मेरी गर्ल फ्रेंड ने अपने टी एल और मुझसे ग्रुप में चुदवाई

hr group chudai kahani

मैंने अपनी शर्ट उतार दी।

रिया ने मेरी पैंट का बटन खोला, फिर मेरी बेल्ट खींची, और मेरे घुटनों के बल बैठकर मेरी पैंट नीचे खींच ली। मेरी बॉक्सर भी उतर गई। और मैं वहीं खड़ा था — पूरा नंगा, खड़ा लंड, और सामने एक नंगी औरत जो घुटनों पर थी और मेरे पीछे एक आदमी जो दीवार से टिककर मुस्कुरा रहा था।

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे तिलक नगर में अपनी कंपनी के HR को पटाकर चोदा।

रिया ने मेरे लंड को हाथ में लिया — पूरे हाथ से, धीरे से — और फिर मुड़कर कबीर की तरफ़ देखा।

“देखो,” उन्होंने कहा। “इसकी उम्र में ये।”

कबीर ने एक कदम आगे बढ़कर देखा और होंठ सीटी की तरह गोल किए। “बीस साल में ये, आदित्य? तू तो चुप रहा।”

“अब पता चला,” रिया ने कहा, और मुस्कुराते हुए उसी को होंठों में ले लिया।

कबीर ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया — एक टीम लीड वाली मुस्कान, न दुश्मनी, न श्रेय, बस एक आदमी की मुस्कान जो समझ गया है कि आज रात कोई हिसाब नहीं होगा।

“बैठ जा,” उसने कहा। “और उससे छीन मत।”

मैं बिस्तर पर बैठ गया और पीछे टिक गया। रिया ने सिर घुमाया, मेरी आँखों में देखा, और फिर मेरे लंड को मुँह से छोड़कर कबीर की तरफ़ बढ़ गईं। उन्होंने कबीर को भी वैसे ही मुँह में लिया — और मैंने पहली बार देखा कि कबीर का लंड मेरे से कितना मोटा था। लंबाई में शायद मेरे बराबर, पर मोटाई में कहीं ज़्यादा। और रिया उसे आराम से ले रही थीं, जैसे आदत हो।

मेरा मन थोड़ा सा डगमगाया। क्या मैं कम हूँ?

रिया ने जैसे मेरा दिमाग़ पढ़ लिया। उन्होंने कबीर को मुँह से निकाला, मेरी तरफ़ देखा, और बोलीं — “आदित्य, तुम्हारे ज़्यादा लंबा है। और तुम बहुत ज़्यादा ठीक लगाते हो। बस ये मोटा है। दोनों का अलग मज़ा है।”

और फिर उन्होंने दोनों को अपने पास बुलाया — मुझे बाईं तरफ़, कबीर को दाईं तरफ़ — और बीच में बैठ गईं।

“अब सुनो,” उन्होंने कहा, हाथ से मेरा और कबीर का लंड एक-एक करके सहलाते हुए। “आज कोई जल्दी नहीं करेगा। कोई ईर्ष्या नहीं करेगा। और कोई भी ये नहीं सोचेगा कि वो दूसरा है। आज हम तीन हैं। बस तीन।”

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा — “तुम्हारे लिए कोई नियम नहीं। जब चाहो, जहाँ चाहो।” और फिर कबीर की तरफ़ मुड़कर — “और तुम्हारे लिए भी।”

कबीर ने हामी में सिर हिलाया। मैंने भी हिलाया।

“और अगर कोई जलन हो,” रिया ने कहा, “तो बाद में लड़ लेना। बिस्तर में नहीं।”

कबीर हँस पड़ा। “बहुत देर से सीख रही हो रिया, ये सब।”

“देर से सही, सीख रही हूँ,” उन्होंने कहा।

उसके बाद जो हुआ, वो शब्दों में लिखना मुश्किल है। पर कोशिश करता हूँ।

रिया ने पहले मुझे लिटाया। मेरी छाती पर बैठीं, झुककर मेरी गर्दन चूमी, मेरे निपल्स पर होंठ रखे, मेरे पेट पर, फिर नीचे जाकर मेरे लंड को मुँह में लिया। और जब वो मुझ पर झुकी थीं, तो उनका दूध मेरी छाती पर झूल रहा था, और उनके निपल्स मेरी त्वचा से रगड़ खा रहे थे।

