slut wife fuck story
मेरा नाम सिमरन है। जन्म पुणे में हुआ, पर ब्याह के बाद से मुंबई में रहती हूँ — और अब तो मुंबई ही मेरा घर है। उम्र बत्तीस साल, कद पाँच फुट चार इंच, रंग गेहुआ, बाल कमर तक लंबे और घुंघराले।
शादी के बाद मैंने खुद को सँभाला है, पर सच कहूँ तो मेरा जिस्म कभी “सँभलने” वाला जिस्म था ही नहीं।
जब चलती हूँ तो कमर लहराती है, जब झुकती हूँ तो आगे का हिस्सा खिंचता है, और जब मुस्कुराती हूँ तो आँखों के नीचे गड्ढे बन जाते हैं। यह सब भगवान का दिया हुआ है, मेरी मेहनत नहीं। पर मैं झूठ नहीं बोलूँगी — मुझे अपने जिस्म पर नाज़ है।
मेरी चूचियाँ छत्तीस की हैं। हाँ, वही “36” — जो हर किसी की नज़र में आ जाती हैं। भरे-भरे, गोल, नीचे की तरफ़ थोड़ा झुकते हुए भारी, जैसे किसी फल की टहनी।
मेरे निप्पल हल्के गुलाबी-भूरे हैं और ठंड लगने पर तुरंत सख़्त होकर उभर आते हैं। मेरे निपल्स इतने संवेदनशील हैं कि अगर कोई सामने से देखे भी तो मुझे उनका होना महसूस होता है।
और मेरी चूचियों में दूध है — हाँ, आज भी, बच्चे के बाद भी, और शादी से पहले भी था। सात मर्दों ने इन चूचियों को चूसा है, दबाया है, और दूध निकाला है।
यह कहानी फिर कभी बताऊँगी, पर यह जान लो कि मेरे जिस्म को “पहली बार” वाला रोमांच कोई नई बात नहीं है — यह मेरी आदत है, मेरी ज़रूरत है।
मेरी कमर बत्तीस इंच की है, और मेरी गाँड़ चालीस इंच की। गाँड़ बाहर की तरफ़ निकली हुई है, गोल और कसी हुई, ऐसी कि किसी भी मर्द का लंड उसे देखकर खड़ा हो जाए।
पीछे से देखो तो लगता है दो गोले हैं जो अलग होकर भी जुड़े हुए हैं। जींस पहनूँ तो सीम हँसती है, साड़ी पहनूँ तो पल्ला खिसक जाता है।
मेरे शरीर में सबसे ज़्यादा देखा जाने वाला हिस्सा मेरी गाँड़ ही है — चाहे किसी ने कबूल किया हो या नहीं।
शादी मेरी बहुत प्यारी हुई। मेरे पति का नाम रोहन है। पाँच फुट ग्यारह इंच लंबा, चौड़ा छाती, साफ़-सुथरा, शांत।
वह एक बैंक में मैनेजर है, तनख़्वाह अच्छी है, और हमारी लाइफ़ सच में बहुत ख़ूबसूरत है — वह ईमानदार है, ध्यान रखने वाला है, मुझे मारता नहीं, डाँटता कम है, प्यार बहुत करता है। और उसका लंड भी कम नहीं — करीब आठ इंच का, मोटा, सीधा।
रोहन मुझे काफ़ी हद तक सैटिस्फ़ाई कर देता है, यह सच है। रात को जब वह मेरे ऊपर आता है तो मैं ख़ुश होती हूँ, पूरी होती हूँ, और नींद अच्छी आती है।
लेकिन…
लेकिन एक बात है। और वह बात है — नयापन। जो मर्द पुराना हो जाता है, चाहे कितना भी अच्छा हो, उसकी छूअन आदत बन जाती है।
मुझे किसी भी ग़ैर मर्द से चुदवाना अच्छा लगता है — एक नया रोमांस, एक नई पहचान, एक नई खुशबू, एक नया तरीक़ा, एक नई आवाज़। रोहन मेरा घर है। पर कभी-कभी घर से बाहर निकलकर बारिश में भीगना भी ज़रूरी होता है, है ना?
