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उन्नीसवीं सालगिरह के बाद हमारे बीच कुछ बदल गया। पहले हम भाई-बहन थे जो छिपकर चोदते थे। अब हम दो ऐसे जानवर थे जो एक-दूसरे को पहचान चुके थे — और जानते थे कि छिपाना बेकार है।
काशिश अब पहले जैसी शरमीली नहीं रही थी। जब आकाश और विक्रम घर आते, वो जान-बूझ कर ऐसे कपड़े पहनती जिसमें उसका दूध का भार साफ़ दिखे, और जब कोई गलती से उसकी तरफ़ देख ले तो वो नज़र हटाने के बजाय मुस्कुरा देती — जैसे कहे, “हाँ, देखो, अच्छा लगता है न?”
एक दिन आकाश ने मुझसे पूछा, “भाई, तेरी बहन कुछ ज़्यादा ही खुल गई है। कहीं कोई चक्कर है?”
“चक्कर?” मैंने कहा, “कौन-सा चक्कर?”
“मतलब… कहीं वो किसी से…”
“किसी से क्या?”
“किसी से चुदती तो नहीं?” आकाश बोला, और उसने इतना सीधा पूछा कि मैं हँस पड़ा।
“तू पहले अपना नाप बता,” मैंने कहा, “फिर बताऊँगा।”
मार्च में मैंने काशिश को उदयपुर ले गया। तीन दिन। ऑफ़िस से छुट्टी, और घर में बहाना — “भैया-बहन घूमने जा रहे हैं, पिक्चर देखने, पहाड़ देखने।” माँ ने कहा, “अच्छा, तू सँभाल लेना उसे।” और माँ को क्या पता था कि सँभालने का मतलब क्या है।
पहली बार हम घर से बाहर, एक ही कमरे में, एक ही बेड पर — बिना पापा-मम्मी की दीवार वाले डर के। जैसे शादीशुदा जोड़ा।
ट्रेन में वो खिड़की के पास बैठी थी। मैं सामने। वो चाय पी रही थी और मुझे देख कर हँस रही थी।
“क्या?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं,” वो बोली, “बस सोच रही हूँ — घर में तू ‘भैया’ है, और यहाँ तू…”
“क्या हूँ मैं यहाँ?”
वो झुकी, और चाय के कप के पीछे से फुसफुसाई, “तू यहाँ मेरा आदमी है।”
ट्रेन के डिब्बे में उस वक़्त किसी ने नहीं देखा, लेकिन मेरा लंड उस एक लाइन से खड़ा हो गया।
उदयपुर पहुँचे तो पुरानी हवेली का होटल था — पीली दीवारें, झरोखे, नीचे झील। कमरे में पहुँचते ही काशिश ने दरवाज़ा बंद किया, चाबी घुमाई, और दीवार से लगा कर मुझे चूमने लगी — ट्रेन की तीन घंटे की भूख एक साथ।
“तीन दिन,” उसने होंठों पर ही कहा, “तीन दिन में तू मुझे थका देगा।”
“और तू मुझे?”
“मैं तो पहले ही थका चुकी हूँ,” वो बोली, और मेरी शर्ट खींच कर बाहर निकाल दी।
उस रात हमने तीन बार किया। पहले खिड़की के पास, खड़े-खड़े — उसकी साड़ी उतारने की फ़ुरसत नहीं थी, बस पेटीकोट ऊपर की और ब्लाउज़ के हुक खोले, और फिर दोनों हाँफते हुए। दूसरी बार बाथरूम में, गरम पानी के नीचे, जहाँ उसके दूध भीगे हुए मेरे सीने से रगड़ रहे थे। और तीसरी बार बेड पर, धीरे-धीरे, लंबे-लंबे, आराम से — जबकि झरोखे से झील की ठंडी हवा आ रही थी।
तीसरी बार में वो ऊपर थी। उसकी कमर मेरे ऊपर झूल रही थी, बाल खुले हुए, पसीना उसके गले से बह कर मेरे सीने पर गिर रहा था। वो मेरी छाती पर हाथ रख कर झुकी और बोली —
“राकेश, एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“वो रात… मेरे बर्थडे वाली… तुझे बुरा लगा?”
