पंडित जी ने चोदा मेरी विधवा माँ को और मुझे

vidhwa maa ki chudai sex story

26 साल की निर्मला अपनी विधवा माँ सुनीता को एक धार्मिक गुरु मोहन के साथ संबंध बनाते हुए देखती है, जो उनकी शादी के लिए मदद करने के बहाने उनका फायदा उठा रहा है।

नमस्ते दोस्तों, यह कहानी मेरी माँ की है, सुनीता नाम है उनका। उम्र 36-38 की होगी। विधवा 10 साल से।

मेरे पापा बिजली विभाग में काम करते थे, करंट लगने से मर गए थे।

तो माँ पढ़ी-लिखी नहीं थी तो उनकी आधी पेंशन आती थी, ऊपर से हमारा गुजारा हो जाता।

अब मेरी ग्रेजुएशन पूरी होके 3 साल हो गए थे।

मैं पापा की जगह उधर काम पर लग गई थी।

मुझे काम करके 3 साल हो गए थे। मेरा नाम निर्मला है। मेरी 26 की हो गई थी।

मेरे पापा ने माँ को जब 18 साल की थी तब भगा कर ले आए थे और शादी की थी। तो हम दोनों के परिवारों ने ठुकरा दिया था।

आधी पेंशन पर कैसे मेरा बचपन जवानी निकल गई। लेकिन अब मेरी उम्र निकलती जा रही थी। माँ को मेरी शादी की चिंता हो रही थी।

और हम घर जमाई की तलाश में थे। क्योंकि मेरे अलावा माँ का कोई नहीं था।

वैसे तो माँ दिखने में एकदम मस्त थी। कामसिन लड़कियों को मात दे दे।

लेकिन 10 साल से विधवा होने के कारण उनकी हवस मर गई थी।

और शुरू-शुरू में हर कोई माँ पर लाइन मारता था। लेकिन तब माँ ने किसी को घास नहीं डाली।

और मैं भी माँ पर ही गई थी। लेकिन माँ के मम्मे मेरे से बड़े थे।

और मेरी गांड भी माँ से कम थी। मैंने आज तक कभी खुद की बुर को छुआ भी नहीं था।

लेकिन मुझे नहीं पता था ऐसा भी होगा। मेरी माँ बहुत धार्मिक थी।

पिछले 10 सालों से एक गुरु जो मेरे पापा का श्राद्ध करवाता था, बस वही एक आदमी हमारे घर आता-जाता था।

और हमें भी वो फैमिली जैसा था।

तो मेरी माँ अब उनके पीछे लग गई थी मेरी शादी के लिए। बचपन से ही गुरु जी मुझ पर चांस मारा करते थे।

वो मुझे अपनी गोद में बिठाकर अपने टाइट लंड पर मेरी नन्ही बुर घिसवाते।

कभी मेरे गालों को चूमने के बहाने मेरे ओठ चूस लेते। मुझे टाइट हग करते।

लेकिन मैं ड्रामा न हो इसलिए किसी को नहीं बताती और वैसे भी उनका आना-जाना कम रहता था।

मेरी माँ उसे अब सब बता दिया करती थी।

वो हर रोज कोई न कोई लड़का लाते लेकिन कोई घरजमाई बनने के लिए तैयार नहीं था।

माँ हर वक्त परेशान रहती। और माँ को अब कुछ इज्जत का पड़ा नहीं था।

तो उसका पल्लू गिर जाता साड़ी का तो वो वैसे ही बैठ जाती, एक तो वो अंदर कुछ नहीं पहनती तो उसके निप्पल का काला साइड दिख जाता।

और माँ आंगन में पैर फैलाकर बैठी तो गुरु जानबूझकर सीढ़ी पर बैठकर माँ की बुर देखता।

मैं ज्यादा घर पर नहीं रहती। लेकिन जब भी आती तो गुरु घर पर माँ से बातें करते दिखता।

एक दिन मैं घर पर आई। और आंगन में देखा कोई नहीं था

और मेरे अंदर के कपड़े बाहर सुखाने को डाले थे मैं उन्हें लेने गई। घर के पीछे की तरफ तो मुझे माँ की आवाज आई।

वो लोग बातें कर रहे थे। गुरु माँ को भड़का रहा था, बेटी को घर पर बैठा, उसका कोई यार होगा काम पर इसलिए रिश्ते नहीं आ रहे।

ऐसी बातें होते-होते माँ की आवाज सिसकियों में बदल गई।

मैंने थोड़ा सा झांक के देखा तो गुरु ने माँ की साड़ी जांघों से ऊपर की थी और बुर में उंगली कर रहा था।

