slut wives xxx sex story
तीन हफ़्ते बाद नीरज को ऑफ़िस का काम लेकर बेंगलुरु जाना पड़ा — पूरे पाँच दिन। जाते वक़्त उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “पाँच दिन ख़ाली नहीं रहना।”
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो जरुर पढ़ें की कैसे अपने पड़ोसी और उसके दो दोस्तों के साथ ग्रुप में चुदी।
“किसके साथ?” मैंने पूछा।
“जिसके साथ तेरा मन करे,” उसने कहा। “पर जब मैं आऊँ, तो तेरी बुर और तेरी गाँड़ मेरी याद कर रही हों।”
“करेंगी,” मैंने कहा।
पहले दिन शाम को गणेश का मैसेज आया। सिर्फ़ चार शब्द: “दीदी, आज खाली हैं?”
मैंने लिखा: “आ जाओ। पर आज धीरे करना।”
“धीरे?” उसने लिखा।
“हाँ। आज रोमांस वाला।”
वह साढ़े आठ बजे आया। दाढ़ी बनाई हुई, सफ़ेद शर्ट, हाथ में गुलाब का एक फूल। यह देखकर मैं हँस दी — इतना बड़ा आदमी और हाथ में एक फूल।
“कहाँ से?” मैंने पूछा।
“रास्ते में एक फूल वाला था,” उसने कहा। “लगा कि लाना चाहिए।”
“नीरज कभी नहीं लाया,” मैंने कहा।
“तो आज ले लो,” उसने कहा, और फूल मेरे हाथ में रख दिया। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और उसे उठाकर चूमा।
वह चुम्बन लंबा था — कलाई पर, फिर हथेली पर, फिर उँगलियों पर। जब वह मेरी उँगलियाँ चूम रहा था, तो मेरी बुर ने अंदर से हल्की सी झुरझुरी ली।
आज हमने जल्दी नहीं की। हम बैठे, बातें कीं, खाना खाया। उसने मेरे हाथ से खाया और मुझे अपने हाथ से खिलाया।
बीच-बीच में वह मेरी गर्दन पर चूमता, मेरे कान पर चूमता, और मेरे बालों को हटाकर मेरे गाल को सहलाता।
उसका हाथ मेरी कमर पर रहता और अंगूठा मेरे पेट पर धीरे-धीरे घूमता। पूरा शरीर मेरा इंतज़ार कर रहा था — पर अच्छे वाले इंतज़ार में।
“तुम जानते हो,” मैंने कहा, “नीरज तुमसे कम नहीं है। पर तुम अलग हो।”
“कैसे अलग?” उसने पूछा।
“तुम बड़े हो। तुम्हारे हाथ बड़े हैं। तुम्हारा जिस्म मुझे ढक लेता है। तुम्हारे साथ लगता है कि कोई पहाड़ मेरे ऊपर है — और अच्छा लगता है।”
उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। “और सुखप्रीत?”
“वह चालाक है,” मैंने कहा। “वह जानता है कहाँ छूना है। उसकी ज़बान ख़तरनाक है।”
“तो आज मैं क्या करूँ?” उसने पूछा।
“आज तुम बस मुझे ढको,” मैंने कहा।
और उसने ठीक वही किया। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और पूरा अपना जिस्म मेरे ऊपर डाल दिया — बिना जल्दी, बिना हड़बड़ी।
उसकी छाती मेरी चूचियों पर टिकी, उसकी टाँगें मेरी टाँगों पर, उसकी बाज़ुओं ने मेरे सिर को घेर लिया।
और वह मुझे चूमने लगा — माथे, आँखों, गालों, नाक, ठुड्डी, गर्दन। हर जगह, धीरे-धीरे। जैसे कोई नक़्शा पढ़ रहा हो।
जब उसका मुँह मेरी गर्दन पर पहुँचा तो मैं कराहने लगी।
उसने मेरी गर्दन के किनारे चूमा, दाँतों से हल्के से पकड़ा, और फिर मेरी कॉलरबोन पर नीचे उतरा।
मेरी कुर्ती अब तक खुल चुकी थी और मेरी चूचियाँ खुली थीं। उसने देखा, और एक लंबी साँस ली।
“इन्हें देखकर लगता है,” उसने कहा, “कि भगवान ने तुझे बनाते वक़्त जल्दी में नहीं बनाया। धीरे-धीरे बनाया।”
