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जून, 2026।
गोवा से लौटे हुए चार महीने हो गए थे। चार महीने में अजमेर वाले रिश्ते की तीन बार बात हुई, और तीनों बार काशिश ने टाल दिया — “अभी पढ़ाई बाक़ी है,” “अभी जल्दी क्या है,” “सोचने दीजिए।”
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे बहन की ख्वाहिश पर चार दोस्तों से चुदवाया
चौथी बार माँ ने टालना बंद कर दिया।
एक रविवार की दोपहर थी। पापा दोपहर की नींद ले रहे थे। मैं आँगन में बैठा फ़ोन देख रहा था और काशिश पास में बैठी अपने नाखून का रंग चढ़ा रही थी। माँ आई, दो गिलास नींबू-पानी रखे, और सामने कुर्सी खींच कर बैठ गईं।
“काशिश,” माँ ने कहा, “शर्मा जी वाले पूछ रहे हैं। हाँ या ना?”
काशिश ने नाखून का ब्रश रखा। मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिला कर कुछ नहीं कहा।
“मना कर दो, माँ,” काशिश ने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि… मुझे अजमेर नहीं जाना।”
माँ ने गिलास से घूँट लिया। फिर बहुत शांति से पूछा — “क्यों, यहीं कोई पसंद है?”
काशिश चुप।
“हाँ या ना,” माँ ने कहा।
“हाँ,” काशिश बोली, बहुत धीरे।
“नाम बता।”
काशिश ने मेरी तरफ़ देखा, फिर आँगन में खेलती गौरैया की तरफ़, फिर अपनी गोद में रखी नेलपॉलिश की तरफ़। और फिर बोली —
“राकेश।”
माँ ने तीन सेकंड तक कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने गिलास रखा और उठ कर रसोई की तरफ़ चलीं। दरवाज़े पर रुक कर बिना मुड़े कहा —
“अच्छा। तो मैं शर्मा जी को मना कर देती हूँ।”
“और बापू?” काशिश ने कहा।
“बापू को मैं सँभाल लूँगी,” माँ ने कहा। “तुम दोनों अपनी सँभालो।”
और वो चली गईं।
काशिश ने मेरी तरफ़ देखा — आँखें फैली हुई, होंठ खुले।
“बस?” उसने कहा।
“बस,” मैंने कहा।
“इतना आसान?”
“माँ को पता था,” मैंने कहा। “तीन साल से पता था। बस तेरी तरफ़ से सुनना चाहती थीं।”
काशिश ने अपनी गोद में सिर रख कर दो मिनट हँसी — पूरे पेट से, बेकाबू, जैसे पूरा बोझ उतर गया हो। और फिर उठ कर मेरे पास बैठ गई और मेरे कंधे पर सिर रख दिया, बिलकुल सार्वजनिक, बिना दरवाज़ा बंद किए, बिना चाबी घुमाए।
पापा ने उस रात खाने की मेज़ पर बस इतना कहा — “ठीक है। बड़ा तो तू है ही। और जो लड़का घर से बाहर नहीं मिला, वो घर के अंदर मिल गया। अब शादी कब?”
“बापू,” काशिश बोली, “अभी तो हम जवान हैं।”
“जवान हैं तो जवानी में शादी कर लो,” पापा बोले, और रोटी तोड़ कर खाने लगे, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
चार फरवरी, दो हज़ार तीस।
काशिश बाईस की। और इस बार उसने जान-बूझ कर घर चुना।
“तीन साल बाहर किया,” उसने कहा। “अब वहीं करेंगे जहाँ पहली बार किया था।”
घर। हमारी हवेली। वही छत, वही चादर, वही चाँद।
पापा-मम्मी अब जानते थे, तो बहाना बनाने की ज़रूरत नहीं थी। माँ ने बस इतना कहा, “शोर मत करना, बापू जल्दी सो जाते हैं,” और अपने कमरे में चली गईं।
पाँच लोग पहले से तय थे। और छठा — काशिश ने दो हफ़्ते पहले नाम बताया था।
“अर्जुन,” उसने कहा।
अर्जुन। तेईस साल का, काशिश का कॉलेज सीनियर। लंबा, दुबला, साफ़-सुथरा, चश्मा, और — ये सबसे ज़रूरी था — वो लड़का जिसे काशिश ने सोलह साल की उम्र में सबसे पहले पसंद किया था। मुझसे पहले।
“मतलब,” मैंने कहा, “ये तो तेरा पहला क्रश है।”
“हाँ,” काशिश ने कहा, बिना झिझक।
“और तू उसे छह साल बाद चोदवाने ला रही है?”