“क्या बुरा लगेगा?”
“कि दो और लोगों ने मुझे चोदा।”
मैंने उसकी कमर पकड़ कर नीचे खींचा, गहरा डाला, और उसने आँखें बंद कर लीं।
“लगा तो,” मैंने कहा, “जब विक्रम का लंड तेरे अंदर गया, तो एक सेकंड को लगा कि तू मेरी नहीं रही।”
“और फिर?”
“फिर लगा कि तू मेरी और भी ज़्यादा हो गई। क्योंकि जब वो तुझे चोद रहे थे, तब भी तेरा हाथ मेरा पकड़ा हुआ था।”
काशिश रुकी। उसने मेरी आँखों में देखा — बहुत देर तक। और फिर बहुत धीरे से कहा, “तू जानता है, आज तक सबसे अच्छी चीज़ क्या है?”
“क्या?”
“कि तीन लोग मुझे चोदते हैं, पर जब सब ख़त्म हो जाता है, तो मैं सिर्फ़ तेरे पास सोती हूँ।”
और वो झुक कर मुझे चूमने लगी, और हम दोनों उसी हालत में ख़त्म हो गए — वो मेरे ऊपर, मैं उसके नीचे, और उसके अंदर मेरा पूरा रस।
उदयपुर से लौटते वक़्त ट्रेन में उसने विषय उठाया।
“अगले साल चार,” उसने कहा।
“चार कौन?”
“तू, आकाश, विक्रम…” वो रुकी, और फिर बोली, “और एक नया।”
“नया कौन?”
“तेरा ऑफ़िस वाला। समर।”
मैं चौंका। समर मेरा सहकर्मी था — अट्ठाईस का, लंबा, चौड़ा, बॉडी बिल्डर जैसा, और शादीशुदा। उसने एक बार घर पर चाय पी थी, दिवाली पर। और उस दिन काशिश ने उसे निप्पल दिखाने वाला ब्लाउज़ पहना था।
“तूने समर को कब देखा?” मैंने पूछा।
“दिवाली पर। और उसने मुझे देखा भी था,” काशिश ने कहा, “पूरे दो सेकंड तक। तेरे सामने।”
“और तूने क्या किया?”
“मैंने दुपट्टा ठीक किया। ऐसे।” उसने दुपट्टा ठीक किया — ऐसे कि सीना और उभर आए।
मैं हँसा। “और उसका लंड?”
“उसकी पैंट में उभार साफ़ दिख रहा था,” काशिश बोली, बिना झिझक। “बहुत मोटा। तू उसके साथ नहाता है, तू बता।”
“मोटा है,” मैंने कहा। “मेरे से मोटा। लंबाई कम, पर मोटाई ज़्यादा।”
काशिश ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कल्पना कर रही हो।
“तो तय?” उसने पूछा।
“तय,” मैंने कहा।
और उस साल भर में काशिश ने ख़ुद को तैयार किया — जिम शुरू किया, योग किया, और अपनी बुर के बाल हमेशा ट्रिम रखने लगी, “क्योंकि चार आदमी सामने होंगे, भैया, और मुझे साफ़ रहना है।” उसने यह बात इतनी सीधी कह दी जैसे कोई मेडिकल रिपोर्ट पढ़ रहा हो।
चार फरवरी, दो हज़ार छब्बीस।
इस बार घर नहीं। इस बार जयपुर के बाहर एक फ़ार्महाउस बुक किया — पूल, बड़ा बेडरूम, छत पर लाइट्स, और चारों तरफ़ खुला मैदान। दो दिन का बुकिंग।
बहाना? “काशिश का बर्थडे है, दोस्तों के साथ मनाएँगे।” माँ-पापा ने हामी भर दी। और काशिश ने पैकिंग में सिर्फ़ तीन साड़ियाँ रखीं — और कोई सलवार-कुर्ता नहीं।
“साड़ी क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि साड़ी में निकालना आसान है,” उसने कहा, “और ब्लाउज़ में हुक आठ हैं, जो एक-एक करके खुलते हैं। मज़ा आता है।”
