karaka chaturathi girlfriend chudai
मेरा नाम राकेश पांडे है। उम्र चौबीस साल। कद पाँच फुट छह इंच। बनावट ऐसी कि जहाँ खड़ा हो जाऊँ, लड़कियाँ एक बार ज़रूर देखती हैं और फिर नज़र चुरा लेती हैं।
जिम में पसीना बहाने की आदत सालों से है, इसलिए कंधे चौड़े हैं, बाजू भरे हुए हैं, छाती पत्थर जैसी है और पेट पर वो हल्की-सी लकीरें हैं जो किसी हीरो की तस्वीर में देखकर लड़कियाँ आह भरती हैं।
और जो चीज़ सबसे ज़्यादा बात की जाती है, वो है मेरा लंड — पूरे आठ इंच का, मोटा, भारी, ऐसा कि पैंट में भी अपनी जगह बना लेता है। जब खड़ा होता है तो सोनिया एक बार देखकर होंठ भींच लेती है और फुसफुसाती है, “राकेश, तू तो आदमी नहीं, आफत है।”
और सोनिया। सोनिया मेरी गर्लफ्रेंड है। सोनिया को देखकर लगता है कि भगवान ने कोई तस्वीर बनाई हो और फिर उसमें जान डाल दी हो। कद पाँच फुट चार इंच, रंग गेहुँआ सुनहरा, बाल कमर तक घने और काला जैसे रात का कोई टुकड़ा, आँखें बड़ी-बड़ी, ऐसी कि जब वो देखती है तो लगता है कि दुनिया रुक गई है।
उसका बदन हीरोइन जैसा है — दूध बत्तीस का, कमर अट्ठाईस की, और गांड चौंतीस की, ऐसी गोल, उठी हुई और भारी कि जब वो साड़ी पहनकर चलती है तो पीछे से आदमी का दिमाग़ काम करना बंद कर देता है।
सामने से उसकी चूत का उभार साड़ी के पल्लू के नीचे साफ़ दिखता है, और जब वो सीढ़ियाँ चढ़ती है तो उसकी गांड का हिलना किसी कविता की तरह होता है।
सोनिया बहुत हॉट है। बहुत सेक्सी। और सबसे बड़ी बात — वो मेरी है।
उसने मेरे लिए करवा चौथ का व्रत रखा। हम शादीशुदा नहीं हैं, अभी तो बस एक-दूसरे के हैं, लेकिन सोनिया ने कहा, “शादी का सर्टिफिकेट ज़रूरी थोड़े है? जिससे दिल लगा है, उसके लिए व्रत रखूँगी, तेरी लंबी उम्र माँगूँगी।”
मैं हँसा था और बोला था, “सोनिया, तू व्रत रखेगी तो मैं क्या करूँगा?”
वो बोली थी, “तू मेरी चूत की फिक्र कर, पेट की मैं कर लूँगी।” और फिर हँसकर मेरा हाथ अपनी कमर पर रख दिया था।
लेकिन एक दिक्कत थी। बहुत बड़ी दिक्कत। हम दोनों अलग-अलग इलाकों में रहते हैं, और सोनिया के घर में करवा चौथ पर कोई बाहर नहीं जाने देता। उसकी माँ, उसकी बुआ, उसकी बड़ी बहन — सब उसी दिन उसके घर जमा होने वाले थे।
सुबह से सरगी, दिन भर भूख-प्यास, शाम को कथा, फिर छलनी से चाँद देखना, फिर पति के हाथ से पानी पीना। और सोनिया का “पति” कोई नहीं, बस मैं — जो उस दिन उसके घर से सौ किलोमीटर दूर अपने कमरे में बैठा रहता।
हमारे पास मिलने का कोई तरीका नहीं था। फोन पर बातें, वीडियो कॉल, “तू खा ले”, “तू पानी पी ले”, “तू सो जा” — बस इतना ही। सोनिया उस दिन रोई भी। कहा, “राकेश, साल में एक दिन होता है जब लड़की को अपने आदमी के सामने बैठना होता है, और मैं यहाँ अकेली बैठी हूँ।”
मैंने कहा, “अकेली क्यों? तेरी सहेलियाँ तो हैं ना।”
वो बोली, “सहेलियाँ पति नहीं होतीं, राकेश।”
उस वाक्य ने मेरे अंदर कुछ जला दिया। और मैंने उसी रात ठान लिया कि सोनिया इस करवा चौथ पर अकेली नहीं रहेगी। चाहे जो हो जाए।
तरीका सोचते-सोचते मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया। फिर एक नाम चमका — प्रिया। सोनिया की सबसे नज़दीकी सहेली। दोनों बचपन से साथ हैं। प्रिया सोनिया के घर आती-जाती है, उसकी माँ भी प्रिया को बेटी की तरह मानती है। अगर कोई सोनिया को बहाने से बाहर निकाल सकता था, तो सिर्फ़ प्रिया।
तो मैंने प्रिया को पटाया। पूरी तरह पटाया — दो दिन तक उसके पीछे पड़ा रहा। पहले उसने मना किया, “राकेश, भाई बहुत मुश्किल है, आंटी क्या सोचेंगी?”