“हाँ,” वो बोली। “एक बार उसके साथ भी। जैसे पुराना हिसाब चुकाना हो।”
और मुझे उस रात पहली बार महसूस हुआ कि मैं जल रहा हूँ। थोड़ा-सा। इतना कि काशिश भाँप गई और मुझे चिढ़ाने लगी।
“जल रहा है तू,” वो तीन दिन तक कहती रही।
“जल नहीं रहा।”
“जल रहा है। अच्छा लग रहा है।”
रात साढ़े दस बजे सब आए। आकाश, विक्रम, समर, जतिन — और अर्जुन, जो पहली बार हमारे बीच आया था और इसलिए सबसे ज़्यादा घबराया हुआ था।
काशिश ने आज घाघरा-चोली पहना था — गहरा लाल, कशीदाकारी वाला, और चोली इतनी छोटी कि कमर के नीचे तीन इंच नंगी त्वचा दिखे। बाल जूड़े में, बिंदी, और कानों में झुमके। जब वो छत की सीढ़ी चढ़ी, तो उसके झुमके बजे, और छह आदमी उसकी तरफ़ देखने लगे।
अर्जुन ने उसे देखा और साँस रोक ली। काशिश ने उसे देखा, और फिर मेरी तरफ़ — जैसे पूछ रही हो, “देखा?”
छत पर चादर बिछी थी। मैंने म्यूज़िक लगाया, बियर खोली। चाँद पूरा था। नीचे जयपुर चमक रहा था।
पहला घंटा बातचीत में गया। अर्जुन सबसे कम बोला। जतिन उसे चिढ़ाता रहा — “क्या हुआ भाई, पहली बार आए हो?” और अर्जुन शरमा कर पानी पीता रहा।
ग्यारह बजे काशिश उठी, चोली के हुक पीछे से खोलने लगी, और बोली — “बातें बहुत हो गईं।”
चोली खुली। घाघरा गिरा। और काशिश उस चादर पर खड़ी हो गई — बस एक पतली लाल पेटीकोट और मैचिंग ब्रा में, बाल खोल कर।
छह आदमी चुप।
“पहले सब कपड़े उतारो,” काशिश ने कहा। “फिर मैं बताऊँगी।”
सबने उतारे। और जब सब नंगे खड़े हुए, काशिश ने एक-एक को देखा — आकाश का मोटा और ऊपर मुड़ा हुआ, विक्रम का लंबा पतला, समर का भारी और गठा हुआ, जतिन का सबसे मोटा जो मुट्ठी में नहीं आता, मेरा सबसे लंबा — और अर्जुन का, जो अभी आधा खड़ा था, क्योंकि वो अब भी घबराया हुआ था।
काशिश अर्जुन के सामने गई। घुटनों के बल बैठी। और उसने अपने हाथ से उसका लंड पकड़ा।
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
“छह साल पहले,” काशिश ने कहा, बिना उसकी तरफ़ देखे, “तू क्लास के बाहर खड़ा रहता था। और मैं अंदर से देखती थी।”
“पता है,” अर्जुन ने कहा, आवाज़ भारी।
“पता है?” काशिश ने उसकी तरफ़ देखा।
“पता है। तभी तो आज आया।”
काशिश ने उसका लंड मुँह में ले लिया।
अर्जुन की चुदाई पहले हुई। काशिश ने उसे चादर पर लिटाया, ऊपर चढ़ी, और धीरे-धीरे बैठी। अर्जुन उसके अंदर जाते ही कराहा और उसकी कमर पकड़ ली। काशिश ने अपनी कमर झुलाई — आगे-पीछे, फिर ऊपर-नीचे — और उसके दूध ब्रा के अंदर उछलने लगे। फिर उसने ख़ुद ब्रा खोली और दूध बाहर गिरे — भारी, गोल, निप्पल कड़े।
अर्जुन ने हाथ बढ़ा कर दूध पकड़ा और मसला। काशिश ने आँखें बंद कर लीं।
“छह साल का बदला,” उसने कहा, और हँसी, और फिर कराही।
मैं पास बैठा देख रहा था। और हाँ, मैं जल रहा था। अच्छा लग रहा था, पर जल रहा था।
काशिश ने बीच में मेरी तरफ़ देखा और होंठ से कहा, “देख रहा है?”
