दोस्त और मैं मिलकर उसकी माँ की चुदाई किये

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बृजेश तीन दिन बाद लौटा। दोपहर की बस से, थका हुआ, बैग कंधे पर, मुँह पर शादी की मिठाई की चाशनी सूखी हुई। मैं गली के मोड़ पर खड़ा था — जान-बूझकर, क्योंकि मुझे देखना था कि वो लौटकर कैसा लगता है, और यह भी देखना था कि आंटी उसके सामने मेरी तरफ़ कैसे देखती हैं।

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे दोस्त की मम्मी को उनके घर में चोदा

बृजेश ने मुझे देखा और हाथ उठाकर बोला, “ओए, सुनील! क्या कर रहा है यहाँ?”

“तेरा इंतज़ार,” मैंने कहा।

“मेरा इंतज़ार? तूने तो आने से मना कर दिया था।”

“अब आया ना। बैग दे, उठा लेता हूँ।”

वो हँसा और बैग मुझे दे दिया। दरवाज़े पर आंटी निकलीं — साड़ी में, बाल जूड़े में, माथे पर बिंदी। पूरी तरह सधी हुई, पूरी तरह “माँ”। उन्होंने बृजेश का मुँह दोनों हाथों में लेकर माथा चूमा और कहा, “ठीक से खाया तूने वहाँ? भूखा तो नहीं है?”

“माँ, पहले अंदर तो आने दे,” बृजेश ने हँसकर कहा।

और फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बस आधा सेकंड — लेकिन वो आधा सेकंड काफ़ी था। उनकी आँखों में वही बात थी जो तीन दिन पहले रात को थी, और उनके होंठों पर एक बहुत हल्की, बहुत जल्दी मिट जाने वाली मुस्कान। फिर वो बृजेश के पीछे अंदर चली गईं।

मैंने बैग अंदर रखा और कहा, “आंटी, मैं चलूँ?”

“बैठ ना,” बृजेश ने कहा, “चाय पी।”

“हाँ, बैठ,” आंटी ने रसोई से कहा, “चाय बना रही हूँ।”

तीनों बैठे। बृजेश शादी की बातें कर रहा था — ढोल, बारात, खाना, नाना का घर। मैं सुन रहा था, लेकिन मेरी नज़र आंटी पर थी। और आंटी की नज़र कभी मुझ पर आती और कभी तुरंत बृजेश पर चली जाती। एक बार जब बृजेश ने पानी लेने के लिए मुँह फेरा, तब उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर बहुत धीरे से होंठ हिलाए — बस इतना कि समझ आ जाए कि “रुक, अभी नहीं।”

चाय पीकर बृजेश बोला, “माँ, मैं नहाने जा रहा हूँ, बहुत पसीना है।”

“जा,” आंटी ने कहा, “तौलिया ले लेना।”

बृजेश अंदर चला गया। और मैं और आंटी कमरे में अकेले रह गए — बस बीस कदम की दूरी पर बृजेश, और बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़। आंटी ने तुरंत मेरी तरफ़ देखा और होंठों पर उँगली रखकर “श्श” किया। फिर धीरे से बोलीं, “शाम को। जब वो सो जाए।”

“वो सोएगा कैसे?”

“उसे नींद की गोली दे दूँगी। बहाना कर दूँगी कि सफ़र से थका है, ठीक से नींद आए।”

“और मैं?”

“तू छत की सीढ़ी से आ जा। पिछली दीवार के सहारे। दरवाज़ा खुला मिलेगा।”

मैंने सिर हिलाया। बृजेश नहाकर आया, हमने खाना खाया, और मैं सात बजे घर चला आया। घर पर माँ को बहाना बनाया कि बृजेश के यहाँ पढ़ाई का ग्रुप है, रात रुकूँगा। माँ ने कहा, “कपड़ा ले जा।” मैंने कहा, “ले लूँगा।”

रात नौ बजे मैं पिछली दीवार से छत पर चढ़ा। घुटनों में दर्द हुआ, कमीज़ पर प्लास्टर लगा। छत के कोने से सीढ़ी उतरकर मैं पिछले दरवाज़े तक आया। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा था, बस आंगन की तरफ़ से एक पतली रोशनी आ रही थी।

आंटी आंगन में खड़ी थीं, चारपाई के पास, एक हाथ कमर पर। बृजेश खाट पर पेट के बल सो रहा था, मुँह दूसरी तरफ़, कंबल आधा गिरा हुआ। उसकी साँस गहरी और लगातार थी — नींद की गोली काम कर चुकी थी।

आंटी ने मुझे देखा और होंठों पर उँगली रखी। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझे खाट के पास खींचा और फुसफुसाईं, “बोल, अब क्या?”

“आपने उससे कुछ कहा?”

