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उस रात के बाद पूरा घर बदल चुका था। अब मौसी का मकान सिर्फ़ मौसी का मकान नहीं था — वो हमारा अड्डा बन गया था।
हफ़्ते में दो-तीन बार तो हम वैसे भी जाते ही थे, लेकिन अब जाने का बहाना भी नहीं चाहिए था। सोनू और मैं मौसी के घर पहुँचते, दरवाज़ा बंद करते, और जो होता, वो दुनिया से छिपा रहता।
मम्मी को हमने कह दिया था कि मौसी अकेली है, हम उसका साथ देने जाते हैं। मम्मी खुश थी कि बेटा सुधर गया है — उसे क्या पता था कि हमारी “सेवा” किस तरह की सेवा है।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे मौसी की सहेली सुनीता और उनकी बेटी की चुदाई
उस महीने की बात है। एक शाम सब बैठे हुए थे — मौसी, सुनीता, पूजा और रानू। चाय चल रही थी और बातें हो रही थीं।
तभी पूजा ने कहा, “मम्मी, मेरी एक सहेली है, नेहा। कॉलेज में मेरे साथ पढ़ती है। बहुत मज़ेदार है। और… अभी तक कुँवारी है। बस बातें सुन-सुनकर तरस रही है।”
सुनीता हँसी, “तो बुला ले। यहाँ क्या कमी है?”
मौसी ने चाय का कप रखते हुए कहा, “हाँ, बुला ले। और रानू, तू भी अपनी कोई सहेली बुला। गाँव से। देख, अब घर में बहुत औरतें हैं, लेकिन मर्द सिर्फ़ तीन हैं। तीन औरतें और आ जाएँ, तो पूरा मेला लगेगा।”
रानू ने सोचकर कहा, “मम्मी, मेरी सहेली मीना है। वो गाँव में है। पर उसकी तो शादी तय हो चुकी है, अगले साल हो जाएगी। वो बहुत शरमाती है।”
मौसी ने शातिर मुस्कान के साथ कहा, “तो और अच्छा। शादी से पहले ही उसकी चूत खुल जाएगी, तो ससुराल में मज़े करेगी। बुला ले उसे भी।”
सोनू और मैंने यह सुनकर एक-दूसरे को देखा। तीन औरतें और आ रही थीं — मतलब छह औरतें, और हम तीन मर्द। यानी हर मर्द को दो औरतें। यानी पूरी रात चुदाई, बारी-बारी, बिना रुके।
सोनू ने धीरे से मेरे कान में कहा, “वेद, साला ये लोग तो हमें ख़त्म कर देंगे।”
मैं हँसा, “तो क्या हुआ? मरेंगे तो भी चुदाई में मरेंगे।”
मौसी ने हम दोनों की बात सुनकर कहा, “हाँ, अब तैयार रहो। तुम दोनों को ही नहीं, रोहन को भी बुला लेंगे। चार मर्द, छह औरतें। बराबर बँटवारा हो जाएगा।”
अगले शनिवार दोनों लड़कियाँ आ गईं। नेहा पूजा के साथ आई — बीस साल की, काली-साँवली, लंबी, तगड़ी। उसका बदन एकदम भरा हुआ था — चौड़े कूल्हे, गोल और बड़ी गांड, और चूचियाँ जो कुर्ती से बाहर निकलने को मचल रही थीं।
उसकी चाल में एक झूला था, जैसे वो जानती हो कि उसके पीछे सब देख रहे हैं। चेहरे पर एक बिंदी, होंठ भरे हुए, और आँखों में शरारत। स्कूल-कॉलेज वाली मासूमियत उसमें कम थी और एक गर्मजोशी ज़्यादा।
मीना रानू के साथ आई — उन्नीस साल की, गोरी, दुबली-पतली, गाँव की सीधी-सादी लड़की। सलवार-कुर्ता, सिर पर दुपट्टा, आँखें नीची। लेकिन जब उसने दुपट्टा हटाया, तो उसके गोरे गाल, छोटी नाक और सीधे-सादे चेहरे पर एक अजीब सी मिठास थी।
उसकी चूचियाँ छोटी थीं, लेकिन गोल और कसी हुईं, और उसकी गांड दुबली पर गोल। वो शरमाती बहुत थी, हर बात पर मुँह लाल कर लेती, और यही उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी थी।
मौसी ने दोनों को गले लगाया और बिठाया। पूजा और रानू ने अपनी-अपनी सहेलियों को चाय पिलाई, और हँसी-मज़ाक चलने लगा। मौसी ने नेहा से पूछा, “नेहा, तेरा कोई है कॉलेज में?”
