friends wife sex story
मेरा नाम साहिल है। बत्तीस साल का एक आम लड़का, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता है, हर महीने की पंद्रह तारीख को सैलरी आती है, और हर महीने की सोलह तारीख को मैं अपनी अलमारी में एक नई कमीज़ टांग देता हूँ।
मेरी लंबाई पाँच फुट सात इंच है — न ज़्यादा, न कम। चेहरा ऐसा है कि लोग पहली नज़र में कह देते हैं, “भाई, तुम तो हैंडसम हो, तुम्हारी तो अभी तक शादी हो जानी चाहिए थी।”
और मैं हर बार यही जवाब देता हूँ कि भाई, शादी तो हो जाएगी, पर पहले मुझे वो इंसान मिले जिससे बात करके दिल न भरे।
क्योंकि सच यह है — मुझे बात करना पसंद है। बहुत पसंद है। बात करना मेरे लिए शौक नहीं, आदत है, और कभी-कभी तो बीमारी जैसी चीज़ है। मैं किसी से भी, कहीं भी, किसी भी विषय पर बात शुरू कर सकता हूँ।
पार्क में बैठे बुजुर्ग से क्रिकेट पर, लिफ्ट में मिले अंकल से बारिश पर, चाय की दुकान वाले से चाय की पत्ती पर। लेकिन सबसे ज़्यादा मज़ा मुझे औरतों से बात करने में आता है — उनकी आवाज़ में एक लय होती है, बात करने का एक अलग तरीका होता है, और जब कोई औरत अपनी ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातें सुनाती है, तो लगता है जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने धीरे-धीरे खुल रहे हों।
कपड़ों का शौक भी मुझे बचपन से है। मैचिंग शर्ट, मैचिंग पैंट, मैचिंग बेल्ट, और मैचिंग घड़ी — मेरी अलमारी में सात घड़ियाँ हैं, हर घड़ी के साथ एक कमीज़, हर कमीज़ के साथ एक पैंट।
लोग कहते हैं कि यह नखरा है, मैं कहता हूँ यह आत्म-सम्मान है। इंसान जैसा दिखता है, दुनिया उसे वैसा ही मानती है। और मैंने यह भी सीखा है कि अगर आप अच्छे कपड़े पहनकर खड़े हों, तो लोग आपकी बात सुनने से पहले आपको नापना बंद कर देते हैं।
मेरे लंड का साइज़ नॉर्मल है — लगभग 5.2 इंच। न बहुत बड़ा, न बहुत छोटा। एक समय था जब मैं इस बात से परेशान रहता था।
दोस्तों की महफ़िल में जब कोई कहता, “भाई, छह-सात इंच से कम तो कुछ नहीं है,” तो मैं चुपचाप अपनी चाय घूँट लेकर रह जाता।
पर फिर एक बात समझ आई — औरत को सिर्फ़ लंबाई नहीं चाहिए होती, उसे वो एहसास चाहिए होता है कि उसके शरीर को किसी ने पढ़ा है। और मुझे पढ़ना आता है। बातों से भी, और बाद में हाथों से भी।
मेरा एक दोस्त है — जुल्फी। मुझसे तीन साल बड़ा, यानी पैंतीस का। हम एक ही ऑफ़िस में काम करते हैं, एक ही कैंटीन में खाना खाते हैं, और एक ही तरह के मज़ाक पर हँसते हैं। जुल्फी की एक ही कमी है — उसे अपनी बीवी की खूबसूरती का अंदाज़ा नहीं है।
वो उसे रोज़ देखता है, इसलिए उसके लिए वो बस “घर वाली” है। पर जो आदमी एक बार भी उसे देख ले, वो भूल नहीं सकता।
जुल्फी की बीवी का नाम नूर बानो है। चौंतीस साल की। और मैं ईमान से कहता हूँ — नूर बानो किसी पाकिस्तानी हीरोइन की तरह दिखती है।
वो फ़िल्मी चेहरा, वो भरे हुए गाल, वो भौंहें जो हर बात पर एक अलग कहानी कहती हैं, और वो आँखें — बड़ी, काजल से भरी, जैसे कोई गहरा कुआँ जिसमें देखने वाला गिर जाए।
उसके बाल हमेशा कलर किए हुए रहते हैं — कभी चेस्टनट, कभी मैरून, कभी गहरा सुनहरा। वो अंग्रेज़ी में बात करती है तो लगता है कोई ग़ज़ल गा रही हो, और उर्दू में बात करती है तो लगता है किसी शायर की किताब खुल गई हो।
उसकी हाइट लगभग पाँच फुट तीन इंच होगी। शरीर ऐसा है कि नाप लिख दूँ तो काग़ज़ शरमा जाए — उसके दूध चौंतीस इंच के हैं, बिल्कुल भरे हुए, ऊपर उठे हुए, कुर्ती के कपड़े में भी जिनका वज़न महसूस होता है। कमर छत्तीस की है, और गांड अड़तीस की — इतनी गोल, इतनी भारी कि जब वो जींस पहनकर चलती है तो पीछे से देखने वाले का हिसाब गड़बड़ा जाता है।
उसे शॉर्ट कुर्ती और जींस पहनने का शौक है, और वो जानती है कि उसे क्या सूट करता है — यही सबसे ख़तरनाक बात है।
और सबसे बड़ी बात — नूर बानो हँसती बहुत है। खुलकर, बिना फ़िल्टर, जैसे हँसी उसके अंदर से नहीं, बल्कि किसी और दुनिया से आती हो। और मुझे बात करना पसंद है — तो जब कोई औरत हँसती है, तो मैं और बात करता हूँ। यह चक्र दोनों तरफ़ से चलता है, और एक दिन हम दोनों इस चक्र से निकल नहीं पाए।