और पीछे कबीर था।

वो रिया के पीछे आया, घुटनों पर बैठा, और दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ी। फिर उसने अपना मोटा लंड उनकी बुर पर रखा, दो-तीन बार ऊपर-नीचे रगड़ा, और फिर एक झटके में अंदर डाल दिया।

रिया ने मेरे लंड को मुँह में रखे-रखे ही कराह मारी — मेरे लंड पर उनका कराह एक कंपन बनकर आया, और मेरी रीढ़ तक गया।

और फिर कबीर धक्के मारने लगा। धीमे, लंबे, गहरे धक्के। और हर धक्के पर रिया आगे की तरफ़ खिसकतीं — यानी मेरी तरफ़ — और मेरा लंड उनके मुँह में और अंदर चला जाता।

यानी हर धक्के में दो बार।

आगे से मैं, पीछे से कबीर। और बीच में रिया — पूरी भरी हुई, पूरी ली हुई, पूरी इस्तेमाल की हुई।

उनके शरीर का वो हाल था जो किसी औरत का तभी होता है जब वो पूरी तरह छोड़ दे। वो लगातार कराह रही थीं — ‘हम्म… हम्म… हम्म’ — और हर धक्के पर उनकी पीठ झुक जाती थी। कबीर ने उनके बाल एक तरफ़ कर दिए और उनकी गर्दन चूमने लगा। मैंने नीचे से हाथ बढ़ाकर उनका दूध पकड़ा और निप्पल दबाया।

दस मिनट बाद कबीर ने रफ़्तार बढ़ा दी। अब धक्के तेज़ थे, छोटे, और रिया अब मुँह से लंड निकालकर सिर्फ़ हाँफ रही थीं। मेरा लंड उनके गाल पर, होंठों पर रगड़ खा रहा था।

“रुको,” रिया ने कहा। “मुझे बदलना है।”

वो मेरे ऊपर से उठीं। कबीर निकल गया। और फिर रिया ने मेरी तरफ़ देखा, मुस्कुराईं, और बोलीं — “अब तुम अंदर आओ।”

मैं बैठ गया। वो मेरे ऊपर बैठीं — आमने-सामने, अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर, और अपनी बुर मेरे लंड के ऊपर रखी। और फिर धीरे से नीचे बैठ गईं।

पूरा अंदर गया। उनकी आँखें बंद हो गईं। उन्होंने होंठ भींचे।

“आदित्य…” उन्होंने फुसफुसाया।

और फिर वो ऊपर-नीचे होने लगीं।

और कबीर ने पीछे से आकर उनकी पीठ पर हाथ रखा। फिर वो झुका, और रिया की गर्दन के पीछे होंठ रखे। और फिर उसने अपना हाथ नीचे लाकर रिया के दूध पकड़े — और दबाए।

अब रिया के चारों तरफ़ हाथ थे। मेरे हाथ उनकी कमर पर, कबीर के हाथ उनके दूध पर। मैं नीचे से धक्के मार रहा था, कबीर ऊपर से उनकी गर्दन चूम रहा था। और रिया बीच में थीं — आँखें बंद, होंठ खुले, बाल बिखरे — पूरी तरह हमारी।

फिर कबीर ने रिया को हल्का सा आगे झुकाया — मेरी छाती पर — और उनके पीछे अपना लंड फिर रखा।

रिया ने आँखें खोलीं और मेरी आँखों में देखा।

“दोनों?” उन्होंने पूछा।

“दोनों,” कबीर ने कहा।

और रिया मुस्कुराईं। “कोशिश करो,” उन्होंने कहा।

कबीर ने धीरे से अपना लंड रिया की बुर में डाला — जहाँ मेरा पहले से था। रिया ने एक तेज़ साँस ली। और फिर दोनों अंदर थे।

“आआह्ह्ह…” रिया का पूरा शरीर काँप गया।

दोनों एक साथ नहीं हिल रहे थे — बारी-बारी। कबीर अंदर जाता, मैं बाहर आता। मैं अंदर जाता, कबीर बाहर आता। रिया के अंदर लगातार एक लंड भरा हुआ था, और कभी-कभी दोनों आधे-आधे।

पाँच मिनट में रिया टूट गईं।

उनका शरीर झटके खाने लगा। उन्होंने मेरी छाती पर सिर रख दिया और कराहती रहीं — एक लंबी, टूटती, हाँफती आवाज़ में। उनके अंदर का सिकुड़न दोनों को महसूस हो रहा था। कबीर ने मेरी तरफ़ देखा और होंठों से कहा — ‘रुक जा’ — और हम दोनों रुक गए, अंदर ही, और उन्हें आने दिया।

