devar bhabhi hardcore chudai
बच्चा हुआ तो घर में नाम रखने की रस्म चली। पापा ने कहा, “पुरखों का नाम रखो।” माँ ने कहा, “जो पंडित जी बताएँ।” और भाई ने कहा, “अपने हिसाब से रखो, किसी को क्या पड़ी है।” आख़िर में नाम रखा गया — औपचारिक नाम लंबा और भारी, जिसे सब भूल जाते थे; और घर का नाम छोटा और मीठा, जिसे सब याद रखते थे। हम उसे गोलू बुलाने लगे।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की बच्चे के लिए भाभी ने पचासों बार चुदवाया
गोलू का चेहरा भाभी पर गया था — वही आँखें, वही नाक, वही होंठों की हल्की लकीर। लेकिन जो कोई ध्यान से देखता, वह एक बात पकड़ सकता था: गोलू की छाती चौड़ी थी, और उसकी उँगलियाँ लंबी — जितेंद्र भाई की नहीं, मेरी। बस भाई ने कभी ध्यान नहीं दिया, क्योंकि भाई ध्यान देने वालों में से नहीं था। भाई के लिए बच्चा बच्चा था — एक ऐसी चीज़ जो अब मिल गई थी, तो बात खत्म।
लेकिन भाभी के लिए बात खत्म नहीं हुई थी। भाभी के लिए बात तो अब शुरू हुई थी।
गोलू रात में रोता था। और रात में उठने का काम भाभी का था — क्योंकि भाई सुबह खेत जाता था और उसे नींद चाहिए थी। तो रात भर भाभी जागतीं, गोलू को दूध पिलातीं, झुलातीं, फिर सुलाकर खुद पलटतीं। और जब गोलू सो जाता, तो भाभी की आँखें मेरी तरफ़ मुड़ जातीं।
हमारा कमरा अब भी वही था — बरामदे के सिरे पर, जहाँ से आँगन दिखता था। भाई सो जाता, पापा-मम्मी अपने कमरे में। और फिर आधी रात के किसी सुनसान पहर में भाभी धीरे से उठतीं और मेरी चारपाई की तरफ़ आ जातीं।
“रोहित, सो गया?” वह फुसफुसातीं।
मैं जागा होता था। मैं हमेशा जागा होता था।
भाभी मेरी चारपाई के किनारे बैठ जातीं। रात की ठंडी हवा उनके बालों को हिलाती। उनका कुर्ता पतला होता, और दूध से भीगा — क्योंकि गोलू को दूध पिलाने के बाद भाभी के निपल्स से दूध की बूँदें अभी भी रिसती रहतीं। भाभी जान-बूझकर कुर्ता ठीक नहीं करतीं। वे बस बैठ जातीं, और मेरा हाथ पकड़कर अपने दूध पर रख देतीं।
“देख,” वह धीरे से कहतीं, “अब भी भरा हुआ है। गोलू पूरा नहीं पीता।”
और फिर मैं वह करता जो उन्नीस साल की उम्र में मैंने पहली बार किया था — मैं उनका दूध अपने मुँह में ले लेता। भाभी सिर झुकाकर मेरे बालों में उँगलियाँ घुमातीं और बहुत धीरे-धीरे कराहतीं। रात की चुप्पी में वह कराह किसी गाने से कम नहीं थी।
फिर भाभी मेरे ऊपर आ जातीं। दोनों चारपाई पर लेट जाते। भाभी पहले अपनी साया खोलतीं, फिर मेरी नेकर का नाड़ा। मेरा लंड उनके हाथ में आता और वे उसे उसी लय में सहलातीं, जिस लय में सालों पहले तेल की कटोरी के साथ सहलाया करती थीं। फिर वे धीरे से ऊपर चढ़ जातीं और मुझे अपने अंदर ले लेतीं।