कुछ दिन पहले जुल्फी ने ऑफ़िस में आकर कहा, “साहिल, भाई, अगले हफ़्ते मेरी छोटी बहन की शादी है। तू ज़रूर आना।”
मैंने कहा, “भाई, तेरी बहन की शादी में मैं क्या करूँगा? मैं तो तेरा ऑफ़िस वाला दोस्त हूँ।”
“इसीलिए बुला रहा हूँ,” वो हँसा। “भीड़ में एक ऐसा आदमी चाहिए जो बात करके माहौल को ज़िंदा रखे। तू बस आ जा। और हाँ — नूर भी आ रही है, वो तेरे साथ ही बैठेगी, उसे भी अकेलापन लगता है ऐसी जगहों पर।”
यह सुनते ही मेरे अंदर कुछ हिला। “अच्छा,” मैंने बहुत नॉर्मल आवाज़ में कहा। “देखता हूँ, टाइम निकाल लूँ तो आ जाऊँगा।”
और उस रात मैंने अलमारी खोलकर बैठकर सोचा — तीन घंटे। कौन सी कमीज़? कौन सा रंग? क्या शादी में भी मैचिंग घड़ी पहननी चाहिए या बहुत ज़्यादा लगेगा? मैंने गहरे नीले रंग की कमीज़ चुनी, उससे मैच करती पैंट, और चाँदी के रंग की घड़ी। शादी थी, तो सफ़ेद में भी जा सकता था, पर सफ़ेद में सब जाते हैं। मुझे अलग दिखना था।
शादी का फ़ंक्शन एक बड़े लॉन में था। दो सौ आदमी, तीन सौ औरतें, बैंड, रोशनी, फूलों की खुशबू और शोर — इतना शोर कि अपनी सोच भी सुनाई न दे। मैं गेट से अंदर आया और सबसे पहले जुल्फी को ढूँढा, पर वो पता नहीं कहाँ था। फिर मेरी नज़र सीढ़ियों के पास खड़ी एक औरत पर पड़ी, और मैं रुक गया।
नूर बानो।
उस दिन उसने गहरे मैरून रंग की शॉर्ट कुर्ती पहनी थी — बिना आस्तीन की, कंधों तक, कमर से थोड़ी ऊपर तक। नीचे काले रंग की स्किन-फिट जींस। गले में एक पतली सोने की चेन, कानों में झुमके, हाथों में चूड़ियाँ। बाल खुले हुए, हवा से उड़ते हुए, और माथे पर एक छोटी सी बिंदी।
वो सीढ़ी पर खड़ी थी और अपनी बहन से कुछ कहकर हँस रही थी। हँसते वक़्त उसकी गर्दन पीछे जाती थी, और उसके दूध कुर्ती के कपड़े में ऊपर उठकर एक साफ़ लकीर बनाते थे। मैंने एक बार नहीं, दो बार नहीं — तीन बार देखा। फिर चौथी बार देखते हुए उसकी नज़र मुझ पर पड़ गई।
वो एक पल के लिए रुकी। फिर मुस्कुराई — वैसी मुस्कुराहट जिसमें सवाल था, “कब से देख रहे हो?”
मैंने हाथ जोड़कर नमस्ते किया।
वो सीढ़ी से उतरी, मेरे पास आई, और बोली, “साहिल, तुम आ गए? जुल्फी ने कहा था तू आएगा, मुझे यक़ीन नहीं हुआ था।”
“भाई की बहन की शादी है,” मैंने कहा। “और भाभी खुद बुला रही हों, तो आना तो बनता है।”
“भाभी?” वो हँसी। “तू मुझे भाभी कहता है? इतनी जल्दी बूढ़ा बना दिया।”
“तो क्या कहूँ? नूर?”
वो एक सेकंड रुकी, फिर बोली, “नूर ठीक है। पर ज़्यादा मत बोलना, जुल्फी को बुरा लगेगा।”
“जुल्फी को कब से ऐसी चीज़ों का बुरा लगता है?” मैंने कहा। “उसे तो पता ही नहीं चलेगा।”
वो फिर हँसी — और यह हँसी पिछली हँसी से अलग थी। इसमें एक छोटी सी चुभन थी, जैसे किसी ने सच कह दिया हो।
हम दोनों कुर्सियों की तरफ़ चले। रास्ते में वो बोली, “तूने कपड़े अच्छे पहने हैं। नीला रंग तुझ पर अच्छा लगता है।”
“आपने भी बहुत अच्छे पहने हैं,” मैंने कहा। “मैरून आपके रंग पर ज़ुल्म कर रहा है।”
“ज़ुल्म?” वो हँसी। “बड़े शायर हो तुम।”
“नहीं, बस बात करना आता है।”
“हाँ,” उसने कहा। “यह तो देख रही हूँ।”
हम बैठ गए। उसकी कुर्सी मेरी कुर्सी से बस एक हाथ के फ़ासले पर थी। बैंड बज रहा था, लोग नाच रहे थे, बच्चे दौड़ रहे थे, और हम दोनों बैठकर बातें कर रहे थे — धीमी आवाज़ में, एक-दूसरे की तरफ़ झुककर, शोर को हराने के लिए।
उसने अपनी नौकरी के बारे में बताया — एक डिज़ाइन स्टूडियो में काम करती है, कपड़ों के प्रिंट डिज़ाइन करती है।
मैंने पूछा कि प्रिंट कैसे बनते हैं, और वो बीस मिनट तक बताती रही। फिर उसने पूछा कि मैं क्या करता हूँ, और मैंने अपनी कंपनी के बारे में बताया — जितना बोरिंग बना सकता था, उतना बोरिंग बनाया, फिर आख़िर में कहा, “पर सच यह है कि मुझे अपना काम पसंद नहीं। मुझे बस लोगों से बात करना पसंद है।”
“तो तू अपने काम में बात क्यों नहीं करता?”