“देख रहा हूँ।”
“अच्छा।”
दो मिनट में अर्जुन ने हाँफ कर कहा, “काशिश, मैं जल्दी…”
“निकाल दे,” उसने कहा।
अर्जुन ने उसे उठा कर नीचे लिटाया, और ऊपर से तेज़ झटके मार कर छोड़ दिया — उसके पेट पर। काशिश ने उसका चेहरा पकड़ कर चूम लिया और बोली, “अब बैठ। देख।”
उसके बाद बारी बदलती रही। जतिन ने पीछे से लिया, और उसकी मोटाई से काशिश पहले की तरह चीखी। आकाश ने उसे घुटनों के बल लिया और गहरा डाला। विक्रम ने उसे सामने से लिया और उसका लंबा लंड उसके पेट तक पहुँचा। समर ने उसे खड़ा कर के, दीवार से लगा कर लिया, उसकी टाँगें कमर पर उठी हुईं।
और हर बदलाव के बीच, काशिश किसी न किसी का हाथ पकड़े रहती। कभी किसी का लंड मुँह में, कभी दोनों हाथों में दो। उसकी लार, पसीना, और बुर का रस — सब मिल कर चादर पर गिर रहे थे।
रात दो बजे उसने डबल माँगा। समर आगे, विक्रम पीछे। और इस बार वो तीसरे झटके में ही चीख कर टूट गई — लंबी कराह, आँसू, और पूरी कमर उठी हुई।
फिर उसने अर्जुन को बुलाया। “तू पीछे से,” उसने कहा, “और जतिन आगे।”
अर्जुन ने डरते-डरते टिप रखी और धीरे-धीरे अंदर गया। काशिश ने दाँत भींच कर कहा, “और डाल। डर मत।”
और जब अर्जुन पूरा अंदर गया, और जतिन सामने से आया, तो काशिश के अंदर दो लंड थे — एक आगे, एक पीछे। उसने आँखें बंद कर लीं और फुसफुसाई, “छह साल। छह साल का हिसाब।”
तीन बजे सब थके। चारों तरफ़ पसरे। जतिन ने कहा, “अब सो जाएँ?” और काशिश ने सिर हिलाया — ना।
“एक और,” उसने कहा। “और वो राकेश।”
“हर साल यही,” विक्रम ने कहा।
“हर साल यही,” काशिश ने कहा।
सब पीछे हट गए। छत पर बस दो बचे।
मैं उसके ऊपर आया। वो पूरी खुल चुकी थी — पाँच आदमियों ने उसे ढीला कर दिया था। मैंने टिप रखी और एक झटके में पूरा अंदर डाल दिया। वो कराही नहीं — बस मेरी गर्दन पकड़ कर मुझे अपने ऊपर खींच लिया।
“धीरे,” उसने कहा।
“हर साल की तरह?”
