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दरवाज़ा बंद हुआ और कुंडी की आवाज़ पूरे घर में गूँजी। तीन मर्द मेरे ड्राइंग रूम में खड़े थे — नीरज, गणेश और सुखप्रीत। और मैं, अकेली औरत, बीच में। मैंने उन तीनों को एक-एक करके देखा, और मेरा जिस्म खुद बता रहा था कि आज रात कुछ बड़ा होने वाला है।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो जरुर पढ़ें की कैसे पड़ोसी लड़के को पटाकर उसकी रंडी बनकर चुदवाई।
नीरज मेरे पास आया और उसने पहले ही की तरह मेरी कमर पकड़ी, मुझे अपने से चिपकाया और मेरे माथे पर चूमा।
यह उसका हक़ था — वह पहले आया था, वह मेरा पहला था, और आज भी वही मेरा “घर” था।
फिर उसने मेरे कान में धीरे से कहा, “आज तू मेरी राँड है। ये दोनों मेरे दोस्त हैं, और मेरी चीज़ पर उनका भी हक़ है। समझी?”
“समझी,” मैंने कहा, और मेरी बुर ने अंदर से कस लिया।
गणेश आगे आया। छह फुट तीन इंच, चौड़ी छाती, दाढ़ी में घना स्याह बाल, हाथ भाले जैसे। उसने मेरा हाथ पकड़ा और उसे उठाकर चूमा — पुराने तरीक़े से, पर आँखों में बिल्कुल नई भूख।
“सिमरन जी,” उसने कहा, “नीरज ने आपकी तारीफ़ में जो-जो कहा, वो कम लग रहा है।”
“क्या कहा उसने?” मैंने मुस्कुराकर पूछा।
“कहा कि आपके पास जो है, वो किसी के पास नहीं है।” उसने मेरी आँखों में देखा। “और कहा कि आप बिस्तर में आग हो।”
“तो आज आप खुद जाँच लीजिए,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में जो कंपन थी, वह शरम की नहीं, भूख की थी।
फिर सुखप्रीत आया। दुबला, तेज़, हँसमुख। उसने हाथ नहीं पकड़ा — उसने सीधे मेरी कमर पर हाथ रखा और मुझे एक तरफ़ घुमा दिया, जैसे कोई तस्वीर का एंगल बदलता हो।
फिर उसने मेरी गाँड़ की तरफ़ देखा और एक लंबी सीटी बजाई।
“दीदी,” उसने कहा, “ये तो कमाल है। नीरज ने कहा था, पर इतना कहा नहीं था।”
“इतना क्या?” मैंने पूछा।
“ये कि आपकी गाँड़ देखकर आदमी का दिमाग़ ख़ाली हो जाता है।” वह हँसा। और उसकी हँसी में वह चालाकी थी जो आज रात मेरे साथ बहुत कुछ करने वाली थी।
मैंने चाय बनाई। चार कप। हम बैठे — मैं सोफ़े के बीच में, और तीनों मेरे आस-पास।
गणेश मेरी बाईं तरफ़, सुखप्रीत दाईं तरफ़, नीरज मेरे सामने फ़र्श पर बैठा — और वह मेरी टाँगों को देख रहा था, जो मेरी सूती कुर्ती से निकली हुई थीं।
बातें हुईं — नीरज के ऑफ़िस की, गणेश के जिम की, सुखप्रीत की गाड़ी की। पर हर बात के बीच एक हाथ मेरी टाँग पर आ जाता, एक हाथ मेरे कंधे पर रहता, और कोई न कोई मेरी तरफ़ झुककर मेरी खुशबू लेता।
दस मिनट में चाय ख़त्म हो गई। और जैसे ही आख़िरी कप मेज़ पर रखा गया, नीरज ने कहा, “अब चाय का काम ख़त्म।”
“अब क्या?” मैंने पूछा।
“अब तू।”
नीरज उठा और उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे खड़ा किया। फिर उसने मेरी कुर्ती की डोरी खींची।
कुर्ती खुली और मेरी चूचियाँ बाहर झूल गईं — भारी, गोल, और निपल्स सख़्त होकर उभरे हुए। तीनों ने एक साथ देखा और तीनों की साँस एक साथ भारी हुई।
“हे भगवान,” गणेश ने धीमी आवाज़ में कहा। “इतनी बड़ी।”
“छत्तीस की हैं,” मैंने शरमाते हुए कहा, पर शरम सिर्फ़ दिखावा था।
“और निप्पल?” सुखप्रीत ने पूछा, पास आकर। “ये इतने सख़्त क्यों हैं?”
