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उस रात के बाद दो हफ़्ते तक रुक्मणी का शरीर सामान्य नहीं हुआ। पहले तीन दिन तो वो ठीक से बैठ भी नहीं पाई — कहती “अंदर तक अकड़ गई हूँ, जैसे किसी ने मुझे खोलकर वापस बंद किया हो, और ठीक से बंद नहीं किया।” मैं हँसता, और वो मुझे मारती। फिर वो मेरे पास आकर बैठ जाती और मेरा हाथ अपनी कमर पर रख देती, जैसे पुष्टि कर रही हो कि मैं हूँ, वो अकेली नहीं है।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की मेरी गर्लफ्रेंड चार काले लंडों से चुदवाई
उन तीन दिनों में हमने चुदाई नहीं की। बस सोए, खाया, बातें कीं, और एक-दूसरे को छुआ। और मुझे लगा कि यही तीन दिन हमारे सात महीनों से ज़्यादा भारी थे। जब शरीर पर लगाम लग जाती है, तब पता चलता है कि सामने वाला सिर्फ़ शरीर नहीं था।
चौथे दिन रुक्मणी ने खुद बुलाया। मैं पहुँचा तो वो दरवाज़े पर खड़ी थी — साड़ी में, बाल जूड़े में, माथे पर बिंदी। देखकर लगा कि कोई और औरत है।
“ये क्या है?” मैंने पूछा।
“बदलाव,” उसने कहा। “आज घर जैसा महसूस करना है।”
उस रात हमने बहुत धीरे चुदाई की। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई करतब नहीं। सिर्फ़ वो लेटी हुई, मैं उसके ऊपर, और हर धक्का एक सवाल की तरह। उसने मेरी पीठ पर नाखून रखे, मेरे कान में धीमे-धीमे कुछ कहा, और आख़िर में मेरी गर्दन में हाथ डालकर मुझे अपने ऊपर कस लिया। उस रात के बाद हमारे बीच एक चीज़ बदल गई थी — और दोनों जानते थे, पर किसी ने नाम नहीं दिया।
पाँचवें दिन रुक्मणी ने नोटबुक निकाली।
“फिर?” मैंने पूछा।
“फिर,” उसने कहा, और नोटबुक खोल दी। पिछली बार चार नाम थे। इस बार उसने छह लिखे थे।
“छह?” मैंने पूछा।
“छह,” उसने कहा। “लेकिन इस बार कुछ अलग है।”
इस बार उसने शर्तें बदल दीं। पहली शर्त — वो बीच में रहेगी, पर मैं बाहर नहीं खड़ा रहूँगा। इस बार मैं भी शुरुआत से आख़िर तक उसके साथ रहूँगा। वो चाहती थी कि पहला धक्का मेरा हो, और आख़िरी धक्का भी मेरा हो। बीच में जो छह लोग आएँ, वो सिर्फ़ बीच के हों — शुरुआत और अंत उसके पास।
“समझ रहे हो?” उसने पूछा।
“समझ रहा हूँ,” मैंने कहा। “तुम चाहती हो कि सब देखें कि तुम मेरी हो।”
“हाँ,” उसने कहा, बिना झिझक। “और ये भी चाहती हूँ कि मैं खुद देखूँ कि तुम मेरे हो।”
दूसरी शर्त — कोई जल्दबाज़ी नहीं। पूरी रात। इस बार वो सिर्फ़ झड़ने नहीं आ रही थी, वो जीना चाहती थी। उसने कहा — “पिछली बार मैं चार बार झड़ी, पर मुझे ठीक से याद नहीं कि बीच में क्या हुआ। इस बार मुझे याद रखना है।”
तीसरी शर्त — और ये सबसे नई थी — इस बार उसे दो एक साथ चाहिए थे। असली, पूरे। पिछली बार एक झलक मिली थी, अधूरी। इस बार वो चाहती थी कि दो आदमी एक साथ अंदर हों, और दोनों ठीक से हों — एक बुर में, एक गांड में, पूरी लय के साथ।
“दो एक साथ?” मैंने कहा।
“दो एक साथ,” उसने दोहराया, और मुझे देखकर मुस्कुराई। “और उसमें एक तुम भी होगे।”
