सरपंच जी से चूत चुदवाकर कर्ज चुकाई

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एक गाँव की महिला अपने पति के कर्ज के बोझ तले दबी होती है। जब वसूली के लिए सरपंच जी आते हैं, तो वह अपनी चूत देकर कर्ज चुकाने का प्रस्ताव रखती है। धीरे-धीरे यह रिश्ता गहरा होता है और वह सरपंच जी की रखैल बन जाती है।

नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम कविता है। मैं आज आपको अपनी जीवन की एक ऐसी कहानी सुनाने जा रही हूं जिसने मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल दी।

यह कहानी शर्मिंदगी और गुप्त इच्छाओं से भरी है, लेकिन यह मेरी सच्चाई है।

मेरा फिगर 36-28-38 है। मेरी उम्र 26 साल है। मेरा रंग गोरा है जिसमें हल्की सुनहरी चमक है जो धूप में और भी निखर जाती है।

मेरे परिवार में मेरे पति रामू और एक छोटी सी बेटी है। हम तीनों एक छोटे से मकान में रहते हैं राजस्थान के एक साधारण गाँव में।

मेरे पति रामू एक मजदूर हैं। वो खेतों में काम करते हैं। हमारी हालत बहुत खराब है।

कभी-कभी दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है।

दो साल पहले मेरी सास की बीमारी के इलाज के लिए हमें सरपंच जी से 2 लाख रुपये का कर्ज लेना पड़ा था।

वो कर्ज अब 3 लाख हो चुका है। ब्याज पर ब्याज चढ़ता जा रहा है। हम इतने पैसे कहाँ से लाएं? रामू की महीने की कमाई 8-10 हजार रुपये है। उसमें घर का खर्चा भी मुश्किल से चलता है।

आज फिर सरपंच जी के आदमी आए थे। धमकी देकर गए। “अगले हफ्ते तक पैसे नहीं दिए तो खेत जब्त कर लेंगे। और मकान भी।”

रामू रात भर रोते रहे। मैं भी सोचती रही। क्या करें? कहाँ से लाएं इतने पैसे?

अगले दिन मैंने रामू से कहा, “मैं सरपंच जी से बात करके आती हूं। शायद कुछ रास्ता निकल आए।”

रामू ने मना किया लेकिन मैं जिद पर अड़ी रही। सुबह-सुबह नहा-धोकर तैयार हुई। एक साधारण साड़ी पहनी।

बालों में तेल लगाया। चेहरे पर हल्का सा मेकअप। देखने में मैं अभी भी जवान और खूबसूरत लगती हूं।

गाँव में मुझे सबसे सुंदर औरत माना जाता है।

सरपंच जी का बंगला गाँव के बाहर है। बड़ी-बड़ी दीवारें। लोहे का गेट। अंदर बगीचा। मैंने घंटी बजाई। नौकर ने दरवाजा खोला।

“कौन हो?” उसने पूछा।

“मैं कविता हूं। रामू की पत्नी। सरपंच जी से मिलना है।”

नौकर अंदर गया। फिर आकर बोला, “आओ।”

मैं अंदर गई। बड़ा सा हॉल। सोफे पर एक आदमी बैठा था। करीब 50 साल का। मोटा-ताजा शरीर। सफेद बाल। दाढ़ी। आंखों में एक अलग चमक।

यह थे ठाकुर रघुवीर सिंह, हमारे गाँव के सरपंच।

“आओ बैठो,” उन्होंने कहा।

मैं सामने की कुर्सी पर बैठी। पैर सिकुड़ गए। दिल तेज़ी से धड़क रहा था।

“क्या बात है? कर्ज लेकर आए हो?” उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा।

“जी… वो… हमारी हालत आप जानते ही हैं। थोड़ा और वक्त चाहिए था,” मैंने कहा।

“वक्त? दो साल हो गए। ब्याज पर ब्याज चढ़ गया। अब तो 3 लाख हो चुके हैं। तुम लोग कब चुकाओगे?” उनकी आवाज सख्त थी।

“जी… हम गरीब आदमी हैं। इतने पैसे कहाँ से लाएं?” मेरी आंखों में आंसू आ गए।

सरपंच जी ने मुझे घूरकर देखा। उनकी आंखें मेरे चेहरे से लेकर पैरों तक गईं।

मेरी साड़ी के पल्लू से मेरी चूचियां ढंपी हुई थीं लेकिन आकार साफ दिख रहा था।

“तुम्हारे पास एक औरत के पास और क्या संपत्ति हो सकती है?” उन्होंने धीरे से कहा।

मैं समझ गई। उनकी नीयत मुझे देखकर खराब हो चुकी थी।

मेरे मन में एक विचार आया। क्यों ना मैं ही उन्हें खुश कर दूं? अपनी चूत देकर कर्ज माफ करवा लूं?

