एच आर नैना की ग्रुप में मस्त चुदाई

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उस सोमवार ऑफिस में एक नई सीट जुड़ी थी।

क्रिएटिव टीम के कोने में, खिड़की के पास, जहाँ पहले कोई नहीं बैठता था। मेज़ पर एक स्केचबुक, रंगीन पेन, एक छोटा सा पौधा, और एक लैपटॉप जिसके ऊपर बहुत सारे स्टिकर लगे थे। सीट के पीछे एक बीन बैग पड़ा था, और उस बीन बैग पर कोई बैठा हुआ था — पैर क्रॉस करके, स्केचबुक गोद में, सिर झुकाए हुए।

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे मेरी गर्ल फ्रेंड ने अपने टी एल और मुझसे ग्रुप में चुदवाई

छोटे-छोटे बाल, थोड़े बिखरे, थोड़े चॉपी। नाक में एक छोटी सी नथ। गले के नीचे, कॉलरबोन पर, एक छोटा सा टैटू — कुछ शब्द, दूर से पढ़ा नहीं गया। ओवरसाइज़्ड ग्राफ़िक टी-शर्ट, हाई-वेस्ट जींस, और पैरों में कैनवास के स्नीकर्स जिन पर खुद की बनाई हुई डूडल्स थीं।

उसने सिर उठाया, मुझे देखा, और मुस्कुरा दी।

“हाय,” उसने कहा। “आप आदित्य हैं ना? मैं नैना। नई जॉइनिंग। डिज़ाइनर।”

“हाँ… हाँ, हाय,” मैंने कहा।

“रिया मैम ने बताया था कि आदित्य से मदद ले लेना, वो सब जानता है,” उसने कहा, और अपनी स्केचबुक बंद कर दी।

“मैम ने कहा?” मैंने पूछा।

“हाँ, कल ऑनबोर्डिंग में,” नैना ने कहा। “बहुत प्यारी हैं वो।”

और उसी पल रिया कॉरिडोर से गुज़रीं। उन्होंने मुझे और नैना को एक-साथ देखा, और मुस्कुराईं — वो मुस्कान जो सिर्फ़ मुझे समझ आती थी। और चलती हुई बोलीं — “आदित्य, नैना को सिस्टम समझा देना।”

बस इतना। और मेरे पेट में कुछ हिल गया।

उस दिन रात को रिया का मैसेज आया।

“नैना कैसी लगी?”

मैंने लिखा — “प्यारी है।”

“बस?”

“और क्या लिखूँ?”

“सच लिखो,” रिया ने लिखा।

मैंने लिखा — “ठीक है। बहुत प्यारी है। नथ अच्छी लग रही थी।”

“बस नथ?” रिया ने लिखा, और साथ में एक चिढ़ाने वाला स्माइली।

मैंने लिखा — “आप बताइए।”

और रिया ने लिखा — “रविवार को बताऊँगी। तीन नहीं, चार।”

उस हफ़्ते रिया ने सब कुछ सोच-समझकर किया। पहले नैना से दोस्ती बढ़ाई — लंच साथ, कॉफ़ी साथ, दो बार शाम को मार्केट तक साथ चलीं। फिर एक दिन नैना को घर बुलाया, “काम की बात करनी है” बहाने से।

और उस शाम नैना के जाने के बाद रिया ने मुझे फ़ोन किया।

“वो बहुत प्यारी है,” रिया ने कहा।

“हाँ,” मैंने कहा।

“और वो अकेली है,” रिया ने कहा। “दिल्ली में दो महीने पहले आई है। एक रूम का सेट है उसका, वहाँ कोई नहीं।”

“तो?”

“तो,” रिया ने कहा, “मैंने उसे रविवार को घर बुलाया है। डिनर के लिए। और तुम और कबीर भी आ रहे हो।”

“और उसे पता है?” मैंने पूछा।

“किस बात का?”

“किसी भी बात का,” मैंने कहा।

रिया हँस पड़ीं। “नहीं। बिल्कुल नहीं।”

“तो उसे कैसे पता चलेगा?”

