slut woman group sex story
शक़ हमेशा बड़ी चीज़ों से नहीं होता। छोटी-छोटी चीज़ों से होता है। और रोहन बैंक का मैनेजर था — उसे नंबरों की आदत थी। उसे चीज़ें मिलाने की आदत थी। और मेरे जिस्म के नंबर अब उसके हिसाब से मिल नहीं रहे थे।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की मेरी बॉयफ्रेंड की वाइफ और मैं एक साथ ग्रुप में चुदी
पहला शक़ उसे एक रात हुआ। हम बिस्तर पर थे और वह मुझे चोद रहा था — अपने आठ इंच के लंड से, वैसे ही जैसे वह तेरह साल से चोदता आया था।
और उसने अचानक रुककर पूछा, “सिमरन, तू आजकल इतनी जल्दी क्यों आ जाती है?”
“क्या मतलब?” मैंने पूछा।
“मतलब यह कि पहले तुझे पंद्रह मिनट लगते थे। अब पाँच में। और तेरी बुर पहले से ज़्यादा कस रही है। जैसे किसी ने उसे रोज़ खोला हो।”
मैं हँस दी। “तो तुम रोज़ खोलते हो ना।”
“हाँ,” उसने कहा। “पर कुछ तो बदला है।”
दूसरा शक़ उसे मेरी चूचियों से हुआ। एक सुबह उसने मुझे चूमते हुए मेरा निप्पल मुँह में लिया और दूध पीने लगा। फिर वह रुक गया और मेरे निपल्स को ध्यान से देखने लगा।
“इन पर निशान हैं,” उसने कहा।
“कैसे निशान?”
“दाँतों के,” उसने कहा। “हल्के। और मेरे दाँत इतने छोटे नहीं हैं।”
मैं मन में ठंडी पड़ गई। क्योंकि गणेश के दाँत बड़े थे, और वह मेरे निपल्स को हल्के से काटता था — जान-बूझकर, खेल में।
मैंने कहा, “शायद मैंने कहीं रगड़ दिए हों।” वह हँसा और आगे नहीं पूछा।
पर उसकी आँखों में वह चमक आ गई थी जो पूछताछ करने वाले की आँखों में आती है।
तीसरा शक़ सबसे बड़ा था — और वह नीरज से ही आया। रोहन ने एक शाम नीरज को चाय पर बुलाया। बातें हुईं, हँसी हुई।
और फिर नीरज उठकर बाथरूम गया। और जब वह निकला, तो उसके हाथ में एक तौलिया था — मेरा तौलिया, गुलाबी, जो बाथरूम में लटका रह जाता था। उसने उसे लापरवाही से अपने चेहरे पर फेर लिया और वापस रख दिया।
रोहन ने देखा। और मुझे देखा। और कुछ नहीं कहा। पर रात को जब हम बिस्तर पर थे, तो उसने कहा, “नीरज तेरा तौलिया पहचानता है।”
“होगा,” मैंने कहा। “वह यहाँ आता-जाता है।”
“हाँ,” रोहन ने कहा। “आता-जाता है।”
और फिर उसने मुझे करवट दिलाई और पीछे से चोदना शुरू किया — और उस रात वह पहले से ज़्यादा ज़ोर से चोद रहा था।
जैसे वह किसी से मुक़ाबला कर रहा हो। जैसे उसे पता हो कि मेरे अंदर कोई और भी है, और वह उसे भगाना चाहता हो।
तारीख़ याद है — चौदह तारीख़, गुरुवार। नीरज मेरे पास आया था, दोपहर बारह बजे। रोहन आम तौर पर ढाई बजे घर आता था।
इसलिए हमें पूरे ढाई घंटे मिले थे, और हमने उन ढाई घंटों को पूरा खर्च किया था।
हम बेडरूम में थे। मैं चारों पर थी, हाथ बिस्तर पर, और नीरज मेरे पीछे घुटनों पर।
उसने मेरी गाँड़ में अपना लंड डाल रखा था — उसका ग्यारह इंच का लंड मेरी गाँड़ में पूरा अंदर।
और उसका एक हाथ आगे बढ़कर मेरी बुर में उँगलियाँ डाल रहा था। मेरी चूचियाँ झूल रही थीं और दूध की बूँदें नीचे बिस्तर पर गिर रही थीं।
मैं चीख रही थी। “नीरज… और… और ज़ोर से…”
“तेरी गाँड़ कमाल है,” वह कराहा। “इतनी कसी हुई।”
“तेरी है,” मैंने कहा। “तेरी गाँड़।”
“और तेरी बुर?”