“जी… मैं समझ रही हूं… आप जो चाहें… मैं तैयार हूं…” मैंने शर्माते हुए कहा।

“क्या?” उन्होंने नाटकीय ढंग से पूछा।

“मैं… मैं आपकी सेवा करूंगी… बस कर्ज माफ कर दीजिए…” मेरी आवाज कांप रही थी।

सरपंच जी मुस्कुराए।

उन्होंने नौकर को बुलाया। “जा, दरवाजा बंद कर दे। कोई आए तो रोक देना।”

नौकर चला गया। अब हम अकेले थे।

“खड़ी हो जाओ। घूमकर दिखाओ,” उन्होंने आदेश दिया।

मैं खड़ी हुई। धीरे-धीरे घूमी। उनकी आंखें मेरे हर अंग को नोच रही थीं।

“पल्लू हटाओ,” उन्होंने कहा।

मैंने हिचकिचाते हुए अपना पल्लू हटाया।

मेरी चूचियां ब्लाउज में उभरी हुई थीं। गोल-गोल। तनी हुईं।

“बहुत सुंदर हो तुम,” उन्होंने कहा। “आओ पास।”

मैं उनके पास गई। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी चूची पर रख दिया। उंगलियों से दबाने लगे।

“आह्ह्ह…” मेरे मुंह से सिसकारी निकल गई।

“कितनी नरम है… कितनी गोल है…” वो बड़बड़ा रहे थे।

उन्होंने मुझे अपनी गोद में खींच लिया। मैं उनके ऊपर बैठ गई।

उनका हाथ अब मेरी जांघ पर था। साड़ी के अंदर घुस रहा था।

“तुम्हें पता है मैं तुम्हें कब से चाहता था?” उन्होंने कहा। “जब से तुम इस गाँव में आई हो। मेरी नजर तुम पर थी।”

“जी…” मैंने कहा।

“आज तुम मेरी हो जाओगी। पूरी तरह। और मैं तुम्हारा कर्ज माफ कर दूंगा। सिर्फ तुम्हारा नहीं, रामू का भी। और उसे अच्छी नौकरी भी दिलवाऊंगा,” उन्होंने वादा किया।

“जी… मैं तैयार हूं…” मैंने कहा।

उन्होंने मुझे खड़ा किया। फिर खुद खड़े हुए।

मेरे पीछे आ गए। मेरी कमर पर हाथ रखा। फिर धीरे-धीरे मेरी साड़ी खोलने लगे।

पल्लू खुला। फिर पेटीकोट की नाड़ी खोली। साड़ी नीचे गिर गई।

मैं सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में रह गई। उन्होंने मेरा ब्लाउज पीछे से खोला। हुक खुला।

फिर आगे से बटन खोले। ब्लाउज उतार दिया। अब मैं ब्रा और पेटीकोट में थी।

उन्होंने मेरी ब्रा भी उतार दी। मेरी चूचियां आजाद हो गईं। गोल-गोल। गुलाबी निप्पल।

वो पीछे से मेरी चूचियों को पकड़कर दबाने लगे।

“आह्ह्ह… धीरे…” मैंने कहा।

“डरो मत… मजा आएगा,” उन्होंने कहा।

उनका एक हाथ नीचे गया। पेटीकोट के अंदर घुसा। मेरी चूत पर रखा। उंगली से सहलाने लगा।

“ओह्ह्ह… गीली हो गई हो…” उन्होंने कहा।

मैं शर्म से लाल हो गई। सच में मैं गीली हो चुकी थी। उनके स्पर्श से मेरे शरीर में आग लग गई थी।

उन्होंने मुझे बेडरूम में ले जाया। बड़ा सा बेड। गद्दे वाला। मुझे बेड पर लिटाया। फिर खुद मेरे ऊपर आ गए।