“आदित्य,” रिया ने कहा, “कुछ चीज़ें बताई नहीं जातीं। दिखाई जाती हैं।”

और फिर उन्होंने फ़ोन काट दिया।

मैं उस रात सो नहीं पाया। और कबीर को भी नहीं आया, क्योंकि अगली सुबह वो मुझसे ऑफिस के पैंट्री में मिला और बोला — “रिया ने तुझे भी बताया?”

“हाँ,” मैंने कहा।

“तैयार है तू?” उसने कहा।

“नहीं,” मैंने सच कहा।

“मैं भी नहीं,” उसने कहा। “पर रिया ने कुछ सोचा है। चलने दो।”

रविवार शाम सात बजे नैना आई।

उसने उस दिन साड़ी पहनी थी — हल्के पीले रंग की, ऑर्गैंज़ा, छोटी सी बॉर्डर। बालों में एक छोटा फूल, गले में माँ का दिया हुआ पुराना हार, और वही नथ। साड़ी में वो बिल्कुल औरत लग रही थी — ऑफिस के टी-शर्ट वाले अवतार से बिल्कुल अलग।

दरवाज़े पर खड़ी होकर उसने चारों तरफ़ देखा और बोली — “इतना सुंदर घर है।”

“रिया का है,” मैंने कहा।

“आपका नहीं?” उसने पूछा।

“मैं… मैं और कबीर दोनों आते हैं,” मैंने कहा।

“अच्छा,” उसने कहा, और उसकी आँखों में थोड़ा सा सवाल था — ऐसा सवाल जो वो पूछ नहीं रही थी।

रिया रसोई से निकलीं। उस दिन उन्होंने डार्क रेड रंग की ड्रेस पहनी थी, कमर पर फ़िट, बाल खुले। उन्होंने नैना को गले लगाया, गाल पर किस किया, और बोलीं — “आ गई तू। बैठ।”

कबीर पहले से बैठा था, सोफ़े पर, वाइन का ग्लास हाथ में। उसने नैना को देखा, खड़ा होकर हाथ मिलाया, और बोला — “कबीर। रिया का… पुराना दोस्त।”

“पुराना दोस्त,” नैना ने दोहराया, और हल्का सा मुस्कुराई।

डिनर शुरू हुआ। वाइन, ब्रूस्केटा, पास्ता, और एक मीठी चीज़। बातें होती रहीं — नैना के घर, उसके कॉलेज, उसका शहर, उसकी कला। और जैसे-जैसे रात बढ़ी, और वाइन खत्म हुई, नैना की झिझक कम होती गई।

और रिया ने बात को वहाँ पहुँचाया।

“नैना,” रिया ने कहा, “तूने कभी सोचा है कि एक वक़्त में दो लोगों से प्यार किया जा सकता है?”

नैना ने काँटा रख दिया।

“मतलब?”

“मतलब,” रिया ने कहा, “एक के साथ सोना, और दूसरे के साथ भी। और दोनों को पता हो।”

नैना ने एक पल सोचा। “मैंने सुना है। पढ़ा है। पर मिला कभी नहीं।”

“तो मिल ले,” रिया ने कहा।

और फिर उन्होंने नैना की तरफ़ देखा — सीधा, बिना झिझक — और बोलीं — “नैना, मैं तुझे एक बात बताती हूँ। और तू सुन ले। बाद में जो करना है करना।”

“बोलो,” नैना ने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।

“आदित्य,” रिया ने कहा, “मेरा बॉयफ़्रेंड है। एक साल से।”

नैना ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।

“और कबीर,” रिया ने कहा, “दो साल से मेरा है।”

नैना ने कबीर की तरफ़ देखा। कबीर ने गिलास उठाया और हल्का सा मुस्कुराया।

“और दोनों को पता है?” नैना ने पूछा।

“पता है,” रिया ने कहा। “और दोनों ठीक हैं।”

नैना चुप हो गई। फिर बोली — “और रविवार?”