मैंने सोचा — नौ इंच के साथ किसी की गांड में जाना, और उसी वक़्त किसी और का लंड उसकी बुर में। मुझे तुरंत खड़ा होना महसूस हुआ, और रुक्मणी ने नीचे देखकर पकड़ लिया।
“देखा,” उसने कहा, “तुम राज़ी हो।”
चौथी शर्त — जगह। इस बार घर नहीं, फार्महाउस। गुरुग्राम के बाहर, एक पुराना फार्महाउस जिसमें बड़ा कमरा, बड़ा बाथरूम, और आँगन में एक बड़ा सा जकूज़ी था। वो चाहती थी कि रात खुले आसमान के नीचे भी निकले — पानी में, तारों के नीचे।
पाँचवीं शर्त — और ये उसने बड़ी धीमी आवाज़ में कही — इस बार उसे चोदने के बाद कोई चला न जाए। सब सुबह नाश्ता करेंगे। साथ बैठेंगे। बातें करेंगे। वो चाहती थी कि रात को एक “मुलाक़ात” की तरह जिया जाए, न कि एक “इवेंट” की तरह।
“तुमने तो पूरा नियमावली बना दिया,” मैंने कहा।
“क्योंकि पिछली बार,” उसने कहा, “चार लोग थे और मैं उनके नाम भूल गई। इस बार मुझे सब याद रहना चाहिए।”
इस बार लिस्ट लंबी थी, और उसमें दो पुराने भी थे — मार्कस और टूंडे। रुक्मणी ने कहा कि दो जाने-पहचाने चेहरे होने से पहली बार जैसा डर नहीं रहेगा, और वो ज़्यादा खुल सकेगी। बाक़ी चार नए थे — एक कीनियाई, एक दक्षिण अफ़्रीकी, एक अमेरिकन, और एक ब्रिटिश-नाइजीरियाई।
चारों की फोटो देखकर उसने नोटबुक में टिक किया, और फिर मेरी तरफ़ देखा।
“एक बात बताओ,” उसने कहा। “तुम्हें कभी लगता है कि तुम कम हो?”
“किस चीज़ में?”
“कि तुम्हारे पास नौ इंच है, और वहाँ छह लोग आ रहे हैं। कभी डर नहीं लगता कि कोई बड़ा निकल आएगा?”
मैंने सच बोला — “लगता है। एक बार ज़रूर लगा। पिछली बार।”
“फिर?”
“फिर तुमने मुँह में मेरा लंड लेकर मुझे देखा था,” मैंने कहा। “और उस नज़र में कोई तुलना नहीं थी। बस तुम और मैं। उसके बाद डर चला गया।”
रुक्मणी ने कुछ सेकंड मुझे देखा, और फिर मेरे गाल पर हाथ रख दिया।
“सूरज,” उसने कहा, “तुम्हें पता है तुम्हारी सबसे बड़ी बात क्या है?”
“क्या?”
“तुम्हारे पास जो है, उस पर तुम्हें घमंड नहीं है। और इसी वजह से तुम सबसे आगे हो।”
उस रात उसने फार्महाउस बुक किया। अगले शुक्रवार की तारीख़ तय हुई। छह लड़कों को मैसेज गए, और एक-एक से कन्फ़र्मेशन आया। रुक्मणी ने पिछली बार की तरह पूरी तैयारी की — मसाज, वैक्सिंग, नींद, खाना। और इस बार उसने एक चीज़ और जोड़ी — दो दिन पहले से उसने शराब बंद कर दी, ताकि शरीर साफ़ रहे और दिमाग तेज़।
“तुम इतनी सीरियस हो जाती हो,” मैंने कहा।
“क्योंकि ये मेरे शरीर की बात है,” उसने कहा। “और अब तुम्हारी भी।”
फार्महाउस शहर से चालीस किलोमीटर दूर था, खेतों के बीच, एक पुराने पेड़ के नीचे। जब हम पहुँचे तो सूरज डूब रहा था और आँगन में लाल रोशनी फैली हुई थी। घर का चौकीदार चला गया था, और पूरा परिसर सिर्फ़ हमारा था।
रुक्मणी ने कमरे का दौरा किया। बड़ा पलंग, बड़ा शीशा, बड़ा बाथरूम। आँगन में जकूज़ी। उसने जकूज़ी को छुआ, पानी देखा, और फिर मेरी तरफ़ देखा।
“बाद में,” उसने कहा। “आख़िर में।”
“वादा?”