माँ क्या करती, 10 साल से जिसकी बुर को किसी ने छुआ नहीं था।

गुरु ने माँ को अपनी ओर खींचा और ओठ पर ओठ रखकर चूसना शुरू किया।

और एक हाथ से मम्मे दबाने लगा। माँ कराह रही थी लेकिन आवाज मुंह में दब जाती।

उसने माँ का ब्लाउज खोला और मम्मों को चूसने लगा।

माँ उसका सिर पकड़कर अंदर धंसा रही थी। फिर उसने धोती उतारी और लंड माँ के हाथ में थमा दिया।

माँ ने बिना देर किए झुककर चूसना शुरू किया।

गुरु के चेहरे पर जो स्माइल थी, देखकर पता चल रहा था कि स्वर्ग की सैर कर रहा है।

गुरु ने माँ का सिर उठाया और माँ को सुलाकर पैर फैलाए और धक्के मारने शुरू किए।

माँ भी मजे ले रही थी वो बीच-बीच में गुरु के सिर को पकड़कर मम्मे चुसा रही थी।

गुरु बोला, देख सुनीता अब से मैं तेरा पति हूं समझी क्या। अब से मैं हर रोज तुझे चोदूंगा।

मम्मी भी बोलने लगी जी गुरु जी। बस एक बार निर्मला की शादी करा दो।

गुरु बोला, तू उसकी फिक्र करना छोड़, अब मैं आ गया हूं ना। अब से मैं यहीं रहूंगा, तू मेरी सेवा करेगी।

अब गुरु ने माँ को डॉगी स्टाइल में खड़ा किया और पीछे से चोदने लगे।

सारे लड़के तेरी लड़की को चोदना चाहते हैं। लेकिन शादी नहीं करना चाहते मैं क्या करूं इसमें।

वो भी तेरे जैसे माल है। उसकी उम्र भी इतनी हो गई है। लड़कों को शक होता है…

उसने आगे बोला, इतना मस्त शरीर बिना शादी के कैसे आया।

मैं क्या करूं इसमें, जरूर उसके ऑफिस में कोई आशिक होगा।

जिससे वो चुदवाती है। गुरु के हाथ माँ की कमर पर थे।

माँ ने वो लेके मम्मों पर रखे और बोली। पता नहीं साली रंडी बताती नहीं कुछ।

मुझे उसकी शादी की फिक्र है। प्यार है या किसी की रखैल है क्या पता।

एक बार उसके हाथ पीले कर दूं फिर मेरी जान छूटेगी। उसको मेरे जैसे जिंदा लाश नहीं बनाऊंगी…

वो बोली रही, उसका पति उसे चोदे या पूरे गांव से चुदवाए मुझे कुछ नहीं। बस अमीर खानदान में जाए।

गुरु जी आप इतना काम करा दो आपकी दासी बन जाऊंगी। हर रोज सेवा करूंगी।

गुरु बोलने लगा तेरी बेटी है तो माल लेकिन तेरे जैसा मजा नहीं है सुनीता।

मुझे अगर उसकी बुर एक बार मिल जाती तो फिर उसकी शादी को लग जाता।

तेरी बेटी को चेक करना पड़ेगा। कैसा मजा देती है, उस हिसाब से आदमी ढूंढूंगा।

मेरी माँ अचानक खड़ी हो गई। मुझे लगा वो उसे थप्पड़ मारेगी लेकिन उसने गुरु को चटाई पर सुलाया

और खुद उसके ऊपर चढ़ गई और लंड को बुर में डाल के ऊपर-नीचे करने लगी।

देख अगर वो चुदाकड़ होगी तो तू बेशक उसे चोद लेना गुरु जी।

मुझे कोई हर्ज नहीं, लेकिन अगर वो सीधी होगी तो उसका ख्याल भी मत ला दिमाग में।

मैं हूं ना तेरे लंड की खुजली मिटाने के लिए। अब वो बड़ी हो गई है।

उसको अपने भविष्य के फैसले खुद लेने चाहिए। मैं उसको रोकती नहीं हूं किसी बात पर।

यह नजारा देखकर और बातें सुनकर मैं अंदर से पूरी हिल गई थी।

अब दोनों शांत पड़े थे एक-दूसरे के ऊपर शायद झड़ गए थे दोनों।

मैं सोच ही रही थी कि मेरा हाथ अचानक मेरे कुर्ते के अंदर मेरी बुर के पास गया।

मुझे कुछ गीला महसूस हुआ और मैं बुर पर हाथ फेरने लगी।

जैसे ही मेरा हाथ दाने पर गया तो मेरी आंखों में बिजली दौड़ गई। मैंने आस-पास देखा।

कपड़े लिए और घर में गई देखा तो माँ ने कमरे को लॉक किया था। तो मैंने आवाज लगाई और बाथरूम में गई फ्रेश होने।