“आज तुम्हें अच्छे से चोदूंगा। तुम्हारी चूत का भोसड़ा बना दूंगा,” उन्होंने कहा।

“जी… जैसी आपकी मर्जी…” मैंने कहा।

उन्होंने मेरे पेटीकोट को नीचे खींचा। मैं पूरी नंगी हो गई। फिर उन्होंने अपने कपड़े उतारे।

उनका शरीर मोटा था। पेट निकला हुआ। लेकिन लंड… ओह… 7-8 इंच का। मोटा। काला। नसें फूली हुईं।

“देखो मेरा लंड… यह तुम्हारी चूत में जाएगा,” उन्होंने कहा।

मैंने हां में सिर हिलाया। वो मेरे पैर फैलाने लगे। फिर अपना लंड मेरी चूत पर रगड़ने लगे।

“वैसे तुम्हारे पति का कितना बड़ा है?” उन्होंने पूछा।

“जी… छोटा सा है… 4-5 इंच का…” मैंने शर्माते हुए कहा।

“तो आज असली मजा आएगा,” कहते हुए उन्होंने एक धक्का दिया।

लंड का सिरा अंदर घुसा। मेरी चूत फैली। दर्द हुआ लेकिन मजा भी आया।

“आह्ह्ह… धीरे सरपंच जी…” मैंने कहा।

“बुलावे में मजा आ रहा है,” वो हंसे। फिर एक और जोरदार धक्का दिया।

पूरा लंड अंदर घुस गया। मेरी चूत भर गई। वो रुके नहीं। धक्के लगाने शुरू कर दिए।

“फच्च… फच्च… फच्च…” की आवाजें आने लगीं।

मैं सिसकारियां लेने लगी। आह्ह्ह… ओह्ह्ह… हाय्य्य…

“कैसा लग रहा है?” उन्होंने पूछा।

“अच्छा… बहुत अच्छा…” मैंने कहा।

“तुम्हारे पति से बेहतर ना?” वो पूछ रहे थे।

“हां… बहुत बेहतर…” मैंने कहा।

वो और तेजी से चोदने लगे। मेरी चूचियां हिल रही थीं।

उन्होंने एक हाथ से चूची पकड़ी और दबाने लगे। निप्पल को मसलने लगे।

“आह्ह्ह… और जोर से…” मैं खुद बोलने लगी।

“देखो कैसे मजे ले रही हो… तुम्हें तो यह चाहिए था…” वो हंस रहे थे।

मैं शर्मा गई। लेकिन सच था। मुझे यह बहुत पसंद आ रहा था।

उनका मोटा लंड मेरी चूत को भर रहा था। हर धक्के पर मजा आ रहा था।

“आज के बाद तुम मेरी रखैल बनोगी। जब मन चाहेगा तुम्हें चोदूंगा। और तुम्हारा कर्ज भी माफ हो जाएगा,” उन्होंने कहा।

“हां… मैं आपकी हूं…” मैंने कहा।

वो झड़ने वाले थे। उन्होंने गति तेज की। फिर अपना लंड अंदर ही रखा और झड़ गए। गर्म वीर्य मेरी चूत में भर गया।

“आह्ह्ह…” मैंने भी झड़ने का नाटक किया।

वो मेरे ऊपर ही लेट गए। कुछ देर बाद उठे। मुझे किस किया।

फिर कहा, “आज से तुम मेरी हो। कल से रामू मेरी फैक्ट्री में काम करेगा। 15 हजार महीना मिलेगा। और कर्ज भी माफ।”

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। कपड़े पहने। घर आई। रामू को सब बताया।

उसने पहले तो गुस्सा किया फिर मान गया। क्योंकि उसके पास और कोई रास्ता नहीं था।

अगले दिन से रामू सरपंच जी की फैक्ट्री में काम करने लगा।

और मैं… मैं सरपंच जी की रखैल बन गई। वो हफ्ते में 3-4 बार मुझे बुलाते।

कभी उनके बंगले पर, कभी खेतों में, कभी फैक्ट्री के ऑफिस में।

मेरी चूत उनके लंड की आदी हो गई।

रामू से तो अब मजा ही नहीं आता था।

मैं खुद सरपंच जी के पास जाती। उनसे चुदवाती। मेरा कर्ज तो माफ हो ही गया, साथ में हमारी जिंदगी भी बदल गई।

आज भी मैं सरपंच जी की रखैल हूं। और खुश हूं।

क्योंकि उन्होंने मेरी जिंदगी बचा ली।

चूत देकर कर्ज चुकाया, लेकिन मजा भी बहुत आया।

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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