मेरी पत्नी की ग्रुप चुदाई

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उस महीने मैंने प्लान बनाया, जैसा रुक्मणी ने कहा था। और प्लान बनाते-बनाते मुझे समझ आया कि ये काम सोचने से ज़्यादा मुश्किल है। क्योंकि इस बार चार लोग थे, और चार लोगों में हिसाब रखना पड़ता है — कौन कहाँ रहेगा, कौन कब आएगा, कौन किसके साथ होगा। रुक्मणी ने मुझे टोकना बंद कर दिया था। वो बस बैठकर देखती रहती, और जब मैं कुछ तय करता, तो हल्का सा सिर हिला देती — न हाँ, न ना, बस एक हल्की सी हुकूमत।

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे रंडी सोच वाली लड़की से शादी, सुहागरात और रंडीबाजी

जगह इस बार हमारा ही घर था। नया फ्लैट, नया कमरा, नया बिस्तर। रुक्मणी ने कहा था — “पहली बार घर में। बाहर नहीं।” और मैं समझ गया था कि वो चाहती थी कि जिस कमरे में हम रोज़ सोते हैं, उसी कमरे में एक और कहानी लिखी जाए।

तारीख़ तय हुई — महीने के आख़िरी शनिवार। समय — शाम सात बजे। मैंने डेविड को बुलाया, और मीरा को बुलाया। दोनों को एक ही लाइन लिखी — “साढ़े छह बजे। कपड़े ढीले पहनना।”

मीरा ने जवाब में लिखा — “ढीले क्यों?”

“क्योंकि उतारने में मज़ा आएगा,” मैंने लिखा।

उसने इमोजी भेजी — एक हँसता हुआ चेहरा, और उसके बाद एक आँख मारती हुई।

रुक्मणी ने मेरा फोन देखा और बोली — “तुम मीरा से फ़्लर्ट कर रहे हो।”

“थोड़ा,” मैंने कहा।

“अच्छा है,” उसने कहा। “इससे रात आसान होगी।”

उस शनिवार की शाम पाँच बजे से ही रुक्मणी तैयार होने लगी। इस बार उसने कोई नया कपड़ा नहीं खरीदा था — उसने वही काला सेट निकाला जो उसने पिछली बार पहना था। कहा — “याद बनी रहे।”

मैंने शॉवर लिया, हल्का खाना बनाया — सिर्फ़ सलाद, ब्रेड, और एक हल्का सूप, ताकि पेट भारी न हो। घर की लाइट धीमी कर दी, और कमरे में एक हल्की इत्र की खुशबू छोड़ दी।

साढ़े छह बजे दरवाज़ा बजा। मीरा थी।

उसने स्लिम जींस और ढीली सफ़ेद कमीज़ पहनी थी, और बाल ऊपर बाँधे हुए थे। हाथ में छोटा सा बैग। अंदर आई, जूते उतारे, और रुक्मणी को गले लगा लिया — दोनों ने एक-दूसरे के गाल पर किस किया, और वो किस सामान्य से ज़्यादा देर चला।

फिर मीरा मेरी तरफ़ मुड़ी, और हाथ मिलाकर बोली — “सूरज।”

“मीरा जी,” मैंने कहा।

“जी नहीं,” उसने कहा। “सिर्फ़ मीरा। आज रात जी नहीं चलेगा।”

रुक्मणी हँसी और बोली — “देखा, मैंने कहा था ना, ये खुली है।”

फिर सात बजे डेविड आया।

वो अंदर आया तो कमरे की हवा थोड़ी भारी हो गई — इसलिए नहीं कि वो बोझ था, बल्कि इसलिए कि वो लंबा और शांत था, और उसकी शांति में एक भरोसा था। उसने सबसे हाथ मिलाया, और जब रुक्मणी से हाथ मिलाया, तो उसने एक सेकंड ज़्यादा देखा — वही शांत, गहरी नज़र जो रुक्मणी को पिछली बार सबसे ज़्यादा पसंद आई थी।

“आ गए,” रुक्मणी ने कहा।

“आ गया,” डेविड ने कहा। और बस।

हमने बैठकर खाया। चारों मेज़ पर। बातें हल्की थीं — मीरा ने अपने काम की बात की, डेविड ने दिल्ली की ट्रैफ़िक की, रुक्मणी ने कुछ नहीं कहा, बस सबको देखती रही और मुस्कुराती रही।

