तिलक नगर में अपनी कंपनी के HR को पटाकर चोदा

hr chudai kahani

मेरा नाम आदित्य है। उम्र बीस साल। लंबाई पाँच फुट चार इंच। वज़न पचास के आसपास, चेहरा साधारण, बाल घने काले, आँखें बड़ी-बड़ी और भोली।

और मेरे लंड की लंबाई सात इंच है — ये मैंने दसवीं कक्षा में फ़ीते से नापी थी, और उस दिन से यही एक चीज़ थी जिस पर मुझे अपने आप पर सच में गर्व था।

क्योंकि बाकी सब कुछ — नौकरी, पैसा, गाड़ी — सब आगे की कहानी थी, और ये एक चीज़ पहले से मेरे पास थी।

तिलक नगर, पश्चिमी दिल्ली। भीड़, धूल, छोटी-छोटी दुकानें, ऊपर उठती हुई बिल्डिंगें और उन बिल्डिंगों के अंदर चलने वाला एक दूसरा शहर — कॉल सेंटर, कोचिंग, स्टार्टअप, डिजिटल एजेंसियाँ।

मैं ऐसी ही एक डिजिटल मार्केटिंग कंपनी में काम करता हूँ, जहाँ सुबह नौ बजे मेट्रो से उतरकर मैं उस भीड़ में घुल जाता हूँ जिसमें हज़ार चेहरे होते हैं और कोई चेहरा याद नहीं रहता।

पर एक चेहरा था जो याद रह गया। और वो चेहरा था — रिया मल्होत्रा।

कंपनी की HR। उम्र उनतीस साल। अनमैरिड। और इतनी खूबसूरत कि आप पहली नज़र में भरोसा नहीं कर पाते कि वो आपके ही ऑफिस में बैठी है।

लंबा कद, हल्का सा घूमा हुआ शरीर, कमर वो जिसे देखकर शायरी लिखने का मन करे, और चलने का एक अंदाज़ जिसमें ऊँची सैंडल की टक-टक पूरे कॉरिडोर में गूँजती थी।

बाल हमेशा खुले या एक ढीली जूड़ा में, होंठों पर हल्का गुलाबी लिपस्टिक, और आँखों में काजल। कपड़े — बिल्कुल नए ज़माने की लड़की जैसे।

कभी बॉडी-हगिंग वाला फॉर्मल शर्ट, कभी हाई-वेस्ट ट्राउज़र, कभी लंबी स्लिट वाली स्कर्ट, और शुक्रवार को तो पूरा ऑफिस उनके अंदाज़ का मुरीद हो जाता था।

वो जब किसी की तरफ़ मुड़कर मुस्कुराती थीं, तो लगता था कि पूरे फ़्लोर की लाइट एक साथ बढ़ गई है।

और वो मुझसे नौ साल बड़ी थीं। नौ साल। जब मैं ग्यारहवीं में था, तब वो कॉलेज पास कर चुकी थीं। फिर भी किसी ने उन्हें उम्र का एहसास कभी नहीं दिया, क्योंकि उनकी एनर्जी, उनकी हँसी, उनकी बातें — सब बीस-बाईस साल की किसी लड़की से कहीं ज़्यादा ज़िंदा थीं।

उनमें वो चीज़ थी जो लड़कियों में उम्र के साथ आती है — एक भरोसा, एक ठहराव, एक सुकून। और साथ में वो चीज़ भी जो नए ज़माने की लड़की में होती है — बेखौफ़, खुली, मॉडर्न।

अब सोचिए — बीस साल का लड़का, सात इंच का लंड, और एक ऐसी औरत जिसके लिए दिल में जगह बनाने के लिए आसमान भी छोटा पड़ जाए।

वो दिन आज भी याद है। जुलाई की शुरुआत, तेज़ धूप, और मैं पहली नौकरी के इंटरव्यू पर आया था। नई शर्ट पहनी थी, जूते चमकाए थे, और हाथों में एक फ़ाइल जिसमें दस बार छपा हुआ रिज़्यूमे था।

तिलक नगर में एक छोटी सी बिल्डिंग के तीसरे फ़्लोर पर कंपनी थी। लिफ़्ट में चढ़ते वक़्त दिल धक-धक कर रहा था।

रिसेप्शन पर एक लड़की बैठी थी, जिसने मुझे बैठने को कहा। पंद्रह मिनट बाद दरवाज़ा खुला और वो आईं।

रिया मल्होत्रा।

उस दिन उन्होंने ऑफ-व्हाइट रंग का एक फ़िटेड शर्ट पहना हुआ था, जिसके ऊपर के दो बटन खुले थे, और नीचे गहरे रंग की हाई-वेस्ट ट्राउज़र।

बाल ऊँचे जूड़े में बँधे थे, गर्दन पर एक पतला सोने का चेन, कानों में छोटे झुमके। और हाथों में एक क्लिपबोर्ड, जिस पर मेरा रिज़्यूमे लगा था।

वो दरवाज़े पर ठहरीं, मुझे ऊपर से नीचे देखा, और मुस्कुराकर बोलीं —

“आदित्य?”

“जी… जी मैम,” मेरी आवाज़ अटक गई।

“मैम नहीं, रिया। चलिए, अंदर चलिए।”

वो मुड़ीं और चलीं, और मैं उनके पीछे-पीछे। उस दिन उन्होंने हील नहीं पहनी थी, फ्लैट्स पहने थे, फिर भी उनका कद मुझसे कुछ ऊँचा लग रहा था — या शायद ऐसा लग रहा था क्योंकि मैं उनके सामने खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था।

उनकी पीठ देखते हुए मेरी नज़र उनकी कमर से फिसलकर नीचे चली गई, और फिर मुझे होश आया कि मैं उन्हें घूर रहा हूँ।

कैबिन के अंदर उन्होंने मुझे कुर्सी दिखाई और खुद सामने बैठ गईं।

पहले दस मिनट तो सब फ़ॉर्मलिटी रही — पढ़ाई, स्किल्स, सैलरी एक्सपेक्टेशन। फिर उन्होंने रिज़्यूमे बाज़ू में रखा और मुझसे पूछा —

“आदित्य, बताइए, तिलक नगर में क्यों?”