“वो भी तेरी। सब तेरी।”
और ठीक उस वक़्त…
चाबी की आवाज़ आई।
मैं ठिठक गई। नीरज रुका नहीं। उसने सोचा कि शायद कोई और है। पर मैं जानती थी — वह चाबी की आवाज़, वह झटका, वह घूमने का तरीक़ा। वह रोहन था।
“नीरज,” मैंने फुसफुसाया। “रोहन आ गया।”
“अच्छा,” उसने कहा, और फिर भी रुका नहीं। उसने एक और झटका दिया — गहरा। मैं कराह पड़ी। और मेरी कराह सुनकर बाहर से रोहन की आवाज़ आई।
“सिमरन?”
“हाँ!” मैंने चीख दबाते हुए कहा। “बेडरूम में हूँ!”
दरवाज़ा खुला।
रोहन अंदर आया — शर्ट में, टाई ढीली, हाथ में लैपटॉप बैग। उसने दरवाज़े पर खड़े होकर देखा। और जो दृश्य उसने देखा, वह उसे ज़िंदगी भर याद रहना था।
उसकी पत्नी — चारों पर, पूरी नंगी, पसीने से भीगी, बाल बिखरे हुए, चूचियाँ झूलती हुईं, दूध बहता हुआ।
और उसके पीछे एक लंबा जवान लड़का, घुटनों पर, जिसका लंड उसकी पत्नी की गाँड़ में था — पूरा अंदर, और वही जवान लड़का उसके पड़ोसी था, जिसे रोहन “सीधा लड़का” कहता था।
तीन सेकंड का सन्नाटा। बहुत लंबा सन्नाटा।
“नीरज?” रोहन ने कहा।
“रोहन भाई,” नीरज ने कहा — और उसने लंड अभी बाहर नहीं निकाला। “नमस्ते।”
“नमस्ते,” रोहन ने कहा। और फिर वह हँसने लगा। पहले हल्के से, फिर ज़ोर से।
उसने बैग रखा, टाई खोली, और बिस्तर के पास आकर बैठ गया। और फिर उसने मेरी बुर को देखा — गीली, खुली, और फिर मेरे पीछे उस लड़के को देखा।
“तो यह बात है,” उसने कहा।
“रोहन,” मैंने हाँफते हुए कहा। “मैं समझाती हूँ।”
“क्या समझाएगी?” उसने कहा। “सब सामने है।” और फिर उसने नीरज की तरफ़ देखा। “कब से?”
नीरज ने ईमानदारी से कहा, “चार महीने, भाई।”
“चार महीने?” रोहन ने कहा। “और मुझे पता नहीं?”