“क्योंकि तुम तीनों यहाँ हो,” मैंने कहा।
उसने उँगली से मेरे निप्पल को छुआ और धीरे से घुमाया। मेरी कमर झटके से हिली।
और तभी गणेश ने दूसरी तरफ़ से मेरी दूसरी चूची पकड़ ली — पूरे हाथ से, जैसे कोई फल तोड़ता हो।
उसने दबाया, फिर छोड़ा, फिर दबाया। और जैसे ही उसने ज़ोर लगाया, मेरी चूची से दूध की एक बूँद निकली और उसकी कलाई पर गिरी।
वह रुक गया। उसने अपनी कलाई देखी, फिर मुझे देखा। “ये दूध?”
“हाँ,” मैंने कहा।
“अभी भी?”
“अभी भी। और बहुत निकलता है।”
गणेश ने अपनी कलाई को जीभ से चाट लिया और फिर सीधे मेरी चूची पर मुँह रख दिया।
उसने निप्पल को मुँह में लिया और ज़ोर से चूसा। दूध की धार उसके मुँह में गई और वह उसे पीने लगा — धीरे-धीरे, गहरे-गहरे, जैसे बच्चा पीता हो पर ज़्यादा भूखा।
दूसरी तरफ़ सुखप्रीत भी झुक गया और उसने मेरी दूसरी चूची मुँह में ले ली। अब दोनों तरफ़ से मेरी चूचियाँ चूसी जा रहीं थीं, और मैं बीच में खड़ी कराह रही थी।
नीरज पीछे आया। उसने मेरी पीठ पर हाथ रखा, फिर मेरी कमर पर, फिर नीचे जाकर मेरे पेटीकोट की डोरी खींची।
पेटीकोट फ़र्श पर गिरा। अब मैं पूरी नंगी थी — बस मेरी चूचियाँ दो मुँहों में, और मेरी बुर हवा में खुली।
नीरज ने मेरी गाँड़ पर दोनों हाथ रखे और उसे दबाया। फिर उसने झुककर मेरी गाँड़ पर चूमा — ठीक उसके बीच में।
मैं चीख पड़ी।
“सुंदर,” नीरज ने कहा। “ये आज दोनों को मिलेगी।”
“दोनों को?” सुखप्रीत ने मुँह उठाकर पूछा।
“हाँ,” नीरज ने कहा। “आज ये सब कुछ है। मुँह, बुर, और गाँड़। तीन जगह, तीन मर्द।”
गणेश ने मेरे निप्पल से मुँह हटाया और मेरी तरफ़ देखा। “तीनों एक साथ?”
“हाँ,” मैंने कहा। “तीनों एक साथ।”
तीनों हँसे — वह हँसी जो मर्द तब हँसते हैं जब उन्हें पता चलता है कि आज रात उनकी औरत नहीं रुकेगी।
नीरज ने मुझे बिस्तर पर लिटाया। उसने मेरी टाँगें खोलीं और मेरी बुर को देखा, जो अब तक गीली होकर चमक रही थी।
उसने उँगली से मेरे बुर के होंठ सहलाए और फिर सीधे अपनी जीभ नीचे लगा दी। मैंने अपनी कमर उठा दी।
और उसी वक़्त गणेश मेरे सिरहाने आया — उसने अपनी पैंट खोली और उसका लंड बाहर निकला।
मैंने देखा और मेरी आँखें फैल गईं। गणेश का लंड मोटा था — नीरज से कम लंबा, शायद नौ इंच, पर मोटाई में नीरज से भी आगे।
एक भाले जैसा, जैसा मैंने सोचा था। सिरा चौड़ा और गोल, और रगों की लकीरें उस पर उभरी हुईं।
वह खड़ा था मेरे मुँह के ठीक ऊपर, और उसका लंड मेरी ठुड्डी को छू रहा था।
“मुँह खोल,” गणेश ने कहा।
मैंने मुँह खोला और उसने अपना लंड अंदर डाल दिया। मोटाई की वजह से मेरे जबड़े में खिंचाव हुआ, पर मैंने पूरा लिया।