“क्योंकि यहीं काम मिला,” मैंने सच कह दिया, और वो हँस पड़ीं।

उनकी हँसी सुनकर लगा जैसे कमरे में ठंडी हवा आ गई हो।

और उनके हँसते वक़्त उनकी गर्दन और कॉलरबोन की लाइन ऐसी दिख रही थी कि मैं उनसे आँखें हटाना भूल गया।

“बेईमान लड़के हो,” उन्होंने कहा। “अच्छा लगा। ईमानदारी अच्छी बात है।”

इंटरव्यू खत्म हुआ। मैं उठा, उनसे हाथ मिलाया। उनका हाथ छोटा, नरम और ठंडा था, और मेरा हाथ पसीने से भीगा।

हाथ मिलाते वक़्त उन्होंने मेरी आँखों में देखा — सीधा, बिना झिझक — और मुझे लगा जैसे वो मेरे अंदर कुछ पढ़ रही हैं।

बाहर निकलकर मैंने सीढ़ियों पर खड़े होकर लंबी साँस ली। दिल में एक ही बात थी — ये लड़की मिलनी चाहिए।

तीन दिन बाद मेल आया। सिलेक्शन हो गया।

और उस दिन से मैं उनका दीवाना हो गया था। सच में। पूरा, बेपनाह, बेवकूफ़ों वाला दीवाना।

पहले दिन जब मैं ऑफिस पहुँचा, तो पहले तो मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि वो दिखेंगी।

पर HR की सीट ठीक कॉरिडोर के उस मोड़ पर थी, जहाँ से हर कोई गुज़रता था। और हर बार जब भी मैं गुज़रता, वो सिर उठाकर देखतीं, और मुस्कुराकर कहतीं — “हाँ आदित्य, सब ठीक?”

बस इतना। दो शब्द। और मेरा पूरा दिन बन जाता।

ऑफिस में लोग उन्हें ‘मैम’ कहते थे। मैं भी पहले ‘मैम’ ही कहता रहा। पर एक दिन उन्होंने कहा —

“आदित्य, तुम मुझे मैम क्यों कहते हो? रिया बोलो। मुझे उम्र का एहसास तुम्हारे मैम बोलने से होता है।”

“आप बड़ी हैं ना… तो रेस्पेक्ट…” मैंने हकलाकर कहा।

“रेस्पेक्ट ठीक है, पर बड़ी मत कहो,” उन्होंने आँखें सिकोड़कर कहा। “वैसे भी नौ साल कौन सा सौ साल है।”

“ठीक है… रिया।”

उस दिन मैंने पहली बार उनका नाम लिया। रिया। जैसे मुँह से निकला, वैसे ही लगा कि ये नाम अब मेरा हो गया है।

धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं। सुबह चाय लेते वक़्त हम टकराते, वो कहतीं — “मेरे लिए भी लाओगे?” और मैं दो कप लेकर आता।

लंच में वो अक्सर अपने डेस्क पर ही खातीं, और मैं बहाना बनाकर उनके पास जाकर बैठ जाता। बातें होतीं — कॉलेज, दिल्ली, फ़िल्में, घूमने की जगहें, बचपन।

और मैं चुपके-चुपके उन्हें देखता रहता। जब वो कंप्यूटर पर टाइप करतीं और झुकतीं, तो उनकी शर्ट की गर्दन से नीचे की लाइन दिखती, और मैं हिसाब लगाता कि कहाँ तक देख पाया।

जब वो कॉफ़ी का कप उठातीं, तो उनकी उँगलियाँ, उनकी कलाई, उनकी बाँह — सब कुछ देखता रहता।

और जब वो अपने बालों को एक तरफ़ झटककर पीछे करतीं, तो उनकी गर्दन की नसें उभरतीं, और मुझे अंदर तक कुछ होता।

रात में घर जाकर मैं उनके सोशल मीडिया को खंगालता। उनकी पुरानी फ़ोटो देखता — ट्रेकिंग की, बीच की, पार्टी की।

एक फ़ोटो में उन्होंने गोल्डन रंग की टॉप पहनी थी और पानी के किनारे खड़ी थीं। उस फ़ोटो को मैंने सेव कर लिया।

दूसरी में वो बर्थडे पर केक काट रही थीं, लाल ड्रेस में, हँसते हुए।

तीसरी में साड़ी में — क्लासिक, पूरी हिंदुस्तानी, पर उन पर जो लग रही थी, वो किसी डिज़ाइनर के शो से कम नहीं थी।

एक रात उन्होंने मुझे मैसेज किया — “सो गए?”

रात ग्यारह बजे। मेरा दिल बैठ गया।

“नहीं,” मैंने तुरंत टाइप किया, बहुत तेज़, बहुत बेवकूफ़ों की तरह।

“कल ऑफिस में एक प्रेज़ेंटेशन है, उसका फ़ॉर्मैट देख लेना। बस इसलिए मैसेज किया।”

“ओह… ठीक है,” मैंने लिखा, और अंदर से थोड़ा टूटा।

फिर अगला मैसेज आया — “वैसे अभी तक जाग क्यों रहे हो? सोच रही थी कि शायद किसी और के साथ बात कर रहे हो।”

“किसी और के साथ क्यों बात करूँगा?” मैंने पूछा।

“क्यों, तुम्हारी उम्र की लड़कियाँ तो होल ही होंगी…” और साथ में एक स्माइली भेजी।

मैंने जवाब में लिखा — “होली हैं। पर एक और है।”

“कौन?” उन्होंने तुरंत पूछा।

मैंने बहादुरी से लिखा — “ऑफिस में है। उम्र में बड़ी है। नाम रिया है।”

पढ़ते ही उन्होंने लिखा — “अच्छा। कल ऑफिस में बात करेंगे।”

और फिर दोनों ने किसी ने ‘गुड नाइट’ नहीं लिखा। जैसे दोनों को पता था कि अब नींद नहीं आएगी।

अगले दिन ऑफिस में वो पहले से भी ज़्यादा खूबसूरत लग रही थीं — या शायद मुझे वैसा लग रहा था।

हम दोनों एक-दूसरे को देखते और मुस्कुरा देते, और बीच में कुछ न कहते। जब आसपास कोई नहीं होता, वो चुपके से पूछतीं — “कल ठीक से सोए?”

