रंडी सोच वाली लड़की से शादी, सुहागरात और रंडीबाजी

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शादी की बात जब घरवालों को बताई, तो माँ ने पहले तारीख़ पूछी, फिर कुंडली, फिर खर्च। और रुक्मणी ने पहले ही कह दिया था — “जो भी होगा, सादा होगा। ज़्यादा दिखावा नहीं।”

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पर सादगी भी शादी है। दो महीने पूरे लग गए — कार्ड, कपड़े, मेहंदी, हल्दी, दोनों तरफ़ के रिश्तेदारों का आना-जाना। मेरी माँ ने रुक्मणी को पहली बार देखा तो गले लगा लिया, और कहा — “बहू तो हीरो है।” रुक्मणी ने शरमाकर सिर झुका लिया, पर मुझे पता था कि वो “हीरो” शब्द को बहुत एंजॉय कर रही थी, क्योंकि उसके मन में वो बात चल रही थी जो माँ को पता नहीं थी।

शादी से एक हफ़्ता पहले रुक्मणी ने मुझे रात को फोन किया।

“सूरज, एक बात।”

“बोलो।”

“शादी के बाद सुहागरात में तुमने कुछ सोचा है?”

“सोचा है,” मैंने कहा। “पहली रात दोनों की। कोई और नहीं।”

“हम्म,” वो रुकी। “पर एक बात और है।”

“क्या?”

“दस दिन,” उसने कहा।

“क्या दस दिन?”

“दस दिन पहले से मैंने सब बंद कर दिया है। कोई मिलन नहीं। माँ ने कहा था कि शादी से पहले ब्रह्मचर्य रखो, तो शरीर साफ़ रहता है और पहली रात खास होती है। तो मैंने रख लिया।”

“यानी दस दिन?”

“दस दिन,” उसने कहा, और फिर हँसकर जोड़ा, “और तुमने भी रखना है।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे देखना है कि दस दिन के बाद तुम्हारा क्या होता है,” उसने कहा। “मुझे लगता है तुम पागल हो जाओगे।”

मैं पागल हो गया। दस दिन में मेरा हाल ऐसा हो गया कि रात को उसकी आवाज़ सुनकर ही मेरा लंड खड़ा हो जाता, और जब वो वीडियो कॉल करती, तो बस उसकी गर्दन देखकर ही हालत खराब हो जाती। वो जान-बूझकर तंग करती थी — कभी कंधा दिखाती, कभी बालों को एक तरफ़ करके गर्दन, और एक बार तो बस ऐसे ही दुपट्टा सरकाकर कॉल पर आई कि मैंने लगभग फोन फेंक दिया।

“कमीनी,” मैंने कहा।

“बहुत,” उसने कहा, और कॉल काट दिया।

शादी का दिन आया। मार्च की शुरुआत थी, हवा में फूलों की महक, और पूरा पंडाल रोशनी से भरा हुआ। शहनाई बज रही थी, बच्चे भाग रहे थे, मामा लोग मज़ाक कर रहे थे। और बीच में, लाल जोड़े में, रुक्मणी।

जब वो सजकर आई, तो मैं उसे देखकर बोलना भूल गया। लाल साड़ी, सोने के गहने, माथे पर बिंदी, हाथों पर मेहंदी। उसकी आँखें नीची थीं, पर जब उसने मुझे देखा, तो उनमें वो चमक थी जो सिर्फ़ मेरे लिए थी।

फेरे हुए, सात वचन लिए, कन्यादान हुआ। पंडितजी मंत्र पढ़ रहे थे और मैं सोच रहा था कि दस दिन हो गए। बीच-बीच में रुक्मणी मेरी तरफ़ देखकर हल्का सा मुस्कुरा देती, जैसे कहे — “सब्र करो।”

रात के दो बजे विदाई हुई। रुक्मणी रोई — असली आँसू, जो हर लड़की रोती है। माँ ने उसे गले लगाया, बाबा ने सिर पर हाथ रखा, और फिर वो गाड़ी में मेरे पास बैठी। घूँघट में, हाथ में फूल।