उसने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। मेरी जीभ उसके नीचे घूमती रही और मेरे होंठ उसे पकड़ते रहे।
ऊपर नीरज मेरी बुर चाट रहा था और अंदर-बाहर जीभ डाल रहा था।
फिर सुखप्रीत पीछे आया। उसने मेरी गाँड़ को दोनों हाथों से फैलाया और उस पर अपना तेल लगाया।
उसकी उँगली मेरी गाँड़ के छेद पर घूमी, फिर अंदर गई। मैं कराही — पर मुँह भरा होने की वजह से कराह दबी हुई निकली।
उसने दो उँगलियाँ डालीं और धीरे-धीरे खोलने लगा।
तीन जगह। मेरा मुँह, मेरी बुर, और मेरी गाँड़। एक साथ तीन मर्द मुझे खोल रहे थे, और मैं उनके बीच में एक टूटी हुई गुड़िया की तरह पड़ी थी — पर टूटी नहीं, बल्कि भरी हुई।
नीरज ने मेरी बुर में अपना लंड डाल दिया। पहला झटका गहरा था, और मेरी बुर ने उसे कसकर पकड़ लिया।
उसने धीरे-धीरे चोदना शुरू किया — लंबे, गहरे झटके।
ऊपर गणेश मेरे मुँह में अपना लंड दे रहा था, और पीछे सुखप्रीत मेरी गाँड़ में अपनी उँगलियाँ। मेरा पूरा जिस्म एक साथ तीन जगह से भरा हुआ था।
“देखो,” नीरज ने कहा, “इसकी बुर कैसे पकड़ रही है। जैसे जान नहीं देना चाहती।”
“राँड है,” गणेश ने कहा। “ऐसी राँड ही ऐसे पकड़ती है।”
“हाँ,” मैंने मुँह से लंड निकालकर कहा। “तेरी राँड।”
“किसकी?” नीरज ने पूछा, और एक ज़ोरदार झटका दिया।
“तेरी!” मैं चीखी। “तेरी राँड हूँ।”
“और ये दोनों?”
“ये भी मेरे हैं। जब तक तेरे साथ हैं।”
नीरज हँसा और उसने रफ़्तार बढ़ा दी। अब वह पूरी ताक़त से मेरी बुर मार रहा था, और हर झटके पर मेरी चूचियाँ हिलती थीं।
सुखप्रीत ने मेरी गाँड़ से उँगलियाँ निकालीं और अपना लंड सामने लाया।
उसका लंड पतला था पर लंबा — दस इंच से ज़्यादा — और सीधा। उसने तेल लगाकर सिरा मेरी गाँड़ पर रखा।
“तैयार?” उसने पूछा।
“कर दे,” मैंने कहा। “आज सब कर दे।”
उसने दबाया। पहला इंच गया, फिर दूसरा। मेरी गाँड़ खुलने लगी।
और फिर वह धीरे-धीरे अंदर गया — और जब पूरा अंदर था, तो मुझे लगा कि मेरे अंदर दो लंड हैं जो बस एक दीवार से अलग हैं।
नीरज मेरी बुर में, सुखप्रीत मेरी गाँड़ में। दोनों ने एक साथ हिलना शुरू किया — कभी साथ, कभी बारी-बारी।
मैं चीखने लगी। “आह! रुको… रुको मत… ऐसे ही करो…”
“अच्छा लग रहा है, राँड?” सुखप्रीत ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वह चालाकी थी।
“बहुत अच्छा…” मैं हाँफी। “बहुत…”
और ऊपर गणेश ने फिर अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया। अब तीनों एक लय में हिल रहे थे।
मेरा पूरा जिस्म उनके बीच एक ढोल की तरह बज रहा था। मेरी बुर नीरज के लंड से भरी, मेरी गाँड़ सुखप्रीत के लंड से भरी, और मेरा मुँह गणेश के लंड से।