रात की चुदाई अलग होती थी। रात की चुदाई में जल्दी नहीं होती थी। रात की चुदाई में सिर्फ़ आवाज़ होती थी — चारपाई की चरमर, भाभी की साँस, मेरी धड़कन, और बाहर झींगुरों का शोर जो हमारी आवाज़ छुपा लेता था।
भाभी ऊपर बैठकर बहुत धीरे हिलतीं। इतना धीरे कि हर हलचल महसूस हो, सुनी न जाए। उनकी बुर मेरे लंड को भीतर तक निचोड़ती और फिर छोड़ देती। मैं उनकी कमर पर हाथ रखता। उनके निपल्स मेरे होंठों के सामने झूलते और मैं उन्हें पकड़ लेता। भाभी मेरे कान में फुसफुसातीं, “आहिस्ता रोहित… भाई उठ जाएगा।”
और फिर, आख़िर में, जब हम दोनों की साँस टूटने लगती, भाभी अपनी टाँगें कसकर मेरी कमर पर जकड़ देतीं और कहतीं — “अंदर ही।”
मैं अंदर ही करता। भाभी मेरी छाती पर झुक जातीं और कुछ देर वैसे ही रहतीं। फिर उठकर चुपचाप अपने बिस्तर पर लौट जातीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। और अगली सुबह भाई उठता, चाय पीता, खेत जाता — और उसे कभी पता नहीं चलता कि रात में उसके बेटे की माँ उसके छोटे भाई के नीचे थी।
भाई के व्यवहार में एक बदलाव आया था, जिसे पहले तो किसी ने नहीं समझा। वह खेत से देर से आने लगा। पहले छह बजे घर आ जाता, अब आठ-नौ बजे आता। और आते-आते उसकी साँस में कुछ मीठी-तीखी महक होती।
एक दिन माँ ने पूछा, “जितेंद्र, कहाँ रुक जाता है?”
भाई हँसा, “माँ, खेत पर काम ज़्यादा है। थोड़ा बैठकर आता हूँ।”
लेकिन सच यह था कि भाई खेत के पास वाले ठेके पर बैठने लगा था। वहाँ शराब मिलती थी — देसी, सस्ती, और तेज़। भाई रोज़ एक-दो पैग लगाने लगा। उसका गुस्सा अब पहले जैसा नहीं था; अब वह शांत हो गया था, लेकिन उस शांति में एक नई लापरवाही थी। भाई को अब घर की बातों में उतनी दिलचस्पी नहीं रही थी। और भाई को अब भाभी की तरफ़ भी उतनी दिलचस्पी नहीं रही थी।
यह हमारे लिए वरदान था।
पहले भाई की नज़र हर वक्त भाभी पर रहती थी — कहाँ गई, क्या किया, किससे बात की। अब भाई को फ़र्क नहीं पड़ता था। और जब किसी को फ़र्क नहीं पड़ता, तो बहुत कुछ हो सकता है।
भाभी ने एक रात मेरे कान में कहा, “रोहित, अब डर कम है। अब हम दिन में भी मिल सकते हैं।”
मैंने पूछा, “माँ?”
भाभी मुस्कुराई, “माँ दोपहर में सोती है। और माँ को क्या पता — माँ तो खुद तेरी मालिश करती थी।”
वह आख़िरी वाक्य भाभी ने हँसकर कहा था, लेकिन उसमें एक सवाल छुपा था। और मुझे तब नहीं पता था कि वह सवाल आगे चलकर एक पूरी नई कहानी खोलेगा।
दोपहर का वक्त हमारा हो गया। यह वह वक्त था जब पूरा कस्बा नींद में डूबा होता — कुत्ते भी नहीं भौंकते, बच्चे भी नहीं रोते। माँ छत पर चटाई बिछाकर सो जातीं। पापा आम के पेड़ के नीचे पलंग पर। गोलू भी दूध पीकर सो जाता।
और हम आँगन के उस कोने में।
