karwa chauth gangbang chudai
मेरा नाम पार्वती है और मैं दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन की रहने वाली हूँ। साउथ एक्स — वो इलाका जहाँ पुरानी दिल्ली की महक और नई दिल्ली की चमक दोनों एक ही गली में घुली हुई हैं।
मेरे पापा बहुत रईस हैं। इतने रईस कि उनके गैराज में जो गाड़ियाँ खड़ी रहती हैं उनकी गिनती करने के लिए उँगलियाँ कम पड़ जाएँ, और हमारा जो बंगला है उसमें एक पूरी मंज़िल सिर्फ़ मेहमानों के लिए बनी हुई है।
मेरी परवरिश शहनाई की तरह हुई — नाज़ों में, रेशम में, और बहुत सारे प्यार में।
पापा कहते थे, “पारो, तू हमारी आँखों की रोशनी है,” और मम्मी कहती थीं, “इसकी सूरत नहीं, इसकी चाल देखो — रानी लगती है।” मैं बचपन से यही सुनती आई हूँ कि मेरा शरीर बना ही ऐसा है कि जहाँ चली जाऊँ, नज़रें मुझ पर रुक जाती हैं।
मेरी उमर अब सत्ताईस साल है। मेरी चूचियों का साइज़ 36 है — भारी, गोल, और इतनी भरी हुई कि ब्लाउज़ के भीतर उन्हें समेटना हर सुबह एक छोटा-सा संघर्ष होता है। मेरी कमर 32 इंच की है, जो उन चूचियों और नीचे के हिस्से के बीच एक ऐसा घुमाव बनाती है कि साड़ी का पल्लू वहीं अटक जाए। और मेरी गांड — भगवान जाने किस ख़ज़ाने से बनी है — 38 इंच की है।
बिल्कुल किसी नाइजीरियन औरत की तरह। गोल, ऊँची, भरी हुई, और चलते वक़्त ऐसी लहराती है कि पीछे वाला हर आदमी अपनी चाल भूल जाए। मेरे हिप्स जब दोनों तरफ़ फैलते हैं तो साड़ी का नापा नीचे तंग पड़ जाता है और मुझे हर बार एक्स्ट्रा पिन लगानी पड़ती है।
पापा एक बार हँसते हुए बोले थे, “बेटा, तेरी गांड देखकर लगता है हमारी नस्ल में कहीं अफ़्रीका घुल गया है।” और मैं उस बात को दिल से पकड़कर बैठ गई थी — क्योंकि उसी दिन मुझे पहली बार लगा था कि मेरा शरीर किसी ख़ास काम के लिए बनाया गया है।
मेरी त्वचा गेहुँआ है, बाल घने और काले, और आँखें बड़ी-बड़ी, जिनमें जब मैं शरमाती हूँ तो पानी आ जाता है। मेरे होंठ भरे हुए हैं और जब मैं हँसती हूँ तो गालों पर गड्ढे पड़ते हैं। मेरे निप्पल बड़े हैं — बहुत बड़े, और इतने संवेदनशील कि ब्लाउज़ के कपड़े की रगड़ से ही खड़े हो जाते हैं।
मम्मी कहती थीं कि ये दूध भरे निपल्स ही मेरी पहचान हैं, और मैंने बचपन से देखा है कि जब भी कोई मर्द मुझसे बात करता है, उसकी नज़र पहले मेरी आँखों पर रुकती है और फिर मेरी चूचियों के बीच फँस जाती है। शुरू में मुझे शर्म आती थी। फिर आदत हो गई। और फिर — पता नहीं कब — अच्छा लगने लगा।
मेरी शादी आज से ठीक चार साल पहले हुई थी। मेरे पति का नाम कैलाश है। कैलाश की हाइट 5 फ़ीट 9 इंच है, और उनके लंड का साइज़ 9.3 इंच है। वह देखने में बहुत हैंडसम है — असल में इतना हैंडसम कि जिस दिन पहली बार उसने मुझे देखा था, उस दिन मेरे हाथ से चाय का कप छूट गया था।
उसकी आँखें गहरी हैं, जबड़ा तराशा हुआ, और मुस्कुराते वक़्त उसके गाल पर एक हल्का-सा गड्ढा पड़ता है जो मुझे आज भी पागल कर देता है। कैलाश की बॉडी स्लिम है लेकिन कंधे चौड़े हैं, और उसकी बाँहों में एक ऐसी गर्मी है कि जाड़े की रात में भी उसके पास लेटकर मुझे कभी ठंड नहीं लगी।
मेरे ससुर दिनानाथ जी बहुत ही रईस और ऊँची पहुँच वाले आदमी हैं। उनकी पहुँच बड़े-बड़े अफ़सरों तक है। दिल्ली में जब कोई बड़ा फ़ाइल अटकती है तो लोग कहते हैं, “दिनानाथ जी से बात करा दो।” वह लंबे-चौड़े हैं, सफ़ेद-काली मिली घनी मूँछ रखते हैं, और सूट पहनकर ऐसे लगते हैं जैसे किसी पुरानी हिंदी फ़िल्म से निकल आए हों।
उनकी उमर पचपन के आसपास है, लेकिन बदन आज भी मज़बूत है। मेरी सास बहुत ख़ूबसूरत हैं — सच में, इतनी ख़ूबसूरत कि शादी के एल्बम में उनकी तस्वीर देखकर मुझे ईर्ष्या हुई थी।
लेकिन वो बीमार रहती हैं। शुगर, बीपी, घुटनों का दर्द — एक लंबी लिस्ट है जो कभी ख़त्म नहीं होती। इसलिए घर की रौनक बनाए रखने का काम मेरे हिस्से आया, और मैंने ख़ुशी से उठाया।
शादी के बाद मेरे और मेरे हसबैंड के बीच बहुत प्यार बढ़ा। ऐसा प्यार जो रात की चादर के नीचे से शुरू होकर सुबह की चाय तक चलता रहता है। कैलाश मुझे “पारो” कहकर बुलाता है और मैं उसे “कैलू”।
वह मेरे बालों को उँगलियों से सहलाता है, मेरे कंधों पर अपनी ठुड्डी रखता है, और मुझे ऐसे देखता है जैसे दुनिया में मेरे सिवा कुछ है ही नहीं। हम रात-रात भर बातें करते — बचपन की, फ़िल्मों की, और हमारे शरीर की। क्योंकि हमारे बीच शर्म नाम की चीज़ तीन महीने में मर गई थी।
और उसी खुली बातचीत में एक चीज़ निकली जो हमारा सबसे बड़ा राज़ बन गई — कैलाश को नीग्रो औरतें बहुत पसंद थीं। बहुत ज़्यादा। हम लोग अक्सर ब्लैक रंडियों की चुदाई देखते।
लैपटॉप खुलता, हेडफ़ोन लगते, और हम दोनों सोफ़े पर लिपटकर देखते कि कैसे कोई स्याह, लंबी, मांसल नाइजीरियन लड़की चार-पाँच काले लंडों से एक साथ भरी जा रही है।
कैलाश मेरे पीछे बैठता, मेरी चूचियों को अपने हाथों में लेता, और मेरे कान में धीरे से कहता, “देख पारो, देख कैसे फटती है।” और मैं उस वक़्त अपनी जाँघें कसकर दबा लेती थी क्योंकि मेरी चूत पहले ही गीली हो चुकी होती थी।
जब मैं कॉलेज में थी तो मैंने दिल्ली में बहुत से नाइजीरियन मर्दों को देखा था। वो लंबे, चौड़े, गहरे रंग के, बड़ी आवाज़ में हँसने वाले मर्द। जब वो बाज़ार से गुज़रते तो मैं रुक कर देखती रह जाती।