मेरी चूचियाँ उनके बीच झूलती रहीं और दूध की बूँदें बहती रहीं।
नीचे से सुखप्रीत ने मेरी एक चूची पकड़ी और दबाई, और दूध की धार उसकी उँगलियों पर गिरी। उसने उँगलियाँ मुँह में लीं और चाट लीं।
“मीठा है,” उसने कहा। “साली, तेरा दूध मीठा है।”
“तो पी ले,” मैंने कहा। “जितना पीना है पी ले। आज तेरे लिए है।”
वे तीनों लंबे समय तक चोदते रहे। कोई जल्दी में नहीं था।
हर एक दूसरे को देख रहा था, हर एक मेरे जिस्म की एक-एक प्रतिक्रिया पढ़ रहा था।
मेरी बुर से रस बहकर मेरी जाँघों पर और फिर चादर पर गिर रहा था।
मेरी गाँड़ तेल से चिकनी हो गई थी और सुखप्रीत उसे बड़ी आसानी से खोल-बंद कर रहा था।
मेरे निपल्स दोनों हाथों से पकड़े जा रहे थे और हर बार दूध निकलता था।
गणेश पहले हारा। उसने मेरे बाल पकड़े और मेरा सिर अपनी तरफ़ खींचा, और फिर ज़ोरदार झटके देकर मेरे मुँह में अपना पानी उँडेल दिया। गर्म, मोटा, बहुत सारा।
मैंने पूरा लिया और निगल लिया। फिर उसने लंड बाहर निकाला और उसका सिरा मेरे होंठों पर रखकर बाक़ी बूँदें भी मेरे होंठों पर लगा दीं। मैंने जीभ से साफ़ कर लिया।
“अच्छी लड़की,” उसने कहा और मेरे माथे पर चूमा। यह चुम्बन गंदा भी था और प्यारा भी।
नीरज और सुखप्रीत अभी लगे थे। दोनों ने लय बदली — अब वे बारी-बारी चोद रहे थे।
जब नीरज अंदर जाता, तो सुखप्रीत रुक जाता; जब सुखप्रीत जाता, तो नीरज रुक जाता।
मेरी बुर और मेरी गाँड़ को एक-एक करके भरा जा रहा था, और मैं हर बार पूरी भर जाती थी।
यह खेल उन्होंने दस मिनट चलाया, और मैं दो बार आई — बिना छुए, सिर्फ़ भराव से।
“ये तो निकल रही है,” सुखप्रीत ने कहा।
“निकलने दे,” नीरज ने कहा। “आज जितना निकले, उतना अच्छा।”
फिर नीरज ने मुझे करवट दिलाई — अब मैं सुखप्रीत के ऊपर थी, और वह नीचे लेटा था।
उसका लंबा लंड फिर मेरी बुर में गया, और मैं उसके ऊपर बैठकर झूलने लगी।
नीरज पीछे आया और उसने मेरी गाँड़ पर अपना लंड रखा। अब नीचे सुखप्रीत, पीछे नीरज — मेरी बुर और गाँड़ दोनों एक ही समय में भरी।
“अब तू दोनों ले रही है,” नीरज ने कहा। “एक साथ।”
“हाँ,” मैं कराही। “ले रही हूँ।”
उसने ज़ोर लगाया और मेरी गाँड़ में अंदर तक आया। नीचे सुखप्रीत ने मेरी कमर पकड़ी और अपनी तरफ़ खींचा।
दोनों लंड मेरे अंदर एक दीवार के दोनों तरफ़ थे, और हर झटके पर वे एक-दूसरे को महसूस कर रहे थे। मेरी बुर और गाँड़ इतनी भरी थीं कि मुझे लगा मैं फट जाऊँगी — पर अच्छे से।
गणेश ने तब तक मेरी चूचियाँ सँभाल रखी थीं।
वह मेरे सामने बैठा और दोनों चूचियाँ एक-एक करके चूस रहा था, दूध पी रहा था, निपल्स को दाँतों से हल्के काट रहा था।