“आपको पता है,” नीरज ने कहा। “आपने बस मानना नहीं चाहा।”
रोहन ने मेरी तरफ़ देखा। “सिमरन, तू नीचे आ, और गुसलखाने जाकर साफ़ हो जा। और तू,” उसने नीरज की तरफ़ देखा, “चाय पीने बैठ। आज हम बात करेंगे।”
मैं नहा के आई। नीरज ने कपड़े पहन लिए थे और वह ड्राइंग रूम में बैठा था। रोहन उसके सामने।
दोनों के बीच चाय के कप रखे थे। और दोनों में वह सभ्यता थी जो दो मर्दों के बीच तब आती है जब दोनों जानते हैं कि उनके बीच एक औरत है।
मैं आकर बैठ गई — नीरज के पास नहीं, रोहन के पास नहीं, बल्कि दोनों के बीच। सोफ़े के कोने पर।
“बोल,” रोहन ने कहा। “शुरू से बोल।”
और मैंने बोला। पूरा बोला। शुरुआत से — उस पहली शाम से, उस पहली चाय से, उस पहले चुम्बन से।
बताया कि कैसे मुझे नयापन चाहिए था, कैसे नीरज को देखकर मेरी बुर में खुज़ली हुई, कैसे उसने मुझे तोड़ा, कैसे हम रोज़ मिले।
फिर बताया गणेश के बारे में, सुखप्रीत के बारे में, कबीर और रितिका के बारे में। सब कुछ। बिना छिपाए।
रोहन चुपचाप सुनता रहा। उसका चेहरा पढ़ना मुश्किल था। पर उसने एक बार भी टोका नहीं।
जब मैं ख़त्म हुई, तो वह पीछे झुक गया और उसने अपने हाथ से अपनी आँखें ढक लीं। कुछ देर वह वैसे ही रहा। फिर उसने हाथ हटाए और मुझे देखा।
“सिमरन,” उसने कहा। “एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“क्या मैं कम पड़ गया?”
और यह सवाल मेरे दिल पर लगा। क्योंकि रोहन कभी कम नहीं पड़ा था। वह अच्छा पति था, अच्छा आदमी था, और अच्छा प्रेमी भी। बस… पुराना था।
“नहीं,” मैंने कहा। “तुम कम नहीं पड़े। तुम घर हो। तुम वो हो जिसके बिना मैं नहीं रह सकती। पर…”
“पर?”
“पर घर से बाहर भी एक दुनिया होती है,” मैंने कहा। “और मुझे उसमें घूमना अच्छा लगता है।”
रोहन ने नीरज की तरफ़ देखा। “और तू?”
“मैंने कभी छीनने की कोशिश नहीं की, भाई,” नीरज ने कहा। “आपकी जगह आपकी है। मैं तो बस… उसके साथ हूँ। जब वह बुलाए।”
“क्यों?” रोहन ने पूछा। “क्यों उसके साथ? तेरी उम्र कम है, तू अच्छा दिखता है, तुझे कोई मिल सकती है।”
नीरज कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा — और उसकी आवाज़ में वह चीज़ थी जो सिर्फ़ सच में होती है, “क्योंकि जब वह मेरे नीचे होती है, तो वह ज़िंदा होती है। पूरी ज़िंदा। और उसे ज़िंदा रखना… मेरा काम है। जैसे आपका काम उसे सुखी रखना है। हम दोनों अलग-अलग काम कर रहे हैं।”
रोहन ने उसकी बात सुनी। फिर उसने अपना कप उठाया, एक घूँट लिया, और कप रख दिया।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा — और उसकी आँखों में वह चमक थी जो पहली रात थी, जब वह मुझे लेकर आया था।
“ठीक है,” उसने कहा।
“ठीक है?” मैंने कहा।
“हाँ,” उसने कहा। “पर एक शर्त।”
“क्या?”