शाम सात बजे सब पहुँचे। आकाश, विक्रम, और समर।
समर जब अंदर आया, तो कमरे का माहौल बदल गया। वो पाँच फुट ग्यारह का, कंधे दरवाज़े से भरे हुए, बाजू मेरी जाँघ जितनी। नीचे सफ़ेद टीशर्ट, ऊपर खुली शर्ट। और उसकी पैंट में उभार ऐसा कि काशिश ने एक नज़र डाली और फिर मुझे देख कर होंठ दबा लिए।
काशिश आई — लाल साड़ी में। ब्लाउज़ बहुत गहरे कट का, और पीछे इतना खुला कि पूरी पीठ नंगी। साड़ी की कमर टाइट, नाभि खुली, और पल्लू बहुत हल्का — जैसे हवा से ही खिसक जाएगा।
समर ने उसे देखा और सीधे बोला, “काशिश, तुम हर साल और ख़तरनाक हो रही हो।”
“आप भी,” काशिश ने कहा, “हर साल और बड़े हो रहे हो।”
आकाश और विक्रम हँस पड़े। समर समझ गया।
हमने पूल के पास बैठ कर बर्थडे मनाया। केक, बीयर, बारबेक्यू। काशिश ने दो बार पूल में डुबकी लगाई और दोनों बार साड़ी भीगी — और भीगी साड़ी में उसके दूध का उभार साफ़ दिख रहा था, और ठंडे पानी से उसके निप्पल कड़े हो कर ब्लाउज़ से चिपक गए थे। चारों की आँखें उस पर थीं और वो जानती थी।
दस बजे हम कमरे में आए। बड़ा बेड, कम रोशनी, एसी की धीमी आवाज़।
विक्रम ने शरारत से कहा, “काशिश, आज तो कोई गेम होना चाहिए।”
“होना चाहिए,” काशिश ने कहा। उसने एक दुपट्टा उठाया। “आँख बाँध कर खेलेंगे। मैं बंद आँखों से बताऊँगी कौन है — लंड से।”
आकाश ने ताली बजाई। “भाभी, तू तो वैज्ञानिक है।”
काशिश ने दुपट्टा आँखों पर बाँधा। चारों ने अपनी पैंट खोली और बेड के किनारे खड़े हो गए। काशिश घुटनों के बल बैठी, दोनों हाथ बढ़ाए, और एक-एक करके चारों के लंड पकड़े।
पहला — पकड़ा, सहलाया, और बोली, “ये आकाश है। मोटा और भारी, और टिप ऊपर की तरफ़ मुड़ा हुआ।”
“सही,” आकाश हँसा।
दूसरा — उसने पकड़ा और रुकी। “ये विक्रम। लंबा, पतला, और झुका हुआ।”
“सही।”
तीसरा — हाथ बढ़ाया, और पूरी मुट्ठी नहीं बनी। उसने दोनों हाथ लगाए, ऊपर-नीचे किया, और फिर आवाज़ बदल गई। “ये… ये समर सर हैं। सबसे मोटा। मुट्ठी में नहीं आता।”
समर ने कहा, “बंद आँख से भी पहचान लिया।”
चौथा — उसने पकड़ा और मुस्कुरा दी। “और ये मेरा राकेश। नौ दशमलव सात इंच, और सबसे लंबा। और…” उसने टिप चूम लिया, “…और सबसे अपना।”
चारों ताली बजाने लगे।
काशिश ने दुपट्टा खोला और चारों को देखा — चार नंगे, खड़े, तने हुए। उसके होंठ खुले रह गए।
“अब?” उसने पूछा, मेरी तरफ़ देख कर।
“अब तू बता,” मैंने कहा। “आज तेरा बर्थडे है।”
उसने एक-एक को देखा, और फिर बोली — “ब्लाउज़ पहले खोलो। चारों में से कोई।”
समर आगे आया। उसने पीछे से आकर हुक खोले — आठ हुक, एक-एक करके, और काशिश की साँस हर हुक के साथ तेज़ होती गई। आख़िरी हुक खुला और ब्लाउज़ ढीला पड़ गया। समर ने उसे सामने से खींच कर उतार दिया।