कुछ सेकंड तक बिस्तर पर सिर्फ़ रिया की साँस थी।

फिर उन्होंने सिर उठाया। आँखें लाल। होंठ फूले हुए। बाल चेहरे पर चिपके। और वो मुस्कुराईं।

“अब,” उन्होंने कहा, “तुम दोनों की बारी।”

कबीर ने पहले रिया को पीछे से लिया। उन्होंने दीवार पकड़ ली, कमर उठा दी, और कबीर ने पीछे से अपना मोटा लंड अंदर डाल दिया। रिया कराह उठीं — उस कोण में मोटाई का एहसास और गहरा होता है।

मैं उनके सामने खड़ा था। मेरा लंड उनके होंठों के सामने। उन्होंने बिना कहे मुँह खोला और मुझे अंदर ले लिया। और अब वो दोनों तरफ़ से भरी हुई थीं — आगे मेरा लंड मुँह में, पीछे कबीर का लंड बुर में। और हर धक्के पर वो आगे की तरफ़ धकेल दी जाती थीं, और मेरा लंड उनके गले तक।

कबीर की साँस भारी हो रही थी। वो बोला — “रिया, तेरी बुर कितनी तंग है।”

रिया ने मुँह से मेरा लंड निकाला और कहा — “तो और तेज़ करो।”

और कबीर ने और तेज़ कर दिया।

मैंने उनके दूध पकड़े — दोनों हाथों से — और नीचे झुककर एक निप्पल मुँह में लिया। अब रिया के शरीर में एक भी जगह खाली नहीं थी। आगे मुँह में लंड, पीछे बुर में लंड, हाथों में दूध, होंठों पर निप्पल। वो बस आवाज़ें निकाल रही थीं — शब्द नहीं, बस आवाज़ें।

कबीर ने कहा — “आदित्य, तू सामने से आ जा।”

हमने रिया को घुमाया। अब मैं पीछे, कबीर सामने। और यहीं मुझे पहली बार पता चला कि मेरे लंड की लंबाई का मतलब क्या है।

रिया ने जैसे ही मुझे पीछे से अंदर डाला, एक अलग आवाज़ निकाली — एक ऊँची, चौंकी हुई आवाज़। मेरे सात इंच उनके अंदर गहरे तक पहुँच रहे थे, जहाँ कबीर की मोटाई पहुँच नहीं पाती थी।

“आदित्य…” उन्होंने हाँफते हुए कहा। “तुम… तुम गहरे जाते हो…”

“अच्छा लग रहा है?” मैंने पूछा।

“हाँ…” उन्होंने कहा। “हाँ… और करो…”

कबीर सामने था — उसने रिया का चेहरा पकड़कर अपने लंड के पास लाया और वो उसे मुँह में लेने लगीं। और मैं पीछे से पूरी ताक़त से धक्के मार रहा था।

हम दोनों बिना बोले तालमेल बना रहे थे — जब मैं धक्का मारता, कबीर रुक जाता। जब कबीर धक्का मारता, मैं रुक जाता। रिया के अंदर लगातार कुछ चलता रहता था।

उनकी पीठ पर पसीना था। उनके बाल गीले हो गए थे। और वो लगातार काँप रही थीं।

फिर रिया ने कबीर को मुँह से निकाला और हाँफते हुए कहा — “अब छोड़ दो। दोनों। अंदर।”

मैंने रफ़्तार बढ़ाई। कबीर ने भी। और पाँच मिनट बाद रिया फिर आईं — इस बार ज़ोर से, चीखती हुई, मेरे लंड को अंदर कसकर पकड़ती हुई।

और उनके आने के बाद, कबीर ने एक गहरी साँस ली और खुद को निकालकर उनकी पीठ पर छोड़ दिया। मैंने भी निकाला और उनकी बुर के ऊपर छोड़ दिया। और रिया वहीं लेट गईं — पूरी भीगी, पूरी भरी, पूरी टूटी हुई।

तीन मिनट तक कोई नहीं बोला।

फिर कबीर ने कहा — “आदित्य, तू ठीक है।”

“आप भी,” मैंने कहा।

“अब ‘आप’ छोड़ दे,” उसने कहा। “आज के बाद ऑफिस में कबीर सर, यहाँ कबीर।”

