bhabhi hardcore chudai for baby
मेरा नाम रोहित है। मैं लखीमपुर खीरी का रहने वाला हूँ — उस कस्बे का, जहाँ बरसात में गलियों का कीचड़ इतना गहरा हो जाता था कि चप्पल पहनकर चलना सजा लगती थी, और गर्मियों में आम के बागों से इतनी मिठास हवा में घुलती थी कि साँस लेते ही दाँतों में खट्टापन उतर आता था।
हमारा घर पुराना था — आँगन में एक बूढ़ा नीम का पेड़, उसके नीचे पीतल की परात रखकर माँ कपड़े धोती थीं, छत पर मिर्चें सुखाने की लाल चादर बिछी रहती थी, और दीवारों पर हर साल सफेदी की नई परत चढ़ती थी जो पहली बारिश में फिर से पीली पड़ जाती थी। घर में चार जानें थीं — पापा, मम्मी, मेरे बड़े भाई जितेंद्र, और मैं।
जितेंद्र भाई मुझसे पाँच साल बड़ा था। और भाई सिर्फ बड़ा नहीं था, वह गुस्से वाला भी था। उसका गुस्सा मौसम की तरह था — कभी अचानक आता और घर भर को ढक लेता। एक बार नल का पानी बंद हो गया तो उसने पूरी बाल्टी आँगन में दे मारी और दो दिन तक किसी से बात नहीं की।
पापा कम बोलने वाले थे, वे अपनी चुप्पी में ही सब कह देते थे। और मम्मी — मम्मी मेरी दुनिया थीं। मुझ पर मम्मी का प्यार ऐसा था जैसे कोई अपनी आँख की पुतली को हथेली में बंद करके रखता हो। मैं जितना बड़ा होता गया, मम्मी का लाड़ कम होने के बजाय बढ़ता ही गया।
आज मैं बीस साल का हो चुका हूँ, पाँच फुट ग्यारह इंच लंबा हूँ, छाती चौड़ी है, और फिर भी मेरी मम्मी आज भी मुझे अपने हाथों से नहलाती हैं और अपने हाथों से खाना खिलाती हैं। लोग हँसते हैं, कहते हैं — “इतना बड़ा हो गया, अब तक माँ के हाथ का खाना?” लेकिन उन्हें क्या पता कि माँ के हाथ में सिर्फ प्यार नहीं होता, माँ के हाथ में आदत होती है, और आदत छूटती नहीं।
और यही आदत थी जिसने मेरी पूरी कहानी लिख दी। क्योंकि एक दिन मम्मी की जगह वो हाथ बदल गए — मेरी भाभी के हाथ।
यह उस समय की बात है जब भाई की शादी हुई थी। भाभी का नाम रीना था। वह उम्र में छोटी थी, चेहरे पर कुछ ऐसी मासूमियत थी जो शादी के बाद भी कस्बे की धूप में सूख नहीं पाई थी। घूँघट के नीचे से जब वह हँसती, तो आँगन की गौरैयाँ भी चौंककर उड़ जाती थीं।
भाभी मुझे बहुत प्यार करती थी। शुरू में यह प्यार देवर-भाभी वाला प्यार था — कभी कपड़े धो देती, कभी स्कूल से लौटने पर रोटी पर घी लगाकर दे देती, कभी बाल खींचकर हँसा देती। लेकिन सब कुछ जल्द ही बदलने वाला था।
वह दिन आज भी याद है। माँ बीमार थीं, तेज़ बुखार में बिस्तर पकड़े थीं। भाभी उनके सिरहाने बैठी थीं, और माँ की हथेली पकड़कर उन्होंने कहा, “माँ जी, अब आप आराम कीजिए। मैं आ गई हूँ, अब मैं रोहित को नहलाऊँगी और खिलाऊँगी।”
मम्मी ने कमज़ोर आवाज़ में कहा, “बेटा, यह आसान काम नहीं है। इसके लंड पर भी मैं तेल लगाकर मालिश करती हूँ — हड्डी-हड्डी सब मालिश करनी पड़ती है, तब जाकर यह चल पाता है। तू कैसे करेगी?”