“आज रात,” उसने कहा। “तीनों। यहीं। मैं भी देखूँ कि तू उसके साथ कैसी दिखती है।”
मेरी बुर ने अंदर से कस लिया। मैंने नीरज की तरफ़ देखा। वह मुस्कुरा रहा था — वही मुस्कान जो पहली रात थी।
“आपकी मर्ज़ी,” नीरज ने कहा।
“तो आज रात,” रोहन ने कहा। “आठ बजे। यहीं।”
बाक़ी दिन वह अजीब सा था। रोहन ऑफ़िस गया, नीरज अपने घर गया, और मैं अकेली रह गई।
मैंने घर सजाया, दीपक जलाए, लाइट धीमी की। फिर नहाया, पूरे जिस्म पर तेल लगाया, बाल खोले, और एक साड़ी पहनी — गहरे लाल रंग की, बिना ब्लाउज़ के नीचे कुछ और, बस एक पतली सी डोरी।
मन में सोच रही थी — आज रोहन अपनी पत्नी को किसी और की बाज़ुओं में देखेगा। और आज नीरज अपने “भाई” के सामने मुझे चोदेगा।
दोनों आठ बजे से पहले आ गए। पहले नीरज आया, फिर रोहन। रोहन ऑफ़िस से सीधा आया था — शर्ट, पैंट, पर कोलोन लगाकर। नीरज ने भी अच्छे कपड़े पहने थे।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। नीरज ने हाथ बढ़ाया। रोहन ने पकड़ा। और दोनों ने हाथ मिलाया — एक बार वैसे ही जैसे पहले, और एक बार ज़्यादा देर तक। जैसे दोनों कह रहे हों — “आज बराबरी का खेल है।”
“बैठिए,” मैंने कहा।
हम खाना खाने बैठे। तीनों साथ। बातें हुईं, हँसी हुई। रोहन ने नीरज से उसके काम के बारे में पूछा, नीरज ने रोहन से बैंक के बारे में।
दोनों ने मुझे बीच में बिठाया — एक तरफ़ रोहन, एक तरफ़ नीरज। और दोनों के हाथ कभी मेरी जाँघ पर आ जाते, कभी मेरी कमर पर।
दोनों एक-दूसरे को देखते और मुस्कुरा देते। जैसे दो शेर एक ही शिकार के दोनों तरफ़ बैठे हों — और दोनों जानते हों कि आज शिकार दोनों का है।
खाना ख़त्म हुआ। रोहन ने कहा, “अब?”
“अब,” नीरज ने कहा।
रोहन ने पहला क़दम उठाया — क्योंकि वह पति था, और आज उसे अपनी जगह दिखानी थी।
उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खड़ा किया। फिर उसने मेरी साड़ी का पल्ला खींचा। पल्ला गिरा।
फिर उसने मेरी कमर पर बँधी डोरी खोली, और साड़ी फ़र्श पर गिर गई।
अब मैं बस पतली सी डोरी में खड़ी थी — जो नीचे मेरी बुर को ढक रही थी और ऊपर मेरी चूचियों को बस छू रही थी।
रोहन ने मेरी तरफ़ देखा, फिर नीरज की तरफ़। “देख,” उसने कहा। “मेरी पत्नी है।”
“है,” नीरज ने कहा। “और इसीलिए ख़ूबसूरत है।”
रोहन ने मेरी चूचियाँ पकड़ीं — दोनों, पूरे हाथ से। उसने दबाया और मेरे निप्पल उसकी उँगलियों के बीच उभर आए।
फिर उसने झुककर एक निप्पल मुँह में लिया और चूसा। दूध निकली और उसके मुँह में गई। उसने पिया, फिर रुककर नीरज की तरफ़ देखा।
“इसमें दूध है,” उसने कहा।
“पता है,” नीरज ने कहा। “मैंने भी पिया है।”
रोहन हँसा और फिर उसने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। उसने मेरी डोरी खींची और मेरी बुर सामने आई — गीली, खुली, चमकती हुई।
उसने देखा और फिर उसने दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। मेरी बुर ने उन्हें कसकर पकड़ लिया।
“तंग है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में हैरानी थी। “चार महीने से चुद रही है और तंग है।”
“क्योंकि तुम दोनों मिलकर भी इसे पूरा नहीं भर पाते,” मैंने कहा।
रोहन ने नीरज की तरफ़ देखा। “सुना? चुनौती है।”
“सुन ली,” नीरज ने कहा, और वह बिस्तर के पास आ गया।
अब दोनों मेरे दोनों तरफ़ थे। रोहन मेरी बुर के पास, नीरज मेरी चूचियों के पास। रोहन ने अपनी पैंट खोली और उसका लंड बाहर आया — आठ इंच, मोटा, सीधा, जाना-पहचाना।
उसने सिरा मेरी बुर पर रखा और दबाया। पहला इंच, दूसरा, तीसरा — और फिर वह अंदर आ गया, पूरा। मेरी बुर ने उसे पहचान लिया और पकड़ लिया।
“आह,” मैंने कहा।
रोहन धीरे-धीरे चोदने लगा — वैसे ही जैसे वह तेरह साल से चोदता आया था। पर आज वह थोड़ा अलग था।
आज वह जानता था कि देखने वाला कोई है। आज वह अपनी पत्नी को साबित कर रहा था।
और नीरज ने तब मेरी चूचियाँ मुँह में ले लीं। उसने एक निप्पल चूसा, दूध पिया, और दूसरे को उँगलियों से दबाया।
उसका लंड अभी पैंट में था, पर मैं महसूस कर सकती थी कि वह कितना खड़ा था।
रोहन ने गति बढ़ाई। अब वह ज़ोर से चोद रहा था — और मैं चीख रही थी। मेरी बुर से रस बह रहा था।
नीरज ने मेरी चूचियों को छोड़ा और उसने अपनी पैंट खोली। उसका ग्यारह इंच का लंड बाहर आया — मोटा, भारी, सीधा। रोहन ने उसे देखा और उसकी भौंहें उठीं।
“इतना बड़ा?” रोहन ने कहा।
“हाँ,” नीरज ने कहा।
“और यह पूरा इसमें जाता है?”