“नहीं। सोचा, आज तू ही बता दे।”

मैंने बृजेश की तरफ़ देखा। सोता हुआ, बेखबर, मुँह खुला हुआ। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था। फिर मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर हल्का सा हिलाया।

“बृजेश… ओए बृजेश…”

वो करवट बदलकर “उँ” करके फिर सो गया।

“बृजेश, उठ। दो मिनट के लिए उठ।”

इस बार वो आँखें मलता हुआ उठा। “क्या है यार… नींद आ रही है…”

“देख, कौन है।”

उसने आँखें खोलीं। अंधेरे में आंटी को खाट के पास खड़ा देखा, मुझे उनके बगल में। फिर उसकी नींद उतरने लगी।

“माँ? तू यहाँ क्यों खड़ी है? और ये…” उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और फिर आंटी पर, और फिर दोनों के बीच की दूरी पर।

“बैठ जा,” आंटी ने कहा, “कुछ बताना है।”

बृजेश उठकर बैठ गया, कंबल खींचकर गोद में। उसकी आँखें अब पूरी तरह खुली थीं और उनमें वो भाव था जो लड़के तभी दिखाते हैं जब उन्हें लगता है कि कुछ ऐसा होने वाला है जो उनके हिसाब से नहीं होना चाहिए था।

आंटी ने एक लंबी साँस ली। फिर बोलीं, “बेटा, तीन दिन तू नहीं था। सुनील आया था। हम दोनों…” वो रुक गईं, और फिर आगे नहीं बोल पाईं, बस हाथ से इशारा किया जैसे कह रही हों, “तू ही बता दे।”

मैंने कहा, “बृजेश, हम दोनों के बीच कुछ हो गया है।”

बृजेश ने मेरी तरफ़ देखा, फिर आंटी की तरफ़। “मतलब… तू और माँ?”

“हाँ।”

वो चुप बैठा रहा। दस सेकंड, पंद्रह सेकंड। फिर उसने हाथ से अपना चेहरा रगड़ा और बोला, “कब से?”

“पहले ही दिन,” आंटी ने कहा, आवाज़ धीमी। “जिस दिन तू गया, उसी शाम। बारिश में।”

बृजेश ने आंटी की तरफ़ देखा। “और मुझे बताया नहीं?”

“अब बता रहे हैं।”

“तीन दिन बाद।”

“तू शादी में था।”

वो फिर चुप हो गया। फिर एकदम बोला, “माँ, तू तो बता देती।”

“बताती तो तू यहीं से लौट आता।”

“तो लौट आता।” उसने कंबल में हाथ घुसाकर गोद पर रख लिए और आंटी की तरफ़ देखा, “अच्छे से बता। क्या-क्या हुआ?”

आंटी शरमा गईं। “अरे, पूरा क्या बताऊँ…”

“पूरा बता,” बृजेश ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो नरमी आ गई थी जो पहले नहीं थी।

आंटी ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मदद माँग रही हों। मैंने कहा, “मैं बता दूँ?”

उन्होंने सिर हिलाया।

मैंने बताया। बारिश, बिजली जाना, मोमबत्ती, चाय, गिरता पल्लू, हाथ पकड़ना। रुक-रुक कर बताया, और जैसे-जैसे बताता गया, वैसे-वैसे बृजेश की आँखें बड़ी होती गईं और उसकी साँस भारी होती गई। जब मैंने ब्लाउज़ के हुक की बात की, तो उसने एक बार अपने होंठ चाट लिए।

“और माँ ने मना नहीं किया?” उसने पूछा।

“नहीं,” आंटी ने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे।

“माँ, तूने नौ महीने से इंतज़ार किया है ना?” बृजेश ने पूछा, और फिर जैसे अपने ही सवाल से शरमाकर बोला, “मतलब… पापा दिवाली से नहीं आए…”

“हाँ,” आंटी ने कहा, बहुत धीरे।

“तो फिर ठीक है,” बृजेश ने कहा। और फिर एकदम हँस पड़ा — वो हँसी जिसमें हल्की नाराज़गी और बहुत ज़्यादा हैरानी थी। “सुनील, तू कमाल है यार। मेरी माँ।”

“तेरी माँ नहीं थी उस रात,” मैंने कहा, “एक औरत थी।”

बृजेश ने आंटी की तरफ़ देखा और उसकी नज़र उनके ऊपर से नीचे तक गई — पहली बार, किसी औरत को देखने वाली नज़र से। आंटी ने महसूस किया और साड़ी का पल्लू ठीक किया।

“माँ,” बृजेश ने कहा, “सच में?”

“क्या?”

“सच में तूने सुनील को…?”

“हाँ रे।”

“और कैसा लगा?”

आंटी ने मुँह फेर लिया। “ये भी कोई बेटे से पूछने की बात है?”

