मेरे हस्बैंड ने मेरी छोटी बहन की बुर चोदी

sali mast chudai kahani

मेरा नाम संध्या है। उम्र अट्ठाईस साल। कद मध्यम, रंग गेहुँआ, बाल घुटनों तक — और शरीर 32-28-38 का।

यानी ऐसा नक़्शा जिसे देखकर गली के लड़के भी चलते-चलते मुड़कर देख लेते हैं, फिर चलते-चलते मुस्कुरा देते हैं।

लेकिन ये सब बाद की बात है। पहले ये समझ लीजिए कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आई हूँ, और मेरी ज़िंदगी में सुरेश कहाँ आते हैं।

मेरी शादी बीस साल की उम्र में हो गई थी। तब मैं बारहवीं पास करके बस घर की चारदीवारी में रह रही थी, और मम्मी-पापा ने रिश्ता देखना शुरू किया था।

जो पहला ही लड़का पसंद आया, वो सुरेश थे। पच्चीस साल के, पाँच फुट नौ इंच लंबे, चौड़े कंधे, घने बाल, सीधी नाक, और वो सबसे बड़ी बात — उनकी आँखों में एक ऐसी शांति थी जो झूठ नहीं बोलती।

मैंने उन्हें एक बार मंदिर में देखा था, फिर मम्मी के हाथ में हाथ डालकर कह दिया था, “हाँ।”

उस वक़्त मुझे ये नहीं पता था कि उनकी पैंट के अंदर एक दस इंच का लंड छिपा बैठा है, जो आगे की आठ सालों में मेरी बुर को इतना फैला देगा कि मैं खुद इसे प्यार से भोसड़ा कहने लगूँगी।

शादी की रात। मैं लाल जोड़े में, घूँघट में, दरवाज़े पर बैठी थी। सुरेश अंदर आए, दरवाज़ा बंद किया, और मेरे सामने घुटनों पर बैठकर पहले मेरा घूँघट उठाया।

फिर मेरे हाथ पकड़कर कहा, “डर लग रहा है?”

मैंने सिर हिला दिया। उन्होंने हँसकर कहा, “तो आँख बंद कर लो, और मेरा हाथ पकड़ लो। जब तक तुम कहो, तब तक सिर्फ़ चूमूँगा।”

और सच में, पहली रात उन्होंने पहले मुझे आधा घंटा सिर्फ़ चूमा। गर्दन, गाल, माथा, हथेलियाँ, पंजे, और फिर होंठ। जब वो मेरी ब्लाउज़ की हुक खोल रहे थे, तब मेरे दूध इतने कसे हुए थे कि ब्लाउज़ से बाहर छलक रहे थे।

उन्होंने नीचे झुककर मेरे निप्पल को मुँह में लिया और मैंने पहली बार जाना कि औरत के निपल्स में इतनी जान होती है।

लेकिन जब वो मेरे अंदर आए — हे भगवान। मैंने चादर मुँह में दबा ली थी। दस इंच। एक-एक इंच ने मुझे फाड़ते हुए अंदर तक जगह बनाई थी।

पहले हफ़्ते मैं लंगड़ाकर चलती रही। दूसरे हफ़्ते से मज़ा आने लगा। चौथे महीने तक मेरी बुर उनके लंड के हिसाब से ढल गई — मुलायम, गीली, और चौड़ी।

आठ साल बाद आज मैं खुद को छूकर महसूस करती हूँ तो लगता है कि ये बुर नहीं, एक भोसड़ा है, जिसे सुरेश ने अपने हाथों से तराशा है।

लेकिन हर अच्छी चीज़ की एक बीमारी होती है — आदत। हमारी चुदाई अब नियम बन गई थी। हफ़्ते में एक बार, रात के ग्यारह बजे, लाइट बंद, सीधे मिशनरी में डालकर, दस मिनट में, और फिर दोनों करवट बदलकर सो जाना।

लंड वही था, बुर वही थी, लेकिन जोश? जोश कहीं खो गया था। और मुझे जोश चाहिए था।

मेरी एक छोटी बहन है। नाम निधि। चौबीस साल की। मुझसे चार साल छोटी, लेकिन शरीर में मुझसे दोगुनी बिंदास।

रंग मेरे से एक शेड साँवला, आँखें बड़ी-बड़ी और काजल से भरी हुई, होंठ हमेशा ग्लॉसी, बाल कभी कमर तक खुले तो कभी मस्से-बन में बँधे।

पढ़ाई बीच में छोड़कर उसने शहर की एक बुटीक में काम पकड़ लिया था, और उसके बाद उसका शरीर जैसे जाग गया। कसे हुए दूध, गोल कूल्हे, और वो निप्पल — भगवान, उसके निप्पल इतने मुंहजोर थे कि पतली कुर्ती में भी साफ़ दिख जाते।

कभी-कभी मैं सोचती, इस लड़की को किसी ने दबाया क्यों नहीं।

फिर पता चला — सबने दबाया था। हमारे शहर की गली के लगभग सारे लड़के उसे चोद चुके थे। निधि खुद हँसकर कहती थी, “दीदी, मैं तो गली की रान्डी हूँ।” और कहते हुए शरमाती नहीं थी, गर्व करती थी।

चौक के मुंशी के लड़के से लेकर बस अड्डे के टायर वाले लड़के तक — सबने उसकी बुर देखी थी। कॉलेज के पीछे की दीवार, नहर के किनारे का खेत, बंद दुकान की सीढ़ियाँ — सब उसकी चुदाई के ठिकाने थे।

लेकिन एक बात निधि ने मुझे कभी नहीं बताई थी, और वो थी इसका दुख।

एक रात हम दोनों छत पर लेटी थीं, तारे गिन रही थीं, तब उसने कहा, “दीदी, सब लड़के एक जैसे हैं। चढ़ते हैं, पाँच-छह इंच डालते हैं, धक-धक करते हैं, और उतर जाते हैं। पूरा शरीर अंदर तक कभी नहीं भरता।” उसने करवट बदली और धीरे से कहा, “किसी दिन कोई ऐसा मिले जो मुझे अंदर तक भर दे। ऐसा लगे कि नाभि तक पहुँच गया।”

मैं मुस्कुराई थी, और उस रात मेरे दिमाग़ में एक तस्वीर बनी थी — मेरी बहन, और मेरे पति का वो दस इंच का लंड।

सुरेश ने मुझे ये बात खुद बताई थी। हमारी शादी की आठवीं सालगिरह पर, दोनों बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे। निधि उस वक़्त हमारे ही घर में आई हुई थी

और अंदर बर्तन धो रही थी, कुर्ती की आस्तीन चढ़ाई हुई, कमर झुकी हुई। सुरेश ने चाय का कप रखा और धीरे से कहा, “संध्या, एक बात पूछूँ?”

“पूछो।”

“तेरी बहन का जिस्म बड़ा मस्त है।” फिर चाय की चुस्की लेते हुए जोड़ा, “और वो निपल्स… कुर्ती में भी साफ़ दिखते हैं। देखकर लगता है, मुँह लगा दूँ।”

मैं हँस दी थी। “तो लगा दो ना।”

“पर तू बुरा तो नहीं मानेगी?”

