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उस रात के बाद हम दोनों, यानी मैं वेद और मेरा दोस्त सोनू, मौसी के घर से निकले तो सारे बदन में एक अजीब सी हल्की थकान और गहरी तृप्ति थी।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो जरुर पढ़ें की कैसे मौसी की माली काका के साथ मिलकर गैंगबैंग चुदाई की।
पैर लड़खड़ा रहे थे, जाँघें अकड़ी हुई थीं, और दिमाग़ में सिर्फ़ मौसी नीलम का चेहरा, उसकी कराहें, उसकी भारी चूचियाँ और उसकी गांड घूम रही थी।
सोनू बाइक चला रहा था और बार-बार हँसकर कह रहा था, “वेद, यार आज तो ज़िंदगी बन गई। ऐसी रंडी मौसी मिली कि तीनों को पागल कर दिया।
कल फिर चलेंगे?” मैंने हँसते हुए कहा, “बिल्कुल चलेंगे, साला आज तो मौसी ने बुर और गांड दोनों भर दीं, अब क्या मुँह चुराएँगे?” और हम रात भर उसी चुदाई की बातें करते रहे।
अगले दिन सुबह-सुबह मम्मी ने फिर हमें बुलाया और कहा, “वेद, मौसी का फ़ोन आया था। कह रही थी कि उसकी बेटी रानू गाँव से आ रही है, उसे स्टेशन से ले आओ। तुम दोनों जाओ।” यह सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए।
रानू! मौसी की बेटी। अठरह साल की, गाँव में पली, गोरी-चिट्टी, चंचल और मासूम। जब वो हमारे घर आती थी, तो सब उसे “बिटिया” कहकर प्यार करते थे, लेकिन हम दोनों की नज़र उसके नए-नए उभरते जिस्म पर रहती थी।
उसकी चूचियाँ अब भरने लगी थीं, कमर पतली थी, और चलने में जो हल्का-सा शरम और भोलापन था, वो हर मर्द के अंदर एक अलग ही आग जलाता था।
सोनू ने मेरी तरफ़ देखकर आँख से इशारा किया, जैसे कह रहा हो, “अब तो मज़ा आएगा।” मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
स्टेशन पर जाकर हमें रानू मिली। सफ़ेद सलवार-कुर्ता पहने, गले में हल्का दुपट्टा, हाथ में छोटा-सा बैग।
उसका चेहरा मौसी जैसा ही था, बस उम्र की ताज़गी से और भी निखरा हुआ। गालों पर लाली, आँखों में शरारत, और बाल जो हवा में बिखरे हुए थे।
उसने हमें देखते ही खुशी से हाथ हिलाया, “वेद भैया! सोनू भैया! आप दोनों आए?
मम्मी ने भेजा?” मैंने कहा, “हाँ रानू, चलो, बैठो।” वो बाइक पर पीछे बैठी, और जब उसने मेरी कमर को हल्के से पकड़ा, तो उसकी उँगलियों की गर्मी मेरे शरीर से सीधे अंदर उतर गई।
रास्ते में सोनू ने पूछा, “रानू, गाँव में पढ़ाई कैसी चल रही है?” वो हँसकर बोली, “ठीक है भैया। बस मम्मी बहुत याद आती थी, इसलिए आ गई।”
और मैंने पीछे मुड़कर देखा तो उसका दुपट्टा सरककर उसकी गर्दन और छाती का हिस्सा खोल रहा था।
गोरी छाती, हल्की-हल्की उभरी हुई चूचियाँ — बस देखते ही मेरा लंड बाइक के अंदर खड़ा होने लगा।
मौसी के घर पहुँचे तो मौसी दरवाज़े पर खड़ी हँस रही थी, “आ गई मेरी बिटिया? आ जा, आ जा।”
रानू दौड़कर मौसी से लिपट गई और मौसी ने उसे गले लगा लिया।
लेकिन जब मौसी ने हम दोनों की तरफ़ देखा, तो उसकी आँखों में एक शातिर-सी चमक थी।
