sasur bahu chudai
कैलाश चार दिन बाद लौटा। शाम को छह बजे की फ़्लाइट थी, और मैं दोपहर से बेचैन थी।
सास उस दिन कुछ ठीक लग रही थीं — बुख़ार उतर गया था, वो हॉल में बैठकर टीवी देख रही थीं — और मैं रसोई में उनके लिए खिचड़ी बना रही थी जबकि मेरा दिमाग़ बार-बार उस रात पर जाता रहा।
ससुर जी के नीचे, उनका ग्यारह इंच मेरी चूत में, उनका दूध मेरी जाँघों पर। और अब उसी घर में, उसी छत के नीचे, कैलाश लौट रहा था — मेरा पति, जिसे कुछ पता नहीं था।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे करवा चौथ के दिन मेरे पति मुझे 5 काले लंड गिफ्ट किये
मैंने दरवाज़ा खोला तो वो सामान के साथ खड़ा था, धूल भरा, थका हुआ, और मुस्कुरा रहा था। मैंने उसके गले में बाँहें डाल दीं और वो मुझे उठाकर अंदर लाया।
उसने मेरे गाल पर, मेरी गर्दन पर, मेरे बालों पर चुंबन किए और कहा, “चार दिन में तू और सुंदर हो गई है, पारो।” मैंने उसकी गंध सूँघी — धूल, पसीना, हवाई अड्डे की सीट — और मुझे रोना आ गया। प्यार से भी और एक अजीब-से अपराध-बोध से भी।
रात को हम अपने कमरे में थे। वो नहाकर आया, बाल गीले, बस एक टी-शर्ट और निक्कर में। वो बिस्तर पर लेटा और मुझे अपनी छाती पर खींच लिया। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में चलने लगीं और उसने आँखें बंद कर लीं।
“पापा ने बताया सासू माँ ठीक हो रही हैं,” वो बोला। “तूने बहुत ख़याल रखा, पारो। शुक्रिया।”
मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने उसकी छाती पर उँगली से गोल घुमाया और धीरे से कहा, “कैलू… एक बात कहनी है।”
“कह।”
“पर तू सुनकर हँसेगा नहीं, और नाराज़ भी नहीं होगा।”
वो एक आँख खोलकर मुझे देखने लगा। “इतनी सीरियस क्या बात है?”
मैं उठकर बैठ गई। उसके पास, उसी बिस्तर पर, अपने ही घर में — और मैं काँप रही थी।
“तेरे जाने के बाद,” मैंने कहा, “एक रात बिजली गई थी। पापा रसोई में आए। बातें हुईं… तेरी बातें हुईं। उन्होंने पूछा कि मुझे कैसे मर्द पसंद हैं— नहीं, मुझे क्या पसंद है। और फिर उन्होंने पूछा, ‘ग्यारह इंच बड़ा होता है?'”
कैलाश की भौंहें उठ गईं। वो धीरे से उठकर बैठ गया। “ग्यारह इंच? पापा ने कहा?”
मैंने सिर हिलाया।
“और?”
“और कैलू, फिर जो हुआ…” मैंने हाथों को गोद में रख लिया। “तेरे जाने से पहले एक दिन मैंने उन्हें अपने कमरे में बुलाया था, अलमारी का बहाना बनाकर। और फिर… वो रात आई। सासू माँ को नींद की गोली दी गई थी। पापा ग्यारह बजे मेरे कमरे में आए। और कैलू — वो सच में ग्यारह इंच है। और वो मेरी चूत में था।”
कैलाश कुछ देर चुप रहा। बस मेरी तरफ़ देखता रहा। और फिर उसके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने करवा चौथ की रात देखा था — वही चमक, वही अजीब-सी ख़ुशी। उसने मेरा हाथ पकड़कर खींचा और मुझे अपनी छाती से लगा लिया।
“पारो,” वो बोला, “तू पागल है।”
“तू नाराज़ है?”
“नाराज़?” वो हँसा। “पारो, मैं तो अभी से खड़ा हो गया हूँ।” उसने मेरा हाथ अपनी निक्कर पर रख दिया। सच में — कड़ा, गरम, तना हुआ। “बता, पूरी बात बता। कैसे डाला? कितना दर्द हुआ? उसने क्या कहा? मेरे पापा ने क्या कहा?”