और सात मर्दों के बाद भी मेरी बुर वैसी ही तंग और गर्म रही है — ऐसा नहीं कि ढीली पड़ गई। नहीं।
मेरी बुर तो अपने आप को सिकोड़कर पकड़ने वाली है, जैसे किसी को जाने नहीं देना चाहती। इसलिए जो भी मर्द मेरे अंदर आया, वह गया ज़रूर — पर भूला नहीं।
हमारी बिल्डिंग में ठीक हमारे सामने वाला फ्लैट — 402 — कई महीने खाली पड़ा था। फिर एक दिन सुबह-सुबह बड़े-बड़े डिब्बे और मज़दूर आने लगे।
मैं बालकनी में खड़ी चाय पी रही थी, तब एक लंबा-चौड़ा लड़का सीढ़ियों से चढ़कर आया और सामने खड़ा हो गया।
मेरा हाथ कप पर जम गया।
उसकी हाइट कम से कम छह फुट एक इंच थी। बीस-चौबीस साल का लग रहा था — मालूम हुआ चौबीस ही है। बाल घने काले, चेहरा साफ़-शाफ़, जबड़ा तीखा, आँखें गहरी।
टी-शर्ट के आर-पार उसकी बाज़ुओं की नसें उभरी हुई थीं। और वह बाज़ू सख़्त थीं — सच में सख़्त, जैसे लोहे की रस्सियाँ। वह पूरा का पूरा एक सीधी रेखा जैसा लग रहा था — जवानी की, ताक़त की, और कुछ ऐसी गर्मी की जिसका नाम मर्द होता है।
उसका नाम नीरज था। वह अकेला ही आया था, अकेला ही रहता था। किसी टेक कंपनी में काम करता था, वर्क फ्रॉम होम, इसलिए सारा दिन घर में।
पहले हफ़्ते में हमने सिर्फ़ “हाँ-हाँ, नमस्ते, कैसे हो” वाली दोस्ती की। दो-तीन बार लिफ़्ट में मिले, एक बार दूध वाले का सामान लेते मिले, एक बार रोहन भी उससे मिला और दोनों ने मर्दों वाली गपशप की।
पर मेरे अंदर कुछ और चल रहा था।
जब भी वह मेरे पास आता, मुझे उसकी बॉडी की खुशबू आती — पसीने और किसी अच्छे डियो वाली, मर्दाना खुशबू।
मेरी बुर में ख़ुज़ली होने लगती।
मेरा मन कहता — “सिमरन, इस लड़के से चुदवा।” और मन के भीतर एक और आवाज़ कहती — “और इससे गाँड़ भी मरवाना।”
हमारी बिल्डिंग के नीचे एक जिम था। नीरज वहाँ शाम को जाता था। एक दिन मैं सामान लेने के बहाने उधर से गुज़री। वह ट्रेडमिल पर था, और पसीने में लथपथ।
जब उसने ट्रेनिंग-शर्ट ऊपर की तरफ़ खींची, तो उसकी पतलून जिस जगह पर बैठी थी वहाँ नज़र गई — और मैंने साफ़ देख लिया कि उसके अंदर का सामान कितना बड़ा है।
जब वह झुका या बैठा, तो उसके लंड का भारीपन उसकी पैंट के आर-पार दिखता — लटकता हुआ, मोटा, भारी।
मेरा दिल बोला — “यह तो आठ इंच वाले रोहन से भी बड़ा है।” और मेरी बुर ने तुरंत जवाब दिया — एक गीली, गर्म झुरझुरी के साथ।
उस रात बिस्तर पर रोहन मेरे ऊपर आया। वह मुझे चूम रहा था, चूचियाँ दबा रहा था, निप्पल चूस रहा था। और मैं आँखें बंद करके सोच रही थी — सामने वाले फ्लैट में सोया हुआ वह लंबा लड़का।
रोहन ने मेरी बुर में लंड डाला, तो मैंने कसकर उसे पकड़ लिया, जैसे किसी और को पकड़ रही हूँ।
रोहन ने कहा, “आज तो तुम अलग लग रही हो।”
मैं हँस दी और बोली, “तुम्हारे साथ हूँ, इसलिए।”
झूठ नहीं था। पर पूरा सच भी नहीं था।
अगले कुछ हफ़्तों में हमारी बातचीत बढ़ने लगी। शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई — “दीदी, मैगी कहाँ से लेते हैं?”, “दीदी, गैस वाला कब आता है?”, “दीदी, आपका पौधा बहुत सुंदर है।”
मैं उससे चार साल बड़ी थी, इसलिए वह मुझे “दीदी” कहता था। पर जब वह “दीदी” कहता, तो उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो भाई-बहन वाली दीदी नहीं लगती थी।
धीरे-धीरे वह शाम को चाय के लिए आने लगा। रोहन भी उसे पसंद करता था — दोनों बैठकर क्रिकेट की बातें करते, मोबाइल के कैमरे, गाड़ियों, और न जाने क्या-क्या।
रोहन कहता, “नीरज बहुत अच्छा लड़का है, बहुत सीधा।”
और मैं मन में सोचती — “सीधा है क्या? तेरे जाने के बाद देखती हूँ।”
एक रात रोहन को ऑफ़िस के काम से दो दिन के लिए दिल्ली जाना पड़ा।
उसने जाते वक़्त कहा, “नीरज को बता देना, कोई दिक्कत हो तो।”
मैंने कहा, “हाँ-हाँ, बता दूँगी।” और मन में कहा — “अब तो हर दिक्कत का हल सामने वाले फ्लैट में रहता है।”
वह रात मैं सो नहीं पाई। मैंने अपनी साड़ी उतारी, एक लाल सूती नाइटी पहनी, और बालकनी में आकर खड़ी हो गई। सामने नीरज की बालकनी की लाइट जल रही थी। वह भी बाहर आया।
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुरा दिए। बीच में सिर्फ़ हवा थी, आवाज़ नहीं।
उसने हाथ हिलाया। मैंने भी हिलाया।
फिर उसने अपना मोबाइल उठाया और मुझे दिखाया — यानी नंबर चाहिए। मैंने अपना मोबाइल लेकर उस पर नंबर लिख कर दिखाया। पाँच मिनट में मेरे फ़ोन पर मैसेज आया:
“दीदी, चाय पीने आऊँ? अकेली हैं ना।”
मैंने लिखा: “आ जाओ।”
वह दरवाज़े पर आया। सफ़ेद टी-शर्ट, ग्रे पैंट, गीले बाल — लगा अभी नहाया है। उसकी खुशबू पूरे कमरे में फैल गई।
मैंने उसे बैठने को कहा और चाय बनाने के लिए रसोई में गई। वह भी पीछे-पीछे आ गया और दरवाज़े के पास खड़ा हो गया।
मैंने पलटकर देखा — वह मुझे देख रहा था। मेरी पीठ को, मेरी कमर को, और मेरी गाँड़ को।
“क्या देख रहे हो?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं दीदी।” उसने कहा, “बस आप बहुत सुंदर लग रही हैं आज।”
मैं मुस्कुराई। “आज ही?”