“रविवार तीनों का,” रिया ने कहा।

“तो मुझे क्यों बुलाया?”

रिया ने गिलास उठाया, एक घूँट लिया, और कहा —

“क्योंकि तेरे आने से अब चार हो जाएँगे।”

कमरे में एक पल के लिए पूरी चुप्पी छा गई।

फिर नैना हँस पड़ी — एक छोटी सी, घबराई हुई हँसी। “मैं सोच रही थी कि तीन लोगों वाले घर में क्यों चार कुर्सियाँ हैं।”

“तो?” रिया ने कहा।

नैना ने अपना गिलास खत्म किया, रखा, और बोली —

“तो और वाइन है?”

वाइन आई। दो गिलास और। और उसके बाद रिया ने बातें बदल दीं — सेक्स की बातें नहीं, बस हल्की-फुल्की। पर हवा में कुछ तैर रहा था।

दस बजे कबीर ने स्पीकर ऑन किया। धीमा जैज़। और रिया उठकर नैना के पास बैठ गईं — इतनी पास कि उनका घुटना नैना के घुटने से छू गया।

और फिर रिया ने नैना के बालों में उँगलियाँ फिराईं।

नैना ने आँखें बंद कर लीं।

“अच्छा लग रहा है?” रिया ने पूछा।

“हाँ,” नैना ने कहा।

“तो आँखें बंद रख,” रिया ने कहा, और फिर उसके गाल पर होंठ रख दिए।

नैना ने एक छोटी सी साँस ली। और रिया ने होंठ आगे बढ़ाकर उसके होंठों पर रख दिए।

वो पहला चुंबन बहुत धीमा था — जैसे कोई नई चीज़ चख रहा हो। रिया ने नैना का निचला होंठ हल्का सा खींचा, फिर ऊपरी, और फिर जीभ से उनके होंठ खोले। नैना ने पहले झिझकी, फिर अपना हाथ रिया की गर्दन पर रख दिया, और मुँह से एक नरम सी आवाज़ निकली।

कबीर ने मेरी तरफ़ देखा। और हम दोनों चुपचाप बैठे देखते रहे।

चुंबन खत्म हुआ। नैना ने आँखें खोलीं, और उनकी आँखें थोड़ी भीगी थीं।

“और अब?” नैना ने धीरे से पूछा।

रिया मुस्कुराईं, और अपनी उँगली नैना के गाल पर फिराते हुए बोलीं —

“अब तेरी बारी। आदित्य को चूम।”

नैना ने मेरी तरफ़ देखा। मैं उठकर उसके पास गया, बैठ गया, और उसका चेहरा हाथों में लिया। वो काँप रही थी — हल्का सा।

“डर रही हो?” मैंने पूछा।

“थोड़ा,” उसने कहा।

“मैं भी,” मैंने कहा, और वो हँस पड़ी।

और फिर मैंने उसे चूमा।

उसके होंठ रिया से छोटे और ज़्यादा नरम थे, और उसके मुँह में वाइन का स्वाद था। वो पहले झिझकी, फिर धीरे-धीरे मेरे साथ हो ली। और जब वो मेरे साथ हो ली, तो उसने मेरी शर्ट की कॉलर मुट्ठी में पकड़ ली — जैसे कहीं गिर न जाए।

अब कबीर।

वो उठा, नैना के सामने घुटनों के बल बैठा, और बोला — “नैना, मैं तुझे चूमूँगा। अगर बुरा लगे तो धक्का देना।”

“अगर अच्छा लगे तो?” नैना ने पूछा।

“तो खींच लेना,” कबीर ने कहा।

और उसने उसे चूमा।

कबीर का चुंबन अलग था — ज़्यादा भरोसेमंद, ज़्यादा ठहरा हुआ, जैसे उसे पता हो कि क्या करना है। नैना ने उसकी गर्दन पकड़ ली और उसे खींच लिया।

और जब वो चुंबन खत्म हुआ, नैना ने आँखें खोलीं और चारों तरफ़ देखा — रिया, मैं, कबीर — और फिर बोली —

“तीनों ने चूम लिया। अब आगे क्या?”

