friend mother sex story
मेरा नाम सुनील है। उम्र बीस साल। कद पाँच फुट दस इंच। रीवा, मध्य प्रदेश का एक साधारण सा लड़का — न ज़्यादा अमीर, न ज़्यादा गरीब, न बहुत तेज़, न बहुत धीमा। बस एक साधारण सा लड़का, जिसके पास एक असाधारण चीज़ थी — उसका लंड।
नौ इंच से भी आधा इंच ज़्यादा, मोटा, भारी, और जब खड़ा होता तो पैंट के अंदर छुपाना मुश्किल पड़ जाता। इसी लंड की वजह से मेरी सारी कहानी शुरू हुई — और इसी की वजह से एक दिन वो पूरी होने वाली थी।
मेरा एक दोस्त है बृजेश। हम बचपन से साथ पढ़े हैं। उसका घर मेरी गली से तीन गलियाँ आगे है — पुरानी रीवा के उस हिस्से में जहाँ आज भी घरों के आँगन में तुलसी का चौरा है और दीवारों पर पीली हो चुकी फोटो टँगी रहती हैं।
बृजेश के पिता जी, रमेश भैया, सूरत की एक कपड़ा मिल में काम करते हैं। साल में दो बार आते हैं — होली पर और दिवाली पर। बाकी ग्यारह महीने उस घर में बस एक औरत रहती है, अकेली, अपने बेटे के साथ — और वो औरत है बृजेश की माँ, रेखा आंटी।
आंटी की उम्र अड़तीस के आस-पास होगी। गोरा रंग, घने काली आँखें, माथे पर छोटी सी बिंदी, हाथों में हमेशा लाल चूड़ियाँ। उनका शरीर वो शरीर था जो गाँव-कस्बे की औरतों में अक्सर देखने को मिलता है — पूरा भरा हुआ, कसा हुआ, ऊपर से नीचे तक एक ही जैसा।
साड़ी के नीचे उनका पेट थोड़ा गोल, कमर से नीचे फैलती हुई गांड, और ब्लाउज़ में ठुँसा हुआ भारी दूध भरा जोड़ा — दोनों स्तन इतने बड़े कि ब्लाउज़ कभी उन्हें पूरा ढक ही नहीं पाता था। जब वो झुकतीं, तो ब्लाउज़ के किनारे से दूध का सफेद किनारा दिखने लगता, और जब सीधी खड़ी होतीं, तो ब्लाउज़ के ऊपर दो उभार साफ़ झलकते — बिना ब्रा के, क्योंकि उस घर की गर्मी में उन्हें ब्रा पहनना पसंद नहीं था।
मैं बचपन से उस घर आता-जाता हूँ। पहले तो आंटी मुझे बस बृजेश का दोस्त समझती थीं — “आ जा बेटा, खाना खा ले”, “पानी पी ले, धूप में मत घूम”। फिर धीरे-धीरे, जब मैं पंद्रह का हुआ और घर में पहली बार केबल टीवी पर रात को चुदाई वाले चैनल चलने लगे, तब से मेरी नज़र में आंटी बदलने लगीं।
वो अब बस बृजेश की माँ नहीं रह गई थीं। वो एक औरत बन गई थीं — एक ऐसी औरत जिसके स्तन, जिसकी गांड, जिसकी बुर, और जिसकी चूत के बारे में मैं रात-रात भर सोचता रहता।
पंद्रह साल की उम्र में पहली बार जब मैंने आंटी को गीले कपड़ों में देखा — सावन के महीने में, छत पर कपड़े सुखाते हुए, बारिश में भीगी हुई साड़ी शरीर से चिपकी हुई — तब मेरा लंड पहली बार बिना किसी वजह के, सिर्फ़ उन्हें देखकर खड़ा हो गया था। मैंने उसे पैंट के अंदर समेटने की कोशिश की, लेकिन उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि मेरे पास जो है, वो साधारण नहीं है।
उसके बाद मैंने आंटी को पटाने की कोशिशें शुरू कर दीं। लेकिन सच कहूँ तो मेरी सारी कोशिशें बच्चों वाली थीं। मैं उनके लिए बाज़ार से कचौड़ी लेकर आता, “आंटी, आपके लिए लाया हूँ” कहकर मेज़ पर रख देता।
वो मुस्कुरा कर कहतीं, “अरे बेटा, अपने लिए लाता तो अच्छा लगता, हमें क्या ज़रूरत।” मैं उनकी साड़ी की तारीफ़ करता — “आंटी आज साड़ी बहुत अच्छी है” — तो वो हँसकर कहतीं, “अरे ये तो पुरानी है, तू क्या जाने साड़ी क्या होती है।” मैं कूलर ठीक करने, पंखा साफ़ करने, बक्से उठाने में हाथ बटाता।
