मोहल्ले की औरतों की जबर्जस्त चुदाई खेल

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जिस रात नौ लोगों की चुदाई हुई थी, उसके बाद पूरे मोहल्ले में हलचल मच गई। बात यह थी कि मौसी का मकान अब रात भर जागता रहता था। देर रात तक दरवाज़ा बंद रहता, पंखा चलता रहता, और कभी-कभी कराहों की आवाज़ बाहर तक पहुँच जाती। पड़ोस में रहने वाली औरतें सुबह-सुबह मौसी से पूछतीं, “नीलम, रात को तेरे घर कुछ होता है क्या? इतनी आवाज़?” और मौसी हँसकर टाल देती, “कुछ नहीं, बस भाँजा और उसका दोस्त आते हैं, बैठकर बातें करते हैं।”

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे तीन मर्दों ने मिलकर छः औरतों को चोदकर रंडी बनाए

लेकिन औरतें मूर्ख नहीं थीं। उन्होंने देखा था कि मौसी अब पहले से ज़्यादा खिली-खिली लगती है, चेहरे पर एक नूर है, चाल में एक झूला। उसके बदन में जो लचक आ गई थी, वो सिर्फ़ खुशी से नहीं आती। सुनीता भी अब सुधरी हुई लगती, और रानू तो पूरी बदल चुकी थी — पहले जो लड़की आँख नीची किए चलती थी, अब वो हँसती-बोलती, बेझिझक। मोहल्ले की औरतें कानाफूसी करने लगीं, “नीलम के घर कुछ तो है। ज़रूर कोई जादू है।”

एक दोपहर शीला भाभी, जो मौसी की पड़ोसन थी और उससे उम्र में छोटी, घर आई और सीधा पूछ बैठी, “नीलम दीदी, सच बताओ, क्या चक्कर है? हम सब सुन रहे हैं।”

मौसी ने चाय बनाई, बैठाया, और फिर मुस्कुराकर कहा, “शीला, चक्कर कुछ नहीं है। बस ज़िंदगी जी रहे हैं।”

“मतलब?”

“मतलब ये कि मेरा भाँजा वेद आता है, और उसका दोस्त सोनू। दोनों जवान हैं। और मैं… मैं औरत हूँ। बाक़ी तू समझ ले।”

शीला भाभी की आँखें फैल गईं, “अरे! मतलब तू… अपने भाँजे से?”

मौसी हँसी, “भाँजे से क्या, भाँजा तो खून का नहीं है ना। और फिर भाँजा-भाँजे में क्या फ़र्क़? औरत को चाहिए — कोई दे। वेद देता है, सोनू देता है, और मेरी सहेली सुनीता का माली रोहन भी देता है।”

शीला भाभी ने चाय का कप रख दिया, “नीलम, और बताओ। पूरी बात बताओ।” और मौसी ने सब कुछ बता दिया — सब, शुरू से आख़िर तक।

शीला भाभी सुनकर हक्की-बक्की रह गई, “और रानू? वो तो बच्ची है!”

“सत्रह की है, बच्ची कहाँ? और शीला, तेरा तो पति शहर में रहता है, महीने में दो बार आता है। तू कैसे काम चलाती है?”

शीला भाभी ने मुँह बनाकर कहा, “हाथ से। और क्या? दो साल से वो भी ठीक से नहीं देता।”

मौसी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “तो आज ही आ जा। रात को। और अपने साथ कमला दीदी और रीना को भी ले आ। और रीना की बेटी टीना को भी। देख, अब यहाँ पूरा मेला लगेगा।”

उस रात चार औरतें आईं। पहले शीला भाभी — बत्तीस साल की, गोरी, भरी हुई देह, बड़ी चूचियाँ और गोल गांड। पति शहर में काम करता था और महीने में दो बार आता था, इसलिए वो हमेशा भूखी-सी लगती थी। उसकी आँखों में एक बेचैनी थी और होंठ हमेशा भरे हुए, जैसे कुछ कहना चाहते हों।

फिर कमला दीदी — अड़तीस की, थोड़ी भरी हुई, दो बच्चों की माँ, चेहरे पर हल्की सी झुर्रियाँ लेकिन बदन एकदम गद्देदार। उसकी चूचियाँ बच्चों को दूध पिलाने से और भारी हो गई थीं, निपल्स बड़े और भूरे। वो पहले तो शरमाती रही, लेकिन जैसे-जैसे बातें खुलीं, वो भी बेझिझक हो गई।