भाभी शरमाकर बोली, “माँ जी, मैं भी आपकी तरह ही रोहित का देखभाल करूँगी। आपकी तरह ही।”
माँ ने उस दिन भाभी को ऊपर से नीचे तक देखा, और फिर हल्की मुस्कान के साथ आँखें बंद कर लीं। शायद माँ को तब पता नहीं था, और शायद पता भी था।
अगले दिन से भाभी वाकई मेरी देखभाल करने लगीं — ठीक माँ की तरह, बल्कि माँ से ज़्यादा ध्यान से। शाम को जब घर ठंडा होता, भाभी मुझे बुलाती, “रोहित, आ जा।” और मैं आ जाता। भाभी मेरे सारे कपड़े उतार देतीं — कमीज़, पैंट, बनियान, कच्छा।
मैं एक पुरानी लकड़ी की चौकी पर बैठ जाता, और भाभी पीतल की कटोरी में सरसों का तेल लेकर मेरी पीठ पर डालतीं। तेल ठंडा होता, भाभी की हथेलियाँ गरम। वह मेरे कंधों से शुरू करतीं, फिर पीठ, फिर कमर, फिर जाँघों पर आ जातीं। मेरी हर मांसपेशी को वह जानती थीं — कहाँ ज़ोर लगाना है, कहाँ हल्के से सहलाना है। फिर आख़िर में वह मेरे लंड पर तेल डालकर मालिश करतीं।
शुरू में तो यह मालिश बस मालिश थी। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, तेल की वह कटोरी एक अनजानी शुरुआत बन गई। भाभी की उँगलियाँ जब मेरे लंड पर तेल फैलातीं, तो कुछ देर के लिए मेरी सारी दुनिया रुक जाती थी। वह धीरे-धीरे, ऊपर से नीचे, फिर नीचे से ऊपर, एक लय में मालिश करतीं — और मेरे लंड का आकार बदलने लगता। भाभी हँसतीं, “देख, बड़ा हो गया।” और मैं शरमा जाता।
फिर भाभी मुझे बाथरूम में अपने साथ ले जातीं। वह भी कपड़े उतारकर नंगी हो जातीं — शुरू में ब्लाउज़ और साया तो बाद में सिर्फ तौलिया। और फिर साबुन लगाकर, फुहारे के नीचे, वह मेरे लंड को सहलाते हुए नहलातीं। पानी ठंडा, भाभी की हथेलियाँ गरम, और उनके निप्पल पानी की बूँदों से भीगे हुए मेरी छाती से टकराते। वह निपल्स मेरे हृदय की धड़कन के साथ काँपते, और मैं सोचता — काश यह स्नान कभी खत्म न हो।
इस तेल और पानी की मालिश ने मेरे शरीर का नक्शा बदल दिया। उन्नीस साल की उम्र तक मेरी लंबाई पाँच फुट ग्यारह इंच हो चुकी थी, और मेरे लंड का आकार सिर्फ इसी निरंतर मालिश के कारण ग्यारह इंच तक पहुँच चुका था। मोटा भी वह पूरा था, ऐसा कि भाभी जब मालिश करतीं तो उन्हें दोनों हाथों में लेना पड़ता। भाभी हँसकर कहतीं, “अरे रोहित, तू तो बड़ा हो गया, बहुत बड़ा।”
और हाँ — भाभी का दूध भी बढ़ने लगा था। मैंने पहली बार देखा था कि उनके ब्लाउज़ की सिलाई में कितनी कसावट आ गई थी। उनके निप्पल ब्लाउज़ के नीचे साफ़ नक़्शे की तरह उभरते थे। कभी-कभी जब भाभी झुकतीं, तो उनका दूध झूलता और मेरी नज़र वहीं अटक जाती। भाभी जानती थीं कि मैं देख रहा हूँ, लेकिन वह कुछ नहीं कहतीं। बस एक मुस्कान छोड़ देतीं।
धीरे-धीरे शब्द कम होने लगे और नज़रें ज़्यादा होने लगीं। यही थी हमारी chemistry की शुरुआत। हम दोनों जानते थे कि हमारे बीच कुछ है, लेकिन दोनों में से किसी ने उसका नाम नहीं रखा था। भाई जितेंद्र के सामने सब कुछ सामान्य था, और भाई की नज़र में सब कुछ सामान्य होना ज़रूरी भी था। लेकिन भाई के गुस्से वाले घर में एक छुपी हुई हलचल चलने लगी थी — और वह हलचल मेरे और भाभी के बीच थी।
भाई की शादी को तीन साल हो चुके थे, लेकिन भाभी के बच्चे नहीं हो रहे थे। यह बात घर में किसी ने ऊपर से नहीं कही, लेकिन दीवारों को सब पता था। हर महीने भाभी की आँखों में एक उम्मीद उगती और फिर टूट जाती। पापा चुप रहते। माँ बहाने बनातीं — “जल्दी क्या है, अभी तो दोनों बच्चे हैं।” और भाई — भाई का गुस्सा इस बात पर सबसे ज़्यादा उठता था।
एक रात भाई ने आवाज़ ऊँची करके कहा, “तीन साल हो गए। घर में कोई बच्चा नहीं। लोग क्या कहते हैं पता है? बीज खराब है या ज़मीन?”