“क्यों, बेटा हूँ तो क्या, बाहर का थोड़े हूँ।” वो थोड़ा आगे खिसका। “बता ना।”

आंटी कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “अच्छा लगा।” और फिर, “बहुत अच्छा लगा।”

बृजेश ने एक लंबी साँस छोड़ी और पीछे टिक गया। उसके चेहरे पर वो भाव था जैसे उसने कुछ खो दिया हो और कुछ पा भी लिया हो। फिर बहुत धीरे बोला, “और मैं?”

“तू क्या?” आंटी ने पूछा।

“मैं भी…”

आंटी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कहा, “आंटी, मैंने आपसे कहा था ना — देखते हैं, बृजेश की हिम्मत पड़े तो।”

आंटी ने एक लंबी नज़र बृजेश पर डाली। फिर बोलीं, “हिम्मत है?”

बृजेश ने गला साफ़ किया। “है।”

“तो फिर?” आंटी ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो हल्की सी चुनौती थी जो औरत तभी देती है जब उसे पता हो कि वो जीतने वाली है।

बृजेश ने मेरी तरफ़ देखा — जैसे इजाज़त माँग रहा हो। मैंने सिर हिलाया।

वो आंटी की तरफ़ हाथ बढ़ाने लगा, फिर रुक गया, फिर हिम्मत करके उनकी उँगली पकड़ ली। आंटी ने उसे अपनी तरफ़ खींचा और वो खाट से उतरकर उनके सामने खड़ा हो गया — बीस साल का लड़का, अपनी माँ के सामने, हाथ में उनकी उँगली।

“तू सुनील की तरह नहीं है,” आंटी ने कहा, “वो मुझे पंद्रह साल से देख रहा है। तेरे पास एक रात है। देखूँ, क्या करता है।”

आंटी ने अपनी साड़ी की गांठ खोली और पल्लू उतारकर बृजेश के हाथ में रख दिया। बृजेश ने कपड़ा पकड़ा और देखता रह गया। फिर उन्होंने उसका हाथ पकड़कर अपनी कमर पर रख दिया और उसके हाथ के ऊपर अपना हाथ रखकर दबाया।

“ऐसे,” उन्होंने कहा, “औरत को कमर से पकड़ते हैं। ज़ोर से नहीं, पर छोड़ते भी नहीं।”

बृजेश ने वैसा ही किया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। आंटी ने उसका दूसरा हाथ भी लेकर कमर के दूसरी तरफ़ रखा और फिर धीरे से उसे अपने पेट से लगा दिया। बृजेश की साँस एकदम तेज़ हो गई।

“माँ…” उसने कहा, बस फुसफुसाकर।

“अब माँ मत बोल,” आंटी ने कहा, “अब बस औरत बोल।”

बृजेश ने उनके पेट पर होंठ रख दिए — ब्लाउज़ के ऊपर से, झुककर, आँखें बंद किए हुए। फिर ऊपर आकर गले पर। फिर जबड़े पर। फिर होंठों पर। पहला चुंबन थोड़ा टकराया — नाक आपस में लगी, दाँत टकराए — लेकिन फिर बृजेश ने संभाल लिया और आंटी ने उसका सिर पकड़कर उसे धीमा कर दिया।

मैं पीछे खाट पर बैठ गया और देखने लगा। मेरी कमीज़ उतरी हुई थी और पैंट खुली थी, हाथ पैंट के अंदर। आंटी ने एक बार मेरी तरफ़ देखा, देखा कि मैं क्या कर रहा हूँ, और उनकी आँखों में एक चमक आ गई।

बृजेश अब आंटी के होंठ चूस रहा था और उसके हाथ अब कमर से आगे बढ़कर पीठ पर चले गए थे, और फिर नीचे। जब उसका हाथ गांड पर पहुँचा तो उसने पूरी हथेली से दबा दिया, और आंटी ने उसके मुँह में “म्म्म्ह” की आवाज़ दी।

“गांड पर हाथ ठीक है,” मैंने कहा, “लेकिन पूरा हाथ एक साथ मत लगा। पहले दबा, फिर सहला, फिर ज़ोर बढ़ा।”

बृजेश ने वैसा ही किया। आंटी ने उसके होंठों से मुँह हटाकर सिर पीछे किया और आँखें बंद कर लीं।

“अब ब्लाउज़,” मैंने कहा।

बृजेश ने ब्लाउज़ के हुक ढूँढे और उँगलियाँ फिसलती रहीं। आंटी हँसीं और खुद पीछे हाथ करके एक-एक करके हुक खोल दिए। ब्लाउज़ ढीला हुआ और बृजेश ने उसे कंधों से सरकाया। दोनों दूध से भरे स्तन बाहर आ गए और बृजेश एक कदम पीछे हटकर रुक गया — बस देखता हुआ।

“अरे, देखता रहेगा?” आंटी ने कहा।

“बड़े हैं…” बृजेश ने बेवकूफ़ों की तरह कहा।

“तो पकड़।”