वो कहतीं, “बड़ा भला लड़का है रे, बृजेश जैसा ही।” बस — “बृजेश जैसा ही”। मतलब मैं उनके लिए बृजेश का दोस्त, एक बच्चा, एक भला लड़का — औरत का दिल जीतने वाला मर्द नहीं।
दो साल यही चला। सोलह, सत्रह, अठारह — हर बार मैं कोई न कोई बहाना बनाता, वो बहाना बच्चों वाला ही रहता। आंटी हँसकर टाल देतीं।
कोई गलती नहीं करतीं, कोई इशारा नहीं देतीं, किसी चीज़ का “लाइफ़” नहीं करतीं — यानी मेरी किसी भी बात को वो तवज्जो ही नहीं देतीं जिससे लगे कि वो समझ गईं और शरमा गईं। वो बस एक बड़ी बहन की तरह सिर पर हाथ फेर देतीं और मैं पस्त होकर लौट आता।
फिर मैं उन्नीस का हुआ। और उस साल मेरे शरीर ने वो किया जो तीन साल की कोशिशें नहीं कर पाई थीं। कॉलेज के साथ-साथ मैंने एक छोटे से जिम में जाना शुरू किया — बस दो घंटे रोज़, लेकिन काफ़ी था।
मेरे कंधे चौड़े हो गए, बाज़ुओं में नसें उभर आईं, छाती फैल गई, और जब मैं कमीज़ उतारता तो पेट पर सीधी लकीरें दिखतीं। मूँछ भी आ गई थी — पतली, बस ऊपर के होंठ के किनारे, लेकिन काफ़ी थी चेहरे से बचपन हटाने के लिए। अब मैं बृजेश का “भला लड़का” दोस्त नहीं, एक जवान आदमी था।
और आंटी ने वो नोटिस करना शुरू कर दिया। यही सबसे प्यारी बात थी — उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं, लेकिन आँखें कहने लगीं। जब मैं कमीज़ के बटन खुले हुए बैठता, उनकी नज़र मेरी छाती पर एक सेकंड ज़्यादा रुक जाती।
जब मैं पानी लेने के लिए फ्रिज तक जाता, वो पीछे से मेरे कंधों को देखतीं — मुझे एहसास होता, चाहे वो तुरंत नज़र हटा लेतीं। खाना देते वक्त अब वो एक नहीं, तीन रोटियाँ थाली में रखतीं, और एक दिन कह दिया — “तू तो बड़ा मर्द लगने लगा है, कसरत करता है क्या?” मैंने कहा, “आपको अच्छा लगता है?” वो हँस पड़ीं और बोलीं, “अच्छा नहीं लगेगा तो क्या, बेटे की तरह ही तो देखते हैं।” फिर भी, उस दिन बात करते वक्त उन्होंने मेरी बाँह को एक बार छुआ — बस उँगलियों से, जैसे गलती से — और मैं उस एक स्पर्श को पूरे तीन दिन महसूस करता रहा।
एक दिन ऐसा भी आया जब हम दोनों छत पर अकेले थे। आंटी ने मुझसे कहा था कि पानी की टंकी का ढक्कन उतार देना, पंप चल गया है। मैं सीढ़ी पर चढ़ा, वो नीचे खड़ी थीं, कमर पर हाथ रखे। जब मैं ढक्कन खोलकर उतरा, तो पैर फिसला और मैं सीढ़ी से गिरा — गिरा नहीं, उछलकर उतरा, और सीधे उनके सामने जा लगा। दोनों हाथ उनकी कमर पर, चेहरा उनके चेहरे से चार इंच दूर।
उनका दूध से भरा जोड़ा मेरी छाती से दबा। उन्होंने हड़बड़ा कर मुझे पकड़ा और पहली बार हमारी आँखें सीधी मिलीं — दो-तीन सेकंड के लिए, बस।
फिर उन्होंने हाथ हटाया, पल्लू ठीक किया और कहा, “अरे, ध्यान से उतरता है, गिर जाता तो!” आवाज़ में वो कंपन था जो पहले कभी नहीं था। मैंने भी आवाज़ नहीं निकाली, बस वहीं खड़ा रह गया।
उस दिन मैं घर लौटा तो मेरी पैंट में सबसे कसी हुई जगह थी और दिल धक-धक कर रहा था। अब मुझे यकीन हो चला था — बात एक तरफ़ा नहीं थी।
बीच में बृजेश हमारी बातों में आ जाता था। हम तीनों बैठते, चाय पीते, हँसते। लेकिन जब बृजेश सामने होता, आंटी का व्यवहार फिर वैसा ही “माँ” वाला हो जाता — पूरा नियंत्रण। मैं समझ गया था कि बृजेश के सामने वो कभी कुछ नहीं होने देंगी। मौका चाहिए था — बिना बृजेश का, बिना पड़ोस की आँखों का, बिना किसी बहाने का।