“पूरा,” नीरज ने कहा। “और गाँड़ में भी।”
रोहन ने मेरी तरफ़ देखा। “सच?”
“सच,” मैंने कहा। “और तुम भी आज वहाँ जाओगे।”
रोहन रुक गया। “मैं? गाँड़ में?”
“आज सब करेंगे,” मैंने कहा। “आज कोई शर्त नहीं।”
रोहन ने मुझे करवट दिलाई। अब मैं साइड में थी और वह पीछे से मेरी बुर में घुसा।
नीरज मेरे सामने आया और उसने अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया। अब मैं दो जगह भरी हुई थी — नीचे रोहन और मुँह में नीरज।
रोहन मेरी बुर में धीरे-धीरे चोद रहा था और उसका हाथ मेरी चूची पर था। नीरज मेरे मुँह में दे रहा था और मेरे बाल पकड़े हुए था।
मैं बीच में कराह रही थी, और हर कराह पर नीरज का लंड मेरे गले में और गहरा जाता था।
फिर रोहन ने पीछे हाथ बढ़ाया और उसने मेरी गाँड़ पर उँगली रखी। उसने गोल-गोल घुमाया और फिर धीरे से अंदर डाल दी। मैं झटके से हिली।
“दर्द हो रहा है?” उसने पूछा।
“नहीं,” मैंने कहा। “अच्छा लग रहा है।”
उसने दूसरी उँगली भी डाल दी और मेरी गाँड़ को खोलने लगा। नीरज ने मुँह से लंड निकाला और मेरी चूचियों पर झुक गया।
अब रोहन मेरी बुर और गाँड़ दोनों पर काम कर रहा था और नीरज मेरी चूचियाँ चूस रहा था।
“नीरज,” रोहन ने कहा। “तेल है?”
“हाँ,” नीरज ने कहा, और उसने बेडसाइड टेबल से तेल उठाकर रोहन को दिया।
रोहन ने लंड बाहर निकाला, तेल लगाया, और फिर अपना लंड मेरी गाँड़ पर रखा। उसने दबाया।
पहला इंच — मैंने कराहा। दूसरा इंच — मेरी गाँड़ खुलने लगी। और फिर धीरे-धीरे वह अंदर गया — पूरा। रोहन ने एक लंबी साँस ली।
“हे भगवान,” उसने कहा। “यह तो… यह तो बुर से भी तंग है।”
“बताया था,” मैंने हाँफते हुए कहा।
वह हिलने लगा — धीरे-धीरे, सँभलकर। और तभी नीरज आगे आया और उसने अपना लंड मेरी बुर में डाल दिया।
अब मेरी बुर में नीरज और गाँड़ में रोहन। दोनों लंड मेरे अंदर एक साथ, सिर्फ़ एक दीवार के दोनों तरफ़।
मैं चीख पड़ी। “आह! रुको… एक मिनट रुको…”
दोनों रुके। दोनों मेरी तरफ़ देखने लगे।
“अच्छा लग रहा है?” रोहन ने पूछा।
“बहुत,” मैंने कहा। “पर पहली बार है ना, इसलिए…”
“तो अब करते हैं,” रोहन ने कहा। और उसने नीरज की तरफ़ देखा। “साथ?”