“सुरेश,” मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मेरी बहन बुरा माने या ना माने, ये तेरी फ़िक्र होनी चाहिए। मुझे तो मज़ा आएगा।”

उस रात हमने पहली बार निधि पर बात की — खुलकर, गंदी बातें करते हुए।

सुरेश ने बताया कि जब भी निधि हमारे घर आती है, वो उसके पीछे-पीछे आँखें घुमाता है। और जब निधि झुककर कोई चीज़ उठाती है, तो उसका लंड पैंट में तन जाता है।

मैंने पूछा, “कितना तन जाता है?” वो शरमाकर बोला, “पूरा।” और तब मैंने उसका हाथ अपनी जाँघ पर रखकर कहा, “तो निधि को भी बताना चाहिए ना कि उसके जीजू के अंदर क्या है।”

तभी से एक योजना मेरे दिमाग़ में घूम रही थी। लेकिन मौक़ा नहीं मिल रहा था।

मौक़ा खुद चलकर आया। हमारे घर, यानी मम्मी के घर से फोन आया — मेरे छोटे भाई राहुल की शादी पक्की हो गई थी।

मम्मी फोन पर रो रही थीं, खुशी से। और उन्होंने साफ़ कह दिया, “संध्या, तू और सुरेश दो दिन पहले ही आ जाओ।

घर में भीड़ लगी है, तेरे जैसे समझदार हाथ की ज़रूरत है। निधि भी है, लेकिन वो तो बस अपने बाल सँवारती रहती है।”

फोन रखने के बाद मैं किचन में गई, सुरेश को देखा और धीरे से कहा, “दो दिन पहले जाना है। पूरे चार दिन रुकना है।”

सुरेश ने भौंहें उठाईं।

“और निधि वहाँ अकेली है,” मैंने बर्तन धोते-धोते, बिना उनकी तरफ़ देखे कहा। “उसको भी हाथ बँटाना पड़ेगा।”

बस इतना काफ़ी था। सुरेश ने अपना गला साफ़ किया और बोले, “हाँ… हाँ, चलो।”

मैंने पीछे मुड़कर देखा — उनकी पैंट में साफ़ उभार था।

ट्रेन सुबह नौ बजे पहुँची। प्लेटफ़ॉर्म पर निधि खड़ी थी, पीली कुर्ती और नीली जींस में, बाल मस्से-बन में, कानों में बड़े सिल्वर हूप्स।

गाड़ी से उतरते ही उसने मुझे लपककर गले लगाया और फिर पीछे मुड़कर सुरेश को देखकर हँसते हुए बोली, “नमस्ते जीजू! और भी हैंडसम हो गए हो।”

सुरेश ने हँसकर सिर हिलाया। “और तू और बदतमीज़।”

“अच्छा?” निधि ने आँखें घुमाकर सूटकेस पकड़ा। “जीजू, ये बदतमीज़ी नहीं, सीधापन है।”

बाहर पार्किंग में ऑटो खड़ा था। तीनों बैठे। निधि बीच में बैठी, मैं एक तरफ़, सुरेश दूसरी तरफ़।

ऑटो के झटके खा रहे थे और निधि की जाँघ बार-बार सुरेश की जाँघ से टकरा रही थी। पहले दो बार उसने हटकर बैठने की कोशिश की, तीसरी बार नहीं हटी। और सुरेश भी नहीं हटे।

मैं दोनों के बीच बैठी थी और मुझे दोनों तरफ़ का ताप महसूस हो रहा था। ऑटो वाले को क्या पता था कि उसके पीछे एक शादी का नया अध्याय शुरू हो रहा है।

घर पहुँचकर मम्मी ने हमें जकड़ लिया। घर में शादी की तैयारी थी — बर्तन, कपड़े, फूल, मिठाई के डिब्बे, और चारों तरफ़ रिश्तेदारों की चहल-पहल। कमरे तय हुए।

मम्मी ने मुझे और सुरेश को पिछली तरफ़ वाला कमरा दिया, जिसमें एक पुराना डबल बेड, एक अलमारी, और एक खिड़की थी जो आँगन की तरफ़ खुलती थी।

निधि बराबर वाले कमरे में थी। दोनों कमरों के बीच दीवार भर थी, और उस दीवार पर एक बंद दरवाज़ा भी — जो बरसों से इस्तेमाल नहीं हुआ था, चिटकनी लगी थी।

पहली शाम मैंने कपड़े रखते-रखते वो बंद दरवाज़ा देखा और मन ही मन सोचा — अगर ये खुल जाए तो क्या बात हो।

उस रात गर्मी थी। बिजली भी चली गई थी। मम्मी ने सबको छत पर सोने भेज दिया।

चटाइयाँ बिछीं, चादरें तानी गईं, और मच्छरदानी के नीचे सब लेट गए। मैं और सुरेश एक कोने में, निधि हमसे कुछ दूर, मम्मी और चाची बीच में।

पर रात बारह बजे के बाद चाची अंदर चली गईं, और मम्मी भी भीतर सो गईं। छत पर बस हम तीन बचे। ऊपर आसमान में तारे, नीचे पुराने ज़माने का पंखा घूम रहा था, और हवा में मिट्टी की महक।

निधि ने अपनी चादर हटा दी थी। उसने पहने थे एक हल्की सूती नाइटी, जिसमें उसकी कमर और दूध का ऊपरी हिस्सा साफ़ दिख रहा था। पीठ के बल लेटी, एक घुटना ऊपर उठाकर, आँखें आसमान पर।

सुरेश मेरी तरफ़ लेटे थे, पर उनकी आँखें बार-बार उधर जा रही थीं। मैंने धीरे से उनकी कमर पर हाथ रखा और कान में फुसफुसाई, “देख रहे हो?”

“नहीं,” उन्होंने झूठ बोला।

“झूठ।”

वो हँसे। तभी निधि ने अचानक कहा, “जीजू, नींद नहीं आ रही?”

“नहीं,” सुरेश ने कहा।

“मुझे भी नहीं।” फिर वो करवट लेकर हमारी तरफ़ मुड़ी और उसकी नज़र सीधे सुरेश की छाती पर पड़ी — जहाँ कुर्ता खुला था और घने बाल दिख रहे थे। “दीदी, तुम तो सो गईं?”

“आधी,” मैंने कहा।

“तो मैं जीजू से बात करूँ?”

“कर ले।”

फिर उन दोनों ने आधे घंटे बात की — काम-धंधा, शहर, बुटीक, राहुल की होने वाली बीवी, मम्मी की नसीहतें।

बात साधारण थी, लेकिन आवाज़ों में एक ऐसी मिठास थी जो साधारण नहीं थी। और मैं आँखें बंद किए सब सुन रही थी।

तभी पंखा रुक गया — बिजली गई। गर्मी बढ़ी। निधि ने कराहते हुए चादर पूरी हटा दी, और उसकी नाइटी का पल्लू कमर से खिसककर ऊपर चला गया।

उसकी नाभि दिख रही थी। सुरेश की साँस ज़रा तेज़ हुई, और मैंने महसूस किया कि उनकी जाँघ की मांसपेशियाँ कस गई हैं।

“दीदी, इतनी गर्मी!” निधि ने कहा।

“सुरेश, पानी की बोतल दे दो उसे,” मैंने कहा।

सुरेश उठकर बोतल लेने गए, लौटे, और बोतल निधि की तरफ़ बढ़ाई। निधि ने उठकर बोतल पकड़ी — और उस वक़्त दोनों के हाथ टकराए।

अँधेरे में भी मैंने देखा कि उनका हाथ दो सेकंड ज़्यादा रुका। निधि ने पानी पिया, बोतल वापस दी, और लेटते-लेटे धीरे से कहा, “जीजू, तुम्हारे हाथ बड़े बड़े हैं।”

“तो?”