फिर मैंने कहा, “प्रिया, तू सिर्फ़ इतना कर — सोनिया को बोल कि तेरे घर पर करवा चौथ की पूजा का सामान आया है, उसे लेने चलना है, आधे घंटे में लौट आएँगी। बस आधे घंटे।”
फिर मैंने उसके हाथ में एक छोटा-सा पैकेट रख दिया, उसके लिए लिपस्टिक का, और कहा, “और ये तेरे लिए। तेरी मदद के बिना ये दिन अधूरा रहेगा।”
प्रिया ने पैकेट खोला, होंठ भींचे, और बोली, “तू कमीना है, राकेश।” फिर मुस्कुरा दी। “ठीक है। कर देती हूँ। लेकिन अगर पकड़े गए तो सारा बोझ तेरा।”
“सारा बोझ मेरा,” मैंने कहा और हाथ जोड़ लिए।
उस रात मैंने होटल बुक किया। शहर के किनारे, नदी की तरफ़ मुँह किए हुए एक पुराना, खूबसूरत होटल — “होटल गंगा व्यू”। तीन मंज़िला, पीली दीवारें, लाल टाइल की छत, बरामदों में गमले।
बाहर से देखकर पुराना ज़माना लगता है, अंदर से एकदम नया और शानदार। मैंने कमरा नंबर सात सौ चार लिया — ऊपर की मंज़िल पर, कोने का कमरा, दोनों तरफ़ खिड़कियाँ।
कमरे में घुसते ही जो पहली चीज़ मिली, वो थी ख़ामोशी — मोटी, नरम, लिपटी हुई ख़ामोशी। फर्श पर गहरे लाल रंग का मोटा कालीन था, इतना मोटा कि जूते उतारकर नंगे पाँव चलो तो पैर धँसते हैं। दीवारें हल्के क्रीम रंग की थीं और उन पर जगह-जगह सुनहरी धारियाँ बनी हुई थीं, जो दीयों की रोशनी में धीरे-धीरे हिलती लगती थीं।
छत पर लकड़ी के शहतीर थे और उनसे एक भारी, झालरदार शीशे का शिकारा लटका था जो हर हल्की हवा में बजता था। सोने जैसी पीली, मद्धम रोशनी — कमरे में तीन लैंप थे, तीनों पीले शेड के, तीनों इतने धीमे कि आँखों में चुभें नहीं, बस सब कुछ को मोम जैसा बना दें।
बड़ा-सा पलंग बीचोंबीच रखा था। चौड़ा, ऊँचा, भारी लकड़ी का सिरहाना जिस पर नक्काशी थी। उस पर मोटी सफ़ेद चादर बिछी थी, और तकिये इतने ढेर में कि उनमें मुँह छिपा लो। चादर के बीचोंबीच लाल गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखेरी हुई थीं — मैंने ख़ास कहा था, गुलाबी, क्योंकि सोनिया को गुलाबी रंग पसंद है और लाल गुलाब से ज़्यादा गुलाबी गुलाब।
पलंग के बगल में एक चौकी थी जिस पर दो मोमबत्तियाँ और एक छोटी-सी काँच की कटोरी में चॉकलेट रखी थी। पलंग के सामने, दीवार पर, कमरे की सबसे शरारती चीज़ — एक लंबा, ऊँचा आईना, जिसके सामने खड़े होकर आदमी अपने आप को पूरा देख सकता है। मैंने उस आईने को देखकर मन ही मन सोचा कि सोनिया इसके सामने खड़ी होगी, और मेरा पेट गर्म हो गया।
खिड़कियों पर भारी परदे थे — गहरे मैरून रंग के, मखमली। मैंने एक तरफ़ के परदे खींचकर आधा रास्ता खोल दिया, जिससे बाहर की ठंडी हवा अंदर आए और परदा हल्का-हल्का लहराए। खिड़की के बाहर बरामदा था, लोहे की जाली, और उससे आगे नदी — काली, चमकती, दूर तक फैली, किनारे पर दीयों की एक कतार जो पानी में काँपती हुई दिखती थी। नदी के पार शहर की रोशनियाँ थीं, बहुत दूर, बहुत धुँधली, जैसे किसी और दुनिया की आवाज़।