भाभी उस रात रोई थी। मैंने उन्हें आँगन में अकेले बैठा देखा — नीम के पेड़ के नीचे, घुटनों में मुँह छुपाए। मैं पास जाकर बैठ गया। भाभी ने मेरी तरफ देखा और फिर बहुत धीरे से कहा, “रोहित, क्या सच में मेरी कोई गलती है?”
मैंने कहा, “भाभी, गलती किसी की नहीं होती। डॉक्टर से दिखाओ।”
वह बोली, “डॉक्टर क्या बताएगा? वो कहता है सब ठीक है। फिर बच्चा क्यों नहीं होता?”
मैंने उस रात पहली बार भाभी का हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। भाभी ने हाथ नहीं छुड़ाया।
डॉक्टर ने कुछ महीने पहले जो रिपोर्ट दी थी, वह घर में चुपचाप एक कोने में रखी थी। भाई की रिपोर्ट में सब ठीक था, भाभी की रिपोर्ट में भी सब ठीक था। फिर भी बच्चा नहीं। यही वह पहेली थी जिसने हमारे बीच वह दरवाज़ा खोला, जिसे खोलने की हिम्मत पहले किसी ने नहीं की थी।
और मैं जानता था — गहरे में जानता था — कि भाभी भी जानती थीं। हमारे बीच जो स्नान, जो तेल, जो निपल्स की छुअन, जो हर रात की गर्मी थी — वह बेकार नहीं जा सकती थी।
वह रात दशहरे के बाद की थी। पूरा कस्बा रामलीला से लौटकर सो चुका था। घर की छत पर चाँद इतना साफ़ था कि उसकी रोशनी में आँगन की मिट्टी चाँदी जैसी दिख रही थी। भाई दूध पीकर सो गया था, मम्मी-पापा अपने कमरे में थे। भाभी छत पर कपड़े समेट रही थीं।
मैं भी छत पर गया। भाभी ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई।
“रोहित, देर क्यों आया?”
“नींद नहीं आ रही थी भाभी।”
वह कपड़ों का ढेर वहीं छोड़कर चाँद की तरफ मुँह करके बैठ गईं। मैं उनके पास बैठ गया। दोनों चुप। चुप्पी में कुछ ऐसा बोलता है जो शब्द नहीं बोल पाते।
फिर भाभी ने कहा, “तुझे पता है रोहित, शादी से पहले मैं कैसी थी?”
“कैसी?”
“गाने सुनती थी। कैसेट पर। कुमार सानू, अलका याग्निक… पूरा दिन गाने। मेरी सखी कहती थी, तू तो बड़ी रोमांटिक है। और अब?” भाभी ने ठंडी साँस ली, “अब घर के काम, और बच्चे की चिंता। गाने कहीं छूट गए।”
“भाभी, आप अब भी गा सकती हैं।”
वह हँसीं, “किसके साथ गाऊँ रोहित? तेरे भाई को गाना-वाना पसंद नहीं। वो कहता है, बेकार का शोर।”
उस रात मैंने पहली बार भाभी की आँखों में वह लड़की देखी जो शादी से पहले थी — गाने वाली, हँसने वाली, सपने देखने वाली। और उस लड़की को मैंने अपने सामने बैठा पाया।
मैंने धीरे से कहा, “भाभी, कल से हम गाने सुनेंगे। मेरे मोबाइल में हैं।”
भाभी ने मेरी तरफ देखा। चाँद की रोशनी में उनके निपल्स पतले कुर्ते के नीचे साफ़ उभरे हुए थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “रोहित, मुझे ठंड लग रही है।”
मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर रखा। फिर हम उठे और नीचे आ गए। घर के आँगन के उस कोने में, जहाँ पुराना पलंग पड़ा था और जहाँ से कोई देख नहीं सकता था, हम बैठे।
और वहीं पहली बार, भाभी ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया।
अगले तीन हफ़्ते हमारा पूरा रिश्ता बदल गया। अब हम नहलाते-धुलाते नहीं थे, अब हम एक-दूसरे को खोजते थे। भाई जब खेत पर जाता, और माँ-पापा दिन में बाहर होते, तब हमारा आँगन हमारा होता था।
भाभी की पुरानी शैली थी — नब्बे के दशक वाली। उन्हें फुर्ती नहीं, धीमापन पसंद था। उन्हें पहले बातें करनी थीं, पहले गाना सुनना था, पहले हाथ पकड़कर बैठना था, फिर आगे बढ़ना था। उनके लिए शुरुआत सीधे शरीर से नहीं होती थी — शुरुआत आँखों से होती थी।
तो हमने वही किया। मैंने मोबाइल पर उनके पसंदीदा पुराने गाने लगाए — “पहला नशा”, “मेरे रश्के क़मर”, “दीवाना हुआ बादल”। भाभी आँखें बंद करके सुनतीं, और कभी-कभी धीरे से गुनगुनाती भी। मैं उनके पास बैठकर उनके बाल सहलाता। उनके सिर से ख़ुशबू आती — नारियल तेल और उस साबुन की, जो कस्बे की दुकान पर मिलता था।
फिर भाभी ने एक दिन कहा, “रोहित, तू तो अब बड़ा हो गया। पर तूने कभी प्यार किया है?”