“हाँ,” वो बोली। “हर साल की तरह।”
और मैंने धीरे किया। बहुत धीरे। लंबे-लंबे, गहरे झटके। उसने मेरी आँखों में देखा और कुछ नहीं कहा। पीछे पाँच आदमी चुप थे, और ऊपर चाँद था, और नीचे जयपुर सो रहा था।
फिर उसने कहा — “राकेश, अगर हम शादी कर लें, तो ये बंद हो जाएगा?”
“क्यों बंद होगा?”
“क्योंकि पति-पत्नी हो जाएँगे। फिर भाई-बहन नहीं रहेंगे।”
“तो फिर और भी अच्छा,” मैंने कहा। “फिर कोई बहाना नहीं चाहिए।”
वो हँसी, और हँसते हुए कराही, और फिर मेरे कंधे पर दाँत गड़ा दिए।
मैंने गति बढ़ाई। वो ऊपर चढ़ी, और फिर चीख पड़ी — और उस चीख में पूरे तीन साल थे। उसने मेरी पीठ पर नाखून चलाए और मेरा नाम लिया, तीन बार, बेतरतीब — “राकेश… राकेश… राकेश…”
और जब मैंने छोड़ा, तो वो मेरी गर्दन में मुँह दबा कर काँपती रही।
उसके अंदर उस रात छहों का रस था — अर्जुन का, जतिन का, आकाश का, विक्रम का, समर का, और मेरा।
छह। जैसा उसने माँगा था।
उसने आँखें खोलीं और मुझे देखा। फिर बोली, बहुत धीरे, इतना धीरे कि बाक़ी पाँच सुन भी न पाएँ —
“अब पूरा हुआ।”
सब साढ़े तीन बजे नीचे चले गए। कुछ वहीं बैठक में पसर गए, कुछ घर की छत की चारपाइयों पर। अर्जुन सबसे आख़िर में गया — दरवाज़े पर रुक कर काशिश की तरफ़ देखा, कुछ कहा नहीं, और चला गया।
काशिश चादर में लिपटी छत पर ही लेटी रही। और मैं उसके पास बैठा।
“फ़ोन दे,” उसने कहा।
मैंने उठाया और दिया। उसने नोट खोला — वही नोट, “हिसाब”। और उसमें आज की लाइन लिखी:
“४ फ़रवरी २०३० — घर, छत — छह — अर्जुन, जतिन, आकाश, विक्रम, समर, राकेश।”
और फिर उसने नीचे एक और लाइन जोड़ी, और फ़ोन मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने पढ़ा:
“२२ साल। बस इतना। अब आगे जो होगा, वो हिसाब नहीं है — वो ज़िंदगी है।”
“मतलब?” मैंने कहा।
“मतलब अब बंद,” उसने कहा।
“छह बंद?”
“हाँ। बहुत हो गया। तीन साल में पाँच लोग, छह लोग, डबल, ट्रिपल…” वो करवट ले कर मेरी तरफ़ मुड़ी। “अब मुझे तेरा चाहिए। बस तेरा।”
“और अगर फिर कभी मन करे?”
“तो बुला लेंगे,” उसने कहा। “पर नियम बदल जाएगा। अब वो मेहमान होंगे। और तू घर होगा।”
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा। छत पर ठंडी हवा आ रही थी। नीचे से किसी के खर्राटे की आवाज़ आ रही थी।
“काशिश,” मैंने कहा।
“हूँ।”
“शादी कर लें?”
वो चुप रही। इतनी देर चुप रही कि मुझे लगा सो गई।
फिर उसने चादर के अंदर से हाथ निकाला, मेरा हाथ पकड़ा, और अपने सीने पर रख दिया — जहाँ उसका दिल अब भी तेज़ धड़क रहा था।
“हाँ,” उसने कहा। “पर एक शर्त।”
“क्या?”