उनके कंधे दरवाज़े जितने चौड़े लगते, और उनकी जाँघों के बीच जो भारीपन झूलता था, उसे देखकर मेरा दिल कहता — “ये पूरा नहीं, ये अंदर तक जाता है।”
मैंने चुदाई वाली फ़िल्मों में भी देखा था कि कैसे एक काली औरत के भीतर तीन-चार काले लंड एक साथ जाते हैं और वो औरत आधे घंटे तक चीखती रहती है।
और मुझे उनसे चुदवाने का बहुत मन था। बहुत। इतना कि रात में सोते वक़्त मैं कल्पना करती कि चार काली बाँहें मुझे उठाकर ले जा रही हैं और मैं बस बह रही हूँ।
मैं अक्सर अपने हसबैंड के सामने ब्लैक लंडों की तारीफ़ करती रहती थी। खाना खाते वक़्त, टीवी देखते वक़्त, बिस्तर पर लेटे वक़्त। मैं कहती, “कैलू, सोचो, कितना मज़ा आता होगा एक साथ पाँच ब्लैक लंड लेने में रंडियों को। और उन्हें एक साथ मिलकर चोदने में भी कितना मज़ा आता होगा — कोई बाल खींचता होगा, कोई कमर पकड़ता होगा, कोई चूचियाँ दबाता होगा।”
कैलाश हँसकर कहता, “तू तो रोज़ इन्हीं की बातें करती है। कहीं तू हमें धोखा तो नहीं दे रही?” और मैं कहती, “देखना, एक दिन तू ख़ुद पाँच नाइजीरियन ले आएगा।” वो हँसता और कहता, “ले आऊँगा।” और मैं समझती थी कि वो मज़ाक है।
करवा चौथ से एक दिन पहले मैंने मेहंदी लगवाई। पूरे दोनों हाथों पर, कोहनी से उँगलियों तक, गहरी लाल-भूरी मेहंदी।
मेहंदी लगाने वाली बाई ने मेरी हथेली पर बारीक़ डिज़ाइन बनाई — पंखुड़ियाँ, जाली, और बीच में एक छोटा-सा दीपक।
मैंने कहा, “बीच में कैलाश का नाम लिख दो।” और वो हँस पड़ी।
उस रात मैंने मेहंदी की ख़ुशबू में हाथ फैलाकर सोई, और कैलाश बार-बार उठकर मेरी हथेलियाँ देखता और कहता, “कितनी सुंदर लग रही है तू।”
उसी दिन मैंने हेयर कलर भी करवाया। बालों में गहरा बरगंडी-कत्थई रंग, जिसमें रोशनी पड़ने पर ताँबे जैसी चमक आती थी। सैलून से निकली तो कैलाश मुझे देखकर ठिठक गया।
उसने मेरे बालों की एक लट पकड़ी, होंठों से चूमा, और कहा, “पारो, तू तो मुझे बर्बाद कर देगी।” मेरी चूचियाँ उसके सामने थीं, बालों से भीगी, और उसकी नज़र वहीं अटक गई। उसने धीरे से कहा, “कल व्रत रखेगी न?”
मैंने हाँ कहा। उसने कहा, “तो आज रात पूरा हक़ माँग लूँ, क्योंकि कल तू भूखी रहेगी।” और उस रात उसने मुझे ऐसे चोदा कि मेरी चूत सुबह तक सुलगती रही।
करवा चौथ के दिन मैंने अपने हसबैंड के लिए व्रत रखा। सुबह सरगी खाई, फिर पूरे दिन पानी का एक कतरा भी नहीं। मैंने लाल साड़ी निकाली — वही जो शादी के बाद पहली करवा चौथ पर पहनी थी। सिंदूर भरा, बिंदी लगाई, चूड़ियाँ चढ़ाईं, पायल पहनी, और कानों में झुमके टाँगे।
आईने में ख़ुद को देखकर मुझे लगा कि मेरी आँखों में एक ऐसी चमक है जो सिर्फ़ इंतज़ार की होती है। चूचियों पर ब्लाउज़ तंग था, और साड़ी की किनारी जब सीने पर पड़ती तो मेरे निप्पल उभर आते — मैंने शीशे के सामने करवट बदली और मुस्कुराई।
शाम के समय मेरी सास और ससुर अपने पुरखों के गाँव शिकोहाबाद चले गए। कोई पुश्तैनी ज़मीन का मामला था, किसी पुराने कारीगर की तबीयत ख़राब थी, और सास ने कहा, “पारो, तू यहीं रुक, तेरा व्रत है, तू कैलाश का मुँह देखेगी।” मैंने उनके पैर छुए और वो चले गए।
घर एकदम ख़ाली हो गया — बस मैं, दीवारों पर टिक-टिक करती घड़ी, और रसोई से आती मिठाई की महक।
मैं अपने हसबैंड का इंतज़ार कर रही थी। छत पर पूजा की थाली सजा दी थी — छन्नी, करवा, दीया, रोली, चावल, और एक कटोरी में पानी।
अंगीठी जलाकर रखी थी ताकि ठंड न लगे। ऊपर का आसमान धुँधला नीला था और चाँद कहीं बादलों के पीछे छिपा हुआ था। मैंने चूड़ियाँ झंकारते हुए दीया जलाया और बालकनी से नीचे सड़क देखने लगी।
तभी मेरा फ़ोन बजा। कैलाश का नाम चमका।
“पारो,” उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ख़ुशी थी, “छत पर आ जा। चाँद निकल आया है।”
“तू कहाँ है?” मैंने पूछा।
“छत पर हूँ। आ जा, जल्दी। अंगीठी उठा ले और थाली भी।”
मैंने फ़ोन रखा और मेरा दिल धक-धक करने लगा। साड़ी का पल्लू ठीक किया, सिंदूर को एक बार छुआ, और अंगीठी उठाकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे हिप्स हर क़दम पर लहरा रहे थे और पायल बज रही थी।
मैं मन में सोच रही थी कि आज उसने इतनी जल्दी क्यों बुलाया — और ऊपर जाकर मेरा व्रत तोड़ने की रस्म के लिए मुझे पहले उसका मुँह देखना था, छन्नी से, फिर चाँद को, फिर उसे पानी पिलाना था।
छत का दरवाज़ा खोला। ठंडी हवा मेरे चेहरे पर लगी।
और फिर मैं एकदम से जम गई।
क्योंकि छत पर सिर्फ़ कैलाश नहीं था। छत पर पाँच नाइजीरियन खड़े थे। पाँच। पूरे पाँच। काले, लंबे, चौड़े, बड़ी हँसी वाले, और इतने ऊँचे कि हमारी छत की बैकग्राउंड लाइट्स उनके कंधों के नीचे लग रही थीं।
उनमें से एक भी छह फ़ीट से कम नहीं था। उनके बाज़ू खुले हुए थे, कमीज़ें आधी खुली, और उनके सीने पर एक अलग तरह की चमक थी।
मैंने थाली को कसकर पकड़ लिया क्योंकि लगा कि हाथ से गिर जाएगी।
कैलाश बीच में खड़ा मुस्कुरा रहा था — मेरा पति, मेरा कैलू, 5 फ़ीट 9 इंच, उन पाँचों के बीच एकदम छोटा-सा लग रहा था, लेकिन उसकी छाती चौड़ी थी और आँखों में एक ऐसा नशा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
“ये… ये कौन हैं?” मेरी आवाज़ फटी हुई निकली।
कैलाश मेरे पास आया। उसने मेरे हाथों से अंगीठी लेकर एक तरफ़ रखी, थाली लेकर पास के स्टूल पर रखी, और फिर दोनों हाथों से मेरा चेहरा उठाया।
“पारो,” उसने धीरे से कहा, “याद है तू कहती थी कि एक दिन तू ख़ुद पाँच नाइजीरियन ले आएगा?”