मैंने सब बताया। एक-एक बात, ख़त्म होने तक, और जैसे-जैसे बताती गई, कैलाश की साँस भारी होती गई और उसकी मुट्ठी मेरी कमर पर कसती गई। जब मैंने बताया कि उन्होंने आख़िर में मेरी चूत में अपना वीर्य निकल दिया और मेरे माथे को चूमकर कहा “पारो”, तो कैलाश ने आँखें बंद कर लीं और गहरी साँस छोड़ी।
“मेरे पापा,” वो बोला, हँसते हुए। “पचपन साल के मेरे पापा। पारो, तू जानती है, मुझे कभी नहीं पता था कि उनके पास ग्यारह इंच है। हम दोनों बाप-बेटे एक ही औरत से मिल रहे हैं — और मुझे पता ही नहीं।”
“तू ख़ुश है?”
“मैं बहुत ख़ुश हूँ।” उसने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया। “पारो, सुन। मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन है — नाइजीरियन हो, पापा हों, कोई भी हो। मुझे फ़र्क़ सिर्फ़ इतना पड़ता है कि तू चुदती है तो चमकती है। और तू चमकती है तो मेरा पूरा घर चमकता है। बस।”
मैंने उसका हाथ चूमा और फिर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसने मुझे अपनी गोद में बैठा लिया और हम देर तक चूमते रहे — धीमे, गहरे, बिना जल्दी के।
उसने मेरी टी-शर्ट ऊपर की और मेरी चूचियों को हाथों में लेकर दबाया, फिर झुककर मेरे निपल्स चूसे। मैंने कराहते हुए कहा, “आज नहीं, कैलू। आज बस बता देती हूँ, कल पापा से बात कर।”
“कल?” उसने मेरे निप्पल को दाँतों से हल्का काटा।
“कल,” मैंने कहा। “आज तू सो। पूरा हफ़्ता थका है।”
वो कराहकर लेट गया। “ठीक है। पर एक चीज़ माननी होगी।”
“क्या?”
“अगली बार जब पापा तेरे कमरे में आएँ, मैं वहाँ बैठूँगा। तेरे सिर के पास। बिल्कुल वैसे जैसे पाँचों के साथ बैठा था।”
मेरा पेट हल्का हो गया। मैंने हाँ कहा।
कैलाश ने अगली सुबह ही बात कर ली। रसोई के बाहर, बरामदे में, चाय के दो कप लेकर। मैं अंदर से सुन रही थी — नहीं, सुनने की हिम्मत नहीं हुई, तो मैंने बर्तन धोने का बहाना बना लिया और कान लगाए रही।
कैलाश ने शुरू में हँसी में डालकर कहा, “पापा, आपने मुझसे कुछ छिपाया।”
ससुर जी ने चाय की चुस्की ली। “क्या?”
“ग्यारह इंच?”
एक लंबा मौन। फिर ससुर जी की हल्की हँसी। “पारो ने बता दिया?”
“पारो सब बताती है,” कैलाश ने कहा। “पापा, मुझे बुरा नहीं लगा। सच में। आपको बताना चाहिए था।”
“सोचा, तू सोचेगा क्या।”
“मैं सोचूँगा कि मेरे पापा अब भी मर्द हैं,” कैलाश ने कहा और मैंने बर्तन धोना रोक दिया। “और पापा, एक बात। मैं चाहता हूँ कि अगली बार जब आप पारो के कमरे में जाएँ, मैं वहीं रहूँ। पास में। ताकि मैं देख सकूँ।”
काफ़ी देर चुप्पी रही। फिर ससुर जी ने कहा, “तुझे बुरा नहीं लगेगा, बेटा?”