“भाभी, आपको बताऊँ?” मैंने कहा, “पहला प्यार आप ही हैं।”
भाभी का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने मुँह फेर लिया, फिर वापस देखा, और फिर बहुत धीरे से मेरा हाथ पकड़कर अपने दूध के पास रख दिया। कुर्ते के ऊपर से भी मुझे उनके दिल की धड़कन महसूस हुई। वह बोली, “तू ऐसी बातें करेगा तो मैं क्या करूँगी?”
मैंने अपनी उँगलियाँ धीरे-धीरे उनके ब्लाउज़ की तरफ बढ़ाईं। पहले ब्लाउज़ के ऊपर से सहलाया। भाभी ने आँखें बंद कर लीं। मैंने हुक खोले — एक, दो, तीन। ब्लाउज़ खुल गया और उनका दूध बाहर आ गया। गोरे, भरे हुए, और निप्पल गुलाबी-भूरे — ऐसे जैसे किसी ने गुलाब की पंखुड़ी पर तेल की एक बूँद रख दी हो।
मैंने पहली बार उनके निप्पल को अपने होंठों से छुआ। भाभी की साँस एकदम रुक गई, फिर टूटी। उन्होंने मेरा सिर अपनी छाती से दबा लिया और धीरे से कहा, “ऐसे ही कर… ऐसे ही कर रोहित।”
मैंने उनके निपल्स को धीरे-धीरे चूसा, कभी हल्के दाँत से सहलाया, कभी ज़बान से घुमाया। भाभी के निपल्स सख़्त हो गए और उनके दूध के आसपास की त्वचा ठंडी हो गई। भाभी मेरे बालों में उँगलियाँ घुमाती रहीं और बार-बार मेरा नाम लेती रहीं, “रोहित… रोहित…”
मैंने उनकी साया खोली। साया ज़मीन पर गिरी और भाभी सिर्फ ब्लाउज़ में बची रहीं। उनकी नाभि पर मैंने होंठ रखे, फिर धीरे-धीरे नीचे गया। साया उतारते ही मैंने उन्हें पहली बार पूरी देखा — उनकी बुर, जो सिर्फ हल्के बालों से ढकी थी, और उनकी जाँघों के बीच वह गर्मी, जो मेरे चेहरे पर लग रही थी।
मैंने उनकी बुर को अपने होंठों से छुआ। भाभी ने एक झटका लिया और मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया। मैंने उनकी बुर पर होंठ फेरना शुरू किया — ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर। भाभी की बुर गीली हो रही थी, और उसकी ख़ुशबू बढ़ती जा रही थी। मैंने ज़बान से उनके छोटे से उभार को सहलाया और भाभी की कमर थरथरा उठी। वह बोली, “रोहित, तूने यह कहाँ सीखा?”
मैंने हँसकर कहा, “भाभी, मन में सब सीखा हुआ था। बस मौका मिला नहीं।”
भाभी ने मेरे सिर को उठाकर मेरे होंठ चूमे। उनके होंठों पर अपनी ही बुर का स्वाद था। फिर उन्होंने मेरी कमीज़ उतारी, मेरी पैंट खोली, और मेरा लंड उनके हाथ में आ गया। वह ग्यारह इंच का, सख़्त, और ऊपर से चमकता हुआ। भाभी ने उसे दोनों हाथों में लिया और हैरानी से देखा।
“रोहित… इतना बड़ा कब हुआ?”