“करता हूँ। इसीलिए अब तक नौकरी बची हुई है।”
वो ज़ोर से हँसी, इतनी ज़ोर से कि उसने अपना हाथ मेरी बाजू पर रख दिया — बस एक सेकंड, गरम हथेली, फिर हटा लिया। पर वो एक सेकंड मेरी बाजू पर अगले दो घंटे तक रहा।
फ़ंक्शन ख़त्म होने से पहले हमने नंबर एक्सचेंज किए — “काम के सिलसिले में,” उसने कहा, और मैंने हाँ में सिर हिला दिया, जैसे हम दोनों को यक़ीन हो कि यह काम के लिए है।
उस रात एक बजे मेरे फ़ोन पर मैसेज आया: “सो गए?”
मैंने लिखा: “नहीं, छत पर बैठा हूँ। शादी में जो खाना था, वो मुझे मार डालेगा।”
“तीन प्लेट बिरयानी खाने का यही अंजाम है।”
“आपने गिना?”
“मैं औरत हूँ, साहिल। सब गिनती है।”
मैं हँस पड़ा। फिर लिखा: “आपने कितनी खाईं?”
“एक। और मैं अपने हिस्से की तीन प्लेटें तुझे देखकर खा लीं।”
उस रात हम तीन बजे तक बात करते रहे — उसके बचपन पर, उसके पिता पर जो उसे बहुत मारते थे, उसकी माँ पर जो हर बात पर रो देती थी, मेरे पहले प्यार पर जो मुझे छोड़कर किसी और से शादी कर गई, और उसके और जुल्फी की शादी पर — जो एक अरेंज्ड शादी थी, दो परिवारों का सौदा, और जिसमें प्यार बाद में आया… या शायद कभी पूरा नहीं आया।
“जुल्फी बुरा आदमी नहीं है,” उसने लिखा। “पर वो मुझे नहीं देखता। वो मुझे ऐसे देखता है जैसे घर का कोई फ़र्नीचर।”
“और आप कैसे देखा जाना चाहती हैं?”
वहाँ एक लंबा रुकावट आया। फिर: “ऐसे, जैसे किसी ने पहली बार देखा हो।”
मैंने कुछ नहीं लिखा। बस स्क्रीन देखता रहा, और सीने में कुछ जलता रहा।
अगले तीन हफ़्ते हम रोज़ बात करते रहे। कभी सुबह, कभी ऑफ़िस में, कभी रात को दो बजे तक। एक दिन उसने ऑफ़िस के बाहर मिलने का बहाना बनाया — “मेरा स्टूडियो पास ही है, चाय पी लें।” चाय दो घंटे चली और ठंडी हो गई।
दूसरी बार मिले तो मॉल में। तीसरी बार बारिश में, एक छज्जे के नीचे, जहाँ उसने अपने बाल पोंछने के लिए मेरा रुमाल माँगा और फिर वापस नहीं किया। वो रुमाल अब भी मेरी जेब में रहता है, उसकी खुशबू के साथ।
और इन तीन हफ़्तों में शरीर की भाषा बदलती गई। पहले कंधे से कंधा, फिर हाथ पकड़ना चलते वक़्त, फिर उसकी कमर पर मेरा हाथ — बस दो सेकंड, जैसे गलती से, और फिर कभी गलती नहीं लगी। एक दिन लिफ्ट में हम अकेले थे और वो मेरी तरफ़ मुड़ी, अपना माथा मेरे कंधे पर रखा, और बोली, “साहिल, मुझे बहुत बुरा लगता है।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ और घर जाकर ऐसे जीना पड़ता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।”
मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और पहली बार माथे पर चूमा। वो आँखें बंद करके खड़ी रही, और लिफ्ट का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ पर हम दोनों चौंक गए, जैसे पकड़े गए हों।
फिर वो दिन आया जिसका हम दोनों को इंतज़ार था, बिना नाम लिए। जुल्फी को तीन दिन का काम से बाहर जाना था — पुणे, क्लाइंट मीटिंग।
“तू घर आ जाएगा?” उसने जाते वक़्त पूछा। “नूर अकेली होगी।”
“हाँ भाई,” मैंने कहा, “आ जाऊँगा।”
और फिर नूर ने मुझे मैसेज किया: “घर नहीं। होटल।”
मैंने पूछा: “क्यों?”