गाड़ी चल पड़ी। बाहर शहर सो रहा था। रुक्मणी ने घूँघट हटाया, मेरी तरफ़ देखा, और बोली — “ससुराल जा रही हूँ।”

“और मेरे पास,” मैंने कहा।

“वही तो,” उसने कहा। “अब तुम्हारे पास जा रही हूँ, और तुम्हारे पास ही रहूँगी।”

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। और फिर गाड़ी की अंधेरी पिछली सीट पर, दोनों ने एक-दूसरे को देखा — और दस दिन की गिनती दोनों की आँखों में थी।

होटल का कमरा छोटा और सुंदर था — पलंग पर गुलाब की पंखुड़ियाँ, मोमबत्तियाँ, और खिड़की से आती ठंडी हवा। शादी के कपड़े उतारने में आधा घंटा लगा — मेहंदी, गहने, साड़ी के पिन, जूड़े के पिन। रुक्मणी हँसती रही — “तुम साड़ी भी नहीं खोल पाओगे, और शादी का दावा करते हो।”

जब आख़िरी पिन खुला, तो साड़ी ढीली हुई। और फिर वो सामने थी — लाल ब्लाउज़ में, और नीचे लाल पेटीकोट। दस दिन की दूरी के बाद वो पहली बार इतने पास थी।

मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसने रोक दिया।

“एक मिनट,” उसने कहा। “पहले बैठो।”

हम पलंग पर बैठ गए। रुक्मणी ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और कुछ सेकंड देखती रही।

“अब पति हो,” उसने कहा।

“और तुम पत्नी।”

“पर एक बात कभी नहीं बदलेगी,” उसने कहा। “बस वाला दिन। कभी नहीं भूलूँगी कि तुमने पहले मेरी गांड पर अपना लंड रगड़ा, फिर नाम पूछा।”

“और अगर न पूछता?”

“तो भी,” उसने कहा। “मैं तुम्हारा नंबर ले लेती।”

फिर उसने मुझे चूमा। पहला चुंबन धीमा था — शादी वाला, संकोच वाला, जैसे पहली बार हो। फिर दूसरा, और तीसरा। और फिर वो संकोच उतर गया और वही पुरानी भूख लौट आई। दस दिन की भूख।

ब्लाउज़ खुला। ब्रा खुली। उसके दूध सामने आए — भारी, गोल, ऊपर उठे हुए, और निपल्स अभी से खड़े हुए, कठोर, गहरे भूरे। मैंने दोनों हाथों में एक-एक दूध भरा। वज़न, गर्मी, नरमी — सब वही था, जो सात महीने से मेरा था, और अब सचमुच मेरा था।

मैंने निप्पल को मुँह में लिया। जीभ से गोल-गोल घुमाया, फिर हल्का दबाया। रुक्मणी ने सिर पीछे कर दिया और एक लंबी साँस छोड़ी। दूसरे हाथ से दूसरा दूध दबाता रहा, और निपल्स पर बारी-बारी जीभ फेरता रहा। दोनों निप्पल कुछ ही सेकंड में लाल, गीले, कठोर हो गए।

“दस दिन,” वो हाँफी, “बहुत लंबे थे।”

“तुमने ही रखवाए थे।”

“पता है,” उसने कहा, “इसलिए और मज़ा आ रहा है।”

मैंने उसकी पेटीकोट खींची। नीचे लाल पैंटी — पहले से गीली। पैंटी उतारी, और उसकी बुर सामने आई — घनी, चमकती, गुलाबी-भूरी, और पूरी तरह तैयार। दस दिन का इंतज़ार उसमें साफ़ लिखा हुआ था।

मैं नीचे झुका। पहले बाहरी होंठों पर चुंबन, फिर जीभ से लंबी लकीर। रुक्मणी पूरी उठ गई और चादर मुट्ठी में भर ली।

“ओह… सूरज…”