“तो धीरे-धीरे इस्तेमाल करो,” मैंने कहा।
उसने मेरी बाईं चूची पकड़ी और उसे अपने हाथ में भर लिया। उसका हाथ इतना बड़ा था कि पूरी चूची उसके अंदर समा गई।
उसने दबाया, फिर छोड़ा, फिर अंगूठे से मेरे निप्पल को सहलाया। और जैसे ही उसने उँगली से मेरे निप्पल को रगड़ा, दूध की एक बूँद निकली और उसकी उँगली पर चमक गई।
उसने उँगली मुँह में ली। “अब भी वही मिठास है।”
“तेरे लिए है,” मैंने कहा।
उसने मेरे निप्पल को मुँह में लिया और चूसा — धीरे-धीरे, लंबे-लंबे खिंचाव में। दूध की धार उसके मुँह में गई और वह पीने लगा।
वह पीते-पीते आँखें बंद कर लेता, जैसे कोई शराब पी रहा हो। फिर उसने मेरी दूसरी चूची पर जाकर वही किया।
दोनों चूचियाँ बारी-बारी से चूसी जातीं, दबाई जातीं, और दूध निकलता रहा। मेरी कमर उठती रही और मेरी बुर ने मेरी जाँघों को गीला कर दिया।
फिर वह नीचे उतरा। उसने मेरा पेट चूमा, मेरी नाभि को जीभ से सहलाया, और मेरी जाँघों को अलग किया। उसने मेरी बुर को देखा — गीली, खुली, और इंतज़ार करती हुई। उसने अपनी नाक से मेरी बुर को छुआ और सूँघा।
“तू बहुत गीली है,” उसने कहा।
“तू बहुत धीरे कर रहा है,” मैंने कहा।
“तो?” उसने कहा, और मुस्कुराया।
“तो और धीरे कर,” मैंने कहा। “पर जल्दी भी कर।”
उसने अपनी जीभ निकाली और मेरी बुर के ऊपरी हिस्से पर रख दी। एक लंबा, धीमा, चौड़ा चाट। मेरी कमर झटके से ऊपर आई।
फिर उसने वही किया — बार-बार, धीरे-धीरे। जब भी वह मेरे उभरे हुए हिस्से पर पहुँचता, वह रुक जाता, उसे जीभ से घुमाता, और फिर नीचे जाता। मेरे अंदर उँगली डालता और अंदर की दीवारों को सहलाता। मेरी बुर उसकी उँगली को पकड़कर खींचती।
वह लंबे समय तक चाटता रहा — इतने लंबे समय तक कि मैं तीन बार किनारे तक पहुँची और वह मुझे रोक देता।
जब चौथी बार पहुँची, तो उसने तेज़ कर दिया और मैं उसके मुँह पर चुदाई कर पड़ी। मेरी बुर ने उसकी जीभ पर अपना रस छोड़ा और मैं बिस्तर पर काँपती रही।
उसने मुँह उठाया, होंठ गीले, दाढ़ी गीली। उसने मेरे पेट पर चूमा और ऊपर आया।
फिर उसने अपनी पैंट खोली और उसका लंड बाहर निकला — वही मोटा, भाला जैसा, गोल सिरे वाला। मैंने उसे देखा और मेरी बुर ने फिर कस लिया।
“धीरे डालना,” मैंने कहा।
“धीरे ही,” उसने कहा।
उसने सिरा मेरी बुर पर रखा और दबाया। पहला इंच गया — आसानी से, क्योंकि मैं पूरी गीली थी।
दूसरा इंच गया — थोड़ा खिंचाव, क्योंकि मोटाई बहुत थी। वह रुका, मुझे चूमा, फिर और दबाया।
तीसरा, चौथा, पाँचवाँ — धीरे-धीरे। और जब पूरा अंदर था, तो मुझे लगा कि मेरी बुर को किसी ने भर दिया है — ऊपर से नीचे तक।
वह हिलने लगा — धीमे, गहरे झटकों में। हर झटका लंबा था, और हर झटके के बीच में वह रुकता, मुझे देखता, मुझे चूमता।
उसकी छाती मेरी चूचियों को दबाती रही और उसके पेट से मेरा पेट रगड़ता रहा।
उसने मेरी टाँगें अपनी कमर पर लपेट दीं और मेरी गाँड़ को हाथ से पकड़कर ऊपर उठाया, ताकि वह और गहरा जा सके।
“गणेश,” मैं कराही।
“बोल,” उसने कहा।
“ऐसे ही करो। बिल्कुल ऐसे ही।”
“कैसे?”