मैंने देखा कि रुक्मणी ने जान-बूझकर मीरा के बग़ल में बैठना चुना था, और डेविड मेरे सामने था। यानी वो चाहती थी कि पहले मीरा उसके पास हो।

खाना ख़त्म हुआ। प्लेटें उठीं। और फिर मैंने लाइट और धीमी कर दी।

यही इशारा था।

रुक्मणी उठी, और सबसे पहले मीरा की तरफ़ बढ़ी। उसने मीरा का चेहरा दोनों हाथों में लिया और उसे चूम लिया — बिना किसी झिझक के, सीधे होंठों पर। मीरा ने आँखें बंद कर लीं और उसके हाथ रुक्मणी की कमर पर चले गए।

डेविड और मैं किनारे खड़े देखते रहे।

दोनों औरतें कुछ देर चूमती रहीं — धीमे, तोलकर, जैसे एक-दूसरे को याद कर रही हों। फिर मीरा ने रुक्मणी के कुर्ते की ज़िप खींची। कुर्ता उतरा। नीचे काली ब्रा, जिसमें रुक्मणी के दूध भरे हुए थे। मीरा ने उन्हें देखा, और फिर धीमे से बोली — “तू तो और भरी हो गई है।”

“शादी का असर,” रुक्मणी ने हँसकर कहा।

“अच्छा असर है,” मीरा ने कहा, और ब्रा खोल दी।

रुक्मणी के दूध सामने आए — भारी, गोल, ऊपर उठे हुए, और निपल्स कठोर। मीरा ने दोनों हाथों में एक-एक दूध भरा, और उन्हें धीरे-धीरे दबाया। फिर वो झुकी और एक निप्पल को मुँह में ले लिया।

रुक्मणी ने सिर पीछे कर दिया और एक लंबी साँस छोड़ी।

“सूरज,” उसने आँखें बंद करके कहा, “देख रहे हो?”

“देख रहा हूँ,” मैंने कहा।

“अच्छा लग रहा है?”

“बहुत।”

मीरा ने दूसरा निपल भी मुँह में ले लिया, और बारी-बारी दोनों पर जीभ फेरने लगी। दोनों निपल्स कुछ ही सेकंड में लाल, गीले और कठोर हो गए। रुक्मणी की साँसें तेज़ हो गईं, और उसने मीरा के बालों में हाथ डालकर उसे अपने सीने पर दबा लिया।

तभी डेविड पास आया। उसने रुक्मणी के पीछे खड़े होकर उसके बाल एक तरफ़ किए, और गर्दन पर होंठ रख दिए। रुक्मणी ने आँखें खोलकर मुझे देखा — और उस नज़र में एक बात थी — “अब तुम।”

कमरे में चले। रुक्मणी ने मुझे बुलाया — “सूरज, पहले तुम।”

मैं आया। उसने मेरी कमीज़ उतार दी, और मेरी पैंट की बेल्ट खोली। जब पैंट नीचे गई, तो मीरा ने देखा — और उसने होंठ खोलकर एक नर्म सी आवाज़ निकाली।

“हे भगवान,” मीरा ने कहा। “तो ये सच था।”

“सच ही था,” रुक्मणी ने गर्व से कहा।

मीरा ने हाथ बढ़ाकर मेरे लंड को मुट्ठी में थामा — नापा, दबाया, और फिर हल्का सा सहलाया। उसकी हथेली में एक भरोसा था, जैसे वो ये काम बहुत बार कर चुकी हो। उसने आँखें उठाकर मुझे देखा और मुस्कुरा दी।

“ठीक है,” उसने कहा। “अब समझ आया कि रुक्मणी तुझे क्यों छोड़ नहीं रही।”

“अब छोड़ नहीं सकती,” रुक्मणी ने कहा। “ब्याह हो गया है।”

डेविड भी नंगा हो गया। उसका लंड लंबा और सीधा था, और मीरा ने उसे देखकर भौंहें उठाईं — वो भौंहें जो कहती हैं कि “ओह, ये भी अच्छा है।”

अब चारों नंगे थे। चार शरीर, एक कमरा, एक बिस्तर।

रुक्मणी ने मुझे बिस्तर पर बिठाया और खुद मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गई। फिर उसने मेरा लंड मुँह में ले लिया। मीरा उसके पीछे आई, और रुक्मणी की गांड पर हाथ फेरने लगी — दोनों पाट थामकर फैलाए, और फिर नीचे झुककर उसकी बुर पर जीभ रख दी।