“नहीं। रोज़। पर आज… आज थोड़ा ज़्यादा।”
चाय लेकर हम सोफ़े पर बैठे। बीच में एक तकिया था, जो धीरे-धीरे हट गया। उसकी बाज़ू मेरी बाज़ू से टकराई। वह टकराव बहुत छोटा था, पर मेरे पूरे जिस्म में बिजली दौड़ गई।
हम बातें करते रहे — उसके घर, उसके पापा, उसकी पढ़ाई, मेरे पुणे वाले दिन। फिर बात शादी पर आई।
“दीदी, आपकी शादी कैसी है?” उसने पूछा।
“अच्छी है। रोहन अच्छा है।”
“और… आप ख़ुश हैं?”
मैंने उसकी आँखों में देखा। “ख़ुश हूँ। पर…”
“पर?”
“पर कुछ चीज़ें हैं जो अच्छी होने से नहीं मिलतीं। मिलने के लिए चाहिए भी तो होती हैं।” मैंने कहा। और फिर हिम्मत करके जोड़ा — “तुम जैसे लड़के को देखकर लगता है कि जवानी बर्बाद हो रही है।”
वह हँसा। “दीदी, आप मुझे बर्बाद कर देंगी।”
“क्यों? तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नहीं?”
“नहीं। ब्रेकअप हुआ था। अब बस काम और जिम।”
“तो तुम्हारा लंड कहाँ जाता है?” — और यह कहकर मैं खुद शरमा गई, क्योंकि इतनी सीधी बात मैंने पहली बार किसी से पूछी थी।
वह ज़ोर से हँसा। “दीदी, आपने सीधे निशाने पर मारा। सच बताऊँ? जाता कहीं नहीं। रात-रात भर जागता है, और सुबह भी।”
“अकेले?”
“अकेले ही। अब क्या करें।”
मैंने चाय का कप रखा। हम दोनों में सन्नाटा था। सिर्फ़ फ़्रिज की गूँज और बाहर की बारिश।
मैंने देखा — उसकी पैंट में कुछ हिल रहा था। और मेरी बुर भी अंदर से धड़क रही थी, जैसे वह भी बातचीत में हिस्सा ले रही हो।
“नीरज,” मैंने कहा।
“हाँ दीदी।”
“तुम्हें पता है, मैं शादी से पहले सात लड़कों के साथ रही हूँ?”
उसकी आँखें बड़ी हो गईं। “सात?”
“हाँ। सात।”
“और वो सब…?”
“सबने मुझे पूरा इस्तेमाल किया। सबने मेरी चूचियाँ चूसी, मेरा दूध पिया, मेरी बुर में लंड डाला, और कुछ ने मेरी गाँड़ भी मारी।” मैंने एक साँस में कह दिया। “इसलिए मैं ढीली नहीं हुई। उल्टा कसी हुई हूँ।”
वह पीछे झुक गया, जैसे किसी ने उसके सिर पर चोट मारी हो। “दीदी, आप तो कमाल हो। और रोहन भाई को पता है?”
“उन्हें इतना-इतना पता है। पूरा नहीं।” मैं मुस्कुराई।
“तो अब क्या?” उसने पूछा।
“अब तुम बताओ।”
उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया और मेरी उँगली पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं। उसने मेरी हथेली को अपनी हथेली में लिया और धीरे से दबाया। मैंने भी दबाया।
“दीदी,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “मुझे आपके साथ कुछ करना है।”
“क्या?”
“सब कुछ।”
बाहर बारिश ज़ोर से गिर रही थी। अंदर हमारी साँसें तेज़। उसने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे अपनी तरफ़ खींचा।
मैं उसकी छाती पर गिरी। उसने मेरी ठुड्डी उठाई और मुझे देखा — सीधे आँखों में। फिर उसने मुझे चूम लिया।
पहला चुम्बन। वह धीमा था, गीला था, गहरा था। उसके होंठ मेरे होंठों पर जम गए और मेरी आँखें बंद हो गईं। उसका एक हाथ मेरी पीठ पर आया, दूसरा मेरे कमर पर, और उसने मुझे अपने से चिपका लिया।
मेरी चूचियाँ उसकी छाती से दब गईं और मेरे निप्पल उसके अंदर की गर्मी से सख़्त होकर उभर आए।
मैंने अपनी उँगलियाँ उसके बालों में डाल दीं और उसे और गहरा चूमा। हमारी जीभें मिलीं। हमारी साँसें मिलीं। हमारे लार मिले।
जब हम अलग हुए, तो मैं हाँफ रही थी।
“यह क्या था?” मैंने पूछा।
“शुरुआत।” उसने कहा, और मेरी आँखों में देखकर मुस्कुराया। “बाक़ी कल से।”
“कल?” मैंने कहा। “रोहन दो दिन बाद आएगा।”
“तो ठीक है। कल से शुरू करते हैं।”
अगले दिन सुबह से ही मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी। मैंने स्नान किया, पूरे जिस्म पर लोशन लगाया, बाल सुखाए, और एक गुलाबी सूती कुर्ती पहनी जिसमें मेरी चूचियाँ साफ़ दिखती थीं।
नीचे कुछ नहीं पहना — ना पैंटी, ना ब्रा। बस कुर्ती और एक छोटा सा पेटीकोट। मन में सोच रही थी — जब वह इसे हटाएगा, तो सामने क्या होगा।
दोपहर में मैसेज आया:
“दीदी, आज शाम?”