“तो कुछ नहीं। बस।”

फिर सन्नाटा। और उस सन्नाटे में मैंने मन ही मन कहा — अब देर नहीं करनी।

अगले दिन घर में मेहंदी की रस्म थी। आँगन में चटाइयाँ बिछीं, ढोलक आई, और औरतें गाने लगीं।

निधि पूरे घर की सबसे चुलबुली चीज़ थी। वो उठी, कुर्ती की कमर कसी, चूड़ियाँ पहनीं, और ढोलक की ताल पर नाचने लगी।

और हे भगवान, वो कैसे नाच रही थी। कमर ऐसे घूम रही थी जैसे कोई गीला तौलिया झटक रहा हो। कूल्हे ताल पर ठीक-ठीक गिर रहे थे।

और उसके दूध — उछल-उछलकर कुर्ती में धक्के मार रहे थे। मैंने पलटकर सुरेश को देखा। वो दीवार से टिककर खड़े थे, हाथ जेब में, और आँखें बंद किए नहीं, खुली हुईं।

उनकी पैंट में साफ़ उभार था, और उन्होंने जेब में हाथ डालकर उसे छिपाने की कोशिश की, लेकिन पीछे से सब दिख रहा था।

मैंने पास जाकर धीरे से कहा, “छिपाने की कोशिश मत करो।”

“क्या?”

“तुम्हारा लंड। सब दिख रहा है।”

सुरेश ने जीभ से होंठ गीले किए। “मरवा डालेगी ये लड़की।”

निधि ने तभी पलटकर हम दोनों को देखा, और हँसकर इशारा किया — “जीजू, आओ ना, नाचो!”

सुरेश ने हाथ जोड़कर मना किया। निधि ने दीदी की तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाकर हाँ कहा। और फिर सुरेश को मजबूरन बीच में आना पड़ा।

निधि ने उनका हाथ पकड़ा — दोनों हाथ — और घुमाने लगी। घूमते-घूमते एक बार निधि का सिर सुरेश की छाती से टकराया, और उसने शरमाकर माफ़ी माँगने की जगह वहीं सिर टिका दिया। सुरेश ने ऊपर से उसका सिर थाम लिया। दो सेकंड। तीन सेकंड। चार।

और आँगन में तालियाँ बजीं।

अगले दिन हल्दी की रस्म थी। राहुल को हल्दी लगाने के बाद सबने सुरेश पर भी हल्दी मली — क्योंकि “जीजा जी भी तो घर के हो गए”। सुरेश की बाँहें, गर्दन, गाल — सब पीले पड़ गए। और हल्दी लगाने वालों में सबसे आगे निधि थी।

उसने अपनी उँगलियों में हल्दी ली, और सुरेश की बाँह पर मलने लगी। ऊपर से नीचे, कलाई तक।

फिर उसने कहा, “जीजू, झुको ज़रा, गर्दन पर लगाऊँ।” सुरेश झुके। निधि ने हल्दी उनकी गर्दन पर मली, और उसकी उँगलियाँ ज़रा नीचे सरककर सुरेश के कॉलरबोन पर पहुँचीं। सुरेश ने आँखें बंद कर लीं।

“ठंडी है ना?” निधि ने पूछा।

“हाँ,” सुरेश ने आँख बंद किए हुए कहा।

“मुझे लगा तुम्हें ठंड लगेगी।” और फिर उसने उँगलियाँ हटाते हुए बहुत धीरे से कहा, “जीजू, तुम्हारी गर्दन पर हल्दी बहुत अच्छी लग रही है।”

उस रात मैं सुरेश के साथ बेड पर लेटी थी, और उनके गले से हल्दी की महक आ रही थी।

मैंने उनका हाथ पकड़कर अपनी बुर पर रख दिया, जो उस वक़्त गीली थी। सुरेश ने उँगली डाली और हैरान होकर पूछा, “आज क्यों?”

“पता नहीं,” मैंने कहा। “हल्दी की महक आ रही है तुमसे।”

फिर दोनों हँसे।

तीसरी रात, शादी से एक दिन पहले। घर में भीड़ थी, बारात अगले दिन आनी थी। मैं और निधि आँगन के कोने में बैठी थीं, मेहंदी सुखा रही थीं।

निधि ने अचानक पूछा, “दीदी, एक बात पूछूँ? बुरा मत मानना।”

“पूछ।”

“जीजू कैसे हैं? यानी… पति के नाते कैसे हैं?”

मैं मुस्कुराई। “अच्छे हैं। बहुत अच्छे हैं।”

“अच्छे कैसे?” उसने आँखें बड़ी करके पूछा। “अच्छे लड़के वाले अच्छे, या अच्छे आदमी वाले अच्छे?”

मैं हँस पड़ी। “निधि, तू सीधे पूछ ना।”

उसने होंठ काटे। फिर धीरे से, आवाज़ दबाकर कहा, “दीदी, जीजू का साइज़ क्या है?”

मैंने बिना नाटक किए कहा, “दस इंच।”

निधि के हाथ से मेहंदी की कोन गिर गई। “झूठ!”

“सच।”

“दस?” उसने दोबारा पूछा, जैसे हिसाब लगा रही हो। “पूरा दस? दीदी, लड़कों का तो पाँच-छह होता है।”

“तो तूने लड़के देखे हैं,” मैंने शरारत से कहा।

“दीदी!” वो शरमा गई, फिर हँस पड़ी। “अच्छा, अच्छा, देखे हैं। पर सच बताओ, दस इंच से कैसे समाता है?”

“नहीं समाता,” मैंने कहा। “फैल जाता है। और फिर वो फैलाव ही आदत बन जाता है।” मैंने उसकी तरफ़ देखा। “तूने कभी दस इंच नहीं लिया?”

उसने सिर हिलाया — ना में। “कभी नहीं। सब कहते हैं मेरी बुर टाइट है।”

“तो टाइट बुर पर दस इंच,” मैंने धीरे से कहा, “वो अलग ही सीन होता है। पहले फाड़ता है, फिर भरता है, फिर ऐसा लगता है कि नाभि तक पहुँच गया।”

निधि ने अपनी जाँघें ज़रा कसकर बैठी। फिर बोली, “दीदी, एक बात कहूँ?”

“कह।”

“जीजू जब नाच रहे थे, तब उनकी पैंट में… ” वो रुक गई।

“बहुत कुछ दिख रहा था,” मैंने उसकी बात पूरी की।

दोनों हँस पड़ीं। और फिर उस हँसी के नीचे एक समझौता हो गया — बिना शब्दों के।

रात ग्यारह बजे मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी, आज मैं आपके पास सो जाऊँ? बहुत दिनों से आपके पैर नहीं दबाए।”

मम्मी खुश हो गईं। “हाँ-हाँ, आ जा।”

फिर मैंने निधि को आवाज़ दी, जो रसोई में बर्तन रख रही थी। “निधि, सुन।”

“हाँ दीदी?”