मौका पिछले साल अगस्त में आया। सावन-भादों का महीना, रीवा में लगातार बारिश, और बृजेश के नाना के यहाँ सतना में एक शादी। बृजेश तीन दिन के लिए जाने वाला था और दूसरे दिन दोपहर की बस से निकलने वाला था।
उसने मुझे बोला भी, “चल ना साथ।” मैंने कहा, “भाई, तीन दिन का क्या करूँ, रोज़गार का सवाल है” — जबकि असली वजह यही थी कि मैं उस घर में अकेली आंटी के साथ रुकना चाहता था। बृजेश हँसा और बोला, “ज्यादा मत बोल। माँ को बोल दूँगा कि तू आए तो दाल-चावल दे देना।”
वो दिन आया। बृजेश अपना बैग लेकर निकला। दरवाज़े पर मैं भी खड़ा था। आंटी ने उसे चौकी तक छोड़ा, और लौटकर आते हुए मुझसे कहा, “तू भी जा रहा है क्या साथ?” मैंने कहा, “नहीं आंटी, मैं तो आपको अकेला छोड़कर कैसे जाऊँ। तीन दिन में ज़रूरत पड़े तो कोई तो हो।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — एक लंबी नज़र — और बस इतना कहा, “हाँ… अकेले रहना ठीक नहीं लगता।”
बस उतना ही चाहिए था।
शाम को बारिश शुरू हुई। मैं उनके घर के दरवाज़े पर खड़ा था, छाता लेकर। बिजली जाते-जाते एक बार गई, फिर आई, फिर दोबारा गई और अंधेरा हो गया — पूरी गली में। बाहर पानी की धार, अंदर सन्नाटा। आंटी ने भीतर से आवाज़ दी, “सुनील, अंदर आ जा, बाहर खड़ा है क्या बरसात में।” मैंने छाता बंद किया और भीतर आया।
वो रसोई में थी, एक मोमबत्ती जलाकर रखी हुई थी — पीली, काँपती, हवा से कभी झुकती, कभी सीधी। चूल्हे की लौ से उनका चेहरा नारंगी दिख रहा था। गीली साड़ी में वो एक बार फिर थीं — आज की बारिश में भीगकर छत से उतरी थीं। साड़ी की गांठ कमर पर थोड़ी ढीली पड़ी थी और ब्लाउज़ कंधों से सरककर दूध भरे स्तनों पर तन रहा था। भीगे कपड़े से दोनों निप्पल साफ़ उभरे हुए दिख रहे थे।
उन्होंने मुझे देखकर कहा, “बैठ जा। चाय बना रही हूँ।” मैं बैठ गया — खाट पर, मोमबत्ती के बिल्कुल सामने। वो चाय बनाती रहीं और मैं बस उन्हें देखता रहा। उन्हें पता था कि मैं देख रहा हूँ, इसीलिए कभी चूल्हे की तरफ़ देखतीं, कभी बर्तन, कभी बाहर की बारिश — जान-बूझकर मेरी तरफ़ नहीं। चाय बनाकर वो मेरे पास आई और गिलास मेरे हाथ में रखने लगी।
तभी हवा का एक तेज़ झोंका आया, मोमबत्ती बुझ गई और साड़ी का पल्लू उनके कंधे से फिसलकर नीचे गिर गया। अंधेरे में उन्होंने “अरे!” कहकर हाथ आगे बढ़ाया और मेरा हाथ पकड़ लिया — गर्म हाथ से मेरा हाथ।
अंधेरे में मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। उन्होंने भी नहीं छोड़ा। पूरे दस सेकंड हम दोनों वैसे ही बैठे रहे — मेरा हाथ उनकी उँगलियों में, उनका साँस मेरे चेहरे पर। फिर मैंने धीरे से कहा, “आंटी…” और वो मुड़ गईं।
“मोमबत्ती जलाऊँ…” उन्होंने कहा, आवाज़ बहुत धीमी।
“अभी रहने दीजिए,” मैंने कहा और उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपनी तरफ़ खींच लिया।
वो खाट के किनारे बैठ गईं, मेरे बिल्कुल पास। उनका घुटना मेरे घुटने से छू रहा था। पल्लू अभी भी कंधे से गिरा हुआ था, सिर्फ़ ब्लाउज़ और साड़ी का किनारा बचा था। बाहर बारिश एक ही लय में गिर रही थी — जैसे कोई ढोल बजा रहा हो, बहुत धीरे।
“आपको पता है,” मैंने कहा, “मैं पंद्रह साल से आपको देखता आ रहा हूँ।”
“पंद्रह साल…” वो हँसीं, “और अभी बता रहा है।”
“पहले हिम्मत नहीं थी।”
“अब आ गई?”