“हाँ। रात 8 बजे। खाना खाकर आ जाओ।”
“और आप?”
“मैं तुम्हें ही खाऊँगी।”
उसने बस एक इमोजी भेजा — आग। और सही था।
शाम को मैंने खाना बनाया, सजाया, दीपक जलाए, लाइट धीमी कर दी। पूरे घर में हल्की सी खुशबू और सुनहरी रोशनी। मन में पूरा प्लान था। मुझे पता था आज क्या होगा।
पहले बातें, फिर फोरप्ले, फिर बुर की चुदाई, और फिर — जब सब खुल जाए — तो उससे मेरी गाँड़ भी मरवानी है। मुझे उसके ग्यारह इंच के लंड को गाँड़ में लेना था।
मैंने सोच लिया था। तेल निकालकर रख दिया था। तौलिया रख दिया था। और अपने अंदर की सारी शरम को अलमारी में बंद कर दिया था।
वह आया। नहाया हुआ, सुगंधित, नीली शर्ट और बेज पैंट में। दरवाज़े पर खड़ा होकर मुस्कुराया। मैंने उसे अंदर बुलाया और दरवाज़ा बंद कर दिया — कुंडी लगाकर।
“दरवाज़ा बंद?” उसने पूछा।
“हाँ। अंदर कोई नहीं आएगा।”
हम खाना खाने बैठे। वह मेरे हाथ का खाना खाता रहा और मुझे देखता रहा। मैं खाती रही और उसे देखती रही। दोनों की आँखें भूखी थीं — एक की पेट की, दूसरे की बुर की।
खाना खत्म हुआ। बर्तन वहीं छोड़े। वह सोफ़े पर बैठा। मैं उसके पास गई और उसकी गोद में बैठ गई — ऐसे जैसे हम बहुत पुराने प्रेमी हों।
उसने मेरी कमर पकड़ ली और मुझे अपने से चिपका लिया। उसकी छाती चौड़ी थी, और मेरी चूचियाँ उस पर टिक गईं। उसने मेरी गर्दन पर होंठ रखे और धीमे-धीमे चूमने लगा।
“सिमरन,” उसने पहली बार “दीदी” की जगह मेरा नाम लिया।
“हाँ?” मेरा दिल धक्-धक्।
“आज मुझे पूरा चाहिए।”
“तुम्हें मिलेगा।” मैंने कहा। “पर एक बात।”
“क्या?”
“आज हम जो करेंगे, वह पूरा करेंगे। बीच में रुकना नहीं। और जो मैं कहूँ, वह करना।”
“हुक्म।” उसने कहा, और मेरी गर्दन पर चूमते हुए नीचे की तरफ़ बढ़ने लगा।
वह मेरी गर्दन से नीचे आया। उसने मेरे कंधों को चूमा, मेरी कॉलरबोन को चूमा, और धीरे से मेरी कुर्ती की डोरी खींची।
कुर्ती ढीली हुई और आगे का हिस्सा खुल गया। मेरी चूचियाँ झूल गईं, सिर्फ़ हवा से ढकी हुई। उसने देखा और उसकी साँस रुक गई।
“कमाल है,” उसने फुसफुसाया।
उसने दोनों हाथों से मेरी चूचियाँ पकड़ीं। पहले हल्के से, जैसे कोई गिलास उठाता हो, फिर थोड़ा ज़ोर से दबाया।
मेरी चूचियाँ उसकी हथेलियों में फैल गईं और मेरे निप्पल उसकी उँगलियों के बीच उभर आए। उसने अंगूठे और अपनी इंडेक्स ऊँगली से मेरे निपल्स को पकड़ा और धीरे से खींचा। मेरी कमर झटके से ऊपर उठी।
“आह,” मैंने कहा।
“दर्द हो रहा है?”
“अच्छा हो रहा है। करो।”
उसने मेरे निप्पल को मुँह में लिया। पहले बाएँ वाला, फिर दाएँ वाला। वह चूसने लगा — धीरे-धीरे, गहरे-गहरे, जैसे प्यासा हो। और जैसे ही उसने चूसा, मेरी चूची से दूध की एक बूँद निकली और उसकी जीभ पर गिरी।
वह रुक गया। उसने मुँह उठाया और मुझे देखा, आँखें फैली हुईं।
“दूध?” उसने कहा। “सच में दूध?”
“हाँ,” मैं मुस्कुराई। “निकलता है। अब तक।”
“और पहले भी निकलता था?”