“सुरेश को रात में दवा लेनी है — वो लाल डिब्बी में है, अलमारी के ऊपर। और खाना भी ठीक से नहीं खाया उसने।” मैंने झूठ बोला, पर आँखों में सच था। “तू गरम पानी करके दाल-चावल ले जाना उसके कमरे में। और सुन, उस कमरे की खिड़की खुली है, मच्छर आ जाएँगे। तू जाकर बंद कर देना।”

निधि ने बर्तन पोंछते-पोंछते कहा, “अच्छा।”

फिर जाते-जाते मैंने कंधे पर से पलटकर कहा, “और हाँ — मम्मी के कमरे में पंखा तेज़ है, तो मैं वहीं सो जाऊँगी। तू जीजू का ख्याल रखना।”

निधि ने बर्तन रख दिया। “मतलब?”

“मतलब,” मैंने कहा, “जो समझना है समझ ले।”

रात साढ़े ग्यारह बजे थी। बारात आ चुकी थी, घर में शोर था, शराब के गिलास थे, और सुरेश को भी दो पैग पिला दिए गए थे — इतने कि नशा हो, पर होश बना रहे। वो अपने कमरे में आए, कुर्ता खोला, बेड पर बैठ गए, और फिर दीवार से टिककर आँखें बंद कर लीं।

उस वक़्त मैं मम्मी के कमरे में थी, पर सोई नहीं थी। मैंने दरवाज़े की चिटकनी खुली रखी थी, ताकि गलियारे में सब दिखे।

रात ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर गलियारे में चप्पल की आहट आई। हल्की। धीमी। फिर रुकी।

फिर सुरेश के कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला।

निधि दरवाज़े पर खड़ी थी। पीली कुर्ती और नीली जींस वाली नहीं — उसने नाइटी पहन रखी थी।

हल्की, गुलाबी, और उतनी पतली कि बेडसाइड लैंप की रोशनी में उसके शरीर की लाइनें साफ़ दिख रही थीं।

उसके दूध की गोलाई, उन पर कसे हुए निप्पल, और नीचे की कमर — सब कुछ उस कपड़े के नीचे बोल रहा था। बाल खुले थे, गीले थे — जैसे अभी नहाकर आई हो। हाथ में एक छोटी स्टील की थाली थी, जिसमें दाल-चावल था।

सुरेश ने आँखें खोलीं। “निधि?”

“जीजू,” उसने अंदर क़दम रखा और दरवाज़ा अपने पीछे धीरे से बंद कर दिया। “दीदी ने भेजा है। दवा और खाना।”

“अच्छा… रख दे।”

उसने थाली मेज़ पर रखी। फिर खिड़की के पास गई, मच्छरदानी वाली खिड़की बंद की, और पलटकर सुरेश को देखा।

उसके सामने सुरेश बेड पर बैठे थे, कुर्ता खुला, सफ़ेद बनियान में, बाल बिखरे हुए, आँखें शराब से थोड़ी लाल।

“जीजू, खाओ।”

“तूने खाया?”

“नहीं।” वो पास आकर बेड के किनारे बैठ गई — सुरेश से कोई एक फुट दूर। “भूख नहीं थी।”

“तो खा ले मेरे साथ।”

निधि ने थाली उठाई, बेड पर रखी, और दोनों ने चुपचाप कुछ निवाले खाए। बीच में एक बार सुरेश का हाथ निधि के हाथ से टकराया — दोनों ने हाथ नहीं हटाया।

फिर निधि ने आख़िरी निवाला सुरेश के मुँह के पास कर दिया, और सुरेश ने उँगलियों को मुँह में लेते हुए निधि की उँगली भी हल्के से चूम ली।

निधि की साँस रुक गई।

“जीजू…”

“हाँ?”

“तुमने मेरी उँगली चूमी।”

“अच्छा?” सुरेश मुस्कुराए। “ग़लती हो गई।”

“तो सुधार लो,” निधि ने कहा और अपना हाथ उनके आगे बढ़ा दिया। चारों उँगलियाँ। सुरेश ने एक-एक उँगली उठाई और एक-एक को चूमा। अँगूठे के पोर पर जीभ फेरी। निधि ने आँखें बंद कर लीं और गर्दन पीछे झुक गई, जैसे कोई तार खिंच गया हो।

“निधि,” सुरेश ने आवाज़ भारी करके कहा। “एक बात पूछूँ?”

“हाँ।”

“आज यहाँ क्यों आई?”

निधि ने आँखें खोलीं। सीधे सुरेश की आँखों में देखा। और बिना घुमाए, बिना नाटक किए कहा, “देखने।”

“क्या देखने?”

“जो दीदी बताती है।”

सुरेश हँसे। “क्या बताती है?”

निधि ने अपनी उँगली सुरेश की छाती पर रखी, बनियान के ऊपर। “कि जीजू के पास दस इंच का लंड है।”

उस पल सुरेश की साँस खुल गई। उन्होंने निधि का हाथ पकड़ा और खींचकर अपने पास बैठा लिया। अब दोनों की जाँघें टिकी हुई थीं। “तो देखना है?” सुरेश ने पूछा।

“देखना है,” निधि ने कहा।

फिर सुरेश ने उसका चेहरा दोनों हाथों में थामा — बड़े, मज़बूत हाथों में। और धीरे-धीरे पास लाए। निधि की आँखें अपने आप बंद हो गईं। पहला चुंबन माथे पर। दूसरा दोनों पलकों पर। तीसरा नाक पर। और चौथा — होंठों पर।

पहला चुंबन छोटा था। दूसरा लंबा। तीसरे में निधि के होंठ खुल गए और सुरेश की जीभ अंदर गई। निधि ने एक छोटी-सी आवाज़ निकाली — “म्म्म” — और सुरेश की कमीज़ की कॉलर मुट्ठी में जकड़ ली। दोनों होंठ चूसते, काटते, फिर से जुड़ते।

सुरेश की जीभ निधि के तालू पर फिर रही थी और निधि की जीभ उनके होंठों के नीचे लिपट रही थी। दस मिनट तक सिर्फ़ होंठ चले। कोई जल्दी नहीं थी।

फिर सुरेश ने चुंबन नीचे सरकाया — ठुड्डी, गर्दन, कंधे। निधि की नाइटी के स्ट्रैप को उन्होंने दाँतों से खींचकर नीचे किया। कंधा खुला। फिर गले का बंद, फिर कॉलरबोन पर जीभ। निधि ने सिर पीछे झुकाया और सुरेश के बालों में उँगलियाँ घुसा दीं।

“जीजू… ठंडा लग रहा है,” वो फुसफुसाई।

“अच्छा?” सुरेश ने कान पर फुसफुसाया। “तो गरम कर दूँ?”

और उन्होंने दोनों हाथ निधि की पीठ पर रखकर उसे खड़ा कर दिया। फिर उसकी नाइटी की कमर पकड़कर ऊपर खींची।

निधि ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए और नाइटी सिर से निकल गई। अब वो सिर्फ़ मैचिंग पैंटी में खड़ी थी।

सुरेश ने पीछे हटकर देखा। पूरा। ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर।

निधि के दूध भारी थे, गोल, और उनके निप्पल मुंहजोर — जैसे किसी ने उन्हें उभारकर बनाया हो। सुरेश ने दोनों हाथ बढ़ाए और पहले दोनों दूध को बाहर से थामा, फिर अंदर की तरफ़ से। अँगूठों से निप्पल पर हल्का दबाव डाला। निधि ने आँखें बंद कर लीं और होंठ भींच लिए।

“बोल,” सुरेश ने कहा। “अच्छा लग रहा है?”