कमरे के एक कोने में बड़ा-सा गोल टब था, सफ़ेद पत्थर का, जिसमें गुलाब की पंखुड़ियाँ तैर रही थीं। उसके ऊपर शीशे की एक बड़ी खिड़की थी जिससे आसमान दिखता था। दूसरे कोने में एक छोटी मेज़, दो कुर्सियाँ, और मेज़ पर मैंने खाने की चीज़ें रखवा दी थीं — ठंडा पानी, फल, मिठाई, और एक बरतन में सोनिया के पसंद का शरबत, हालाँकि व्रत टूटने तक उसे कुछ नहीं पीना था।
और हवा में एक ख़ुशबू — चंदन और गुलाब की, बहुत हल्की, बस इतनी कि साँस लेते ही महसूस हो जाए और फिर भूल जाओ। मैंने कमरे में एक चक्कर लगाया, हर चीज़ को छुआ, तकियों को ठीक किया, मोमबत्तियाँ जलाईं, और फिर खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखा।
ये कमरा सिर्फ़ सोने के लिए नहीं था। ये कमरा उस रात के लिए बना था जब सोनिया आएगी और हम दोनों वो सब करेंगे जो महीनों से सिर्फ़ फोन पर बोलते आए थे।
शाम सात बजे का वक़्त था जब मेरा फोन बजा। प्रिया का मैसेज — “निकल रहे हैं। पंद्रह मिनट। गेट पर खड़ा रह।”
मेरे हाथ काँपने लगे। मैं तीन बार आईने के सामने खड़ा हुआ, बाल ठीक किए, कॉलर सीधा किया, और फिर खुद पर हँसा। आठ इंच का लंड रखने वाला आदमी आईने के सामने घबरा रहा था।
मैं नीचे गया और गेट के पीछे, अंधेरे में खड़ा हो गया। दस मिनट बाद एक ऑटो आया। उसमें से प्रिया पहले उतरी, फिर सोनिया।
और मेरी साँस रुक गई।
सोनिया ने करवा चौथ के लिए लाल रंग की साड़ी पहनी थी — गहरे, खून जैसे लाल रंग की, जिस पर सुनहरी ज़री की महीन कढ़ाई थी। ब्लाउज़ बहुत छोटी थी, बहुत तंग, और उसके दूध ब्लाउज़ के किनारे से ऊपर उभरे हुए थे। साड़ी का पल्लू उसने सिर पर रखा था, लेकिन इस तरह कि कमर तक सब खुला था — नाभि दिख रही थी, कमर की वो गड्ढेदार लकीर दिख रही थी। हाथों में मेहंदी, कलाइयों में चूड़ियाँ, माथे पर बिंदी, कानों में झुमके, गले में मंगलसूत्र जैसा एक हार जो उसने सिर्फ़ मेरे लिए पहना था। होंठ गहरे लाल, आँखों में काजल, और चेहरे पर वो थकान जो पूरे दिन के भूखे-प्यासे रहने से आती है — लेकिन उस थकान के नीचे एक चमक भी थी।
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई और मेरे पैर कमज़ोर हो गए।
“तू आ गई,” मैंने कहा। आवाज़ भारी निकली।
“तूने बुलाया था,” उसने कहा। आवाज़ धीमी, थोड़ी रुँधी।
प्रिया ने दोनों को देखा और बोली, “अब मैं चलूँ? बीस मिनट में लौटना है, राकेश, बीस — ज़्यादा हुआ तो मैं झूठ नहीं बोल पाऊँगी।”
“प्रिया,” सोनिया ने कहा, “तू भी चल।”
“नहीं, तू जा,” प्रिया हँसी, “मैं नीचे कैफ़े में बैठी हूँ। बीस मिनट बाद आ जाना।” और वो मुड़कर चली गई।
मैंने सोनिया का हाथ पकड़ा। उसकी हथेली में मेहंदी की ख़ुशबू थी। हम चुपचाप सीढ़ियाँ चढ़े, और जब सात सौ चार का दरवाज़ा खुला तो सोनिया अंदर घुसकर रुक गई।
वो कमरे को देखती रही। फिर मेरी तरफ़ मुड़ी और उसकी आँखें भर आईं।
“राकेश… तूने ये सब…”
“तेरे लिए,” मैंने कहा। “आज तेरा दिन है। तेरा व्रत है। और तू अकेली नहीं है।”
वो मेरे पास आई, अपना माथा मेरी छाती पर टिका दिया और बोली, “पूरे दिन सोचती रही कि आज कोई मेरे हाथ से पानी पिलाने वाला नहीं है।”
मैंने उसका चेहरा उठाया। “छलनी कहाँ है?”