जैसे उसने दिमाग़ में कुछ ठान लिया हो। और सचमुच, मौसी ने ठान लिया था — अब अपनी बेटी को भी हम दोनों जवान मर्दों से चुदवाना है।
दोपहर का खाना खाया, बातें हुईं, रानू ने हमें अपनी स्कूल की बातें सुनाईं और हँसी-मज़ाक चलता रहा।
लेकिन मौसी बार-बार हमें ऐसे देख रही थी जैसे कोई राज़दार इशारा दे रही हो।
खाने के बाद मौसी ने रानू को कहा, “बिटिया, तू जाकर कपड़े बदल ले, और थोड़ा आराम कर ले। रास्ते की थकान है।”
रानू अपने कमरे में चली गई, और मौसी हमें आँगन के एक कोने में ले गई।
“सुनो,” मौसी ने धीरे से, लेकिन साफ़ लहज़े में कहा, “आज इसकी बारी है। मैं इसे तुम दोनों से चुदवाऊँगी।”
मेरा दिल ज़ोर से धड़का, “मौसी, पर वो तो कच्ची है, अभी अभी तो अठरह की है।”
मौसी हँसी, “कच्ची है तो क्या? औरत की चूत बड़ी होकर नहीं आती, वेद। पहली बार में जो मज़ा होता है, वो ही असली है। और देख, इसकी माँ तो मज़े से चुद गई, अब बेटी भी चुदेगी।”
फिर मौसी ने धीरे से कहा, “लेकिन एक बात का ध्यान रखना — पहली बार है, तो पहले आराम से फोरप्ले करना। इसे डराना नहीं है। पहले होंठ चूमना, चूचियाँ चूसना, बुर चाटना, और जब ये पूरी भीग जाए, तब लंड डालना। और सोनू, तेरा तो दस इंच का है, तू ज़रा संभलकर, धीरे-धीरे।”
सोनू ने हैरान होकर पूछा, “मौसी, पर तुझे कैसे पता कि रानू चुदना चाहेगी? कहीं वो शरमा जाए?”
मौसी ने गर्दन हिलाई, “वो मेरी बेटी है। रात को जब वो नहाती है, तो आईने के सामने खड़े होकर अपनी चूचियाँ देखती है, अपनी बुर देखती है। मैंने उसे कई बार पकड़ा है। और आजकल गाँव में भी उसकी सहेलियाँ चुद चुकी हैं, वो भी पीछे नहीं रहना चाहती। बस इसे एक बहाना चाहिए। वो बहाना मैं बनूँगी।”
फिर मौसी ने हमें पूरा प्लान समझाया। रात को खाने के बाद सब लोग छत पर सोने जाएँगे, क्योंकि गर्मी बहुत थी।
छत पर बड़ी चारपाइयाँ थीं। मौसी बीच में सोएगी, रानू एक तरफ़, और हम दोनों दूसरी तरफ़।
फिर मौसी रानू को सहला-सहला कर, बातों-बातों में उसके जिस्म को गरम कर देगी, और जब रानू पूरी तरह तैयार हो जाएगी, तब मौसी हमें इशारा करेगी।
यह सुनकर मेरा लंड पैंट में खड़ा हो गया। सोनू की हालत भी वही थी।
मौसी ने यह देखकर हँसते हुए कहा, “देख रही हूँ, दोनों के लंड खड़े हो गए। अभी तो शाम भी नहीं हुई। संभालो, रात लंबी है।” और हम तीनों हँस पड़े।
रात हुई, खाना खाया, और गर्मी के कारण सब छत पर चले गए। आसमान साफ़ था, तारे चमक रहे थे, और हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी।
छत पर चार चारपाइयाँ बिछी थीं। मौसी ने वैसे ही बिछवाया था जैसा उसने प्लान किया — वो बीच में, रानू उसके एक तरफ़, और हम दोनों उसके दूसरी तरफ़।
शुरू में सब चुपचाप लेटे थे। रानू ने हल्की सी चादर ओढ़ ली थी, लेकिन गर्मी के कारण वो भी ठीक से नहीं ढकी थी।
उसने एक पतली सी कुर्ती और पजामा पहना था।
मौसी ने धीरे से रानू की तरफ़ करवट ली और उसके बाल सहलाने लगी, “बिटिया, सो गई?”