और काशिश के दूध बाहर निकले — भारी, गोल, और निप्पल ठंडी हवा में तुरंत कड़े। बाईस का नाप अब पूरा भरा हुआ था, और उसके दूध अब एक-दूसरे से सटे हुए भारी थे।
चारों आदमी एक साथ साँस छोड़ने लगे।
“अब साड़ी,” काशिश ने कहा, और कमर पर हाथ रख दिया।
विक्रम ने साड़ी खोली। पेटीकोट गिरा। फिर उसने ख़ुद पैंटी नीचे खींची — बिना शरम, सीधे मेरी तरफ़ देखते हुए।
और अब वो बेड पर खड़ी थी — पूरी नंगी, चाँद जैसी रोशनी में, चार आदमियों के बीच, और उसकी बुर से रस पहले ही बह रहा था।
“राकेश,” उसने कहा, “पहले तू। जैसे हमेशा।”
मैंने उसे पीठ के बल लिटाया और उसकी टाँगें खोलीं। उसकी बुर अब और भरी लग रही थी — बाल ट्रिम किए हुए, होंठ गुलाबी और सूजे हुए, और अंदर से गरम। मैंने जीभ से एक लंबी लकीर खींची — ऊपर से नीचे तक। वो पूरी झटके से उठी और चीख पड़ी।
“आsshhhhh!”
फिर मैंने उसके निप्पल चूसे — बाएँ, फिर दाएँ, दाँतों से हल्का काटते हुए — और उसने मेरे बाल नोच लिए। फिर टिप रखी और एक ही झटके में पूरा अंदर डाल दिया।
उसकी बुर ने मुझे जान से पकड़ लिया। उसने कराह कर कहा, “अब चार लोग होंगे, राकेश… चार।”
“हाँ,” मैंने कहा, और धक्के शुरू कर दिए।
चारों देख रहे थे। मैं उसके अंदर था, और चार जोड़ी आँखें हम पर थीं। काशिश ने एक हाथ बढ़ा कर विक्रम का लंड पकड़ा और उसे सहलाने लगी, और दूसरे हाथ से आकाश का। मुँह से बोली, “समर सर, पास आओ।”
समर बेड पर चढ़ा और अपना मोटा लंड उसके होंठों पर रख दिया। काशिश ने मुँह खोला और उसे अंदर लेने की कोशिश की — और पहली बार में ही गाग हो गई, क्योंकि समर का लंड मोटाई में मेरे से भी ज़्यादा था।
अब तस्वीर ऐसी थी — मैं उसकी बुर में, समर उसके मुँह में, और दोनों हाथों में दो लंड। चार आदमी, एक काशिश, और कोई किसी का इंतज़ार नहीं कर रहा था।
आधे घंटे बाद उसने मुझे हटने को कहा। “अब बारी बदलो,” वो हाँफ रही थी। “आज चारों को चखना है।”
आकाश उसकी बुर में गया — पीछे से, घुटनों के बल। उसका मोटा लंड अंदर जाते ही काशिश ने चादर मुट्ठी में ले ली और चीख पड़ी। मैं सामने बैठा उसके दूध दबा रहा था और निप्पल चूस रहा था। विक्रम एक तरफ़ बैठा उसके पैर सहला रहा था, और समर पीछे खड़ा उसकी गाँड पर हाथ फेर रहा था।
फिर विक्रम। उसका लंबा पतला लंड इस बार सबसे गहरा गया — इतना कि काशिश की आँखों से पानी आ गया और उसने हाँफ कर कहा, “रुको… रुको… पेट तक जा रहा है।”
और फिर समर।
समर जब उसके अंदर गया, तो काशिश ने पूरी कमर उठा दी और एक लंबी कराह निकली जो कमरे से बाहर तक गई। समर की मोटाई उसके अंदर हर दीवार को छू रही थी। वो धीरे-धीरे चल रहा था, और काशिश हर झटके पर सिसक रही थी — दर्द और मज़ा एक साथ।
“समर सर… बहुत मोटा है…” वो बोली।
“अच्छा लग रहा है?” समर ने पूछा।
“बहुत,” उसने कहा, और फिर मेरी तरफ़ देख कर बोली, “राकेश, माफ़ करना, पर ये अच्छा लग रहा है।”