मैंने सिर हिलाया, गला सूखा हुआ।
“तो मैं ले आया।” उसने पीछे मुड़कर उन पाँचों की तरफ़ इशारा किया। “ये मेरे दोस्त हैं। लंबे समय से दिल्ली में हैं, काम करते हैं, और मैंने इन्हें आज ख़ास बुलाया है।”
फिर उसने मेरे कान में वो जुमला कहा जो मेरी ज़िंदगी बदल देने वाला था। उसने कहा —
“आज ये पाँचों तुम्हारे पति हैं। और मैं सिर्फ़ तुम्हें इनकी पत्नी और रंडी बनकर चुदवाते हुए देखूँगा।”
मेरी चूत में एक झटका-सा लगा। बिल्कुल सच में। मैंने साड़ी के नीचे अपनी जाँघें कस लीं और महसूस किया कि मेरी चड्डी पहले ही गीली हो चुकी है।
कैलाश ने मुझे उनसे मिलवाया। पहला — ओबी। छह फ़ीट चार इंच, इग्बो, चौड़े कंधे, हँसी में सारी छत गूँज उठी। दूसरा — चुकवुडी, जिसे सब चुकी बुलाते थे।
सबसे लंबा, छह फ़ीट छह इंच, पतला-दुबला लेकिन बाँहों में इस्पात। तीसरा — एमेका, गोल-मटोल बदन वाला, भारी जाँघों वाला, जिसकी छाती पर बालों की घनी लकीर थी।
चौथा — टुंडे, योरूबा, हँसते हुए बोला, “मैडम, आपकी साड़ी बहुत सुंदर है,” और उसकी आवाज़ इतनी भारी थी कि लगा ज़मीन हिल गई। और पाँचवाँ — सेगुन, सबसे छोटा, पर छह फ़ीट दो इंच, और सबसे शरारती आँखों वाला।
पाँचों ने एक-एक करके मेरा हाथ चूमा। उनके हाथ मेरी कलाई से दुगने मोटे थे। जब ओबी ने मेरा हाथ पकड़ा तो मेरी पूरी हथेली उसकी हथेली में छिप गई।
“पहले रस्म,” कैलाश ने कहा। “व्रत तोड़ना ज़रूरी है।”
उसने छन्नी उठाई और मेरे सामने तान दी। मैंने उसके पीछे से छन्नी के छेदों में अपने पति का चेहरा देखा — मेरा कैलू, मुस्कुराता हुआ। फिर मैंने चाँद को देखा।
फिर उसने करवे से पानी मेरी हथेली पर डाला और मैंने वो पानी पिया। पानी गले से उतरते ही मेरे भीतर एक ठंडक फैल गई, लेकिन नीचे तो आग जल रही थी।
कैलाश ने मिठाई का एक टुकड़ा मेरे मुँह में डाला और फिर वही टुकड़ा चूमकर खा लिया। उसने मेरे होंठों को चूमते हुए कान में कहा, “आज रात तेरी चूत रानी है। और ये पाँचों इसके सेवक हैं।”
फिर फोरप्ले शुरू हुआ — और वो फोरप्ले ऐसा था जैसे कोई आरती उतार रहा हो, बस उतारने वाले पाँच हाथ और चूमने वाले पाँच मुँह थे।
कैलाश ने पीछे हटकर अपनी बाँहें बाँध लीं और देखने लगा। उसने कहा, “पारो, तू कुछ मत कर। बस खड़ी रह। ये पाँचों तुझे खोलेंगे।”
और वो पाँचों मेरे चारों तरफ़ घेरा बनाकर खड़े हो गए। टुंडे ने मेरी पीठ पर हाथ रखा और साड़ी का पल्लू धीरे से खींच लिया। पल्लू जब गिरा तो मेरे ब्लाउज़ की गहरी कटाई और मेरी चूचियों का ऊपरी हिस्सा सामने आ गया।
चुकी ने सीटी बजाई। “आह, मैडम,” वो बोला, “आपके दूध तो भगवान ने ख़ास बनाए हैं।” उसने उँगली से मेरे ब्लाउज़ के किनारे को छुआ और मेरे निप्पल पहले से ही तने हुए थे — कपड़े के नीचे उभरी हुई दो गोलियाँ साफ़ दिख रही थीं।
एमेका ने पीछे से मेरी कमर पकड़ी। उसकी दोनों हथेलियाँ मेरी कमर के 32 इंच पर ऐसे बैठीं जैसे वो माप ही उसके लिए बना हो।
उसने धीरे से मेरी नाभि पर अँगूठा रखा और कहा, “बहुत पतली कमर है। और नीचे?” उसने मेरी गांड पर हल्की-सी थपकी दी और मैं “आह” करके झुक गई। मेरी 38 इंच की गांड उसके हाथ में आते ही मानो अपनी जगह ढूँढ लेती है।
ओबी ने मेरे ब्लाउज़ के हुक खोले। एक-एक करके। पाँच हुक। और जब आख़िरी खुला तो मेरी चूचियाँ ब्लाउज़ से बाहर झूल गईं, भारी, गोल, और उनके बड़े निपल्स हवा लगते ही और कसे हो गए।
पाँचों एक साथ “ओह” करके बोले। कैलाश ने पीछे से कहा, “देखा? मैंने कहा था न। ये मेरी पारो हैं।” उसकी आवाज़ में गर्व था — असली गर्व, जैसे कोई अपनी चीज़ दिखा रहा हो।
सेगुन झुका और उसने मेरे दाएँ निप्पल को मुँह में ले लिया। पहले हल्का, फिर पूरा चूसने लगा। मेरे मुँह से एक लंबी “आssss” निकली और मेरे घुटने काँप गए।
बाईं तरफ़ से टुंडे ने अपना मुँह लगाया और वो भी चूसने लगा। दोनों तरफ़ से दूध चूसा जा रहा था और मेरी चूत में लगातार पानी बह रहा था। उनके दाँत मेरे निपल्स पर हल्के-हल्के रगड़ते और फिर जीभ से गोल-गोल घुमाते। मैं अपने दोनों हाथ उन दोनों के सिर पर रखकर उन्हें और दबाने लगी।
चुकी पीछे से झुका और उसने मेरी साड़ी की कमर खोली। साड़ी सरकती हुई नीचे गिरी और मेरी पेटीकोट और पेटीकोट के नीचे छिपी मेरी चूत की गर्मी सामने आ गई।
उसने मेरी नाभि चूमी, फिर पेटीकोट की नाड़ खींची और वो भी गिर गई। अब मैं सिर्फ़ लाल चड्डी में थी। पतली लाल चड्डी। और उस चड्डी पर पहले से ही मेरे रस का गीला दाग़ फैला हुआ था।
एमेका ने घुटने टेके और उसने मेरी चड्डी के ऊपर से मेरी बुर को सूँघा। “आह,” वो बोला, “ये गंध।” उसने जीभ से चड्डी के ऊपर से मेरी चूत की दरार पर लंबी लकीर खींची और मैंने कैलाश की तरफ़ देखा।
कैलाश अपनी जगह खड़ा था, हाथ बँधे, आँखें चमकती हुईं, और होंठ खुले हुए। उसने बस इतना कहा, “खोल दो।”