“घर में पड़ोस की आंटी आ जाती हैं, दरवाज़ा खुला रहता है, कभी भी कोई आ सकता है। होटल में मैं बिना डर के तेरी हो सकती हूँ।”
“तेरी हो सकती हूँ।” उस वाक्य ने मेरे अंदर कुछ ऐसा जगाया जो तीन हफ़्तों से दबा हुआ था।
मैंने होटल बुक किया — शहर के बाहर, हाईवे से थोड़ा हटकर, एक बुटीक होटल। बड़ा नाम नहीं, शोर नहीं। रिसेप्शन पर एक आदमी था जिसने ज़्यादा सवाल नहीं पूछे। मैंने सबसे ऊपर वाला कमरा लिया।
कमरा नंबर 304।
कमरा खोला तो सामने बड़ी खिड़की थी, जिससे पूरा शहर की रोशनी दिखती थी। बिस्तर किंग साइज़, सफ़ेद चादर, ऊपर चार तकिए — दो नीचे, दो सजावट के। दीवार पर बड़ा शीशा, सामने एक लकड़ी की कुर्सी जिस पर कपड़े टांगे जा सकते थे। बगल में छोटा सा टेबल, दो गिलास, एक बोतल पानी, और मोमबत्ती जलाने की एक खूबसूरत स्टैंड। कोने में एक कोईना — पीली रोशनी, धीमी। बाथरूम का दरवाज़ा शीशे का, अंदर से पर्दा। बाथरूम में बड़ा शॉवर, गरम पानी, मोटे सफ़ेद तौलिए और छोटी-छोटी शीशियों में साबुन, शैंपू, लोशन।
मैंने मोमबत्ती जलाई, कोईने की रोशनी धीमी की, और खिड़की के पर्दे आधे खुले छोड़ दिए ताकि बाहर की रोशनी अंदर आती रहे। फिर मैं बैठकर उसका इंतज़ार करने लगा — और इंतज़ार में हर मिनट घंटे जैसा लगा।
साढ़े नौ बजे दरवाज़े पर दो दस्तक हुईं।
मैंने खोला। वो खड़ी थी।
उसने गहरे जामुनी रंग की शॉर्ट कुर्ती पहनी थी — बिना आस्तीन, गहरी नेकलाइन, कमर से बहुत ऊपर तक। नीचे काली लेगिंग। बाल सीधे किए हुए, होंठों पर हल्का गुलाबी रंग, और आँखों में वो काजल जो अब तक देखी हर चीज़ से ज़्यादा बोल रहा था। हाथ में एक छोटा बैग।
वो अंदर आई, दरवाज़ा बंद किया, और पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। हम दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।
“कमरा अच्छा है,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
“आप अच्छी हैं,” मैंने कहा। “कमरा तो बहाना है।”
वो मुस्कुराई और बोली, “साहिल, एक बात पूछूँ?”
“पूछिए।”
“आज के बाद… कुछ बदल जाएगा?”
“सब बदल जाएगा,” मैंने कहा। “पर आज रात कुछ नहीं बदलेगा। आज रात बस हम हैं।”
वो मेरे पास आई। दो कदम। फिर रुकी। मैंने उसका हाथ पकड़ा — ठंडा हाथ, काँपता हुआ। मैंने उँगलियाँ उसकी उँगलियों में फँसाईं और उसे अपनी तरफ़ खींचा।
“डर लग रहा है?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा। “बहुत सालों बाद किसी नए आदमी के सामने खड़ी हूँ।”
“तो डर के साथ करते हैं,” मैंने कहा। “डर भी एक एहसास है, और एहसास अच्छे होते हैं।”
उसने मेरी आँखों में देखा और फिर अपना माथा मेरे माथे से टिका दिया। हमारी साँसें मिलीं। उसकी साँस गरम थी, हल्की सी काँपती हुई।
मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और होंठों पर चूमा।
पहला चुंबन छोटा था — बस एक निशान, एक सवाल। वो हिली नहीं। फिर दूसरा, थोड़ा लंबा। तीसरे में उसने अपने होंठ खोल दिए और मेरी जीभ का इंतज़ार किया।
हम चूमते हुए बिस्तर तक पहुँचे, और मैंने उसे बैठा दिया। फिर मैं घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया — कुर्सी की तरह, बिस्तर के किनारे पर, उसके पैरों के बीच।
मैंने उसके हाथ पकड़े और एक-एक करके उसकी उँगलियाँ चूमीं। अंगूठे से हथेली पर गोल घुमाया। वो आँखें बंद किए बैठी रही, होंठ हल्के खुले।
“आँखें खोलिए,” मैंने कहा।
उसने खोलीं।
“आपको देखना है,” मैंने कहा। “जो हो रहा है, वो देखिए।”
“शरम आती है।”
“शरम अच्छी चीज़ है,” मैंने कहा। “पर आज रात शरम को बाहर छोड़ दीजिए।”
वो हँसी, फिर सिर हिलाया।
मैंने उसकी बाँहों को चूमना शुरू किया — कलाई से कोहनी तक, धीमे, गीले चुंबन। कोहनी के अंदर वाली नस पर जब होंठ लगाए, तो उसने तेज़ साँस ली। फिर कंधे, फिर गर्दन — कान के नीचे वाली जगह, जो हर औरत की सबसे कमज़ोर जगह होती है। वहाँ मैंने दाँत लगाए, हल्के से, और उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींच लिया।
“साहिल,” वो फुसफुसाई। “तू बहुत धीरे चलता है।”
“धीरे चलूँगा,” मैंने कहा। “जल्दी में कहाँ जाना है?”