“आ गई।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस सिर झुका लिया — इतना कि उनका माथा मेरे कंधे को छूने लगा। मैंने हिम्मत करके अपना हाथ उनकी कमर पर रखा। गीली साड़ी के नीचे उनकी कमर गर्म थी। मेरी उँगलियाँ कमर के ऊपर से सरककर पीठ तक गईं और वो एक बार साँस भरकर रुक गईं, जैसे कोई बहुत दिनों का बोझ उतर रहा हो।
“रमेश भैया कब आए थे आख़िरी बार?” मैंने पूछा।
“दिवाली पर।”
“और अब कितने महीने?”
“नौ।” उन्होंने सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा और कहा, “नौ महीने, सुनील। औरत के लिए नौ महीने बहुत होते हैं।”
मैंने उनका चेहरा दोनों हाथों में लिया। उनका चेहरा छोटा सा, गर्म, और आँखों में पानी। मैंने उनका माथा चूमा — फिर भौंहें, फिर आँखों के कोने, फिर गाल। वो आँखें बंद किए बैठी रहीं, होंठ काँप रहे थे। जब मेरे होंठ उनके होंठ पर पहुँचे तो उन्होंने खुद आगे आकर मुँह खोल दिया।
पहला चुंबन धीमा था — नाम का चुंबन, बस। दूसरा भूखा था। मैंने उनके होंठ चूसकर अपने मुँह में लिए और वो मेरी जीभ पर अपनी जीभ ले आईं। उनके मुँह में अदरक वाली चाय की महक थी और उनकी जीभ गीली, नरम, और हैरान करने वाली तेज़ थी। उन्होंने मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर और नीचे खींच लिया — जैसे कह रही हों, अब पीछे मत हटना।
हम चूमते रहे। बारिश बाहर, चूल्हे की धीमी लौ अंदर, और खाट पर दो शरीर एक-दूसरे में धँसते हुए। मेरा हाथ उनकी कमर से सरककर उनकी गांड पर गया।
भरी हुई, गोल, भारी गांड — जब मैंने पूरी हथेली से उसे दबाया तो उन्होंने मेरे होंठों में “म्म्म्ह” करके आवाज़ दी और मेरी जीभ ज़ोर से चूसी। मैंने उनकी गांड दबाते हुए उसे ऊपर-नीचे सहलाया, और वो मेरी गोद में और आगे खिसक आईं।
फिर मेरा हाथ उनकी पीठ से ऊपर गया, ब्लाउज़ के हुक तक। मैंने एक हुक खोला, दूसरा खोला। ब्लाउज़ ढीला पड़ा और मैंने उसे कंधों से नीचे सरका दिया। उनका दूध से भरा जोड़ा बाहर आ गया — पूरा, खुला, बिना किसी बंधन के।
अंधेरे में भी उनके स्तनों का सफ़ेद रंग दिख रहा था, और निप्पल कसे हुए, गहरे, भूरे-गुलाबी। भारी स्तन गुरुत्व से थोड़े झुके हुए थे और उनके नीचे की त्वचा पर बारीक नसें झलक रही थीं।
मैंने दोनों हाथों में एक-एक स्तन भर लिया। इतना दूध, इतना वज़न कि मेरी हथेलियाँ उन्हें पूरा नहीं पकड़ पाईं — माँस हथेली से बाहर निकल आया। मैंने उन्हें उठाया, दबाया, और नीचे से ऊपर की तरफ़ मालिश की। आंटी ने सिर पीछे करके आँखें बंद कर लीं और होंठ खुले छोड़ दिए।
“इतना दूध…” मैंने फुसफुसाया।
“बेटा बड़ा हो गया,” उन्होंने कहा, आवाज़ लड़खड़ाती हुई, “अब कोई पीने वाला नहीं।”
“आज पीने वाला मिल गया।”
उन्होंने आँखें खोलकर मुझे देखा और हँसी — वो हँसी जो औरत तभी हँसती है जब उसका शरीर उसके दिमाग़ से पहले जवाब दे चुका हो। फिर उन्होंने खुद अपने एक निप्पल को उँगली से दबाकर ऊपर उठाया — जैसे मुझे बुला रही हों।
मैंने मुँह बढ़ाकर उसे होंठों में भर लिया। जैसे ही मेरी जीभ निप्पल पर लगी, वो पूरी कमर झुका कर मेरी तरफ़ आ गईं और मेरे बालों में हाथ डालकर मेरा सिर दबाया। मैंने निप्पल चूसा, दाँतों से हल्का काटा, जीभ से ऊपर-नीचे किया। वो “आह… आह…” करके धीरे-धीरे कराहने लगीं। जब मैंने एक स्तन चूसते हुए दूसरे के निप्पल को उँगलियों से रगड़ा, तो उन्होंने मेरा सिर पकड़कर अपनी छाती में और ज़ोर से दबा दिया — इतना कि मेरा मुँह दूध में धँस गया। दोनों निपल्स सख़्त होकर मेरी जीभ और उँगलियों के नीचे तड़पते रहे।
मैं उन्हें खाट पर लिटा दिया। साड़ी की गांठ खोली और साड़ी का सारा पल्लू उतारकर फ़र्श पर गिरा दिया। अब उनके शरीर पर सिर्फ़ पेटीकोट था — कमर से ऊपर सब खुला। उन्होंने शरमाकर हाथ से पेट ढकने की कोशिश की, लेकिन मैंने हाथ हटा दिया और पेट पर होंठ रख दिए। नाभि पर, कमर के दोनों तरफ़, और फिर पेटीकोट की नाड़ी के ऊपर।
“सुनील…” उन्होंने कहा, “मोमबत्ती…”
“बुझी है।”
“कोई आ जाए तो?”