वो हँस पड़ी, आँसू के साथ। अपनी थैली से उसने वो छोटी-सी छलनी निकाली जो हर सुहागिन उस रात हाथ में लेती है।
“चाँद निकल आया है,” मैंने खिड़की की तरफ़ इशारा किया। “देख।”
हम दोनों खिड़की के पास गए। बाहर आसमान में चाँद था — पूरा, ठंडा, चाँदी जैसा, नदी पर उसकी रोशनी की एक लंबी पट्टी। सोनिया ने छलनी आँखों के सामने की, चाँद देखा, और फिर छलनी हटाकर मेरी तरफ़ देखा।
“मेरा चाँद यहाँ है,” उसने फुसफुसाया।
मैंने पानी का गिलास उठाया और उसके होंठों से लगाया। उसने एक घूँट पी, फिर मेरा हाथ पकड़कर गिलास नीचे किया और मुझे खींचकर चूम लिया। चूमते हुए उसके होंठों से पानी मेरे होंठों पर आया और वो ऐसे चूम रही थी जैसे पूरे दिन की प्यास एक साथ निकल रही हो।
हम चूमते रहे। लंबा, गहरा, भूखा चुंबन। मेरे हाथ उसकी कमर पर थे और उसके हाथ मेरे बालों में, मेरी गर्दन में, मेरे कंधों पर। उसकी साँस मेरे मुँह में गर्म थी और उसके होंठ मेरे होंठों से चिपके हुए ऐसे हिल रहे थे जैसे कोई अपनी जान बचा रहा हो।
मैंने उसका पल्लू सिर से खींचा। बाल नीचे गिरे, कंधों पर फैल गए, और उसके चेहरे पर वो घेरा बना दिया जो सिर्फ़ घर के अंदर दिखता है। मैंने उसके गले पर होंठ रखे, उसकी धड़कन महसूस की, और वहीं फुसफुसाया, “आज तू सिर्फ़ मेरी है।”
“सिर्फ़ तेरी,” उसने आँखें बंद करके कहा। “पूरे दिन सिर्फ़ तेरा नाम लिया है। कथा में भी।”
“और मैंने पूरे दिन तेरी चूत की सोची है,” मैंने कहा।
उसने होंठ भींचे और मेरी कमर पर अपनी कमर दबा दी। मैं उसके पेट पर उभार महसूस कर सकता था — वो उभार जो मेरे लंड से मिलने पर और बड़ा हो गया।
मैंने उसकी कमर पर हाथ रखकर उसे पलंग तक पीछे धकेला। उसके घुटनों के पीछे पलंग लगा और वो पीछे गिरी, चादर पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखर गईं, और वो हँस पड़ी। वो हँसी कमरे में भर गई, फिर मैं उसके ऊपर झुका और हँसी को चूमकर बंद कर दिया।
मेरा हाथ उसकी साड़ी की तह में घुसा। पहले पेट पर, फिर नाभि पर, फिर और नीचे। मेरी उँगलियाँ उसकी चूत के ऊपर लगीं और उसने मेरी कमीज़ मुट्ठी में भर ली।
“राकेश…” वो कराही।
“गीली है,” मैंने कहा।
“बहुत,” उसने कहा। “सुबह से।”
मैंने उसकी साड़ी की तहें खोलनी शुरू कीं। उसने मेरा हाथ रोका, खुद उठकर बैठी, और फिर धीरे-धीरे साड़ी खोलने लगी — जैसे कोई तोहफ़ा खोल रहा हो। कपड़ा फिसलता गया, पहले कंधे से, फिर कमर से, और फिर सारी साड़ी फर्श पर ढेर हो गई। उसने ब्लाउज़ की हुक खोलीं। ब्लाउज़ भी गिरी।
और मेरे सामने सोनिया थी — बस ब्रा और पेटीकोट में, पीली रोशनी में, होंठ खुले, साँस भारी। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी और ब्रा के कपड़े के नीचे से निप्पल्स साफ़ उभरे हुए थे।
मैंने उसे धकेलकर फिर लिटाया और उसकी ब्रा के ऊपर से अपना मुँह रख दिया। उसके दूध मुँह में भर गए, गर्म, भारी, नरम। मैंने उसके दूध पर होंठ फेरे और वो पलंग पर हाथ पटककर कराही। मैंने ब्रा के कपड़े के ऊपर से ही उसके निप्पल को जीभ से दबाया। कपड़ा गीला होकर चिपकने लगा और निपल्स और सख़्त होकर उभर आए, मेरी जीभ के नीचे काँपते हुए।
“कपड़ा उतार,” उसने कहा। “प्लीज़।”
मैंने ब्रा पीछे से खोली। कपड़ा ढीला होकर गिरा और उसके दूध एकदम खुले होकर बाहर निकल आए — भारी, गोल, ऊपर की तरफ़ थोड़े उठे हुए, और बीच में निप्पल्स गहरे गुलाबी, सख़्त, चमकते हुए। मैंने उन्हें देखा और मेरा मुँह सूख गया।