मैं उसके मुँह में अपनी चूची दे रही थी और वह पी रहा था, जैसे वह भी मेरा हो गया हो।
फिर सुखप्रीत ने मेरी कमर पकड़कर नीचे-ऊपर किया — और वह अपने पानी के पास पहुँचा।
उसने मेरी बुर में गर्मी उँडेल दी। और ठीक उसी वक़्त नीरज ने मेरी गाँड़ में अपना पानी भर दिया। दोनों जगह, एक साथ, दो गर्म धाराएँ।
मैं चीख पड़ी और उनके बीच काँपने लगी। मेरी आँखों से पानी आ गया। मेरा पूरा जिस्म तीन हाथों और दो लंडों के बीच एक गीली, गर्म, टूटी हुई चीज़ बन गया था।
फिर तीनों हटे। मैं बिस्तर पर पसर गई — पसीने, दूध, तेल और उनके पानी से लथपथ।
मेरी बुर से और मेरी गाँड़ से उनका पानी रिस रहा था। मेरी चूचियाँ अभी भी ऊपर-नीचे हो रही थीं। मैं हाँफ रही थी, जैसे दौड़कर आई हूँ।
“ये तो बहुत जल्दी हार गई,” सुखप्रीत ने हँसकर कहा।
“जल्दी?” मैंने कहा। “तुम तीनों ने मिलकर मुझे तोड़ दिया।”
“तोड़ा नहीं,” नीरज ने कहा, और वह मेरे पास आकर लेट गया। “खोला है।”
थोड़ी देर हम तीनों मेरे चारों तरफ़ लेटे रहे। कोई बोलता नहीं था।
सिर्फ़ साँसें और बाहर की हल्की हवा। गणेश मेरे बाल सहला रहा था, सुखप्रीत मेरी टाँग पर हाथ फिरा रहा था, और नीरज मेरा हाथ पकड़कर चूम रहा था।
यह वह पल था जब चुदाई रोमांस बन जाती है — जब जिस्म थक जाते हैं पर आत्मा अभी भी भूखी रहती है।
पर थकान सिर्फ़ मेरी थी। मर्द तो मर्द थे — पानी निकल गया था, पर लंड फिर खड़ा होने लगा था।
मैंने देखा — तीनों के लंड धीरे-धीरे उठ रहे थे, जैसे तीन पहाड़। और मेरी बुर ने फिर झुरझुरी ली।
“फिर?” मैंने पूछा।
“फिर,” नीरज ने कहा।
“अब क्या?” मैंने पूछा।
“अब गंदा खेल,” सुखप्रीत ने कहा, और उसकी मुस्कान में वह चालाकी लौट आई। “अब हम तुझे खड़ा करेंगे और तू दीवार से टिकेगी।”
वे तीनों उठे। गणेश ने मुझे उठाया और दीवार से टिका दिया — मेरा मुँह दीवार की तरफ़, मेरी गाँड़ बाहर।
सुखप्रीत मेरे पीछे आया और उसने मेरी गाँड़ पर हाथ रखा। नीरज मेरे सामने खड़ा होकर अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया।
गणेश मेरी बाईं तरफ़ खड़ा होकर मेरी चूची पकड़कर चूसने लगा।
सुखप्रीत ने मेरी गाँड़ में अपना लंड डाला — बिना तेल, क्योंकि अंदर अभी भी पहले का पानी और तेल था।
वह आसानी से घुस गया और उसने मेरी गाँड़ मारनी शुरू की। इस पोज़िशन में वह और गहरा जाता था, और मेरी चूचियाँ दीवार से रगड़ खा रही थीं।
नीरज मेरे मुँह में चोद रहा था और मेरी ठुड्डी पर उसका पानी लग रहा था।
“अच्छी राँड,” सुखप्रीत ने कहा, और उसने मेरी गाँड़ पर चपत लगाई। “कैसी राँड?”
“अच्छी राँड,” मैंने मुँह भरे हुए कहा।
“किसकी राँड?”
“तीनों की राँड,” मैंने कहा।
“और सबसे ज़्यादा किसकी?”