“धीरे… और गहरा।”
वह वैसे ही करता रहा। लंबे, धीमे, गहरे झटके। मेरी बुर की दीवारें हर झटके पर खुलतीं और बंद होतीं।
मेरे निपल्स उसकी छाती से रगड़ खाते रहे और दूध हमारे बीच चिपचिपा हो गया।
उसने मेरे कान में कहा, “आज तू धीरे-धीरे मर।”
और मैं धीरे-धीरे मरती रही। लंबे समय तक, बिना जल्दी, बिना चीख, बस कराहते हुए, उसके नीचे पिघलते हुए।
और जब आख़िर में वह अपने पानी के पास पहुँचा, तो उसने गति बढ़ाई — दस-बारह गहरे झटके — और फिर मेरे अंदर ही भर दिया। गर्म, मोटी, भारी। मैंने अपनी टाँगें उसकी कमर पर कस लीं ताकि एक बूँद भी बाहर न जाए।
वह मेरे ऊपर ही लेटा रहा। उसका वज़न मुझे अच्छा लगा — पहाड़ जैसा, पर सुरक्षित।
उसने मेरी गर्दन पर चूमा और फुसफुसाया, “पाँच दिन नीरज आएगा नहीं, तो तू मुझे याद कर लेना।”
“कर लूँगी,” मैंने कहा।
“और मैं तुझे,” उसने कहा।
दूसरे दिन शाम को सुखप्रीत आया। और उसने वह किया जिसके लिए वह जाना जाता था — उसने मुझे तोड़ा, पर एक-एक करके।
वह आते ही मेरे पीछे आया और उसने मेरी आँखों पर अपनी टाई बाँध दी। “आज अंधेरे में,” उसने कहा। “आज तू सिर्फ़ महसूस करेगी।”
उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरे चारों तरफ़ मोमबत्तियाँ जला दीं — मैंने रोशनी नहीं देखी, पर गर्मी महसूस की।
फिर उसने मेरे पूरे जिस्म पर ठंडा पानी की बूँदें छोड़ीं — शायद फ़्रिज से निकाली बर्फ़ की। एक बूँद मेरी गर्दन पर, एक मेरे निप्पल पर, एक मेरी नाभि पर, और एक — बहुत धीरे से — मेरी बुर पर।
मैं चीख पड़ी और हँस दी, दोनों एक साथ।
फिर उसने मेरे जिस्म पर शहद लगाया। ठंडा, चिपचिपा, मीठा। मेरी चूचियों पर, मेरे पेट पर, मेरी जाँघों पर।
और फिर उसने उसे चाटना शुरू किया — बहुत धीरे-धीरे, बहुत लंबे समय तक। उसकी जीभ मेरे निप्पल पर घूमी, शहद उठाया, और फिर मेरी चूची चूसी। दूध और शहद मिल गए और उसने दोनों पिए।
मेरे पेट पर वह उँगली से शहद लगाता और फिर जीभ से हटाता। मेरी जाँघों के अंदर तक वह पहुँचा और वहाँ से मेरी बुर तक चाटता हुआ आया।
“देख,” उसने कहा, “तेरी बुर पर भी शहद लगा है।”
“तो चाट,” मैंने कहा।
और उसने चाटा। उसकी ज़बान मेरी बुर के होंठों पर दौड़ी, शहद उठाया, और फिर अंदर गई। अंदर शहद नहीं था, पर गीलापन था — और वह गीलापन उसने पी लिया।
वह मेरी बुर को चूसता रहा, अंदर-बाहर करता रहा, और मेरी कमर उठती रही। आँखों पर पट्टी थी, इसलिए हर छूअन दुगनी लग रही थी। मुझे पता नहीं था कि वह कहाँ छुएगा और कब छुएगा।
और वह मुझे तीन बार किनारे तक ले गया और तीनों बार रोक दिया।
जब चौथी बार मैंने कहा, “अब रुकना मत,” तो उसने अपनी जीभ को अंदर तक भेजा, ऊपर वाले हिस्से पर रगड़ा, और मुझे छोड़ दिया।
मैं चीख पड़ी और मेरा पूरा जिस्म काँप गया। पट्टी के नीचे से आँसू निकल आए।
उसने पट्टी खोली। मैंने उसे देखा — वह मुस्कुरा रहा था, और उसका लंड खड़ा था, गीला और चमकदार।
उसने मुझे करवट दिलाई और मेरी एक टाँग उठाकर मेरी बुर में अपना लंड डाल दिया — साइड वाली पोज़िशन में।
वह पतला और लंबा था, इसलिए वह अंदर आराम से चला गया और गहरा तक पहुँच गया।
और फिर उसने वह किया जो वह करता था — उसने मेरी बुर में लंड डालकर मेरी गाँड़ पर अंगूठा रख दिया।
जैसे ही वह अंदर-बाहर करता, उसका अंगूठा मेरी गाँड़ के छेद पर घूमता। मेरे दोनों छेद एक साथ छुए जा रहे थे और मैं पागल हो रही थी।
“सुखप्रीत,” मैं कराही।
“हाँ, राँड,” उसने कहा।
“गाँड़ में डाल।”
“अभी नहीं,” उसने कहा। “पहले इसमें आ।”
उसने गति बढ़ाई। साइड पोज़िशन में वह गहरा जाता और मेरी चूचियाँ हिलतीं। उसका हाथ मेरी चूची पर था और दूध उसकी उँगलियों से बहता था।
उसने मेरी गर्दन पर चूमा, मेरे कंधे पर चूमा, और मेरे कान में फुसफुसाया, “तेरी बुर इतनी टाइट क्यों है? तीन मर्द चोदते हैं और यह ढीली नहीं होती।”
“क्योंकि तुम तीनों मिलकर भी इसे पूरा नहीं भर पाते,” मैंने कहा।
“तो आज चार मर्द चाहिए?” उसने पूछा।
“चार?” मैंने कहा।
“हाँ,” उसने कहा। “नीरज का एक दोस्त है। कबीर। और वह अपनी बीवी को भी लाएगा।”
मेरी बुर ने अंदर से कस लिया। “बीवी?”