एमेका ने चड्डी नीचे खींची। जब चड्डी मेरे घुटनों से सरकी, तो मेरी चूत से एक महीन चमकती लकीर टूटी और नीचे जाकर चड्डी में फैल गई। पाँचों ने एक साथ देखा। मेरी बुर खुली हुई, भरी हुई, गुलाबी-भूरी, और उसके ऊपर के बाल कलम की तरह सँवारे हुए थे। मैंने महसूस किया कि मेरी चूत की हवा से ठंडक और उनकी साँसों की गर्मी — दोनों एक साथ।
कैलाश ने आगे बढ़कर मेरे होंठ चूमे। गहरा, लंबा चुंबन। उसने मेरी जीभ चूसी और मेरे होंठ काटे। फिर उसने मेरे माथे पर होंठ रखे, सिंदूर को छुआ, और बोला, “पारो, आज तू रंडी बनेगी, पर मेरी रंडी। समझी?” मेरी आँखें भर आईं। प्यार से, नशे से, और इंतज़ार से।
फिर कैलाश ने योजना बताई। असली योजना। जैसे कोई डायरेक्टर शॉट-लिस्ट समझाता है। वो छत के बीच में आया, अपनी अंग्रेज़ी-हिंदी मिली भाषा में बोला, और पाँचों उसकी बात ध्यान से सुनते रहे। मैं नंगी खड़ी थी, काँपती हुई, और मेरे भीतर हर शब्द घंटी की तरह बज रहा था।
“पहले — सब अपने लंड निकालो,” कैलाश ने कहा। “पारो को देखने दो कि उसने क्या माँगा था।”
पाँचों ने एक साथ अपनी जीन्स खोली। और जब वो नीचे आईं, तो मेरी साँस रुक गई।
मैंने उन्हें देखा और गिना — ओबी का लंड ग्यारह इंच का, मोटा, नसों की उभरी हुई जाली, जिसका सिरा इतना भारी था कि वो झूलता रहता था। चुकी का साढ़े ग्यारह इंच, पतला-लंबा, बाँस की तरह।
एमेका का दस इंच का, और मोटाई में सबसे आगे — इतना मोटा कि मेरी कलाई उसके चारों तरफ़ बंद हो जाए। टुंडे का ग्यारह इंच, और सेगुन का दस-साढ़े दस। पाँचों के लंड एक-एक करके खड़े हो रहे थे, काली-भूरी चमड़ी में लिपटे, गोल बड़े सिरों वाले, और नीचे उनकी भारी थैलियाँ एक अलग ही वज़न बनाती थीं।
मेरे पति का 9.3 इंच का लंड उनके सामने छोटा लग रहा था — और मुझे यही सबसे ज़्यादा उत्तेजित कर रहा था। कैलाश ने मेरा मुँह पकड़ा और कहा, “बोल, क्या माँगा था तूने?”
“पाँच,” मैंने फुसफुसाया।
“क्या?”
“पाँच काले लंड। एक साथ।”
“तो ले।” उसने मेरी गांड पर हाथ रखा और मुझे आगे धकेला। “पहले हाथ से नाप ले। सबको नाप। जैसे तू बाज़ार में साड़ी नापती है।”
मैंने एक-एक का लंड अपने दोनों हाथों में लिया। मेरी हथेलियों में वो इतने भारी थे कि लगा किसी का अंगूठा पकड़ रही हूँ। जब मैंने ओबी का नापा तो मेरी दोनों हथेलियाँ भी उसके आधे हिस्से को नहीं ढक पाईं।
मैंने सबको धीरे से सहलाया, ऊपर से नीचे, और उनके सिरों पर अँगूठे से गोल-गोल घुमाया। सेगुन की साँस भारी हो गई और उसने मेरे बालों को पकड़कर मेरा सिर नीचे किया।
फिर पहला चरण — मुँह।
मैंने एमेका को चुना क्योंकि वो मोटाई में सबसे भारी था और मैं जानना चाहती थी कि क्या मेरा जबड़ा खुल जाएगा। मैं घुटनों पर बैठी, दोनों हाथ उसकी जाँघों पर रखे, और उसका लंड मुँह में लिया। पहले सिरा, फिर आधा, फिर और।
मेरी आँखों से पानी आ गया और मैं गला दबाकर “घhh” करने लगी। टुंडे मेरे पीछे खड़ा होकर मेरे बाल एक मुट्ठी में लेकर मेरा सिर धीरे-धीरे आगे-पीछे कर रहा था, और एमेका मेरे निपल्स को उँगलियों से मरोड़ रहा था। मेरी चूत से रस मेरी जाँघों पर बहकर टपक रहा था।
कैलाश पीछे से आया और उसने मेरी गांड के दरार पर अपना लंड रखा। सिर्फ़ रखा — अंदर नहीं डाला। और मेरे कान में बोला, “अभी नहीं। पहले इन्हें तेरी बुर चखने दे। तेरी चूत आज इन पाँचों की है। मेरी बाद में।”
फिर शुरू हुआ — और मैंने वो महसूस किया जो मैंने चार साल सपनों में देखा था।
ओबी ने मुझे छत की चटाई पर लिटाया। मेरी कमर के नीचे एक तकिया रखा गया ताकि मेरी गांड ऊपर उठ जाए और मेरी बुर पूरी खुली रहे। उसने अपना ग्यारह इंच का लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा, दो उँगलियों से मेरे रस को फैलाया, और एक ही झटके में आधा अंदर कर दिया। मेरे मुँह से चीख निकली — “आssss कैलू!” मेरी चूत पहली बार इतनी भरी हुई थी। वो अंदर और गया, और गया, और जब मुझे लगा कि अब बस, तब भी गया। जब उसका पूरा लंड अंदर था तो मुझे लगा कि मेरी चूत की दीवारों ने उसे गले लगा लिया है।
कैलाश मेरे सिर के पास बैठ गया और मेरे बाल सहलाने लगा। “हाँ पारो, हाँ,” वो बोला, “ले। पूरा ले।” उसने मेरी चूचियों को अपने हाथों में लिया और निपल्स को अँगूठे से दबाया, और ओबी ने धक्के मारने शुरू किए। पहले धीरे, फिर भारी। हर धक्के पर मेरी चूचियाँ ऊपर-नीचे झूलतीं और कैलाश उन्हें वापस पकड़ लेता। मेरे हिप्स पर टुंडे और सेगुन के हाथ थे — एक तरफ़ एक। वो मेरी 38 इंच की गांड को पकड़कर ओबी के धक्कों के साथ मुझे उस पर धकेलते, और मेरी गांड की लहर उनकी हथेलियों में बजती रहती थी।
मैं चीख रही थी। छत पर हमारी आवाज़ें गूँज रही थीं और नीचे सड़क की गाड़ियों की आवाज़ भी दब गई थी। मेरी चूत पहले कसी हुई थी, फिर ढीली पड़कर उसे ढँक लिया, और फिर हर धक्के पर चप-चप की आवाज़ आने लगी। मेरा पहला झड़ना आया — ऐसा झड़ना जिसमें मेरी पूरी कमर उठ गई और मैंने ओबी की छाती पर अपने नाखून गाड़ दिए। उसने मेरा मुँह चूमा और बोला, “मैडम, अभी तो शुरू हुआ है।”
तभी कैलाश ने कहा, “अब डबल। पारो, तैयार हो?”