और रिया बीच में लेटी हुई हँस पड़ीं।

हम उस रात तीन बार और हुए।

दूसरी बार में रिया ने हमें बैठाकर दोनों को एक-साथ हाथ में लिया और लंबे समय तक सहलाती रहीं — दोनों को बारी-बारी मुँह में लेतीं, दोनों को एक साथ अपने दूध के बीच रगड़तीं। उन्होंने कहा — “देखो, दोनों कितने ठीक लग रहे हो।” और फिर वो मेरे ऊपर बैठीं और कबीर को अपने मुँह में लिया, और हमने उन्हें बीच में लेकर आख़िर तक ले गए।

तीसरी बार में कबीर ने कहा — “रिया, तू थक गई होगी।”

“नहीं,” उन्होंने कहा। “आज रात कोई थकान नहीं।”

और उन्होंने खुद हमें पलटा — मुझे बिस्तर पर लिटाया, मुझ पर चढ़ीं, और फिर पीछे की तरफ़ हाथ बढ़ाकर कबीर को बुलाया। और इस बार उन्होंने कबीर को भी अंदर ले लिया — मेरे साथ।

उस वक़्त रिया की आवाज़ पूरी तरह बदल गई थी।

और चौथी बार, सुबह लगभग चार बजे, हमने सिर्फ़ धीरे-धीरे किया — कोई ज़ोर नहीं, कोई रफ़्तार नहीं, बस तीन शरीर एक-दूसरे में। रिया बीच में, मैं आगे, कबीर पीछे, और हम तीनों एक-दूसरे की साँस सुन रहे थे।

पाँच बजे हम तीनों एक ही बिस्तर पर सो गए — रिया बीच में, मेरा हाथ उनके दूध पर, कबीर का हाथ उनकी कमर पर।

और सुबह जब मैं उठा, तो रिया जाग रही थीं और मेरे बालों में उँगलियाँ फिरा रही थीं।

“क्या सोच रहे हो?” उन्होंने पूछा।

“ये कि कल क्या होगा,” मैंने कहा।

“कल क्यों?” उन्होंने कहा। “आज को देखो। कल कल होगा।”

कबीर भी जाग गया। वो उठकर बैठा, और बिना किसी शर्म के नंगा खड़ा होकर पानी पीने गया। फिर लौटकर बोला — “चाय बनाऊँ?”

“तुम बनाओगे?” रिया ने पूछा।

“तीस साल से बना रहा हूँ,” उसने कहा। “अब ये लड़का भी बना लेगा।”

“मैं बनाता हूँ,” मैंने कहा, और उठ गया।

रसोई में जाकर मैंने तीन कप चाय बनाई। और जब वापस आया, तो रिया बिस्तर पर बैठी हुई थीं, कबीर उनके पीछे, और दोनों कुछ बातें कर रहे थे। और मैंने पहली बार देखा कि वो दोनों सिर्फ़ सेक्स नहीं करते थे — उनके बीच एक दोस्ती थी, एक आदत थी, एक आराम था।

और मैं उस आराम में घुस गया था।

हमने चाय पी। रिया ने मेरी शर्ट पहनी, कबीर ने अपनी पैंट। और हम तीनों सोफ़े पर बैठकर बातें करने लगे — ऑफिस, काम, बॉस, प्रोजेक्ट, और बीच-बीच में उस रात की बातें जो अब हमारी थीं।

दस बजे कबीर उठा। नहाया। कपड़े पहने। और दरवाज़े पर खड़े होकर उसने मेरी तरफ़ देखा।

“आदित्य,” उसने कहा। “सोमवार को ऑफिस में कुछ नहीं बदलेगा। वहाँ तू जूनियर है, मैं टीम लीड हूँ। रिया मैम है।”

“समझ गया,” मैंने कहा।

“पर एक बात,” उसने कहा, और मुस्कुराया। “कैबिन का दरवाज़ा बंद हो, तो कुछ भी हो सकता है।”

और वो चला गया।

सोमवार को मैं ऑफिस पहुँचा, और मुझे लगा कि पूरी बिल्डिंग बदल गई है।

कबीर अपनी सीट पर बैठा था, कॉफ़ी पीते हुए, लैपटॉप खोले हुए। उसने मुझे देखा, सिर हिलाया, और बोला — “आदित्य, मॉर्निंग। स्टैंडअप में तैयार रहना।”