“लगेगा तो नहीं। बस… थोड़ा अजीब लगेगा। पहली बार।”
“मुझे भी,” ससुर जी ने कहा। और फिर दोनों बाप-बेटे बैठकर हँसने लगे — और वो हँसी मेरे पेट में गरमी बनकर उतरी।
वो रात दो दिन बाद तय हुई। सास उस शाम अपनी बहन के घर गई थीं, रात वहीं रुकना था। घर में सिर्फ़ हम तीन।
मैंने अपने कमरे में दो दीये जलाए। नहाया, बालों में तेल लगाया, और वो लाल साड़ी पहनी — वही करवा चौथ वाली। ब्लाउज़ पीछे से बंधा हुआ, पेटीकोट ऊँचा। आईने में ख़ुद को देखा और सोचा कि आज रात दो पुरुष एक ही कमरे में होंगे, और दोनों का रक्त एक ही है।
दरवाज़ा खुला। पहले कैलाश आया, अपनी कुर्सी खींचकर बिस्तर के सिरहाने बैठ गया।
फिर ससुर जी आए — ग्रे कुर्ते में, बाल सँवारे हुए, मूँछ ठीक किए हुए। कमरे में घुसते ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी और वो ठिठक गए। “साड़ी…” उन्होंने धीरे से कहा।
“करवा चौथ वाली,” मैंने कहा।
उन्होंने कैलाश की तरफ़ देखा, और कैलाश ने सिर हिलाकर हल्की मुस्कान दी। और फिर ससुर जी आगे आए।
पहले उन्होंने मेरा पल्लू उतारा। फिर ब्लाउज़ के हुक खोले — एक-एक करके, बिना जल्दी के। मेरी चूचियाँ बाहर आईं और उन्होंने दोनों हाथों से उन्हें भरकर पकड़ा। उनके अँगूठे मेरे निपल्स पर आए और मैंने साँस रोक ली।
“कैलाश,” ससुर जी ने बिना पीछे देखे कहा, “तेरी औरत के दूध बहुत भरे हैं।”
“जानता हूँ, पापा,” कैलाश ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गर्व फिर था। “आप चूसिए।”
ससुर जी ने चूसा। मैंने कैलाश की तरफ़ देखा — वो अपनी कुर्सी पर झुका हुआ, कोहनियाँ घुटनों पर, आँखें बड़ी — और मैंने महसूस किया कि मेरे पति के सामने मेरे ससुर मेरे निपल्स चूस रहे हैं, और मेरा पति इस सबको ऐसे देख रहा है जैसे कोई फ़िल्म देख रहा हो जिसमें वो ख़ुद कलाकार हो।
साड़ी गिरी। पेटीकोट गिरी। पैंटी गिरी। और फिर ससुर जी ने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया, मेरी जाँघें फैलाईं, और अपना मुँह मेरी चूत पर रख दिया।
वो मेरी चूत चूसने लगे — लंबी, चौड़ी जीभ के झाड़ू से, नीचे से ऊपर तक। मेरी बुर का हर हिस्सा उन्होंने चाटा, मेरे रस को पिया, और मेरी क्लिट पर जीभ से गोल-गोल घुमाया।
मैंने चादर को मुट्ठी में ले लिया और कराहने लगी। कैलाश उठकर आया, मेरे सिरहाने बैठा, और उसने मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में चलीं और उसने मेरे माथे को चूमा।
“देख,” उसने मेरे कान में कहा, “मेरे पापा तेरी चूत चूस रहे हैं। बोल, कैसा लग रहा है?”
“आssss… अच्छा,” मैंने हाँफते हुए कहा। “कैलू, बहुत अच्छा।”
“और तेरा सिर तुम्हारे गोद में बिलकुल तुम्हारे लंड के ऊपर।,” मैंने कहा और वो हँसा।
ससुर जी ने मुझे चार बार झड़वाया — जीभ से, उँगलियों से, मेरी चूत के भीतर घुमाते हुए। चौथी बार मेरी कमर उठ गई और मैंने उनके बाल पकड़कर उनका सिर अपनी चूत पर दबा दिया और चीख मारी। कैलाश ने मेरा मुँह चूमा।
फिर ससुर जी ऊपर आए। उनका लंड ग्यारह इंच का, मेरे रस से चिकना। उन्होंने उसे मेरी चूत के मुँह पर रखा और मेरी आँखों में देखकर धीरे से अंदर किया। मैंने कराही। उन्होंने पूरा डाल दिया और मेरी चूत फैलकर उनके चारों तरफ़ कस गई।
और तभी कैलाश ने अपना लंड निकाला।
वो मेरे मुँह के पास आया, मेरे सिर के ऊपर झुका, और मैंने उसे मुँह में ले लिया — जबकि उसके पापा नीचे मेरी चूत में थे। अब एक ही औरत के भीतर बाप और बेटे — एक चूत में, एक मुँह में। और ससुर जी के हर धक्के पर मेरा गला कैलाश के लंड पर और गहरा जाता।
कैलाश ने मेरी चूचियाँ सहलाईं, मेरे निपल्स को उँगलियों में लिया, और नीचे देखा। “पापा,” उसने कहा, “आप पूरा डालिए। वो झेल लेगी। वो झेलती है।”
और ससुर जी ने पूरा डाला। गहरा, भारी, मेरे गर्भ तक। मेरी आँखों से पानी निकल आया और मैंने कैलाश की जाँघ पर हाथ रखकर उसे दबा दिया। कैलाश ने मेरे आँसू पोंछे और मेरे कान में कहा, “शाबाश मेरी पारो, शाबाश।”
फिर कैलाश ने कहा, “पापा, अब मुझे गांड दे दीजिए।”
ससुर जी रुक गए। “गांड?”
