।
“आह वेद… ऐसे ही चूस… मेरे निप्पल… मेरे दूध… मुझे और चूस…” वो मेरा सिर पकड़कर मेरे मुँह को अपने दूध से दबाने लगी।
मैं बारी-बारी से दोनों निपल्स चूसता, और जब एक को छोड़कर दूसरे पर जाता, तो मौसी पूरी देह हिला देती।
इधर रोहन काका मौसी के बाल पकड़कर उसका मुँह अपनी तरफ़ खींचते और उसके होंठ चूमते, और सोनू पीछे से उसकी गांड को चूम-चूम कर दबाता।
मौसी अब तीनों के बीच फँसी हुई, एक-एक के हाथ में, एक-एक के होंठों में, पूरी तरह भीग चुकी थी। उसकी बुर से रस बहकर जाँघों पर चमकने लगा था।
फिर मैंने मौसी को चारपाई पर लिटाया और उसकी टाँगें फैलाकर उसकी बुर के सामने घुटने टेक दिए।
उस घनी झाँट के बीच से उसकी बुर के फूले हुए होंठ साफ़ दिख रहे थे, गीले और चमकते।
मैंने अपनी जीभ निकालकर पहले उसकी जाँघों पर फेरी, फिर धीरे-धीरे बुर के होंठों पर।
मौसी झटके से हिल गई, “आह… वेद… वहीं… वहीं चाट… ऐसे ही जीभ घुमा…”
मैंने पूरी जीभ से उसकी बुर चाटनी शुरू की, ऊपर से नीचे, और फिर अंदर तक।
मौसी की चूत का रस मीठा और नमकीन-सा लग रहा था।
मैं बुर को चूसने लगा, होंठों में भरकर खींचने लगा, और जीभ से उसके ऊपर के दाने को सहलाने लगा।
मौसी की कमर चारपाई से उठ गई और वो मेरे सिर को अपनी जाँघों से दबाने लगी, “हाय वेद, मर गई… ऐसे ही… ऐसे ही चूस मेरी बुर…”
रोहन काका ने पीछे से मौसी की गांड के गड्ढे पर अपनी जीभ लगाई, और सोनू ने मौसी के होंठ चूमने शुरू कर दिए।
इस तरह मौसी तीन मुँहों से एक साथ चूमी जा रही थी — ऊपर होंठ, नीचे बुर, और पीछे गांड।
मौसी पूरी तरह पागल हो चुकी थी, बार-बार कराहती और बेबाक होकर बोलती, “तीनों चोदो मुझे… तीनों एक साथ… मेरी चूत सबकी है आज…”
रोहन काका से ज़्यादा सब्र नहीं हुआ।
उसने मौसी को घुटनों के बल कर दिया, उसकी बयालीस इंच की गांड ऊपर उठा दी और अपना मोटा लंड मौसी की चूत के मुँह पर रखकर ज़ोर से एक झटके में अंदर घुसा दिया।
मौसी ज़ोर से चीखी, “आआआह… रोहन… तेरा लंड… मेरी चूत में… ऐसे ठोक मुझे…” और रोहन ठोकने लगा, पहले धीरे-धीरे, फिर तेज़-तेज़।
हर ठोकर पर उसकी जाँघें मौसी की गांड से टकरातीं और “थप-थप” की आवाज़ आती।
मौसी की चूचियाँ झूल रही थीं, और मैंने सामने खड़े होकर उन झूलती चूचियों को अपने हाथों में पकड़ लिया, उन्हें दबाया और निपल्स चूसने लगा।
मौसी एक साथ पीछे से चुद रही थी और आगे से दूध चुसवा रही थी।
“चोद रोहन… ज़ोर से चोद… मेरी चूत फाड़ दे… तेरी रंडी को चोद…” मौसी बेबाक होकर गालियाँ बक रही थी और रोहन भी जवाब में, “ले नीलम, ले रंडी, तेरी चूत कितनी गरम है… ले मेरा लंड पूरा अंदर… ले-ले-ले…” पूरे कमरे में पसीने, चूत के रस और चुदाई की आवाज़ें गूँज रही थीं।
सोनू ने पीछे जाकर मौसी के होंठ चूमे और उसके कान में फुसफुसाया, “मौसी, अब तैयार हो? मेरा दस इंच का लंड अंदर जाएगा, तो मज़ा आएगा।”
मौसी ने पीछे मुड़कर सोनू को देखा, आँखों में प्यास और भूख साफ़ थी, “आ जा सोनू, तेरा बड़ा लंड देखकर तो मेरी चूत और गरम हो गई। डरती हूँ कि फाड़ देगा, लेकिन आज फटने दो।”
रोहन काका कुछ देर और ठोकता रहा, फिर बाहर निकल आया।
उसका लंड मौसी के रस से लथपथ, लाल-लाल चमक रहा था। मौसी की चूत खुली हुई, फैली हुई, और उसमें से सफ़ेद-सफ़ेद रस बह रहा था।
अब सोनू आगे आया। उसने अपना दस इंच का लंड मौसी की बुर के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे धकेलने लगा।
मौसी की आँखें बंद हो गईं, वो होंठ दबाकर रह गई, “हाय… इतना मोटा… धीरे सोनू… धीरे…” सोनू ने पहले सिरा घुसाया, फिर थोड़ा और, और जब आधा लंड अंदर गया, तो मौसी ने कराहकर कहा, “आह… मर गई… पूरा अंदर है क्या?”