“हाँ,” उसने कहा। “उसकी बीवी भी तेरे जैसी है। या कहें, तेरे जैसी बन गई है।”
और फिर उसने अपनी बात पूरी करने के लिए ज़ोर लगाया और मुझे फिर चुदाई पर ले गया।
मैं उसकी बाज़ू में काँपती रही और मेरी बुर ने उसके लंड को कसकर पकड़ लिया। उसने अपना पानी मेरे अंदर छोड़ा और मेरी जाँघों पर हाथ फिराया।
“कल?” मैंने हाँफते हुए पूछा।
“परसों,” उसने कहा। “कल नीरज आएगा। परसों सब।”
नीरज लौटा अगले दिन। मैंने उसे दरवाज़े पर ही पकड़ लिया — बिना बात, बिना चाय।
मैंने उसकी शर्ट खींची, उसकी पैंट खोली, और घुटनों के बल बैठकर उसका लंड मुँह में ले लिया। वह हैरान रह गया।
“सिमरन—”
“बोलो मत,” मैंने मुँह भरे हुए कहा। “बस खड़े रहो।”
उसने मेरे बाल पकड़े और मेरा सिर नीचे-ऊपर किया। उसका लंड मेरे मुँह में बड़ा हो गया और मैंने उसे पूरा लिया — ग्यारह इंच, गले तक।
मेरी आँखों से पानी आया, पर मैंने छोड़ा नहीं। उसने पाँच मिनट में मेरे मुँह में अपना पानी छोड़ दिया और मैंने सब निगल लिया।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
“तुम पाँच दिन गए थे,” मैंने कहा। “और तुम्हारे दोस्तों ने मुझे बता दिया कि परसों कबीर और उसकी बीवी आ रहे हैं।”
वह हँसा। “तो?”
“तो तुम बताओ,” मैंने कहा। “प्लान क्या है?”
वह मेरे साथ सोफ़े पर बैठा। “कबीर मेरा कॉलेज का दोस्त है। उसकी बीवी का नाम रितिका है। उम्र उनतीस। दोनों खुले हैं।
रितिका को भी तेरे जैसा ही पसंद है — नयापन। और वह तुझसे मिलना चाहती है।”
“मुझसे?”
“हाँ। सुखप्रीत ने तेरी बात की। तेरी फ़ोटो दिखाई। और वह राज़ी हो गई।”
मेरा दिल धक्-धक् करने लगा। “मतलब… दोनों?”
“दोनों,” उसने कहा। “दो औरतें, चार मर्द। पर एक शर्त है।”
“क्या?”
“रितिका पहले तुझसे अकेले में मिलेगी। दोनों औरतें। बाक़ी हम बाद में।”
मेरी बुर में वह झुरझुरी लौट आई जो पहले दिन आई थी। “क्यों?”
“क्योंकि वह पहले तुझे जानना चाहती है,” उसने कहा। “और तू उसे। औरत का औरत से जुड़ना अलग होता है।”
“और तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?”
“क्यों लगेगा?” उसने कहा। “मैं तो देखूँगा। मज़ा आएगा।”
वह शनिवार की दोपहर थी। नीरज ने दरवाज़ा खोला और वह अंदर आई। छह फुट जैसी लंबी नहीं, पर मुझसे थोड़ी लंबी — पाँच फुट सात इंच।
दुबली, चमकती हुई खाल, लंबे सीधे बाल, और आँखें जो बहुत सीधी देखती थीं। उसने हल्का सा सलवार-कुर्ता पहना था, पर वह भी उसके जिस्म को छिपा नहीं पा रहा था।
उसकी चूचियाँ मेरी से छोटी थीं — शायद बत्तीस की — पर गोल और ऊँची। और उसकी कमर पतली, गाँड़ गोल।
उसने मुझे देखा और मुस्कुराई। “आप सिमरन हैं,” उसने कहा। “नीरज ने सही कहा था।”
“क्या कहा था?” मैंने पूछा।
“कहा था कि आप आग हैं,” उसने कहा। “और आपकी खुशबू से लगता है कि बात सच है।”
हम बैठे। चाय पी। बातें हुईं — उसकी शादी, उसके कबीर, उनका खुला रिश्ता, उसका पहला अनुभव, उसकी उत्सुकता।
और फिर वह बोली, “सिमरन, क्या हम… अकेले में?”