“शादी वहीं होगी। इसी घर में। इसी छत पर। और उस रात तू मुझे उसी कमरे में ले जाएगा जहाँ पहली बार ले गया था।”
“ठीक है,” मैंने कहा।
“और एक और शर्त।”
“बता।”
“शादी की रात तेरे तीन दोस्त और अर्जुन — वो आएँगे।” वो मुस्कुराई। “बस एक बार। शादी की रात। फिर तो बस हम दोनों।”
मैंने आसमान की तरफ़ देखा और हँस पड़ा।
“तू कभी नहीं बदलेगी।”
“बदल गई हूँ,” उसने कहा। “पहले तू चोदता था। अब तू रहेगा।”
मेरा नाम राकेश पांडेय है। जयपुर का रहने वाला। उम्र उनतीस साल।
और काशिश पांडेय — बाईस साल की। उसके दूध अब भरे हुए हैं और उसके निपल्स अब भी वैसे ही कड़े हो जाते हैं जैसे उस पहली रात छत पर हुए थे।
अट्ठारह पर मैंने उसे चोद कर रंडी बनाया।
उन्नीस पर तीन आदमियों ने उसे चोदा।
बीस पर चारों ने एक साथ।
इक्कीस पर पाँचों ने।
और बाईस पर छहों ने — और उसके बाद उसने हिसाब बंद कर दिया।
उसने मुझे कभी “भैया” कहना बंद नहीं किया। घर में, मेहमानों के सामने, मंदिर में — वो आज भी “भैया” कहती है। लेकिन रात में, जब सब सो जाते हैं, तब वो “राकेश” कहती है — और उस “राकेश” में पूरा जयपुर, पूरी छत, पूरी हवेली, और पूरे पाँच साल छिपे होते हैं।
शादी की तारीख़ तय हो गई है। ग्यारह दिसंबर। घर में। मंडप आँगन में बनेगा, और शेरवानी मैं पहनूँगा, और वो लाल जोड़ा।
और उस रात — शादी की रात — वो मुझे उसी कमरे में ले जाएगी जहाँ पहली बार ले गया था। दरवाज़ा बंद होगा। चाबी घूमेगी। और मैं उसकी साड़ी का पल्लू खींचूँगा, और वो मुस्कुरा कर कहेगी —
“भैया, अब तो रिश्ता बदल गया। अब तो चलाना पड़ेगा।”
और मैं कहूँगा — “पाँच साल से चला रहा हूँ। आगे भी चलाऊँगा।”
कल रात उसने सोते से पहले आख़िरी बात कही। मेरी छाती पर सिर रख कर, आँखें बंद करके, बहुत धीरे से —
“राकेश, एक बात बता।”
“बता।”
“अगर उस दिन तू मुझे छत पर न चूमता… तो क्या होता?”
मैंने उसके बालों में हाथ फेरा और सोचा। फिर कहा —
“तो भी होता। बस तीन साल लेट होता।”
“अच्छा,” उसने कहा, और मेरी छाती पर मुँह दबा कर हँस दी।
“और अगर तू उस दिन मेरी तरफ़ न मुड़ती?” मैंने पूछा।
वो मुड़ी। ठीक वैसे ही जैसे उस रात छत पर मुड़ी थी। और बोली —
“मैं तो पहले से मुड़ी हुई थी, राकेश। बस तू देख नहीं रहा था।”
और उसने आँखें बंद कर लीं।
बाहर छत पर चाँद वैसा ही था जैसा पाँच साल पहले था। हवा वैसी ही थी। और मेरी बाँह में वो वैसी ही थी — भारी, गरम, और पूरी तरह मेरी।
मैंने उसका माथा चूमा और आँखें बंद कर लीं।
बस इतना ही।
राकेश और काशिश।
भाई, बहन, और उसके बाद — सब कुछ।
तीन मर्दों ने मिलकर छः औरतों को चोदकर रंडी बनाए
बच्चे के लिए भाभी ने पचासों बार चुदवाया
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