रिया ने उसका हाथ पकड़कर उसे खड़ा किया, और बोलीं —

“अब अंदर।”

बेडरूम में लाइट मद्धम थी। रिया ने बड़ी मोमबत्ती जलाई, और खिड़की की तरफ़ का पर्दा खींच दिया।

नैना बिस्तर के किनारे बैठ गई। रिया उसके पीछे खड़ी हुईं, और उसकी साड़ी का पल्लू उतारने लगीं — धीरे-धीरे, एक-एक तह। और साड़ी जब गिरी, तो नैना सिर्फ़ ब्लाउज़ और पेटीकोट में थी।

नैना दुबली थी — पतली कमर, छोटे पर गोल दूध, और कॉलरबोन पर वो टैटू साफ़ दिख रहा था। उसकी त्वचा रिया से कुछ गहरी थी, और शरीर पर एक-दो तिल भी थे।

रिया ने उसके ब्लाउज़ के हुक खोले। ब्लाउज़ गिरा। और फिर नैना के दूध बाहर आ गए — छोटे, तने हुए, और उनके निपल्स बहुत छोटे और बहुत गुलाबी।

रिया ने पीछे से आकर उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा।

नैना ने सिर पीछे किया और आँखें बंद कर लीं।

“छोटे हैं ना?” नैना ने धीरे से कहा।

“सुंदर हैं,” रिया ने कहा, और उसके निप्पल को अँगूठे और उँगली के बीच दबाया। नैना का पूरा शरीर काँप गया।

“आदित्य,” रिया ने कहा। “आ जाओ।”

मैं सामने आया, नैना के सामने घुटनों पर बैठा, और उसका एक निप्पल होंठों में लिया।

जैसे ही मेरी जीभ उस पर लगी, नैना ने मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और ज़ोर से साँस ली। उसका निप्पल मेरे मुँह में सख़्त हो गया। मैंने उसे चूसा, दाँतों से हल्का काटा, और जीभ से गोल घुमाया। दूसरी तरफ़ रिया उसके दूसरे दूध को हाथ में भरकर दबा रही थीं।

नैना बीच में थी, और दोनों तरफ़ से भरी हुई।

“ओह…” वो बस इतना कह पा रही थी।

फिर रिया ने उसकी पेटीकोट और पैंटी नीचे खींची। नैना पूरी नंगी हो गई।

कबीर दरवाज़े के पास खड़ा देख रहा था। रिया ने उसे देखा और इशारा किया। वो आया, नैना के पैर फैलाए, और नैना की बुर के सामने घुटनों पर बैठ गया।

नैना की बुर छोटी और साफ़ थी, और अब तक गीली हो चुकी थी।

कबीर ने जीभ से पहला स्पर्श किया — हल्का, ऊपर से नीचे — और नैना की कमर उठ गई।

“आह्ह्ह…” उसने ज़ोर से कहा।

और फिर कबीर उसे चाटने लगा — धीरे, फिर तेज़, जीभ से गोल-गोल, और उँगली अंदर डालकर।

नैना ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बहुत ज़ोर से दबाया। उसकी आँखें बंद थीं, होंठ खुले थे, और वो लगातार कराह रही थी — बिना शर्म के, बिना रुकने के।

पाँच मिनट में ही वो आई।

उसका पूरा शरीर झटके खाने लगा, जाँघें कबीर के सिर पर कस गईं, और उसने एक लंबी, टूटती आवाज़ निकाली — जैसे कोई पहली बार किसी चीज़ तक पहुँचा हो।

और शायद वो सच में पहली बार था।

वो हाँफती हुई बिस्तर पर पड़ी रही। रिया उसके पास लेट गईं और उसके बालों में उँगलियाँ फिराने लगीं।