“अभी?”
“अभी,” उसने कहा।
नीरज उठा और हँसकर बोला, “मैं बालकनी में। बुलाओ तो आऊँ।” और वह चला गया।
रितिका मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपने गाल पर रखा। उसका गाल गर्म था।
फिर उसने मुझे चूमा — हल्का, साफ़, औरत वाला। मेरे होंठों पर उसके होंठ कुछ देर रुके।
उसकी खुशबू हल्की फूलों जैसी थी, और उसकी साँस मीठी।
“अच्छा लगा?” उसने पूछा।
“बहुत,” मैंने कहा।
उसने मेरी कुर्ती की डोरी खोली। उसने मेरी चूचियाँ देखीं और एक लंबी साँस ली। “छत्तीस?”
“हाँ,” मैंने कहा।
“और इतनी भारी,” उसने कहा, और दोनों हाथों से पकड़ लीं। उसकी हथेलियाँ छोटी थीं, पर उसने पूरी ताक़त से दबाया।
मेरे निप्पल उसकी उँगलियों के बीच उभर आए और मैंने कराहा। उसने झुककर एक निप्पल मुँह में लिया और चूसा।
और जैसे ही चूसा, दूध निकली और उसके मुँह में गई।
वह रुक गई। “दूध?”
“हाँ,” मैंने कहा। “बहुत निकलता है।”
“तो मैं पीऊँगी,” उसने कहा, और उसकी आँखों में चमक आ गई।
वह मेरी चूचियों पर लगी रही। उसने बाईं चूसी, दाईं चूसी, दोनों दबाईं, और दूध पिया।
वह औरत थी, इसलिए उसका चूसना अलग था — नरम, लगातार, और बहुत धैर्य वाला। जैसे वह मेरे जिस्म से बात कर रही हो।
मेरी कमर उठती रही और मेरी बुर गीली होती रही।
फिर उसने मेरी सलवार खोली। मेरी बुर सामने आई — गीली, खुली, और उसके इंतज़ार में। उसने देखा और मुस्कुराई।
“तुम्हारी बुर सुंदर है,” उसने कहा।
“तुम्हारी दिखाओ,” मैंने कहा।
उसने अपनी सलवार खोली। उसकी बुर उसके जिस्म पर बिल्कुल फिट बैठी थी — ऊपर से साफ़, होंठ चिपके हुए, और बीच में हल्की चमक।
मैंने हाथ बढ़ाया और उसे छुआ। गीली। बहुत गीली। मैंने उँगली ऊपर-नीचे फिराई और उसने आँखें बंद कर लीं।
“तुमने मुझे देखकर गीला किया?” मैंने पूछा।
“तुमने चूचियाँ दिखाईं,” उसने कहा। “उससे पहले ही गीली थी।”
हम बिस्तर पर लेट गईं। वह मेरे ऊपर आई — उसका जिस्म मेरे जिस्म पर, उसकी चूचियाँ मेरी चूचियों पर।
हमने एक-दूसरे को चूमा, गहरा और लंबा। हमारी जीभें मिलीं, हमारी साँसें मिलीं।
फिर वह मेरी गर्दन पर चूमने लगी, मेरे कंधों पर, मेरी चूचियों पर — और आगे बढ़ती गई। मैंने उसे रोका नहीं।
उसने मेरी टाँगें खोलीं और मेरी बुर पर मुँह रखा। उसकी जीभ मेरी बुर पर दौड़ी — हल्की, तेज़, चालाक।
उसने मेरे होंठ चूसे, अंदर जीभ डाली, और ऊपर वाले हिस्से पर लगातार रगड़ा।
मैंने उसके बाल पकड़ लिए और अपनी कमर उठा दी। वह जानती थी कि क्या करना है — क्योंकि औरत औरत का जिस्म पढ़ सकती है।
वह मुझे किनारे तक ले गई और फिर रुक गई। “अभी नहीं,” उसने कहा। “अभी तुम मेरे ऊपर आओ।”
हम पलट गए। अब मैं उसके ऊपर थी और उसकी बुर मेरे सामने। मैंने उसे चूमा, उसकी चूचियाँ दबाईं, और फिर नीचे उतरी।
उसकी बुर को मैंने जीभ से खोला — पहले हल्के, फिर गहरे। उसने मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर दबाया, और मैंने और गहरा जीभ डाल दी। उसका रस मीठा था — हल्का, गर्म।
और फिर हमने वह किया जो दो औरतें करती हैं। हम एक-दूसरे के ऊपर पलट गईं, टाँगें मिला दीं, और अपनी बुरें एक-दूसरे पर रख दीं। और हम रगड़ने लगीं।
मेरी बुर उसकी बुर से रगड़ खा रही थी — गीली, गर्म, चिकनी। हम दोनों एक-दूसरे को पकड़कर झूलने लगीं।