मैंने जीभ का काम शुरू किया — ऊपर की कली पर घेरे, फिर नीचे छेद के मुँह पर, फिर अंदर तक। उसका स्वाद मीठा-नमकीन था, और उसकी बुर हर बार मेरी जीभ पर सिकुड़ रही थी। एक हाथ से उसकी गांड सहलाता रहा, दूसरे से कमर थामे रखा।

कुछ मिनट में उसकी साँसें बेतरतीब हो गईं। उसने मेरे बाल पकड़े, ऊपर खींचा, फिर नीचे दबाया।

“रुको मत,” वो बड़बड़ी, “बस थोड़ा और…”

मैंने और तेज़ किया। और फिर वो झड़ी — लंबा, काँपता हुआ झड़ापा, जिसमें उसने मेरा सिर दोनों जाँघों के बीच कस लिया और पूरा शरीर तन गया। मैंने पूरा अमृत पी लिया, और फिर चेहरा ऊपर उठाकर उसे देखा।

वो पलंग पर पसरी थी, चेहरा लाल, साँस भारी।

“अब,” मैंने कहा।

“अब,” उसने आँखें खोलकर कहा।

मैंने अपने कपड़े उतारे। जब बेल्ट खुली और पैंट नीचे गई, तो रुक्मणी ने देखा — और दस दिन की दूरी के बाद वो लंड पहले से भी ज़्यादा तना हुआ लगा। नौ इंच, मोटा, नसें उभरी हुईं, सिर चमकदार। उसने हाथ बढ़ाकर मुट्ठी में थामा, और हल्का सहलाया।

“मेरा पति,” उसने धीमे से कहा, और मुट्ठी में कस लिया।

मैंने कंडोम लगाया। शादी के बाद भी हमने यही रखा था — सुविधा के लिए, और साफ़-सुथरेपन के लिए। फिर उसके पैरों के बीच आया, नोक रखी, और धीरे से आगे बढ़ा।

पहले एक इंच, फिर तीन, फिर पाँच। रुक्मणी ने होंठ कस लिए और मेरी तरफ़ देखने लगी। जब पूरा अंदर गया, तो उसने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली।

“पूरा,” उसने फुसफुसाया। “पूरा अंदर है। दस दिन बाद।”

मैंने धीमे धक्के शुरू किए। गहरे, तोलकर। हर धक्के पर उसकी गांड मेरी जाँघों से टकराती, और टकराने की आवाज़ कमरे में गूँजती। उसकी बुर हर बार मेरे लंड को कसकर पकड़ती, जैसे दस दिन का हिसाब एक साथ वसूल कर रही हो।

फिर उसने पैर मेरी पीठ पर कस लिए और नीचे से गांड मिलानी शुरू की। अब हम दोनों एक लय में थे। मैंने झुककर उसके दूध को मुँह में लिया, और उसकी गर्दन पर होंठ रख दिए। उसने मेरी पीठ पर नाखून चलाए।

“सूरज,” उसने कान में कहा, “आज पति-पत्नी वाला करो। धीरे। पूरी रात।”

मैंने रफ़्तार नहीं बढ़ाई। धीमे ही रखा — लंबे, गहरे धक्के, बिना जल्दी। बीच-बीच में रुककर उसके होंठ चूमता, फिर फिर शुरू करता। उसकी साँसें मेरी गर्दन पर गरम हवा छोड़ती रहीं। दोनों पसीने से तर हो गए।

कुछ मिनट बाद उसने पैर और फैलाए और मुझे अपने ऊपर खींच लिया। उसके दूध मेरे सीने से चिपक गए, निपल्स मेरी छाती पर रगड़ खाने लगे।

“अब ज़ोर से,” उसने कहा।

मैंने गति बढ़ाई। अब धक्के तेज़ थे, गहरे। पलंग हिलने लगा, और उसकी आवाज़ भी बढ़ने लगी। उसने मेरी गर्दन पकड़ी और मेरे होंठ अपने होंठों पर रखे।

“साथ,” वो हाँफी, “साथ आओ…”