मेरे हाथ उसकी कमर पर गए और कुर्ती का घेरा ऊपर खींचा। कुर्ती सरकी और उसकी नाभि सामने आई — गोल, गहरी, जैसे किसी ने उँगली से दबाकर बनाई हो। मैंने उसे चूमा। उसने पेट अंदर खींच लिया।
“गुदगुदी होती है,” वो हँसी।
“अच्छा,” मैंने कहा, “तो यहाँ और करते हैं।”
और मैंने उसकी कमर के दोनों तरफ़ होंठ रगड़े, फिर जीभ से नाभि के चारों तरफ़ गोल घुमाया। वो हँसती रही, फिर हँसी धीमी होकर साँस में बदल गई।
कुर्ती ऊपर गई। उसने खुद हाथ उठाकर मेरी मदद की, और कुर्ती सिर से निकलकर फ़र्श पर गिरी। सामने काले रंग का ब्रा था — जालीदार, पतला, और उसमें से उसके निप्पल्स साफ़ दिख रहे थे। दोनों कड़े हो चुके थे, कपड़े को धक्का दे रहे थे।
मैंने देखा और कुछ सेकंड कुछ नहीं किया। बस देखता रहा।
“क्या हुआ?” उसने पूछा, थोड़ी घबराकर।
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “आपके दूध देख रहा हूँ। बहुत खूबसूरत हैं।”
“बस कर,” वो शरमाई। “तीस की हो गई हूँ, दो बच्चों के बाद…”
“और इसीलिए और खूबसूरत हैं,” मैंने कहा। “जो औरत माँ बनती है, उसका शरीर और सुंदर हो जाता है। जिसने यह नहीं देखा, वो क्या देखा।”
वो कुछ कहने के बजाय मेरी तरफ़ झुकी और मुझे चूमा — इस बार वो चूम रही थी, मैं नहीं। उसकी जीभ मेरे मुँह में थी, और उसके हाथ मेरी कमीज़ के बटन खोल रहे थे। बटन टूटने जैसी जल्दी में।
“आराम से,” मैं हँसा। “कमीज़ महँगी है।”
“कमीज़ की परवाह कौन कर रहा है,” वो बोली, और मैं हँसता रह गया।
मेरी कमीज़ खुल गई, फिर मेरी बेल्ट। उसने बेल्ट खींची और फ़र्श पर गिरा दी। फिर उसका हाथ मेरी जींस के ऊपर से मेरे लंड पर पड़ा और वहाँ रुक गया। उसने दबाया। मैंने साँस रोक ली।
“इतना कड़ा है,” उसने धीमे से कहा।
“आपकी वजह से,” मैंने कहा।
उसने ब्रा का हुक पीछे से खोला — बिना देखे, एक ही बार में, जैसे आदत हो। ब्रा ढीली हुई और मैंने उसे खींचकर अलग किया।
उसके दूध बाहर आए। भारी, गोल, नीचे से भरे हुए, और सबसे ऊपर गहरे रंग के निपल्स — कड़े, सिकुड़े हुए। हवा लगते ही वो और कड़े हो गए। मैंने दोनों हाथों में एक-एक दूध भर लिया। वज़न महसूस हुआ, गरमी महसूस हुई। मैंने उन्हें ऊपर उठाया, फिर छोड़ा, फिर फिर उठाया। उसने आँखें बंद कर लीं।
मैंने होंठ नीचे किए और बाएँ निप्पल को मुँह में लिया। पहले बस होंठों से, फिर जीभ से, फिर दाँतों से बहुत हल्के से। उसने मेरे सिर को पकड़कर अपनी छाती से चिपका लिया।
“हाँ,” वो फुसफुसाई। “ऐसे… ऐसे ही।”
मैंने उस निप्पल को मुँह में लेकर चूसना शुरू किया — धीमे, लंबे खिंचाव में, जैसे कुछ निकालना हो। दूसरे दूध को हाथ से दबाता रहा, अंगूठे से उसके निप्पल को गोल घुमाता रहा। फिर मैंने मुँह बदला। दूसरे निप्पल पर वही सब किया, और इस बार ज़्यादा ज़ोर से, क्योंकि अब वो कराह रही थी और कराह में जो आवाज़ थी, वो और ज़ोर माँग रही थी।
उसके दूध मेरे मुँह में भरे हुए थे और मेरे हाथों में भी। मैंने उन्हें चूमा, काटा, दबाया, और उसने एक भी बार मना नहीं किया। बस मेरे बालों में उँगलियाँ चलाती रही और धीमे-धीमे कराहती रही।
फिर मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। लेगिंग उतारी — धीमे, पैर के पंजे से खींचकर। वो पूरी निकली और फ़र्श पर पड़ी रह गई। अब उसके शरीर पर सिर्फ़ काला पतला पैंटी था।
उसकी कमर छत्तीस इंच की है, और उसकी गांड अड़तीस की — यानी गांड कमर से चौड़ी। यही उसके शरीर का सबसे ख़तरनाक हिस्सा है। जब वो लेटी, तो उसकी गांड बिस्तर पर फैल गई, दोनों तरफ़ भारी और गोल। मैंने हाथ से उसे भरा और दबाया। मांस अंगुलियों के बीच से फिसल गया।
“गांड बहुत भारी है,” मैंने कहा।
“जींस में दिखती है ना?” उसने कहा।
“जींस में भी नहीं दिखती, जितनी असली में है,” मैंने कहा, और उसने हँसकर आँखें बंद कर लीं।
मैंने उसके पैरों को फैलाया। पैंटी के ऊपर से ही मैंने उसकी चूत पर हथेली रखी। गरमी ऐसी थी जैसे कोई तवा हो। पैंटी का कपड़ा नम हो चुका था।
“यहाँ भी बहुत गरम है,” मैंने कहा।
“तूने क्या सोचा था?” उसने आँखें खोलकर कहा। “तू इतनी देर से ऊपर लगा हुआ है, नीचे क्या होगा?”