“नहीं,” मैं कहता।

“मैं भी नहीं,” वो कहतीं, और मुस्कुरा देतीं।

धीरे-धीरे हमारी बातों की दूरी कम होती गई। पहले ‘आप’, फिर ‘तुम’। पहले ऑफिस की बातें, फिर घर की। पहले टेक्स्ट, फिर लंबी कॉल। पहले दस मिनट की कॉल, फिर पूरी रात।

एक रात उन्होंने अपने बारे में बताया — कि तीन साल पहले एक रिश्ता टूटा था, जिसमें शादी तक बातें पहुँच गई थीं, और फिर लड़के ने पीछे हट गया।

उसके बाद उन्होंने अपने आप पर भरोसा करना सीखा, अकेले रहना सीखा, अकेले घूमना सीखा। “अब डर नहीं लगता,” उन्होंने कहा। “बस कभी-कभी रात में लगता है कि बिस्तर बहुत बड़ा है।”

उस रात मैंने लिखा — “तो बिस्तर छोटा करना पड़ेगा।”

उन्होंने जवाब दिया — “कैसे?”

मैंने लिखा — “किसी को एक तरफ़ सोने बुलाकर।”

उस रात फिर किसी ने ‘गुड नाइट’ नहीं कहा।

अब हमारी दिनचर्या बन गई थी। सुबह की चाय साथ, लंच साथ, शाम को एक-साथ निकलना — पहले बस मेट्रो स्टेशन तक, फिर थोड़ी दूर चलना, फिर एक कॉफ़ी शॉप जिसकी कोने वाली सीट हमारी हो गई थी।

उस सीट पर बैठकर हम घंटों बातें करते, और हमारे हाथ टेबल के नीचे एक-दूसरे को छूते रहते — पहले इत्तेफ़ाक़ से, फिर जान-बूझकर।

पहली बार हाथ पकड़ना — वो भी याद है। शाम थी, बारिश से पहले वाली हवा, और हम ऑफिस से निकलकर सड़क के किनारे चल रहे थे।

एक बाइक तेज़ी से गुज़री और मैंने उन्हें खींचकर अपनी तरफ़ किया। मेरा हाथ उनकी कमर पर गया, और वो एक सेकंड वहीं रुक गईं।

“सॉरी,” मैंने कहा।

“किस बात की सॉरी?” उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए पूछा।

और फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँस गईं, और उन्होंने पकड़ ढीली नहीं की।

पूरे रास्ते हम वैसे ही चले, बातें करते हुए, और मेरा दिल जैसे मेट्रो की पटरियों पर दौड़ रहा था।

उस शाम बिछड़ते वक़्त उन्होंने कहा — “आदित्य, तुम्हें पता है ना कि हम दोनों के बीच कुछ हो रहा है?”

“पता है,” मैंने कहा।

“और तुम ठीक हो इससे? उम्र का फ़र्क़, लोग क्या कहेंगे, घर क्या कहेगा…”

“रिया,” मैंने कहा, “जब आपको देखता हूँ तो उम्र याद ही नहीं रहती। और जब आपसे बात करता हूँ तो लोगों का ख्याल भी नहीं रहता।”

वो एक पल चुप रहीं, फिर बोलीं — “तुम मुझे ‘आप’ कब कहना बंद करोगे?”

“जब आप कहें,” मैंने कहा।

“तो अब से तुम बोलो,” उन्होंने कहा, और मुड़कर चल दीं।

दो हफ़्ते बाद उन्होंने खुद कहा — “आदित्य, शनिवार को फ़्री हो?”

“आपके लिए तो हमेशा,” मैंने कहा।

“तो चलो कहीं डिनर करने चलेंगे। ठीक से। ऑफिस वाला नहीं, असली वाला।”

उस शनिवार मैंने तीन घंटे पहले से तैयारी शुरू कर दी। नहाया, दाढ़ी बनाई, नई शर्ट निकाली, परफ़्यूम लगाया, बाल सेट किए।

तीन बार आईने के सामने खड़ा हुआ और तीन बार लगा कि कुछ तो कम है।

शाम सात बजे मैं होटल के लॉबी में पहुँचा — करोल बाग के पास एक बढ़िया होटल, जिसकी छत पर रूफ़टॉप रेस्टोरेंट था।

मैं पाँच मिनट पहले पहुँच गया, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं वो पहले न आ जाएँ।

और फिर वो आईं।

उस रात उन्होंने ब्लैक रंग की ड्रेस पहनी थी — शोल्डर पर पतले स्ट्रैप, कमर पर फ़िट, और घुटनों से थोड़ा ऊपर तक।

बाल खुले, एक तरफ़ से लहराते हुए, होंठों पर गहरा लिपस्टिक, और गले में एक चाँदी का पेंडेंट। उनके हाथ में एक छोटा क्लच था। और जब वो लॉबी में चलकर आईं, तो लगा जैसे पूरी लॉबी उनके लिए बनी है।

मैं खड़ा हो गया। हाथ हिलाना भी भूल गया।

“क्या हुआ?” उन्होंने मुस्कुराकर पूछा। “जुबान गई कहाँ?”

“आप… आप आज…” मैंने कहा, और आगे शब्द नहीं मिले।

“अच्छी लग रही हूँ?” उन्होंने शरारत से पूछा।

“बहुत ज़्यादा,” मैंने कहा। “इतनी कि साँस लेना भूल जाऊँ।”

वो हँसीं और मेरी बाँह में हाथ डालकर बोलीं — “चलो अब।”

लिफ़्ट से हम छत पर गए। रूफ़टॉप पर मद्धम रोशनी थी, फेयरी लाइट्स लटकी थीं, कोनों पर छोटे पौधे, और किनारे पर शहर की लाइटें — दूर तक फैला हुआ दिल्ली का जगमगाता नक़्शा। हवा ठंडी थी और उनकी खुशबू उस हवा में घुलकर मेरे पास आ रही थी।

वेटर ने हमें कोने वाली टेबल पर बिठाया। मोमबत्ती जलाई। मेन्यू दिया। और मैंने मेन्यू खोलकर देखा भी नहीं, क्योंकि सामने बैठी लड़की को देखने में पूरा ध्यान लगा हुआ था।

“मेन्यू देखो,” उन्होंने कहा।

“देख रहा हूँ,” मैंने कहा।

“मेन्यू में क्या लिखा है?”