हमारी चूचियाँ एक-दूसरे से टकरातीं, हमारे निपल्स रगड़ खाते, और मेरी दूध उसके पेट पर गिरती।
वह पहले आई। उसकी बुर मेरी बुर पर काँपी और उसने चीख दबा ली। और उसके काँपने से मैं भी आ गई।
हम दोनों एक साथ काँपीं, एक-दूसरे की बाज़ुओं में, गीली और हाँफती हुई। फिर वह मेरे ऊपर लेट गई और उसने मेरी गर्दन पर चूमा।
“अच्छा लगा?” उसने फुसफुसाया।
“बहुत,” मैंने कहा। “और तुम्हें?”
“बहुत,” उसने कहा। “अब मर्द आएँ?”
“अब मर्द आएँ,” मैंने कहा।
नीरज ने बालकनी से अंदर झाँका। “खत्म?”
“नहीं,” रितिका ने कहा। “शुरू हुआ है।”
वह हँसा और अंदर आया। उसके पीछे गणेश और सुखप्रीत, और आख़िर में कबीर।
कबीर लंबा था, चौड़ा, साफ़ मुँह, और उसकी आँखें हँसती हुई थीं।
उसने पहले रितिका को देखा और फिर मुझे। उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया और हमारी उँगलियाँ मिलीं।
“सिमरन,” उसने कहा। “बहुत सुना है।”
“अच्छा सुना है या बुरा?” मैंने पूछा।
“ऐसा सुना है कि आज रात नींद नहीं आएगी,” उसने कहा।
चार मर्द, दो औरतें। छह जिस्म। एक बड़ा सा बेडरूम, कम रोशनी, और हवा में वह गर्मी जो शब्दों में नहीं आती।
नीरज ने पहले कहा, “आज कोई जल्दी नहीं करेगा।” और सब मान गए। क्योंकि नीरज ही वह था जिसने यह सब जोड़ा था।
उन्होंने हमें बीच में लिटाया — मुझे और रितिका को, साथ-साथ। और फिर चारों हमारे चारों तरफ़ बैठ गए।
गणेश मेरे पास, कबीर रितिका के पास, सुखप्रीत हमारे पैरों के पास, और नीरज हमारे सिरहाने।
“आज हम तुम्हें तोड़ेंगे,” नीरज ने कहा। “पर धीरे-धीरे।”
और फिर चार हाथ चलने लगे। गणेश ने मेरी चूचियाँ पकड़ीं और निपल्स दबाए। कबीर ने रितिका की चूचियाँ पकड़ीं।
सुखप्रीत ने हम दोनों की टाँगें खोलीं और हमारी बुरों पर हाथ फिराया। और नीरज ने मेरे बाल सहलाए और मेरे माथे को चूमा।
रितिका ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराई। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। हम दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहे, जबकि चार मर्द हमें खोल रहे थे।
गणेश ने मेरे निप्पल मुँह में लिया और दूध पिया। रितिका ने देखा और उसकी आँखें बड़ी हो गईं। “उससे दूध निकलता है?” उसने पूछा।
“हाँ,” कबीर ने कहा। “और आज तू भी पीयेगी।”
और वह भी पिया। कबीर ने रितिका को मेरी चूची पर लिटाया और उसने मेरा निप्पल मुँह में ले लिया।
अब मेरी एक चूची गणेश के मुँह में थी और दूसरी रितिका के। दूध दोनों तरफ़ बह रही थी। मैं कराह रही थी और रितिका पी रही थी।
सुखप्रीत ने मेरी बुर में अपना लंड डाल दिया। पहले धीरे, फिर गहरा। मेरी बुर ने उसे पकड़ लिया।
और उसी वक़्त कबीर ने रितिका की बुर में अपना लंड डाल दिया।
अब दोनों औरतें एक साथ चोदी जा रही थीं — साथ-साथ, एक ही लय में। सुखप्रीत मुझे चोद रहा था और कबीर रितिका को। हमारी आवाज़ें मिल गईं।
“आह… आह…” रितिका कराही।
“आह… आह…” मैंने भी।
गणेश और नीरज देखते रहे। फिर नीरज मेरे पास आया और उसने अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया।
अब मेरी बुर में सुखप्रीत और मुँह में नीरज। रितिका के मुँह में गणेश आ गया। अब हम दोनों औरतें तीन-तीन जगह से भरी हुई थीं।
यह चला लंबे समय तक। कोई जल्दी नहीं कर रहा था। कोई हिसाब नहीं रख रहा था। बस छह जिस्म एक-दूसरे में घुल रहे थे।