“हाँ। सात लड़कों ने पिया है। तुम आठवें हो।”
वह ज़ोर से हँसा, फिर गंभीर हुआ। “तो आज पूरा पीऊँगा।”
और वह फिर झुक गया। इस बार उसने जल्दी नहीं की। उसने मेरे निप्पल को मुँह में लिया और चूसा, चबाया, जीभ से सहलाया, और बीच-बीच में दूध पीता रहा।
मेरी चूचियाँ उसके मुँह में थीं और मेरी आँखें बंद थीं। मैं उसके सिर को सहलाती रही और हल्के-हल्के कराहती रही।
एक चूची खाली हो गई तो दूसरी पर गया। दस-पंद्रह मिनट तक वह मेरी चूचियों पर लगा रहा, और मेरी बुर उस दौरान गीली होकर मेरी जाँघों को चिपचिपा रही थी।
फिर वह मुझे गोद में उठाकर बेडरूम ले गया। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरा पेटीकोट खींच लिया। अब मेरे नीचे सिर्फ़ हवा थी। उसने मेरी टाँगें खोलीं और मेरी बुर को देखा — सीधे, बिना झिझक।
“यह…” वह फुसफुसाया। “यह इतनी गीली है।”
“तुम्हारे लिए,” मैंने कहा।
उसने उँगली से मेरी बुर के होंठों को सहलाया। फिर धीरे से दो उँगलियाँ अंदर डालीं। अंदर जाते ही मेरी बुर ने उन्हें कसकर पकड़ लिया — और वह हैरान रह गया।
“टाइट है,” उसने कहा। “इतनी टाइट?”
“सात लड़कों के बाद भी,” मैंने गर्व से कहा।
उसने उँगलियाँ अंदर-बाहर करना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेज़। उसका अंगूठा ऊपर वाले उभरे हुए हिस्से पर गोल-गोल घूमता रहा। मेरी कमर उठने लगी। मेरी आँखें बंद हो गईं।
मैं बिस्तर की चादर मुट्ठी में भरकर खींचने लगी। और तभी उसने अपना मुँह नीचे लाकर मेरी बुर पर रख दिया।
मैं चीख पड़ी।
उसकी जीभ मेरी बुर के अंदर-बाहर दौड़ने लगी। ऊपर, नीचे, अंदर, चारों तरफ़। वह जानता था कि कहाँ लगाना है और कितना लगाना है। कभी हल्का, कभी तेज़, कभी रुककर।
उसने मेरे बुर के होंठ चूसे, अंदर जीभ डाली, और मेरी चूचियों को एक हाथ से दबाता रहा ताकि दूध निकलता रहे। मेरी साँसें फूले हुए गुब्बारे की तरह फटने को थीं।
“नीरज…” मैं कराही। “रुक नहीं… जल्दी मत करो…”
वह मेरी आवाज़ सुनकर और तेज़ हो गया। मेरी बुर में उसकी जीभ डूब गई। और फिर मेरे पूरे जिस्म में एक लहर दौड़ी — पैर से सिर तक — और मैं उसके मुँह पर चुदाई कर पड़ी।
मेरी बुर ने उसकी जीभ पर अपना रस छोड़ा और मैं हाँफते हुए बिस्तर पर पसर गई।
उसने मुँह उठाया, होंठ गीले, आँखें जलती हुई।
“सिमरन,” उसने कहा, “अब मैं अंदर आता हूँ।”
उसने अपनी शर्ट उतारी। उसकी छाती सख़्त थी, पेट पर मछली जैसी लाइनें, बाज़ुओं में नसें।
मैं उसे देखती रही और मेरी बुर फिर से गीली हो गई। फिर उसने अपनी पैंट खोली।
और जब उसने बॉक्सर नीचे की, तो उसका लंड बाहर निकला।
मैंने देखा और मेरी साँस रुक गई। वह वाक़ई ग्यारह इंच का था — सीधा, मोटा, चमकदार, गोल सिरे वाला, और भारी।
जब वह खड़ा हुआ, तो उसका लंड अपने आप ऊपर की तरफ़ उठा हुआ रहा, जैसे किसी का इशारा हो। रगों की लकीरें उस पर उभरी हुईं और सिरा गीला था।
“हे भगवान,” मैंने कहा।
“पसंद आया?” उसने मुस्कुराकर पूछा।
“इतना बड़ा… कहाँ जाएगा?”
“जहाँ तुम कहो।”
वह मेरे ऊपर आया। उसने मेरी टाँगें और फैलाईं और मेरे नीचे तकिया रख दिया, ताकि मेरी बुर ठीक उसके लंड के सामने आ जाए।
उसने अपने लंड का सिरा मेरी बुर के होंठों पर रखा और हल्के से रगड़ा। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। मेरी बुर ने उसका सिरा चूमा, चिपचिपे रस से भिगो दिया।
“नीरज,” मैंने कहा, “डालो।”
“पूरा?”