“वादा।”
साढ़े सात बजे पहला दरवाज़ा बजा। मार्कस। उसने गले लगाया, रुक्मणी को देखा और हँसकर कहा — “आज छह हैं, बहन। हिसाब रखना।”
फिर टूंडे आया — हँसता हुआ, हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए। रुक्मणी ने डिब्बा खोला, एक लड्डू निकाला, और खाने लगी। “एनर्जी चाहिए,” बोली। सब हँसे।
फिर चार नए आए — एक-एक करके। डेविड, कीनियाई, छह फुट, मैराथन धावक जैसा दुबला-तगड़ा, पर कंधे चौड़े। थाबो, दक्षिण अफ़्रीकी, छह फुट एक इंच, फुटबॉल खिलाड़ी, मोटी जाँघें। जेरोम, अमेरिकन, सबसे लंबा — छह फुट तीन इंच, धीमी आवाज़, गहरी आँखें। और इमेका, ब्रिटिश-नाइजीरियाई, छह फुट, भरा हुआ, हँसता हुआ, और सबसे ज़्यादा बोलने वाला।
छह लोग, एक कमरा। चाय पी गई, मिठाई खाई गई, हँसी हुई। और फिर रुक्मणी ने अपना कप रखा और खड़ी हो गई।
बस इतना ही काफ़ी था।
इस बार रुक्मणी ने खुद शुरुआत की। उसने लाइट धीमी करवाई, और फिर खुद अपने कपड़े उतारने लगी — एक-एक करके, धीरे-धीरे, सबको देखते हुए। पहले कुर्ता, फिर ब्रा। जब ब्रा खुली, तो छह आदमियों की साँसें एक साथ भारी हुईं। उसके दूध भरे हुए, भारी, गोल, ऊपर की तरफ़ उठे हुए — चौंतीस का नाप, और निप्पल गहरे भूरे, अभी से कठोर।
फिर उसने पैंट उतारी। नीचे काली पैंटी, पहले से गीली। और फिर पैंटी भी उतरी। अब वो पूरी नंगी खड़ी थी — बुर घनी, चमकती हुई, गांड भरी हुई, कमर पतली। उसने आईने में खुद को देखा और मुस्कुराई, फिर बोली — “अब आओ।”
छह हाथ आगे बढ़े। दो हाथ उसके दूध पर, दो उसकी कमर पर, एक उसकी गांड पर, और एक उसके बालों में। रुक्मणी ने आँखें बंद कर लीं।
मार्कस और टूंडे ने उसके दोनों दूध थामे और धीरे-धीरे दबाया। जेरोम पीछे आया, उसके बाल एक तरफ़ किए, और गर्दन पर होंठ रख दिए। डेविड सामने झुका और एक निप्पल को मुँह में ले लिया। थाबो ने उसकी कमर से होते हुए हाथ नीचे सरकाया और उसकी बुर पर उँगली फेरी। इमेका घुटनों के बल बैठा और उसकी गांड के दोनों पाट थामकर उन्हें फैलाया।
रुक्मणी की आवाज़ निकली — नर्म, फटी हुई। उसने दोनों हाथ ऊपर उठाए और किसी-किसी के सिर पकड़ लिए। दोनों निपल्स कुछ ही सेकंड में लाल, गीले, और कठोर हो गए। उसके दूध हर हाथ के नीचे दब रहे थे, और वो दबाव उसके पूरे शरीर में उतर रहा था।