उसने दोनों हाथों से एक-एक स्तन पकड़ लिया। बृजेश के हाथ मेरे हाथों से छोटे थे, इसलिए स्तन उसकी हथेलियों से बाहर निकल आए और वो घबरा गया — जैसे कुछ टूट जाएगा।

“इतना ज़ोर मत,” मैंने कहा, “स्तन नरम होते हैं। पकड़ ऐसी रख कि माँस हथेली में बैठे, उँगलियों से दबाना कम रख। नीचे से ऊपर उठा।”

वो करने लगा। जब उसने उन्हें नीचे से उठाया, आंटी ने एक लंबी साँस छोड़ी और बृजेश की तरफ़ झुक गईं। उसने मुँह बढ़ाकर एक निप्पल होंठों में लिया। जैसे ही जीभ लगी, आंटी की कमर अंदर धँस गई और उन्होंने बृजेश के बाल पकड़ लिए।

“दाँत नहीं,” उन्होंने हाँफते हुए कहा, “बस होंठ और जीभ।”

बृजेश ने वैसा ही किया — जीभ से ऊपर-नीचे, होंठों से चूसते हुए। आंटी का सिर पीछे चला गया और उनके होंठ खुले रह गए। जब बृजेश ने दूसरे निप्पल को उँगलियों से पकड़कर रगड़ा, तो वो कराह उठीं — “आह्ह्ह… बेटा… अच्छा कर रहा है…”

फिर आंटी ने उसका सिर अपनी छाती से हटाया और उसे नीचे धकेला। बृजेश घुटनों के बल बैठ गया। आंटी ने पेटीकोट की नाड़ी खोलकर उसे नीचे गिरा दिया और बृजेश के सामने उनकी बुर खुल गई — भरी हुई, काली, और अब गीली, चमकती हुई।

बृजेश ने देखा और एक बार हाथ बढ़ाकर रुक गया।

“छू,” आंटी ने कहा।

उसने उँगली रखी। बुर के होंठों पर उँगली फिसलते ही उसकी आँखें बड़ी हो गईं — वो गीलापन शायद उसने पहली बार महसूस किया था।

“अब मुँह लगा,” आंटी ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब थोड़ी बेसब्री थी।

बृजेश ने मुँह लगाया। शुरू में उसे समझ नहीं आया — वो जीभ से बेतरतीब घूमता रहा। आंटी ने उसका सिर पकड़कर सही जगह पर जमाया और कहा, “यहाँ, ऊपर। और ज़ोर से चूस।”

मैं पीछे से बोला, “जीभ चपटी रख और ऊपर से नीचे खींच। ऊपर वाली गांठ पर ज़ोर, नीचे हल्का।”

अब बृजेश ने वैसा किया। आंटी की गांड उठकर खाट पर पड़ने लगी और उनकी कराहें लगातार हो गईं। मैंने देखा कि बृजेश का लंड पैंट में उभर आया था — छोटा सा उभार, जो हिलते-हिलते कस रहा था।

मैं उठकर उसके पीछे आया और उसकी पैंट का बटन खोल दिया। पैंट घुटनों तक सरका दी। उसका लंड बाहर आ गया — पाँच इंच से थोड़ा ज़्यादा, पतला, सख़्त, और सिरे पर पानी। बृजेश ने पीछे देखा।

“अपनी चूत पर लगा,” मैंने आंटी से कहा, “देखिए, कितना तैयार है।”

आंटी ने झुककर देखा और मुस्कुराईं। फिर उन्होंने हाथ बढ़ाकर बृजेश का लंड पकड़ा और सहलाया। बृजेश की पूरी कमर काँप गई और वो आंटी की चूत पर मुँह गड़ाए हुए ही कराह उठा।

“ये भी पूरा है,” आंटी ने कहा, “छोटा नहीं है।”

“लेकिन मेरे से आधा है,” मैंने कहा।

“तो क्या,” आंटी ने कहा, “मेरी चूत सिर्फ़ नौ इंच के लिए बनी थी क्या? बीस साल से इसी घर में हूँ।”

बृजेश हँसा। आंटी ने उसका लंड पकड़कर अपनी चूत पर रखा और उसकी कमर अपनी तरफ़ खींच ली।

बृजेश पहली बार अंदर गया। उसका पूरा शरीर एक झटके में सख़्त हो गया। आंटी ने उसकी गांड पकड़कर उसे और अंदर धकेला और फिर उसके कान में कहा, “अब हिल।”

वो हिलने लगा। तेज़, बेतरतीब, जल्दी। आंटी ने उसकी कमर पर हाथ रखकर उसे धीमा किया।

“धीरे, बेटा। इतनी जल्दी में कहाँ जा रहा है?”