फिर नीरज ने कहा, “अब गाँड़।”
रितिका ने पहले कहा, “मेरी पहले।”
“नहीं,” मैंने कहा। “मेरी।”
“दोनों,” नीरज ने कहा। “एक साथ।”
उन्होंने हमें घुटनों पर लाया — मुझे और रितिका को, साथ-साथ, कंधे से कंधा मिलाकर। चारों पीछे आए।
सुखप्रीत ने मेरी गाँड़ पर तेल लगाया और कबीर ने रितिका की गाँड़ पर।
और फिर एक साथ — दोनों ने अपने लंड हमारी गाँड़ों में डाले। दो औरतें, दो गाँड़, एक साथ।
मैं और रितिका दोनों चीख पड़ीं। हमने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली पसीने से गीली थी और मेरी भी।
हम दोनों एक-दूसरे को पकड़े हुए घुटनों पर झूल रही थीं, जबकि दो मर्द हमारी गाँड़ें मार रहे थे।
“अच्छा लग रहा है?” कबीर ने रितिका से पूछा।
“बहुत,” रितिका हाँफी।
“तू?” सुखप्रीत ने मुझसे पूछा।
“बहुत,” मैंने कहा।
और फिर गणेश और नीरज आगे आए। गणेश ने मेरी बुर में अपना मोटा लंड डाल दिया — तो अब मेरी बुर में गणेश और गाँड़ में सुखप्रीत।
और नीरज ने रितिका की बुर में अपना लंड डाल दिया। अब हम दोनों औरतें दो-दो लंड एक साथ ले रही थीं।
मेरे अंदर दो लंड थे — एक बुर में, एक गाँड़ में — और बस एक पतली दीवार उनके बीच। रितिका के अंदर भी वही।
हम दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देख रही थीं और हमारी आँखों में आँसू थे — अच्छे वाले।
हमारी चूचियाँ झूल रही थीं और मेरी दूध रितिका के हाथ पर गिर रही थी।
“चोदो,” रितिका ने कहा। “और ज़ोर से चोदो।”
“हाँ,” मैंने कहा। “हमें तोड़ दो।”
और उन्होंने तोड़ दिया। चार मर्द, दो औरतें, एक कमरा। वे हमें बारी-बारी चोदते, एक साथ चोदते, पोज़िशन बदलते, जगह बदलते।
मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों भरी रहीं। रितिका की भी। हम चीखते, कराहते, हँसते, और फिर चीखते। हमारे जिस्म पसीने, तेल, दूध और रस से लथपथ हो गए।
और फिर आख़िरी दौर। उन्होंने हमें एक-दूसरे के ऊपर लिटाया — रितिका नीचे, मैं उसके ऊपर। हमारी बुरें एक-दूसरे पर।
और फिर चारों ने हमें घेर लिया। गणेश मेरी गाँड़ में, नीरज रितिका की गाँड़ में, कबीर मेरी बुर में, और सुखप्रीत रितिका की बुर में।
चार लंड, दो औरतें, चारों छेद। और हम दोनों एक-दूसरे को पकड़े हुए, एक-दूसरे की चूचियाँ दबाते हुए, एक-दूसरे के होंठ चूमते हुए।
वे एक लय में चलने लगे। धीरे, फिर तेज़, फिर धीरे। हम दोनों की साँसें एक हो गईं। हमारी धड़कनें एक हो गईं।
मुझे पता नहीं था कि कौन मेरे अंदर था और कहाँ — बस इतना पता था कि मैं भरी हुई हूँ, पूरी भरी हुई हूँ, और यही मेरी जगह है।
“अब,” नीरज ने कहा। “सब एक साथ।”
और चारों ने एक साथ छोड़ा। मेरी बुर में, मेरी गाँड़ में, रितिका की बुर में, रितिका की गाँड़ में। चार गर्म धाराएँ।
रितिका चीख पड़ी और उसकी बुर ने कबीर को कस लिया। मैं चीख पड़ी और मेरा पूरा जिस्म काँप गया।
हम दोनों एक साथ आईं — एक-दूसरे के ऊपर, एक-दूसरे की बाज़ुओं में।
फिर सन्नाटा। सिर्फ़ साँसें। और हमारे जिस्मों से बहता हुआ सब कुछ।
चारों हटे और हम दोनों बिस्तर पर पड़ी रहीं। रितिका ने करवट ली और मेरी तरफ़ देखा।
उसके बाल चेहरे पर चिपके थे और उसके होंठ फूले हुए थे। उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपने होंठों पर लगा दिया।
“सिमरन,” उसने कहा।
“हाँ,” मैंने कहा।
“अब हम क्या हैं?”