नेहा ने बेझिझक कहा, “नहीं मौसी। किसी ने पूछा भी नहीं। और जो पूछते हैं, वो सिर्फ़ बातें करते हैं, कुछ करते नहीं।”
मौसी हँसी, “तो आज कुछ हो जाएगा।”
नेहा ने शरारत से पूछा, “मौसी, क्या होगा?”
मौसी ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, “आज रात को पता चल जाएगा।”
मीना ने धीरे से रानू से पूछा, “रानू, ये सब क्या है? मौसी कुछ कह रही थीं?” रानू ने हँसकर कहा, “मीना, तू बस तैयार रह। आज तेरी भी वो चीज़ होगी जो तेरी सहेलियाँ बताती हैं।” और मीना का चेहरा और लाल हो गया।
रात का खाना खाया गया, और मौसी ने आज पूरा घर तैयार किया। बड़े कमरे में तीन-चार गद्दे जोड़कर एक बड़ा बिस्तर बनाया गया, ऊपर साफ़ चादरें।
मौसी ने सारी खिड़कियाँ बंद करवाईं और एक पुराना पंखा चलाया। फिर उसने रोहन काका को फ़ोन किया — वो भी आ गए, तगड़े, पसीने से चमकते, हाथ में एक बोतल पानी लिए।
अब पूरे घर में ग्यारह लोग थे — चार मर्द, छह औरतें, और एक बूढ़ी मौसी जो सबको देखने आई थी… नहीं, छह औरतें तो ये ही थीं: मौसी नीलम, सुनीता, पूजा, रानू, नेहा और मीना। और मर्द तीन — मैं, सोनू और रोहन काका। कुल नौ लोग।
मौसी ने यह गिनती करके कहा, “देखो, आज पूरा समाज एक जगह है। कोई शरमाना नहीं। जो मन करे, करो।”
मौसी ने पहले सबको बैठकर बातें करने दिया। चाय, हँसी, मज़ाक।
फिर उसने कहा, “अब सब अपने-अपने कपड़े ढीले कर लो।” और खुद अपनी साड़ी उतारकर सिर्फ़ ब्लाउज़-पेटीकोट में आ गई। उसकी भारी चूचियाँ और बयालीस इंच की गांड खुल गईं।
सुनीता ने भी अपनी साड़ी उतार दी। पूजा और रानू ने नाइटी पहन ली थी, वो वैसे ही बैठीं। नेहा ने कुर्ती उतारकर सिर्फ़ कमीज़ में आ गई — और उसकी भरी हुई छाती और गोल गांड देखकर सोनू की आँखें फैल गईं।
मीना ने बड़ी मुश्किल से सलवार-कुर्ता उतारा और उसकी गोरी देह, छोटी चूचियाँ और गोल गांड सामने आ गई। वो दोनों हाथों से अपने आपको ढकने लगी।
मौसी ने कहा, “मीना, हाथ हटा। सबको देखने दे। औरत का जिस्म छिपाने के लिए नहीं, दिखाने के लिए होता है।”
मीना ने धीरे से हाथ हटाए। उसका चेहरा लाल था, लेकिन आँखों में उत्सुकता थी।
अब मौसी ने पहला क़दम उठाया। उसने रानू को बुलाकर उसके होंठ चूमे, फिर पूजा को बुलाकर चूमा, फिर नेहा को, फिर मीना को। चारों लड़कियों के होंठ चूमने के बाद मौसी ने कहा, “अब तुम चारों आपस में चूमो। जो जिसके पास हो, उसे चूमे।”
और फिर जो हुआ, वो देखने लायक था। चार लड़कियाँ — रानू, पूजा, नेहा और मीना — एक-दूसरे को चूमने लगीं।
पूजा ने नेहा को चूमा, नेहा ने रानू को, रानू ने मीना को, मीना ने पूजा को। “म्म्म… स्मूच…” की आवाज़ें चारों तरफ़ गूँजने लगीं। शुरू में शरम से, फिर धीरे-धीरे खुलकर।