“नहीं पता,” मैंने सच कहा, और वो हँस पड़ीं।

उस रात हमने वाइन ली, दो स्टार्टर, और पास्ता। पर असली स्वाद उन बातों का था।

हमने उन चीज़ों के बारे में बात की जो पहले कभी नहीं की थी — उन्होंने बताया कि वो शादी क्यों नहीं करना चाहतीं, मैंने बताया कि मुझे घर से क्या दबाव है, हमने बताया कि हमने पहली बार एक-दूसरे को कब देखा था।

मैंने कहा — इंटरव्यू वाले दिन, जब आप दरवाज़े पर आईं थीं।

उन्होंने कहा — मैंने उस दिन तुम्हें देखा था, और सोचा था कि ये लड़का बहुत घबराया हुआ है, पर आँखों में ईमानदारी है।

“और ईमानदारी क्यों पसंद आई?” मैंने पूछा।

“क्योंकि ईमानदार लड़के झूठ कम बोलते हैं,” उन्होंने कहा। “और मैंने ज़िंदगी में बहुत झूठ सुने हैं।”

फिर वो खामोश हो गईं। मोमबत्ती की लौ उनके चेहरे पर नाच रही थी।

हवा से उनके बाल उड़कर गाल पर आ रहे थे, और वो उन्हें बार-बार पीछे कर रही थीं।

मैंने कहा — “रिया।”

“हम्म।”

“मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ।”

उन्होंने कुछ सेकंड मेरी आँखों में देखा। फिर कुछ नहीं कहा। बस वाइन का ग्लास रखा, कुर्सी थोड़ी आगे खींची, और मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा।

“आदित्य,” उन्होंने कहा, “तुम्हें पता है? मैंने तुम्हारी उम्र वाले लड़कों को हमेशा बच्चा समझा। पर तुमने मुझे ग़लत साबित कर दिया।”

“तो मतलब…”

“तो मतलब ये कि,” उन्होंने कहा, “मैं भी।”

और फिर उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में कस लिया, और मुस्कुराकर वाइन का आख़िरी घूँट लिया।

डिनर के बाद हम छत के किनारे वाली रेलिंग पर खड़े हो गए। नीचे शहर था, ऊपर आसमान। उनका कंधा मेरे कंधे से छू रहा था।

और मैंने हिम्मत करके उनकी कमर पर हाथ रख दिया। वो एक पल के लिए काँपीं, फिर मेरी तरफ़ झुक गईं और अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया।

“आदित्य,” उन्होंने धीरे से कहा।

“जी।”

“इस रात को खत्म मत होने देना।”

“कोशिश करूँगा,” मैंने कहा।

उस रात हम होटल के लॉन्ग में बैठे रहे, एक-दूसरे की उँगलियाँ पकड़े, और बारह बजे से पहले घर नहीं गए।

बिछड़ते वक़्त उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और मेरे माथे पर होंठ रख दिए। फिर मुस्कुराकर बोलीं — “अगला वीकेंड भी बुक है।”

उस डिनर के बाद दो महीने में हमारा रिश्ता उस मुक़ाम पर पहुँच गया जहाँ लोग सिर्फ़ प्रेमी नहीं रहते — वो एक-दूसरे की आदत बन जाते हैं।

सुबह का पहला मैसेज उनका, रात का आख़िरी मैसेज मेरा। ऑफिस में हम चुपचाप एक-दूसरे को देखते और मुस्कुरा देते, और कभी-कभी लिफ़्ट में, जब कोई और न होता, वो मेरा हाथ दबा देतीं।

हर शनिवार-रविवार अब हमारा हो गया था। दो महीने में हमने जो किया, वो एक कहानी है अपने आप में —

पहला वीकेंड — कनॉट प्लेस। हमने एक फ़िल्म देखी, जिसमें हमें फ़िल्म याद नहीं रही क्योंकि हम एक-दूसरे का हाथ पकड़े बैठे थे और अंधेरे में उन्होंने एक बार मेरे गाल पर होंठ रख दिए थे।

दूसरा वीकेंड — गुड़गाँव का एक रूफ़टॉप कैफ़े। हमने लंबे समय तक बैठकर बातें कीं, और उस रात उन्होंने पहली बार मुझे ‘बेबी’ कहा। मैं तीन बार उन्हें ‘बेबी’ कहलवाता रहा, बस सुनने के लिए।

तीसरा वीकेंड — हौज़ खास विलेज। हमने गली-गली घूमा, स्ट्रीट फ़ूड खाया, एक दुकान से उन्होंने मेरे लिए ब्रेसलेट खरीदी, और दूसरी दुकान से मैंने उनके लिए एक झुमका।

झुमका पहनकर उन्होंने पूछा — “कैसा लग रहा है?”