“हाँ…” निधि की आवाज़ घुटी हुई थी।

“और?” सुरेश ने निप्पल को अँगूठे और उँगली के बीच रगड़ा। “और बोल।”

“जीजू… निपल्स मत रगड़ो, पूरा शरीर काँप रहा है।”

“तो काँपे।”

फिर सुरेश ने उसे बेड पर लिटा दिया और सीधे उसके दूध पर झुक गए। पहले बाएँ निप्पल को होंठों में लिया, जीभ से गीला किया, फिर हल्के दाँतों से दबाया। निधि की पीठ उठ गई। फिर दाएँ निप्पल पर वही सिलसिला — चूसना, काटना, जीभ घुमाना।

सुरेश इतने धीरे और इतने पूरे मन से चूस रहे थे जैसे कोई प्यासा हो। निधि के दोनों निपल्स खड़े हो चुके थे, चमकदार, और सुरेश की लार से भीगे हुए।

वो बार-बार निधि के दूध को दोनों हाथों से दबाकर ऊपर उठाते, फिर छोड़ते, और निप्पल को मुँह में भर लेते। निधि की हथेलियाँ उनके सिर पर थीं और वो बार-बार फुसफुसा रही थी, “जीजू… जीजू… बस… बहुत हो गया…”

पर सुरेश रुके नहीं। उन्होंने अपना हाथ निधि की नाभि से नीचे सरकाया और पैंटी के ऊपर से बुर पर रख दिया। निधि ने जाँघें थोड़ी खोल दीं।

“गीली है?” सुरेश ने पूछा।

निधि ने शरमाकर सिर हिलाया।

“बोल।”

“हाँ,” निधि ने कहा। “बहुत।”

सुरेश ने पैंटी की इलास्टिक पकड़ी और नीचे खींची। निधि ने कूल्हे उठाकर उसे पूरी निकलवा दी। अब वो पूरी नंगी थी — पूरी।

बेडसाइड लैंप की पीली रोशनी में उसका साँवला शरीर सोने जैसा चमक रहा था, और जाँघों के बीच वो जगह गीली, चमकती, और सूजी हुई थी।

सुरेश घुटनों के बल बेड पर बैठे, निधि की दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं, और झुक गए। पहले बाहर से होंठ लगाए।

फिर जीभ से ऊपर से नीचे एक लंबी लकीर खींची। निधि ने कराहकर चादर मुट्ठी में भर ली।

“आह… जीजू!”

सुरेश ने जीभ से उसके निप्पल-जैसे छोटे क्लिट पर हल्के-हल्के सर्कल बनाए, फिर उसे होंठों में लेकर धीरे-धीरे चूसा। निधि की कमर बेड से ऊपर उठने लगी और सुरेश ने हाथ से उसकी कमर दबाकर नीचे रखी।

फिर उन्होंने जीभ नीचे सरकाई और बुर के द्वार पर घुमाई — अंदर बाहर, अंदर बाहर। निधि की जाँघें काँपने लगीं। वो घुटने से बेड पर चोट मार रही थी।

“जीजू… रुक जाओ… मर जाऊँगी…”

“मर जा,” सुरेश ने मुँह भरकर कहा और उन्होंने दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं।

निधि चीख पड़ी। अंदर इतनी गर्मी, इतनी नमी थी कि सुरेश की उँगलियाँ फिसल गईं। उन्होंने अंदर घुमाकर ऊपर की तरफ़ दबाव डाला — वो जगह जो औरत को पागल करती है — और साथ-साथ जीभ से क्लिट पर चूसते रहे।

निधि की साँस फूलने लगी। उसके पेट की मांसपेशियाँ कसने लगीं। दो मिनट में ही उसका पहला ऑर्गैज़्म आ गया — बिना लंड, बस जीभ और उँगलियों से।

वो काँपते हुए सुरेश के सिर को दोनों हाथों से जकड़कर अपनी तरफ़ दबा रही थी, और “जीजू, जीजू, जीजू” बुदबुदा रही थी, जैसे कोई मंत्र।

जब वो शांत हुई, तब सुरेश ने अपना कुर्ता और बनियान उतार दी। उनकी छाती चौड़ी, पेट सख़्त, बाँहें मोटी।

निधि ने उठकर देखा और उसकी आँखें ठिठक गईं — पेट के नीचे के बालों से उभरता हुआ, पैंट से दबा हुआ, एक मोटा, लंबा, भारी उभार।

“जीजू,” निधि ने धीरे से कहा, “निकालो।”

सुरेश ने पैंट खोली। ज़िप। फिर शॉर्ट्स। और फिर वो बाहर आया।

निधि की साँस रुक गई।

वो खड़ा था, ऊपर की तरफ़ उठा हुआ, नसों में खून भरा हुआ, टिप पर एक बूँद। मोटाई ऐसी कि निधि की कलाई उसके आगे पतली लगे। लंबाई — पूरी दस इंच, बिना नाप-तौल के भी दिखने वाली। और नीचे उसका थैला भी भारी, भरा हुआ।

निधि ने बिना कुछ कहे हाथ बढ़ाया और उसे पकड़ा। दोनों हाथों से। उँगलियाँ आपस में नहीं मिलीं। उसने धीरे से ऊपर-नीचे सरकाया — एक, दो, तीन बार — और सुरेश की आँखें बंद हो गईं, गले से एक गहरी आवाज़ निकली।

“अच्छा लगा?” सुरेश ने पूछा।

“जीजू,” निधि ने उसे देखते हुए कहा, “ये मेरी बुर में कैसे जाएगा?”

“पता नहीं,” सुरेश ने हँसकर कहा। “पर जाएगा। दीदी के भी यही सवाल था।”

फिर निधि झुकी और उसने लंड को अपने होंठों पर लिया। पहले सिर्फ़ टिप को चूमा। फिर जीभ से नीचे से ऊपर तक लंबी लकीर खींची।

फिर मुँह में लिया — जितना समा सका। दस इंच में से छह इंच। बाक़ी हाथ से सहलाती रही।

सुरेश ने उसके बाल पकड़कर पीछे की तरफ़ किया, ताकि चेहरा दिखे — और निधि की वो हालत देखकर, आँखों में पानी, होंठ फूले हुए, लार टपकती हुई, उनका लंड और सख़्त हो गया।

“बस,” सुरेश ने कहा। “बस कर, वरना यहीं निकल जाएगा।”

निधि ने लंड मुँह से निकाला और चट-चट आवाज़ के साथ चूमा। “जीजू, अब करो।”

“क्या करूँ?”