यही वह समय था जब हमने वे सब किया जो रात में नहीं कर सकते थे — ज़ोर से, बिना डर, बिना चुप्पी। भाभी अब पहले जैसी शरम वाली नहीं थीं। भाभी अब अपनी मर्ज़ी बोलने लगी थीं।
“आज मुझे कमर के बल लेटना है,” वह कहतीं।
“आज तू बैठ, मैं ऊपर आऊँगी।”
“आज धीरे करना रोहित, गोलू ने रात भर जगाया है।”
“आज तेज़ करना, आज बहुत गरमी है।”
और मैं हर बार वही करता जो वह कहतीं। भाभी की बुर अब मुझे ऐसे पता थी जैसे अपनी हथेली की लकीरें। मैं जानता था कि पहला धक्का कहाँ लगाना है जिससे भाभी काँप जाएँ, और कौन सा धक्का लंबा खींचना है जिससे भाभी मेरी पीठ अपने नाखूनों से पकड़ लें।
कभी हम आँगन के पलंग पर होते। कभी कोठरी में। कभी छत पर, माँ की चटाई से दो हाथ दूर, तकिया मुँह में दबाए। कभी बरामदे में, जहाँ से बाहर सड़क दिखती थी और कोई आ जाए तो खटका लगता था।
एक दिन तो हम इतने खो गए कि माँ उठकर नीचे आ गईं और हमें पता भी नहीं चला। भाभी उस वक्त मेरे ऊपर बैठी थीं, कुर्ता खुला, दूध झूलता हुआ, और मेरा लंड उनकी बुर में धँसा हुआ। माँ सीढ़ियों से उतरीं और आँगन की तरफ़ देखा।
भाभी ने मेरी छाती पर हाथ रखकर मुझे नीचे दबा दिया और माँ को देखकर मुस्कुरा दीं, “माँ जी, नींद खुल गई?”
माँ ने आँखें सिकोड़कर देखा। “तू यहाँ क्या कर रही है?”
भाभी बोलीं, “रोहित को तेल लगा रही थी। कमर दर्द बता रहा था।”
माँ ने “हूँ” कहकर पानी पिया और वापस चली गईं। और जैसे ही उनकी सीढ़ी की आवाज़ दूर हुई, भाभी मेरी छाती पर हँस पड़ीं — दबी हुई हँसी, काँपती हुई हँसी, ऐसी हँसी जो किसी राज़ की ताली थी।
“देखा रोहित?” उन्होंने कहा, “अब भी अंदर ही है तेरा लंड। और माँ को लगा कि तेल लगा रही हूँ।”
फिर भाभी ने खुद हिलना शुरू किया। माँ की सीढ़ियों की आवाज़ अभी दूर नहीं हुई थी कि भाभी चरम पर पहुँच गईं। और मैंने अंदर ही छोड़ा — क्योंकि अब यह आदत बन गई थी, और उस आदत का एक ही मतलब था।
फिर एक दिन भाई ने कहा कि उसे कस्बे बाहर जाना है — किसी रिश्तेदार के यहाँ, किसी काम से। पाँच दिन। पापा साथ गए। माँ भी कहने लगीं, “मैं भी चलूँ, बहू अकेली रहेगी तो घर सँभालेगी।” लेकिन फिर माँ ने खुद ही कहा, “नहीं, गोलू छोटा है, बहू अकेली कैसे सँभालेगी। मैं रुक जाती हूँ।”
और इस तरह घर में बचे — माँ, भाभी, गोलू, और मैं।
पहली रात माँ जल्दी सो गईं। दूसरी रात भी। तीसरी रात भाभी ने दरवाज़ा बंद कर दिया — सिर्फ़ कुंडी नहीं, पूरा किवाड़।
“आज आराम से करेंगे,” भाभी ने कहा।
उस रात हमने पहले गाने सुने — भाभी के पुराने गाने, मोबाइल के छोटे स्पीकर पर। भाभी ने आँखें बंद करके सुना, गुनगुनाया, फिर मेरे पास आकर बैठ गईं और कहा, “रोहित, तूने मुझे यह सब दिया।”
“क्या दिया भाभी?”