मीना तो पहली बार किसी लड़की को चूम रही थी, और उसकी आँखें बंद हो गईं, जैसे कोई नई दुनिया खुल गई हो।
मौसी और सुनीता भी एक-दूसरे को चूमने लगीं — दो सहेलियाँ, दोनों उम्रदराज़, एक-दूसरे की चूचियाँ दबातीं, निपल्स चूसतीं, और हँसतीं।
सुनीता ने मौसी की भारी चूची मुँह में लेकर चूसी और मौसी ने सुनीता की। यह देखकर तीनों मर्दों के लंड पत्थर हो गए।
मैंने और सोनू ने अपनी पैंट खोल दीं। मेरा सात इंच का और सोनू का दस इंच का लंड बाहर निकला।
रोहन काका ने भी अपना मोटा लंड निकाल लिया। अब कमरे में तीन लंड खड़े थे, और छह औरतें उन्हें देख रही थीं।
नेहा ने सोनू का लंड देखकर आँखें बड़ी कर लीं और बेझिझक कहा, “हे भगवान, इतना बड़ा? ये तो अंदर जाएगा कैसे?”
और मीना ने मुँह छिपाकर कहा, “मुझे तो डर लग रहा है।”
रानू ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “डर मत, मैंने भी लिया है। पहले ज़रा दर्द होता है, फिर मज़ा।”
मौसी ने पूरा खेल शुरू किया। उसने हमें बाँट दिया — “वेद, तू मीना के साथ। सोनू, तू नेहा के साथ। रोहन, तू पूजा के साथ। और रानू और सुनीता मेरे साथ।” यानी हर मर्द को एक नई लड़की मिली, और मौसी-सुनीता आपस में।
मैं मीना के पास गया। वो काँप रही थी, शरम से और डर से। मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और धीरे से उसके होंठों पर होंठ रखे।
मीना ने पहले तो होंठ दबा लिए, फिर धीरे-धीरे खोल दिए। उसका चुंबन कच्चा, मासूम, लेकिन मीठा था।
मैंने उसे धीरे-धीरे चूमा, उसके होंठ चूसे, और वो भी धीरे-धीरे जवाब देने लगी। “म्म्म… स्मूच…” मीना की आँखें बंद हो गईं और उसने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
फिर मैंने उसकी कमीज़ के हुक खोले और उसकी छोटी, कसी चूचियाँ बाहर आईं। सफ़ेद, चिकनी, गुलाबी निपल्स वाली।
मैंने उन्हें हाथों में लिया, दबाया, और फिर एक निप्पल मुँह में लेकर चूसने लगा।
मीना ने “आह” करके मेरा सिर पकड़ लिया, “आह… ये क्या कर रहे हो… अच्छा लग रहा है…” मैंने दूसरा निप्पल भी चूसा, और उसकी चूचियों को चूमते-चूमते नीचे उतरा।
इधर सोनू नेहा के साथ था। नेहा बेझिझक थी — उसने खुद सोनू को खींचकर चूम लिया और उसकी जीभ अंदर डाल दी।
सोनू हँसते हुए बोला, “अरे, तू तो तेज़ निकली।” और नेहा ने कहा, “बहुत दिनों से तरस रही हूँ सोनू। आज मत रोकना।”
सोनू ने उसकी कमीज़ खोलकर उसकी भारी चूचियाँ बाहर निकालीं और उन्हें चूसने लगा। नेहा की चूचियाँ बड़ी और भारी थीं, निपल्स मोटे।
नेहा कराह रही थी, “आह सोनू… चूस… मेरे निप्पल… ऐसे ही…”
रोहन काका ने पूजा को गोद में बिठाकर उसके होंठ चूमे और उसकी चूचियाँ चूसने लगे।