वो धीमा हुआ। आंटी ने उसकी लय अपने हिसाब से बनाई — लंबे, धीमे झटके, जिनमें हर बार वो उसे पूरा अंदर आने देती थीं और फिर अपनी कमर से उसे पकड़ लेती थीं। मैंने बृजेश की गांड पर हाथ रखकर उसे लय बताई — हर झटके पर हल्का सा दबाता हुआ।

“हर झटके में पूरा अंदर जाने दे,” मैंने कहा, “और जाते वक्त गांड दबा। औरत को यही अच्छा लगता है।”

आंटी ने मेरी तरफ़ देखकर आँखें बंद कर लीं — यानी हाँ, ऐसा ही है।

दो-तीन मिनट में बृजेश की साँस टूटने लगी। वो रुकने ही वाला था कि मैंने कहा, “निकाल ले, वरना खत्म हो जाएगा।”

उसने निकाल लिया और हाँफते हुए घुटनों पर बैठ गया। आंटी हँसीं — वो हँसी जिसमें प्यार था। उन्होंने उसका चेहरा पकड़कर माथा चूमा और कहा, “अभी तो शुरू हुआ है।”

फिर आंटी ने मेरी तरफ़ देखा और हाथ बढ़ा दिया। मैं आगे आया। उन्होंने मेरी पैंट खींचकर नीचे की और मेरा लंड हाथ में लेकर दोनों बार ऊपर-नीचे किया। बृजेश देख रहा था — पहली बार मेरा लंड पूरा खुला देख रहा था। उसका मुँह खुला रह गया।

“इतना बड़ा…” उसने कहा।

“इसी से तेरी माँ की चूत खुली है,” मैंने कहा।

आंटी ने मेरा लंड अपनी चूत पर लगाया और मुझे खींच लिया। एक ही झटके में मैं पूरा अंदर गया — चूत अब पहले से खुली हुई थी और भीगी हुई। आंटी ने आँखें बंद करके एक लंबी साँस ली।

“देख,” उन्होंने बृजेश से कहा, “देख कैसे अंदर जाता है। सीख।”

मैंने धीमा शुरू किया — पूरा बाहर, पूरा अंदर। हर बार जब लंड पूरा अंदर जाता, आंटी की गांड खाट से उठती और उनके होंठों से एक आवाज़ निकलती। बृजेश खाट के किनारे बैठकर देख रहा था, अपना लंड हाथ में लिए हुए, बिना हिलाए — बस देखता हुआ।

“हाथ लगा,” आंटी ने उससे कहा, “मेरी चूत पर हाथ लगा, ऊपर वाली गांठ पर।”

बृजेश ने उँगली रखी और रगड़ने लगा। अब दोनों तरफ़ से — मेरा लंड अंदर-बाहर और उसकी उँगली ऊपर गांठ पर। आंटी की कराह बदल गई, पतली और ऊँची हो गई।

“और ज़ोर,” उन्होंने कहा।

बृजेश ने ज़ोर बढ़ाया। आंटी का पूरा शरीर काँपने लगा। फिर उन्होंने बृजेश का हाथ पकड़कर उसे अपने एक स्तन पर रख दिया और कहा, “यहाँ भी। निप्पल दबा।”

बृजेश ने निप्पल पकड़कर दबाया और खींचा। आंटी की चूत ने मेरे लंड को पूरी तरह निचोड़ लिया और वो चीख पड़ीं — एक लंबी, टूटती हुई चीख — और उनका शरीर झटकों में आ गया। मैंने धीमा करके चुदते रहना जारी रखा और बृजेश ने उँगली नहीं हटाई, जब तक उनके झटके खत्म नहीं हुए।

आंटी हाँफ रही थीं। पसीना उनके माथे से कनपटी तक आ गया था।

“अब तू,” उन्होंने बृजेश से कहा, “अब तू आ।”

मैं बाहर निकला। आंटी ने बृजेश को खींचकर अपने ऊपर बुलाया और उसकी टाँगों के बीच जगह दी। बृजेश फिर अंदर गया — इस बार बिना डर के, पूरे ज़ोर से। आंटी ने उसकी गांड दोनों हाथों से पकड़ ली और उसे अपनी तरफ़ दबाया।

“और ज़ोर,” उन्होंने कहा, “आज जितना ज़ोर है लगा।”

वो लगाने लगा। खाट ज़ोर-ज़ोर से चरमराने लगी। उनके दूध भरे स्तन एक-दूसरे से टकरा रहे थे। मैंने आंटी के सिर के पास बैठकर उनका हाथ अपने लंड पर रख दिया और वो उसे हाथ में लेकर सहलाने लगीं।

बृजेश की हालत खराब हो रही थी — चेहरा लाल, माथे पर पसीना, होंठ कटे हुए। वो हर झटके के साथ कराह रहा था।