“आपकी मालिश से भाभी।”
वह शरमाई, फिर झुकी और उसके ऊपर हल्का चूमा। यही थी उनकी पुरानी शैली — पहले आँख, फिर हाथ, फिर होंठ, और फिर पूरा शरीर। भाभी ने कहा, “आज धीरे करना रोहित। मुझे डर लगता है।”
मैंने भाभी को पुराने पलंग पर लिटाया। पलंग की रस्सियाँ हमारे वज़न से चरमराईं। भाभी ने अपनी टाँगें खोलीं और अपनी बुर मेरे सामने रख दी। उस पल भाभी की आँखों में एक अजीब सी उम्मीद थी — वह उम्मीद जो तीन साल के सूनेपन से पैदा हुई थी।
मैंने अपने लंड का सिरा उनकी बुर पर रखा। भाभी ने हाथ से मेरी पीठ पकड़ी। मैंने धीरे से अंदर जाना शुरू किया। भाभी की बुर गरम, गीली और टाइट थी। पहला इंच जाते ही भाभी ने होंठ काटे। दूसरा इंच जाते ही उन्होंने मेरा नाम लिया। तीसरे पर उनकी आँखों से पानी आ गया।
“रोहित… पूरा अंदर कर… धीरे-धीरे…”
मैं धीरे-धीरे अंदर गया, और जब पूरा लंड भाभी की बुर में समा गया, तो दोनों ने लंबी साँस छोड़ी। भाभी की बुर ने मेरे लंड को ऐसे पकड़ा जैसे किसी को डूबते हुए ने रस्सी पकड़ी हो। मैं कुछ देर वहीं रुका — बाहर निकले बिना। भाभी ने मेरी छाती पर हाथ रखा और कहा, “हिल मत… बस यूँ ही रुक जा… मुझे तेरे लंड का वज़न अंदर महसूस हो रहा है।”
फिर मैंने हिलना शुरू किया। पुरानी शैली में — धीमा, गहरा, पूरा। कोई जल्दबाज़ी नहीं। हर धक्का गिना हुआ, हर धक्का लंबा। भाभी की छाती हर धक्के पर ऊपर-नीचे होती और उनके दूध हल्के से काँपते। उनके निपल्स सख़्त होकर मेरी छाती से रगड़ खाते।
भाभी ने अपनी टाँगें मेरी कमर पर लपेट लीं। अब हर धक्का और गहरा हो गया। भाभी धीरे-धीरे कराहने लगीं — “आह… रोहित… ऐसे ही… मत रुक…”
मैंने उनकी बुर पर अपना हाथ रखा। जहाँ मेरा लंड भाभी के अंदर जाता, वहीं बाहर से मैंने उँगली से उनके छोटे उभार को सहलाया। भाभी पूरी झटके खाने लगीं। उनकी बुर ने मेरे लंड को और कसकर पकड़ा, और फिर भाभी चरम पर पहुँचीं — उनका पूरा शरीर अकड़ गया, टाँगें कस गईं, और वे लंबी साँस लेकर पलंग पर फैल गईं।
मैंने उस पल में कुछ देर रुककर उन्हें देखा। भाभी की छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। माथे पर पसीना था। आँखें बंद थीं। और होंठों पर एक मुस्कान थी — वह मुस्कान जो उस रात नीम के पेड़ के नीचे गायब हो गई थी।
फिर भाभी ने आँखें खोलीं और कहा, “रोहित, अंदर ही करना। बाहर मत जाने देना।”
मैंने सिर हिलाया। और फिर मैंने वह किया जो भाभी चाहती थीं। तीन-चार गहरे धक्कों के बाद मैंने पूरा लंड भाभी की बुर में दबा दिया और वीर्य भाभी के अंदर छोड़ दिया। भाभी ने मेरी पीठ अपने नाखूनों से पकड़ ली। और वह लंबी साँस — वह साँस जिसमें तीन साल की प्यास थी — हम दोनों ने एक साथ छोड़ी।
कुछ देर हम वैसे ही रहे। मेरा लंड भाभी के अंदर, मेरा सिर भाभी के दूध के बीच। भाभी मेरे बाल सहलाती रहीं और धीरे से कहा, “रोहित, यह पाप है न?”
“भाभी, जिस पाप से बच्चा हो, वो पाप कैसा?”