तीसरी रीना — पैंतीस की, तेज़-तर्रार, बोल्ड, जींस-टॉप पहनने वाली। उसका बदन कसा हुआ, बिना बच्चा हुए, इसलिए उसकी बुर और गांड दोनों जवान थीं। वो बेझिझक हँसती और बेझिझक बोलती।

और चौथी टीना — रीना की बेटी, अठारह की, मासूम, पतली, कॉलेज में पढ़ती। रानू की उम्र की, लेकिन रानू से ज़्यादा शरमाती। वो अपनी माँ के साथ आई थी और पूरे रास्ते पूछती रही, “मम्मी, वहाँ क्या होता है?”

रीना हँसकर बोली, “बेटा, पहुँचकर पता चल जाएगा।”

जब ये चारों आईं, तो घर में पहले से मौजूद औरतें — मौसी, सुनीता, पूजा, रानू, नेहा और मीना — सब बैठी थीं। अब घर में दस औरतें थीं। और मर्द सिर्फ़ तीन — मैं, सोनू और रोहन काका।

मौसी ने सबको बिठाकर चाय पिलाई और माहौल हल्का किया। हँसी-मज़ाक चला, चुटकुले हुए, और फिर मौसी ने कहा, “अब सबको पता है कि यहाँ क्यों आए हैं? या किसी को समझाना पड़े?”

शीला भाभी ने हँसकर कहा, “नीलम, हम सब समझ चुके हैं। बस अब काम की बात करो।”

और सब हँस पड़ीं।

मौसी ने आज और बड़ा बिस्तर बनवाया। चारों गद्दे जोड़े, ऊपर साफ़ चादरें, और एक तरफ़ पानी का घड़ा और तौलिए रख दिए। क्योंकि आज दस औरतें और तीन मर्द थे, और रात लंबी होने वाली थी।

सब पहले कपड़ों में थीं। मौसी ने कहा, “आज नियम बदलता है। पहले हम औरतें सब एक-दूसरे को तैयार करेंगी। मर्द बाद में आएँगे।” और यह नया नियम था — पहले औरतें आपस में खेलेंगी, और मर्द सिर्फ़ देखेंगे। यह सुनकर तीनों मर्दों की हालत खराब हो गई — पूरी रात सिर्फ़ देखना, बिना छूने।

शीला भाभी ने पूछा, “नीलम, तू इतनी पक्की कैसे हो गई?”

मौसी हँसी, “शीला, औरत को एक बार चूत खुल जाए, तो वो खुद पक्की हो जाती है। देख, पहले मैं भी शरमाती थी। अब देख।” और उसने अपनी साड़ी खोल दी। उसकी भारी चूचियाँ और बयालीस इंच की गांड बाहर आ गईं। दस औरतों ने मौसी को निहारा।

फिर एक-एक करके सबने कपड़े उतारे। सुनीता की भारी दूध वाली चूचियाँ, पूजा की छोटी कसी चूचियाँ, रानू की गोल गांड, नेहा की बड़ी गांड, मीना की गोरी देह — और अब शीला भाभी की भरी छाती, कमला दीदी की गद्देदार देह, रीना का कसा बदन, और टीना की मासूम-सी पतली देह।

दस औरतें, दस तरह के बदन। और तीनों मर्द दीवार से टिककर बैठे थे, लंड खड़े किए, और सिर्फ़ देख रहे थे।

कमला दीदी ने शरमाकर कहा, “नीलम, इन तीनों को ऐसे बिठाकर रखा है, कुछ करने भी दो।”

मौसी ने कहा, “नहीं, आज पहले हम। इन्हें तरसना है।” और सब हँस पड़ीं।

अब मौसी ने पहला क़दम उठाया। उसने शीला भाभी को अपने पास बुलाया और उसके होंठ चूमे। शीला भाभी ने पहले तो झिझकी, फिर उसने भी मौसी के होंठ चूमे। दोनों की जीभें लिपट गईं। “म्म्म… स्मूच…” की आवाज़ें हुईं। मौसी ने शीला की भारी चूचियाँ दबाईं और उसका निप्पल चूसा। शीला भाभी कराह उठी, “आह नीलम… दो साल से किसी ने नहीं छुआ…” और उसकी आँखें भर आईं।