बस इतना। न कोई इशारा, न कोई मुस्कान।

और रिया अपनी सीट पर बैठी थीं, ऑफिशियल कपड़ों में — लाइट ब्लू शर्ट, हाई-वेस्ट ट्राउज़र, बाल जूड़े में। जब मैं उनके सामने से गुज़रा, तो उन्होंने सिर उठाकर देखा और कहा — “आदित्य, आईडी कार्ड ठीक से लगाइए।”

और जब मैं मुड़ा, तो उन्होंने होंठों से इतना धीमा कहा कि सिर्फ़ मैं सुन सका — “रात में सब बातें।”

मैं पूरे दिन खुद को संभालता रहा।

पर मुश्किल उस वक़्त शुरू हुई जब कबीर ने मीटिंग बुलाई।

कॉन्फ़्रेंस रूम में पाँच लोग थे — कबीर, मैं, दो और टीम मेंबर, और रिया (क्योंकि HR बैठती थी)। कबीर बोल रहा था, बोर्ड पर कुछ लिख रहा था, और मैं नोट्स बना रहा था।

और फिर मेरा फ़ोन वाइब्रेट हुआ। रिया का मैसेज।

“कबीर के माइक्रोफ़ोन वाले हाथ को देख रहे हो?”

मैंने फ़ोन नीचे रखकर देखा। कबीर का हाथ। कल रात वही हाथ रिया के दूध पर था। और आज वो सफ़ेद शर्ट की आस्तीन में था।

मैंने लिखा — “अब देख रहा हूँ।”

फिर आया — “और कबीर की गर्दन। कल रात तुमने उसकी गर्दन देखी थी?”

मैंने लिखा — “नहीं।”

“देखो। बाईं तरफ़। नाखून के निशान। मेरे।”

मैंने देखा। कबीर की गर्दन पर हल्के लाल निशान थे, कॉलर के नीचे छिपे हुए। और मुझे याद आया — कल रात जब वो मेरे नीचे थी और कबीर उसकी गर्दन चूम रहा था, तो उसने नाखून गड़ाए थे।

मैंने मेज़ के नीचे अपना हाथ मुट्ठी में भींच लिया।

फिर आया — “और आज रात?”

“आज रात क्या?” मैंने लिखा।

“आज रात कौन किसके साथ?”

मैंने लिखा — “फैसला आपका।”

उसने लिखा — “ग़लत जवाब। आज रात तुम्हारा। कबीर का बुधवार है।”

मैंने पूछा — “और रविवार?”

“रविवार सबका।”

मीटिंग खत्म हुई। लोग निकल गए। और जब रिया उठकर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ीं, तो उन्होंने मेरी कुर्सी के पीछे से गुज़रते हुए मेरे कंधे पर हल्का सा हाथ रखा — बस एक सेकंड — और फिर चलीं गईं।

कबीर ने ये देखा। और हंसा। और फिर मेरी तरफ़ देखकर बोला — “आदित्य, आज की मीटिंग नोट्स शाम तक भेज देना।”

और फिर धीरे से जोड़ा — “और रात के लिए तैयार रहना।”

उस हफ़्ते हमने नियम बनाए। नहीं, रिया ने बनाए। और हम दोनों ने मान लिए, क्योंकि जब वो नियम बताती थीं, तो बताने का अंदाज़ ऐसा था कि मानने का मन करता था।

नियम कुछ यूँ थे —

एक — ऑफिस में कुछ नहीं। न हाथ, न नज़र, न मैसेज जब तक ज़रूरी न हो। “प्रोफ़ेशनल,” उन्होंने कहा। और फिर खुद उसी दिन तीन मैसेज भेज दिए।

दो — हफ़्ते में एक रात सिर्फ़ मेरी। बुधवार या गुरुवार, जो भी मेरा हो, वो पूरा मेरा। “किसी और का नाम तक नहीं,” उन्होंने कहा।

तीन — एक रात सिर्फ़ कबीर की। और उन रातों में मुझे बीच में नहीं आना था। “न मैसेज, न कॉल।”

चार — शनिवार सिर्फ़ हम दोनों का। “क्योंकि तुम मेरे बॉयफ़्रेंड हो,” उन्होंने कहा। “कबीर मेरा कुछ और है। और ये फ़र्क़ रहेगा।”

पाँच — रविवार तीनों का।

“और कोई नहीं?” कबीर ने पूछा।

“अभी नहीं,” रिया ने कहा। “देखते हैं।”