“बारिश में कौन आएगा, आंटी।”
वो मान गईं। और मैंने पेटीकोट की नाड़ी खींच दी। कपड़ा सरककर नीचे गया और उनकी बुर सामने आ गई — घने, काले, थोड़े सफ़ेद मिले बालों के बीच, भरी हुई, गीली, और उभरी हुई। उनके जाँघों की जड़ में पसीना चमक रहा था।
मैंने उँगली बुर पर रखी और धीरे से ऊपर से नीचे खींची। आंटी की पूरी कमर उठ गई। मैंने वो गीलापन उँगली पर लिया और उसे ऊपर लाकर उनके निप्पल पर लगा दिया, फिर झुककर बुर को मुँह लगा दिया।
जैसे ही मेरी जीभ उनकी चूत के दोनों होंठों के बीच फिसली, उन्होंने दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़ लिया और एक लंबी, काँपती हुई “आह्ह्ह…” निकाली — वो आवाज़ जो औरत सालों बाद निकालती है। उनकी चूत का स्वाद नमकीन और गर्म था। मैंने जीभ से ऊपर-नीचे किया, होंठों से होंठ चूसे, और फिर जीभ का सिरा अंदर घुसाकर ऊपर-नीचे हिलाया। उनकी गांड खाट पर उठ-उठकर गिरने लगी। मैंने एक हाथ नीचे लाकर उनकी गांड के नीचे से पकड़ा और दूसरे हाथ से उनकी चूत के ऊपर वाली गांठ को उँगली से सहलाने लगा।
“अरे राम… अरे राम…” वो बड़बड़ाने लगीं, “रुक जा… रुक जा बेटा… मर जाऊँगी…”
मैंने रुकते हुए पूछा, “मरने दीजिए।”
“नहीं… मतलब… ऐसे ही कर… ऐसे ही…”
मैंने वही किया। जीभ तेज़, उँगली ऊपर वाली गांठ पर गोल-गोल, और दूसरा हाथ उनकी गांड दबाता हुआ। उनकी चूत से रस बहकर मेरी ठुड्डी तक आ गया। जब उनकी साँस टूटने लगी और पैर मेरे कंधों पर कसने लगे, तब मैंने एक उँगली अंदर डाल दी। चूत इतनी गीली थी कि उँगली बिना ज़ोर के अंदर सरक गई, और अंदर से उन्होंने उसे ऐसे दबाया जैसे पकड़ रही हों।
“और… और डाल…” उन्होंने कहा।
मैंने दूसरी उँगली भी डाल दी और दोनों को अंदर-बाहर करने लगा, साथ में जीभ ऊपर वाली गांठ पर जमाए हुए। दस-बारह बार के अंदर-बाहर के बाद उनका पूरा शरीर एक झटके में सख़्त हो गया, गांड खाट से उठ गई, और वो लंबी कराह के साथ निकल गईं — मेरी उँगलियों पर, मेरी जीभ पर, मेरी ठुड्डी पर। मैंने उँगलियाँ अंदर ही रखीं और उनके झटके खत्म होने का इंतज़ार किया। जब वो ढीली पड़ीं, तब मैंने उँगलियाँ निकालीं और उन्हें चूमकर ऊपर आ गया।
वो हाँफ रही थीं, आँखें बंद, चेहरा लाल। कमरे में बारिश की महक और उनकी चूत की महक मिल गई थी।
मैंने अपनी कमीज़ उतारी और पैंट का बटन खोला। जब पैंट नीचे गई और बॉक्सर में तना हुआ लंड बाहर आया, तो आंटी ने आँखें खोलकर देखा और एक बार पूरी तरह स्तब्ध रह गईं।
“ये… इतना बड़ा?”