कुछ और धक्के, और फिर हम दोनों साथ टूटे। उसका शरीर तन गया, बुर ने मुझे कसकर भींच लिया, और हम दोनों काँपते रहे। मैंने छोड़ा — गहरे, बार-बार। और फिर उसके ऊपर पसर गया।

कुछ देर दोनों चुप रहे। सिर्फ़ साँसें। उसने मेरे बालों को हटाया और मेरे माथे पर चूम लिया।

“पहली रात,” उसने धीमे से कहा।

“पहली रात,” मैंने दोहराया।

“और सिर्फ़ दोनों की,” उसने कहा। “आज कोई और नहीं था।”

“आज कोई और नहीं,” मैंने कहा।

उस रात हमने तीन बार और किया — एक बार बाथरूम में, एक बार खिड़की के पास खड़े होकर, और आख़िरी बार सुबह होते-होते, बहुत धीरे, जैसे दोनों थक गए हों पर अलग न होना चाहते हों। और जब सूरज निकला, तो वो मेरी बाँह में सो रही थी, और मुझे लगा कि शादी नाम की चीज़ में कुछ तो है।

हनीमून के लिए हम मनाली गए — न अधिक ठंड, न अधिक भीड़। एक पहाड़ी पर छोटा सा कॉटेज, जिसकी खिड़की से पूरी घाटी दिखती थी।

उस हफ़्ते में हमने एक चीज़ की जो पहले नहीं की थी — हमने शरीर से ज़्यादा बातें कीं। सुबह उठकर चाय, बालकनी में बैठकर दो घंटे बात, दोपहर में नींद, शाम को बाज़ार, और रात में चुदाई। पहली बार हम “पति-पत्नी” की तरह जिए, न कि “प्रेमी-प्रेमिका” की तरह।

एक रात, पहाड़ की ठंड में, हम कंबल के नीचे लेटे थे। रुक्मणी ने मेरी छाती पर सिर रखा था, और उसकी उँगली मेरे सीने पर कुछ लिख रही थी।

“सूरज,” उसने कहा।

“हाँ?”

“नोटबुक याद है?”

“हाँ।”

“शादी के बाद की लिस्ट,” उसने कहा। “पहला नाम लिखा था ना?”

“लिखा था,” मैंने कहा। “पर तुमने दिखाया नहीं।”

वो उठकर बैठी। कंबल सरका, और उसके दूध कंबल के किनारे से बाहर निकल आए। उसने अपना बैग उठाया, नोटबुक निकाली, और खोलकर मेरे सामने रख दी।

पन्ने पर एक नाम लिखा था — डेविड। और उसके नीचे, थोड़ा और छोटे अक्षरों में, एक और नाम — मीरा।

“मीरा कौन?” मैंने पूछा।

“मेरी सहेली,” उसने कहा। “जिससे मिलने मैं महारानी बाग आई थी, उस दिन। जिस दिन बस में तुम मिले।”

मैं चुप हो गया।

“तो अगली बार,” उसने कहा, “डेविड और मीरा?”

“डेविड और मीरा,” मैंने दोहराया।

“डेविड इसलिए,” उसने कहा, “क्योंकि वो सबसे शांत था, और उसके हाथ सबसे अच्छे थे। और मीरा इसलिए…” वो रुकी।

“क्यों?”

“क्योंकि मीरा ने मुझे सब कुछ सिखाया,” उसने कहा। “जब मैं कॉलेज में थी, तब वो मुझसे बड़ी थी, और उसने मुझे बताया था कि औरत का शरीर क्या होता है, कैसे खुलता है, कैसे झड़ता है। और अब मुझे लगता है कि उसे भी देखना चाहिए कि उसकी सिखाई चीज़ कहाँ पहुँची है।”

“और सिर्फ़ देखेगी, या…”

“सिर्फ़ देखेगी या नहीं, ये तुम पर छोड़ती हूँ,” उसने मुस्कुराकर कहा। “पर एक बात बता दूँ — मीरा बहुत खुली है। और उसका शरीर भी मुझसे कम नहीं है।”

उसने नोटबुक बंद कर दी, और फिर मेरी तरफ़ झुककर मुझे चूम लिया।

“अब सो जाओ,” उसने कहा। “कल फिर बात करेंगे।”