“जीना।” भाभी ने कहा, “शादी के बाद मुझे लगा था कि बस, यही ज़िंदगी है — खाना, कपड़ा, बच्चे की चिंता। लेकिन तूने मुझे याद दिला दिया कि मैं औरत भी हूँ, सिर्फ़ बहू और माँ नहीं।”
मैंने उनके होंठ चूमे। भाभी ने मेरे होंठ काट लिए — हल्के से।
फिर उस रात हमने बहुत कुछ किया। भाभी ने पहली बार मेरे लंड को पूरे मुँह में लिया। वे झुकीं, बाल एक तरफ़ किए, और उसे धीरे-धीरे अंदर लेने लगीं। उनकी ज़बान ऊपर के हिस्से पर फिरती और उनकी आँखें मुझे देखतीं। मैं उनके बालों में हाथ रखकर उन्हें सहलाता रहा।
“इतना बड़ा है रोहित,” भाभी ने बीच में कहा, “मुँह में पूरा नहीं आता।”
मैंने हँसकर कहा, “आपने ही तो बड़ा किया है भाभी। तेल से।”
भाभी हँसीं और फिर झुक गईं।
फिर मैंने उन्हें पलंग पर लिटाया, पेट के बल, और पीछे से उनकी बुर में गया। भाभी ने तकिया पकड़ लिया। मैंने उनकी कमर पर हाथ रखकर धक्के शुरू किए — पहले धीमे, फिर तेज़, फिर बहुत तेज़। भाभी की बुर हर धक्के पर चटकती। मैंने एक हाथ नीचे ले जाकर उनके निपल्स को उँगलियों में पकड़ लिया और हल्के से खींचा। भाभी ज़ोर से कराहीं।
“रोहित… मत रुक… आज पूरा कर दे…”
उस रात हम तीन बार मिले। पहली बार पेट के बल। दूसरी बार उनके ऊपर मैं। तीसरी बार बरामदे में, दीवार से टिकाकर, खड़े-खड़े।
तीसरी बार में भाभी की टाँगें मेरी कमर पर थीं और मेरी पीठ दीवार से चिपकी थी। भाभी ने मेरे कंधे पकड़कर खुद को ऊपर-नीचे किया। उनके दूध मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे। भाभी की बुर गहरी हो चुकी थी — तीन बार की थकान में भी वह मेरे लंड को पूरी तरह निचोड़ रही थी।
और आख़िर में, जब मैंने अंदर ही छोड़ा, भाभी ने मेरी गर्दन में मुँह दबाकर मेरा नाम लिया। फिर वे मेरे ऊपर ढह पड़ीं और फुसफुसाईं, “रोहित, अगर इस बार भी हो गया तो?”
लेकिन माँ को कुछ पता चल गया था। माँ को हमेशा पता चल जाता है — माँ वह होती है जो सबसे ज़्यादा देखती है और सबसे कम बोलती है।
वह दिन भी था। माँ ने मुझे अकेले में बुलाया और कहा, “रोहित, ज़रा बैठ।”
मैं बैठ गया। माँ पानदान सजा रही थीं।
“बहू से तेरा क्या चल रहा है?”
मैंने बेपरवाह होकर कहा, “कुछ नहीं माँ, वही तो। वह मेरा देखभाल करती है।”
माँ ने पानदान एक तरफ़ रखा और मेरी तरफ़ देखा। “देखभाल तो मैं भी करती थी रोहित। बीस साल तेरी देखभाल की। तेल तक लगाया तेरे लंड पर। और तुझे पता है, जब मैं तेरे लंड पर तेल लगाती थी, तो तेरा क्या हाल होता था?”
मैं शरमा गया।
माँ हँसीं, “अब शरमाता है? जब छोटा था तब तो तू नंगा घूमता था।” फिर वे गंभीर हो गईं, “रोहित, बहू अच्छी है। और तेरा भाई… तेरा भाई अब अपनी दुनिया में है। तू बहू को खुश रख। बाकी सब ठीक होगा।”
मैंने पूछा, “माँ, आपको कैसे पता?”