“जो दीदी बताती है।”

सुरेश हँसे। फिर उन्होंने निधि को घुमाकर घोड़ी की तरह बेड पर टिकाया — हाथ बेड के सिरहाने पर, घुटने गद्दे पर, कमर झुकी हुई। ये दीदी वाला सीन नहीं था। ये उनका अपना सीन था।

इस बीच मैं — संध्या — मम्मी के कमरे से उठकर गलियारे में आ चुकी थी। दरवाज़ा पूरा बंद नहीं था; उसमें एक इंच की दरार थी।

मैं उस दरार में आँख रखकर खड़ी थी, और मेरी अपनी बुर में ऐसा पानी बह रहा था कि नाइटी की जाँघ भीग गई थी।

मैंने अपनी नाइटी नीचे से ज़रा ऊपर सरकाई और दो उँगलियाँ अंदर डालकर धीरे-धीरे घुमाने लगी।

मेरी बहन के कमरे में मेरा पति उसकी बुर चोदने वाला था, और मैं दरवाज़े पर खड़ी खुद को चोद रही थी।

सुरेश ने निधि के पीछे खड़े होकर अपने लंड को उसके नितंबों के बीच रखा। पहले सिर्फ़ रगड़ा — ऊपर से नीचे, गीले द्वार पर टिप टिकाते हुए। निधि बेचैन होकर कूल्हे पीछे करने लगी।

“जल्दी करो ना, जीजू,” वो बोली।

“देखते हैं, कितना समाता है,” सुरेश ने कहा। और फिर दबाया।

पहला इंच। टिप घुसा। निधि की साँस फूल गई। दूसरा इंच — और निधि ने आँखें बंद कर लीं। तीसरा — और उसने बेड की चादर मुट्ठी में भर ली।

“आह… जीजू… रुको… रुको…”

सुरेश रुके। आधे अंदर। निधि की बुर ने उन्हें ऐसा जकड़ा हुआ था कि सुरेश को खुद साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी।

चारों तरफ़ से दबाव, गर्मी, और लचीला कसाव। सुरेश ने अपनी उँगलियों से निधि की कमर सहलाई, पीठ पर हाथ फेरा, और धीरे से कहा, “साँस ले। धीरे।”

निधि ने लंबी साँस ली। सुरेश ने फिर दबाया — चार, पाँच, छह इंच। निधि की आवाज़ बदल गई, गले से एक ऐसी कराह निकली जो दर्द की नहीं, खुलने की थी। फिर सात, आठ, और आख़िर में नौ इंच तक।

“दीदी सच कहती थी,” निधि ने हाँफते हुए कहा। “पूरा भर गया, जीजू।”

सुरेश झुके, उसकी गर्दन पर होंठ रखे, और फुसफुसाए, “अभी पूरा नहीं भरा।” और उन्होंने आख़िरी इंच अंदर कर दिया।

निधि चीख पड़ी। बेड की लकड़ी चरमराई।

फिर सुरेश हिले। धीरे-धीरे। बाहर आधा, अंदर पूरा। बाहर आधा, अंदर पूरा। हर बार अंदर जाते वक़्त निधि की बुर के होंठ खिंचते और बाहर आते वक़्त गीले होकर चिपक जाते। आवाज़ आने लगी — चट, चट, चप, चप।

निधि की गीली बुर से झाग बनने लगा। उसकी जाँघों के अंदर तक सुरेश की जाँघें टकरा रही थीं और हर धक्के पर निधि के दूध बेड पर दबते और लटकते थे।

“जीजू… तेज़ करो… तेज़…” निधि ने कहा।

सुरेश ने कमर पकड़कर रफ़्तार बढ़ाई। अब धक्के लंबे और गहरे थे। हर धक्के पर निधि की कमर आगे खिसकती और वो सिरहाने से टकराती। चादर खिसक गई। तकिया गिर गया। मच्छरदानी हिल रही थी।

“बोल,” सुरेश ने दाँत भींचकर कहा। “किसका लंड है?”

“तेरा, जीजू,” निधि ने हाँफते हुए कहा।

“किसकी बुर में?”

“मेरी… मेरी बुर में… आह!”

“कैसी लग रही है?”

“अच्छी… बहुत अच्छी… पूरी भर गई… जीजू, नाभि तक लग रहा है…”

सुरेश ने उसका बाल पकड़कर ज़रा पीछे खींचा, और निधि ने सिर पीछे किया, गर्दन खिंच गई, और सुरेश ने उसके गले के बंद पर दाँत रख दिए।

दोनों इसी हालत में चले — सुरेश ऊपर झुका, निधि नीचे, बुर में लंड, और गले पर मुँह। पाँच मिनट में निधि की जाँघें काँपने लगीं और उसने बेड की चादर को खींचते हुए चीख मारी।

“जीजू… आ रहा है… जीजू रुक मत… रुक मत…”

और वो दूसरी बार झड़ी, और इस बार पूरी बुर ने लंड को दबाकर पकड़ लिया, ऐसी ऐंठन के साथ कि सुरेश को रुकना पड़ा। उन्होंने लंड बाहर निकाला — गीला, चमकता हुआ, निधि की बुर से जुड़ा हुआ जैसे कोई पुल। निधि बेड पर गिर पड़ी, हाँफती हुई, दोनों टाँगें फैली हुईं, बुर खुली हुई, लाल, गीली।

“जीजू,” उसने आँखें बंद किए हुए कहा, “अंदर ही रहना था।”

सुरेश हँसे। “थोड़ा बाक़ी है।”

फिर उन्होंने निधि को करवट लेटाया। स्पून पोज़िशन — सुरेश पीछे लेटे, निधि आगे, उनका लंड फिर से निधि के नितंबों के बीच से सरककर बुर में। इस बार कोई जल्दी नहीं।

इस बार धीमी, गहरी, रसभरी चुदाई। सुरेश का एक हाथ निधि के नीचे से जाकर उसके दूध पर था, दूसरा हाथ उसके पेट पर, और होंठ उसके कंधे के बंद पर। हर धक्के पर निधि की आँखें बंद हो जाती थीं और वो सुरेश की बाँह मुट्ठी में जकड़ लेती थी।

“जीजू, तुमने कहा था कि आधा है,” निधि ने धीरे से कहा।

“हाँ।”

“अब कितना है?”

“पूरा।”

“दस?”

“दस।”

निधि ने सुरेश का हाथ अपनी नाभि पर रखा। “यहाँ तक लग रहा है।”

सुरेश ने उसके कान पर चूमा और कमर ज़रा और दबाई। निधि की बुर ने गीली आवाज़ दी। चप। चप। चप। धीरे, लंबे, गहरे।

इस बीच मैं दरवाज़े पर खड़ी थी, और मेरी उँगलियाँ मेरी बुर में अंदर-बाहर हो रही थीं। मैंने तय कर लिया — अब नहीं रुकना।

फिर सुरेश ने करवट बदली और निधि को घुमाकर ऊपर कर दिया। अब निधि ऊपर, घुटनों पर, और सुरेश नीचे लेटे।

निधि ने सुरेश की छाती पर हाथ रखे, आँखों में देखा, और फिर धीरे से नीचे बैठी।

वो दृश्य। निधि ऊपर से धीरे-धीरे नीचे जा रही थी, लंड एक-एक इंच अंदर, और उसका चेहरा बदलता जा रहा था — पहले खुलता मुँह, फिर भींचे दाँत, फिर एक लंबी कराह। जब पूरा अंदर गया, तो निधि ने पीछे सिर झुकाकर बाल बिखेर दिए और अपनी दोनों हथेलियाँ सुरेश की छाती पर टिकाकर हिलने लगी।

ऊपर-नीचे। ऊपर-नीचे। धीरे, फिर तेज़। उसके दूध उछल-उछलकर सुरेश की छाती पर गिर रहे थे और हर बार टकराते हुए निप्पल उनकी छाती को छू रहे थे। सुरेश ने हाथ बढ़ाकर दोनों दूध पकड़े और अँगूठों से निप्पल दबाए। निधि कराहकर आगे झुक गई और उसने सुरेश के होंठ चूस लिए।

“जीजू, ऐसे ही रखो हाथ,” वो फुसफुसाई।

“छोड़ूँ ना?”