“क्या देख रहा है,” वो शरमाकर बोली और हाथ से छिपाने लगी।
“अपनी चीज़ देख रहा हूँ,” मैंने कहा और उसका हाथ हटाकर सीधे एक निपल को मुँह में ले लिया।
वो चीख पड़ी — छोटी, तेज़, दबी हुई चीख। मैंने उसे चूसना शुरू किया, दाँतों से हल्का खींचा, जीभ से दबाया। उसके निपल्स मेरी जीभ में कठोर और गर्म थे। मैंने एक को मुँह में भरकर चूसा और दूसरे को उँगलियों से दबाया, घुमाया, मींचा। सोनिया का बदन पलंग पर उठने लगा, उसकी गांड चादर से रगड़ खाती रही और वो लगातार कराहती रही।
“दूध… राकेश, दूध ऐसे ही चूसता रह,” वो बोली। “बहुत अच्छा लग रहा है।”
मैंने दोनों दूधों को बारी-बारी से चूसा, दबाया, चूमा। उन पर लाल निशान बन गए। फिर मैं उसके पेट से नीचे उतरा, नाभि पर जीभ फेरी, और पेटीकोट की डोरी खींची। पेटीकोट भी गिरा और सोनिया पूरी नंगी हो गई — सिर्फ़ कमर में एक पतली सोने की कमरबंद, पैरों में पायल, और बस।
उसकी चूत सामने थी। घने, काले बालों के बीच से उभरी हुई, गीली, गुलाबी, चमकती हुई। उसकी बुर की दरार खुली थी और उसमें से रस बहकर जाँघों पर आ रहा था। मैंने उसके पैर फैलाए, अपने कंधे उनके नीचे डाले, और मुँह उसकी चूत पर रख दिया।
सोनिया पूरी कमर उठाकर चीखी।
मैंने जीभ से पूरी दरार ऊपर से नीचे चाटी। रस मीठा और गर्म था। मैंने उसका भगोष्ठ चूसा, फिर अंदर जीभ डाली, फिर ऊपर उस छोटे से दाने पर जीभ रखी और उसे घुमाने लगा। उसका पूरा बदन काँप उठा। उसने मेरे बाल पकड़कर खींचे।
“हाँ… हाँ वहीं… मत रुक,” वो हाँफी।
मैंने उसे चूसते हुए दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। चूत इतनी गीली थी कि उँगलियाँ बिना ज़ोर के अंदर चली गईं। मैंने अंदर घुमाया, ऊपर की तरफ़ मोड़ा, और उसका पेट कसने लगा। उसकी गांड ऊपर उठ गई और फिर पलंग पर गिरी। मैंने उँगलियाँ अंदर-बाहर करनी शुरू कीं और साथ में जीभ से उसका दाना चूसता रहा।
उसने एक बार मेरे बाल खींचकर मेरा मुँह अपनी चूत से दूर किया। उसकी आँखें बंद थीं, साँस फट रही थी।
“राकेश, अब नहीं… नहीं तो हो जाएगा। मुझे तेरा लंड चाहिए।”
मैं उठा और खड़ा होकर कमीज़ उतारी। पैंट खोली। जब बेल्ट खुली तो सोनिया की नज़र सीधे मेरी कमर पर गई और उसने होंठ भींच लिए। मैंने बॉक्सर नीचे किया और मेरा लंड बाहर निकला — भारी, तना हुआ, ऊपर की तरफ़ उठा, चमकता हुआ, आठ इंच का।
सोनिया ने देखा और एक लंबी साँस छोड़ी।
“इतना बड़ा,” वो फुसफुसाई। “हर बार देखकर लगता है, अंदर कैसे जाएगा।”
“जाता है ना,” मैंने कहा और पलंग पर घुटने टेककर उसके ऊपर आ गया।
उसने हाथ बढ़ाकर मेरा लंड पकड़ा। उँगलियाँ उसकी छोटी थीं और वो मुट्ठी में पूरा नहीं आया। उसने उसे सहलाया, ऊपर-नीचे किया, अंगूठे से सिरे पर हल्का दबाया और मैं कराह उठा। फिर वो मुझे खींचकर चूमने लगी और चूमते हुए उसने लंड को अपनी चूत की दरार पर रख दिया।
मैंने कमर आगे बढ़ाई। सिरा उसकी चूत के मुँह पर टिका, फिर उसमें दबा, और उसकी दरार धीरे-धीरे खुलने लगी। सोनिया ने मेरी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए।
“धीरे,” वो हाँफी। “धीरे, राकेश।”
मैंने धीरे-धीरे दबाया। सिरा अंदर गया और उसकी चूत का मुँह चारों तरफ़ से फैल गया। वो मेरी गर्दन में मुँह दबाकर कराही — एक लंबी, कंपकंपाती कराह जो उसके पूरे बदन से निकली। मैंने और दबाया। एक इंच, दो इंच, और फिर उसके अंदर का ताप मेरे लंड पर लिपट गया — गर्म, तंग, गीला, ऐसा कि मेरी आँखें बंद हो गईं।