फिर सबने एक-दूसरे को चूमना शुरू किया। दस औरतें, हर एक किसी न किसी को चूम रही थी। पूजा ने नेहा को, नेहा ने मीना को, मीना ने रानू को, रानू ने टीना को, टीना ने शरमाकर पूजा को, रीना ने सुनीता को, सुनीता ने कमला को, कमला ने शीला को, शीला ने मौसी को, और मौसी ने सबको। पूरा कमरा चूमने और चूसने की आवाज़ों से गूँज उठा।

टीना पहली बार किसी लड़की को चूम रही थी। उसने शरमाकर रानू से पूछा, “रानू, ये सब… ये सब ठीक है ना?” रानू ने उसे गले लगाकर कहा, “टीना, तू बस छोड़ दे अपने आपको। जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है।” और टीना ने आँखें बंद कर लीं।

अब मौसी ने औरतों को जोड़ियों में बाँटा। “हर एक अपने सामने वाली की चूत चाटेगी। और मर्द सिर्फ़ देखेंगे।” और पूरा दृश्य बन गया।

मौसी ने शीला भाभी की चूत चाटी, और शीला ने मौसी की। दोनों एक-दूसरे की बुर पर मुँह लगाकर चाटने लगीं। सुनीता ने कमला दीदी की चूत चाटी, और कमला ने सुनीता की। पूजा ने नेहा की, नेहा ने मीना की, मीना ने रानू की, रानू ने टीना की, टीना ने रीना की, और रीना ने पूजा की। दस औरतें एक चक्र बनाकर एक-दूसरे की चूत चाट रही थीं।

कमरे में चूत के रस की गंध, चाटने की आवाज़ें, और कराहें भर गईं। टीना तो पहली बार थी — जब रानू ने उसकी बुर चाटी, तो वो ज़ोर से चीख पड़ी, “आह रानू… ये क्या… मर जाऊँगी…” और उसकी आँखों से पानी बह निकला। रीना ने बेटी को ऐसे कराहते देखा तो हँसकर बोली, “बेटा, अब तेरी चूत जाग गई।”

शीला भाभी की बुर चाटते-चाटते मौसी ने कहा, “शीला, तेरी चूत कितनी गरम है। सच बता, कब से भूखी है?”

शीला भाभी ने कराहते हुए कहा, “दो साल से नीलम… दो साल से। वो आता है, खुद ऊपर आ जाता है, पाँच मिनट में झड़कर सो जाता है। मेरी तो जागती ही रह जाती है।”

मौसी हँसी, “आज पूरी भूख निकलेगी। देख, मेरे भाँजे का लंड सात इंच का है और सोनू का तो दस इंच का। आज तेरी चूत की जड़ हिल जाएगी।”

और शीला भाभी ने तीनों मर्दों की तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिया।

जब सब औरतें पूरी तरह भीग चुकीं, कराह चुकीं, और तीनों मर्द बेसब्र हो गए, तब मौसी ने कहा, “अच्छा, अब आओ।” और तीनों मर्द एक साथ उठ खड़े हुए।

मैं सबसे पहले शीला भाभी के पास गया — क्योंकि वो सबसे भूखी लग रही थी। उसने मुझे देखकर खुद अपनी टाँगें फैला दीं। उसकी बुर भरी हुई, बड़ी और लाल थी, चूत के होंठ फूले हुए। मैंने अपना लंड उसकी बुर पर रखा और धीरे-धीरे धकेला। शीला भाभी ने लंबी साँस छोड़ी, “आह… दो साल बाद… किसी मर्द का लंड… हाय राम… पूरा अंदर…” और उसकी आँखें भर आईं।

मैं ठोकने लगा। शीला भाभी की भारी चूचियाँ झूलतीं और उसकी गोल गांड लहराती। मैं ठोकते-ठोकते झुककर उसके होंठ चूमता, उसकी चूचियाँ दबाता, निपल्स चूसता। शीला भाभी कराहती, “और ठोको वेद… और ठोको… मेरी चूत फाड़ दो… दो साल की भूख है…”