“नीचे?” मैंने पूछा।
“नीचे सब गीला है,” उसने कहा। “अब देर मत कर।”
मैंने पैंटी किनारे से खींची और उतार दी। उसकी चूत सामने थी — काली, घनी, गीली, और बीच से खुली हुई। होंठ मोटे थे और सूजे हुए। ऊपर वाला हिस्सा लाल था।
मैंने उँगली से ऊपर से नीचे तक एक लकीर खींची। वो काँपी।
“साहिल…” उसने आवाज़ निकाली।
मैंने उँगली चूत के अंदर डाली। अंदर बहुत गरम, बहुत गीला, और टाइट। मैंने उँगली अंदर-बाहर करनी शुरू की, और अंगूठे से ऊपर वाला वो छोटा दाना दबाता रहा। उसने पैर सिकोड़ लिए और कमर उठा दी।
“हाँ,” वो बोली, “वहीं… वहीं रख।”
मैंने दूसरी उँगली भी डाल दी। दोनों को अंदर-बाहर करने लगा, धीमे, फिर तेज़, फिर धीमे। अंगूठा ऊपर बना रहा। उसकी चूत से आवाज़ आने लगी — गीली, चिपचिपी आवाज़। वो कराह रही थी, कमर उठा रही थी, एक हाथ से चादर पकड़े हुए थी।
“रुक मत,” वो बोली। “रुक मत, साहिल।”
मैं रुका नहीं।
फिर मैं नीचे झुका और अपनी जीभ उसकी चूत पर रखी। पहली लकीर ऊपर से नीचे तक — लंबी, सीधी। उसने तेज़ साँस ली और उसकी गांड उठ गई।
उसकी चूत का स्वाद नमकीन था और कहीं पीछे एक मीठास भी थी। मैंने जीभ से ऊपर वाला दाना चूसा, फिर नीचे जाकर उँगली के साथ-साथ अंदर घुसने की कोशिश की। वो दोनों हाथों से मेरा सिर दबाने लगी।
“हाँ… हाँ, बस ऐसे…”
मैं काफ़ी देर वहाँ लगा रहा — जब तक उसकी साँस टूटने लगी, जब तक उसकी टाँगें काँपने लगीं, जब तक उसने मेरा सिर पकड़कर पीछे नहीं धकेला और नहीं कहा, “अब बस, अब अंदर आ।”
मैं खड़ा हुआ और अपनी जींस उतारी। बॉक्सर के साथ।
मेरा लंड बाहर आया — 5.2 इंच, खड़ा, कड़ा, और सिरे पर पहले से गीला। उसने देखा और उसकी नज़र वहीं रुक गई।
“कितना है?” उसने पूछा।
“5.2,” मैंने सच कहा।
वो एक सेकंड रुकी। फिर मुस्कुराई और बोली, “अच्छा।”
“कम लगा?” मैंने पूछा। मेरे अंदर वो पुराना डर फिर उठा।
“साहिल,” उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया और मेरा लंड पकड़ लिया। “जितने वाले मिल जाएँ, बड़े नहीं। तूने मेरी चूत को अभी उँगलियों और जीभ से ऐसा बनाया है कि अब मुझे किसी नाप से मतलब नहीं। बस अंदर आ।”
उसने मेरे लंड को अपनी चूत पर रगड़ा — ऊपर-नीचे, गीली लकीर बनाते हुए। फिर उसने मेरी गांड पर हाथ रखकर मुझे अपनी तरफ़ खींचा।
“मेरे बुर के अंदर डाल,” उसने कहा।
मैंने अपने लंड उपरी सिरा उसके बुर पर रखा और धकेला।
पहला इंच आसानी से गया — वो पूरी गीली थी। फिर अंदर टाइटनेस आई और मैंने ज़ोर लगाया। वो अंदर गया, पूरा, और उसने लंबी साँस छोड़ी।
मैं रुक गया। अंदर ही रुका रहा।
“दर्द?” मैंने पूछा।
“नहीं,” उसने कहा। “बस… भर गई हूँ। अच्छा लग रहा है।”
“तो बताइए और अन्दर अपने लंड को डालूं।”
“अब डाल,” उसने कहा। “और धीरे धीरे मत चोदना। मुझे ज़ोर ज़ोर से चुदवाना है।”
मैंने अपने लंड से उसके बुर में चोदना शुरू किया। पहले धीमे — पूरा बाहर नहीं, बस आधा, और फिर वापस। उसकी चूत मेरे लंड को पकड़े हुए थी, हर बाहर निकलने पर खींचती हुई।
“तेज़,” वो बोली।
मैंने तेज़ चोदना शुरू किया। अब हर धक्का आवाज़ के साथ था — ताली जैसी आवाज़, गीली। उसकी गांड हर धक्के पर हिलती और वापस आती। मैंने उसकी कमर दोनों हाथों से पकड़ ली और उसे अपनी तरफ़ खींचते हुए धक्का देने लगा — इससे हर धक्का और गहरा जाता था।
“आह… हाँ…” वो कराही। “ऐसे… ऐसे चोदो मुझे।”
मैंने उसके दूध पकड़े और दबाते हुए चोदना जारी रखा। निपल्स अंगुलियों के बीच से फिसलते और फिर पकड़े जाते। वो अपने होंठ काट रही थी, आँखें बंद, गर्दन पीछे।
मैंने उसे करवट दिलाई — बिना लंड बाहर निकले, उसे घुमाकर उसकी तरफ़ से करवट पर लिटा दिया और उसके ऊपर वाले पैर को ऊपर उठा दिया। इस पोज़ में मेरा लंड अलग एंगल पर जाने लगा, और वो पहली बार ज़ोर से चीखी।
“वहाँ!” वो बोली। “वहीं पेलो, साहिल, वहीं!”