पूजा तो अब अनुभवी हो चुकी थी, वो रोहन के लंड को हाथ से सहलाती और उसके कान में गालियाँ बकती, “काका, आज पूरी रात चोदना। मेरी चूत में दम है।”
और मौसी-सुनीता-रानू तीनों एक-दूसरे को चूम रही थीं, चूचियाँ चूस रही थीं। रानू मौसी की भारी चूची चूसती और मौसी रानू की।
सुनीता बीच में लेटकर दोनों की चूतें चाटती। मौसी रानू की बुर में उँगली डालकर उसे गरम कर रही थी।
पूरा कमरा कराहों, स्मूच और चूसने की आवाज़ों से भर गया।
अब मौसी ने कहा, “पहले सबकी चूत चाटो। तब लंड डालो।” और यह नियम था — पहले मुँह से तैयार करना।
मैंने मीना को लिटाया और उसकी सलवार नीचे सरकाई। उसकी बुर छोटी, कसी और गुलाबी थी, घनी पर छोटी झाँट से ढकी।
मैंने उसकी टाँगें फैलाईं और जीभ निकालकर उसकी बुर पर लगाई। मीना की पूरी देह ऐंठ गई, “हाय… ये क्या… अच्छा… बहुत अच्छा…” और उसने मेरे सिर को जाँघों से दबाने लगी।
मैंने उसकी बुर चाटी, चूसी, और जीभ अंदर तक डाली। मीना का रस मीठा था और वो जल्दी ही गीली हो गई।
वो कराह रही थी, “आह वेद… ऐसे ही चाट… मर जाऊँगी… मेरी सहेलियाँ सच कहती थीं…”
इधर सोनू नेहा की बुर चाट रहा था। नेहा की बुर बड़ी, रसीली और गरम थी, और सोनू की जीभ पड़ते ही वो चीख पड़ी, “आआह सोनू… वहीं… वहीं चाट… और अंदर… हाँ… मेरी चूत को चूस…” सोनू ने उसकी बुर चूसी और जीभ अंदर डाली, और नेहा की कमर उठने लगी।
रोहन काका पूजा की बुर चाट रहे थे और पूजा मौसी की बुर चाट रही थी। मौसी सुनीता की बुर चाट रही थी और सुनीता रानू की। एक जंज़ीर बन गई — सब एक-दूसरे की बुर चाट रहे थे। मीना और नेहा को यह देखकर और मज़ा आ गया।
कुछ देर बाद मौसी ने कहा, “अब लंड आगे करो। सब अपनी-अपनी चूत में डालो।” और पहला दौर शुरू हुआ।
मैंने अपना लंड मीना की गीली बुर पर रखा और धीरे-धीरे धकेला। मीना की बुर कसी हुई थी, और वो पहली बार चुद रही थी।
जैसे ही लंड आधा अंदर गया, मीना की आँखों से पानी की एक बूँद निकली, “आह… ज़रा दर्द है…” मैंने धीरे से एक झटका और मारा और लंड पूरा अंदर चला गया।
मीना ने कराहकर मेरी कमर को टाँगों से जकड़ लिया, “आआआह… पूरा अंदर… हाय राम… मेरी चूत में कुछ तोड़ गया… लेकिन अच्छा है… बहुत अच्छा…”
मैं ठोकने लगा — धीरे-धीरे, फिर थोड़ा तेज़। मीना की छोटी चूचियाँ झूलतीं और उसकी गोल गांड लहराती। मैं ठोकते-ठोकते उसके होंठ चूमता, चूचियाँ दबाता, निपल्स चूसता। मीना कराहती, “आह वेद… और ठोको… मेरी चूत फाड़ दो… मज़ा आ रहा है…”
सोनू नेहा को घुटनों के बल करके उसकी बुर में अपना दस इंच का लंड डाला।
नेहा ने चीख पड़ी, “आआआह… इतना बड़ा… मेरी चूत छोटी है सोनू… अंदर कहाँ जा रहा है…” लेकिन सोनू ने धक्का देकर पूरा अंदर कर दिया और नेहा कराह उठी, “हाय राम… पेट तक लग रहा है… लेकिन कितना अच्छा है…” सोनू ठोकने लगा और नेहा की बड़ी गांड हर ठोकर पर लहराती।