“नहीं मम्मी, नींद नहीं आ रही। गर्मी है।”
“हाँ, गर्मी तो है। चल, तेरी पीठ सहला दूँ, आराम आएगा।” और मौसी ने रानू की पीठ पर हाथ फेरना शुरू किया।
धीरे-धीरे वो सहलाना कंधों से नीचे कमर तक पहुँचा।
रानू ने आँखें बंद कर लीं, “अच्छा लग रहा है मम्मी।” मौसी का हाथ अब कमर से नीचे, रानू की गांड के ऊपरी हिस्से तक जाने लगा।
मैं दूसरी तरफ़ करवट लेकर सब देख रहा था, और सोनू भी।
कुछ देर बाद मौसी ने धीरे से पूछा, “बिटिया, तेरी सहेलियाँ गाँव में… सब शादी हो गईं क्या?”
रानू शरमाकर बोली, “अरे नहीं मम्मी, शादी कहाँ होती है। बस… सबका कोई न कोई हो गया है।”
“अच्छा? मतलब सब चुद गईं?” मौसी ने सीधा सवाल किया।
रानू हँसी, “मम्मी, आप भी! कहती हैं चुद गईं। हाँ, सबका कोई प्रेमी है।”
“और तेरा कोई नहीं?” मौसी ने पूछा, और उसका हाथ रानू की कमर से आगे बढ़कर उसके पेट पर आ गया।
रानू ने धीरे से कहा, “कोई तो है… पर दूर है। बस चिट्ठियाँ लिखते हैं।”
मौसी हँसी, “तो बाक़ी सब देखा है तूने? अपनी चूचियाँ, अपनी बुर, किसी ने छुई?”
रानू की आवाज़ और धीमी हो गई, “नहीं मम्मी… बस मैंने खुद ही देखा है आईने में।”
“अच्छा,” मौसी ने कहा, “तो आज तेरी चूचियाँ और बुर किसी और के हाथ भी लगेंगी। देख, वेद और सोनू दोनों जवान मर्द हैं। दोनों ठीक हैं। तुझे डरना नहीं।”
और यह कहते हुए मौसी ने मेरी तरफ़ देखा और आँख से इशारा किया — चलो, शुरू करो।
मैं धीरे से उठा और रानू के पास जाकर बैठ गया। रानू ने आँखें खोलकर मुझे देखा, चेहरे पर शरम और उत्सुकता दोनों थे।
मौसी ने उसका हाथ थामकर कहा, “बिटिया, वेद तुझे प्यार से रखेगा। बस आँखें बंद कर ले और जो हो रहा है, उसे महसूस कर।”
मैंने रानू का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया। उसका चेहरा गरम था, गाल लाल, आँखें चमकती हुई। मैंने धीरे से अपने होंठ उसके होंठों पर रखे।
पहला स्पर्श — जैसे बिजली की हल्की सी लहर। रानू ने पहले तो होंठ दबा लिए, शरमाकर, लेकिन फिर धीरे-धीरे ढीले कर दिए।
मैंने उसके होंठों को चूमना शुरू किया, पहले हल्के-हल्के, फिर गहरे। “म्म्म… स्मूच…” की आवाज़ें छत के सन्नाटे में गूँजने लगीं।
रानू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली और जवाब में चूमने लगी। उसका पहला चुंबन था, कच्चा, मासूम, लेकिन जैसे-जैसे देर होती गई, उसमें आग पैदा होने लगी।
इधर मौसी ने भी हाथ बढ़ाया और रानू की कुर्ती के ऊपर से उसकी चूचियों को सहलाने लगी।
रानू की चूचियाँ अभी छोटी थीं, लेकिन कसी हुई और गोल — जैसे बिना फूले हुए आम। निप्पल कपड़े के नीचे उभरने लगे थे।
मौसी ने धीरे से कुर्ती के हुक खोल दिए और रानू की चूचियाँ हवा में खुल गईं। उसकी चूचियाँ सफ़ेद, चिकनी और कसी हुई थीं, निप्पल गुलाबी-भूरे और बिल्कुल ताज़े।
रानू ने शरमाकर हाथों से ढकने की कोशिश की, लेकिन मौसी ने हाथ हटा दिए, “दिखने दे बिटिया, ऐसी ही तो सुंदर है तू।”
मैंने रानू के होंठ चूमना जारी रखा और धीरे से नीचे उतरकर उसकी गर्दन, कॉलर-बोन और फिर उसकी चूचियों तक पहुँचा।
पहले मैंने चूचियों के चारों तरफ़ होंठ फेरे, फिर उसके एक निप्पल को अपने मुँह में लिया।
रानू ने “आह” करके आँखें बंद कर लीं और उसकी देह झटके से हिल गई।
निप्पल इतना नरम और कच्चा था कि जैसे किसी फूल की पंखुड़ी हो। मैंने धीरे-धीरे चूसा, जीभ से सहलाया, और फिर दूसरी चूची पर चला गया।
रानू दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़कर दबाने लगी, “आह भैया… अच्छा लग रहा है…” मौसी मुस्कुराते हुए बोली, “भैया नहीं, अब वेद कह।”
अब मैंने रानू का पजामा नीचे सरकाया। उसने कमर उठाकर मदद की, और पजामा उतर गया।
उसकी जाँघें गोरी, मुलायम और चिकनी थीं, और बीच में घनी पर छोटी-सी झाँट से ढकी उसकी बुर।
मैंने उसकी टाँगें धीरे से फैलाईं और बुर को गौर से देखा। बुर के होंठ कसे, छोटे और गुलाबी थे — बिल्कुल कच्चे फल की तरह।
उसने शरमाकर कहा, “भैया… ऐसे क्यों देख रहे हो?”