“रुक जाऊँ?” उसने पूछा।

“नहीं,” आंटी ने कहा, “अभी नहीं। मेरे अंदर कर। आज अंदर ही कर।”

“माँ…”

“कर।”

वो फिर लगाने लगा। पाँच-छह झटकों के बाद उसका शरीर सख़्त हो गया, वो एक लंबी कराह के साथ अंदर ही रुक गया, और उसकी गांड झटकों में आ गई। आंटी ने उसकी पीठ पर हाथ रखकर उसे सहलाया और उनके अपने होंठों से भी एक हल्की आवाज़ निकली।

बृजेश उन पर गिर पड़ा। आंटी ने उसका सिर सहलाया और कुछ देर दोनों वैसे ही पड़े रहे। फिर बृजेश हटा और करवट में लेट गया, साँस नहीं आ रही थी।

आंटी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो नशा था जो सिर्फ़ पूरी तरह तृप्त औरत की आँखों में होता है।

“और तू?” उन्होंने कहा।

“अभी नहीं,” मैंने कहा, “आप पहले आराम कर लीजिए।”

“हट,” उन्होंने कहा और करवट बदलकर पेट के बल लेट गईं, “आराम बाद में।”

उन्होंने अपनी गांड ऊपर उठाई — भरी हुई, गोल, पसीने से चमकती। और फिर उन्होंने हाथ पीछे करके अपनी गांड के माँस को दोनों तरफ़ से खींचकर फैला दिया — जैसे मुझे बुला रही हों।

“यहाँ भी,” उन्होंने कहा।

बृजेश उठकर बैठ गया और देखने लगा। मैंने अंगूठा उनकी चूत में डुबोया, रस लिया, और उसे गांड के छेद पर लगाया। धीरे-धीरे दबाया। आंटी ने साँस भरी और फिर छोड़ दी, और अंगूठा अंदर सरक गया। उन्होंने गांड मेरी तरफ़ और ऊपर उठाई।

“बृजेश,” मैंने कहा, “देख, गांड कैसे खुलती है।”

बृजेश झुककर देखने लगा, बिल्कुल पास से। फिर उसने हिम्मत करके उँगली बढ़ाई और मेरे अंगूठे के साथ अपनी उँगली भी अंदर डाल दी। आंटी ने कराहकर कहा, “अरे, दोनों एक साथ…”

“दर्द हो रहा है?” मैंने पूछा।

“अच्छा लग रहा है,” उन्होंने कहा, “बस धीरे।”

मैंने अंगूठा निकाला और उसकी जगह लंड का सिरा रखा। धीरे-धीरे दबाया। गांड का छेद फैलता गया और फिर सिरा अंदर चला गया — और आंटी की पूरी कमर काँप गई।

“आह्ह्ह… बाप रे…” उन्होंने खाट को मुट्ठी में पकड़ लिया।

मैंने रुककर इंतज़ार किया। फिर धीरे से और अंदर डाला — आधा, फिर तीन-चौथाई। आंटी की गांड मेरे लंड के चारों तरफ़ कस गई, बहुत ज़्यादा कसी हुई, चूत से भी ज़्यादा। उनका पूरा शरीर तन गया था।

“साँस लीजिए,” मैंने कहा।

उन्होंने साँस ली और धीरे-धीरे ढीली पड़ीं। मैंने बाक़ी भी अंदर कर दिया।

फिर हिलना शुरू किया। धीमा, छोटा, बस दो इंच। आंटी हर झटके पर कराहतीं और उनकी गांड मेरे पेट से टकराती। बृजेश ने हिम्मत करके नीचे हाथ बढ़ाया और उनकी चूत पर उँगलियाँ रगड़ने लगा — और आंटी एकदम चीख पड़ीं, क्योंकि अब दोनों तरफ़ से भरा हुआ था।

“अरे राम… अरे राम…” वो बड़बड़ाने लगीं, “दोनों जगह… दोनों जगह…”

मैंने रफ़्तार बढ़ाई। अब झटके लंबे और गहरे थे। मेरी जाँघें उनकी गांड से टकराती और थपकी की आवाज़ कमरे में गूँजती। आंटी की गांड मेरी हथेलियों में भरी हुई थी, और हर झटके पर उसका माँस मेरी उँगलियों के बीच से बाहर निकलता।

बृजेश ने झुककर आंटी के कान में कहा, “माँ, कैसा लग रहा है?”