“माफ़ी क्यों,” मैंने कहा, “मैं तो तेरे लिए लाया हूँ।”
फिर आया वो हिस्सा जिसका काशिश को पता भी नहीं था कि वो चाहती है।
समर उसकी बुर में था और विक्रम पीछे आकर उसकी गाँड पर लार लगाने लगा। उसने उंगली डाली — पहले एक, फिर दो। काशिश ने कराह कर कहा, “विक्रम, तू क्या कर रहा है?”
“अंदर आने वाला हूँ,” विक्रम बोला।
“अंदर? उसी जगह? पर समर सर तो…”
“दोनों जगह अलग हैं,” मैंने कहा, और उसका हाथ पकड़ लिया। “आराम से। साँस ले।”
विक्रम ने अपने लंबे लंड की टिप रखी और धीरे-धीरे दबाया। काशिश की साँस रुक गई। पहला इंच — दर्द। दूसरा इंच — और वो बोली, “रुको… रुको…”
“हटा दूँ?” विक्रम ने पूछा।
“नहीं,” काशिश ने दाँत भींच कर कहा, “डाल।”
और फिर वो अंदर चला गया। अब काशिश के अंदर दो लंड थे — एक बुर में, एक गाँड में, और बीच में सिर्फ़ एक पतली दीवार। दोनों ने एक साथ चलना शुरू किया, बारी-बारी से, और काशिश पूरी टूट गई।
वो बेड पर पसर गई, दोनों हाथ फैलाए, आँखें बंद, और मुँह से लगातार आवाज़ निकल रही थी — “आ… आ… आ… राकेश… राकेश देख…”
मैं पास बैठा देख रहा था, और मेरा लंड फिर तन गया था। आकाश ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला, “भाई, तेरी बहन कमाल है।”
“हाँ,” मैंने कहा, “है।”
दो मिनट में काशिश अपने आने के कगार पर पहुँच गई। उसने अपने निपल्स ख़ुद पकड़ कर मसलने शुरू किए, और फिर चीख पड़ी — “आsshhhhhhh!” — और उसका पूरा शरीर झटके खाने लगा। उसकी बुर ने समर के लंड को इतनी ज़ोर से दबाया कि वो भी रुक गया।
“निकल दूँ?” समर ने हाँफते हुए पूछा।
“नहीं,” काशिश ने कहा, “अंदर। सब अंदर।”
समर ने आख़िरी झटके मारे और उसके अंदर छोड़ दिया। फिर विक्रम ने, उसकी गाँड में। फिर आकाश ने, फिर से उसकी बुर में। और आख़िर में मैं — चौथा, सबसे आख़िर, जैसे मुहर।
जब मैंने उसके अंदर छोड़ा, तब तक काशिश के शरीर में तीन आदमियों का रस भर चुका था और मेरा चौथा। चारों ने एक-एक बार उसके अंदर छोड़ा — किसी ने उसकी बुर में, किसी ने गाँड में, किसी ने मुँह में।
काशिश लेटी रही। साँस फूल रही थी। उसकी बुर से रस धीरे-धीरे बह कर चादर पर गिर रहा था, और उसके दूध पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
उसने आँखें खोलीं और मुझे देखा।
“चार,” उसने फुसफुसाया।
“चार,” मैंने कहा।
“और तू आख़िर में था।”
“हाँ।”
“अच्छा किया,” वो बोली, और मेरा हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रख दिया — जहाँ उसका दिल अब भी तेज़ धड़क रहा था।
चारों पसरे रहे। आकाश बीयर लाया, विक्रम ने पानी, समर ने छत का दरवाज़ा खोल दिया और ठंडी हवा अंदर आई। काशिश ने चादर ओढ़ ली और हमारे बीच बैठ गई।
फिर उसने कहा — “एक बात पूछूँ?”