“पूरा।”
उसने दबाया। पहला इंच गया — आसानी से। दूसरा इंच गया — थोड़ा खिंचाव। तीसरा इंच गया — मैंने महसूस किया कि मेरी बुर खुल रही है। चौथा, पाँचवाँ — मैं कराहने लगी। छठा, सातवाँ — मेरी आँखें भर आईं। और आठवें पर उसने ज़ोर लगाया और पूरा लंड अंदर घुस गया।
मैं चीख पड़ी। मेरी बुर उसके लंड से भर गई, जैसे किसी खाली बर्तन में पानी भर दिया गया हो।
“आह… सिमरन… तुमने पूरा ले लिया,” उसने हैरानी से कहा।
“तुम्हारा है,” मैंने हाँफते हुए कहा। “तो लेना पड़ेगा।”
वह हिलने लगा। पहले धीरे — अंदर तक, बाहर तक। फिर थोड़ा तेज़। उसका लंड मेरी बुर की दीवारों से रगड़ता, उन्हें खोलता, उन्हें बंद करता, फिर खोलता।
मेरी बुर हर झटके पर उसे कसकर पकड़ती, जैसे छोड़ना नहीं चाहती। उसने मेरी टाँगें अपनी कमर पर लपेट दीं और मुझे और पास खींच लिया। अब वह हर झटके में गहरा जाता और मेरी चूचियाँ उसकी छाती से रगड़तीं।
“तेज़,” मैंने कहा। “नीरज, तेज़ करो।”
वह तेज़ हो गया। बिस्तर चरमराने लगा। उसकी खाल मेरी खाल से टकराने लगी — चट-चट-चट। मेरी बुर से रस बहकर मेरी गाँड़ तक जाने लगा।
उसने मेरे निप्पल को मुँह में लिया और चूसते हुए चुदाई करता रहा, और दूध उसके होंठों से बहकर मेरी गर्दन तक आने लगा।
फिर उसने मेरी कमर पकड़ी और पोज़िशन बदली — अब मैं घुटनों पर थी, हाथ बिस्तर पर, और वह पीछे से। उसने अपना लंड फिर मेरी बुर में डाला और पीछे से चुदाई शुरू की।
इस पोज़िशन में वह और गहरा जाता था, और मेरी गाँड़ हर झटके पर हिलती थी। उसने मेरी गाँड़ पर हाथ रखा और दबाया, फिर चपत लगाई।
“आह!” मैं चीखी।
“सुंदर है,” उसने कहा। “बहुत सुंदर।”
वह पीछे से ज़ोर-ज़ोर से चोदता रहा। मेरी चूचियाँ झूलती रहीं, दूध की बूँदें चादर पर गिरती रहीं, और मेरी बुर उसके लंड को पूरी ताक़त से पकड़े हुए थी।
मेरा पूरा जिस्म पसीने से भर गया। हमारी साँसें मिल गईं। उसने मेरे कान में कहा, “सिमरन, तुम कमाल हो।”
और फिर वह लय बदल गया — लंबे, गहरे, धीमे झटके। हर झटका मेरी बुर के सबसे गहरे हिस्से तक जाता। मेरी आँखें बंद हो गईं। मेरा मुँह खुल गया। मेरी उँगलियाँ चादर को नोचने लगीं।
“नीरज… मैं आ रही हूँ…” मैंने कराहा।
“आओ,” उसने कहा। “साथ आओ।”
उसने रफ़्तार बढ़ाई। दस-बारह तेज़ झटके। और फिर मेरे पूरे जिस्म में वह लहर आई — गहरी, लंबी, तोड़ने वाली। मेरी बुर ने उसे जकड़ लिया और मैं चीख पड़ी।
उसी वक़्त उसने भी अपना लंड अंदर तक भेजा और उसकी गर्मी मेरे अंदर उँडेल दी। उसने मेरी कमर पकड़कर दो-तीन बार और झटके दिए, फिर हाँफते हुए मेरे ऊपर गिर पड़ा।
हम दोनों लंबे समय तक हाँफते रहे। मेरी बुर से उसका लंड अभी निकला नहीं था। वह अंदर ही था, गर्म, भारी। मैंने अपनी आँखें खोलीं और उसकी छाती पर हाथ रखा।
“यह तो बस पहला दौर था,” उसने मेरे कान में कहा।
“मुझे पता है,” मैं मुस्कुराई। “और अभी बाक़ी है।”
“क्या?”
“तुमने कहा था — सब कुछ करना है।” मैंने उसकी आँखों में देखा। “तो अब मेरी गाँड़ मारो।”
उसकी आँखों में चमक आ गई। “सच में?”
“सच में। मैंने तेल निकालकर रखा है।” मैंने बेडसाइड टेबल से तेल की बोतल उठाई और उसे दी।
उसने लंड बाहर निकाला। मेरी बुर से अभी भी उसका रस टपक रहा था। वह उठा, तेल लिया, और अपने लंड पर लगाया।
फिर मेरी गाँड़ पर तेल डाला और उँगली से फैलाया। उसकी उँगली मेरी गाँड़ के छेद पर घूमी, हल्के से अंदर गई, बाहर आई।
“तैयार हो?” उसने पूछा।
“करो,” मैंने कहा, और घुटनों पर आकर, हाथ बिस्तर पर टिकाकर, अपनी गाँड़ उसकी तरफ़ उठा दी।
वह मेरे पीछे आया। उसने अपने लंड का सिरा मेरी गाँड़ पर रखा और दबाया। पहला इंच गया — मैंने कराहा। दूसरा इंच — मेरी गाँड़ जलने लगी, पर अच्छी जलन। तीसरा, चौथा — धीरे-धीरे वह अंदर जाता रहा। मेरी गाँड़ उसके ग्यारह इंच के लंड को खा रही थी, और वह भी बिना फटे।
“हे भगवान,” उसने हाँफते हुए कहा। “यह भी इतनी टाइट है।”
“मेरी गाँड़ कभी किसी ने नहीं मारी,” मैंने कहा। “तुम पहले हो।”
वह रुक गया। “पहले? सच?”