पर नींद कहाँ आती थी। दिमाग में एक तस्वीर घूम रही थी — रुक्मणी, मीरा, डेविड, और बीच में मैं। और उस तस्वीर में एक और चीज़ थी जो मुझे अच्छी लग रही थी — कि मीरा का नाम लिस्ट में है, यानी रुक्मणी ने अपनी सबसे पुरानी सहेली को भी अपने शरीर की कहानी में शामिल करना चाहा है।

हनीमून से लौटने के बाद एक हफ़्ते में रुक्मणी ने मीरा को घर बुलाया। कहा — “आ जा, मिल ले, और अपने दोस्त को भी देख ले।”

शनिवार की शाम मीरा आई।

पहली नज़र में पता चल गया कि रुक्मणी ने सच कहा था। मीरा उम्र में रुक्मणी से दो-तीन साल बड़ी थी, और शरीर में भी आगे। कद उससे थोड़ा ऊँचा, कमर पतली, और आगे-पीछे इतना भरा हुआ कि आते ही कमरे की हवा बदल गई। उसने जींस और कसी हुई काली टॉप पहनी थी, जिसमें उसके दूध साफ़ उभर रहे थे। बाल कटे हुए, कानों में बड़े झुमके, और आँखों में एक सीधी, बेझिझक नज़र।

उसने मुझे देखा, और फिर रुक्मणी की तरफ़ देखकर बोली — “यही है तेरा बस वाला?”

“हाँ,” रुक्मणी ने कहा, शरमाकर।

“ठीक है,” मीरा ने कहा, और मुझे ऊपर से नीचे देखकर मुस्कुरा दी। “तूने तो अच्छा चुना।”

रुक्मणी ने चाय बनाई। तीनों बैठे। मीरा बोलती रही — अपने काम की, अपने पति की जिससे वो अलग रह रही थी, और अपनी “आज़ादी” की। उसकी बातों में एक साफ़ बात थी — वो शरीर को लेकर शर्मिंदा नहीं थी। उसने बिना झिझक कहा — “शादी के बाद भी मैं जिससे मन करे, उससे सोती हूँ। पति को भी पता है। हम दोनों ने ये तय किया है।”

रुक्मणी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक सवाल था — “देखा, मैंने कहा था ना?”

फिर चाय के बाद रुक्मणी उठी और बोली — “मैं रसोई में कुछ लगाती हूँ।” और वो चली गई।

अब कमरे में मैं और मीरा थे।

मीरा ने कप रखा और मेरी तरफ़ देखा। उसने कुछ सेकंड मुझे देखा, और फिर वो बात कही जो सीधी थी — “रुक्मणी ने सब बता दिया है। सब।”

“सब?” मैंने पूछा।

“सब,” उसने कहा। “बस वाला दिन, पहली रात, चार लोग, छह लोग, और वो लिस्ट जिसमें मेरा नाम है।”

मैंने गला साफ़ किया। “और आपको बुरा नहीं लगा?”

“क्यों बुरा लगेगा?” उसने कहा। “मैं तो खुश हूँ। मैंने ही रुक्मणी को सिखाया था कि औरत को अपने शरीर से शर्म नहीं करनी चाहिए। और अब वो मुझसे आगे निकल गई है। इससे अच्छी बात क्या होगी?”

फिर वो थोड़ा झुकी, और धीमी आवाज़ में बोली — “एक बात पूछूँ?”

“पूछिए।”

“रुक्मणी ने कहा था कि तुम्हारे पास नौ इंच है,” उसने कहा, और फिर मेरी आँखों में देखकर मुस्कुराई, “सच है या बढ़ा-चढ़ा कर बोला है?”

“आप खुद देख लीजिए,” मैंने कहा।

“देख लूँगी,” उसने कहा। “पर तब, जब रुक्मणी भी हो। उसके बिना मज़ा नहीं आएगा।”

और ठीक उसी वक़्त रुक्मणी रसोई से निकली, हाथ में प्लेट लिए। उसने दोनों को देखा और बोली — “क्या बात हो रही थी?”