“नीरज की,” मैंने कहा, और नीरज ने ज़ोरदार झटका देकर मेरा मुँह भर दिया।
“सही जवाब,” उसने कहा।
फिर सुखप्रीत मेरी गाँड़ से हटा और नीचे झुककर उसने मेरी बुर में अपना लंड डाला।
गणेश पीछे आया और उसने मेरी गाँड़ पर अपना लंड रखा। उसका लंड मोटा था, इसलिए मेरी गाँड़ को थोड़ा ज़ोर लगा।
उसने तेल लगाया और धीरे-धीरे अंदर आया। और जब पूरा अंदर था, तो मुझे लगा मेरी गाँड़ फट जाएगी — पर फिर वह फैल गई, और अच्छी लगने लगी।
अब नीचे सुखप्रीत, पीछे गणेश, और मुँह में नीरज। तीनों एक साथ। दीवार से टिकी हुई मैं उनके बीच एक पुल बन गई थी।
वे तीनों एक लय में हिल रहे थे — धीरे-धीरे, गहरे-गहरे। और मैं बीच में कराह रही थी, चीख रही थी, और अपने दोनों हाथों से गणेश और नीरज की बाज़ुओं को पकड़े हुए थी।
गणेश ने मेरे कान में कहा, “साली, तेरी गाँड़ कमाल है। मोटा लंड भी पूरा ले रही है।”
“तेरी है,” मैंने कहा। “जब तक तू चोदे, तेरी है।”
“तो आज बहुत देर तक चोदूँगा।”
“चोद,” मैंने कहा। “आज जितना चोदना है चोद लो। तीनों।”
वे तेज़ हो गए। अब झटके ज़ोरदार थे और दीवार हिल रही थी।
मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों से रस बह रहा था और मेरी जाँघों पर फैल रहा था।
मेरी चूचियाँ दीवार पर पिचक रही थीं और दूध की बूँदें दीवार पर लग रही थीं।
मेरा पूरा जिस्म पसीने से भीग गया था। मेरे बाल मेरे चेहरे पर चिपक गए थे। और मैं ख़ुश थी — बहुत ख़ुश।
वे लगातार चोदते रहे — पोज़िशन बदलते, जगह बदलते, पर रुकते नहीं।
कभी मुझे घुटनों पर लाते, कभी चारों पर, कभी ऊपर बिठाते, कभी नीचे लिटाते।
कभी एक मेरी बुर में, कभी दूसरा मेरी गाँड़ में, कभी तीसरा मेरे मुँह में।
और बीच-बीच में कोई न कोई मेरी चूचियाँ चूसता रहता, दूध पीता रहता।
मेरे निपल्स इतने चूसे गए कि वे लाल और सूजे हुए लगने लगे — पर अच्छे से।
अब गणेश मेरी बुर में था और सुखप्रीत मेरी गाँड़ में। नीरज मेरे सिरहाने बैठा मेरे मुँह में अपना लंड दे रहा था।
गणेश के हर झटके पर मेरी चूचियाँ हिलती थीं और उसकी छाती से टकराती थीं।
सुखप्रीत पीछे से मेरी गाँड़ में गहरा जाता और मेरी कमर दबाता। और नीरज मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर नीचे-ऊपर कर रहा था।
“अब सब एक साथ निकालेंगे,” नीरज ने कहा। “तीनों, इसी पर।”
“हाँ,” गणेश ने कहा। “इसी राँड पर।”
“कहाँ?” सुखप्रीत ने पूछा।
“जहाँ है वहीं,” नीरज ने कहा। “बुर में, गाँड़ में, और मुँह में।”
उन्होंने गति बढ़ाई। तीनों की साँसें तेज़ हो गईं। तीनों के झटके एक लय में आ गए।
मेरा पूरा जिस्म उनके बीच काँप रहा था। और फिर एक साथ — जैसे किसी ने इशारा किया हो — तीनों ने अपना पानी छोड़ दिया।
गणेश ने मेरी बुर में भर दिया — गर्म, मोटी धारा। सुखप्रीत ने मेरी गाँड़ में भर दिया — लंबी, गहरी धारा।
और नीरज ने मेरे मुँह में भर दिया — और मैंने पूरा निगल लिया। तीनों जगह, एक साथ, तीनों मर्द।
मैं चीख पड़ी — पर मुँह भरा होने से आवाज़ दबी रही। मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों ने एक साथ कस लिया, और मेरी अपनी चुदाई भी साथ आ गई — तीसरी बार, और सबसे लंबी।
वे तीनों झटके देते रहे जब तक आख़िरी बूँद न निकली। फिर एक-एक करके बाहर आए।
गणेश पहले, सुखप्रीत दूसरा, नीरज आख़िर में। उनका पानी मेरी जाँघों से बहकर चादर पर गिरा।
मेरी बुर और मेरी गाँड़ अभी भी खुली और भरी हुई महसूस हो रही थीं। मैं बिस्तर पर पसर गई और आँखें बंद कर लीं।
तीनों मेरे चारों तरफ़ लेट गए। कोई बोला नहीं। गणेश ने मेरा एक हाथ पकड़ा।
सुखप्रीत ने मेरी टाँग पर हाथ रखा। नीरज मेरे सिर के पास आया और उसने मेरे बाल सहलाए। और फिर उसने मेरे माथे पर चूमा।
“सिमरन,” उसने कहा।
“हाँ,” मैंने आँखें बंद रखते हुए कहा।
“आज तूने कमाल किया।”
“तुम तीनों ने किया,” मैंने कहा।
“नहीं,” उसने कहा। “तूने हमें बनाया। तूने हमें अपने अंदर जगह दी।”
मैंने आँखें खोलीं और उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही गर्मी थी जो पहली रात थी — पर अब उसमें कुछ और भी था। प्यार। और मालिकाना। दोनों।
“कल भी?” मैंने पूछा।
“कल भी,” उसने कहा। “और परसों भी।”
गणेश हँसा। “और हम?”