और उस शाम, जब हम दोनों उनके घर पर बैठे थे और ये नियम लिख रहे थे, तो रिया ने एक और लाइन जोड़ी, जो सबसे ज़रूरी थी —

छह — “जब भी कोई जल जाए, बोल देगा। बिस्तर में जलन नहीं रहेगी।”

“और अगर जलन हो?” मैंने पूछा।

“तो उस रात सिर्फ़ उसी के साथ,” उन्होंने कहा। “बाक़ी हम समझ जाएँगे।”

कबीर ने काग़ज़ पर हस्ताक्षर किए, जैसे कोई कॉन्ट्रैक्ट हो। मैंने भी किए। और रिया ने दोनों को देखकर कहा — “बहुत बच्चे लग रहे हो दोनों।”

“तो?” कबीर ने कहा।

“तो अच्छा लग रहा है,” उन्होंने कहा, और फिर दोनों को गले लगा लिया।

उस रात पहली बार हमने तीनों ने सिर्फ़ बातें कीं — सेक्स नहीं। हमने खाना बनाया, फ़िल्म देखी, और सोफ़े पर बैठकर बकवास की। रिया बीच में थीं, मेरा सिर उनकी गोद में, कबीर का हाथ उनके कंधे पर। और ऐसा लगा जैसे ये तीन लोगों का घर है।

“आदित्य,” रिया ने कहा, मेरे बालों में उँगलियाँ फिराते हुए।

“हम्म।”

“तुम्हें बुरा तो नहीं लगता?”

“किस बात का?”

“इसका। कि तुम्हारी गर्लफ़्रेंड किसी और के साथ भी है।”

मैंने एक पल सोचा। फिर कहा — “शुरू में लगा था। जब दरवाज़ा खोला था। पर फिर जब आपने मेरी शर्ट खोलनी शुरू की, तो सब चला गया।”

“क्यों?”

“क्योंकि आपने मुझे बाहर नहीं किया। अगर उस दिन आपने कहा होता कि ‘आदित्य, तुम जाओ, बात बाद में,’ तो शायद कुछ और होता। पर आपने मुझे अंदर खींच लिया। उससे लगा कि मैं भी आपका हूँ।”

रिया ने मेरे माथे पर होंठ रखे।

“और तुम, कबीर?” उन्होंने पूछा।

कबीर ने कंधे उचकाए। “मैं तेरे साथ दो साल से हूँ, रिया। मुझे पता था कि तू किसी एक से बाँधने वाली नहीं। और सच कहूँ, तो इस लड़के में दम है। मज़ा आया।”

“मतलब तुम्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता?” रिया ने पूछा।

“फ़र्क़ पड़ता है,” कबीर ने कहा। “पर ऐसा नहीं जो रोक दे।”

और रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसके बाद के महीनों में हमारी ज़िंदगी एक अजीब सी सुंदर लय पर चलने लगी।

बुधवार मेरा। रिया मेरे फ्लैट पर आतीं, हम खाना बनाते, बातें करते, और फिर बिस्तर पर घंटों। उन दिनों में वो सिर्फ़ मेरी होतीं — पूरी, बिना किसी बाँट के। और मैं उन्हें वैसे ही चोदता जैसे पहले चोदता था — धीरे, लंबे, गहरे, और आख़िर में उनकी बुर के अंदर छोड़कर।

गुरुवार कबीर का। मुझे उन दोनों की फ़ोटो तक मिलतीं — रिया कभी बेडशीट में लिपटी, कभी बालकनी में, और मैसेज आता — “कल तुम्हारी बारी।”

शनिवार हमारा — बाहर। होटल, डिनर, मॉल, कभी किसी दूसरे शहर का ट्रिप। ये वो दिन था जब रिया पूरी तरह ‘गर्लफ़्रेंड’ मोड में होतीं — हाथ पकड़े चलना, फ़ोटो खिंचवाना, मेरे लिए कपड़े चुनना, और रात को लंबी बातें।

रविवार तीनों का। और रविवार अब हमारा सबसे पसंदीदा दिन था।

रविवार को रिया खुद सब कुछ चलाती थीं। कभी कहतीं — “आज मैं बीच में रहूँगी, तुम दोनों बात करो, मुझे नहीं बोलना।” तो हम दोनों उनके ऊपर-नीचे एक-दूसरे से बातें करते रहते, और वो बस बीच में हाँफती रहतीं। कभी कहतीं — “आज तुम दोनों बारी-बारी।” और बारी-बारी में वो हमें अलग-अलग आज़माती थीं — कबीर की मोटाई, मेरी लंबाई — और बाद में बताती भी थीं, बड़े सलीके से, कि किस धक्के में उन्हें क्या लगा।