मैं हँसा। “नौ और आधा।”
“नौ और आधा इंच?!” उन्होंने उठकर बैठते हुए कहा, “सुनील, तू तो मुझे फाड़ डालेगा।”
“आराम से करूँगा।”
उन्होंने हाथ बढ़ाकर बॉक्सर के ऊपर से लंड को छुआ — पहले डर से, फिर दोनों हाथों से पूरी लंबाई नापते हुए। उनकी उँगलियाँ ऊपर से नीचे तक गईं और फिर वो रुक गईं, जैसे यकीन नहीं हो रहा हो। “रमेश का तो आधा है,” उन्होंने बिना सोचे कह दिया, और फिर शरमाकर मुँह फेर लिया।
मैंने बॉक्सर उतार दिया। लंड खुला होकर झूल गया, एक बार मेरे पेट पर लगा। उन्होंने उसे हाथ में लिया और धीरे से ऊपर-नीचे करने लगीं। अंगूठे से सिरे पर फैला हुआ पानी फैलाया और फिर उसे अपनी चूत पर लगाने के लिए खींचने लगीं।
“आप कर लीजिए,” मैंने कहा।
उन्होंने लंड का सिरा अपनी चूत के मुँह पर रखा और धीरे से दबाया। सिरा फिसला और अंदर जाने लगा — और फिर रुक गया। उन्होंने साँस रोक ली।
“धीरे,” मैंने कहा, “धीरे से।”
उन्होंने कमर थोड़ी उठाई और मैंने हल्का सा ज़ोर दिया। सिरा अंदर गया और उनके चेहरे पर दर्द और आनंद एक साथ आ गए। “आह… ओह… बहुत मोटा है…” उन्होंने आँखें बंद करके कहा। फिर थोड़ा और, और थोड़ा और। पहला एक-डेढ़ इंच जाते-जाते उनकी चूत ने उसे पकड़ लिया और अंदर की दीवारें उसके चारों तरफ़ कस गईं।
मैंने उनकी कमर दोनों हाथों से पकड़ी और एक लंबे, धीमे झटके में आधा लंड अंदर डाल दिया।
“ह्ह्ह्हाआ…” वो लंबी कराह के साथ पीछे को झुक गईं, नाखून मेरी बाँहों में गड़ गए। “रुक… रुक जा… पूरा नहीं जाएगा…”
“पूरा जाएगा। साँस लीजिए।”
उन्होंने साँस ली। मैंने इंतज़ार किया। उनके अंदर की पकड़ ढीली पड़ी और मैंने बाक़ी भी अंदर कर दिया — बस आख़िरी आधा इंच छोड़कर। उनका पेट मेरे पेट से लग गया। हम दोनों एक-दूसरे में पूरे धँसे हुए थे और कुछ सेकंड के लिए कोई हिला नहीं।
फिर मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। पहले छोटे झटके — बस दो इंच बाहर, दो इंच अंदर। उनकी चूत हर झटके पर मेरे लंड को पूरी तरह निचोड़ती और छोड़ती। उनका मुँह खुला रह गया, आँखें आधी बंद, और हर अंदर जाते झटके पर “आह” निकलता — एक ही लय में, मेरे झटकों के साथ।
“दर्द हो रहा है?” मैंने पूछा।
“हो रहा है…” उन्होंने कहा, “लेकिन रुकना मत।”
मैंने रफ़्तार बढ़ाई। अब हर झटका लंबा था — लगभग पूरा बाहर, फिर पूरा अंदर। उनकी गांड खाट पर थप-थप करने लगी और वो थपकी की लय पर कराहने लगीं। उनके दूध भरे स्तन हर झटके पर ऊपर-नीचे हिलते और एक-दूसरे से टकराते। मैंने एक स्तन हाथ में भर लिया, दबाया, और निप्पल अंगूठे और उँगली के बीच पकड़कर खींचा।
“आह्ह्ह… निप्पल मत खींच… तड़पता है…” वो बोलीं, लेकिन खुद अपनी छाती मेरी हथेली में और आगे धकेल दी।
मैंने उनकी दोनों टाँगें अपनी कमर पर चढ़ा दीं और उनकी गांड के नीचे हाथ डालकर उन्हें थोड़ा ऊपर उठाया — इस कोण से लंड और गहरा जाने लगा, और उनकी चूत का ऊपरी हिस्सा मेरे लंड के निचले हिस्से से रगड़ने लगा। वो तुरंत बदल गईं — कराह लंबी हो गई, आवाज़ में पहले से ज़्यादा बेकाबू।
“यहीं… यहीं रगड़… ऐसे ही…” उन्होंने मेरा सिर पकड़कर अपने मुँह से लगा दिया और मेरी जीभ चूसने लगीं।
हम इसी तरह चूमते और चुदते रहे। बारिश तेज़ हो गई थी, छत पर पानी पड़ने की आवाज़ अब ढोल जैसी नहीं, बल्कि लगातार गिरते पत्थरों जैसी थी। खाट चरमराने लगी। मेरा पसीना उनकी छाती पर गिर रहा था और उनका पसीना मेरे गले पर। पूरे कमरे में दो शरीरों की महक भर गई थी।
मैंने उन्हें करवट से घुमाकर पेट के बल लिटा दिया और उनकी गांड को ऊपर उठाया। पीछे से लंड दोबारा डालते हुए मैंने एक हाथ से उनकी गांड का माँस पकड़ लिया — भारी, भरा हुआ, गर्म। अंगूठे से गांड के बीच की लकीर पर ऊपर-नीचे सहलाया। जब अंगूठा उनके गांड के छेद पर पहुँचा और हल्का दबा, तो वो सिकुड़ गईं।
“अरे! वहाँ भी?” उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।
“बस छू रहा हूँ।”
“छूने में तो तू डाल ही देगा,” उन्होंने कहा और अपनी गांड मेरी तरफ़ और ऊपर उठा दी।
मैंने अंगूठे को उनकी चूत से निकले रस में भिगोया और दोबारा गांड के छेद पर रखा। धीरे-धीरे दबाया — अंगूठा घुसा और वो हल्की सी चीखीं, लेकिन मेरी कमर पकड़कर खुद हिलने लगीं। पीछे से झटके अब गहरे और सीधे थे। उनकी गांड हर झटके पर मेरे पेट से टकराती और थपकी की आवाज़ कमरे में गूँजती।
“सुनील… सुनील…” वो मेरा नाम ले रही थीं, एक ही लय में, जैसे प्रार्थना।
“कैसा लग रहा है आंटी?”