सोनू नेहा के पास गया और उसकी चूत में अपना दस इंच का लंड डाला। नेहा ने चीख पड़ी, “आआआह… फिर से… इतना बड़ा…” और सोनू ठोकने लगा। नेहा बेबाक होकर गालियाँ बकने लगी, “चोद सोनू… ज़ोर से चोद… मेरी चूत फाड़ दे…”

रोहन काका ने मौसी को घुटनों के बल किया और उसकी चूत में अपना मोटा लंड डालकर ठोकने लगे। मौसी कराह उठी, “आह रोहन… ठोक… मेरी चूत को फाड़ दे…” और रोहन ठोकते-ठोकते मौसी की गांड दबाते और उसकी चूचियाँ चूसते।

बाक़ी औरतें — सुनीता, पूजा, रानू, मीना, कमला दीदी, रीना और टीना — सब बारी का इंतज़ार कर रही थीं, और इंतज़ार में एक-दूसरे की चूत चाट रही थीं, चूचियाँ चूस रही थीं। टीना तो अब पूरी खुल चुकी थी और बेझिझक होकर रानू की चूत चाट रही थी।

कुछ देर ठोकने के बाद मौसी ने कहा, “शीला, तेरे लिए आज कुछ ख़ास है।” और उसने सोनू को बुलाया। “सोनू, तू भी आ। शीला की चूत में आज दो लंड जाएँगे। एक साथ।”

शीला भाभी ने घबराकर पूछा, “दो लंड एक साथ? अरे, चूत फट जाएगी!”

मौसी हँसी, “फटेगी नहीं। तू तो बच्चा भी जनी है, तेरी चूत खुली हुई है। अब देख, दोनों डालेंगे, और तू ज़िंदगी का सबसे बड़ा मज़ा लेगी।”

शीला भाभी ने हाँ कर दी, लेकिन उसकी आँखों में डर था।

मैं शीला भाभी की चूत में लंड डाले हुए था। सोनू आया और उसने अपना लंड भी उसी बुर में, मेरे लंड के साथ, अंदर डालने की कोशिश की। पहले तो थोड़ा अटका, फिर धीरे-धीरे दोनों लंड शीला भाभी की चूत में अंदर चले गए।

शीला भाभी ने चीख पड़ी, “आआआआह… हाय राम… दो लंड… मेरी चूत में दो लंड… फट गई… मर गई…” और उसकी आँखों से पानी बह निकला। लेकिन वो रुकी नहीं, उसने दोनों की कमर पकड़ ली, “चोदो… दोनों चोदो… मत निकालो… मरना है तो चुदाई में मरूँगी…”

मैं और सोनू दोनों ठोकने लगे। पहले एक-एक करके, फिर साथ-साथ। शीला भाभी की चूत दोनों लंडों से भरी हुई थी और वो बेबाक होकर चीख रही थी, “चोदो… चोदो… मेरी चूत तोड़ दो… दो साल की भूख आज निकल गई… हाय राम… कितना अच्छा…”

मौसी पास बैठकर यह देख रही थी और हँस रही थी, “देखो सब, शीला कैसे ले रही है। औरत की चूत में कितना दम है।” और बाक़ी औरतें देखकर ताली बजाने लगीं।

कमला दीदी ने कहा, “नीलम, मुझे भी दो लंड चाहिए।”

मौसी हँसी, “सबको मिलेगा। आज रात लंबी है।”

शीला भाभी को थोड़ा आराम देकर मैं कमला दीदी के पास गया। वो अड़तीस की, दो बच्चों की माँ, बदन गद्देदार। उसकी चूचियाँ बच्चों को दूध पिलाने से भारी हो गई थीं। उसने शरमाकर कहा, “वेद, मेरी चूत ढीली हो गई होगी, दो बच्चे हुए हैं।”

मैंने कहा, “दीदी, ढीली नहीं है, गरम है। और गरम चूत का अपना मज़ा है।” और मैंने उसकी चूत में लंड डाल दिया। कमला दीदी ने लंबी साँस छोड़ी और मेरी गर्दन पकड़ ली, “आह… अच्छा लग रहा है…” मैं ठोकने लगा और उसकी भारी चूचियाँ झूलने लगीं। मैंने झुककर उसके बड़े भूरे निप्पल चूसे, और कमला दीदी कराह उठी, “आह वेद… निप्पल मत छेड़… बच्चों ने दूध पिया है, बहुत संवेदनशील हैं…” लेकिन उसने मेरा सिर और दबा दिया।