“तुम्हें पता है,” उन्होंने एक रविवार कहा, “तुम दोनों एक-दूसरे से अलग हो। कबीर भरता है। तुम गहरे जाते हो। कबीर के साथ लगता है कि कोई पूरा भर गया है। तुम्हारे साथ लगता है कि कोई अंदर तक छू गया है।”

“तो कौन बेहतर?” कबीर ने पूछा।

“दोनों,” रिया ने कहा, और हँस पड़ीं। “इसीलिए तो तुम दोनों चाहिए।”

और कभी-कभी रविवार को हम बस सो जाते थे — तीनों एक बिस्तर पर, बिना किसी काम के। और वो दिन सबसे अच्छे होते थे।

और ऑफिस में?

ऑफिस में सब कुछ सामान्य था। पूरी तरह सामान्य। इतना सामान्य कि लोग कुछ भाँप ही नहीं पाए।

कबीर मुझे डाँटता था — “आदित्य, ये कैंपेन में ग़लती है, ठीक करो।”

रिया मुझे मेल भेजतीं — “आदित्य, लीव एप्लीकेशन पर हस्ताक्षर चाहिए।”

और बीच-बीच में, कभी किसी मीटिंग में, कबीर मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा देता, और रिया दोनों को देखकर हल्का सा होंठ काट लेतीं।

एक बार ऐसा हुआ कि कंपनी की टीम डिनर पर गई। पूरी टीम, तीस लोग। बड़ा रेस्टोरेंट, लंबी टेबल। और रिया बीच में बैठीं — मेरे और कबीर के बीच।

पूरे डिनर में किसी ने कुछ नहीं पकड़ा।

पर जब बाद में लोग सिगरेट पीने बाहर गए, तो रिया ने मेज़ के नीचे मेरा हाथ पकड़ा — और साथ ही दूसरे हाथ से कबीर का। और तीनों चुपचाप हँसते रहे।

उस रात घर जाते वक़्त कबीर ने कहा — “आदित्य, तू बहुत भाग्यशाली है।”

“आप भी,” मैंने कहा।

“हाँ,” उसने कहा। “पर एक बात बता — तूने कभी सोचा था कि तेरी पहली गर्लफ़्रेंड, तेरी HR, और तेरी पहली ग्रुप सेक्स, सब एक ही औरत होगी?”

मैं हँस पड़ा।

“नहीं,” मैंने कहा। “कभी नहीं।”

“और अब?”

“अब यही सोचता हूँ कि इससे बेहतर कुछ हो भी नहीं सकता था।”

छह महीने बाद रिया का जन्मदिन आया। उनतीस से तीस।

हमने पहले ही तय कर लिया था — कुछ बड़ा करेंगे। कबीर ने होटल बुक किया, दिल्ली से बाहर, एक हिल-स्टेशन वाला रिज़ॉर्ट। दो रात। और मैंने उनके लिए एक गिफ़्ट बनवाया — एक चाँदी की चेन, जिसमें छोटा सा पेंडेंट था, और उस पर खुदवाया था — ‘तीन’।

जब उन्होंने वो पेंडेंट खोलकर देखा, तो एक पल चुप रहीं। फिर बोलीं — “तीन?”

“हाँ,” मैंने कहा।

“तुम दोनों ने मिलकर बनवाया?”

“अलग-अलग सोचा, एक ही बात निकली,” कबीर ने कहा, और अपनी जेब से एक और डिब्बा निकाला — उसमें एक रिंग थी, जिस पर भी ‘तीन’ खुदा था।

रिया की आँखें भर आईं।

“तुम दोनों…” उन्होंने कहा, और आगे नहीं बोल पाईं।

“अब रो मत,” कबीर ने कहा। “वरना बर्थडे सेक्स में नाक बहती रहेगी।”

और रिया हँस पड़ीं।

उस रात रिज़ॉर्ट के कमरे में, खिड़की खुली थी, और बाहर पहाड़ों की हवा आ रही थी। और हम तीनों ने वो रात पहली रात से भी ज़्यादा धीरे बिताई।