इमेका ने उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर उठाया, और उसकी गांड के नीचे जीभ फेरी। रुक्मणी एकदम से ऊपर उठी। फिर थाबो ने उसकी बुर पर जीभ रख दी — ऊपर वाली कली पर गोल-गोल, फिर नीचे लंबी लकीरें। अब वो दो जगह से चाटी जा रही थी, दोनों दूध चूसे जा रहे थे, और जेरोम उसके कान में धीमे-धीमे बातें कर रहा था।
मैं किनारे पर खड़ा था। मार्कस ने मेरी तरफ़ देखकर कहा — “सूरज, तुम भी आओ। आज तुम बाहर नहीं हो।”
रुक्मणी ने आँखें खोलीं और मुझे देखा। उसकी आँखों में वही बात थी जो पहली बार बस में थी — बुलावा। मैं आया, पीछे से उसके पास खड़ा हुआ, और अपना लंड उसकी गांड की दरार में रख दिया — बिल्कुल वैसे ही जैसे उस पहले दिन बस में रखा था। रुक्मणी ने तुरंत महसूस किया और एक लंबी साँस ली।
“याद आया?” मैंने उसके कान में कहा।
“हर बार आता है,” उसने फुसफुसाया।
कुछ मिनट में उसकी साँसें बेतरतीब हो गईं। थाबो की जीभ तेज़ हुई, इमेका की जीभ पीछे, और डेविड दूध पर दाँत लगा रहा था। रुक्मणी ने चादर नहीं पकड़ी — इस बार उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसका पहला झड़ापा आया — लंबा, काँपता हुआ। उसके पैर लड़खड़ाए और जेरोम ने उसे कमर से थाम लिया।
वो हाँफ रही थी, पसीने से तर, आँखें भरी हुईं। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और बोली — “अब तुम। पहले तुम।”
मैंने उसे पलंग पर लिटाया। उसने सिर के नीचे तकिया रखा ताकि सब देख सके, और आईना ठीक उसके सामने था। वो आईने में खुद को देखकर मुस्कुराई।
मैंने कंडोम लगाया — आज सब लगाएँगे, ये तय था — और उसके पैरों के बीच आया। उसकी बुर पहले से गीली थी, चमक रही थी। मैंने नोक रखी और धीरे से आगे बढ़ा। पहले एक इंच, फिर तीन, फिर पाँच। रुक्मणी ने होंठ कस लिए और मेरी तरफ़ देखने लगी। जब पूरा लंड अंदर गया, तो उसने आँखें बंद कर लीं और गहरी साँस ली।
“पहला धक्का तुम्हारा,” उसने फुसफुसाया। “और आख़िरी भी तुम्हारा।”
मैंने धीमे धक्के शुरू किए। छह लोग किनारे खड़े देख रहे थे, और यही बात मुझे अजीब तरह से उत्तेजित कर रही थी। हर धक्के पर उसकी गांड मेरी जाँघों से टकराती, और टकराने की आवाज़ कमरे में गूँजती। उसकी बुर हर बार मेरे लंड को कसकर पकड़ती।
फिर मार्कस पास आया और रुक्मणी के सिर के पास बैठ गया। रुक्मणी ने गर्दन घुमाई और उसका लंड मुँह में ले लिया। अब वो एक साथ दो जगह भरी थी — मुँह में मार्कस, बुर में मैं।
टूंडे और इमेका दोनों तरफ़ आए और उसके दूध थामे। जेरोम उसकी कमर के पास बैठकर उसकी गांड फैलाने लगा, और उसकी उँगली धीरे-धीरे उसके गुदा पर फिर रही थी। डेविड और थाबो उसके पैरों को पकड़कर ऊपर उठाए हुए थे, ताकि मैं और गहरा जा सकूँ।