रुक्मणी ने मेरे लंड के साथ मुँह में एक आवाज़ निकाली — दबी हुई, गरम। उसका पूरा शरीर एक लय में हिलने लगा — आगे से मेरा लंड, पीछे से मीरा की जीभ।

डेविड पास आया और रुक्मणी के दूध को पीछे से पकड़कर दबाने लगा। अब रुक्मणी चारों तरफ़ से घिरी हुई थी — मुँह में मेरा लंड, बुर पर मीरा की जीभ, दूध डेविड के हाथों में, और गांड मीरा के हाथों में।

कुछ मिनट में ही उसकी साँसें बेतरतीब हो गईं। मीरा ने जीभ तेज़ की, और डेविड ने निप्पल को उँगलियों से घुमाया। रुक्मणी का पहला झड़ापा आया — लंबा, काँपता हुआ। उसने मेरे लंड को मुँह से निकाल दिया और मेरी जाँघ पर सिर रखकर साँस लेने लगी।

“पहला,” उसने हाँफते हुए कहा। “और आगे भी है।”

अब मीरा पलंग पर लेटी। रुक्मणी ने उसकी जींस और कमीज़ उतारी — धीरे-धीरे, जैसे तोहफ़ा खोल रही हो। जब मीरा की ब्रा खुली, तो उसके दूध सामने आए — रुक्मणी से भी भरे, और निपल्स गहरे, चौड़े। उसकी बुर भी घनी थी, और पहले से गीली।

रुक्मणी ने मीरा की तरफ़ देखकर कहा — “देखो, ये भी तैयार है।”

“तूने ही तैयार किया,” मीरा ने हँसकर कहा।

अब मैं मीरा के पैरों के बीच आया। कंडोम लगाया, और धीरे से अंदर बढ़ा। मीरा की बुर रुक्मणी से थोड़ी कसी हुई थी, और उसने अंदर आते ही एक गहरी साँस ली। जब पूरा अंदर गया, तो उसने मेरी गर्दन में हाथ डालकर मुझे नीचे खींच लिया।

“धीरे से शुरू कर,” उसने कहा। “फिर देखेंगे।”

मैंने धीमे धक्के शुरू किए। मीरा की बुर हर धक्के पर मुझे कसकर पकड़ती। और तभी रुक्मणी ने पीछे से मीरा के दूध पकड़ लिए, और ऊपर से झुककर उसके निप्पल चूसने लगी। मीरा ने चीखकर सिर पीछे कर दिया।

डेविड मीरा के सिर के पास आया और उसके मुँह में अपना लंड रख दिया। अब मीरा एक साथ दो जगह भरी हुई थी — नीचे मैं, ऊपर डेविड, और उसके दूध पर रुक्मणी।

ये दृश्य देखकर मुझे अपने आप पर गर्व होने लगा — क्योंकि ये सब मेरे प्लान से चल रहा था, और मैंने इसे बनाया था।

कुछ मिनट में मीरा झड़ी — लंबा, काँपता हुआ। उसने मेरी पीठ पर नाखून चलाए और पूरा शरीर तन गया। मैंने गति बढ़ाई और छोड़ दिया। फिर डेविड भी मीरा के मुँह में छोड़ दिया।

अब बारी रुक्मणी की।

रुक्मणी पलंग पर लेटी और उसने आईने की तरफ़ देखा — हमारे कमरे में भी शीशा था, जो उसने खुद लगवाया था। उसने खुद को देखा, और फिर मुझे देखा।

“जो तुम कहो,” उसने कहा।

मैंने कहा — “पहले डेविड।”

रुक्मणी ने सिर हिलाया और मुस्कुरा दी। वो समझ गई कि मैं क्या कर रहा हूँ — मैं उसे उसके शरीर की पूरी रात दे रहा हूँ, और खुद किनारे से देखने का मज़ा ले रहा हूँ।

डेविड आया। उसने रुक्मणी को घुटनों और हाथों पर लाया, और पीछे से धीरे से अंदर डाला। लंबा और गहरा। रुक्मणी ने गहरी साँस ली और सिर नीचे कर दिया।