और मैंने कहा — “आप पर सब कुछ अच्छा लगता है।”

चौथा वीकेंड — एक होटल। दिन भर घूमे, शाम को होटल का कमरा, और पहली बार हम घंटों एक-साथ एक कमरे में बंद रहे। उस रात हमने चूमा — असली, लंबा, टूटता हुआ चुंबन। उनके होंठ नरम थे और उनकी साँस में वाइन की खुशबू थी। मैंने उनकी कमर पकड़ी, उन्होंने मेरी गर्दन पकड़ी, और हम कई मिनट तक एक-दूसरे से चिपके रहे।

पाँचवां वीकेंड — एक बुटीक होटल, जहाँ का कमरा बड़ा था, बिस्तर बहुत बड़ा, और बाथरूम में बड़ा सा टब। उस रात हमने पहली बार एक साथ नहाए — अलग-अलग नहीं, एक-साथ, टब में, झाग और गर्म पानी के बीच।

और उस रात पहली बार मैंने उनके शरीर को करीब से देखा — असली में, बिना कपड़ों के, बिना किसी लाइट की शरारत के।

छठा वीकेंड — दिल्ली से बाहर, नीलकंठ की ड्राइव। पहाड़, हरा-भरा, बारिश, और रास्ते में एक छोटा सा रिज़ॉर्ट। हम वहाँ रुके, और उस रात उन्होंने मुझे बताया कि वो मुझसे कितना प्यार करती हैं — इतना कि डर लगने लगा है।

“किस बात का डर?” मैंने पूछा।

“इस बात का कि तुम बीस के हो,” उन्होंने कहा। “और मैं उनतीस। कल को तुम्हारे घर वाले, तुम्हारी उम्र की लड़की चाहेंगे।”

“तो?” मैंने कहा।

“तो क्या करोगे?”

मैंने उनका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया और कहा — “जब तक आप मेरी हैं, मैं किसी और की तरफ़ नहीं देखूँगा। और जब आप मेरी न रहें, तब भी नहीं।”

वो हँसीं, फिर रो पड़ीं, फिर दोनों ने उस रात देर तक एक-दूसरे को जकड़े रखा।

सातवें वीकेंड पर उन्होंने कहा — “आदित्य, अगला वीकेंड तुम्हारे घर पर। तुम्हारा फ्लैट है ना?”

“है,” मैंने कहा। “पर छोटा है।”

“तो क्या हुआ,” उन्होंने कहा। “बिस्तर तो बड़ा है ना?”

और मैं समझ गया कि सिर्फ़ घूमना ही नहीं, अब कुछ और भी है।

वो हफ़्ता मेरी ज़िंदगी का सबसे लंबा हफ़्ता था। मैंने पूरे फ्लैट की सफ़ाई की — कोना-कोना। बेडशीट बदली, नई सफ़ेद बेडशीट लगाई। तकिया धोया। बाथरूम चमकाया। किचन में बर्तन तक सही जगह रखे। दो नए मोमबत्तियाँ खरीदीं, एक छोटा सा स्पीकर जिस पर लो-फ़ाई प्लेलिस्ट चलाई जा सके, और एक बोतल वाइन।

शनिवार शाम वो आईं। पहली बार मेरे घर। दरवाज़ा खोला, और वो अंदर आईं, चारों तरफ़ देखा, और मुस्कुरा दीं।

“साफ़-सुथरा रखा है,” उन्होंने कहा।

“आपके लिए,” मैंने कहा।

“बस मेरे लिए?” उन्होंने भौंहें उठाईं।

“और किसके लिए रखूँगा?”

उन्होंने बैग रखा, जूते उतारे, और सीधे सोफ़े पर बैठ गईं। फिर पैर फैलाकर बोलीं — “थक गई हूँ।”

मैंने उनके पैर दबाने शुरू किए, और वो आँखें बंद करके बैठ गईं।

दस मिनट बाद उन्होंने धीरे से कहा — “आदित्य, तुम्हें पता है आज हम यहाँ क्यों आए हैं?”

“पता है,” मैंने कहा।

“तो फिर इतना फ़ॉर्मल क्यों है?”

मैं हँस पड़ा। “क्योंकि डर लग रहा है।”

उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा — सीधा, गहरा।

“डरो मत,” उन्होंने कहा। “आज रात तुम्हारे पास एक औरत है जो तुम्हें चाहती है। बस इतना याद रखो।”

हमने वाइन पी। थोड़ा खाया। मोमबत्तियाँ जलाईं। स्पीकर पर धीमी इंस्ट्रुमेंटल बज रही थी। और फिर वो मेरे पास आकर बैठ गईं — इतनी पास कि उनका घुटना मेरे घुटने से टकरा गया।

“बात कर रहे हो?” उन्होंने पूछा।

“नहीं,” मैंने कहा।

“तो चुप क्यों हो?”

“क्योंकि देख रहा हूँ।”

“क्या देख रहे हो?”

“आपको।”

और फिर मैंने हिम्मत की।

मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में लिया — धीरे से, जैसे कोई कीमती चीज़ उठाई जाए। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। और मैंने उनके माथे पर, फिर आँखों पर, फिर गालों पर, फिर ठुड्डी पर होंठ रखे। और आख़िर में उनके होंठों पर।

वो चुंबन पहले धीमा था, फिर गहरा होता गया। उन्होंने अपने हाथ मेरी गर्दन के पीछे लपेट दिए, और मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने लगीं।

उनकी साँस तेज़ हो गई थी, और उनके होंठ खुल गए थे। मेरी जीभ उनकी जीभ से मिली, और वो एक लंबी साँस लेकर मुझसे और चिपक गईं।

मैंने उनकी गर्दन चूमनी शुरू की — कान के नीचे, जबड़े की लाइन पर, कॉलरबोन तक। और जहाँ-जहाँ मेरे होंठ लगते, वहाँ उनका शरीर हल्का सा काँप जाता।

उन्होंने सिर पीछे किया, आँखें बंद कर लीं, और धीरे से कहा — “आदित्य…”

मैंने उनकी ड्रेस की ज़िप खोली — धीरे से, बहुत धीरे। ड्रेस उनके शरीर से फिसलकर नीचे गिरी, और सामने वो खड़ी रहीं — ब्लैक लेस वाले ब्रा में, जिसमें उनका दूध का ऊपरी हिस्सा साफ़ दिख रहा था। मेरी साँस रुक गई।

“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा।

“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस… बहुत सुंदर हैं आप।”

“और?” उन्होंने पूछा, जैसे जवाब की उम्मीद हो।

“और आपका दूध बहुत सुंदर है,” मैंने कहा, और वो हँस पड़ीं।

मैंने उन्हें गोद में उठाकर बेडरूम तक ले गया। बिस्तर पर लिटाया। मोमबत्ती की रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी।