“तुम दोनों भी,” नीरज ने कहा। “जब तक ये राज़ी हो।”
मैंने तीनों को देखा — तीन मर्द, तीन लंड, तीन भूख। और मेरे अंदर एक बुर और एक गाँड़, जो अब किसी एक की नहीं थीं।
वे तीनों की थीं। पर सबसे ज़्यादा — नीरज की। क्योंकि नीरज पहला था, और पहला कभी भूलता नहीं।
“राज़ी हूँ,” मैंने कहा। “तीनों के लिए।”
देर रात तीनों चले गए। सुखप्रीत ने जाते वक़्त मेरा हाथ चूमा और कहा, “दीदी, अगली बार तेल ज़्यादा रखिएगा।”
गणेश ने मेरे माथे को चूमा और बोला, “आप कमाल हैं, बस।”
और नीरज आख़िर में रुका — वह अकेला बैठा रहा जब तक दोनों गए, फिर उसने दरवाज़ा बंद किया और मेरे पास आया।
“अब?” मैंने पूछा।
“अब बस,” उसने कहा। “अब सिर्फ़ तू और मैं।”
उसने मुझे गोद में उठाया और बाथरूम ले गया। गर्म पानी चलाया और मुझे अंदर खड़ा किया।
फिर वह भी अंदर आया और उसने मेरे पूरे जिस्म को साबुन से धोया — मेरे कंधे, मेरी चूचियाँ, मेरा पेट, मेरी कमर, मेरी बुर, मेरी गाँड़, मेरी टाँगें।
धीरे-धीरे, प्यार से, जैसे कोई पूजा कर रहा हो। उसने मेरे निपल्स पर हल्के से साबुन लगाया और दूध की बूँद निकली, जो पानी में घुल गई।
“आज बहुत पी लिया तुम्हारा दूध,” उसने कहा।
“तीनों ने पिया,” मैंने कहा।
“और तूने दिया।”
“तुम्हारे लिए दिया,” मैंने कहा। “वे तुम्हारे दोस्त हैं। तुम्हारी चीज़ पर उनका हक़ था।”
उसने मुझे पानी में चूमा। लंबा, गीला, गहरा चुम्बन।
फिर हम बाहर आए, तौलिये से पोंछा, और बिस्तर पर आ गए — साफ़ चादर पर, साफ़ जिस्म, पर वही गर्मी।
“सो जा,” उसने कहा, और मुझे अपनी बाज़ू में ले लिया।
“नीरज,” मैंने कहा।
“हाँ।”
“मैं तुम्हारी राँड हूँ?”
“हाँ,” उसने कहा। “पर राँड होकर भी मेरी रानी है।”
मैं उसकी छाती पर सिर रखकर सो गई।
मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों अभी भी भरी-भरी सी महसूस हो रही थीं, और मेरे निपल्स अभी भी उसके चूसने की गर्मी बता रहे थे।
और मेरे अंदर, तीनों की यादें एक साथ थीं — पर सबसे ऊपर नीरज था।
रोहन अगले दिन आया। उसने मुझे देखा और कहा, “तुम तो चमक रही हो।”
“क्यों न चमकूँ,” मैं मुस्कुराई। “अच्छी नींद आई थी।”
और यह सच था। बहुत अच्छी नींद आई थी।
अगले भाग में पढ़िए, गणेश और सुखप्रीत अकेले-अकेले। दो नए खेल, दो नई जगहें। और नीरज का एक और दोस्त — जो अपनी पत्नी को भी लाएगा। यानी दो औरतें, चार मर्द, और एक रात जिसमें बुर, गाँड़, चूचियाँ, और दूध सब एक साथ होंगे।
NEXT PART:
- मेट्रो में जाते हुए एक लड़की को पटाया और पेला
- ट्रेन में दो लड़कों ने मिलकर मेरी सैंडविच चुदाई की
- मैं अपने खुबसूरत छिनाल मकान मालकिन को चोद दिया
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