मीरा उसके नीचे लेट गई, और उसकी बुर पर जीभ रख दी। अब रुक्मणी पीछे से भरी हुई थी और आगे से चाटी जा रही थी — और मीरा की जीभ ठीक उसी जगह थी जहाँ डेविड का लंड अंदर-बाहर हो रहा था। हर धक्के पर रुक्मणी की गांड हिलती, और मीरा की जीभ उसे मिलती।

रुक्मणी की आवाज़ें बढ़ गईं। उसने गांड पीछे धकेलनी शुरू की — अब वो भी धक्के दे रही थी। मैं किनारे पर खड़ा था, और मेरा लंड ऐसा खड़ा था कि लगा फट जाएगा।

फिर डेविड ने उसे पलटकर पीठ के बल लिटाया, पैर अपने कंधों पर उठाए, और फिर अंदर डाला। इस पोज़िशन में वो और गहरा जाता था। रुक्मणी के दूध ऊपर-नीचे लहराने लगे। मीरा ने उन्हें थाम लिया और बारी-बारी निपल्स चूसने लगी।

मैं पलंग के सिरे पर आया और अपना लंड रुक्मणी के मुँह में डाल दिया। अब वो तीन जगह भरी थी — मुँह, बुर, और दूध।

कुछ मिनट बाद डेविड ने गति बढ़ाई। रुक्मणी की साँसें फूल गईं, और फिर उसका झड़ापा आया — इस बार बहुत लंबा, बहुत तेज़। उसके पैर डेविड की पीठ पर कस गए। डेविड ने कुछ और धक्के दिए और छोड़ दिया।

फिर मीरा ने कहा — “अब मेरी बारी।”

अब कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था।

मीरा पलंग पर लेटी और उसने रुक्मणी को अपने ऊपर बुलाया। दोनों औरतें एक-दूसरे के ऊपर लेटीं — मीरा नीचे, रुक्मणी उसके ऊपर, दोनों की बुरें एक-दूसरे पर। और फिर मीरा ने मेरी तरफ़ देखकर कहा — “अब तुम आओ। और ऊपर से।”

मैं ऊपर आया। मैंने धीरे से अंदर डाला — और दोनों बुरों के बीच से गुज़रते हुए, जैसे एक गरम, गीली, नरम सुरंग में। रुक्मणी ने और मीरा ने दोनों ने एक साथ आवाज़ निकाली।

मैंने धीमे धक्के शुरू किए। हर धक्के पर दोनों शरीर हिलते, दोनों की साँसें मिलतीं, और उनके दूध एक-दूसरे से रगड़ खाते। उनके निपल्स आपस में टकराते — चार निपल्स, कठोर, गीले, एक-दूसरे पर रगड़ते हुए।

रुक्मणी ने मेरी गर्दन पकड़ी और मेरे कान में कहा — “तुमने प्लान बनाया था ये?”

“नहीं,” मैंने कहा, “ये तो बोनस है।”

वो हँसी — भीगी हुई हँसी — और फिर मीरा के होंठों पर झुककर उसे चूम लिया। दोनों औरतें मेरे नीचे एक-दूसरे को चूम रही थीं, और मैं दोनों के बीच अंदर-बाहर हो रहा था।

कुछ मिनट में दोनों की साँसें बेतरतीब हो गईं। मीरा पहले झड़ी, फिर रुक्मणी — एक-दूसरे के साथ, एक-दूसरे की बाँहों में। और जब दोनों काँप रही थीं, तब मैंने भी छोड़ दिया।

हम तीनों कुछ देर हिलते रहे, और फिर थम गए।

डेविड अब तक किनारे बैठा देख रहा था — शांत, मुस्कुराता हुआ। मीरा ने उसकी तरफ़ देखकर कहा — “तुम इतने शांत क्यों हो? आओ ना।”

डेविड आया। उसने मीरा को घुटनों पर लाया और पीछे से अंदर डाला। मीरा ने गहरी साँस ली। और रुक्मणी उसके सामने बैठी और उसकी बुर पर उँगली फेरने लगी — ठीक वहीं, जहाँ डेविड जा रहा था।

मैं पीछे से रुक्मणी के पास आया और उसकी गांड पर हाथ रखा। उसने मेरी तरफ़ देखकर सिर हिलाया — और मैंने अपना लंड उसके गुदा के मुँह पर रख दिया।

“आहिस्ता,” उसने कहा। “पहली बार है।”