मैंने उनके ब्रा की हुक खोली, और उनके दूध बाहर आ गए — पूरे, गोल, भारी, और उनके निपल्स गुलाबी-भूरे रंग के, जो अभी से सख़्त हो रहे थे।

मैंने पहले एक हथेली से पूरा दूध भरा और दबाया। वो कराह उठीं। फिर दूसरे को भी वैसे ही पकड़ा। और फिर मुँह झुकाकर एक निप्पल को होंठों में लिया।

जैसे ही मेरी जीभ उनके निप्पल पर लगी, उन्होंने मेरा सिर अपने हाथों से पकड़ लिया और कराहते हुए कहा — “ओह… आदित्य… हाँ…”

मैंने एक-एक निप्पल को चूसा, दाँतों से हल्का सा काटा, और जीभ से गोल-गोल घुमाया।

उनके निपल्स मेरे मुँह में सख़्त हो गए थे और वो लगातार मेरे बालों में उँगलियाँ फिरा रही थीं।

उनकी साँस तेज़, बेकाबू हो रही थी। मेरा हाथ धीरे-धीरे नीचे सरका — पेट पर, नाभि पर, और फिर उनके पैंटी के ऊपर।

वहाँ पहले से गर्मी थी। कपड़ा भीग चुका था।

“आदित्य…” उन्होंने फुसफुसाया।

“बोलिए,” मैंने कहा, बिना उनके निप्पल छोड़े।

“नीचे… नीचे उतारो।”

मैंने उनकी पैंटी नीचे खींची। वो मेरे सामने पूरी नंगी थीं — बिना किसी शर्म के, बिना किसी झिझक के, बस एक औरत जो चाहती थी।

उनकी बुर पूरी तरह से गीली थी, होंठ चमक रहे थे, और ऊपर का छोटा सा हिस्सा उभरा हुआ था।

मैंने उनके पैर फैलाए, और दो उँगलियाँ धीरे से बुर के होंठों पर फिराईं। वो कराह उठीं। फिर उँगली अंदर डाली — गर्म, नरम, तंग। उन्होंने कमर उठा दी।

“और… और अंदर,” उन्होंने कहा।

मैंने दो उँगलियाँ अंदर कीं और अंदर ही अंदर ऊपर वाले हिस्से को छूने लगा। उनका पूरा शरीर काँप रहा था। उनकी एक हाथ से चादर मुट्ठी में भरी हुई थी।

फिर मैंने मुँह नीचे किया और उनकी बुर पर होंठ रख दिए।

जैसे ही मेरी जीभ उनके होंठों को छू गई, उन्होंने ज़ोर से कराह मारी — “आह्ह्ह… आदित्य…” — और मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़कर अपने पास दबा लिया।

मैंने जीभ से ऊपर-नीचे, फिर गोल-गोल, फिर हल्के दाँतों से। उनकी बुर से रस बह रहा था, और मैं पूरा पी रहा था।

उनकी जाँघें मेरे कानों पर कस रही थीं। और पाँच मिनट में ही वो पहली बार आईं — पूरे शरीर में झटके, आँखें बंद, होंठ खुले, और गले से वो आवाज़ जो सिर्फ़ औरत निकालती है जब उसे छोड़ दिया जाए।

उसके बाद उन्होंने मुझे ऊपर खींचा, मेरी शर्ट उतारी, मेरी बेल्ट खोली, और मेरी पैंट नीचे खींची। और फिर उन्होंने मेरी बॉक्सर के ऊपर से हाथ रखा।

“इतना सख़्त?” उन्होंने मुस्कुराकर कहा।

“आपकी वजह से,” मैंने कहा।

बॉक्सर नीचे गई, और मेरा लंड बाहर आ गया — खड़ा, तना हुआ, सात इंच का, और आगे से चमकता हुआ।

रिया ने उसे देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, फिर फिर उसे देखा।

“आदित्य,” उन्होंने धीरे से कहा, “तुमने बताया नहीं था।”

“क्या?”

“ये।” उन्होंने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया। पूरा हाथ नहीं भरा। “तुम्हारी उम्र में लड़के ऐसे नहीं होते।”

और फिर उन्होंने झुककर उसे मुँह में लिया।

उन्होंने पहले सिर्फ़ ऊपर वाले हिस्से को चूसा, जीभ से गोल घुमाया, और फिर धीरे-धीरे पूरा नीचे तक ले गईं।

मेरा लंड उनके मुँह में गर्म और नरम लग रहा था, और उनकी जीभ नसों पर फिर रही थी। उन्होंने एक हाथ से नीचे मेरे अंडकोष को भी सहलाया। पाँच मिनट में मुझे लगा कि यहीं आ जाऊँगा, तो मैंने उन्हें रोक दिया।

“अभी नहीं,” मैंने कहा। “अंदर जाना है।”

वो मुस्कुराईं और पीठ के बल लेट गईं।

मैंने कंडोम निकाला — पर उन्होंने कहा, “निकाल दो। मुझे स्किन टू स्किन चाहिए।”

मैंने कंडोम हटा दिया। फिर उनके पैर फैलाए, अपने लंड को उनकी बुर के होंठों पर रखा, और हल्का सा रगड़ा। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। वो तड़प उठीं।

“अंदर डालो…” उन्होंने कहा।

“इतनी जल्दी?” मैंने चिढ़ाया।

“आदित्य, अंदर डालो वरना मैं खुद डाल लूँगी।”

मैं हँसा और एक झटके में पूरा अंदर डाल दिया।

उन्होंने ज़ोर से कराह मारी — “आआह्ह्ह…” — और अपनी जाँघें मेरी कमर पर कस लीं।

अंदर बहुत गर्म था। बहुत तंग। बहुत गीला। मैंने एक पल रुककर उनकी आँखों में देखा, और वो मुस्कुराईं — प्यार से, बिना शर्म के, जैसे कह रही हों — “अब तुम्हारा हूँ।”

और फिर मैंने धक्के मारने शुरू किए।

पहले धीमे — लंबे, गहरे, पूरे निकलकर पूरे अंदर। हर धक्के पर उनकी साँस टूटती। फिर तेज़ — छोटे, तेज़, लगातार।