मैंने हाँ कहा, हालाँकि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे। चुकी आया और उसने मुझे उठाकर घुटनों पर खड़ा किया — डॉगी पोज़ीशन। ओबी मेरे नीचे लेटा, उसका लंड ऊपर की तरफ़ तना हुआ, और मुझे उस पर बैठाया गया। वो अपना पूरा लंड मेरी चूत में डालकर लेट गया। और फिर चुकी पीछे से आया और उसने अपना लंड उसी चूत के मुँह पर, ओबी के लंड के ऊपर से रखा।
मुझे लगा मेरी चूत फट जाएगी।
वो धीरे-धीरे दबाने लगा। मेरा रस बह रहा था, मेरा रस ओबी के लंड पर चिकनाई बन चुका था, और चुकी उसी चिकनाई में सरकने लगा। जब उसका सिरा अंदर गया तो मेरी आँखों से आँसू निकल आए — असली, ख़ुशी के आँसू। दो लंड। एक ही चूत में। दोनों अंदर, दोनों तने हुए, एक-दूसरे के ऊपर। मेरी चूत का मुँह इतना फैला हुआ था कि मुझे अपनी ही बुर पहचान नहीं रही थी।
कैलाश घुटनों के बल मेरे चेहरे के सामने आया। उसने मेरी ठुड्डी उठाई और कहा, “देख, मेरी पारो, तेरी चूत दो लंडों को एक साथ खा रही है।” उसने मेरे होठों पर अपना लंड रखा और मैंने उसे भी मुँह में लिया। अब तीन लंड — दो अंदर, एक मुँह में। टुंडे और सेगुन दोनों तरफ़ से मेरे निपल्स चूस रहे थे, और एमेका मेरी गांड पर अपना भारी लंड रगड़ रहा था, तैयारी कर रहा था।
चुकी और ओबी ने लय बनाई। एक अंदर जाता तो दूसरा बाहर निकलता — सटीक, घड़ी की तरह। मेरी चूत के अंदर दो सिरे एक-दूसरे को रगड़ते और मेरी जी-स्पॉट पर लगातार चोट करते रहे। मेरे पेट में एक गाँठ बनने लगी। मैंने अपनी गांड पीछे धकेली और एमेका से कहा, “गांड में डालो। अभी।”
एमेका पीछे आया। उसने अपना रस से भीगा लंड मेरी गांड के छेद पर रखा, अँगूठे से मेरे रस को लगाया, और धीरे से दबाया। मेरी गांड खुली, भरी हुई, और उसका लंड उसका नाप ले रहा था। जब सिरा अंदर गया तो मैंने छत पर अपने दोनों हाथ रखे और कराही — “ऊsss माँsss।” मेरी गांड की दीवारें फैलती हुई महसूस हो रही थीं, एक-एक इंच, और फिर उसका पूरा दस इंच अंदर था।
अब तीन लंड मेरे भीतर थे। दो मेरी बुर में, एक मेरी गांड में। मेरी रीढ़ में एक कंपन दौड़ी जिसे मैंने कभी महसूस नहीं किया था। तीनों अलग-अलग लय में चल रहे थे — कभी साथ, कभी बारी-बारी। मेरी गांड में एमेका का लंड जब अंदर जाता तो मेरी चूत की दीवारें और कस जातीं और ओबी-चुकी दोनों एक साथ कराह उठते। मेरे भीतर का पूरा नक़्शा हिल गया था।
और मेरे हाथ? मेरे दोनों हाथ ख़ाली नहीं थे। टुंडे और सेगुन ने मेरे दोनों हाथों में अपने-अपने लंड रख दिए और मुझे मुट्ठी बनाकर उन्हें चोदने का इशारा किया। मैं दोनों हाथों से उनके ग्यारह और साढ़े दस इंच के लंड मसल रही थी — ऊपर-नीचे, नसों पर अँगूठा, सिरे पर गोल घुमाव — जबकि मेरे भीतर तीन लंड चल रहे थे और मेरे दोनों निपल्स पर टुंडे-सेगुन के होंठ… असल में अब एमेका की जगह टुंडे मेरी गांड में आ गया और एमेका मेरी चूचियाँ चूसने लगा।
पाँच लंड, एक औरत। मेरी चूत, मेरी गांड, मेरे दोनों हाथ और मेरा मुँह — पूरा शरीर भरा हुआ। कैलाश एक तरफ़ बैठकर यह सब देख रहा था और अपना लंड ख़ुद मसल रहा था। उसकी आँखें लाल थीं। उसने कहा, “पारो, बोल — कैसा लग रहा है?”
“भर गई हूँ,” मैंने हाँफते हुए कहा। “पूरी भर गई हूँ।”
“और?”
“और… और चाहिए।” और पाँचों ज़ोर से हँसे।
उन्होंने मुझे पलटा। अब उल्टी लिटाया — मेरी पीठ चटाई पर, पैर ऊपर, और गांड के नीचे तकिया। अब जो अंदर थे उन्होंने जगह बदली। इस बार चुकी और टुंडे मेरी चूत में गए — दोनों एक साथ, दोनों लंबे, दोनों एक ही लय में — और ओबी मेरी गांड में। और जब ओबी का ग्यारह इंच मेरी गांड में पूरा गया, तो मुझे लगा कि मेरे पेट में उसका सिरा महसूस हो रहा है।
इस बार मेरी गांड में एक और मेरी चूत में दो — और मेरी दोनों चूचियाँ एमेका और सेगुन के मुँहों में, और मेरी जीभ कैलाश की जीभ से लिपटी हुई। कैलाश मेरे ऊपर झुका और उसने मुझे चूमा जबकि नीचे तीन काले लंड मुझे चोद रहे थे। उसके चुंबन में एक अजीब-सी रोमांटिक कोमलता थी — जैसे ऊपर हम दो पति-पत्नी हों और नीचे एक पूरी गैंग हो। मैंने उसका नाम लिया, बार-बार, “कैलू… कैलू…” और वो मेरे माथे पर होंठ रखता रहा और कहता रहा, “मेरी पारो, मेरी रंडी, मेरी रानी।”
फिर उन्होंने मुझे सीधा करके बैठाया और वो पोज़ीशन बनाई जिसे कैलाश ने “एयरटाइट” कहा। मैं बैठी, पीठ ओबी की छाती से लगी हुई, और ओबी मेरी गांड में अंदर। मेरी चूत खुली हुई सामने। चुकी सामने घुटनों पर आया और अपना लंड मेरी चूत में डाल दिया — अब मैं दोनों तरफ़ से भरी हुई, दोनों तरफ़ से लंड अंदर, और वो दोनों एक-दूसरे को मेरी दीवारों के भीतर महसूस कर रहे थे। और फिर सेगुन ने मेरा सिर नीचे किया और अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया। तीनों लंड एक ही औरत में — मुँह, चूत, गांड — और टुंडे और एमेका दोनों तरफ़ से मेरे दूध और निपल्स चूसते रहे, मेरी कमर और हिप्स सहलाते रहे, और मेरे कानों में गंदी बातें कहते रहे।
“तुम्हारी चूत कस रही है, मैडम।”
“तुम्हारी गांड कितनी गरम है।”
“तुम्हारे दूध में दम है।”
“देखो कैसे तीन लंड एक साथ झेल रही है।”
“आज तुम हमारी पत्नी हो।”
और कैलाश — मेरा कैलू — मेरी चूचियों के बीच से नीचे देख रहा था और बार-बार कह रहा था, “शाबाश पारो, शाबाश मेरी जान।” उसने अपना लंड मेरी चूचियों के बीच रखकर मेरे दूध से उसे दबाया और आगे-पीछे करने लगा। अब मेरे शरीर पर चार जगह चुदाई हो रही थी और मेरी चूचियों के बीच मेरा पति अपना लंड रगड़ रहा था। मैं सिर्फ़ एक चीखती हुई, बहती हुई, भरी हुई औरत थी।
उन्होंने मुझे ऊपर बैठाया। अब मैं घुटनों के बल, एमेका की छाती पर बैठी, उसका मोटा दस इंच मेरी चूत में। मैंने ख़ुद हिप्स चलाने शुरू किए — ऊपर-नीचे, गोल-गोल, और भीतर की मांसपेशियों से उसे कसकर पकड़ा। एमेका ने आँखें बंद कर लीं और कराहने लगा, “ओह मैडम, ओह मैडम।” और उसी वक़्त ओबी पीछे से आया और उसने अपना लंड मेरी गांड में डाल दिया, और मैंने अपनी दोनों हथेलियाँ आगे बढ़ाकर चुकी और टुंडे के लंड पकड़ लिए और उन्हें मसलने लगी। और सेगुन ने मेरे सामने घुटने टेके और मेरे दूध को अपने दोनों हाथों में लेकर निपल्स पर जीभ फेरने लगा।