मैंने वहीं धक्के मारना शुरू किया। उसकी चूत का वो अंदरूनी हिस्सा जो ऊपर की तरफ़ है — वहाँ मेरा सिरा हर बार टकरा रहा था और हर टक्कर पर उसके शरीर में एक झटका जाता था। उसने चादर मुट्ठी में भर ली।
“तेरी चूत कितनी अच्छी है,” मैंने कहा — पहली बार गंदी बात, और उसने सुनकर और ज़ोर से कराहा।
“तेरा लंड भी,” वो बोली। “भर देता है पूरा।”
फिर मैंने उसे घुमाकर पेट के बल लिटा दिया और कमर से ऊपर उठाया। उसकी गांड सामने उठी हुई थी — भारी, गोल, दोनों तरफ़ फैली। मैंने दोनों हाथों से उसे फैलाया और फिर से अंदर डाला।
इस पोज़ में आवाज़ और बढ़ गई। मेरी जांघें उसकी गांड से टकराती थीं और आवाज़ पूरे कमरे में गूँजती थी। मैंने उसकी गांड पर हाथ से हल्की थाप दी। वो चौंकी, फिर बोली, “और।”
मैंने फिर मारी, और फिर। हर थाप पर उसकी चूत सिकुड़ती थी और मेरे लंड को दबाती थी।
“साहिल, मैं… मैं आ रही हूँ,” वो हाँफी।
“आ जाइए,” मैंने कहा और तेज़ किया।
वो चीखी — लंबी, टूटती हुई चीख — और उसका पूरा शरीर काँपने लगा। उसकी चूत ने मेरे लंड को लय में दबाया, छोड़ा, दबाया, छोड़ा। उसकी गांड दोनों तरफ़ काँप रही थी। वो चादर में मुँह दबाकर कराह रही थी।
मैंने धक्के जारी रखे, धीमे कर दिए, ताकि उसका झटका पूरा निकले। फिर रुक गया — अंदर ही रहा, गहरा, और उसके काँपने का इंतज़ार किया।
कुछ सेकंड बाद उसकी साँस लौटी। वो धीरे-धीरे सीधी हुई, और फिर मुड़कर मुझे देखा। उसके गाल लाल थे, आँखें नम थीं, बाल चेहरे पर चिपके थे।
“अभी तू आया नहीं?” उसने पूछा।
“नहीं,” मैंने कहा।
“तो अंदर आ,” उसने कहा। “मुझे चाहिए।”
वो फिर लेट गई, इस बार पीठ के बल, और अपने पैर मेरी कमर पर लपेट लिए। मैंने अंदर डाला और उसने मुझे अपनी तरफ़ खींचकर चूमा। मेरी गर्दन पर हाथ रखा, अपने होंठ मेरे कान के पास लाए और फुसफुसाई, “अब पूरी ताक़त लगा। मुझे तेरा पानी चाहिए।”
मैंने पूरी ताक़त लगाई।
अब कोई तालमेल नहीं था, कोई धीमापन नहीं — बस धक्के, तेज़, भारी, एक के बाद एक। उसकी चूत से आवाज़ आ रही थी, उसकी गांड बिस्तर पर पटक रही थी, और उसके नाखून मेरी पीठ पर चल रहे थे। मैंने उसके दूध फिर पकड़े, उन्हें दबाया, निपल्स को अंगूठे और उँगली के बीच रगड़ा।
और फिर वो आई — मेरे अंदर कुछ टूटा, गरमी फैली, और मैं गहरा जाकर रुक गया। मेरा पूरा शरीर काँपा। मैंने उसके अंदर पानी छोड़ा — लंबा, बार-बार, हर बार के साथ एक झटका।
वो मेरी पीठ पकड़े हुई थी और मेरे कान में धीमे से गिन रही थी जैसे कोई गिनती कर रहा हो, और उसकी गिनती के साथ मेरे झटके चल रहे थे।
फिर मैं उस पर गिर पड़ा। हम दोनों हाँफ रहे थे।
कुछ देर बाद उसने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और मेरे माथे पर चूमा।
“5.2 इंच का लंड,” वो धीमे से बोली, और हँसी।
“अब भी कम लगा?” मैंने पूछा।
“अब?” उसने कहा। “अब मुझे और बड़े का नाम भूल गया।”
हम नहाए — साथ में, उसी शॉवर में। गरम पानी में वो मेरे सामने खड़ी थी और मैं उसके बाल धो रहा था। फिर उसने मेरी छाती पर साबुन मला, धीरे-धीरे, और नीचे जाकर मेरे लंड को भी धोया, और धोते-धोते फिर कड़ा कर दिया।
“अभी फिर से?” उसने पूछा।
“थोड़ी देर में,” मैंने कहा।
“थोड़ी देर कितनी?”
“जितनी देर में हम बिस्तर तक पहुँचें।”
वो हँसी और मेरी छाती पर सिर रख दिया।
हम बिस्तर पर लौटे, गीले बालों के साथ, और उसने मेरे सीने पर अपना गाल टिका दिया। मैंने उसके गीले बालों में उँगलियाँ चलाईं।
“साहिल,” उसने कहा। “आज तक किसी ने मेरी चूत को इतनी देर नहीं छुआ था।”
“अच्छा?”
“जुल्फी सीधे अंदर आ जाता है,” उसने कहा। “दो मिनट में ख़त्म। और मुझे लगता था कि बस यही होता है। आज पता चला कि शुरुआत भी होती है।”
“शुरुआत सबसे ज़रूरी है,” मैंने कहा। “औरत को पहले ऊपर लाना चाहिए, फिर आदमी आए।”
“तूने कहाँ से सीखा?”
“किताबों से,” मैंने कहा। “और तीन हफ़्ते तक आपको देखकर।”
वो उठकर मेरे ऊपर झुकी। “तीन हफ़्ते तक देखकर क्या सोचा था?”
“बहुत कुछ,” मैंने कहा। “कि आपको कैसे चूमूँगा, कहाँ से शुरू करूँगा, आप कहाँ हँसेंगी, कहाँ कराहेंगी।”
“और आज कितना मिला?”