उनका दूध मेरी छाती से रगड़ रहा था, उनके निपल्स मेरे सीने पर सख़्त होकर चुभ रहे थे।

मैंने एक हाथ से उनका दूध पकड़ा, दबाया, निप्पल को अँगूठे और उँगली के बीच दबाया, और वो और ज़ोर से कराहने लगीं।

“हाँ… हाँ… आदित्य… ऐसे ही…” वो बोल रही थीं, और उनकी आवाज़ में वो टूटन थी जो सिर्फ़ बिस्तर पर आती है।

मैंने उनके पैर अपने कंधों पर रखे और कोण बदला — अब हर धक्का ऊपर वाले हिस्से पर लग रहा था। वो मेरी पीठ पर नाखून गड़ाने लगीं।

“आदित्य… रुको नहीं… रुको मत…”

“नहीं रुकूँगा,” मैंने कहा, और और तेज़ कर दिया।

बिस्तर चरमरा रहा था। पूरा कमरा हमारी आवाज़ों से भरा हुआ था — मेरी साँस, उनकी कराह, चूमने की आवाज़, और वो गीली-गीली आवाज़ जो दो शरीरों के मिलने से होती है।

मैंने उन्हें करवट दिलाई — पीछे से। उन्होंने हाथों से दीवार पकड़ ली, कमर उठा दी, और मैंने पीछे से अंदर डाला। उस एंगल में वो पूरी तरह टूट गईं।

उनका दूध नीचे झूल रहा था, और हर धक्के पर हिल रहा था। मैंने पीछे से झुककर उनकी गर्दन चूमी, कान चूमा, और धीरे से कहा — “आप कितनी सुंदर हैं।”

“बेबी… बेबी…” वो बस इतना कह पा रही थीं।

फिर हम कुर्सी पर आए। वो मेरी गोद में बैठीं — सामने से, आमने-सामने, अपने हाथ मेरे कंधों पर। और मैंने नीचे से ऊपर धक्के मारे।

वो मेरी गोद में उछल रही थीं, बाल चेहरे पर आ रहे थे, आँखें आधी बंद, होंठ खुले।

मैंने उनका चेहरा दोनों हाथों में लेकर उनके होंठ चूमे, और उन्होंने मेरी जीभ अपने मुँह में खींच ली।

“आदित्य,” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया, “आज तुम मुझे पूरा तोड़ दो।”

और मैंने तोड़ दिया।

फिर मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया, उनके दोनों पैर फैलाए, और अपनी पूरी ताक़त से धक्के मारे।

उनकी बुर मेरे लंड को पूरा निगल रही थी, और हर धक्के पर वो नीचे से ऊपर को उठती थीं।

उनके निपल्स पर मैंने मुँह रखा, एक चूसा, फिर दूसरा। उनका दूध मेरे हाथ में भरा हुआ था। उनकी साँस टूट रही थी। उनके पैर मेरी कमर पर कस रहे थे।

“आ रही हूँ…” उन्होंने कहा। “आदित्य… आ रही हूँ…”

“साथ आओ,” मैंने कहा।

और फिर वो आईं — पूरे शरीर में झटके, अंदर से सिकुड़ती हुई, मेरे लंड को कसकर पकड़ती हुई, और कराहती हुई इतनी ज़ोर से कि शायद पड़ोसी भी सुन रहे हों।

उसी पल मैंने भी छोड़ दिया — गहरे, लंबे, और पूरे अंदर। वो मेरी पीठ पर नाखून गड़ाए, आँखें बंद किए, और हाँफ रही थीं।

कुछ मिनट हम वैसे ही पड़े रहे। मैं अंदर ही था। उनकी साँस धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी। और फिर उन्होंने मेरा चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया और कहा —

“आदित्य, तुम मेरे पहले वाले से कहीं बेहतर हो। और तुम बीस के हो। ये मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा।”

“तो बर्दाश्त करने की ज़रूरत क्या है,” मैंने कहा। “हर शनिवार आ जाया करो।”

वो हँसीं, और मेरे सीने पर सिर रखकर सो गईं।

उस रात वो मेरे पास ही रहीं। सुबह उठकर उन्होंने मेरे लिए चाय बनाई — मेरी रसोई में, मेरी शर्ट पहनकर, बिना कुछ नीचे पहने। और वो नज़ारा उस रात की चुदाई से भी सुंदर था।

उसके बाद हमारा हर रविवार एक ही जैसा हो गया — और हर बार पहली बार जैसा।

सुबह वो आतीं, नाश्ता बनाते, फिर बिस्तर पर घंटों, फिर दोपहर में नहाते, फिर कहीं घूमने निकलते, और रात को फिर वही सब।

हमने अपने शरीर एक-दूसरे को सौंप दिए थे, बिना किसी हिसाब के।

महीनों में हमने सब कुछ आज़माया — रसोई में, सोफ़े पर, फ़र्श पर, बाथरूम के टब में, बालकनी में रात के अंधेरे में।

कभी धीमे और प्यार भरे, कभी तेज़ और जानवरों जैसे। वो मुझे ‘बेबी’ कहतीं, मैं उन्हें ‘रिया’ — कभी ‘जान’।

और हर बार के बाद वो मेरे सीने पर सिर रखकर कहतीं — “तुम बीस के हो, ये ग़लत है,” और फिर हँस देतीं।

और इस तरह पूरा एक साल गुज़र गया। बारह महीने। बावन रविवार।

पर फिर वो दिन आया।

वो बुधवार था। ऑफिस में मीटिंग जल्दी खत्म हो गई थी, और मैं आधे दिन की छुट्टी लेकर घर जाने वाला था।

रिया को बताया भी नहीं — सोचा सरप्राइज़ दूँगा, उनके पास चला जाऊँगा, शायद लंच साथ करें।

मैं उनके घर पहुँचा — जो अब मेरे लिए दूसरा घर था। दरवाज़े की चाबी भी मेरे पास थी। मैंने चुपचाप दरवाज़ा खोला।