“पूछो,” समर बोला।
“आप तीनों ने मुझे भाभी क्यों कहना शुरू किया? मैं तो राकेश की बहन हूँ।”
आकाश हँसा। “क्योंकि जब राकेश तुझे देखता है, तो वो भाई जैसा नहीं लगता।”
काशिश ने मेरी तरफ़ देखा।
“और जब तू उसे देखती है,” विक्रम ने कहा, “तो तू बहन जैसी नहीं लगती।”
काशिश चुप रही। फिर बोली, “तो फिर हम क्या हैं?”
“तुम,” समर ने कहा, “बस तुम हो।”
और उस रात काशिश मेरी बाँह में सोई — जैसे उदयपुर में सोई थी। तीन और आदमी कमरे में थे, पर वो मेरे सीने पर सिर रख कर लेटी, और उसने सोने से पहले बहुत धीरे से कहा —
“राकेश, अगले साल पाँच।”
“पाँच कौन?”
“समर सर का कोई दोस्त।” उसने आँखें बंद कर लीं। “और उसके बाद छह। और उसके बाद… बस तू।”
हमें लगा था हम सब कुछ छिपा रहे हैं। लेकिन एक दिन माँ ने सुबह चाय लेकर मेरे कमरे में आना किया — बिना दस्तक दिए।
दरवाज़ा खुला और वहाँ काशिश थी, मेरे बेड पर, मेरी कमीज़ पहने हुए, बाल बिखरे, और बग़ल में मैं — नंगी छाती।
माँ रुक गईं। ट्रे हाथ में थी। तीन सेकंड चुप्पी रही।
फिर माँ ने बहुत शांति से कहा — “चाय रख रही हूँ। गरम है।”
और वो मुड़ कर चली गईं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
काशिश ने आँखें खोलीं और मुझे देखा। मैंने कहा, “अब क्या?”
“अब कुछ नहीं,” वो बोली, और मेरी छाती पर सिर रख दिया। “माँ ने देख लिया तो अच्छा ही किया। अब हमें छिपाना नहीं पड़ेगा।”
दस मिनट बाद माँ ने नीचे से आवाज़ दी — “काशिश! नीचे आ जा। बापू को भी बताना पड़ेगा। और बता, तूने अपने भैया की कमीज़ क्यों पहनी है?”
काशिश ने मुँह मेरे कंधे में दबा कर हँसा और बोली, “क्योंकि मेरी कमीज़ भीग गई थी, माँ।”
“क्यों भीगी थी?”
“पानी गिर गया था,” काशिश ने कहा।
“और तेरे भैया की छाती क्यों खुली है?”
काशिश चुप रही। मैं चुप रहा। और फिर माँ ने नीचे से वो आवाज़ दी जो हर राज़ को जानती है — “हूँ। ठीक है।”
नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।
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