“कैसा लगा?” रिया ने पूछा।

नैना ने आँखें खोलीं। एक पल चुप रही। और फिर बोली —

“और चाहिए।”

उसके बाद रात ने अपना रास्ता खुद बना लिया।

नैना ने उठकर मेरी शर्ट के बटन खोले, फिर कबीर की। और फिर हम दोनों को बिस्तर पर बिठाकर, हमारे सामने घुटनों पर बैठ गई, और दोनों को एक-एक करके हाथ में लिया।

उसने पहले मेरा लंड होंठों में लिया। फिर कबीर का। और फिर दोनों को एक-साथ हाथ में रखकर तुलना करने लगी — जैसे कोई डिज़ाइनर दो फ़ॉन्ट्स की तुलना कर रहा हो।

“अलग हैं,” उसने कहा।

“अच्छा?” कबीर ने कहा।

“आपका मोटा है,” नैना ने कहा। “और आदित्य का लंबा।”

“और तुझे क्या चाहिए?” रिया ने पीछे से पूछा, जो अब तक हमें देख रही थीं।

नैना ने दोनों को छोड़ा और पीछे देखा। और फिर बोली —

“दोनों।”

रिया हँस पड़ीं और पास आकर नैना के पीछे बैठ गईं।

“तो ले,” रिया ने कहा। “पर पहले तू बताएगी कि किसके साथ शुरू करना है।”

नैना ने मेरी तरफ़ देखा।

“आदित्य,” उसने कहा। “पहले वो।”

मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। उसके पैर फैलाए। अपने लंड को उसकी बुर के होंठों पर रखा, दो-तीन बार ऊपर-नीचे रगड़ा, और फिर धीरे से अंदर डाला।

नैना तंग थी। बहुत तंग। उसने ज़ोर से साँस ली और अपनी जाँघें मेरी कमर पर कस लीं।

“दर्द?” मैंने पूछा।

“थोड़ा,” उसने कहा। “रुक मत।”

मैंने धीरे-धीरे धक्के मारने शुरू किए — लंबे, गहरे, बिना जल्दी। और हर धक्के पर वो मेरी तरफ़ और खुलती गई।

और तभी रिया ने अपनी जगह बनाई।

वो नैना के ऊपर झुकीं, नैना की गर्दन चूमने लगीं, फिर उसके निपल्स, और फिर उन्होंने नैना का चेहरा पकड़कर उसे चूमा — जबकि मैं अंदर-बाहर हो रहा था।

नैना के शरीर में तीन जगह काम चल रहा था — अंदर मैं, ऊपर रिया, और उसका दिमाग़ जो दोनों को एक साथ झेल रहा था।

“आदित्य…” वो बोली, रिया के होंठों के बीच से।

“हाँ।”

“और तेज़।”

मैंने तेज़ कर दिया।

दस मिनट बाद वो फिर आई — इस बार चीखती हुई, मेरी पीठ पर नाखून गड़ाती हुई।

फिर कबीर।

नैना ने करवट ली। कबीर ने पीछे से अंदर डाला, और उसकी मोटाई ने नैना को पहले झटका दिया — वो पूरी तरह रुक गई, और फिर धीरे-धीरे उसके शरीर ने उसे लेना शुरू किया।

“भर गई,” नैना ने हाँफते हुए कहा।

“अच्छा लगा?” कबीर ने कहा।

“हाँ… और करो।”

और इस बार रिया ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया और मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया। और हम दोनों नैना के सामने बैठ गए — मैं और रिया — और रिया ने मुझे चूमना शुरू किया, जबकि कबीर पीछे नैना को चोद रहा था।

नैना हम दोनों को चूमते देख रही थी। और वो और ज़ोर से कराहने लगी।

“तुम दोनों…” वो बोली। “तुम दोनों ऐसे क्यों कर रहे हो…”