नेहा बेबाक होकर गालियाँ बकने लगी, “चोद सोनू… ज़ोर से चोद… मेरी चूत फाड़ दे… तेरी रंडी को चोद…”
रोहन काका ने पूजा को चारपाई पर पीठ के बल लिटाकर उसकी चूत में लंड डाला।
पूजा ने कराहकर उनकी गर्दन पकड़ ली, “काका, ज़ोर से… मेरी चूत में दम है…” और रोहन ठोकने लगे। पूजा की छोटी चूचियाँ हर झटके पर हिलतीं।
और मौसी, सुनीता और रानू — तीनों एक-दूसरे की चूतों में उँगलियाँ डालकर, चूचियाँ चूसकर, होंठ चूमकर मज़ा ले रही थीं। मौसी रानू की बुर में उँगली डालकर उसे ठोक रही थी, और रानू मौसी की चूत चाट रही थी।
पूरे कमरे में छह औरतों की कराहें, तीन लंडों की थप-थप और पसीने की बूँदें — सब एक साथ।
कुछ देर बाद मौसी ने कहा, “अब बदलो। हर मर्द दूसरी औरत के पास जाओ।” और यही असली मज़ा था — हर औरत को हर लंड मिले।
सोनू मीना के पास गया और मैं नेहा के पास। रोहन काका रानू के पास गए और पूजा मौसी के पास। सुनीता ने सोनू को पकड़ लिया, और मौसी ने मेरी तरफ़ देखकर इशारा किया कि पहले नेहा को पूरा करो।
मैंने नेहा को घुटनों के बल किया और उसकी बड़ी, गोल गांड ऊपर उठाई। उसकी बुर अभी-अभी सोनू के लंड से खुली थी, गीली और लाल। मैंने पीछे से लंड डालकर ठोकना शुरू किया।
नेहा कराह उठी, “आह वेद… तू भी… अच्छा लग रहा है… ज़ोर से ठोक… मेरी गांड पकड़… हाँ वहीं…” मैंने उसकी गांड दोनों हाथों से पकड़कर ठोका और झुककर उसकी गर्दन और कान चूमे। नेहा की बड़ी गांड मेरे हाथों में लहराती रही।
सोनू ने मीना के साथ शुरुआत की। मीना ने सोनू का दस इंच का लंड देखकर फिर घबरा गई, लेकिन अब उसकी बुर मेरे लंड से खुल चुकी थी, इसलिए सोनू का लंड आसानी से अंदर चला गया।
मीना ने कराहकर कहा, “आह सोनू भैया… बहुत बड़ा है… पेट तक लग रहा है…” और सोनू ठोकने लगा। मीना अब पूरी तरह खुल चुकी थी और बेबाक होकर बोल रही थी, “और ठोको… मेरी चूत फाड़ दो… मैं भी अब रंडी हूँ…”
रोहन काका ने रानू को चारपाई पर लिटाया और उसकी चूत में अपना मोटा लंड डाला।
रानू ने कराहकर उनकी गर्दन पकड़ ली, “काका, आज पूरी रात चोदना।” और रोहन हँसकर बोले, “ले रानू, ले। तू तो अपनी माँ जैसी ही निकली।”
मौसी ने पूजा और सुनीता को साथ लेकर उनकी चूतें चाटनी शुरू कीं, और बीच-बीच में उठकर हम तीनों मर्दों के लंड चूसती — जैसे कोई सबका हिस्सा बराबर बाँट रही हो।
मौसी ने एक बार मेरा लंड मुँह में लिया, चूसा, फिर सोनू का, फिर रोहन का। उसकी जीभ कमाल की थी।
अब मौसी ने कहा, “आज दो नई लड़कियों की गांड भी खुलेगी। नेहा और मीना, दोनों।” नेहा तो तैयार थी, मीना ने डरते हुए पूछा, “मौसी, गांड में भी? दर्द होगा ना?”