इधर सोनू रीना के पास गया। रीना बोल्ड थी, उसने खुद सोनू को खींचकर चूम लिया और उसका लंड अपनी चूत में डलवा लिया। सोनू ठोकने लगा और रीना बेबाक होकर गालियाँ बकने लगी, “चोद सोनू… ज़ोर से चोद… मेरी चूत में दम है… तेरा लंड कितना मोटा है… ऐसे ही…”

और रोहन काका टीना के पास गए। टीना तो अठारह की थी, पहली बार चुद रही थी, और सबसे ज़्यादा शरमा रही थी। रोहन काका ने उसकी छोटी चूचियाँ चूसीं और फिर उसकी बुर में अपना मोटा लंड डाला। टीना ने कराहकर अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया, “मम्मी… ज़रा दर्द है…” और रीना ने बेटी का हाथ सहलाया, “हो जाएगा बेटा, अब मज़ा आएगा।”

टीना की चूत कसी हुई थी और रोहन का लंड मोटा। धीरे-धीरे लंड अंदर गया और टीना की आँखों से पानी निकला, लेकिन फिर वो कराहने लगी, “आह… अच्छा लग रहा है… और ठोको काका…” और रोहन हँसकर बोले, “ले बिटिया, ले। अब तू भी औरत बन गई।”

अब मौसी ने बारी-बारी सबको पूरा करने का फ़ैसला किया। हर मर्द को हर औरत के पास जाना था। यानी दस औरतें और तीन मर्द — हर मर्द को दस-दस औरतें।

यह बहुत बड़ा काम था, लेकिन मौसी ने सबको बाँट दिया। पहले मैंने सुनीता को चोदा — उसकी चूत में लंड डालकर, उसकी भारी चूचियाँ दबाकर, निपल्स चूसकर। फिर पूजा को — उसकी छोटी कसी चूत में। फिर रानू को — उसकी गोल गांड पकड़कर डॉगी स्टाइल में। फिर मीना को — उसकी गोरी देह चूमकर, उसकी कच्ची चूत में। और फिर नेहा को — उसकी बड़ी गांड में।

सोनू ने भी यही किया — मौसी, सुनीता, पूजा, रानू, मीना, नेहा, शीला, कमला, रीना और टीना। सबको उसने अपना दस इंच का लंड दिया। औरतें जब सोनू का लंड अंदर लेतीं, तो सब एक ही चीखतीं, “आआआह… इतना बड़ा… पेट तक…” और फिर मज़े से कराहतीं।

रोहन काका ने भी सबको बारी-बारी चोदा — और उनका मोटा लंड हर औरत की चूत में गया।

पूरे कमरे में हर तरफ़ चुदाई हो रही थी। कोई पीठ के बल चुद रही थी, कोई घुटनों के बल, कोई चारपाई के किनारे झुकी हुई। कहीं चूचियाँ चूसी जा रही थीं, कहीं होंठ चूमे जा रहे थे, कहीं गांड दबाई जा रही थी। दस औरतों की कराहें एक साथ, और तीन मर्दों की साँसें भारी।

टीना तो अब बेझिझक हो गई थी और वो रानू के साथ मिलकर एक ही लंड को बारी-बारी चूस रही थी। कमला दीदी और शीला भाभी दोनों मिलकर सोनू का लंड एक साथ चूस रही थीं। मौसी सबको देख-देखकर मज़े ले रही थी और खुद भी तीनों मर्दों से बारी-बारी चुद रही थी।

रात के साढ़े तीन बजे तक चुदाई चलती रही। सब पसीने से लथपथ, थके हुए, लेकिन तृप्त। मौसी ने आख़िरी दौर में सबको लाइन में लिटा दिया — दस औरतें, टाँगें फैलाई हुईं, और तीन मर्द उनके बीच घूम-घूमकर ठोकते रहे।

सोनू सबसे पहले निकला — उसने मौसी की चूत में अपना सारा वीर्य डाला। मौसी कराह उठी, “आह… गरम… पूरी भर गई…” फिर उसने शीला भाभी की चूत में डाला, और शीला ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा, “आह सोनू… दो साल बाद… गरम डाला… मेरी चूत जल गई…”