सोनू मुस्कुराया, “अभी आधा है मौसी, आराम से ले।” और फिर एक झटके में बाकी भी अंदर घुसा दिया।
मौसी ज़ोर से चीख पड़ी और उसकी आँखों से पानी आ गया — मज़े का पानी। “हाय राम… इतना बड़ा… मेरी चूत फट गई… लेकिन कितना अच्छा लग रहा है… ऐसे ही ठोक सोनू… ऐसे ही अपनी रंडी को चोद…”
सोनू ठोकने लगा। दस इंच का लंड हर बार पूरा अंदर जाता, और मौसी की चूत के होंठ लंड के साथ अंदर-बाहर होते।
मौसी की गांड हर ठोकर पर लहराती, और उसकी चूचियाँ झूलती।
मैंने फिर आगे जाकर उसकी चूचियाँ दबाईं, निपल्स चूसे और होंठों पर होंठ रखकर स्मूच किए।
मौसी मेरे होंठ चूमती हुई सोनू के ठोकरों का मज़ा ले रही थी। रोहन काका पीछे खड़े मुस्कुरा रहे थे और मौसी की गांड को सहला रहे थे।
“वेद, देख तेरी मौसी कैसे ले रही है दस इंच,” रोहन काका हँसकर बोले, “ये तो पक्की रंडी निकली।”
मौसी ने सोनू के होंठ चूमते-चूमते कहा, “हाँ, तेरी रंडी हूँ, तीनों की रंडी… आज तीनों मिलकर चोदो… जितना चाहो चोदो… मेरी चूत में सबकी ताक़त झेलने की हिम्मत है…”
अब पूरा कमरा जंगल बन गया था।
मौसी घुटनों के बल थी, सोनू उसकी चूत में लंड ठोक रहा था, मैं आगे खड़े होकर उसके दूध चूस रहा था, और रोहन काका पीछे से उसकी गांड के गड्ढे को अपनी उँगली से खोलकर उसमें अपना मोटा लंड धकेलने की तैयारी कर रहे थे।
मौसी को जब पता चला कि रोहन उसकी गांड में भी डालने वाला है, तो वो और भड़क गई, “हाँ रोहन, गांड में भी डाल… आज पूरी चूत और गांड दोनों भर दो… एक के बाद एक सब करो मेरे साथ…”
रोहन काका ने मौसी की गांड पर थूका, उसे अच्छी तरह चिकना किया, और अपना लंड उसके गड्ढे पर रखा।
मौसी ने गहरी साँस ली और रोहन ने धीरे-धीरे धकेला।
पहले गड्ढा कसा हुआ था, लेकिन जैसे ही लंड अंदर गया, मौसी की आँखें बंद हो गईं, “आआह… गांड में भी… हाय राम… दोनों जगह भर गई… कितना अच्छा लग रहा है…” अब मौसी की चूत में सोनू का दस इंच और गांड में रोहन का मोटा लंड एक साथ ठोक रहे थे।
दोनों की गति अलग-अलग थी, और मौसी दोनों का मज़ा एक साथ ले रही थी।
उसकी चूचियाँ मेरे मुँह में थीं, निपल्स चुसाए जा रहे थे, होंठ होंठों से लिपटे थे, चूत और गांड दोनों भरी थीं — मौसी पूरी तरह तीन आदमियों की रंडी बन चुकी थी।
“थप-थप-थप” की आवाज़ें, पसीने की बूँदें, चूत के रस की धार, गालियाँ और कराहटें — सब एक साथ।
मौसी कभी सोनू को चूमती, कभी मुझे, कभी रोहन के हाथ को अपनी चूची पर दबाती।
बीच-बीच में वो बेबाक होकर बोलती, “तीनों मेरे लंड… तीनों की रंडी… चोदो-चोदो-चोदो… मेरी बुर में, मेरी गांड में, मेरे दूध में… सब जगह भर दो…”
कुछ देर बाद सोनू की साँसें भारी होने लगीं, उसने कहा, “मौसी, मेरा निकलने वाला है… कहाँ डालूँ?”