मैंने धीरे से दबाया। रुक्मणी की गांड ने पहले विरोध किया, फिर फैली, फिर नरम पड़ी। एक इंच, दो, तीन। उसकी साँस फूली हुई थी, और उसने मीरा का कंधा पकड़ लिया। फिर पूरा अंदर।

अब रुक्मणी की गांड मेरे लंड से भरी थी। उसने कुछ सेकंड लिए, और फिर धीरे से कहा — “अब चलो।”

मैंने धीमे धक्के शुरू किए। साथ ही मीरा के सामने, डेविड मीरा को चोद रहा था। चारों शरीर, दो जोड़े, एक ही कमरे में — और बीच-बीच में हाथ मिलते, होंठ मिलते, आवाज़ें मिलतीं।

कुछ देर बाद रुक्मणी ने कहा — “मुझे घुमाओ।”

हमने उसे करवट दिलाई — आधा लेटा, एक पैर ऊपर। और फिर डेविड उसकी बुर में आया, और मैं पीछे से उसकी गांड में। दोनों एक साथ, पूरी लय के साथ। रुक्मणी के अंदर दो लंड, बीच में सिर्फ़ एक दीवार।

रुक्मणी की आँखें बंद हो गईं, और उसने बार-बार “और… और…” कहा। मीरा उसके दूध चूस रही थी, और उसके निप्पल्स दाँतों में पकड़कर खींच रही थी।

फिर उसका आख़िरी झड़ापा आया — सबसे लंबा, सबसे फटा हुआ। उसने चीखा, और उस चीख में सब कुछ था — बस वाला दिन, पहली रात, चार लोग, छह लोग, शादी, मीरा, और ये कमरा।

डेविड ने कुछ और धक्के दिए और छोड़ दिया। और फिर मैंने भी — गहरे, बार-बार।

रुक्मणी पलंग पर पसर गई। चारों हाँफ रहे थे। कमरे में सिर्फ़ साँसों की आवाज़ थी।

रात के ग्यारह बजे के आसपास सब उठे। मीरा ने पानी पिया और फिर रुक्मणी के पास बैठ गई। दोनों ने कंबल ओढ़ लिया और एक-दूसरे के सहारे बैठ गईं। डेविड ने खिड़की खोल दी, और ठंडी हवा अंदर आई।

“अब क्या?” मीरा ने पूछा।

“अब आराम,” रुक्मणी ने कहा।

“और तुम्हारा पति?” मीरा ने मेरी तरफ़ देखकर कहा। “ये इतना शांत क्यों है?”

“क्योंकि इसने प्लान बनाया था,” रुक्मणी ने कहा। “और प्लान पूरा हो गया।”

डेविड हँसा। पहली बार उसने ज़ोर से हँसा। और वो हँसी कमरे में फैल गई, और सब हँसने लगे — थकी हुई, खुश हँसी।

रात एक बजे डेविड चला गया। मीरा रुक गई — कहा कि सुबह चलेगी। हम तीनों एक ही बिस्तर पर लेटे — मैं बीच में, रुक्मणी एक तरफ़, मीरा दूसरी तरफ़। दोनों ने मुझ पर हाथ रखे, और मुझे लगा कि शरीर भी एक घर हो सकता है।

सुबह मीरा ने नाश्ता बनाया — अंडे और टोस्ट, और चाय। हमने बालकनी में बैठकर खाया। मीरा ने रुक्मणी से कहा — “अच्छा लड़का है तेरा। संभाल के रख।”

“रखूँगी,” रुक्मणी ने कहा।

फिर मीरा गई। दरवाज़ा बंद हुआ, और हम दोनों बैठ गए।

रुक्मणी ने मेरी तरफ़ देखा, और फिर अपना बैग उठाकर नोटबुक निकाली।

“अभी?” मैंने पूछा।

“अभी,” उसने कहा।

“अब क्या लिख रही हो?”

उसने नोटबुक खोली, और नई लाइन पर एक नाम लिखा — सोनल।

“सोनल कौन?” मैंने पूछा।

“मेरी बुटीक में काम करती है,” उसने कहा। “पर बात सिर्फ़ उसकी नहीं है।”

“तो?”

रुक्मणी ने पेन रख दी, और मेरी तरफ़ मुड़कर बैठ गई। उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया — वो गंभीरता जो शरीर से नहीं, दिल से आती है।

“सूरज,” उसने कहा, “अब तक सब कुछ तुमने मेरे लिए किया। चार लोग, छह लोग, मीरा, डेविड। सब मेरे शरीर के लिए। पर तुम?”