अब रुक्मणी की हालत वो थी जो हर औरत की आख़िरी ख्वाहिश होती है — मुँह में एक, बुर में एक, दो हाथ दूध पर, एक उँगली गुदा पर, दो हाथ पैरों पर। पूरी तरह घिरी हुई, पूरी तरह भरी हुई।
मैंने रफ़्तार बढ़ाई। मार्कस ने भी उसका सिर पकड़कर अपनी लय में चलाया। टूंडे ने निप्पल को दाँतों से पकड़कर खींचा। रुक्मणी ने गले से वो आवाज़ निकाली जो दबी हुई होती है, और वो आवाज़ किसी औरत की सबसे ईमानदार आवाज़ होती है।
कुछ मिनट में उसका दूसरा झड़ापा आया। इस बार उसने मेरी कमर को पैरों से जकड़ लिया, और मुझे अंदर ही रोक लिया — जैसे कहे कि निकलने न दूँ। उसका शरीर काँपता रहा, और जब शांत हुआ, तब भी उसने पैर नहीं खोले।
मैंने कुछ और धक्के दिए, फिर छोड़ दिया। अंदर ही, गहरे। रुक्मणी ने आँखें खोलकर मुझे देखा, और उस नज़र में एक बात थी — कि अब शुरुआत हो गई है।
अब क्रम बदला। रुक्मणी ने खुद हुक्म देना शुरू किया — कौन, कहाँ, कैसे।
जेरोम पहले आया। सबसे लंबा, धीमी आवाज़। उसने रुक्मणी को पलटकर घुटनों और हाथों पर लाया — उसकी गांड हवा में, ऊपर उठी हुई। जेरोम लंबा था, इसलिए उसे झुकना पड़ा, और उस झुकाव में उसने उसकी पूरी पीठ पर होंठ फेरे — गर्दन से लेकर गांड तक। फिर उसने धीरे से अंदर डाला। लंबा और गहरा। रुक्मणी ने गहरी साँस ली।
थाबो सामने आया और घुटनों के बल बैठकर उसके दूध चूसने लगा। अब वो पीछे से भरी हुई थी और आगे से दूध चूसे जा रहे थे। उसकी गांड हर धक्के पर हिल रही थी, और वो हर बार पीछे की तरफ़ धकेल रही थी। जेरोम ने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा — हल्का, गूँजता हुआ। रुक्मणी ने आवाज़ निकाली और गांड और ऊपर उठा दी।
फिर डेविड आया। उसने रुक्मणी को करवट दिलाई — एक पैर ऊपर, आधा लेटा हुआ। जेरोम पीछे रहा, और डेविड सामने आकर उसकी बुर में अंदर आया। अब रुक्मणी एक बार फिर दो जगह भरी थी — बुर में डेविड, गांड में जेरोम। दोनों की लय धीरे-धीरे एक हो गई — जब एक अंदर, तब दूसरा बाहर। रुक्मणी के शरीर में लगा कि कुछ चल रहा है जो शब्दों में नहीं बताया जा सकता।
उसने आँखें बंद कर लीं और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैं आया और उसका हाथ पकड़ लिया। उसने मेरी उँगलियों को कसकर भींचा।
“सूरज…” वो हाँफी, “दोनों… दोनों अंदर हैं…”
“देख रहा हूँ,” मैंने कहा।
“बुरा नहीं लग रहा?”