माँ ने पान खाया और कहा, “माँ को सब पता होता है। और रोहित —” वे रुकीं, “माँ भी जवान थी कभी।”
उस दिन माँ की आँखों में जो चमक थी, वह मुझे कुछ और बताने की कोशिश कर रही थी। लेकिन वह कहानी अभी बाकी थी।
भाई लौटा। माँ की नज़र कम हो गई, या शायद माँ ने नज़र हटा ली — जान-बूझकर। और हम पहले जैसे नहीं रहे, बल्कि पहले से बेहतर हो गए। अब हमें डर कम था और भूख ज़्यादा।
फिर एक सुबह भाभी उठीं और बाथरूम की तरफ़ भागीं। मुझे पता था — यह वही सुबह थी। दो दिन। तीसरे दिन भाभी दुकान से वही छोटा कागज़ लेकर आईं।
भाभी ने मुझे आँगन में बुलाया। इस बार उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने कागज़ मेरे हाथ में रखा।
दो लाल लकीरें। दो साफ़ लकीरें।
“रोहित,” भाभी ने कहा, “दूसरा भी हो गया।”
मैं कुछ नहीं बोला। बस भाभी को खींचकर अपने सीने से लगा लिया। भाभी ने मेरे कंधे पर सिर रखकर रो दीं — खुशी का रोना, जिसमें डर भी था।
“अब क्या होगा रोहित?” भाभी ने पूछा, “भाई क्या कहेगा?”
“भाई खुश होगा भाभी। भाई को खुश होना ही है।”
“और अगर भाई को शक हो गया?”
मैंने कहा, “भाभी, भाई को शक करने के लिए पहले ध्यान देना पड़ेगा। और भाई ध्यान देता तो कब का पता चल गया होता।”
भाभी हँसीं, फिर मेरे हाथ को अपने पेट पर रख दिया। पेट में अभी कुछ नहीं था — बस एक गरमी, एक वादा। लेकिन उस पल मुझे लगा कि मेरे हाथ के नीचे पूरी दुनिया धड़क रही है।
दूसरी बार के बाद भाभी और निडर हो गईं। अब वे जगहें बदलने लगीं। कभी बगीचे की झोपड़ी, कभी नदी किनारे, कभी मेले की भीड़ में छुपकर।
एक बार हम दूर के बाज़ार गए — सिर्फ़ दोनों। भाभी ने बहाना बनाया कि सामान लेना है। माँ ने गोलू को रख लिया। और हम गए।
बाज़ार के पीछे वाली एक सुनसान गली में एक पुराना किराए का कमरा था — भाभी को पता था, क्योंकि उनकी एक सखी वहीं रहती थी। हम उस कमरे में गए। दरवाज़ा बंद किया।
वह कमरा छोटा था, दीवारें हरी, और खिड़की से चूने की रोशनी आती थी। एक पुराना पलंग, एक टूटी कुर्सी। भाभी ने अपनी साया खोली और दीवार पर टाँग दी। फिर मेरी तरफ़ देखकर कहा, “आज नई शैली रोहित। आज तू सिर्फ़ मेरी सुन।”
भाभी ने मुझे कुर्सी पर बैठाया। फिर वे घुटनों के बल बैठीं और मेरा लंड अपने मुँह में लेने लगीं। पूरा। इस बार पूरा। उन्होंने गला खोलकर उसे अंदर तक लिया और मेरी जाँघों पर हाथ रखकर ऊपर-नीचे होने लगीं। उनकी ज़बान और उनके होंठ और उनका गला — तीनों एक साथ काम कर रहे थे। मैंने उनके बालों में हाथ डालकर उन्हें थोड़ा नीचे दबाया। भाभी ने आँखें बंद कर लीं और गला और खोल दिया।
फिर उन्होंने मुझे पलंग पर लिटाया, खुद ऊपर चढ़ीं, और बहुत धीरे-धीरे अपनी बुर पर मेरा लंड उतारना शुरू किया। पहला इंच, दूसरा इंच — और फिर पूरा। भाभी ने आँखें बंद कर लीं और एक लंबी साँस छोड़ी।