“साथ,” नीरज ने कहा।
और दोनों एक लय में चलने लगे। जब रोहन अंदर जाता, नीरज बाहर आता; जब नीरज जाता, रोहन आता।
फिर दोनों एक साथ अंदर — और मेरा पूरा जिस्म भर जाता। मेरी बुर और गाँड़ दोनों भरी हुईं, और बीच में बस एक पतली दीवार जो हर झटके पर दबती थी।
मैं पागल हो रही थी। मेरी चूचियाँ झूल रही थीं और दूध बह रही थी।
मेरे निपल्स दोनों हाथों से पकड़े जा रहे थे — एक रोहन के हाथ में, एक नीरज के। मेरा पूरा जिस्म उन दोनों के बीच एक पुल बन गया था।
और दोनों मर्द एक-दूसरे को देख रहे थे — बिना ईर्ष्या, बिना होड़, बस एक साथ।
“सिमरन,” रोहन ने कहा। “तेरी बुर कस रही है।”
“और गाँड़?” नीरज ने कहा।
“वो तो…” रोहन हाँफा। “वो तो जान ले रही है।”
“तो जान दे दो,” नीरज ने कहा।
वे तेज़ हो गए। अब झटके ज़ोरदार थे और मैं बिस्तर की चादर को मुट्ठी में भरकर खींच रही थी।
मेरी आँखों से पानी आ गया — अच्छे वाले। मेरा पूरा जिस्म पसीने और तेल से भीगा हुआ था।
और मैं दोनों के बीच काँप रही थी, चीख रही थी, और मर रही थी — अच्छी मौत।
“मैं आ रही हूँ,” मैंने कराहा। “दोनों… मत रुको…”
“आओ,” रोहन ने कहा।
“आओ,” नीरज ने कहा।
और मैं आई — लंबी, गहरी, तोड़ने वाली। मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों एक साथ कस गईं और मेरा पूरा जिस्म काँप गया।
और उस कसावट में दोनों मर्द हार गए। रोहन ने मेरी गाँड़ में भर दिया और नीरज ने मेरी बुर में।
दो गर्म धाराएँ, एक साथ, दो जगह। दोनों ने आख़िरी झटके दिए और फिर हम तीनों एक-दूसरे पर ढह गए।
हम तीनों बिस्तर पर पसरे रहे। कोई बोला नहीं। सिर्फ़ साँसें। मेरा सिर रोहन की छाती पर था और मेरी टाँगें नीरज के ऊपर। और दोनों के हाथ मुझ पर थे — एक मेरी पीठ पर, एक मेरी कमर पर।
कुछ देर बाद रोहन ने कहा, “सिमरन।”
“हाँ,” मैंने कहा।
“तूने क्यों नहीं बताया?”
“डर था,” मैंने कहा।
“किस बात का?”
“कि तुम नाराज़ हो जाओगे। कि तुम सोचोगे कि मैं तुम्हें कम मान रही हूँ।”
रोहन ने मेरे बाल सहलाए। “और अब?”
“अब पता है कि तुम नाराज़ नहीं हो।”
“नाराज़ क्यों होऊँ?” उसने कहा। “तेरा जिस्म तेरा है। और मैं तो… मैं तो आज ख़ुश हूँ।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि आज मैंने तुझे वैसे देखा जैसे कभी नहीं देखा,” उसने कहा। “तू आज ज़िंदा थी, सिमरन। पूरी ज़िंदा। और वो ज़िंदगी तुझे मैंने नहीं दी — इसने दी।” उसने नीरज की तरफ़ देखा। “और अब मैं इसका एहसान मानता हूँ, बुरा नहीं मानता।”
नीरज उठकर बैठ गया। “भाई, मैंने कभी आपकी जगह नहीं ली।”
“पता है,” रोहन ने कहा। “इसलिए तो तू अब तक ज़िंदा है।” और तीनों हँस दिए।
फिर रोहन ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, “एक बात और।”
“क्या?”