“अच्छा लग रहा है,” मैंने कहा। “तुम्हारे चेहरे को देखो।”
वो आईने में देखने लगी। उसका चेहरा लाल, होंठ खुले, आँखें भरी हुईं। और वो खुद को देखकर हँसी — एक भीगी हुई हँसी।
इमेका और टूंडे दोनों तरफ़ आकर उसके दूध थामे, और मार्कस उसके सिर के पास बैठकर उसके बाल सहलाता रहा। पूरा शरीर भरा हुआ — कोई अंग खाली नहीं।
कुछ मिनट में रुक्मणी का तीसरा झड़ापा आया, और ये सबसे लंबा था। उसने चीखा — फटी हुई, लंबी चीख — और उसके अंदर दोनों तरफ़ से कसाव आया। डेविड और जेरोम दोनों ने गति बढ़ाई, और फिर एक के बाद एक दोनों छोड़ दिए। रुक्मणी पलंग पर पसर गई, हाँफती हुई, और उसके अंदर से दोनों निकल गए।
अभी तीन बाक़ी थे।
टूंडे ने उसे उठाकर बिठाया — उसकी पीठ अपने सीने से लगाई, और उसकी बुर में पीछे से अंदर आया। इस पोज़िशन में वो उसके दूध भी पकड़ सकता था, और वो करता भी रहा। हर धक्के पर उसके दूध ऊपर-नीचे होते, और वो उन्हें थामकर दबाता। रुक्मणी ने सिर पीछे टिका दिया, टूंडे के कंधे पर।
इमेका सामने बैठा और उसकी बुर पर उँगली फेरी — ठीक वहीं, जहाँ टूंडे का लंड जा रहा था। उस उँगली के दबाव से रुक्मणी की आवाज़ और गहरी हो गई। फिर इमेका उठा और उसके मुँह में अपना लंड रख दिया। अब रुक्मणी बैठी हुई थी — नीचे टूंडे, मुँह में इमेका।
मार्कस ने उसके निपल्स को उँगलियों से घुमाया, और जेरोम उसके गुदा पर फिर से उँगली रख दी। इस बार रुक्मणी ने खुद कहा — “अंदर डालो।”
जेरोम ने धीरे से उँगली अंदर डाली। रुक्मणी की साँस फूली। फिर एक और। फिर उसने उँगली अंदर-बाहर करनी शुरू की, और रुक्मणी की हालत ऐसी हो गई कि उसने इमेका का लंड मुँह से निकालकर सिर्फ़ साँस लेने लगी।
टूंडे ने गति बढ़ाई। अब धक्के तेज़ थे, ऊपर की तरफ़, गहरे। रुक्मणी का शरीर झूल रहा था। और फिर उसका चौथा झड़ापा आया — इस बार बिना किसी के छुए, सिर्फ़ भरे हुए शरीर से। उसने टूंडे की गर्दन पकड़ ली और उसके शरीर पर लटक गई।
टूंडे कुछ देर और चला, फिर छोड़ दिया।
अब बाक़ी दो। डेविड और मार्कस।
रुक्मणी अब थकी थी, पर उसने कहा — “पूरा करो।”
मार्कस ने उसे पलंग के किनारे लाया — पैर नीचे, गांड किनारे पर, और उसने खड़े-खड़े पीछे से अंदर डाला। इस पोज़िशन में वो गहरा जाता था, और रुक्मणी की गांड हर धक्के पर किनारे से टकराती। डेविड सामने आया और उसके मुँह में अंदर आया। इमेका और जेरोम दोनों तरफ़ से उसके दूध थामकर चूस रहे थे। थाबो उसकी कमर पकड़े हुए था, और मैं उसके चेहरे के पास खड़ा था।
मार्कस ने रफ़्तार बढ़ाई। अब धक्के लंबे और तेज़ थे। रुक्मणी की गांड लाल हो गई थी, उसकी बुर फूल गई थी, उसके दूध लाल-लाल और निपल्स फटे हुए लग रहे थे। और वो सब कुछ सह रही थी — सिर्फ़ सह नहीं रही थी, माँग रही थी।
“और…” वो बड़बड़ी, “और…”
मार्कस टूटा। उसने आख़िरी गहरा धक्का दिया, कमर कसी, और छोड़ दिया। फिर डेविड भी उसके मुँह में छोड़ दिया।