“दो औरतें जिन्होंने आज रात एक साथ सब कुछ किया,” मैंने कहा। “और अब कभी अजनबी नहीं रहेंगी।”
वह हँसी और उसकी आँखें भर आईं। “तुम अच्छी हो,” उसने कहा।
“तुम भी,” मैंने कहा।
नीरज आया और वह मेरे पास लेट गया। उसने मुझे अपनी बाज़ू में लिया और मेरे माथे पर चूमा। फिर उसने रितिका की तरफ़ देखा और कहा, “कबीर, तेरी बीवी कमाल है।”
“पता है,” कबीर ने कहा, और उसने रितिका को अपनी तरफ़ खींच लिया।
गणेश और सुखप्रीत हमारे पैरों के पास बैठे रहे और हमारी टाँगों को सहलाते रहे। कोई बोलता नहीं था। कमरे में वह शांति थी जो बड़े तूफ़ान के बाद आती है।
फिर सब उठे। कपड़े पहने। गले मिले। और एक-एक करके चले गए।
सुखप्रीत ने जाते वक़्त मेरे कान में कहा, “अगली बार तेल ज़्यादा लाऊँगा।”
गणेश ने मेरे माथे को चूमा और बोला, “तेरी गाँड़ मेरी पसंदीदा जगह है।”
कबीर ने मेरा हाथ चूमा और कहा, “आप कमाल हैं।”
और रितिका ने मुझे गले लगाया और फुसफुसाया, “फिर मिलेंगे। सिर्फ़ हम दोनों।”
नीरज आख़िर में रुका। उसने दरवाज़ा बंद किया और मुझे गोद में उठाकर बाथरूम ले गया।
गर्म पानी में उसने मेरा पूरा जिस्म धोया — फिर वही धीरे-धीरे पूजा।
उसने मेरी बुर के अंदर तक पानी भेजा, मेरी गाँड़ साफ़ की, मेरी चूचियाँ धोईं और दूध की एक बूँद पानी में घोली।
“थक गई?” उसने पूछा।
“बहुत,” मैंने कहा।
“अच्छा था?”
“बहुत अच्छा,” मैंने कहा। “पर तुम सबसे अलग थे।”
“कैसे?”
“क्योंकि तुमने सब जोड़ा,” मैंने कहा। “और क्योंकि जब सब चले गए, तुम रुके।”
उसने मुझे पानी में चूमा। फिर हम बाहर आए, तौलिए में लिपटे, और बिस्तर पर लेट गए।
“नीरज,” मैंने कहा।
“हाँ।”
“मैं तुम्हारी राँड हूँ?”
“हाँ,” उसने कहा। “हम सबकी राँड।”
“पर सबसे ज़्यादा?”
“सबसे ज़्यादा मेरी,” उसने कहा, और मुझे और कसकर अपने से लिपटा लिया।
मैं उसकी छाती पर सिर रखकर सो गई। मेरे अंदर चारों की यादें थीं, रितिका की खुशबू थी, और सबसे ऊपर नीरज की धड़कन थी।
रोहन अगले दिन आया। उसने मुझे देखा और कहा, “तुम तो और निखर गई हो।”
“अच्छी नींद आई,” मैंने कहा।
“किसके साथ?” उसने मज़ाक़ में पूछा।
मैं मुस्कुराई और बोली, “पता लगाओ।”
अगले भाग में पढ़िए: रोहन को शक़ हुआ। एक दिन वह जल्दी लौट आया — और दरवाज़ा खोला। और फिर शुरू हुआ वह खेल जिसमें पति और आशिक़ एक ही कमरे में होंगे। नीरज, रोहन, और बीच में मैं — एक बुर, दो लंड, और एक ऐसा सच जो अब छिप नहीं सकता।
NEXT PART: एक दिन ग्रुप में चुदवाते हुए मेरे पति ने पकड़ लिया
- मौसी और उनकी बेटी एक साथ ग्रुप में चुदी
- शादी की सालगिरह पर डिलीवरी बॉय से चुदवाई
- मौसी अपनी बेटी को हमसे ग्रुप में चुदवाई
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