मैं ऊपर बैठी हुई थी, मेरी गांड ऊपर उठी हुई, मेरी कमर गोल-गोल घूम रही थी, और नीचे दो लंड मेरे भीतर एक-दूसरे को रगड़ रहे थे। मेरे चेहरे पर पसीना था, मेरे बाल चिपक गए थे, और मेरे होंठ फटे हुए थे। कैलाश मेरे पीछे आया, उसने मेरे कंधे पर ठुड्डी रखी, मेरी कमर पकड़ी, और मेरे हिप्स को उस लय में धकेलने लगा जिसमें वो ख़ुद चलाना चाहता था। उसने कहा, “अब तेरे पति की बात मान। ऊपर-नीचे। और तेज़। और गहरा।”
मैंने वैसे ही किया। और मेरा दूसरा और तीसरा झड़ना एक साथ आ गया। मेरी चूत ने एमेका के लंड को इतनी ज़ोर से कसा कि वो चीख पड़ा, और मेरी गांड ने ओबी को। मैंने सिर पीछे किया और छत के ऊपर चाँद को देखा और सोचा कि आज चाँद ने भी मुझे देख लिया होगा।
पहला झड़ने वाला चुकी था। उसने अपना लंड मेरी चूत से निकाला, मेरी चूचियों के बीच रखा, और दो-तीन बार रगड़कर झड़ गया — गाढ़ा, गरम, सफ़ेद दूध मेरी गर्दन, मेरे दूध और मेरे होंठों तक फैल गया। मैंने अपनी जीभ से होंठों का दूध चाटा। उसका स्वाद नमकीन और गाढ़ा था।
फिर टुंडे। उसने मुझे घुटनों पर लिटाया, मेरी गांड ऊपर उठाई, और मेरी चूत में डालकर तेज़-तेज़ धक्के मारने लगा — असली, भारी, जानवर जैसे धक्के। हर धक्के पर मेरी पूरी गांड हिलती और मेरी चूचियाँ चटाई पर रगड़ खातीं। वो पाँच मिनट तक चोदता रहा, फिर निकालकर मेरी गांड की दरार पर झड़ गया। उसका दूध मेरी गांड की दरार से बहकर मेरी जाँघों पर आ गया।
फिर सेगुन। उसने मेरी गांड में डाला और मेरी चूत को उँगलियों से चोदा — दो उँगलियाँ, फिर तीन। उसने मेरी गांड में धीरे-धीरे गहरे धक्के मारे और मेरी चूत की दीवारों को भीतर से सहलाया। मैंने चौथा झड़ना महसूस किया और चटाई पर औंधी पड़कर कराहने लगी। उसने भी मेरी गांड में झड़ दिया — गरम, भरा हुआ, और मैंने महसूस किया कि मेरी गांड उसके दूध से भर गई और वो बाहर निकलने लगा।
फिर ओबी। सबसे बड़ा, सबसे भारी। उसने मुझे उठाकर अपनी गोद में बैठाया — मेरी पीठ उसकी छाती से, मेरी गांड उसकी जाँघों पर, और उसने नीचे से अपना ग्यारह इंच मेरी चूत में ऊपर की तरफ़ डाल दिया। इस पोज़ीशन में उसका लंड मेरी जी-स्पॉट पर सीधा लग रहा था और हर झटके पर मेरी आँखों में चमक आ जाती थी।
उसने मेरी दोनों चूचियाँ पीछे से हाथों में लीं, उन्हें मुँह के पास लाकर उनके निपल्स चूसे, और मेरी गर्दन पर होंठ रखे। और फिर उसने मेरी चूत में झड़ना शुरू किया — लंबा, गाढ़ा, लगातार। मैंने महसूस किया कि मेरी चूत उसके दूध से भर गई और वो मेरी दीवारों पर फैल रहा है।
एमेका आख़िरी था। उसने मुझे फिर लिटाया, मेरे पैर उसके कंधों पर रखे, और अपना मोटा दस इंच मेरी चूत में डाला — जो अब पूरी गीली, फैली, और उन सबके दूध से चिकनी थी। वो धीरे-धीरे, गहरे-गहरे चोदता रहा और मेरी चूत के भीतर से दूध की चप-चप आवाज़ आने लगी।
मैंने उसके बाल खींचे और उसे अपने ऊपर दबाया। वो मेरे निपल्स चूसता रहा और मेरी चूत को बार-बार पूरा भरता रहा। और फिर उसने भी मेरी चूत में झड़ दिया।
और तब कैलाश आया।
पाँचों हट गए। छत पर सिर्फ़ मैं और मेरा पति। मैं चटाई पर लेटी थी — नंगी, पसीने से भीगी, मेरी चूत से पाँचों का दूध बह रहा था, मेरी गांड से बह रहा था, मेरे होंठों पर चिपका हुआ था। मेरे निपल्स सूजे हुए और लाल थे। मेरे बाल बिखरे हुए थे। मेरी साड़ी दूर पड़ी थी।
कैलाश मेरे ऊपर झुका। उसने पहले मेरे होंठ चूमे। फिर मेरे गालों पर के दूध की लकीर जीभ से साफ़ की। फिर मेरे निपल्स चूसे — कोमलता से, जैसे कोई घाव पर मरहम लगा रहा हो।
फिर उसने अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा, और धीरे से अंदर गया। उसका 9.3 इंच अंदर आया और मुझे लगा जैसे घर लौट आया हूँ। मेरी चूत ने उसे पहचान लिया। मेरी दीवारें उसके चारों तरफ़ लिपट गईं।
“पारो,” उसने मेरे कान में कहा, “आज तू पाँचों की पत्नी बनी। पर तू मेरी है।”
“मैं तेरी हूँ,” मैंने रोते-रोते कहा।
और फिर उसने मुझे चोदा — लेकिन एक अलग तरह से। पाँचों की तरह जंगली नहीं, बल्कि धीमे, गहरे, और हर धक्के में प्यार भरा। हर बार जब वो भीतर तक जाता, तो मेरे निपल्स उसकी छाती से रगड़ते और मेरे होठों से उसका नाम निकलता।
उसने मेरे कान में हमारी शादी की रात याद दिलाई, हमारा पहला चुंबन, पहली बारिश, और वो पहली रात जब उसने मुझे बताया था कि उसे नीग्रो औरतें पसंद हैं। मैं उसके नीचे लेटी हुई हँसती भी रही और रोती भी।
और फिर उसने मेरी चूत में झड़ दिया — आख़िरी, सबसे गहरा झड़ना। मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर अब छह मर्दों का दूध है, और मेरा पति मेरे ऊपर लेटा हुआ मेरे माथे पर होंठ रख रहा है।
पाँचों ने मिलकर मुझे छत के एक कोने में बने छोटे वॉशरूम में ले जाकर गुनगुने पानी से नहलाया। टुंडे ने मेरे बाल धोए, सेगुन ने मेरी पीठ पर साबुन लगाया, और एमेका ने मेरी जाँघों पर से सूखा दूध साफ़ किया। चुकी ने मुझे उठाकर बाहर लाया जैसे दुल्हन उठाते हैं, और ओबी ने मेरी साड़ी उठाकर मुझे दी।
कैलाश ने मुझे अपने कुर्ते में लपेट लिया — बहुत बड़ा था, मेरे घुटनों तक आ रहा था — और मुझे अंगीठी के पास बिठा दिया। उसने मेरे गीले बालों को अपनी उँगलियों से सँवारा और मेरे पैर अपनी गोद में रखकर मालिश करने लगा। पाँचों ने बियर खोली, एक तरफ़ बैठे हँसी-मज़ाक करते रहे, और हर दो मिनट में मुझे देखकर मुस्कुराते। कैलाश मेरे पास बैठा रहा, मेरा हाथ पकड़े हुए।
“कैसे लगा?” उसने धीरे से पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। चाँद अब बादलों से निकल आया था और उसकी रोशनी छत पर पड़ रही थी। मैंने कहा, “कैलू, तूने मेरा सपना पूरा किया।”
“मैंने नहीं,” उसने कहा, “तूने माँगा था। बस मैंने सुना।”
मैंने उसका हाथ अपने होठों से लगाया और कहा, “आज तेरे सामने चुदवाने में जो मज़ा आया, वो किसी और चीज़ में नहीं है। तूने मुझे देखा, तूने मेरा नाम लिया, तूने मेरे पास बैठकर मेरे दूध सहलाए। और नीचे मेरी चूत में तीन लंड चल रहे थे। कैलू, मैं तुझे हर साल ये गिफ्ट माँगूँगी।”
कैलाश हँसा। “हर साल?”