मैं हँसा, “क्योंकि सुंदर है।” और यह कहकर मैंने पहले अपनी उँगली से उसकी बुर के होंठों को सहलाया। रानू की साँस फूल गई।
फिर मैंने अपनी जीभ निकालकर धीरे से उसकी बुर पर लगाई।
पहला स्पर्श — रानू की पूरी देह ऐंठ गई, “हाय… ये क्या कर रहे हो भैया… अच्छा… बहुत अच्छा लग रहा है…”
मैंने जीभ से उसकी बुर चाटनी शुरू की।
ऊपर से नीचे, धीरे-धीरे, और फिर अंदर तक। रानू की बुर से एक मीठा-सा रस आने लगा, और जैसे-जैसे मैं चाटता गया, वो और भीगती गई।
मैंने बुर को चूसना शुरू किया, होंठों में भरकर खींचा, और जीभ से ऊपर के छोटे से दाने को सहलाया।
रानू की कमर चारपाई से उठने लगी और वो मेरे सिर को अपनी जाँघों से दबाने लगी, “आह वेद… रुको ना… मर जाऊँगी… ऐसे ही चूसो… हाँ ऐसे ही…”
इधर मौसी ने भी अपना हाथ बढ़ाया और रानू की चूचियों को दबाने लगी, निपल्स को उँगलियों से सहलाने लगी।
रानू अब दोनों तरफ़ से सहलाई जा रही थी — नीचे बुर पर मेरी जीभ, ऊपर चूचियों पर मौसी के हाथ।
वो बार-बार कराह रही थी, “मम्मी… भैया… ये क्या हो रहा है मुझे… बहुत अच्छा लग रहा है… बंद मत करो…”
मौसी ने हँसकर कहा, “ये तो बस शुरुआत है बिटिया। असली मज़ा तो अब आएगा।”
अब सोनू भी पास आया। उसने अपनी पैंट खोल दी और उसका दस इंच का लंड बाहर निकला — लाल, मोटा, और हवा में सीधा खड़ा।
रानू ने जब उसे देखा तो आँखें बड़ी कर लीं, “हे भगवान! इतना बड़ा? ये तो… ये तो बहुत बड़ा है भैया!”
सोनू शरमाकर हँसा, “रानू, इसे कहते हैं लंड। और अब ये तुम्हारी बुर में जाएगा।”
रानू ने डर और उत्सुकता से पूछा, “पर ये अंदर जाएगा कैसे? मेरी तो फट जाएगी!”