“आह… रोहित… अब तेरा लंड मेरी बुर की शक्ल ले चुका है। जब तक पूरा न हो, चैन नहीं आता।”
उस दिन भाभी ने खुद सारी लय तय की। कभी तेज़, कभी धीमा, कभी पूरा रुककर बस अंदर दबाकर बैठ जाना। भाभी मेरी छाती पर झुककर मेरे होंठ चूमतीं और फिर उठकर फिर हिलने लगतीं। उनके दूध मेरे मुँह के पास आते और मैं उनके निपल्स को पकड़ लेता। भाभी काँप जातीं और और तेज़ हिलने लगतीं।
आख़िर में जब दोनों की साँस टूटी, भाभी ने मेरी कमर पर टाँगें कसकर जकड़ दीं और मेरा पूरा वीर्य अपनी बुर के भीतर ले लिया। फिर वे मेरे ऊपर गिर पड़ीं और फुसफुसाईं, “अंदर ही। जैसे हमेशा।”
कुछ देर हम वैसे ही रहे। खिड़की से चूने की रोशनी आ रही थी। भाभी ने मेरी छाती पर उँगली से कुछ लिखा — कुछ ऐसा जो पढ़ा नहीं जा सकता था, बस महसूस किया जा सकता था।
भाई ने एक दिन अचानक पूछ लिया। कोई खास मौका नहीं था। रात का खाना खत्म हो गया था, पापा-मम्मी अपने कमरे में थे, गोलू सो रहा था। भाई ने तश्तरी में हाथ धोया और कहा —
“रीना, तू रोहित के साथ हर वक्त क्यों रहती है?”
भाभी के हाथ रुक गए। मेरे भी।
भाभी ने सँभलकर कहा, “क्यों, क्या हुआ?”
भाई ने कहा, “कुछ नहीं। बस लगता है तू इसी के पीछे लगी रहती है। पहले मेरे पीछे लगी रहती थी।”
भाभी हँसीं, “अरे, तुम खेत पर रहते हो। घर का काम कौन करेगा? और रोहित अब भी छोटा है, उसका ध्यान रखना पड़ता है।”
भाई ने “हूँ” कहा और फिर बोला, “अच्छा, अब अगला बच्चा भी हो गया। तेरी तो निकल पड़ी। पहले तीन साल कुछ नहीं, अब दो साल में दो।”
भाभी ने हल्की सी आँख मारी — मेरी तरफ़ नहीं, तश्तरी की तरफ़। लेकिन मैंने पकड़ ली।
“भगवान की कृपा है,” भाभी ने कहा।
भाई हँसा, “हाँ, भगवान की कृपा।”
और वह रात भी खत्म हो गई। लेकिन उस रात मुझे पहली बार लगा कि भाई शायद — बस शायद — कुछ जानता है। और वह जानकर भी नहीं जानना चाहता। क्योंकि भाई के लिए सच से ज़्यादा ज़रूरी था कि घर चले, बच्चे हों, नाम बने।
फिर एक नई बात उठी। माँ ने कहा, “रोहित अब इक्कीस का हो गया। अब इसकी शादी की बात करनी चाहिए।”
शादी की बात सुनकर मेरा पेट गिर गया। और भाभी का चेहरा उतर गया।
एक रात भाभी ने मुझसे पूछा, “रोहित, तू शादी करेगा?”
“भाभी, अभी तो बात है।”
“पर करेगा तो? फिर मैं क्या करूँगी?”
उस रात भाभी ने पहली बार मुझे नीचे लिटाया और खुद ऊपर चढ़कर पूरे ज़ोर से चुदवाया। जैसे कोई सबूत लेना चाहता हो। जैसे कोई कह रहा हो — देख, यह तेरा है, इसे भूल मत।
भाभी की बुर उस रात अलग तरह से पकड़ रही थी। तेज़, गहरी, कसकर। वे झुककर मेरे होंठ चूमतीं और फिर उठकर फिर से हिलने लगतीं। उनके दूध मेरे मुँह में झूलते आते और मैं उनके निपल्स चूसता रहता। भाभी की साँस फट रही थी।
“रोहित… शादी कर ले, पर… मुझे मत छोड़ना।”
“नहीं छोड़ूँगा भाभी।”
“कसम?”