“मैं क्या?”

“तुमने कभी किसी और औरत को नहीं चोदा,” उसने कहा। “सिर्फ़ मीरा को — वो भी आधा, उस रात जब मैं भी थी। और तुमने कभी शिकायत नहीं की। कभी नहीं कहा कि मेरी भी बारी है।”

“क्योंकि मुझे मज़ा आता है,” मैंने कहा।

“पता है,” उसने कहा। “इसलिए तुम्हें इनाम देना है।”

“इनाम?”

“एक रात,” उसने कहा। “सिर्फ़ तुम्हारी। बीच में तुम, चारों तरफ़ औरतें। तीन, चार, जितनी तुम कहो। और मैं बाहर खड़ी रहूँगी और देखूँगी — जैसे तुम मुझे देखते हो।”

मैं कुछ सेकंड चुप रहा।

“तो सोनल?” मैंने पूछा।

“सोनल पहली,” उसने कहा। “बाक़ी उसके बाद।”

और फिर उसने नोटबुक बंद करके मेरी गोद में सिर रख दिया, और धीमे से बोली — “अब बताओ, तुम्हें कैसी औरतें चाहिए? गोरी, काली, दुबली, भरी?”

मैंने उसके बालों में हाथ फेरा। और फिर वो कहा जो सच था — “जैसी तुम हो, वैसी।”

रुक्मणी हँसी, और उसकी हँसी मेरी जाँघ पर काँपी।

“ठीक है,” उसने कहा। “तो फिर वैसी ही ढूँढूँगी। पर एक शर्त — सब तुम्हारे प्लान पर होगा। जैसे आज।”

“तय है,” मैंने कहा।

दो साल बाद हम दोनों फिर उसी रूट पर गए।

ये मेरा ही आइडिया था — रुक्मणी की सालगिरह पर। मैंने उसे बस स्टॉप पर खड़ा किया, और कहा — “आज वापस जाना है।”

“कहाँ?”

“वहीं,” मैंने कहा। “जहाँ से शुरुआत हुई।”

बस आई — वो ही रूट, वो ही भीड़, वो ही धक्का-मुक्की। हम दोनों चढ़े, और मैंने रुक्मणी को अपने सामने खड़ा किया। उसने मुस्कुराकर पलटकर अपनी गांड मेरे लंड के पास कर दी — बिल्कुल उस पहले दिन की तरह।

बस हिली, और मेरा लंड उसकी गांड की दरार में बैठ गया।

रुक्मणी ने गर्दन घुमाकर मेरी तरफ़ देखा — बिल्कुल वैसे ही जैसे उस पहले दिन देखा था। और फिर धीमे से बोली — “पता है, आज भी वैसा ही लग रहा है।”

“क्या?”

“कि ये आदमी कुछ ज़्यादा ही ठीक है,” उसने कहा।

मैंने उसकी कमर पर हाथ रखा, और बस चल पड़ी। भीड़ थी, धक्के थे, हवा गरम थी — और मेरी पत्नी की गांड मेरे लंड पर। दो साल, चार लोग, छह लोग, मीरा, सोनल, और एक लिस्ट जो अब भी बढ़ रही थी — और उस सब के बीच, एक चीज़ जो कभी नहीं बदली।

रुक्मणी ने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी कमर पर कस लिया।

“अगला स्टॉप कहाँ?” उसने पूछा।

“अभी तय नहीं,” मैंने कहा।

“तो तय कर लो,” उसने कहा, और मुस्कुराकर सामने देखने लगी। “क्योंकि अब मैं उतरने वाली नहीं हूँ।”

बस चलती रही। भीड़ में दो शरीर एक-दूसरे से चिपके। और अगर कोई उस दिन उस बस में होता, और ध्यान से देखता, तो उसे पता चल जाता कि सिर्फ़ एक लड़की अपनी गांड एक आदमी के लंड पर रखकर खड़ी नहीं थी — वो दो लोग थे, जो एक-दूसरे को तब से जानते थे जब नाम भी नहीं पता था, और जो अब भी हर हिलती बस में एक-दूसरे को ढूँढ लेते थे।

पर रुक्मणी की लिस्ट कभी ख़त्म नहीं होती। और सोनल का नाम अभी बाक़ी है।

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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