मौसी बोली, “फटेगी नहीं बिटिया, फैलेगी। औरत की चूत ऐसी ही चीज़ के लिए बनी है। पहली बार ज़रा दर्द होता है, फिर तू खुद माँगेगी।”
सोनू ने अपना लंड रानू के चेहरे के पास लाया।
रानू ने पहले उसे देखा, फिर धीरे से हाथ से पकड़ा, फिर मौसी के इशारे पर अपना मुँह खोलकर उसका सिरा होंठों में लिया।
पहली बार वो लंड चूस रही थी, और वो भी इतना बड़ा।
वो धीरे-धीरे चूसने लगी, ऊपर-नीचे करने लगी, और जीभ से सिरे को सहलाने लगी।
सोनू ने आँखें बंद कर लीं, “आह रानू… अच्छा चूस रही हो… ऐसे ही…”
मैं इधर रानू की बुर चाटता रहा, और बीच-बीच में उसकी जाँघों और पेट को भी चूमता।
मौसी रानू की चूचियाँ दबाती और निपल्स चूसती।
इस तरह रानू तीनों से एक साथ सहलाई जा रही थी — बुर पर मेरी जीभ, मुँह में सोनू का लंड, और चूचियों पर मौसी के होंठ।
रानू की देह काँप रही थी, पसीना आ गया था, और उसकी बुर से रस बहकर जाँघों तक आ गया था।
कुछ देर बाद रानू ने सोनू का लंड मुँह से निकाला और लंबी साँस लेते हुए बोली, “बस… अब और नहीं… मेरी बुर में कुछ हो रहा है… जैसे अंदर से गरम हो रहा है…”
मौसी हँसी, “वो तेरी चूत तैयार हो रही है बिटिया। अब वक़्त है असली चुदाई का।”
मौसी ने रानू को पीठ के बल लिटाया, उसके नीचे एक मुलायम चादर रखी, और उसकी टाँगें फैलाकर घुटनों को ऊपर कर दिया।
रानू की बुर पूरी खुली हुई, गीली और चमकती हुई सामने थी।
मैंने अपना सात इंच का लंड पकड़ा और उसके सिरे को रानू की बुर के मुँह पर रखा। रानू ने गहरी साँस ली और मौसी का हाथ पकड़ लिया।
“धीरे से, वेद,” मौसी ने कहा।
मैंने धीरे-धीरे धकेला। पहले सिरा अंदर गया, और रानू ने होंठ दबाकर “म्म्म” की आवाज़ की।
फिर थोड़ा और, और फिर थोड़ा और। जैसे ही लंड आधा अंदर गया, रानू की आँखों से पानी की एक बूँद निकली।
“आह… भैया… ज़रा दर्द है… पर अच्छा भी लग रहा है…”
मौसी ने उसका माथा चूमा, “होने दे बिटिया, अभी फटी नहीं है पूरी। एक झटका और।”
मैंने एक बार पीछे खींचकर फिर धक्का दिया, और लंड पूरा अंदर चला गया।
रानू ने कराहकर मेरी कमर को टाँगों से जकड़ लिया, “आआआह… पूरा अंदर है… भगवान… मेरी बुर में कुछ तोड़ गया… लेकिन अच्छा है… बहुत अच्छा है…”
मैं ठोकने लगा। पहले धीरे-धीरे, फिर थोड़ा तेज़। रानू की बुर इतनी कसी हुई थी कि हर ठोकर पर लंड को पूरा जकड़ लेती थी।
“थप-थप” की आवाज़ें होने लगीं। रानू की छोटी-छोटी चूचियाँ हर झटके पर हिलतीं, और निपल्स सख़्त हो गए थे।
मैंने ठोकते-ठोकते झुककर उसके होंठ चूमे, स्मूच किए, और बीच-बीच में उसकी चूचियाँ दबाईं और निपल्स चूसे।
रानू अब पूरी तरह चुद रही थी और उसके मुँह से बेबाक बातें निकलने लगी थीं, “आह वेद… और ठोको… ऐसे ही… मेरी बुर फाड़ दो… मज़ा आ रहा है… मम्मी सच कह रही थीं… ये तो कमाल है…”
मौसी हँसकर बोली, “देखा, मैंने कहा था ना। अब तेरी बुर में भूख जाग गई है।”
कुछ देर बाद मैंने रानू को घुमाकर डॉगी स्टाइल में कर दिया। उसकी गांड ऊपर उठी, छोटी, गोल और कसी हुई।
मैंने पीछे से पकड़कर फिर अंदर घुसाया और ठोकने लगा। इस बार और गहरा जाता था, और रानू पूरी तरह झुककर कराह रही थी।