“ओह… ओह राकेश…” उसने कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
मैंने पूरा अंदर जाने दिया। मेरी कमर उसकी कमर से लग गई। उसकी चूत मेरे लंड को पूरा निगल चुकी थी और फिर भी तंग लिपटी हुई थी, अंदर से खींच रही थी।
कुछ पल हम दोनों हिले नहीं। बस साँसें और उसकी चूत का धीरे-धीरे सिकुड़ना। उसने अपने पैर मेरी कमर पर लपेट दिए।
“अब,” उसने कहा। “अब धीरे से चोद।”
मैंने कमर पीछे खींची और फिर आगे बढ़ाई। धीरे, पूरा अंदर तक, फिर बाहर, फिर अंदर। सोनिया ने पलंग के सिरहाने की नक्काशी पकड़ ली और उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं। मैंने गति बढ़ाई। हर धक्के के साथ पलंग की लकड़ी चरमराती और उसके दूध हिलते, ऊपर-नीचे होते। मैंने झुककर उन्हें फिर मुँह में लिया, चूसा, और सोनिया चीख पड़ी।
“हाँ… हाँ चोद… और ज़ोर से चोद,” वो बोली। “आज कोई नहीं है, कोई सुनने वाला नहीं है। ज़ोर से।”
और फिर वो सब टूट गया जो पकड़ रखा था। मैंने ज़ोर से धक्का दिया — भरपूर, गहरा — और पूरा कमरा उसके चीखने की आवाज़ से भर गया। मैंने उसे तेज़ चोदना शुरू किया। हर धक्का उसकी चूत को चीरता, अंदर तक जाता, और वो मेरी पीठ पर नाखून चलाती रही। मेरे लंड पर उसकी चूत की पकड़ हर धक्के पर साफ़ महसूस होती — तंग, गीली, गर्म, और लगातार सिकुड़ती हुई।
“तेरी चूत कितनी अच्छी है,” मैंने हाँफते हुए कहा।
“तेरे लिए है,” वो बोली। “सिर्फ़ तेरे लिए बनी है।”
उसके दूध हमारे बीच में दब रहे थे। मैंने एक हाथ नीचे लाकर उसे चूत के ऊपर रखा और उसका दाना अंगूठे से सहलाने लगा। उसका पूरा बदन झटके खाने लगा।
“नहीं… नहीं राकेश, वहाँ मत छेड़… मर जाऊँगी…”
“मर जा,” मैंने कहा और और तेज़ चोदा।
कुछ देर बाद उसने मुझे धकेला। “रुक। रुक जा। मुझे ऊपर आने दे।”
हम पलटे। सोनिया मेरे ऊपर आकर बैठी। उसके बाल चेहरे पर गिर रहे थे, दूध लटक रहे थे, आँखें आधी बंद, होंठ खुले। उसने अपनी चूत पकड़कर मेरे लंड पर रखी और धीरे-धीरे उस पर बैठ गई। मैंने उसकी कमर पकड़ ली और वो ऊपर-नीचे होने लगी।
ये नज़ारा पागल करने वाला था — उसकी कमर लहरा रही थी, गांड पीछे की तरफ़ उठकर मेरी जाँघों से टकरा रही थी, दूध सामने झूल रहे थे, और उसका चेहरा उस तरह टेढ़ा हो गया था जैसे वो अपने ही शरीर में खो गई हो। वो आँखें बंद करके अपने होंठ चबा रही थी।
मैंने उसकी गांड पकड़ी। भरी हुई, गोल, मांसल गांड — मेरी उँगलियाँ उसमें धँस गईं। मैंने उसे फैलाया, दबाया, और नीचे उसकी गांड के छेद को अंगूठे से सहलाया। सोनिया एक झटके में रुक गई।
“वहाँ भी?” वो हाँफी।
“बस सहला रहा हूँ,” मैंने कहा।
“सहला… अच्छा लग रहा है।”
वो फिर ऊपर-नीचे होने लगी, और अब मैं भी नीचे से उसके साथ धक्के दे रहा था। हमारी लय मिल गई थी — वो नीचे आती और मैं ऊपर जाता, दोनों एक ही समय पर टकराते। उसकी चूत के अंदर का रस मेरी जाँघों तक बहकर आ रहा था और उसकी गांड मेरी जाँघों पर चपचपा रही थी।
“राकेश, मैं… मैं आ रही हूँ,” उसने कहा। आवाज़ टूट रही थी।
“आ जा,” मैंने कहा और उसकी कमर और ज़ोर से पकड़कर नीचे खींचा।
वो चीखी — लंबी, ऊँची, बेकाबू — और उसकी चूत मेरे लंड पर ज़ोर-ज़ोर से सिकुड़ने लगी, ऐसे सिकुड़ी जैसे पूरी मुट्ठी में भर रही हो। उसका पूरा बदन काँप उठा, गांड कस गई, और वो मेरी छाती पर गिर पड़ी। उसकी साँस गरम-गरम मेरी गर्दन पर चल रही थी।