“सच। सात लड़कों ने बुर मारी, पर गाँड़ सिर्फ़ एक-दो बार। और वह भी पूरी नहीं। तुम पहले पूरे हो।”
उसने मेरी पीठ पर हाथ फिराया और धीरे-धीरे हिलने लगा। पहले बहुत धीमे। मेरी गाँड़ उसकी हर हरकत को महसूस कर रही थी।
अंदर-बाहर, अंदर-बाहर। तेल की वजह से रगड़ कम थी, पर भराव बहुत था। मैं पूरी भर गई थी, जैसे किसी ने मेरे भीतर दस्तक दी हो और फिर घर बना लिया हो।
“अब ठीक लग रहा है,” मैंने कहा। “थोड़ा तेज़।”
वह तेज़ हुआ। उसकी हथेलियाँ मेरी गाँड़ पर थीं और वह उसे दबाते हुए चोद रहा था। हर झटके पर मेरी गाँड़ फैलती और सिकुड़ती।
मेरी बुर से अभी भी उसका पहला पानी टपक रहा था और मेरी जाँघें गीली थीं। उसने एक हाथ आगे बढ़ाकर मेरी बुर को सहलाया और उँगली अंदर डाल दी — अब मेरे अंदर दो जगह उसका होना महसूस हो रहा था।
मैं चीखने लगी। “आह… नीरज… आह…”
“अच्छा लग रहा है?”
“बहुत… बहुत अच्छा…”
उसने गति बढ़ाई। अब झटके तेज़ और गहरे थे। उसकी जाँघें मेरी गाँड़ से टकराती थीं — थप-थप-थप। मेरी गाँड़ लाल हो गई थी, पर मैं रुकना नहीं चाहती थी।
उसने मेरी कमर पकड़कर मुझे और पीछे खींचा और पूरा लंड अंदर तक भेज दिया। मेरी गाँड़ ने उसे पूरा निगल लिया।
“सिमरन,” वह कराहा, “तुम मेरी हो गई।”
“हाँ,” मैंने कहा। “हो गई।”
वह पीछे से झुका, मेरी पीठ पर चूमा, मेरी गर्दन पर चूमा, और मेरे कान में फुसफुसाया, “अब मेरी राँड बन जाओ।”
मैंने उसकी बात सुनी और मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों ने एक साथ कस लिया। “हाँ,” मैंने कहा। “तेरी राँड हूँ। तेरी।”
वह और तेज़ हो गया। अब वह पूरी ताक़त से मेरी गाँड़ मार रहा था। बिस्तर हिल रहा था, दीवार हिल रही थी, मेरी चूचियाँ झूल रही थीं और दूध की बूँदें बिखर रही थीं।
मेरी आँखों से पानी आने लगा — अच्छे वाले। मैंने अपनी गाँड़ उसकी तरफ़ और उठा दी और वह और गहरा जाने लगा।
“नीरज… मैं निकल रही हूँ…” मैं चीखी।
“निकलो,” उसने कहा। “मेरे साथ।”
उसने आख़िरी झटके दिए — गहरे, तेज़, तोड़ने वाले। और मेरी गाँड़ में वह लहर फूट पड़ी। मेरी बुर भी साथ आ गई, बिना छुए ही।
मैं पूरी काँप गई। और उसी वक़्त उसने अपना लंड अंदर तक भेजकर अपनी गर्मी मेरी गाँड़ में उँडेल दी। उसने मेरी कमर पकड़े रखी और दो-तीन बार और हिला, फिर हाँफते हुए मेरे ऊपर ढह गया।
हम दोनों बिस्तर पर पसरे रहे। उसका लंड धीरे-धीरे नरम हुआ और बाहर आया। मेरी गाँड़ से तेल और उसका पानी रिसने लगा।
वह करवट लेटा और मुझे अपनी बाज़ू में ले लिया। मैंने अपना सिर उसकी छाती पर रख दिया और उसकी धड़कन सुनी। वह धड़कन तेज़ थी, जवान थी, और मेरी थी।
“दर्द हो रहा है?” उसने पूछा।
“हल्का। पर अच्छा है।”
“अगली बार और अच्छा होगा।”
“अगली बार?” मैंने पूछा।
“हाँ। रोहन भाई कल आएँगे। उनके जाने के बाद फिर।”
“तुम्हारी हिम्मत देखी जाए,” मैं हँसी।
उसने मेरे माथे पर चूमा। “अब तो आदत लग गई है।”
उस रात के बाद सब बदल गया। रोहन आया, सब कुछ सामान्य रहा, और रात को जब वह मेरे ऊपर आया तो उसे पता नहीं चला कि उसकी पत्नी अभी-अभी किसी और की राँड बनकर आई है।
मैंने उसके लंड को अपनी बुर में लिया और मुस्कुराई। वही बुर अभी कुछ घंटे पहले ग्यारह इंच के लंड से भरी थी।
रोहन कहता, “आज तो बहुत गीली है।” मैं कहती, “तुम्हारी हूँ।” और यह भी सच था।
फिर हमारा सिलसिला शुरू हुआ। हफ़्ते में दो-तीन बार। रोहन ऑफ़िस में होता, तो नीरज मेरे घर में। रोहन घर पर होता, तो मैं बहाना बनाकर उसके फ्लैट में।
कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी रात। कभी सोफ़े पर, कभी रसोई की मेज़ पर, कभी बाथरूम में, कभी बालकनी के पर्दे के पीछे।
मैंने उसे अपने जिस्म के हर हिस्से का मालिक बना दिया। मेरी चूचियाँ उसकी थीं, मेरा दूध उसका था, मेरे निप्पल उसके दाँतों की निशानी बन गए, मेरी बुर उसके लंड की आदी हो गई, और मेरी गाँड़ उसकी रानी बन गई।
वह जब चाहता, मुझे पकड़ता और चोदता। मैं जब चाहती, उसके पास जाती और घुटनों के बल बैठ जाती। कभी-कभी तो वह बैठा रहता, काम करता रहता, और मैं नीचे उसका लंड मुँह में लेकर चूसती रहती।