“बहुत अच्छा रे…” उन्होंने हाँफते हुए कहा, “बहुत अच्छा… मत रुकने दे…”

वो उठकर मेरे पीछे आया और मेरी गांड पर हाथ रखकर दबाने लगा — जैसे मैंने उसे सिखाया था। मैं हँसा और उसने भी हँसी में भरकर ज़ोर बढ़ा दिया।

आंटी की साँस फिर टूटने लगी। उनकी गांड मेरी पकड़ में काँपने लगी।

“फिर आ रहा है…” उन्होंने कहा।

“आ जाइए,” मैंने कहा और पूरा ज़ोर लगा दिया।

वो चीख पड़ीं — तीन बार, हर बार टूटती हुई — और उनका शरीर झटकों में आ गया। बृजेश ने उनकी चूत पर उँगली ज़ोर से रगड़ी और आंटी की चीख एक लंबी कराह में बदल गई। उनकी गांड ने मेरे लंड को पूरी तरह निचोड़ लिया।

मैंने उसी पकड़ में चुदते रहना जारी रखा जब तक उनके झटके नहीं थमे। फिर मैं भी हद तक पहुँच गया।

“अंदर?” मैंने पूछा।

“अंदर,” उन्होंने कहा।

मैंने आख़िरी तीन झटके लगाए और अंदर ही रुक गया। पहला झोंका निकला और मेरी पूरी कमर काँप गई। मैंने उनकी गांड कसकर पकड़ ली और लंड को जितना अंदर जा सकता था, और अंदर धकेल दिया। आंटी ने आँखें बंद करके होंठ काट लिए और उनकी गांड ने फिर एक बार सिकुड़कर मुझे निचोड़ा।

जब आख़िरी झटका निकला, तब मैं उनकी पीठ पर गिर पड़ा। मेरा पसीना उनकी पीठ पर लग गया। कुछ देर हम दोनों इसी तरह पड़े रहे।

फिर मैं हटा और करवट में लेट गया। आंटी करवट बदलकर हमारी तरफ़ आईं और दोनों के बीच में लेट गईं। उन्होंने एक हाथ बृजेश की छाती पर रखा और दूसरा मेरे पेट पर। कोई कुछ नहीं बोला।

काफ़ी देर बाद बृजेश ने कहा, “माँ, पानी दे दे।”

आंटी हँस पड़ीं और उठकर गईं। नंगी ही, कमरे में, साड़ी के पल्लू को बस कंधे पर डालकर। फिर एक लोटा पानी लेकर आईं और बृजेश को दिया, फिर मुझे। फिर खाट पर लौटकर बैठीं।

“अब बता,” उन्होंने कहा, “कल सुबह क्या बहाना बनाऊँगी? गली वाली शांति दीदी पूछेंगी, ‘रेखा, तेरे घर रात में कौन था?'”

“कह देना, बृजेश का दोस्त पढ़ाई करवाने आया था,” बृजेश ने कहा।

“और खाट की आवाज़?” आंटी ने पूछा, “शांति दीदी को सब पता है। वो पूरी रात जागकर सुनती रहती है।”

“तो कह देना, पंखा तेज़ चल रहा था,” मैंने कहा।

तीनों हँस पड़े। फिर बृजेश गंभीर हो गया और बोला, “माँ, एक बात पूछूँ?”

“पूछ।”

“पापा आएँगे तो?”

आंटी ने साड़ी का पल्लू ठीक किया और कुछ देर छत की तरफ़ देखती रहीं। फिर बोलीं, “पापा आएँगे तो पापा के साथ रहूँगी। दो हफ़्ते के लिए आते हैं, दो हफ़्ते उनका हक़ है। बाकी ग्यारह महीने…” वो रुक गईं और हम दोनों की तरफ़ देखा, “…ग्यारह महीने तुम दोनों के।”

बृजेश ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़। हम दोनों हँसे — वो हँसी जिसमें बहुत कुछ था।

“माँ,” बृजेश ने कहा, “एक बात कहूँ?”

“कह।”

“तू बदल गई है।”

“अच्छे के लिए या बुरे के लिए?”

“बहुत अच्छे के लिए,” बृजेश ने कहा, “पहले घर में ऐसा लगता था कि तू बस चल रही है। अब लगता है कि तू ज़िंदा है।”

आंटी कुछ देर चुप रहीं। फिर उनकी आँखों में पानी आ गया — बिना आवाज़ के, बिना सिसकी के। उन्होंने मुँह फेर लिया और हाथ से आँखें पोंछ लीं।

“अरे, रोने क्यों लगी?” बृजेश ने कहा और उनकी तरफ़ झुक गया।

“कुछ नहीं,” उन्होंने कहा, “अच्छा लगा बस। तेरे मुँह से सुनकर अच्छा लगा।”

बृजेश ने उनका माथा चूमा और फिर उनकी गर्दन में मुँह गड़ा दिया। आंटी ने उसका सिर सहलाया। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और हाथ बढ़ाकर मेरे बालों में उँगलियाँ फेरीं।

“तूने मुझे आज एक औरत बना दिया, सुनील,” उन्होंने धीरे से कहा, “बीस साल से इस घर में जो औरत मर रही थी, उसे तूने ज़िंदा किया। और आज इसने उसे इज्ज़त दी।”

“आंटी, इसमें मेरा क्या…”

“चुप,” उन्होंने कहा, “तारीफ़ कर रही हूँ तो सुन ले।”

मैं चुप हो गया। वो मुस्कुराईं।

फिर उन्होंने दोनों की तरफ़ देखा और बोलीं, “एक बात साफ़ कर देती हूँ, दोनों सुन लो। घर में आपस में कुछ छुपाना नहीं। कोई जलना नहीं। जब मैं एक के साथ हूँ, दूसरा चुपचाप बैठा रहेगा — या शामिल हो जाएगा। और जब कोई नाराज़ हो, तो बोलेगा, मुँह नहीं फुलेगा। समझे?”