मैंने उसे गिरने नहीं दिया। हम पलटे और फिर मैं ऊपर आ गया।
“अभी नहीं,” मैंने कहा। “अभी मेरी बारी है।”
उसने कमज़ोर-सी हँसी हँसी और अपने पैर फिर मेरी कमर पर चढ़ा दिए।
मैंने उसे घुमाकर पेट के बल लिटाया। उसने अपने घुटने मोड़कर गांड ऊपर उठाई — वो गांड जो चौंतीस की थी, भरी हुई, गोल, और मेरी तरफ़ उठी हुई। मैंने उसकी कमर पकड़ी और पीछे से लंड अंदर डाल दिया।
इस बार वो पूरी तरह भर गई। वो कराही और उसका चेहरा तकिये में धँस गया।
मैंने पीछे से ज़ोर लगाया। हर धक्के पर उसकी गांड मेरे पेट से टकराती और एक तेज़ आवाज़ करती। उसकी गांड का मांस हर धक्के पर काँपता और फिर वापस लौटता। मैंने हाथ उसकी गांड पर रखकर उसे दबाया, फैलाया, और उसके छेद को फिर अंगूठे से छुआ। वो पूरी तरह गीला था।
“राकेश… तेरा लंड… इतना गहरा जा रहा है,” वो तकिये में बोली।
“अंदर तक जाएगा,” मैंने कहा। “आज पूरा जाएगा।”
मैंने तेज़ चोदा। पलंग अब लगातार चरमरा रहा था, सिरहाना दीवार से टकरा रहा था। सोनिया ने तकिया पकड़कर अपना मुँह दबा लिया लेकिन फिर भी कराहें निकल रही थीं। उसकी गांड मेरे नीचे फैल रही थी, उसकी चूत लंड को अंदर खींच रही थी, और उसकी पीठ पर पसीने की चमक आ गई थी।
मैंने उसके कान के पास झुककर कहा, “तेरी गांड भी कितनी भारी है।”
वो शरमाकर हँसी। “तेरे हाथ में ही अच्छी लगती है।”
मैंने हाथ उसकी गांड पर और गहरा दबाया और चोदना जारी रखा। अब मेरी साँस भी फट रही थी, मेरी जाँघें जल रही थीं, और पेट के नीचे वो गाँठ कसने लगी थी जो सिर्फ़ एक ही तरह से खुलती है।
“सोनिया, मैं रुक नहीं पाऊँगा,” मैंने कहा।
“मत रुक,” उसने कहा। “अंदर कर। आज अंदर ही कर।”
मैंने आख़िरी बार पूरी ताक़त से धक्के दिए — तीन, चार, पाँच — और फिर मेरा पूरा बदन कस गया। मैंने उसकी गांड दोनों हाथों से भरकर पकड़ी और खुद को उसके अंदर दबा दिया।
और फिर वो निकला — गर्म, घना, लगातार, मेरे पेट से छाती तक एक झटके में फैलता हुआ। मैंने कराहते हुए उसकी गर्दन में मुँह दबा दिया और मेरी कमर झटके खाती रही। सोनिया के अंदर मेरा लंड फड़क रहा था और वो भी मेरे साथ कराह रही थी, उसकी चूत मेरे लंड को पूरा निचोड़ रही थी।
मैं उसके ऊपर गिर पड़ा। हम दोनों हाँफ रहे थे। पसीना हमारे बीच चिपचिपा हो गया था।
कुछ देर हम वैसे ही पड़े रहे। फिर मैं उसके बगल में लुढ़क गया और उसे अपनी बाँह में भर लिया। सोनिया ने अपना पैर मेरे पैर पर रख दिया और मेरी छाती पर सिर टिका दिया। उसकी साँस धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी।
“तेरी नब्ज़ कितनी तेज़ है,” उसने कहा।
“तेरी भी,” मैंने उसकी कलाई पकड़कर कहा।
वो हँसी। फिर चुप हो गई। कमरे में सिर्फ़ पंखे की धीमी आवाज़ थी और बाहर से नदी की। मोमबत्तियाँ आधी जल चुकी थीं और उनकी रोशनी पीली-नारंगी हो गई थी।
“राकेश,” उसने कहा, “आज मैंने सुबह सोचा था कि ये दिन बस कट जाएगा। भूख लगी थी, प्यास लगी थी, और तू दूर था। मन कर रहा था कि व्रत तोड़ दूँ।”
“और तूने नहीं तोड़ा।”
“नहीं तोड़ा,” उसने कहा और मेरी छाती पर होंठ रखे। “क्योंकि तेरे लिए था।”
मैंने उसके माथे पर चूमा। “अब तेरा व्रत पूरा हो गया। पानी भी पी लिया, चाँद भी देख लिया, और पति भी मिल गया।”
वो उठकर बैठी और मेरी तरफ़ देखा। “तू पति नहीं है अभी।”
“तो बन जाऊँ?”