कोई जल्दी नहीं। कोई प्रदर्शन नहीं। बस तीन शरीर, और एक लंबी रात।

रिया ने पहले कबीर को चूमा, फिर मुझे, फिर हमें बिस्तर पर लिटाकर खुद बीच में आईं। और फिर उन्होंने हमें बताया कि आज रात वो क्या चाहती हैं।

“पहले तुम दोनों मुझे चूमो,” उन्होंने कहा। “एक-एक। बारी-बारी। और जब तक मैं कहूँ नहीं, आगे नहीं बढ़ना।”

और हमने वही किया।

कबीर ने उनकी गर्दन चूमी, बहुत धीरे, बहुत लंबे समय तक। फिर मैंने। फिर कबीर ने उनके दूध चूमे, एक-एक निप्पल, बिना कोई जल्दी। फिर मैंने। और रिया बीच में पड़ी हुई लगातार काँपती रहीं, और हर बार जब कोई रुकता, वो कहतीं — “और।”

फिर हमने उनके पेट पर, उनकी जाँघों पर, उनके घुटनों पर, उनके पंजों पर — पूरे शरीर पर होंठ रखे। बारी-बारी, दोनों।

और सबसे आख़िर में, दोनों ने साथ, उनकी बुर पर।

कबीर एक तरफ़ से, मैं दूसरी तरफ़ से। और रिया दोनों के बीच में लगातार कराहती रहीं — एक मिनट में ही आ गईं, फिर दूसरी बार, फिर तीसरी बार।

“बस,” उन्होंने हाँफते हुए कहा। “अब बस। अंदर आओ।”

कबीर पहले गया — धीरे, गहरे, और उनकी बुर में। और रिया ने मेरा हाथ पकड़कर अपनी तरफ़ खींचा, और मुझे अपने मुँह में लिया।

और फिर बदले।

और फिर उन्होंने हमें एक-साथ बुलाया।

उस रात रिया ने दो बार दोनों को एक साथ अंदर लिया। और दूसरी बार में, जब हम दोनों अंदर थे और वो पूरी भरी हुई थीं, उन्होंने हमारे हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिए, और बोलीं —

“ये चाहिए था। बस ये।”

और फिर वो आईं — बहुत लंबे समय तक, बहुत ज़ोर से, और हम दोनों को अंदर ही रोक लिया।

अब आप सोच रहे होंगे — ये चलता रहेगा कब तक?

सच ये है कि हमने भी सोचा था। और जवाब मिला — चलता रहेगा।

क्योंकि रिया किसी एक की नहीं थीं, और हम दोनों ने ये मान लिया था। कबीर ने भी। मैंने भी। और सबसे बड़ी बात — हम दोनों एक-दूसरे से जलते नहीं थे।

और फिर एक दिन रिया ने एक नई बात कही।

वो रविवार की दोपहर थी। हम तीनों खाना खा रहे थे, और रिया ने अचानक काँटा रख दिया और बोलीं —

“एक बात पूछूँ?”

“पूछो,” कबीर ने कहा।

“क्या तुम दोनों को कभी लगता है कि हमें कोई चौथा चाहिए?”

कबीर ने मुझे देखा। मैंने उसे देखा।

“चौथा?” मैंने पूछा।

“हाँ,” रिया ने कहा। “एक और लड़की। या… एक और लड़का। पता नहीं। बस सोच रही हूँ।”

“आप किसके साथ सोच रही हैं?” कबीर ने पूछा।

और रिया ने गिलास उठाकर एक घूँट लिया, और मुस्कुराकर कहा —

“ऑफिस में एक नई लड़की जॉइन हुई है। डिज़ाइनर है। बहुत प्यारी है।”

कबीर ने माथा पकड़ लिया।

और मैंने कहा — “तो अगले भाग की कहानी तय है।”

रिया हँस पड़ीं। और बोलीं —

“अगले भाग की नहीं, आदित्य। अगले रविवार की।”

अगले भाग में — नई लड़की, चार लोग, और उससे बना एक और बड़ा खेल। साथ ही रिया का वो फ़ैसला जो सब कुछ बदल देगा।

NEXT PART:

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

2 thoughts on “मेरी गर्ल फ्रेंड ने अपने टी एल और मुझसे ग्रुप में चुदवाई”

  1. Pingback: एच आर नैना की ग्रुप में मस्त चुदाई - Antahvasna

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top