मैं बाथरूम में अपने कपड़े उतारने लगी। मेरे हाथ कांप रहे थे।

मैंने आईने में देखा तो मेरे चेहरे पर लाली थी। मेरी सांसें तेज चल रही थीं।

मैंने सोचा कि माँ क्या कर रही हैं। वो तो धार्मिक थीं, पूजा-पाठ करती थीं। और आज वो एक गुरु के साथ…

मैंने खुद को नंगा किया और शावर चालू किया। ठंडा पानी मेरे शरीर पर गिर रहा था लेकिन मेरा शरीर गर्म था।

मैंने अपने हाथों से अपने स्तनों को छुआ। वो माँ से छोटे थे लेकिन काफी बड़े थे।

मैंने नीचे देखा। मेरी बुर से पानी गिर रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि यह शावर का पानी है या मेरी बुर का।

मैंने अपनी उंगली अपनी बुर में डाली। पहली बार मैंने ऐसा किया था। मुझे अजीब सा लगा। लेकिन फिर मजा आने लगा।

मैं सोच रही थी कि गुरु का लंड कैसा होगा। माँ उसे चूस रही थीं। मुझे भी चूसना चाहिए था। यह सोचकर मैं शरमा गई।

मैंने जल्दी से नहाया और कपड़े पहने। बाहर आई तो देखा माँ और गुरु बैठे बातें कर रहे थे।

दोनों के चेहरे पर संतुष्टि की मुस्कान थी। माँ ने मुझे देखा और बोली, “निर्मला, आ गई बेटा?”

मैंने कहा, “हां माँ।” गुरु ने मुझे घूरकर देखा। उसकी नजरें मेरे स्तनों पर टिकी थीं।

मैंने नोटिस किया लेकिन कुछ नहीं कहा। मैं अपने कमरे में चली गई।

रात को मैं सो नहीं पा रही थी। मेरे कानों में माँ की सिसकियां गूंज रही थीं।

माँ कह रही थीं, “और जोर से गुरु जी…” मैंने अपने हाथ फिर से अपनी बुर पर रखे। वो गीली हो चुकी थी।

मैंने अपनी उंगली फिर से अंदर डाली। इस बार और गहरा। मैं आहें भरने लगी।

“ओह्ह्ह… आह्ह्ह…” मैंने सोचा कि काश गुरु का लंड मेरी बुर में होता। वो मुझे भी वैसे ही चोदते जैसे माँ को चोद रहे थे।

मैं उंगली अंदर-बाहर करने लगी। मेरी सांसें तेज हो गईं।

मैंने अपने दूसरे हाथ से अपने स्तन दबाने शुरू किए। मेरे निप्पल कड़े हो गए थे। मैंने उन्हें मसला। मजा आ रहा था।

मैंने सोचा कि माँ कितनी भाग्यशाली हैं। उन्हें गुरु का लंड मिल रहा है।

और मैं यहां अकेली उंगली से काम चला रही हूं। मैंने अपनी उंगली और तेजी से अंदर-बाहर की। पच पच की आवाजें आने लगीं।

मैंने अपने पैर फैला दिए। और जोर-जोर से उंगली करने लगी। मेरा पूरा शरीर कांप रहा था। मैं झड़ने वाली थी।

और फिर मैं झड़ गई। मेरी बुर से पानी निकल गया। मैंने अपने होंठ काटे ताकि आवाज न बाहर निकले।

मैं थककर लेट गई। लेकिन मन नहीं भरा था। मुझे असली लंड चाहिए था। गुरु का लंड।

मैंने सोचा कि कल से मैं भी माँ के साथ गुरु से अपनी बुर चुदवाऊंगी।

अगले दिन सुबह मैं जल्दी उठ गई। माँ नहाने गई थीं। मैंने आंगन में देखा तो गुरु वहां चाय पी रहे थे।

उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराए। मैंने भी मुस्कुराया और उनके पास जाकर बैठ गई।

“निर्मला बेटा, कैसी हो?” गुरु ने पूछा।

“मैं ठीक हूं गुरु जी,” मैंने कहा।

गुरु ने मेरे पैर छुए। मैंने हल्का सा पैर हटाया लेकिन फिर वहीं रख दिया। उन्होंने मेरे पैरों को दबाना शुरू किया।

“बेटा, तुम्हारी शादी की चिंता है तुम्हारी माँ को,” गुरु बोले।

“पता है गुरु जी,” मैंने कहा।

“कोई अच्छा लड़का मिल जाए तो बात बन जाए,” वो बोले और मेरे पैरों को दबाते हुए ऊपर की तरफ बढ़े।

मेरी साड़ी के पल्लू से मेरे पैर ढके हुए थे। वो पल्लू हटाकर मेरे नंगे पैरों को दबाने लगे।