उसकी आँखें बड़ी हो गईं। “सच?”
“सच,” मैंने कहा। “अगली करवा चौथ तक तू मेरी बीवी होगी। और उस दिन तू अपने ही घर में, अपने ही पलंग पर, अपने ही पति के लिए व्रत रखेगी।”
वो मेरी छाती पर गिर पड़ी और उसकी आँखों से आँसू निकल आए। फिर उसने मेरी गर्दन में मुँह दबाकर कहा, “तो फिर तेरे पास बहुत काम है।”
“बहुत काम है,” मैंने कहा। “लेकिन पहले कुछ खा ले।”
हम उठे। मैंने उसे अपनी कमीज़ पहनाई, जो उस पर कुर्ते जैसी लंबी हो गई, और मेज़ से फल और मिठाई ले आया। वो पलंग पर बैठकर खाने लगी — भूखी, थकी, बाल बिखरे, गाल लाल, और मुझे लगा कि इस रात में वो इसी तरह सबसे ज़्यादा खूबसूरत है।
फिर मेरा फोन बजा। प्रिया — “बीस मिनट हो गए, राकेश। मैंने झूठ बोल दिया है कि ऑटो का टायर पंचर हो गया। अब दस मिनट और।”
सोनिया ने मेरी तरफ़ देखा और हम दोनों हँस पड़े।
“दस मिनट,” उसने कहा और अपनी उँगली मेरी छाती पर फेरी।
“दस मिनट में क्या होगा?”
उसने मेरी कमीज़ का कॉलर पकड़कर मुझे अपनी तरफ़ खींचा।
“देखते हैं,” वो बोली।
और वो दस मिनट भी बीस मिनट बन गए। जब सोनिया आख़िर में नीचे उतरी, उसकी साड़ी की तहें ठीक से नहीं थीं, होंठ सूजे हुए थे, और गले पर एक निशान था जो पल्लू से भी नहीं छिप रहा था। प्रिया ने उसे देखते ही होंठ भींचे और सोनिया के कान में कुछ फुसफुसाया, और सोनिया शरमाकर हँस पड़ी।
ऑटो में बैठते वक़्त सोनिया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो पहले नहीं थी।
“अगली करवा चौथ,” उसने कहा।
“अगली करवा चौथ,” मैंने कहा।
और ऑटो चला गया। मैं गेट पर खड़ा रहा, उसकी गई हुई दिशा में देखता हुआ, और मेरे हाथ में अभी भी उसकी साड़ी की वो सुनहरी पिन थी जो खुलकर गिर गई थी।
कमरे में लौटा तो पलंग बिखरा पड़ा था, चादर सिलवटों में भरी थी, गुलाब की पंखुड़ियाँ कुचली हुई थीं, और हवा में अभी भी उसकी ख़ुशबू थी। मैं पलंग पर गिर पड़ा और छत को देखता रहा।
करवा चौथ के दिन मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को चोदा था — और उसके बाद जो बचा था, वो बस एक चीज़ थी: इंतज़ार। अगले साल का। अगली रात का। और उसके बाद हर रात का, जब वो मेरे घर में, मेरे पलंग पर, मेरी बाँहों में होगी और कोई दूरी नहीं होगी, कोई सहेली नहीं, कोई बहाना नहीं।
मैंने फोन उठाया और लिखा — “पहुँचकर बता देना। और सोनिया… आज रात के लिए धन्यवाद।”
जवाब देर से आया, जब वो घर पहुँची। बस दो शब्द — “तेरे लिए।”
और मैं उसी दो शब्दों को बार-बार पढ़ता रहा, जैसे कोई मंत्र।
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