“क्योंकि तेरे सामने है,” रिया ने कहा, और मुझे और गहरा चूमा।

और नैना उसी पल फिर आ गई — तीसरी बार।

कबीर ने उसे निकालकर उसकी पीठ पर छोड़ दिया। और नैना बिस्तर पर गिर पड़ी, पूरी पसीने में, पूरी हाँफती हुई।

रिया उसके पास लेट गईं और उसे अपनी बाँहों में लिया।

“कैसी हो?” रिया ने पूछा।

नैना ने कुछ सेकंड लिया। फिर बोली — “मुझे पता नहीं था कि ऐसा होता है।”

“ऐसा होता है,” रिया ने कहा।

“और मुझे भी चाहिए,” नैना ने कहा। “हर हफ़्ते।”

रिया ने उसके माथे पर होंठ रखे और कहा —

“तो हर हफ़्ते आ जाना।”

उस रात हम तीनों ने नैना को बीच में ले लिया।

कबीर एक तरफ़, मैं दूसरी तरफ़, और रिया सबसे ऊपर — जैसे कोई चार लोगों का ज्यामिति। हमने नैना को बारी-बारी लिया, फिर साथ, और फिर उसे बीच में रखकर हमने उसे इतना टूटा कि वो आख़िर में बोल पड़ी — “अब और नहीं… बस सो जाओ…”

पर सोने से पहले रिया ने कुछ किया।

वो उठीं, अपनी अलमारी से एक काग़ज़ निकाला — वही काग़ज़ जिस पर छह महीने पहले हमने नियम लिखे थे — और नैना के सामने रख दिया।

“पढ़,” रिया ने कहा।

नैना ने पढ़ा। ऊपर से नीचे। और फिर सिर उठाकर रिया को देखा।

“ये क्या है?” नैना ने पूछा।

“नियम,” रिया ने कहा।

“मेरे लिए भी?”

“तेरे लिए भी,” रिया ने कहा। “अगर तू चाहे तो।”

नैना ने एक पल उस काग़ज़ को देखा। फिर पेन उठाया। और नीचे अपना नाम लिख दिया — नैना वर्मा।

और फिर सोचकर ऊपर एक लाइन जोड़ दी, अपने हाथ से —

“सात — कोई भी किसी से जल जाए तो उसी रात बता देगा। और कोई भी किसी को बाहर नहीं करेगा।”

रिया ने उसे पढ़ा और मुस्कुराईं।

“समझदार लड़की है,” उन्होंने कहा।

और फिर चारों ने उस रात एक ही बिस्तर पर सोया — नैना और रिया बीच में, मैं और कबीर किनारों पर। और सुबह जब उठे, तो नैना ने पहली बात यही कही —

“अगला रविवार कब है?”

नैना के आने के बाद तीन हफ़्ते बहुत तेज़ी से गुज़रे। अब हम चार थे — और चार होने के बाद चीज़ें अजीब तरीक़े से और आसान हो गईं। घर में चार लोगों की हँसी थी। रसोई में चार हाथ। बिस्तर पर चार शरीर। और हर कोई अपनी जगह जानता था।

पर चौथे हफ़्ते में रिया ने एक शाम सबको बुलाया — मुझे, कबीर को, और नैना को। और बोलीं — “आज सेक्स नहीं। आज बात।”

हम बैठ गए।

रिया ने चाय बनाई। चार कप। और फिर सामने बैठकर बोलीं —

“मैंने ऑफिस छोड़ने का फ़ैसला किया है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“क्यों?” मैंने पूछा।

“क्योंकि,” रिया ने कहा, “अब ये सब और नहीं चलेगा। मैं HR हूँ, तुम जूनियर हो, कबीर टीम लीड है, नैना भी उसी कंपनी में है। चार लोग, एक ऑफिस, और हर कोई हर किसी से छिपा रहा है। अब इसे ठीक से करना है।”

“तो तुम जॉब क्यों छोड़ रही हो?” कबीर ने पूछा। “मैं छोड़ सकता हूँ।”

“क्योंकि तुम्हारा काम बड़ा है,” रिया ने कहा। “और आदित्य का अभी शुरू हुआ है — उसे छोड़ना नहीं चाहिए। नैना भी नई है। तो मैं।”