“नहीं। दबाते रहो। पूरा दबाओ।”

सुरेश ने दोनों दूध भरे हाथों में लिए, ऊपर उठाए, फिर नीचे दबाए, और निप्पल को अँगूठे-उँगली के बीच लेकर रगड़ते रहे। निधि ऊपर बैठी सुरेश के लंड पर झूल रही थी, कमर गोल घुमाती हुई, और उसकी बुर हर बार पूरी लंबाई में लंड को निगल रही थी।

फिर निधि पलटी। रिवर्स काउगर्ल। पीठ सुरेश की तरफ़, हाथ बेड पर, घुटने चौड़े। और नीचे बैठी। इस एंगल पर सुरेश की आँखों के सामने निधि की पीठ, उसकी गोल कमर, और कमर के नीचे वो खाई दिख रही थी जिसमें उनका लंड ऊपर-नीचे हो रहा था।

निधि ने हाथ बेड पर टिकाकर कमर ऊपर-नीचे की और सुरेश ने नीचे से धक्के मारने शुरू किए। दोनों की ताल मिल गई। बेड की चरमराहट, निधि की कराह, और चुदाई की चप-चप — तीनों आवाज़ें एक हो गईं।

“जीजू, नीचे से मारो… हाँ… वही… वही…”

तभी निधि ने ऊपर उठकर दीवार की तरफ़ देखा, जहाँ एक पुराना शीशा टँगा था।

उसने अपना चेहरा देखा — फूले होंठ, बिखरे बाल, बहता पसीना — और उसकी आँखें नम हो गईं। “जीजू, देखो मुझे,” उसने कहा। “दीदी ने सही कहा था। अब पता चला।”

फिर सुरेश उठे, निधि को खड़ा किया, और दीवार की तरफ़ घुमा दिया। निधि ने दोनों हाथ दीवार पर रखे, कमर झुकाई, और पीछे देखा।

सुरेश पीछे खड़े होकर लंड को रगड़कर अंदर डाला — इस बार बिना रुके, एक ही झटके में पूरा। निधि ने दीवार पर माथा टिका दिया और उसकी पीठ काँपी।

अब धक्के तेज़ थे। सुरेश ने निधि की कमर पकड़ी और पूरी ताक़त से मारने लगे। हर धक्के पर निधि आगे को खिसकती और दीवार से टकराती। उसके दूध दीवार पर दबते और निपल्स ठंडी दीवार से चिपक जाते।

सुरेश ने एक हाथ नीचे लाकर उसकी बुर के ऊपर वाली गाँठ पर अँगूठा रखा और धक्कों की ताल पर उसे रगड़ने लगे।

निधि तीसरी बार झड़ने लगी। उसकी टाँगें काँपीं, घुटने जवाब दे गए, और सुरेश ने उसे कमर से पकड़कर गिरने से बचाया।

“जीजू, अब बेड पर… गिर पड़ूँगी…” वो हाँफी।

सुरेश ने उसे उठाकर बेड पर लिटाया — पीठ के बल, टाँगें फैली हुईं। फिर खुद ऊपर चढ़े और बिना रुके अंदर डाल दिया।

मिशनरी, पर वो नीरस वाली मिशनरी नहीं। सुरेश निधि की दोनों कलाइयाँ पकड़कर उसके सिर के ऊपर बेड पर दबाए हुए थे, उनकी छाती निधि के दूध से टिकी हुई, और उनका पेट निधि के पेट से। हर धक्के पर निप्पल उनकी छाती पर रगड़ खाते थे।

निधि की आँखों से पानी बह रहा था — खुशी का। उसने अपनी टाँगें सुरेश की कमर पर लपेट दीं और एड़ियाँ दबाकर उन्हें और अंदर खींच लिया।

“अब निकलने नहीं दूँगी,” निधि ने कहा।

“तो मत दो,” सुरेश ने कहा।

फिर सुरेश ने गति बदली — छोटे, तेज़, सतही धक्के, और फिर अचानक लंबा, गहरा धक्का। फिर वही। छ-छ-छ-छ… और एक लंबा। निधि हर लंबे धक्के पर चीखती और हर छोटे पर हाँफती। बेड हिल रहा था, अलमारी के शीशे खनक रहे थे, और कमरे की हवा में पसीने, फिनाइल और दो जिस्मों की गंध घुल चुकी थी।

तभी — दरवाज़ा खुला।

मैं अंदर आई। नाइटी, बिखरे बाल, लाल चेहरा। निधि ने और सुरेश ने एक साथ पलटकर देखा, और सुरेश ठिठककर रुक गए — लंड अंदर ही था।

निधि ने शरमाने की जगह हँस दिया। “दीदी!”

“दीदी,” सुरेश ने कहा, और उनकी आवाज़ में हल्की घबराहट थी। “हम… तू सो गई थी ना?”

“सोई थी,” मैंने कहा, और बिना पूछे बेड के किनारे बैठ गई। “पर तुम दोनों की आवाज़ें मम्मी के कमरे तक आ रही थीं। मम्मी बहरी हैं, वरना अब तक उठ चुकी होतीं।”

फिर मैंने निधि के बिखरे बालों में हाथ फेरा। निधि ने मेरा हाथ पकड़कर चूम लिया। “दीदी, सच कहा था तुमने।”

“क्या?”

“दस इंच। और नाभि तक।”

मैं मुस्कुराई और सुरेश की तरफ़ देखा। सुरेश की हालत ऐसी थी जैसे पकड़े गए हों, पर लंड अभी भी सख़्त था। मैंने अपनी नाइटी ऊपर की और बेड पर उनके पास लेट गई। “जारी रखो,” मैंने कहा। “मैं देखने आई हूँ।”

सुरेश हँसे, और फिर वो फिर हिलने लगे। और अब दृश्य बदल गया — अब मैं पास से देख रही थी, इंच-इंच। देख रही थी कि मेरे पति का लंड कैसे मेरी बहन की बुर को खोलकर अंदर जाता है, और बाहर आते वक़्त उसके गीले होंठ कैसे बाहर की तरफ़ उलटे खिंच आते हैं।

देख रही थी कि हर धक्के पर निधि की बुर का रंग कैसे बदलता है — गुलाबी से लाल। देख रही थी कि निधि के निपल्स कैसे खड़े हैं, जैसे छोटे पत्थर।

मैंने हाथ बढ़ाया और निधि के एक निप्पल को अँगूठे-उँगली के बीच लेकर दबाया। निधि की पीठ उठ गई। “दीदी…”

“चुप,” मैंने कहा। “आँख बंद कर।”

फिर मैंने उसके दूध पर मुँह लगा दिया। निधि की तीन जगहों पर हमला हो रहा था — बुर में लंड, निपल्स पर मेरे होंठ, और गले पर सुरेश की साँस। वो बस पाँच मिनट में तीसरी बार झड़ी, और इस बार उसने चीख रोकने के लिए अपनी कलाई मुँह में डाल ली।

अब सुरेश की हालत भी बिगड़ रही थी। उनकी पीठ पर पसीना आ गया था, बाल माथे पर चिपक गए थे, और उनकी साँसें छोटी-छोटी हो रही थीं। मैंने उनके कान में धीरे से कहा, “निकालना है?”