भाभी हँसीं। और उस हँसी में सब कुछ था — डर, ख़ुशी, अपराधबोध, और उम्मीद।
पहली रात के बाद रुकना मुश्किल था। और रुके भी कैसे? भाभी के पेट में बच्चा आ जाए, इसके लिए एक बार काफ़ी नहीं था — डॉक्टर ने खुद कहा था कि कोशिश करनी पड़ती है, महीने दर महीने, चक्र दर चक्र। तो हमने कोशिश की। और कोशिश की इतनी कि बच्चे के लिए भाभी ने पचासों बार चुदवाया।
पचासों बार — यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही बात नहीं थी। वह सच था। हर वह मौका जब भाई बाहर होता, जब माँ बाज़ार गई होती, जब दोपहर की नींद में पूरा घर सो जाता — हम उस पुराने पलंग पर लौट आते। कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी आधी रात। कभी जल्दी-जल्दी, कभी पूरे घंटे भर। और हर बार भाभी यही कहतीं, “अंदर ही छोड़ना रोहित। बच्चा चाहिए।”
भाभी की बुर उस पूरे साल में मेरे लंड की आदी हो गई। उनके शरीर ने मेरा शरीर पहचान लिया। मैं उनकी साँस से जान जाता कि कब उन्हें तेज़ चाहिए और कब धीमा। भाभी जान जातीं कि कब मुझे रुकना है, कब आगे बढ़ना है। हम एक दूसरे की भाषा बोलने लगे थे — वह भाषा जिसमें शब्द नहीं, धक्के होते हैं।
कभी-कभी भाभी दूध पीने की ज़िद करतीं। वे मेरा सिर अपनी गोद में रखतीं, और मैं उनके निपल्स चूसता रहता, जब तक कि भाभी की साँस भारी न हो जाए और वे खुद मेरे ऊपर आ जाएँ। कभी वे मेरे लंड को अपने दूध के बीच रखकर दबातीं और हँसतीं, “देख, तेरा लंड भी अब मेरा ही हो गया।”
और हर बार, आख़िर में, वे यही कहतीं — “अंदर ही करना।” और मैं अंदर ही करता।
महीना बीता। फिर दूसरा। भाभी की आँखों में हर बार वही उम्मीद उगती और हर बार टूट जाती। लेकिन अब टूटने में दर्द कम था, क्योंकि अब अकेलापन नहीं था। अब उम्मीद टूटने पर भी एक आदमी था जो भाभी का हाथ पकड़ लेता था।
फिर एक दिन कुछ बदला। भाई ने घर में एक पुराना लैपटॉप लाया — किसी दुकानदार से सस्ते में खरीदा था। भाई उसे खेत के हिसाब-किताब के लिए लाया था, लेकिन भाभी ने उसमें एक नई दुनिया खोल ली।
एक रात भाभी ने मुझे बुलाया। “रोहित, यह देख।”
स्क्रीन पर एक अंग्रेज़ी गाना चल रहा था, और उसमें एक जोड़ा बेड पर था — नब्बे के दशक के पुराने गानों जैसी शरम नहीं, बल्कि सीधी, खुली, बेबाक। भाभी ने कहा, “रोहित, यह क्या है? यह तो अजीब है न?”
मैंने कहा, “भाभी, यह नई शैली है। अब लोग ऐसे ही करते हैं।”
भाभी ने पूछा, “कैसे?”
और उस रात मैंने भाभी को नई शैली दिखाई। पहले स्क्रीन पर, फिर पलंग पर।
नई शैली में पहले जैसी शरम नहीं थी — नई शैली में सब कुछ सामने था, सब कुछ खुला था। भाभी ने पहली बार पूरी नंगी होकर मेरे सामने खड़ी होकर अपने कपड़े उतारे। कमरे की रोशनी में उनका दूध, उनकी कमर, उनकी बुर — सब कुछ साफ़ दिख रहा था। भाभी ने अपने बाल खोले और कहा, “देख रोहित। पूरा देख। अब शरम नहीं।”
मैंने उन्हें पलंग पर लिटाया और पहली बार पूरे शरीर को एक साथ खोजा — गर्दन से शुरू, फिर कंधे, फिर उनके दूध, फिर निपल्स को ज़बान से खेलाया, फिर पेट की नाभि पर रुका, फिर जाँघों के अंदर तक गया। भाभी की बुर पहले से गीली थी — नई शैली की तरह, बिना ज़्यादा इंतज़ार।
फिर मैंने उन्हें पलटकर लिटाया — पेट के बल। भाभी ने पहले ऐसा कभी नहीं किया था। उन्होंने हैरानी से पूछा, “यह कैसे होगा?”