मैंने उसकी गांड पर हाथ रखकर, झुक-झुक कर उसकी गर्दन और कान चूमे, और कभी-कभी उसके होंठों तक पहुँचकर स्मूच किए।
रानू की बुर से रस बह-बह कर मेरी जाँघों से चिपक रहा था।
अब मेरी बारी थोड़ी शांत हुई तो सोनू आगे आया। रानू को यह देखकर फिर डर और उत्सुकता दोनों हुए।
मौसी ने उसे समझाया, “बिटिया, अब सोनू है। इसका बड़ा है, तो पहले सिरा डालेगा, फिर धीरे-धीरे। तू बस साँस लेती रह और ढीली हो।”
सोनू ने अपना दस इंच का लंड रानू की बुर पर रखा। रानू की बुर अभी-अभी चुदी थी, गीली और खुली हुई थी, इसलिए पहला हिस्सा आसानी से घुस गया।
लेकिन जब आधे से ज़्यादा अंदर गया, तो रानू ने फिर कराहकर कहा, “आह… ये तो बहुत मोटा है… अंदर कहाँ जा रहा है… मेरी चूत छोटी है भैया…”
सोनू ने धीरे से धक्का दिया, और पूरा लंड अंदर चला गया।
रानू ने ज़ोर से चीख पड़ी, “आआआह… मर गई… इतना अंदर… पेट तक लग रहा है… हाय राम…”
मौसी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “साँस ले बिटिया, साँस ले। पूरा अंदर है, अब आराम हो जाएगा।”
कुछ पल रुककर सोनू ठोकने लगा। रानू की देह झूलने लगी, उसकी चूचियाँ लटककर झूलतीं, और हर ठोकर पर उसके मुँह से गहरी कराह निकलती।
सोनू भी बेबाक होकर बोलने लगा, “ले रानू, ले मेरा लंड… तेरी चूत कितनी कसी है… ऐसी चूत तो पहली बार देखी… ले-ले-ले…”
रानू जवाब देती, “और ठोको सोनू… और ठोको… मेरी बुर फाड़ दो… आज सब कुछ तुम्हारा… मैं भी अब रंडी हूँ…”
इधर मैंने रानू के सामने जाकर उसकी चूचियाँ दबाईं और निपल्स चूसे, और उसके होंठ चूमे।
मौसी पीछे बैठी सब देख रही थी और बीच-बीच में रानू की गांड पर हाथ फेर रही थी।
रानू अब दो आदमियों के बीच पूरी तरह फँसी हुई थी — पीछे से सोनू का दस इंच, आगे से मेरा मुँह और हाथ।
उसकी आँखें बंद थीं, पसीना चेहरे से बह रहा था, और वो बार-बार कह रही थी, “मम्मी… सच में… ये तो जन्नत है… आज पता चला औरत होना क्या होता है…”
अब मौसी ने कहा, “चलो, आज इसे पूरा मज़ा दो। एक बार में दोनों साथ चोदो।”
यानी एक आगे से बुर में, और दूसरा पीछे से उसी बुर में? नहीं, मौसी ने कहा कि रानू की बुर में तो एक ही जाएगा, लेकिन बारी-बारी से दोनों आएँगे, और बीच-बीच में रुक-रुक कर।
लेकिन मैंने सोचा कि क्यों न रानू की बुर में एक और गांड में दूसरा?
रानू की गांड अभी कच्ची थी, लेकिन मौसी ने कहा कि पहली बार में बुर ही काफ़ी है, गांड अगली बार के लिए।
तो हमने बारी-बारी से चुदाई जारी रखी। सोनू ने कुछ देर और ठोका, फिर मैंने, फिर सोनू।
रानू की बुर अब पूरी तरह खुल गई थी, लाल-लाल और फूली हुई।
वो खुद कमर उठा-उठाकर ठोकरों का सामना कर रही थी, और बेबाक होकर गालियाँ बक रही थी, “चोदो… चोदो ना… और ज़ोर से… मेरी चूत में जान आ गई… दोनों भाई मिलकर आज मुझे रंडी बना दो…”
सोनू ने जब सुना तो हँसकर कहा, “अरे रानू, तू तो मौसी से भी आगे निकल गई। मौसी ने तो शरमाते-शरमाते बोला था, तू तो सीधे गालियाँ बक रही है।”
मौसी हँसी, “ये तो मेरी बेटी है, खून तो मेरा ही है। शरम तो अब पूरी तरह टूट गई। चल, अब इसे और मज़ा दो।”
जब सोनू का निकलने का वक़्त आया, उसने रानू से पूछा, “रानू, अंदर डालूँ या बाहर?”