रोहन काका ने कमला दीदी, रीना और टीना की चूतों में बारी-बारी डाला। टीना ने पहली बार वीर्य महसूस किया और चीख पड़ी, “आह काका… गरम… ये क्या है… मेरी बुर में आग लग गई…” और रीना हँसकर बोली, “बेटा, यही तो असली चीज़ है।”

और मैंने शीला भाभी की चूत में डाला — उनकी गरम, भरी हुई चूत में — और फिर मीना, रानू, पूजा और नेहा की चूतों में बारी-बारी अपना रस डाला। आख़िर में मौसी की चूचियों पर अपना बाक़ी रस डाल दिया, और मौसी ने उसे अपनी उँगली से लेकर चखा।

सब गद्दे पर लेट गए — तेरह लोग, एक-दूसरे से चिपके। मौसी बीच में थी। शीला भाभी ने कहा, “नीलम, ये तो कमाल है। दो साल की भूख आज निकल गई।” कमला दीदी ने कहा, “मुझे तो लगा चूत फट जाएगी, पर मज़ा ऐसा आया कि अब हर हफ़्ते आऊँगी।” और टीना ने शरमाकर कहा, “मम्मी, अब मैं भी हर हफ़्ते आऊँगी।”

मौसी ने सबके हाथ पकड़कर अपने बदन पर रख दिए और बोली, “देखो, आज पूरा मोहल्ला एक हो गया। अब कोई शरम नहीं, कोई बंदिश नहीं। जब मन करे, आ जाओ।”

रीना ने हँसकर कहा, “नीलम दीदी, अब तो मोहल्ले में चर्चा होगी।”

मौसी ने हँसकर कहा, “होने दे। जो चर्चा करे, उसे भी बुला लेंगे।”

सुबह जब सूरज निकला, तो घर की हालत देखने लायक थी। चादरें बिखरी हुईं, तौलिए गीले, पानी का घड़ा खाली। दस औरतें उठीं, अँगड़ाई लीं, और शरमाकर एक-दूसरे को देखने लगीं — जैसे रात कुछ हुआ ही न हो। लेकिन जिस्म पर निशान थे, और चेहरों पर वो नूर था जो सिर्फ़ चुदाई के बाद आता है।

शीला भाभी ने जाते-जाते मौसी के कान में कहा, “नीलम, अगले हफ़्ते फिर बुलाना। और अगली बार दो लंड वाला खेल फिर कराना।” और मौसी हँस पड़ी।

मोहल्ले में अगले ही दिन चर्चा हो गई। औरतें मौसी से पूछतीं, “नीलम, तू इतनी खिली क्यों लग रही है?” और मौसी हँसकर कहती, “कुछ नहीं, बस भाँजा आता है।” लेकिन अब मोहल्ले की हर औरत को पता चल गया था कि नीलम के घर में कुछ है — और वो कुछ बहुत अच्छा है।

कुछ औरतें आने लगीं। कोई बहाने से, कोई सीधे। और जो एक बार आ जाती, वो फिर हर हफ़्ते आती। घर में औरतों की संख्या बढ़ने लगी और मर्दों की कमी पड़ने लगी। एक दिन मौसी ने हँसकर कहा, “अब तीन मर्द कम पड़ रहे हैं। सोनू, तू अपने किसी दोस्त को बुला ले। और वेद, तू भी।”

और यही असली दिक्कत थी — मर्द कम थे।

अगले हफ़्ते सोनू दो दोस्त ले आया — बंटी और करण, दोनों तगड़े, बीस-बाईस के, बड़े लंड वाले। और मोहल्ले से भी दो मर्द जुड़े। अब छह मर्द और बारह औरतें थीं। उस रात सबने मिलकर “मर्द-औरत मेला” किया — हर मर्द ने दो-दो औरतें चोदीं, और मौसी ने सबका हिसाब बराबर बाँटा। घर अब पूरे मोहल्ले का “रंडी-कुंज” बन चुका था — जहाँ हर हफ़्ते नई औरत आती और हर रात नया मेला लगता।

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नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

4 thoughts on “मोहल्ले की औरतों की जबर्जस्त चुदाई खेल”

  1. koi Haridwar se hai jiska land 10 inch se bada ho. main haridwar ki rahane wali hun. aur mujhe randi banane ka shauk hai.

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