“और तुम क्या करोगी?” नैना ने पूछा।

“HR कंसल्टिंग शुरू करूँगी,” रिया ने कहा। “घर से। अपना। और वैसे भी,” उन्होंने आसपास देखा, “अब यहाँ कुछ ऐसा बन गया है जिसे सँभालना है।”

फिर उन्होंने एक और बात कही। और ये असली फ़ैसला था।

“आदित्य,” उन्होंने कहा, “मैं तुझसे शादी करना चाहती हूँ।”

मेरा हाथ काँप गया। चाय का कप टेबल पर रख दिया।

“लेकिन शर्त है,” रिया ने कहा। “शादी के बाद भी ये सब चलेगा। कबीर रहेगा। नैना रहेगी। और जो और आए, वो भी। अगर तुझे एक ‘नॉर्मल’ शादी चाहिए, तो बता दे।”

मैं एक पल चुप रहा।

और फिर बोला — “नॉर्मल शादी में इतनी मज़ा कहाँ आती है?”

रिया हँस पड़ीं। और उनकी आँखें भर आईं।

“और तुम, कबीर?” रिया ने पूछा।

कबीर ने कंधे उचकाए। “मुझे तेरी शादी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मुझे तेरी ज़रूरत है, काग़ज़ नहीं।”

“और तू, नैना?” रिया ने पूछा।

नैना ने अपनी चाय खत्म की, कप रखा, और बोली —

“मुझे तो बस रविवार चाहिए।”

और रिया ने तीनों को देखा — और फिर बोलीं —

“तो तय है।”

अगले महीने रिया ने रिज़ाइन दे दिया।

आख़िरी दिन ऑफिस में उन्होंने सबको केक खिलाया, टीम के साथ फ़ोटो खिंचवाईं, और भाषण में बोलीं — “यहाँ तीन साल बहुत अच्छे रहे। और यहाँ से मुझे कुछ ऐसा मिला जो मैंने उम्मीद भी नहीं की थी।”

और मैंने और कबीर ने और नैना ने नीचे बैठे-बैठे एक-दूसरे को देखकर होंठ काटे।

उस रात चारों ने घर पर खाना बनाया और देर तक बैठे रहे। और रिया ने कहा — “अब ऑफिस की सीमा खत्म। अब जो करना है करो।”

तो हमने किया।

और उस रात पहली बार हम चारों ने बिना किसी छिपाव के, बिना किसी नियम के, बिना किसी हिसाब के एक-दूसरे को लिया — जितना मन किया, जैसे मन किया।

सुबह चार बजे, जब सब थके पड़े थे, रिया ने कहा —

“आदित्य।”

“हम्म।”

“अगली कहानी किसकी है?”

मैंने आँखें खोलीं। “क्या मतलब?”

“मतलब,” रिया ने कहा, “हम चार हैं। पर दुनिया बड़ी है। और तेरी उम्र बीस है।”

“तो?” मैंने पूछा।

“तो,” रिया ने कहा, और मेरी छाती पर सिर रख दिया, “सोचना शुरू कर। अगली बार किसको बुलाना है।”

नैना ने आँखें बंद किए हुए ही कहा — “ऑफिस में एक इंटर्न आया है।”

कबीर ने करवट बदली। “फिर से?”

“फिर से,” नैना ने कहा।

और रिया हँस पड़ीं — इतनी ज़ोर से कि पूरा कमरा जाग गया।

अगला भाग होगा — इंटर्न, पाँच लोग, और वो पहली रात जिसमें रिया खुद नहीं, नैना सब चलाएगी। साथ ही एक सवाल जो अब तक नहीं उठा — कि जब पाँच हो जाएँ, तो क्या कोई बाहर रह जाएगा? और रिया की शादी की तारीख़ तय होने के साथ एक नई उलझन — घर वाले, और वो सच जो उन्हें बताना है।

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नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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