मौसी ने बिना झिझक कहा, “अंदर डाल सोनू… मेरी चूत में डाल… आज पूरी भर दे मुझे…” और सोनू ने कुछ ज़ोरदार ठोकरों के बाद अपना सारा रस मौसी की चूत के अंदर उँडेल दिया।
मौसी की देह ऐंठ गई, और वो लंबी साँस छोड़ते हुए बोली, “आह… गरम… कितना गरम डाला… मेरी चूत जल गई…” सोनू बाहर निकला, और उसके लंड से चूत का रस और वीर्य मिला हुआ टपकता रहा।
अब रोहन काका ने भी रफ़्तार बढ़ा दी।
उसने मौसी की गांड को दोनों हाथों से पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से ठोका, और मौसी के कान में गाली देते हुए बोला, “ले रंडी, ले अपनी गांड में… तेरी गांड कितनी कसी है… मेरा लंड निकलने वाला है… ले अंदर… ले सारा…” और उसने अपना वीर्य मौसी की गांड के अंदर भर दिया।
मौसी कराह उठी, “आह रोहन… गांड में भी भर दिया… आज तो मेरी चूत और गांड दोनों लाल हो गईं…”
अब सिर्फ़ मैं बचा था। मौसी पूरी तरह थकी, पसीने से लथपथ, लेकिन उसकी आँखों में अब भी भूख बाक़ी थी।
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई और बोली, “आ जा वेद, अब तेरी बारी। तेरा सात इंच भी कम नहीं है। आज तू भी अपनी मौसी को चोद।”
उसने खुद चारपाई पर पीठ के बल लेटकर अपनी टाँगें फैला दीं और मुझे अपने ऊपर खींच लिया।
मैंने अपना लंड मौसी की गीली, वीर्य से भरी चूत में घुसाया।
चूत इतनी चिकनी थी कि लंड एक झटके में पूरा अंदर चला गया।
मौसी ने कराहकर मेरी कमर को अपनी टाँगों से जकड़ लिया और बोली, “हाँ वेद… ऐसे ही… अपनी मौसी को चोद… मेरे दूध चूस… मेरे होंठ चूम… सब कर…”
मैं ठोकते-ठोकते उसके होंठ चूमता, उसकी चूचियाँ दबाता, निपल्स चूसता, और कभी-कभी झुककर उसकी गर्दन पर होंठ लगाता।
मौसी की कमर मेरे नीचे उठ-गिर रही थी, और उसकी गांड हर ठोकर पर मेरी जाँघों से टकराती।
रोहन काका और सोनू दोनों पास बैठे हमें देख रहे थे।
रोहन बोले, “वेद, मौसी को क्या पता तेरा भी बड़ा है। ज़ोर से चोद, ये रंडी और माँगेगी।”
और मौसी हँसते हुए बोली, “हाँ, और माँगूँगी… और चोदो… तीनों फिर आओ…”
कुछ देर ठोकने के बाद मैंने मौसी को घुमाकर डॉगी स्टाइल में कर दिया।
उसकी बयालीस इंच की गांड फिर ऊपर उठी, और मैंने पीछे से पकड़कर ठोकना शुरू किया।
इस बार मौसी की गांड पर हाथ रखकर मैं झुक-झुक कर उसके होंठ चूमता और उसके कान में गालियाँ बकता, “ले मौसी, ले… तेरी चूत कितनी गरम है… तू तो पक्की रंडी है…” और मौसी जवाब देती, “हाँ रंडी हूँ तेरी… चोद-चोद… मेरी चूत में डाल दे अपना सारा…”
जब मेरा निकलने का वक़्त आया, मौसी ने पीछे मुड़कर कहा, “वेद, मेरे दूध पर डाल… मेरे चूचियों पर डाल अपना रस…” मैंने तेज़ ठोकरें मारीं और अपना सारा वीर्य मौसी की चूचियों और गले पर उँडेल दिया।
सफ़ेद रस मौसी के दूध और निपल्स पर बहकर चमकने लगा।
मौसी ने उसे अपनी उँगली से लेकर चखा और मुस्कुराते हुए बोली, “आज तो तीनों ने मिलकर मुझे पूरा भर दिया। मेरी चूत, गांड, चूचियाँ — सब तुम्हारी हो गईं।”
तीनों पसीने से लथपथ, थके हुए, लेकिन पूरी तरह तृप्त होकर चारपाई पर लेट गए। मौसी बीच में थी, हम तीनों उसके चारों तरफ़।
उसने हम सबके हाथ पकड़कर अपनी चूचियों और गांड पर रख दिए और बोली, “ये घर अब तुम्हारा है। जब भी मन करे, आ जाओ, मौसी तैयार मिलेगी।”
रोहन काका हँसकर बोले, “नीलम जी, अब तो माली की भी छुट्टी हो गई। बगीचे के साथ-साथ ये फूल भी खिलता रहेगा।” और हम सब हँस पड़े।
अगले दिन मौसी की बेटी रानू गाँव से आई। अठरह की गोरी, चंचल, मासूम पर जिस्म में माँ की छाप।
मौसी ने हमें इशारा किया, “अब इसकी बारी।” उस रात सोनू और मैंने मिलकर रानू की कच्ची बुर और चूचियाँ चूसकर उसकी कौमार्य भरी चूत फाड़ दी — डॉगी, मिशनरी, सब करके उसे भी रंडी बना दिया।
NEXT PART: मौसी अपनी बेटी को हमसे ग्रुप में चुदवाई
- माँ को चुदते देख बहन को चोदा भाई ने
- मास्टर जी ने मुझे चोदकर गाभिन किया
- मैंने अपनी वर्जिन वाइफ को चोदा
- मैंने पड़ोसन भाभी को मस्ती के साथ चोदा
नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।
Very nice story………
Kahan se ho shiksha? Chodwaogi??