वह मेरे बालों में हाथ डालकर दबाता और कहता, “अच्छी राँड है।”
और मुझे वह “राँड” कहलाना बहुत अच्छा लगता था।
अब मेरे दो मर्द थे — एक घर का, एक पड़ोस का। एक पति, एक आशिक़। एक शांत, एक जंगली। एक आठ इंच, एक ग्यारह इंच। और मैं दोनों में पूरी थी।
यह दोहरा जीवन मुझे कभी भारी नहीं लगा। उल्टा, मैं और सुंदर होने लगी, और ज़्यादा खुश रहने लगी।
रोहन कहता, “तुम जवान हो गई हो।”
और मैं मन में कहती, “हाँ, तुम्हारे पड़ोसी की वजह से।”
नीरज मुझे नए-नए तरीक़े सिखाता। कभी बिस्तर पर बाँधकर, कभी आँखों पर पट्टी बाँधकर, कभी तेल की मालिश करके, कभी आईने के सामने।
हमने मिलकर हर पोज़िशन आज़माई — मिशनरी, डॉगी, काउगर्ल, रिवर्स काउगर्ल, स्पून, खड़े-खड़े, कुर्सी पर, और वह भी जिसका नाम बताना शरम की बात है।
हर बार वह मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों को पूरा खाता, और हर बार वह मेरे निपल्स से दूध पीता। उसने मेरे दूध को अपना हक़ मान लिया था और मैंने बिना शिकायत दिया।
कभी-कभी वह रात भर मेरे साथ रहता — जब रोहन नाइट शिफ्ट या टूर पर होता। उन रातों में हम तीन-चार बार करते। पहला धीमा और रोमांटिक, दूसरा तेज़ और भूखा, तीसरा खेल-खेल में, और चौथा — जब दोनों थक जाते — बस लिपटकर, बातें करते हुए।
वह मेरे बाल सहलाता, मेरी कमर पर हाथ रखता, और कहता, “सिमरन, तुम मेरी सबसे अच्छी चीज़ हो।”
और मैं कहती, “तुम मेरी सबसे नई चीज़ हो।” दोनों बातें सच थीं।
अब तक की कहानी में सिर्फ़ दो जिस्म थे — मेरा और नीरज का। पर जैसा कि मैंने शुरू में कहा था, मुझे नयापन पसंद है, और नीरज को भी जवानी पसंद है। और जवानी में दोस्त होते हैं, और दोस्तों की भी बुर और लंड होते हैं।
एक शनिवार की शाम नीरज मेरे घर आया — पर अकेला नहीं। उसके साथ दो लोग थे। एक लंबा, चौड़ा, दाढ़ी वाला लड़का जिसका नाम गणेश था — नीरज से भी बड़ा, कम से कम छह फुट तीन इंच, हाथ भाले जैसे और छाती ढोल जैसी।
और दूसरा सुखप्रीत — दुबला-पतला, हँसमुख, तेज़ नज़र वाला, जिसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था कि लगा वह सब जानता है।
नीरज ने दोनों को मिलाया और मेरी आँखों में देखकर कहा, “सिमरन, आज हम चार हैं।”
मैंने पूछा, “चार?”
“हाँ। तीन मर्द, एक औरत।”
मेरी बुर ने अंदर से धक्-धक् किया। मेरे निप्पल सख़्त हो गए। मैंने गणेश की तरफ़ देखा, फिर सुखप्रीत की तरफ़।
दोनों मुझे देख रहे थे — वैसे ही, जैसे नीरज पहली बार देखा था। मैं मुस्कुराई और कहा, “तो अंदर आ जाइए। चाय पहले, और बाक़ी बाद में।”
गणेश हँसा। सुखप्रीत ने कहा, “दीदी, हमने बहुत सुना है आपके बारे में।”
“क्या सुना है?” मैंने पूछा।
“सब,” उसने कहा। “सब कुछ।”
और मैंने दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई, और अंदर की लाइट धीमी कर दी। आज रात चार जिस्म थे, और मैं जानती थी — यह सिर्फ़ शुरुआत है।
अगले भाग में: तीन मर्द, एक बुर, एक गाँड़, दो चूचियाँ, और बहुत सारा दूध। गणेश का भाला-सा लंड, सुखप्रीत की ज़बान की चालाकी, और नीरज का ग्यारह इंच का हुक्म।
मैं उन तीनों की राँड बनूँगी — बारी-बारी भी, और एक साथ भी। और यह कहानी अगले भाग में, “तीन मर्द, एक राँड” में पूरी होगी।
पर आज रात… आज रात बस गणेश की लंड देखनी है, और सुखप्रीत की मुस्कान का मतलब समझना है।
और सबसे ऊपर — नीरज को यह दिखाना है कि उसकी राँड किसी की भी नहीं, सिर्फ़ उसकी है… चाहे बिस्तर में तीन मर्द क्यों न हों।
तो कैसी लगी मेरी कहानी? आप कमेंट करके जरुर बताएं……. आप की सिमरन
NEXT PART: अपने पड़ोसी और उसके दो दोस्तों के साथ ग्रुप में चुदी
- लॉकडाउन के दौरान मॉम को दोस्तों के साथ मिलकर चोदा
- कॉल सेंटर में इंटरव्यू के दौरान मिले 4 लड़कों से ग्रुप में चुदवाई
- अपनी दो रंडी ममेरी बहनों को चोदने का मौका मिला
नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।
Pingback: अपने पड़ोसी और उसके दो दोस्तों के साथ ग्रुप में चुदी - Antahvasna