रानू ने बिना झिझक कहा, “अंदर डालो सोनू… मेरी बुर में डालो… आज पहली बार है, अंदर ही डालो…”
सोनू ने कुछ ज़ोरदार ठोकरें मारीं और अपना सारा वीर्य रानू की कच्ची बुर के अंदर उँडेल दिया।
रानू की देह ऐंठ गई, आँखें खुल गईं, और वो लंबी साँस छोड़ते हुए बोली, “आह… गरम… गरम डाला… पूरी बुर भर गई…” सोनू बाहर निकला और उसके लंड से वीर्य और रस मिला हुआ टपकता रहा।
फिर मेरी बारी आई। रानू ने मुझे खींचकर अपने ऊपर लिया और कहा, “वेद, तू भी अंदर डाल… आज मेरी चूत पूरी भर जाए…” मैंने अपना लंड फिर अंदर घुसाया, इस बार पहले से आसान — बुर पूरी खुल चुकी थी और वीर्य से चिकनी थी।
मैंने तेज़ ठोकरें मारीं, रानू की चूचियाँ दबाईं, निपल्स चूसे, होंठ चूमे, और जब मेरा निकलने का वक़्त आया, तो रानू ने कहा, “अंदर ही डाल वेद… मेरी बुर को पूरा भर दे…” और मैंने अपना सारा रस उसकी बुर में उँडेल दिया।
दोनों निकलने के बाद रानू की बुर से सफ़ेद-सफ़ेद रस बह निकला और जाँघों पर फैल गया।
रानू पूरी तरह थकी, पसीने से लथपथ, लेकिन चेहरे पर एक अजीब-सी तृप्ति और मुस्कान थी।
उसने हम दोनों की तरफ़ देखा और धीरे से कहा, “आज पता चला कि औरत होना क्या होता है। मम्मी, तुमने सच किया जो हमें इन दोनों से मिलवाया।”
मौसी हँसकर उसके पास लेट गई और उसका माथा चूमा, “बिटिया, ये तो बस शुरुआत है। अब तू भी मेरी तरह रंडी बन गई है। जब भी मन करे, बुला लेना इन दोनों को।”
रोहन काका भी उस रात छत पर आ गए थे और सब देख रहे थे।
उन्होंने हँसकर कहा, “नीलम जी, अब तो ये घर पूरा चलता फिरता स्वर्ग बन गया है। माँ चुदे, बेटी चुदे — क्या बात है।”
मौसी ने उन्हें देखकर कहा, “तू भी कल आ जाना रोहन, आज रानू थक गई है, कल तेरी बारी भी है।” और सब हँस पड़े।
रानू ने शरमाकर मुँह छिपा लिया, लेकिन आँखों में अगले दिन की उत्सुकता साफ़ थी।
रात भर तारे चमकते रहे, ठंडी हवा चलती रही, और हम चारों छत पर एक-दूसरे से चिपके पड़े रहे — तीन आदमी और एक औरत, जिसने आज अपनी बेटी को भी अपने जैसा बना दिया था।
नीचे आँगन में कुत्ते सो रहे थे, और ऊपर छत पर एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी — माँ और बेटी की, दोनों की चुदाई की, दोनों की रंडी बनने की।
अगली रात मौसी और रानू दोनों साथ लेटीं। सोनू और मैंने पहले माँ की बुर चाटी, फिर बेटी की।
फिर मौसी की गांड में सोनू और रानू की चूत में मैं — दोनों एक साथ ठोकते रहे।
माँ-बेटी एक-दूसरे की चूचियाँ चूसतीं, होंठ चूमतीं, और हमारे लंड के ठोकरों पर एक साथ कराहतीं।
आज पूरा घर चुदाई का स्वर्ग बन गया — माँ भी, बेटी भी, दोनों हमारी रंडी।
NEXT PART: मौसी और उनकी बेटी एकसाथ चुदवाई
- 3 बावर्ची और मेरा बेटा मिलकर मुझे चोदे
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- जयपुर में तीन काले लंड से चुद गयी
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