मैंने कहा, “भाभी, भरोसा रखो।”
मैंने पीछे से अपना लंड उनकी बुर पर रखा और धीरे से अंदर गया। इस कोण से भाभी की बुर ने मेरे लंड को अलग तरह से पकड़ा। भाभी की साँस एकदम तेज़ हो गई। उन्होंने तकिया मुँह में दबा लिया ताकि आवाज़ बाहर न जाए। मैंने उनकी कमर पकड़कर धक्के शुरू किए — पहले धीमे, फिर तेज़, फिर तेज़ से तेज़। भाभी की बुर हर धक्के पर चटकती आवाज़ कर रही थी, और वह आवाज़ उस रात हमारे सबसे बड़े राज़ की आवाज़ थी।
फिर मैंने भाभी को करवट पर लिटाया। फिर उन्हें अपने ऊपर बिठाया। भाभी ने पहली बार मेरे ऊपर बैठकर खुद हिलना शुरू किया — शुरू में झिझकते हुए, फिर पूरे आत्मविश्वास से। उनके दूध ऊपर-नीचे हो रहे थे, उनके निपल्स मेरे होंठों के सामने झूल रहे थे, और उनकी बुर मेरे लंड को निचोड़ रही थी। भाभी की आँखें बंद थीं और वे धीरे-धीरे कराह रही थीं, “रोहित… रोहित… अब नई शैली ही अच्छी है…”
मैंने उनकी कमर पकड़कर नीचे खींचा और गहरे धक्के मारे। भाभी ने मेरे कंधे पकड़ लिए और पूरे शरीर से झूलने लगीं। उस रात पहली बार भाभी ने अपनी आवाज़ नहीं रोकी — वे ज़ोर से कराहीं, और शायद आँगन के पार तक आवाज़ गई होगी। पर हमें फ़र्क नहीं पड़ा।
और जब मैं चरम पर पहुँचा, तो भाभी ने अपनी टाँगें मेरी कमर पर कसकर जकड़ दीं और कहा, “अंदर ही रोहित… अंदर ही।”
मैंने पूरा वीर्य उनकी बुर में छोड़ा। भाभी काँपती रहीं, फिर मेरी छाती पर गिर पड़ीं। दोनों पसीने से भीगे थे। भाभी ने मेरे होंठ चूमे और फुसफुसाई, “आज कुछ होगा रोहित। मुझे लगता है।”
उसके बाद के महीने में हमने और भी कोशिश की। नई शैली, पुरानी शैली, हर रोज़ नहीं तो हर दूसरे दिन। बच्चे के लिए भाभी ने पचासों बार चुदवाया — और हर बार भाभी यही कहतीं, “अंदर ही करना।” भाभी की बुर उन दिनों में एक मंदिर जैसी हो गई थी — जहाँ हर बार मैं जाता और हर बार कुछ माँगता। और भाभी हर बार देतीं।
फिर एक दिन सुबह भाभी उठीं और बाथरूम की तरफ दौड़ीं। दो दिन ऐसा हुआ। तीसरे दिन भाभी ने दुकान से एक छोटा सा कागज़ लाकर छुपा दिया। फिर वे मेरे पास आईं, मेरा हाथ पकड़ा, और मुझे आँगन के उस कोने में ले गईं जहाँ हमारी शुरुआत हुई थी।
भाभी ने वह कागज़ मेरे हाथ में रखा। दो लाल लकीरें। दो साफ़, गहरी लकीरें।
भाभी की आँखों से पानी बह रहा था, लेकिन होंठ हँस रहे थे। वह बोली, “रोहित… हो गया।”
मैं कुछ नहीं बोल सका। बस भाभी को अपनी बाहों में भर लिया। भाभी ने मेरे कंधे पर सिर रखकर कहा, “यह बच्चा तेरा है रोहित। भाई को पता नहीं चलेगा, किसी को पता नहीं चलेगा। बस तू और मैं जानेंगे।”
और उस सुबह हम दोनों जान गए कि हमारा यह पाप कभी खत्म नहीं होगा — क्योंकि अब यह पाप माँस और हड्डी लेकर इस घर में घूमेगा।
भाई ने जब ख़बर सुनी, तो उसका गुस्सा उस दिन पिघल गया। वह भाभी को देखकर हँसा — शायद पहली बार इतना खुलकर। उसने कहा, “देखा, कहा था न मैंने? जल्दी क्या है।” और भाभी ने मेरी तरफ देखकर हल्की सी आँख मारी।
बच्चा हुआ। लड़का। भाई के नाम से पूरे कस्बे में मिठाई बँटी। लेकिन जो आँखें उस बच्चे को सबसे ज़्यादा देर तक देखती रहीं, वे भाभी की थीं — और उनके बगल में मेरी।
बच्चे के जन्म के बाद भाभी का दूध और बढ़ गया। वे बच्चे को दूध पिलातीं, और मैं पास बैठकर देखता रहता। भाभी कभी-कभी बच्चे को सुलाकर मेरी तरफ देखतीं और कहतीं, “अब तेरी बारी।”
पहली बार जब हम फिर मिले, वह बच्चे के जन्म के डेढ़ महीने बाद था। भाभी ने दरवाज़ा बंद किया, पर्दा खींचा, और मेरी तरफ बढ़ीं। उनकी बुर में थोड़ा बदलाव था — थोड़ी और गहरी, थोड़ी और गरम। जब मैंने अंदर जाना शुरू किया, भाभी ने आँखें बंद कर लीं और कहा, “धीरे रोहित… पर रुकना मत।”
उस दिन हमने फिर पुरानी शैली अपनाई — धीमी, लंबी, बिना जल्दबाज़ी। भाभी के दूध से दूध की बूँदें टपक रही थीं। मैंने उनके निपल्स चूसे और भाभी ने मेरा सिर दबा लिया। हम दोनों जानते थे कि अब यह सिर्फ बच्चे के लिए नहीं है — अब यह अपने लिए है।
और वह रात खत्म होते-होते भाभी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “रोहित, अगला बच्चा भी तेरा ही होगा।”
मैंने हँसकर कहा, “भाभी, तो फिर पचासों बार और?”