“हर करवा चौथ। पाँच नए।” और वो पाँचों भी हँस पड़े और चुकी ने कहा, “मैडम, हम तो हर करवा चौथ के लिए तैयार हैं।”
उस रात हम दोनों उसी छत पर चटाई पर सो गए — अंगीठी की गर्मी में, कंबल के नीचे, लिपटे हुए। मेरी चूत अब भी सुलग रही थी और मेरी गांड में एक हल्का-सा दर्द था जो मुझे पसंद था। कैलाश मेरे पीछे लेटा था, उसकी बाँह मेरी कमर पर थी, और उसका हाथ मेरे निपल्स पर आराम से रखा था। सोने से पहले उसने मेरे कान में कहा, “पारो, तू आज मेरी नज़र में और ऊँची हो गई।” और मैं मुस्कुराकर सो गई।
उस करवा चौथ के छह महीने बाद, बैसाख की तपती गर्मी में, वो रात आई जिसने मेरी ज़िंदगी में एक और मोड़ जोड़ दिया — और वो मोड़ था मेरे ससुर, दिनानाथ जी।
बात यूँ हुई कि उस पूरे हफ़्ते सास को लगातार बुख़ार रहा और डॉक्टर ने उन्हें आराम की सलाह दी। सास अलग कमरे में सो रही थीं ताकि उन्हें शांति मिले। कैलाश उन दिनों दिल्ली से बाहर एक प्रोजेक्ट पर गया हुआ था — चार दिन के लिए। और घर में बस तीन लोग रह गए — मैं, मेरी बीमार सास, और मेरे ससुर।
उस रात बिजली चली गई थी। पूरे मोहल्ले में अँधेरा। मैं रसोई में मोमबत्ती जलाकर बर्तन धो रही थी — सिर्फ़ एक पतली सी कुर्ती पहनी हुई थी, जिसमें मेरी चूचियाँ और निपल्स साफ़ उभरे हुए थे, और नीचे पतली पाजामी, जिसमें मेरी 38 इंच की गांड का गोल घुमाव हर हरकत पर दिख जाता था।
ससुर जी रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए। “पारो, बेटा, इतनी रात तक जाग रही है?”
“सासू माँ की चाय बनानी है,” मैंने कहा और मुड़ी। मुड़ते वक़्त मोमबत्ती की रोशनी मेरे सामने पड़ी और ससुर जी की नज़र मेरे निपल्स पर जाकर रुक गई। उन्होंने जल्दी से नज़र हटाई, लेकिन मैंने पकड़ लिया।
हम दोनों रसोई में अकेले खड़े थे। बाहर बादल गरज रहे थे। ससुर जी ने पानी का गिलास उठाया और पीते-पीते कहा, “कैलाश के बिना अकेले लग रहा होगा तुझे।”
“थोड़ा,” मैंने कहा और मुस्कुराई।
“और… पिछले करवा चौथ की बातें कैलाश ने मुझे बताई थीं,” उन्होंने कहा। “वो पाँच… वो पाँच नाइजीरियन।”
मेरे चेहरे पर गर्मी दौड़ गई। “उन्होंने आपको बताया?”
ससुर जी हँसे। “बताया तो नहीं, हाँ… गलती से निकल गया। एक दिन वो कह गया कि ‘पापा, आपको पता है पारो को कैसी औरतें पसंद हैं?’ और फिर सारी कहानी सुना दी।” उन्होंने पानी का गिलास रखा और सीधे मेरी तरफ़ देखा। “तो पारो, तेरी… तेरी पसंद क्या है?”
मैंने गिलास धोते-धोते धीरे से कहा, “बड़े लंड, ससुर जी।” और फिर हिम्मत करके आँखें उठाईं।
ससुर जी एक क्षण चुप रहे। फिर उन्होंने कहा, “ग्यारह इंच बड़ा होता है?”
मेरा गला सूख गया। “क्या?”