“समझे,” हम दोनों ने कहा।

“अच्छे बच्चे,” उन्होंने कहा और दोनों का माथा चूम लिया।

फिर हम तीनों लेट गए — आंटी बीच में, बृजेश एक तरफ़, मैं दूसरी तरफ़। बृजेश कुछ देर में सो गया। उसकी साँस गहरी हो गई और उसका हाथ आंटी के पेट पर ढीला पड़ गया।

मैंने आंटी की तरफ़ देखा। वो जाग रही थीं, आँखें खुली, छत की तरफ़।

“सोई नहीं?” मैंने फुसफुसाया।

“नींद नहीं आ रही,” उन्होंने कहा, और फिर मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, “सुनील, एक बात कहूँ?”

“कहिए।”

“बीस साल की उम्र में मुझे ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी खत्म हो गई। शादी हो गई, बच्चा हो गया, आदमी शहर छोड़कर चला गया, और मैं इस घर में बैठ गई। फिर रोज़ वही — चूल्हा, बर्तन, साड़ी, सोना। किसी ने पूछा भी नहीं कि मुझे क्या चाहिए। आदमी आते हैं तो भी दो हफ़्ते में वो भी काम की तरह हो जाता है। फिर एक दिन तू आया, छोटा सा, और मुझे देखता रहा। मुझे पता था। पंद्रह साल का था तब भी पता था। लेकिन तू बच्चा था — क्या कहती?”

“आपने मुझे बच्चा समझा।”

“बच्चा तो था ही।” वो हँसीं, फिर गंभीर हो गईं। “लेकिन पिछले साल जब तू बड़ा हो गया, तब भी मैंने कुछ नहीं कहा। जानती थी, फिर भी चुप रही। तू जानता है क्यों?”

“क्यों?”

“क्योंकि औरत को डर लगता है कि कहीं वो अपने ही भरम में तो नहीं है। कहीं इज्ज़त न चली जाए। कहीं बेटे का दोस्त हँसी न उड़ाए। और सबसे बड़ा डर — कहीं उम्र का हिसाब सामने न आ जाए।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, “मैं अड़तीस की हूँ, सुनील। तू बीस का।”

“तो क्या हुआ?”

“अब तुझसे पूछ रही हूँ। सच में क्या हुआ?”

मैंने उनका हाथ पकड़ा और अपनी छाती पर रख दिया। “आंटी, मेरे लिए आप अड़तीस की नहीं हैं। जब आप हँसती हैं तो बाईस की हैं, और जब कराहती हैं तो…” मैं रुक गया।

“तो?”

“तो उम्र का कोई हिसाब ही नहीं रहता।”

वो हँसीं — बहुत धीरे, गले से। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ करवट ली और मेरा चेहरा दोनों हाथों में लेकर मेरे होंठ चूम लिए। एक लंबा, धीमा, शांत चुंबन — पहले वाले सारे चुंबनों से अलग, जिसमें भूख कम और अपनापन ज़्यादा था।

“सो जा,” उन्होंने कहा, “सुबह जल्दी उठना है। बृजेश से पहले उठकर चला जाना, गली वालों को कुछ पता न चले।”

“और फिर?”

“और फिर आ जाना दोपहर को। बहाना बना लेना।” वो मुस्कुराईं, “कुछ सीखा है आज, तो अभ्यास भी चाहिए।”

अगले भाग में आप पढ़ेंगे कि रेखा आंटी का घर एक तरह से हमारा अड्डा बन जाता है — बृजेश और मैं, दोनों, बारी-बारी से और साथ में, और कभी-कभी साथ-साथ। एक दोपहर ऐसी आएगी जब बृजेश पहली बार अपनी माँ को उसके पूरे शरीर पर तेल मलते हुए मालिश करेगा और मैं उसे सिखाऊँगा कि औरत की कमर से लेकर गांड तक कैसे मालिश होती है। एक रात ऐसी आएगी जब आंटी एक ही समय पर दोनों को अपने अंदर लेंगी। और एक दिन पापा दिवाली पर घर आएँगे — और उस दिन भी आंटी की आँखें हमें ढूँढेंगी।

अगले भाग का नाम होगा — “दिवाली से पहले”।

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नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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