“बहुत अच्छा… बहुत अच्छा रे… मत रुक…”
मैंने रफ़्तार बढ़ा दी। अब हर झटका पूरे ज़ोर का था। उनके स्तन खाट पर दबकर बाहर निकल आए थे और हिल रहे थे। एक हाथ से मैंने उनकी गांड के माँस को दोनों तरफ़ से पकड़कर फैलाया और देखा कि मेरा लंड कैसे उनकी चूत में जाता-आता है — बाहर निकलते वक्त चूत के होंठ लंड के साथ बाहर खिंच आते और अंदर जाते वक्त उन्हें अंदर खींच लेते। उनका रस मेरी जाँघों तक बहकर आ गया था।
उनकी साँस फिर टूटने लगी। उनकी गांड मेरी पकड़ में काँपने लगी।
“फिर आ रहा है…” उन्होंने हाँफते हुए कहा, “फिर आ रहा है रे…”
“आ जाइए,” मैंने कहा और ज़ोर लगा दिया।
वो चीख पड़ीं — एक लंबी, टूटी हुई चीख — और उनकी चूत ने मेरे लंड को पूरी तरह निचोड़ लिया। उनका पूरा शरीर काँपने लगा, गांड मेरी हथेली में धड़कने लगी, और टाँगें सिकुड़ गईं। मैंने उसी पकड़ में चुदते रहना जारी रखा, धीमा करके, जब तक उनके झटके खत्म नहीं हुए।
उनका शरीर ढीला पड़ गया। मैंने लंड बाहर निकाल लिया और उन्हें करवट से पलट दिया। उनका चेहरा लाल, बाल माथे पर चिपके, आँखों में पानी। उन्होंने मुझे देखा और बिना कुछ कहे अपनी टाँगें फैला दीं।
मैं दोबारा उनके ऊपर आया। इस बार उन्होंने खुद मेरा लंड पकड़कर अंदर रखा और मेरी गांड पर हाथ रखकर दबा दिया — “अब पूरा डाल… पूरा…”। मैंने पूरा अंदर डाला और वो मेरी गर्दन में मुँह गड़ा कर काटने लगीं।
अब लय अलग थी — धीमी, गहरी, और लंबी। हर झटके पर हम दोनों एक-दूसरे को कसकर पकड़ लेते। उनकी एड़ियाँ मेरी कमर पर जमी थीं और वो हर बार मेरे अंदर जाते वक्त अपनी कमर ऊपर उठाकर मुझसे टकराती थीं। उनकी चूत अब पूरी तरह खुली, गीली, और गर्म थी, और हर झटके पर चट-चट की आवाज़ कर रही थी।
“मुझे नौ महीने से भूख थी,” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया, “नौ महीने। तू जानता है क्या होता है औरत के साथ?”