“कसम।”
फिर मैंने भाभी को पलटकर अपने नीचे ले लिया और जोर-जोर से धक्के मारे। भाभी ने दोनों हाथ मेरी पीठ पर कस लिए और मेरे कंधे पर दाँत गड़ा दिए। उस रात भाभी दो बार चरम पर पहुँचीं और दोनों बार उन्होंने यही कहा — “अंदर ही।”
और मैंने दोनों बार अंदर ही छोड़ा।
एक दिन गोलू बड़ा होकर मेरी उँगली पकड़कर चलने लगा। भाभी पास खड़ी थीं और देख रही थीं। गोलू ने मेरी तरफ़ देखकर “अ…अ…” कहा — कुछ कहने की कोशिश।
भाभी ने कहा, “रोहित, इसे बोलना सिखा।”
“क्या?”
भाभी हँसीं, “पता नहीं। जो तू चाहे।”
मैंने गोलू को गोद में उठाया और उसके माथे पर होंठ रख दिए। गोलू ने मेरी गर्दन पकड़ ली और मेरी छाती पर सिर रख दिया। और उस पल भाभी की आँखें भर आईं।
“देख रोहित,” भाभी ने धीरे से कहा, “यह तेरे जैसा ही लगता है।”
“भाभी, आप भी तो इसी में हैं।”
“हाँ। पर यह जो छाती है, यह जो उँगलियाँ हैं — यह तेरी हैं।”
मैंने गोलू को भाभी की गोद में दे दिया। भाभी ने उसे सीने से लगाया। और फिर उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे कह रही हों — दो बच्चे, एक ही बाप, और पूरा घर अंधेरे में।
दूसरा बच्चा हुआ — लड़की। भाई फिर हँसा, फिर मिठाई बँटी, फिर सब वैसे ही। लेकिन इस बार भाभी की आँखों में एक अलग तरह की शांति थी। जैसे उन्होंने अपना हिसाब पूरा कर लिया हो।
पहली रात — जब भाभी अच्छी तरह उठने लगीं — वे मेरे पास आईं और मेरा हाथ पकड़कर अपने पेट पर रख दिया। फिर अपनी बुर पर।
“रोहित,” वह बोलीं, “इस बार धीरे करना। पर अंदर ही।”
मैंने भाभी को पलंग पर लिटाया और उनकी टाँगें खोल दीं। उनकी बुर थोड़ी देर बाद मिली थी — गरम, गीली, और थोड़ी कसी हुई। जब मैंने पहला इंच डाला, भाभी ने मेरी पीठ पकड़ ली और आँखें बंद कर लीं।
“आह… रोहित… यही चाहिए था।”
मैंने बहुत धीरे-धीरे धक्के दिए। हर धक्का लंबा, हर धक्का गहरा। भाभी की बुर ने मेरे लंड को अपने अंदर पूरी तरह समेट लिया। उनके दूध दूध से भरे हुए थे और उनके निपल्स से हल्की बूँदें रिस रही थीं। मैंने झुककर उनके निप्पल को चूसा और भाभी की कमर ऊपर उठ गई।
“अंदर ही रोहित… बस अंदर ही… और धीरे।”
उस रात हमने लंबी चुदाई की — बिना जल्दी, बिना शोर, बस दो शरीर जो एक-दूसरे को बहुत देर से पहचानते थे। भाभी दो बार चरम पर पहुँचीं और दोनों बार उन्होंने मेरा नाम लिया, बहुत धीरे, जैसे प्रार्थना।
आख़िर में मैंने अंदर ही छोड़ा। भाभी ने मेरी छाती पर हाथ रखा और कहा, “अब कुछ और मत माँग रोहित। बस यही चलाते रहो।”
“भाभी, यही तो माँग रहा हूँ।”
भाभी हँसीं। और उस हँसी में पूरा घर था — दो बच्चे, एक भाई, एक माँ, और एक ऐसा प्यार जिसका नाम किसी ने नहीं रखा।
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- 18 साल पुरे होते ही मैंने अपनी बहन को चोदकर रंडी बनाया
- लॉकडाउन के दौरान मॉम को दोस्तों के साथ मिलकर चोदा
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Hiii
Hiii gd morning
Prayagraj se koi girl bhabhi aunty real meeting me intrested ho tho MSG Karo