“ग्यारह इंच,” उन्होंने दोहराया। “मेरा।”
मैंने बर्तन वहीं छोड़ दिया।
कहानी ये थी कि ससुर जी की उमर पचपन है और उनका शरीर आज भी मज़बूत है — यह तो मैं जानती थी, पर ये नहीं जानती थी कि उनका लंड ग्यारह इंच का है।
कैलाश के नौ-तीन के बाद, मुझे लगा था कि दुनिया में ग्यारह इंच वाले सिर्फ़ पाँच नाइजीरियन हैं जो उस रात छत पर आए थे। और अब मेरे ससुर, जो रोज़ सुबह अख़बार पढ़ते हैं, जो मेरे पापा की तरह सम्मान से बोलते हैं, वो ग्यारह इंच के लंड के मालिक थे।
उस रात के बाद से हम दोनों के बीच एक अजीब-सा खिंचाव बन गया। सास को डॉक्टर के पास ले जाने के बहाने हम साथ गाड़ी में बैठते, और रास्ते भर बातें होतीं।
वो मेरे हाथ पर हाथ रखते, मेरी चूड़ियों के बारे में पूछते, और जब गाड़ी में अकेले होते तो उनकी नज़र बार-बार मेरी चूचियों पर जाती। मैंने भी एक दिन बहाना बनाया — कहा कि मेरे कमरे की अलमारी का दरवाज़ा अटक गया है — और उन्हें अपने कमरे में बुलाया।
वो आए। अलमारी देखी। और फिर मेरे बिस्तर पर बैठ गए। और मैं उनके सामने खड़ी रही, पतली कुर्ती में, बिना ब्लाउज़ के।
फिर वो रात आई जिसे मैं “दूसरी शादी” कहती हूँ।
सास को नींद की गोली दी गई थी और वो गहरी सोई हुई थीं। रात के ग्यारह बजे थे। ससुर जी मेरे कमरे में आए, दरवाज़ा धीरे से बंद किया, और बिना कुछ बोले मेरे पास आकर खड़े हो गए।
मैंने उनकी कमीज़ के बटन खोले। उनका सीना चौड़ा था, बालों वाला, और मज़बूत। मैंने उन्हें बिस्तर पर बिठाया और उनकी पतलून खोली।
और जब उनका लंड बाहर आया, तो मैं घुटनों पर बैठ गई।
ग्यारह इंच। मोटा, सीधा, नसों से भरा हुआ, और सिरा गोल और भारी। उमर के हिसाब से इतना सख़्त और इतना जवान कि मुझे यक़ीन नहीं हुआ। मैंने दोनों हाथों से उसे पकड़ा और मुँह में लिया। आधा ही अंदर गया कि मेरा जबड़ा थक गया।
मैंने ऊपर-नीचे करना शुरू किया और ससुर जी ने मेरे बालों में हाथ डालकर धीरे-धीरे मेरा सिर थाम लिया। उनकी साँस भारी हो गई। उन्होंने पहली बार कहा, “पारो…” और वो नाम उनके मुँह से इतने प्यार से निकला कि मेरी चूत पहले ही गीली हो गई।
फिर उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। मेरी कुर्ती ऊपर की, पाजामी नीचे। उन्होंने मेरी चूचियों को देखा, दोनों हाथों से उन्हें भरा, और मेरे बड़े निपल्स को अँगूठे-उँगली से दबाया। फिर वो झुके और उन्हें चूसने लगे — एक-एक करके, बहुत देर तक, जैसे कोई भूखा आदमी।
मेरे मुँह से लगातार कराह निकल रही थी। उन्होंने मेरी गांड दोनों हाथों से पकड़ी, उसे भरकर सहलाया, और कहा, “कैलाश सच कहता था। तू बनी ही ऐसी है।”
फिर उन्होंने अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा। मैंने अपनी जाँघें फैला दीं और उन्हें अपने आसपास बुला लिया। वो धीरे-धीरे अंदर आए। पहले सिरा, फिर और, और फिर और।
जब आधा अंदर हुआ तो मैंने कराही। जब पूरा हुआ तो मेरी आँखें भर आईं। ग्यारह इंच मेरी चूत में पूरा भरा हुआ था और उनका सिरा मेरे गर्भ तक लग रहा था। मेरी चूत की दीवारें उनके चारों तरफ़ फैलकर कस गईं।
“दर्द हो रहा है?” उन्होंने रुककर पूछा।
“अच्छा दर्द है,” मैंने कहा। “आप रुकिए मत।”
और वो नहीं रुके। उन्होंने धीरे-धीरे, लंबे, गहरे धक्के मारने शुरू किए। हर धक्का मेरे पूरे शरीर को हिला देता। मेरी चूचियाँ उनकी छाती से रगड़ खातीं और उनके बाल मेरे निपल्स पर चुभते — और वो चुभन मुझे अच्छी लगती।
उन्होंने मेरी कमर पकड़ी, मेरी गांड उठाई, और मेरे पैर अपनी बाँहों में लपेट लिए, जिससे वो और गहरे जा सकें। मेरे भीतर हर धक्के पर चप-चप की आवाज़ आ रही थी और मेरे हिप्स पर उनकी उँगलियों के निशान बन रहे थे।
उस रात हमने कई पोज़ीशन बदले। एक बार वो मेरे नीचे लेटे और मैं उनके ऊपर बैठी और ख़ुद हिप्स चलाई — ऊपर-नीचे, गोल-गोल — और उन्होंने मेरी चूचियों को ऊपर से पकड़कर दबाया और मेरे निपल्स को उँगलियों में घुमाया।
एक बार वो पीछे से आए और मेरी गांड पकड़कर चोदते रहे — इस पोज़ीशन में मेरी 38 इंच की गांड का हर झटका उनके पेट से टकराता और एक भारी थप-थप की आवाज़ पैदा करता, जिसे सुनकर वो और उत्तेजित हो जाते।
एक बार उन्होंने मुझे सोफ़े पर लिटाया और खड़े होकर चोदा, मेरी टाँगें उनके कंधों पर। और एक बार उन्होंने मुझे आईने के सामने खड़ा किया, मेरी पीठ अपनी छाती से लगाई, और मुझे आईने में अपना चेहरा देखने पर मजबूर किया — मेरे होंठ खुले हुए, आँखें आधी बंद, और मेरी चूचियाँ उनके हाथों में।
आधी रात के बाद उन्होंने मेरी चूत में झड़ दिया। और जो झड़ना था वो… भरा हुआ, लंबा, और गरम। मैंने महसूस किया कि मेरी चूत उनके दूध से पूरी भर गई और वो मेरी जाँघों पर बहकर आ गया। उन्होंने अपना लंड निकाला और फिर बिस्तर पर मेरे पास लेट गए।
उन्होंने मेरे माथे को चूमा — ठीक वैसे जैसे कोई बेटी को चूमता है — और मैंने उनके सीने पर सिर रख दिया। दोनों की साँसें तेज़ थीं और कमरे में पसीने और उनके दूध की महक भरी हुई थी।
“पारो,” उन्होंने धीरे से कहा, “ये बात कैलाश को बताएँ?”
“बताएँ,” मैंने कहा, “वो ख़ुश हो जाएगा। उसे पता है मुझे बड़े लंड पसंद हैं। और उसे ये भी पता है कि उसके पापा के पास भी एक बड़ा है।”
वो हँस पड़े। “क्या पता?”
“अब पता हो गया,” मैंने कहा और उनकी छाती पर होंठ रख दिए।
आज मैं उस करवा चौथ को याद करती हूँ तो लगता है कि मेरे पति ने मुझे पाँच काले लंड गिफ्ट किये थे — लेकिन असल में उन्होंने मुझे उससे बहुत बड़ी चीज़ दी थी: अपनी नज़र से मुझे देखने का हक़। वो रात मेरे लिए सिर्फ़ चुदाई नहीं थी।
वो मेरी शादी की सबसे सच्ची रात थी, क्योंकि उसमें एक पति ने अपनी पत्नी को बिना शर्म, बिना हिसाब, बिना ईर्ष्या के — सिर्फ़ ख़ुशी से — पूरा छोड़ दिया था।
और फिर छह महीने बाद जब मैं अपने ससुर के नीचे लेटी थी और उनके ग्यारह इंच मेरी चूत में भरा हुआ था, तो मुझे लगा कि पार्वती नाम का मतलब सच हुआ — शिव की अर्धांगिनी, जो सब कुछ समेट लेती है, और फिर भी कभी कम नहीं पड़ती।
मेरी चूत अब भी उन रातों को याद करके सुलग जाती है। मेरी गांड अब भी हर करवा चौथ का इंतज़ार करती है। और मेरे निपल्स — मेरे बड़े, भरे हुए निपल्स — आज भी जब मेरे पति मुझे बाँहों में लेते हैं, खड़े हो जाते हैं।
क्योंकि मेरे शरीर को वो हाथ मिल गए हैं जो उसे पहचानते हैं — पति के, पाँचों के, और ससुर के। और मैं, पार्वती, सिर्फ़ एक चीज़ जानती हूँ: कि मैं बनी ही ऐसी हूँ, और मुझे इस बात पर कोई शर्म नहीं है।
NEXT PART:
- छह मर्द मिलकर बारह औरतें की चुदाई किये
- करवा चौथ के बाद – ग्यारह मर्दों की रंडी
- संस्कारी पत्नी करवा चौथ पर गैर मर्द से चुदवाई
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