“हाँ,” सुरेश ने दाँत भींचकर कहा।

“तो निकालो।” मैंने निधि की कलाई उसके मुँह से हटाई और उसके कान में कहा, “निधि, जीजू निकालने वाले हैं। अंदर रखें?”

निधि ने बिना एक पल सोचे कहा, “हाँ… अंदर… पूरा अंदर…”

“कोई प्रॉब्लम नहीं?” सुरेश ने हाँफते हुए पूछा।

“कॉपर-टी है,” निधि ने कहा। “निकालो जीजू, पूरा अंदर निकालो।”

फिर सुरेश ने निधि की दोनों कलाइयाँ फिर से पकड़ीं, उसके ऊपर पूरा वज़न डाला, और आख़िरी बार ज़ोर से अंदर गए — इतने गहरे कि निधि की आँखें ऊपर चढ़ गईं। और फिर पहला झटका।

निधि ने महसूस किया — गर्म, भारी, अंदर फैलती हुई गर्मी। दूसरा झटका। तीसरा। सुरेश की पीठ काँपी, गले से एक लंबी, गहरी आवाज़ निकली, और वो निधि के अंदर, ऊपर तक, भरते चले गए।

निधि ने अपनी टाँगें सुरेश की कमर पर और कसकर जकड़ दीं, ताकि एक बूँद भी बाहर न जाए।

दोनों लंबे समय तक वैसे ही रहे — सुरेश निधि के ऊपर, निधि की टाँगें उनकी कमर पर, और मैं बराबर में लेटी उन्हें देखती हुई। कमरे में सिर्फ़ साँसों की आवाज़ थी, और बाहर आँगन में कुत्ते के भौंकने की।

फिर सुरेश पलटकर गिर पड़े। निधि वैसे ही पड़ी रही, टाँगें खुली हुईं, और उसकी बुर से सफ़ेद, गाढ़ा तरल धीरे-धीरे बहकर गद्दे पर गिरने लगा।

मैंने पास जाकर झाँका। मेरे पति का काम मेरी बहन के अंदर। मैं झुकी और जीभ से उस बहते तरल को निधि की जाँघों से चाट लिया। निधि ने काँपकर आँखें खोलीं और देखकर हँस पड़ी। “दीदी, तुम पागल हो।”

“हाँ,” मैंने कहा। “पता है।”

फिर तीनों बेड पर लेट गए — निधि बीच में, सुरेश एक तरफ़, मैं दूसरी तरफ़। सुरेश का हाथ निधि की कमर पर, और उसका दूसरा हाथ मेरी जाँघ पर। निधि की आँखें बंद थीं और वो मुस्कुरा रही थी, जैसे कोई बच्चा जिसे वो मिल गया जिसका इंतज़ार था।

“दीदी,” उसने आँखें बंद किए हुए कहा, “जीजू ने मेरी बुर चोदी।”

“पता है,” मैंने कहा।

“और तुमने कुछ कहा नहीं।”

“कहा ना — जारी रखो।”

तीनों हँस पड़े। और उस हँसी में कमरे की गर्मी थोड़ी कम हुई।

फिर तीन बजे निधि उठी, अपनी नाइटी पहनी, और धीरे से अपने कमरे में चली गई — क्योंकि चार बजे मम्मी उठ जाती थीं। जाते-जाते दरवाज़े पर रुककर उसने पलटकर देखा और सिर्फ़ इतना कहा, “जीजू, कल भी।”

अगले दिन घर में राहुल की शादी थी, घर में तीन सौ लोग थे, और तीनों के चेहरों पर एक अलग-सी चमक थी जो सिर्फ़ हम जानते थे। मम्मी ने दो बार पूछा, “निधि, तेरे गाल क्यों लाल हैं?” और निधि ने कहा, “धूप, मम्मी।”

शादी के बाद, रात को जब सब लौटे, तब निधि ने मेरे कान में तीन बातें कहीं जो अगली चुदाई का पूरा नक़्शा थीं:

पहली — “दीदी, अगली बार कमरे की बत्ती पूरी बंद करनी है। और दरवाज़े की चिटकनी भी। इस बार मुझे डर था कि कोई सुन लेगा, इसलिए पूरा मुँह खोलकर चीख नहीं पाई। अगली बार ज़ोर से चीखूँगी।”

दूसरी — “अगली बार तुम भी साथ रहना। आज तुम बाद में आईं। कल शुरू से रहना — तीनों साथ। मुझे देखना है कि जीजू का लंड एक रात में दो बुर कैसे चोदता है। और मुझे तुम्हारी बुर भी देखनी है, दीदी। मुझे पता है तुमने जीजू के लिए कैसे खोली होगी।”

तीसरी — और ये सबसे ज़रूरी थी। निधि ने मेरे हाथ पर हाथ रखकर धीरे से कहा, “दीदी, इस बार जीजू ने बुर चोदी। अगली बार मुझे जीजू से ऊपर बैठकर खुद चलाना है। पूरा कंट्रोल मेरे हाथ में। जितनी देर चाहूँ, जितना गहरा चाहूँ। और जब वो निकालें, तो मुझे देखना है — मुँह में।”

और मेरी तरफ़ से तीन बातें थीं:

एक — नहाकर, तेल लगाकर, पूरे शरीर की मालिश के बाद। क्योंकि पहली बार में पसीना और जल्दबाज़ी थी। अगली बार में सब्र होगा।

दो — अगली बार निधि की बुर को पहले मेरी जीभ से खोलना है, फिर सुरेश के लंड को। ताकि वो टाइट बुर ज़रा नरम हो जाए और सुरेश को पूरा अंदर जाने में तकलीफ़ न हो।

तीन — और आख़िर में, जब सुरेश निकालें, तो इस बार निधि के मुँह में। पहली बार में बुर भर गई, अगली बार होंठ भरेंगे। निधि की माँग थी, और मेरी भी।

और एक चौथी बात, जो किसी ने नहीं कही, पर तीनों जानते थे — ये सिर्फ़ एक रात नहीं थी। ये शुरुआत थी। हमारे शहर में जब भी तीनों मिलेंगे, तब यही होगा। होली पर, दिवाली पर, भाई की शादी की सालगिरह पर। और जिस दिन सुरेश का तबादला उस शहर में हो जाएगा जहाँ निधि रहती है, उस दिन निधि का कमरा हमारे घर से बस एक दीवार की दूरी पर होगा।

और उस दीवार पर वो बंद दरवाज़ा — जो बरसों से बंद था — अब खुल चुका था।

मेरे हस्बैंड ने मेरी छोटी बहन की बुर चोदी।
और मैं वहीं खड़ी रही — देखती हुई, और खुश होती हुई।

…………… तो कैसी लगी आप लोगो को मेरी बहन चुदाई….

NEXT PART: मेरी और मेरी छोटी बहन की मेरे हस्बैंड ने बुर चोदी

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

2 thoughts on “मेरे हस्बैंड ने मेरी छोटी बहन की बुर चोदी”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top