“आज पूरी कर दूँगा।”
“कर दे,” उन्होंने कहा और मेरी पीठ पर नाखून चला दिए।
मेरा भी सब्र टूट रहा था। पेट के नीचे गर्मी जमा हो रही थी और लंड में खिंचाव बढ़ रहा था। मैंने रफ़्तार फिर बढ़ाई — अब बेकाबू, तेज़, और गहरा। खाट ज़ोर-ज़ोर से चरमराने लगी। उनकी कराहें एक-दूसरे में मिलकर एक लगातार आवाज़ बन गईं। उनके दूध भरे स्तन मेरी छाती के नीचे रगड़ रहे थे और उनके निपल्स मेरी त्वचा पर घिस रहे थे।
“आंटी… अब रुक नहीं सकता…”
“मत रुक… अंदर ही कर… आज अंदर ही कर…”
उन्होंने टाँगें और कस दीं। मैंने आख़िरी तीन झटके पूरे ज़ोर से लगाए और फिर अंदर ही रह गया। पहला झोंका निकला और मेरी पूरी कमर काँप गई। मैंने उनकी गांड पकड़कर उन्हें अपने से चिपका लिया और लंड को जितना अंदर जा सकता था, और अंदर धकेल दिया। मेरे झटके उनकी चूत के अंदर भर रहे थे और उन्होंने आँखें बंद करके होंठ काट लिए, गांड मेरी हथेलियों में कसी हुई।
जब आख़िरी झटका निकला, तब मैं उन पर गिर पड़ा — सारा वज़न उनकी छाती पर, चेहरा उनके गले में। मेरी साँस उनकी त्वचा पर पड़ रही थी। उनके दिल की धड़कन मेरी छाती के नीचे से महसूस हो रही थी — तेज़, धीमी होती हुई।
कुछ देर हम दोनों इसी तरह पड़े रहे। लंड अंदर ही था और वो उसे छोड़ना नहीं चाह रही थीं — टाँगें अभी भी मेरी कमर पर थीं। बाहर बारिश अब हल्की हो चली थी और कभी-कभी पत्तों से पानी की बूँदें छत पर गिर रही थीं।
फिर उन्होंने मेरे बालों में उँगलियाँ फेरीं।
“उठ जा,” उन्होंने धीरे से कहा, “वरना पूरा वज़न पड़ा रहेगा।”
मैं करवट में लेट गया। उन्होंने साड़ी का पल्लू उठाकर अपने पेट पर रख लिया और कुछ देर छत की तरफ़ देखती रहीं। फिर मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, “अब बता, कल क्या बहाना बनाएगा? बृजेश आएगा तो?”
“कल की कल देखेंगे,” मैंने कहा और उनकी कमर पर हाथ रख दिया।
वो मुस्कुराईं। फिर एकदम गंभीर होकर बोलीं, “सुनील, बृजेश को पता नहीं चलेगा ना?”
मैंने कुछ सेकंड सोचा। फिर हँसकर कहा, “आंटी, एक बात कहूँ?”
“कह।”
“बृजेश को पता चलेगा तो बुरा लगेगा… या अच्छा?”
“क्या मतलब?”
“मतलब ये कि वो भी तो अब बीस का है। वो भी तो देखता है। और आप इतनी सुंदर हैं कि वो भी आपको सिर्फ़ माँ नहीं समझता।”
“अरे, वो तो मेरा बेटा है।”
“और मैं भी तो उसी की उम्र का हूँ।”
वो हँस पड़ीं और उन्होंने साड़ी का पल्लू उठाकर मेरे मुँह पर फेंक दिया। “हट, बहुत बोलता है।”
“आंटी, सच में,” मैंने कहा, “एक दिन वो भी… और मैं भी… दोनों?”
उन्होंने मुँह फेरकर छत की तरफ़ देखा, और फिर एक बात ऐसी कह दी जो आज तक मेरे दिमाग़ में गूँज रही है — “देखते हैं। बृजेश की हिम्मत पड़े तो।”
अब मैं आपको वादा करता हूँ — अगले भाग में कहानी वहीं से शुरू होगी जहाँ ये रुकी है।
बृजेश सतना से लौटेगा, और वो कुछ बदला-बदला सा लगेगा। माँ की चाल में, हँसी में, ब्लाउज़ के बटनों में कुछ ऐसा दिखेगा जो पहले नहीं था। मैं उसे चाय पर बुलाऊँगा, और फिर उस रात खाट पर तीन लोग होंगे — बृजेश, मैं, और उसकी माँ।
अगले भाग में आप पढ़ेंगे कि कैसे बृजेश पहली बार अपनी माँ को साड़ी में से बाहर निकालता है, कैसे मैं उसे सिखाता हूँ कि उसकी माँ के दूध से भरे स्तन कैसे पकड़े जाते हैं और निपल्स कैसे चूसे जाते हैं, कैसे वो मेरी आँखों के सामने अपनी माँ की बुर चूमता है, कैसे दो लंड एक ही चूत में बारी-बारी आते हैं, कैसे आंटी एक साथ दोनों की हो जाती हैं, और कैसे बृजेश को उसकी माँ की गांड भी देखने का मौका मिलता है।
अगले भाग का नाम होगा — “मैं और बृजेश — दोनों”।
NEXT PART: दोस्त और मैं मिलकर उसकी माँ की चुदाई किये (31 Oct ko padhen)
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Mast chudai story hai bhai. mujhe bhi chudwana hai. main sahrsa bihar se hun. meri age 23 saal hai. meri chuchiyon ki size 34 hai. aur mere gand ki size 38 hai. koi hai jo mujhe group mein chodega???? jiska lauda 12 inch ka ho ya fir 8 inch se kam na ho aur wah ek toy se bhi pelega jo kamse kam 12 inch ka toy ho.