“हाँ,” कैलाश ने कहा। “वो तैयार है। मैं तैयार कर देता हूँ।”
और मैंने देखा — मेरा पति मेरे पीछे खिसका, उसने अपनी उँगलियाँ मेरी चूत में डुबोईं, मेरे ही रस में भिगोईं, और मेरी गांड पर लगाकर एक-एक करके अंदर कीं। मैं कराही और कमर उठा दी। उसने तीन उँगलियाँ अंदर करके फैलाईं, और फिर अपनी उँगलियाँ निकालकर वहीं अपना लंड रख दिया।
अब मेरी चूत में ग्यारह इंच, और मेरी गांड में नौ-तीन। मेरा पूरा शरीर एक तनी हुई डोरी था। दोनों तरफ़ से लंड — एक काला नहीं, एक गहरा गेहुँआ और एक साँवला — और बीच में मेरी दीवार, सिर्फ़ एक पतली दीवार जिसके दोनों तरफ़ लंड सरक रहे थे।
कैलाश और ससुर जी ने लय मिलाई। जब ससुर जी भीतर जाते, कैलाश बाहर निकलता, और उल्टा। मेरी चूत और गांड दोनों एक-दूसरे की हरकत महसूस कर रही थीं। मैंने दोनों हाथों से अपनी चूचियाँ पकड़ लीं और उन्हें दबाने लगी क्योंकि और कुछ नहीं सूझ रहा था।
“देखा पापा,” कैलाश ने हाँफते हुए कहा, “देखिए कैसे दोनों जगह ले रही है।”
“देख रहा हूँ, बेटा,” ससुर जी ने कहा। “मैंने ऐसी औरत नहीं देखी।”
“आपकी बहू है,” कैलाश ने कहा और तीनों हँसे — हँसी में भी धक्के चलते रहे।
ससुर जी पहले झड़े। उन्होंने मेरी चूत में भर दिया, गहरा और लंबा, और उनका पूरा शरीर काँपा। वो मेरे ऊपर गिरे, मेरे माथे को चूमा, और फिर निकलकर एक तरफ़ लेट गए। उनकी साँसें फूली हुई थीं और उनका चेहरा पसीने से भीगा था।
कैलाश मेरी गांड में अकेले रह गया। उसने धीरे-धीरे, गहरे धक्के मारे, और मेरी चूत से ससुर जी का वीर्य बहता हुआ मेरी जाँघों पर आ गया। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रख दिया और वो अपने ही पापा के वीर्य में उँगलियाँ डालकर मेरी चूत को चोदने लगा — दो उँगलियाँ, फिर तीन, मेरी बुर में भरकर।
“पारो,” उसने मेरे कान में कहा, “आज तूने मेरे पापा को बूढ़ा नहीं रहने दिया।”
“और तू मुझे कभी पुरानी नहीं होने देगा,” मैंने कहा।
वो मेरी गांड में झड़ गया। और फिर हम तीनों उसी बिस्तर पर लेटे रहे — मैं बीच में, कैलाश मेरे पीछे, ससुर जी मेरे सामने — और किसी ने कुछ नहीं कहा। ससुर जी ने मेरी हथेली अपने हाथ में ले ली और उसे धीरे से दबाया। मैंने आँखें बंद कर लीं।
उस रात के बाद एक नियम बन गया। हफ़्ते में एक रात। बुधवार की रात। सास को कुछ पता नहीं चला, और ससुर जी ने कहा, “अभी बताने की ज़रूरत नहीं।” मैंने हाँ कह दिया।
बुधवार मेरा पसंदीदा दिन बन गया। सुबह से ही मेरे पेट में एक गरम गाँठ बन जाती। मैं स्नान करती, बालों में तेल लगाती, और जान-बूझकर ऐसी साड़ी पहनती जो पापा के सामने सभ्य लगे और रात में आसानी से गिर जाए।
सास हमें देखकर कहतीं, “तुम दोनों बाप-बेटे को क्या हो गया है, बुधवार को इतने ख़ुश?” और हम तीनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते।
पहले हफ़्ते ससुर जी झिझकते थे। दूसरे हफ़्ते कम। तीसरे हफ़्ते तक वो अपने कमरे से चश्मा उतारकर आने लगे, जैसे उतारते ही कोई और आदमी बन जाते हों।