और अब सिर्फ़ मैं।
रुक्मणी ने मुझे देखा, और बिना कुछ कहे अपने पैर फैला दिए। उसने आईने की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसका पूरा शरीर लाल, पसीने से तर, भरा हुआ, और उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति।
मैं आया। कंडोम बदला। और उसके अंदर आया।
इस बार अंदर जाते ही मुझे फ़र्क़ महसूस हुआ — उसकी बुर पहले से खुली हुई थी, गरम, नरम, और चारों तरफ़ से फैली हुई। मेरा लंड उसके अंदर पहले जैसा कसा हुआ नहीं लगा, लेकिन गर्मी ज़्यादा थी। और वो गर्मी उसकी थी — सिर्फ़ उसकी।
रुक्मणी ने मेरी गर्दन में हाथ डाले और मुझे अपने ऊपर खींच लिया। उसके दूध मेरे सीने से चिपक गए, उसके निपल्स मेरी छाती पर रगड़ खाने लगे।
“धीरे,” उसने कहा। “बहुत धीरे।”
मैंने धीमे धक्के दिए। गहरे, तोलकर, बिना जल्दी। छह लोग किनारे खड़े थे, पर अब किसी की आवाज़ नहीं थी। बस हम दोनों और हमारी साँसें।
“सूरज,” उसने मेरे कान में कहा, “जब ये सब ख़त्म हो, तो मुझे कुछ पूछना है।”
“अभी पूछो,” मैंने कहा।
“नहीं। आख़िर में।”
मैंने गति थोड़ी बढ़ाई। रुक्मणी ने पैर मेरी पीठ पर कस लिए और अपनी गांड नीचे से मिलानी शुरू की। हम दोनों एक लय में आ गए — वो लय जो सात महीने में बनी थी, जिसे किसी और ने तोड़ा नहीं, और जो आज भी सबसे सच्ची थी।
कुछ मिनट में मुझे लगा कि आ रहा है। रुक्मणी ने भी महसूस किया, और उसने और तेज़ कर दिया — जैसे जल्दी हो।
“साथ,” उसने कहा, “साथ आओ।”
उसका शरीर तन गया। उसकी बुर ने मुझे कसकर भींच लिया। उसने मेरी गर्दन पकड़ी, मेरे होंठ अपने होंठों पर रखे, और हम दोनों साथ टूटे। पाँचवाँ झड़ापा — उसका, और मेरा। लंबा, काँपता हुआ, और आख़िरी।
हम दोनों कुछ देर हिलते रहे, फिर थम गए। और फिर वो मेरे नीचे लेटी रही, मुझे अंदर रहने दिया, और मेरे माथे पर होंठ रख दिए।
रात के ग्यारह बजे के आसपास सब बाहर आ गए। कोई कपड़ा ओढ़े हुए, कोई नहीं। जकूज़ी का पानी गरम था और ऊपर तारे दिख रहे थे।
रुक्मणी पानी में उतरी और उसने गहरी साँस ली। उसके शरीर पर पानी की परत चढ़ गई, और उसकी त्वचा पर लाल निशान साफ़ दिख रहे थे — गर्दन पर, दूध पर, कमर पर।
सब पानी में बैठ गए। कोई बोल नहीं रहा था। बस पानी की आवाज़ और दूर किसी कुत्ते का भौंकना।
फिर रुक्मणी ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया, और धीमे से बोली — “आज कुछ बात करनी है।”
“अब?”
“अब।”
छहों ने एक-दूसरे को देखा, समझ गए, और एक-एक करके अंदर चले गए। दरवाज़ा बंद हुआ। और जकूज़ी में सिर्फ़ हम दोनों रह गए।
रुक्मणी ने कुछ देर पानी में देखा, फिर मेरी तरफ़ मुड़ी।
“सूरज,” उसने कहा, “आज तुमने मुझे किसी और के साथ देखा। ठीक से देखा। और तुम्हारा चेहरा बदला नहीं।”
“क्यों बदलता?”
“क्योंकि बदल जाता है,” उसने कहा। “मैंने सुना है। आदमी को बुरा लगता है।”
“मुझे नहीं लगा,” मैंने कहा। “सच।”
“फिर क्या लगा?”