“आज जो मिला,” मैंने कहा, “वो सोच से भी बेहतर था।”
उसने मुझे चूमा और फिर मेरे कान में फुसफुसाई, “तो फिर शुरू कर, और इस बार मुझे पूरा तोड़।”
दूसरी बार और लंबा चला। इस बार उसने ऊपर आकर खुद चलाया — मेरे ऊपर बैठकर, दोनों हाथ मेरी छाती पर, और वो जिस लय में चलती थी, वो उसकी अपनी थी। उसके दूध झूलते थे और मैं उन्हें नीचे से पकड़कर ऊपर उठाता था। उसने आँखें खुली रखीं, मुझे देखती रही, और मुस्कुराती रही।
फिर करवट, फिर पीछे से, फिर मेरे ऊपर, फिर फिर करवट। हमने लगभग हर पोज़ आज़माया और हर बार वो पहले से ज़्यादा खुलती गई।
तीसरी बार के बाद वो बिस्तर पर पसर गई, आँखें बंद, साँस भारी। उसके शरीर पर पसीना था और वो हिलने की हालत में नहीं थी।
“अब बस,” वो बोली। “अब मर गई हूँ।”
मैंने उसके बाल कान के पीछे किए और उसके कंधे पर होंठ रखे। “रात अभी बची है,” मैंने कहा।
“रात बची है,” उसने आँखें बंद किए हुए कहा, “पर मैं नहीं।”
सुबह हम देर तक सोए। जब उठे तो धूप खिड़की से आ रही थी और वो मेरी बाँह में थी। उसने आँखें खोलीं और पहले कुछ सेकंड मुझे पहचानने में वक़्त लिया — फिर याद आया और वो मुस्कुराई, धीमी, नींद भरी मुस्कुराहट।
“क्या सोच रही हैं?” मैंने पूछा।
“कि आज घर जाना है,” उसने कहा। “और यह कमरा छोड़ने का मन नहीं है।”
हमने नाश्ता कमरे में मँगाया। वो मेरी कमीज़ पहनकर बैठी — बस कमीज़, कुछ नहीं। कमीज़ उसके लिए बड़ी थी और घुटनों तक आ रही थी, और उसके दूध कमीज़ के कपड़े से झलक रहे थे।
“यह कमीज़ मुझे दे देना,” उसने कहा।
“क्यों?”
“घर में पहनूँगी,” उसने कहा। “जब तुझसे मिलने का मन करेगा।”
“और जब ज़्यादा मन करेगा?”
“तब तेरे पास आ जाऊँगी,” उसने कहा, और रोटी के टुकड़े पर मक्खन लगाती रही, जैसे कोई बहुत साधारण बात हो।
हम ग्यारह बजे चेकआउट के लिए नीचे गए। पार्किंग में उसकी कार और मेरी कार अलग-अलग खड़ी थीं। जाने से पहले वो मेरे पास आई और बिना कुछ कहे मुझे गले लगा लिया।
“दो दिन,” उसने मेरे कान में कहा।
“दो दिन,” मैंने दोहराया।
वो गई। मैं कार में बैठकर उसकी गाड़ी के पीछे के लाल बत्ते देखता रहा जब तक वो मोड़ से गायब नहीं हुई।
उस रात ग्यारह बजे फ़ोन बजा। नूर बानो।
“सो गए?” उसने पूछा।
“नहीं,” मैंने कहा।
“मैं नहीं सो पा रही,” उसने कहा। “आँख बंद करती हूँ तो तेरा चेहरा दिखता है। तेरे हाथ याद आते हैं। वो तीन बार… साहिल, तीन बार…”
“और चौथी बार?”
वो रुकी। फिर बोली, “चौथी बार नहीं हुआ, यही तो खल रहा है।”
हम उस रात दो बजे तक बात करते रहे। उसने बताया कि घर लौटकर उसे सब कुछ फीका लगा — जुल्फी का “खाना बन गया?” पूछना, टीवी के सामने बैठ जाना, बिस्तर पर करवट बदलकर सो जाना। उसने बताया कि वो मेरी कमीज़ पहनकर सोई थी और उसकी खुशबू में उसका दिल बैचेन रहा।
“कल क्या कर रहे हो?” उसने पूछा।
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “तुम्हारा इंतज़ार।”
“तो इंतज़ार मत करो,” उसने कहा। “कल दोपहर मैं स्टूडियो से निकलूँगी, दो बजे। कहीं और चलेंगे। दूसरा होटल।”
“जुल्फी कब लौटेगा?”
“परसों रात,” उसने कहा। “दो दिन हमारे हैं। और साहिल… एक बात है।”
“क्या?”
“मुझे और चाहिए,” उसने धीमे से कहा। “बहुत और। और इस बार वो सब चाहिए जो शादीशुदा लोग करते हैं और हमने नहीं किया। मुझे तेरा लंड मुँह में चाहिए। मुझे अपनी गांड दिलवानी है। मुझे तेरे नीचे रात भर रहना है।”
मेरा हाथ फ़ोन पर कस गया।
“कल दो बजे,” मैंने कहा।
“कल दो बजे,” उसने दोहराया। “और साहिल — होटल ऐसा लेना जहाँ बाथटब हो।”
वो हँसी और फ़ोन काट दिया।
मैं छत पर गया और आधे घंटे तक तारे देखता रहा। 5.2 इंच — और एक औरत जो दो दिन में उसे अपना बना चुकी थी। दो दिन बाद जुल्फी लौटेगा, और तब से नूर बानो की रातें दो हिस्सों में बँट जाएँगी — दिन में जुल्फी की, रात को फ़ोन पर मेरी।
और उस रात, सोने से पहले, मैंने उसके आख़िरी मैसेज को फिर पढ़ा:
“आज रात सोते वक़्त अपना लंड पकड़कर सोना। कल मैं हिसाब करूँगी कि कितना बड़ा है।”
अगले हिस्से में: दूसरा होटल, बाथटब, और वो सब जो नूर बानो ने माँगा — और उसके बाद वो रातें जब वो घर में सोते हुए भी मेरा नाम फुसफुसाती है।
NEXT PART:
- करवा चौथ के दिन मैंने अपने गर्लफ्रेंड को चोदा
- दोस्त की मम्मी को उनके घर में चोदा
- बहन को पहले रखैल बनाया और फिर शादी की
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