और चौथे हफ़्ते उन्होंने एक चीज़ शुरू की जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई — वो मुझे पहले बैठाकर पूरी बातें सुनाते।
अपने कॉलेज की, अपनी जवानी की, कि कैसे उन्होंने एक बार मेरी सास को साइकल पर बैठाकर पूरे शहर में घुमाया था। और मैं उनके घुटनों के बीच बैठकर सुनती रहती और मेरी चूत गीली होती जाती। बातें उनका असली फोरप्ले थीं — और सबसे अच्छा फोरप्ले।
कैलाश हर बुधवार वहीं रहता। कभी कुर्सी पर, कभी सिरहाने। एक बार वो बाहर गया तो फ़ोन पर आया और कहा, “पापा, फ़ोन स्पीकर पर रखिए, मुझे सुनना है।” और मैंने सुना कि मेरे पति फ़ोन के दूसरी तरफ़ से धक्कों की गिनती कर रहे थे — “आठ… नौ… दस… पापा, आपने ग्यारह बजाए, मैंने सुने हैं।”
मेरे शरीर ने बदलना शुरू किया। मेरी चूत ग्यारह इंच की आदी हो गई — अब वो उसे इतना आसानी से नहीं छोड़ती थी, और कैलाश के नौ-तीन के बाद भी मुझे ख़ालीपन लगता।
मेरी गांड भी ढीली पड़ने के बजाय मज़बूत हो गई, जैसे रोज़ के अभ्यास से मांसपेशियाँ बनती हैं। और मेरी चूचियाँ — भगवान जाने कैसे — और भरी हुई लगने लगीं, जैसे उन्हें रोज़ हाथों की ज़रूरत हो।
सास को शक कब हुआ, पता नहीं। एक दिन उन्होंने मेरे कमरे में आकर बिस्तर पर नज़र दौड़ाई और कहा, “पारो, इस बिस्तर के दोनों तरफ़ के तकिए में गड्ढे हैं। तू अकेले सोती है?”
मैंने कहा, “कैलाश देर से आता है, सासू माँ।”
“हूँ,” वो बोलीं और चली गईं।
अगले साल करवा चौथ आया। इस बार सब कुछ अलग था। सास पूरे दिन मेरे पास बैठी रहीं, मेरी मेहंदी देखी, मेरे हाथों में छन्नी रखी, और एक बार अचानक बोलीं, “पारो, तू ख़ुश है न?”
“बहुत, सासू माँ,” मैंने कहा और सच कहा।
शाम को कैलाश ने मुझे फिर छत पर बुलाया। इस बार ससुर जी नीचे हॉल में बैठे थे, अख़बार पढ़ रहे थे, बिल्कुल बेख़बर। और सास रसोई में थीं।
मैं थाली लेकर छत पर गई। दरवाज़ा खोला। और मेरा दिल फिर वैसे ही रुक गया जैसे पिछले साल रुका था — क्योंकि इस बार छत पर पाँच नहीं, छह लोग थे। पाँच नाइजीरियन, और उनके बीच खड़े मेरे ससुर — ग्रे कुर्ते में, बाल सँवारे हुए, और चेहरे पर एक ऐसी शरारती मुस्कान जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
ओबी ने मुझे देखकर हाथ उठाया। “मैडम, हैप्पी करवा चौथ।”
कैलाश मेरे पास आया और उसने मेरी थाली ले ली। फिर उसने मेरे कान में कहा, “इस साल गिफ्ट में पाँच के साथ एक और है। और वो छठा तेरा ससुर है। आज तेरे ससुर तेरे पति बनेंगे — और मैं और ये पाँचों तेरे देवर।”
मैंने ससुर जी की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया, और अपनी मूँछ के नीचे वो मुस्कान थी।
और फिर, उसी छत पर, उसी अंगीठी की गर्मी में, चाँद के नीचे — मेरे ससुर ने पहली बार सबके सामने मेरे सामने घुटने टेके और मेरी साड़ी की किनारी को होंठों से उठाया।
छह लंड, एक औरत। और करवा चौथ की रात के बारे में मैं अगली बार लिखूँगी…….।
आपकी पार्वती……
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