मैंने सोचा। सच में सोचा, जवाब टालने के लिए नहीं।
“लगा कि तुम भरी हुई थीं,” मैंने कहा। “और फिर भी तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ था। छह लोग थे, पर तुम मेरा हाथ पकड़े हुई थीं। उससे लगा कि मैं किसी और के साथ नहीं हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।”
रुक्मणी ने कुछ सेकंड मुझे देखा। उसकी आँखों में पानी था — न नहाने का, कुछ और।
“तो अब सुनो,” उसने कहा। “जो पूछना था।”
“सुन रहा हूँ।”
वो रुकी। फिर बोली — “सूरज, ये सब — गैंगबैंग, छह लोग, चार लोग — ये तो चलता रहेगा। मुझे ये पसंद है और मुझे पता है कि तुम्हें भी पसंद है। लेकिन एक चीज़ है जो सिर्फ़ तुम्हारी है।”
“क्या?”
“घर,” उसने कहा। “और अगर तुम कहो, तो नाम भी।”
मैं चुप हो गया। पानी में बैठा, उसकी आँखों में देखता रहा।
“शादी?” मैंने पूछा।
“शादी,” उसने कहा। “बस एक बार पूछ रही हूँ। आज नहीं, तो कल। पर तुम्हें पता होना चाहिए कि जब तुमने बस में पहली बार मेरी गांड से अपना लंड टकराया था, तब से मैं सोच रही थी कि ये आदमी छोड़ना नहीं है।”
और फिर उसने मेरा हाथ पानी में पकड़ लिया।
मैंने कुछ सेकंड लिया। फिर वो किया जो सात महीने से करना चाहता था — पानी में ही उसके घुटने पर बैठकर उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया, और कहा — “हाँ।”
रुक्मणी हँसी, और फिर रोई, और फिर मुझे गले लगा लिया। पानी हम दोनों पर चढ़ गया, और दोनों भीग गए, और किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ा।
अगली सुबह सबने साथ नाश्ता किया। पराठे, दही, अचार, चाय। कोई शर्मिंदा नहीं था, कोई अजीब नहीं लग रहा था। मार्कस ने रुक्मणी से कहा — “तू तो साली बन गई, अब छह नहीं, पूरा मोहल्ला आएगा।” सब हँसे। रुक्मणी ने कहा — “आएगा, पर सूरज के घर में।”
और यही बात थी। सब कुछ वैसा ही चलेगा — बुर, लंड, दूध, निप्पल, निपल्स, छह लोग, चार लोग, जितने भी हों। पर अब एक छत होगी, एक नाम होगा, और एक आदमी जिसके हाथ में रुक्मणी का हाथ रहेगा — चाहे बीच में कोई भी हो।
तीन महीने बाद हमने सगाई कर ली। माँ-बाप राज़ी हुए, रिश्ता पक्का हुआ, और गुरुग्राम में एक फ्लैट ले लिया। बस एक चीज़ बदली — रुक्मणी ने सोच-समझकर कहा कि हम शहर बदल लेंगे, क्योंकि दिल्ली की बस में वो पहले ही “पकड़ी जा चुकी है।”
और एक शाम, जब दोनों घर में बैठे थे, उसने फिर वो नोटबुक निकाली। इस बार उस पर लिखा था — “शादी के बाद की लिस्ट।”
“अभी से?” मैंने पूछा।
“अभी से,” उसने कहा। “क्योंकि अब मुझे पता है कि तुम भागते नहीं हो।”
और उसने पहला नाम लिखा — और फिर मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई।
आगे क्या: शादी, सुहागरात — जिसमें रुक्मणी ने शर्त रखी है कि पहली रात सिर्फ़ दोनों की होगी, कोई और नहीं। और उसके बाद वो लिस्ट, जिसका पहला नाम अभी से खुला नहीं है। साथ ही एक नया सवाल — क्या रुक्मणी अपनी सहेली को भी इस “सिस्टम” में लाएगी, जैसे उसने हल्के से कहा था?
NEXT PART: रंडी सोच वाली लड़की से शादी, सुहागरात और रंडीबाजी
- पड़ोसी लड़के को पटाकर उसकी रंडी बनकर चुदवाई
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