भाभी ने मेरी छाती पर हाथ रखा और बोलीं, “पचासों बार क्या, रोहित — अब तो जब तक शरीर चलेगा, चुदवाती रहूँगी। तू बस मुझे मत छोड़ना।”
मैंने उनके होंठ चूमे और कहा, “भाभी, छोड़ूँगा कैसे? आपने मुझे तेल से पाला है, फिर नहाए पानी से नहलाया है, और अब खुद अपने अंदर जगह दी है। यह कर्ज़ किसी हिसाब से चुकेगा?”
भाभी हँसीं, और उस हँसी में पूरा घर बस गया।
अगली बार वह दोपहर थी। भाई बच्चे को गोद में लेकर पड़ोस में गया था, माँ छत पर सो रही थीं। भाभी ने मुझे आँगन के उस पुराने पलंग पर बुलाया — उसी पलंग पर, जहाँ पहली बार हम मिले थे। पलंग की रस्सियाँ वैसे ही चरमराईं।
भाभी ने पहले अपना दूध खोला और मेरे मुँह में डाल दिया। फिर मेरी कमीज़ उतारी, मेरी पैंट खोली, और मेरा लंड अपने हाथों में लेकर धीरे से सहलाया — ठीक वैसे ही, जैसे बरसों पहले तेल की कटोरी के साथ करती थीं। फिर बोलीं, “आज नई शैली। आज तू नीचे लेट, मैं ऊपर।”
वह मेरे ऊपर आ गईं, मेरी कमर पर बैठीं, और मेरा लंड उनकी बुर में समा गया। भाभी ने दोनों हाथ मेरी छाती पर रखे और हिलना शुरू किया। उनके दूध ऊपर-नीचे झूल रहे थे, निपल्स मेरे होंठों के सामने, और भाभी की बुर मेरे लंड को धीरे-धीरे निचोड़ रही थी। मैंने उनकी कमर पकड़कर नीचे खींचा और गहरे धक्के मारे। भाभी ने तकिया मुँह में दबाया और फिर कराहने लगीं, “रोहित… अंदर ही… अंदर ही…”
मैंने अंदर ही छोड़ा। भाभी मेरी छाती पर गिरीं, पसीने से भीगी, और मेरे होंठों पर हल्का चूमा। फिर वे उठीं, कपड़े ठीक किए, और जाते-जाते रसोई की तरफ मुड़कर बोलीं —
“जल्दी आ जाना रोहित। आज दाल बनाई है तेरे हाथ की।”
और मैं वहीं पलंग पर लेटा रह गया, छत की तरफ देखते हुए। ऊपर नीम की पत्तियाँ हिल रही थीं। नीचे आँगन में धूप फैल रही थी। और मेरे भीतर एक अजीब सी शांति थी — वह शांति जो तब मिलती है जब कोई आपका होता है, पूरी तरह, बिना शर्त, बिना किसी सवाल के।
माँ आज भी मुझे अपने हाथों से खिलाती हैं। और भाभी आज भी मुझे अपने हाथों से नहलाती हैं।
बस अब फ़र्क इतना है — नहाने के बाद अब हम दोनों भीगे ही रहते हैं।
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me Naina hun illahabad se. mujhe chudwana hai.