अंदर से आवाज़ आ रही थी।

पहले तो लगा कि टीवी चल रहा है। पर फिर सुना — एक औरत की आवाज़, टूटती हुई, कराहती हुई। और एक मर्द की — भारी, गहरी।

मैंने जूते उतारे और धीरे से बेडरूम की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था। और मैंने अंदर झाँका।

रिया थीं — चारों हाथ-पैर पर, बिस्तर पर, बाल चेहरे पर बिखरे, पूरी नंगी। और उनके पीछे, घुटनों पर, एक आदमी था — मज़बूत शरीर, चौड़े कंधे, और उनकी कमर पकड़कर धक्के मार रहा था।

हर धक्के पर रिया का पूरा शरीर आगे-पीछे हिल रहा था, और वो बस ‘आह… आह…’ कर रही थीं।

उस आदमी को मैंने दो सेकंड में पहचान लिया।

कबीर रस्तोगी। मेरा टीम लीड। चौंतीस साल का, हमारे डिपार्टमेंट का मैनेजर, ऊँचा-चौड़ा, दाढ़ी वाला। वो भी पूरा नंगा।

मेरा दिमाग़ एक सेकंड के लिए सुन्न हो गया। फिर एक ही सवाल उठा — कब से?

मैंने दरवाज़ा थोड़ा और खोला। कबीर ने पहले देखा। वो रुक गया। रिया ने सिर घुमाकर मुझे देखा, और उनकी आँखें फैल गईं।

“आदित्य?” वो हाँफते हुए बोलीं।

कमरे में तीन लोग थे, मुझे तो बस चुप लग गयी थी, और एक बहुत भारी खामोशी।

फिर रिया बोलीं — “आदित्य, सुनो…”

और मैंने कहा — “रुको।” और फिर मुस्कुराया। “पहले कपड़े पहन लो, फिर बैठकर बात करते हैं।”

लेकिन रिया ने कुछ और किया।

वो बिस्तर से उतरीं — नंगी, पसीने से भीगी, बाल बिखरे — मेरे पास आईं, और मेरा हाथ पकड़कर मुझे बिस्तर तक खींच लाईं।

“बात बाद में,” उन्होंने कहा। “अभी तुम कपड़े उतारो।”

और फिर उन्होंने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। कबीर हँस पड़ा और बोला — “आदित्य, तुम्हारी औरत तुम्हें बुला रही है। देर मत करो।”

मैंने रिया की आँखों में देखा — और उन आँखों में कोई शर्म नहीं थी, कोई सफ़ाई नहीं थी, बस एक औरत थी जो दो आदमियों के बीच खड़ी थी और दोनों को चाहती थी।

और मैंने अपनी शर्ट उतार दी।

उस शाम हम तीनों उसी बिस्तर पर थे — मैं, रिया, और मेरा टीम लीड कबीर। पहले तो रिया ने सफ़ाई दी — बोलीं कि कबीर से उनका संबंध मुझसे पहले से था, ऑफिस में ही शुरू हुआ था, और वो बंद नहीं हुआ क्योंकि वो दोनों एक-दूसरे से कुछ भी वादा नहीं कर पाए थे। और फिर मुझसे मिलने के बाद उन्हें लगा कि अब बताना पड़ेगा — पर डर था कि कहीं मैं चला न जाऊँ।

“तो तुम दोनों के बीच फँसी हो,” मैंने कहा।

“हाँ,” उन्होंने कहा, और फिर झुककर मेरे कान में फुसफुसाईं — “और अब तुम फैसला करो क्या करना है।”

कबीर बोला — “आदित्य, मैं कोई झगड़ा नहीं चाहता। पर रिया अकेले किसी की नहीं हो सकती। ये तुम भी जानते हो।”

और रिया ने कहा — “तो आज रात कोई फैसला नहीं होगा। आज रात सिर्फ़ ये होगा कि तुम दोनों मेरे साथ हो।”

उस रात की शुरुआत वहीं हुई जहाँ मैंने सोचा भी नहीं था। पहले रिया ने कबीर को चूमा, फिर मुझे, फिर दोनों के हाथ पकड़कर दोनों को बिस्तर पर बिठाया। और फिर उन्होंने अपने घुटनों के बल बैठकर पहले कबीर का लंड मुँह में लिया, और मेरा हाथ पकड़कर सहलाती रहीं। फिर मुझे मुँह में लिया, और कबीर को सहलाया।

दो लंड, एक औरत, और एक बिस्तर — और उस रात की कहानी वाक़ई अगले हिस्से की कहानी है।

पर उस शाम, जब मैंने रिया को कबीर के नीचे देखा, और फिर अपने नीचे, और फिर दोनों के बीच, तो एक बात समझ आई — रिया अकेले किसी की नहीं थीं। रिया एक ऐसी औरत थीं जिसे पूरा प्यार चाहिए था, और वो जिसे मिलता था, उसे पूरा देती थीं।

और उस रात के बाद हमारे रविवार बदल गए।

अब हर रविवार तीन का होता था।

अगले भाग में आप पढ़ेंगे —

कैसे उस पहली तीन-वाली रात में कबीर ने रिया को पीछे से चोदा और मैंने सामने से, और बीच में रिया दोनों को एक-एक करके झेलती रहीं — पहले मुँह से, फिर बुर से, फिर बदल-बदल कर।

कैसे रिया ने दोनों लंड एक साथ अपने दूध के बीच रगड़े, और कैसे उनके निपल्स पर दोनों के होंठ एक साथ लगे। कैसे मैंने और कबीर ने मिलकर रिया को बीच में लेकर उन्हें इतना तोड़ा कि वो सुबह तक हाँफती रहीं।

और कैसे अगले रविवार से ऑफिस में भी एक नई गर्मी आ गई — मीटिंग में तीनों की नज़रें, लिफ़्ट में तीनों की खामोशी, और कैबिन में तीनों की आवाज़ें।

क्योंकि कहानी अब दो की नहीं, तीन की है।

NEXT PART: मेरी गर्ल फ्रेंड ने अपने टी एल और मुझसे ग्रुप में चुदवाई

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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