“तेरे पति की,” मीरा ने कहा।

“अच्छा,” रुक्मणी ने कहा, और प्लेट रखकर मेरे पास आकर बैठ गई। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया — जैसे मीरा के सामने दावा कर रही हो। और मीरा ने वो देखा, और हल्का सा सिर हिलाकर मुस्कुरा दी।

उस शाम मीरा गई तो दरवाज़ा बंद करके रुक्मणी मेरी तरफ़ मुड़ी।

“तो?” उसने पूछा।

“तो क्या?”

“कैसी लगी?”

“अच्छी,” मैंने कहा। “बहुत सीधी है।”

“और शरीर?”

“वो तो तुमने ही बताया था,” मैंने कहा।

रुक्मणी हँसी, और फिर मेरी गर्दन में हाथ डालकर बोली — “सूरज, अब एक बात तय करनी है।”

“क्या?”

“मीरा और डेविड,” उसने कहा। “कब?”

मैंने सोचा। “अगले महीने?”

“अगले महीने,” उसने दोहराया। “पर इस बार एक बात अलग होगी।”

“क्या?”

“इस बार तुम तय करोगे,” उसने कहा। “कौन क्या करेगा, कौन कहाँ रहेगा। पूरा प्लान तुम्हारा।”

“और तुम?”

“मैं सिर्फ़ आऊँगी,” उसने कहा, और मेरे कान में धीमे से बोली, “और जो तुम कहोगे, वही करूँगी।”

उस रात सोने से पहले मैंने फोन पर डेविड को मैसेज किया। दो लाइन का मैसेज — तारीख़ और जगह। जवाब दस मिनट में आया — “आ जाऊँगा।”

फिर मैंने मीरा को मैसेज किया। उसने जवाब में सिर्फ़ एक लाइन लिखी — “पहले बताना क्या पहनना है। या नहीं पहनना है।”

और फिर मैं बिस्तर पर लेटा, और रुक्मणी मेरी बग़ल में आकर लेट गई। उसने मेरी छाती पर हाथ रखा, और धीमे से बोली — “सोच रहे हो?”

“हाँ,” मैंने कहा।

“क्या सोच रहे हो?”

“ये सोच रहा हूँ,” मैंने कहा, “कि एक भरी हुई बस में एक लड़की ने अपनी गांड मेरे लंड से टकराई थी। और आज वो लड़की मेरी पत्नी है, और अगले महीने उसकी सहेली हमारे बिस्तर पर होगी।”

रुक्मणी हँसी। उसकी हँसी मेरी छाती पर काँपी।

“और तुम्हें पता है सबसे अच्छी बात क्या है?” उसने कहा।

“क्या?”

“कि तुम्हें इसका बुरा नहीं लगता,” उसने कहा। “तुम्हें ये सब अच्छा लगता है। और इसीलिए मैं तुम्हारी हूँ, और तुम्हारी ही रहूँगी। बाक़ी सब तो बस…”

“बस क्या?”

“बस मेरा शरीर है,” उसने कहा। “और शरीर तो खुलता है, बंद होता है। घर नहीं बदलता।”

उसने मेरी छाती पर एक चुंबन रखा, और फिर अपनी गांड को मेरी जाँघ पर रगड़कर करवट ले ली। और मुझे पता था कि ये रात भी चुदाई पर ख़त्म होगी — क्योंकि रुक्मणी कभी बिना चुदाई सोती नहीं थी, और मैं भी नहीं।

आगे क्या: अगले महीने वो रात — जिसमें रुक्मणी, मीरा, डेविड और सूरज एक ही कमरे में होंगे। इस बार प्लान सूरज का, और रुक्मणी की शर्त — “जो तुम कहोगे, वही करूँगी।” और साथ ही एक नया सवाल — मीरा की “आज़ादी” की बातें सुनकर रुक्मणी के मन में एक और नाम उभर रहा है, जिसका ज़िक्र उसने अभी किया भी नहीं।

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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