मौसी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “पहली बार में ज़रा सा। पर फिर तू खुद माँगेगी। देख, मैं तो दोनों जगह ले रही हूँ। और रानू भी।” और रानू ने सिर हिलाकर कहा, “मीना, सच कह रही हूँ, एक बार हो जाए तो फिर भूख लग जाती है।”
मीना ने हाँ कर दी।
मैंने पहले नेहा की गांड ली। उसकी गोल, बड़ी गांड पर थूका, चिकना किया, और लंड का सिरा गड्ढे पर रखा। नेहा ने गहरी साँस ली और मैंने धीरे-धीरे धकेला। गड्ढा कसा था, लेकिन लंड अंदर चला गया। नेहा ने चीख पड़ी, “आआआह… गांड में… हाय राम… कितना अच्छा… और ठोको वेद… मेरी गांड फाड़ दो…” और मैं ठोकने लगा।
इधर सोनू ने मीना की गांड पर थूका और लंड रखा। मीना ने गहरी साँस ली और सोनू ने धीरे से धकेला।
मीना की गांड में सोनू का दस इंच का लंड जाना मुश्किल था, लेकिन धीरे-धीरे वो अंदर चला गया। मीना ने कराहकर रानू का हाथ पकड़ लिया, “आह… जल रही है… लेकिन अच्छा भी है…” और रानू ने उसका हाथ सहलाया, “हो गया मीना, अब मज़ा आएगा।”
अब नेहा की चूत में रोहन का लंड और गांड में मेरा — नेहा दोनों जगह भरी हुई थी। और मीना की चूत में रोहन… नहीं, रोहन नेहा के साथ थे। तो मीना की चूत में मौसी की उँगली और गांड में सोनू का लंड। मीना कराह रही थी, “आह… दोनों जगह… पूरी भर गई…”
नेहा दोनों तरफ़ से चुद रही थी और बेबाक होकर गालियाँ बक रही थी, “चोदो… दोनों चोदो… मेरी चूत फाड़ दो, गांड फाड़ दो… आज पूरी रात चोदो मुझे…”
रात के तीन बजे तक चुदाई चलती रही। सब पसीने से लथपथ, थके हुए, लेकिन तृप्त। मौसी ने आख़िरी दौर में सबको एक जगह लिटा दिया — छह औरतें एक लंबी लाइन में, टाँगें फैलाई हुईं, और तीन मर्द उनके बीच घूम-घूमकर ठोकते रहे।
रोहन काका सबसे पहले निकले — उन्होंने मौसी की चूत में अपना वीर्य डाला।
मौसी कराह उठी, “आह… गरम… पूरी भर गई…” फिर सोनू ने नेहा की चूत में डाला,
और नेहा ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा, “आह… पहली बार… पूरी बुर भर गई…” और मैंने मीना की चूत में डाला, और मीना ने आँखें भर आईं, “आह वेद… गरम… मेरी बुर में आग…”
फिर बची हुई औरतों को भी पूरा किया — पूजा, रानू और सुनीता को बारी-बारी हमने ठोका और उनके चूचियों और गले पर अपना रस डाला। सुनीता ने कहा, “आज तो पूरा शरीर टूट गया, पर मज़ा ऐसा आया कि फिर मन है।”
सब गद्दे पर लेट गए — नौ लोग, एक-दूसरे से चिपके। मौसी बीच में थी, और उसने सबके हाथ पकड़कर अपने बदन पर रख दिए। सुनीता ने पूजा को, रानू ने मीना को, नेहा ने सोनू को गले लगा लिया।
मौसी ने धीरे से कहा, “देखो, आज पूरा घर एक हो गया। माँ, बेटी, सहेली, सहेली की बेटी — सब एक। कोई शरम नहीं, कोई बंदिश नहीं। जब मन करे, आ जाओ। ये घर अब ‘रंडी-कुंज’ है।”
नेहा ने हँसकर कहा, “मौसी, नाम अच्छा रखा है।” और मीना ने शरमाकर कहा, “मौसी, अब मैं भी हर हफ़्ते आऊँगी।” सब हँस पड़े।
रात भर तारे चमकते रहे, और नीचे आँगन में कुत्ते सो रहे थे। ऊपर बंद कमरे में एक नई दुनिया बन चुकी थी — जहाँ हर औरत हमारी थी, और हर रात एक नया मेला।
अगले हफ़्ते मौसी ने पूरे मोहल्ले की चार औरतों को बुलाया — शीला भाभी, कमला दीदी, रीना और उनकी बेटी टीना। अब घर में दस औरतें थीं। उस रात तीन मर्दों ने बारी-बारी सबको चोदा, और शीला भाभी की चूत में तो दो लंड एक साथ गए। मोहल्ले में चर्चा होने लगी — “नीलम के घर कुछ तो है।” अब वो घर पूरे मोहल्ले का अड्डा बन चुका था।
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