“अगली बार,” उसने कहा। “तेरे दोनों दोस्त भी। गणेश, सुखप्रीत। और वो कबीर और उसकी बीवी। मुझे सबसे मिलना है।”
मेरी बुर ने फिर से कस लिया। “सबको?”
“सबको,” रोहन ने कहा। “अगर मेरी पत्नी की इतनी बड़ी दुनिया है, तो मुझे उस पूरी दुनिया से मिलना चाहिए।”
नीरज हँसा। “रोहन भाई, आपको पता है आप क्या माँग रहे हैं?”
“पता है,” रोहन ने कहा। “और आज के बाद पता है कि सँभाल लूँगा।”
फिर रोहन उठा और उसने मुझे गोद में उठाया। नीरज भी उठा और उसने बाथरूम का दरवाज़ा खोल दिया।
और वहीं, उस छोटे से बाथरूम में, तीनों ने मिलकर मेरा जिस्म धोया। रोहन ने मेरी पीठ और बाल धोए, नीरज ने मेरी टाँगें और पेट।
और फिर दोनों ने मिलकर मेरी चूचियाँ धोईं — और जब दूध की बूँद पानी में घुली, तो दोनों हँसे।
“ये दूध कभी ख़त्म नहीं होगा?” रोहन ने पूछा।
“तुम दोनों रहो, तो नहीं,” मैंने कहा।
फिर हम बाहर आए। साफ़ चादर बिछाई। और तीनों एक ही बिस्तर पर लेट गए — मैं बीच में, रोहन मेरी तरफ़, नीरज मेरी दूसरी तरफ़।
दोनों ने मेरे हाथ पकड़े। एक ने मेरी कमर पर हाथ रखा, दूसरे ने मेरे बाल सहलाए।
“रोहन,” मैंने कहा।
“हाँ।”
“तुम नाराज़ नहीं हो?”
“नहीं,” उसने कहा। “पर एक चीज़ है।”
“क्या?”
“आज के बाद,” उसने कहा, “जब भी तू उसके साथ होगी, मुझे पता होगा। और जब मैं जानूँगा, तो और अच्छा लगेगा।”
“और तुम?” मैंने नीरज से पूछा।
“मैं तो पहले से जानता था,” नीरज ने कहा। “अब बस एक चीज़ बदली है।”
“क्या?”
“अब तेरा पति भी मेरा दोस्त है,” उसने कहा। “और अब तू दोनों की है।”
रोहन ने उसकी बात सुनी और उसने नीरज की तरफ़ हाथ बढ़ाया। दोनों ने हाथ मिलाया — और इस बार बहुत देर तक। जैसे कोई समझौता हो रहा हो।
और मैं बीच में लेटी रही — मेरी बुर अभी भी गर्म, मेरी गाँड़ अभी भी भरी, मेरे निपल्स अभी भी दोनों की उँगलियों की गर्मी बता रहे थे।
और मेरे दिल में दो नाम थे — रोहन और नीरज। और कोई टकराव नहीं था।
अगले भाग में: वह रात जब सात लोग एक कमरे में होंगे — रोहन, नीरज, गणेश, सुखप्रीत, कबीर, रितिका और मैं। रोहन पहली बार अपनी पत्नी को छह जोड़ी आँखों के सामने देखेगा। और पहली बार वह खुद भी किसी और औरत को छुएगा — रितिका को। दो औरतें, पाँच मर्द, और एक रात जिसमें बुर, गाँड़, दूध और निपल्स सब मिलकर एक हो जाएँगे।
NEXT PART:
- मेरी गर्लफ्रेंड चार काले लंडों से चुदवाई
- शादी की सालगिरह पर डिलीवरी बॉय से चुदवाई
- मौसी अपनी बेटी को हमसे ग्रुप में चुदवाई
नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।
mast chudayi story. kaash ki main bhi aise hi chudwa paati.
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