फिर धीरे-धीरे मेरी जांघों की तरफ बढ़े। मैंने कुछ नहीं कहा। वो समझ गए कि मैं राजी हूं।

मेरी जांघों को दबाते-दबाते वो मेरी साड़ी के अंदर हाथ डालने लगे। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं।

उनका हाथ मेरी बुर के पास पहुंच गया। उन्होंने मेरी बुर को सहलाया। मैं सिहर उठी।

“ओह्ह्ह गुरु जी…” मैंने हल्की सी आवाज निकाली। वो उठे और मुझे अपनी बाहों में भर लिया।

उनका लंड मेरी जांघ पर टिका हुआ था। वो मेरे ओठों पर चूमने लगे। मैंने भी उनका साथ दिया।

हम दोनों एक-दूसरे को चूमने लगे। उनकी जीभ मेरे मुंह में घुसी। मैंने भी अपनी जीभ उनकी जीभ से खेली।

वो मेरे स्तनों को दबाने लगे। मैंने अपनी साड़ी खोल दी।

अब मैं सिर्फ ब्लाउज और पैंटी में थी। गुरु ने मेरा ब्लाउज खोला। मेरे स्तन बाहर आ गए।

उन्होंने एक स्तन को मुंह में लेकर चूसना शुरू किया। “ओह्ह्ह… आह्ह्ह…” मैं आहें भरने लगी।

वो दूसरे स्तन को भी चूसने लगे। मेरे निप्पल कड़े हो गए थे। उन्होंने उन्हें काटा।

मुझे दर्द और मजा दोनों हुआ। फिर वो नीचे गए और मेरी पैंटी खोल दी।

मेरी बुर उनके सामने थी। उन्होंने कहा, “क्या सुंदर बुर है निर्मला। तेरी माँ से भी सुंदर।” मैं शरमा गई।

उन्होंने अपनी जीभ मेरी बुर पर लगाई और चाटने लगे।

“ओह्ह्ह… गुरु जी… बहुत मजा आ रहा है…” मैं कहने लगी।

वो मेरी बुर को जोर-जोर से चाट रहे थे। मेरी बुर से पानी निकलने लगा था। उन्होंने सब चाट लिया।

फिर वो खड़े हुए और अपने कपड़े उतारने लगे। उनका लंड बाहर आया।

वो 9 इंच लंबा और मोटा था। मैंने पहली बार इतना बड़ा लंड देखा था। माँ सही कहती थीं।

“चूसो इसे,” गुरु ने कहा। मैं झुक गई और उनके लंड को हाथ में लिया। वो गर्म था। मैंने उसे मुंह में लिया और चूसने लगी।

“ओह्ह्ह… बहुत अच्छा कर रही हो…” वो कहने लगे। मैं उनके लंड को गहरे तक अपने मुंह में ले रही थी। वो मेरे सिर को पकड़कर अपने लंड पर दबा रहे थे।

कुछ देर बाद उन्होंने मुझे खड़ा किया और अपने लंड को मेरी बुर के मुहाने पर रखा।

“तैयार हो?” उन्होंने पूछा। मैंने हामे में सिर हिलाया।

उन्होंने धीरे से धक्का मारा। उनका लंड का मुंडा अंदर घुस गया। मुझे दर्द हुआ।

“ओह्ह्ह… धीरे गुरु जी…” मैंने कहा। वो धीरे-धीरे अंदर डालने लगे।

आधा लंड अंदर चला गया। मेरी बुर फटने लगी थी।

लेकिन फिर मजा आने लगा। वो धक्के मारने लगे। “और जोर से…” मैंने कहा।

वो तेजी से धक्के मारने लगे। पच पच की आवाजें आने लगीं।

मैं बहुत उत्तेजित हो गई थी। माँ भी बाहर आई और हमें देखने लगीं। वो मुस्कुरा रही थीं।

“मजा आ रहा है बेटी?” माँ ने पूछा।

“हां माँ… बहुत मजा आ रहा है…” मैंने कहा। गुरु मुझे और तेजी से चोदने लगे।

माँ भी आई और मेरे स्तनों को दबाने लगीं।

हम तीनों मजे ले रहे थे। गुरु ने माँ को भी पास बुलाया और उनकी बुर में भी उंगली करने लगे।

मैं और माँ दोनों एक साथ चुद रही थीं।

लगभग 30 मिनट तक गुरु मुझे चोदते रहे।

फिर उन्होंने अपना वीर्य मेरी बुर में ही छोड़ दिया।

मैं भी झड़ गई। थककर हम तीनों एक-दूसरे से लिपटकर लेट गए।

यह थी मेरी कहानी।

आशा करती हूं आपको पसंद आई होगी।

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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