dada poti chudai story
वीरेंद्र सिंह राठौर की उम्र पैंसठ साल की थी। वह एक सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य थे और अपने पैतृक गाँव में एक पुरानी हवेली में अकेले रहते थे। उनकी पत्नी का दस साल पहले देहांत हो चुका था।
उनके दो बेटे थे – बड़ा बेटा अजय जो दिल्ली में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था, और छोटा बेटा विजय जो जयपुर में एक वकील था।
वीरेंद्र जी की हवेली गाँव के बीच में स्थित थी। दो मंजिला इमारत, पत्थर की दीवारें, और एक बड़ा आंगन।
हवेली में कई कमरे थे लेकिन अब ज़्यादातर बंद पड़े थे। सिर्फ एक कमरा, रसोई और बाथरूम ही इस्तेमाल में थे।
वीरेंद्र जी के दिन बहुत धीरे-धीरे बीतते थे। सुबह उठना, पूजा करना, अखबार पढ़ना, दोपहर को थोड़ा आराम, और फिर शाम को गाँव के बुजुर्गों के साथ बैठना।
रातें बहुत लंबी लगती थीं। उनका शरीर अभी भी मजबूत था। वह रोज़ सुबह टहलने जाते थे और योग भी करते थे। लेकिन मन में एक खालीपन था जो कभी भरता नहीं था।
उनके पोते-पोतियाँ थे लेकिन वे शहरों में रहते थे। बड़े बेटे की बेटी अंजली उनकी सबसे छोटी पोती थी। अंजली अभी उन्नीस साल की थी और जयपुर के एक कॉलेज में बी.ए. की पढ़ाई कर रही थी।
वह वीरेंद्र जी की सबसे चहीती थी। बचपन में वह अक्सर उनके साथ रहने आती थी और दादा-पोती की जोड़ी गाँव में मशहूर थी।
अप्रैल की एक गर्म दोपहर थी। वीरेंद्र जी आंगन में कुर्सी पर बैठे थे और पुरानी यादों में खोए हुए थे।
तभी हवेली के बाहर एक कार रुकी। दरवाज़ा खुला और एक युवा लड़की बाहर निकली। वह अंजली थी।
“दादा!” अंजली चीखकर भागी आई।
वीरेंद्र जी ने अपनी आँखें पोंछीं। वह विश्वास नहीं कर पा रहे थे। अंजली बड़ी हो गई थी।
उसकी लंबी काली चोटी, गोरा चेहरा, और वह मुस्कान जो उसकी दादी जैसी थी।
“मेरी बच्ची!” वीरेंद्र जी उठे और अंजली को गले लगा लिया।
अंजली ने कसकर दादा को गले लगाया। वह अब एक जवान औरत बन चुकी थी लेकिन उसकी मासूमियत बची हुई थी।
उसने सफेद रंग की कुर्ती और नीली जींस पहनी हुई थी।
वीरेंद्र जी ने नोटिस किया कि अंजली अब कितनी बड़ी हो गई थी – उसके स्तन पूरी तरह से विकसित थे और उसकी कमर पतली थी।
“कब आई? कैसे आई? तुम्हारे पापा को बताया?” वीरेंद्र जी ने सवालों की बौछार कर दी।
“दादा, एक-एक करके बताऊँगी,” अंजली हँसी, “पहले यह बताइए, आप कैसे हैं?”
वे अंदर गए। अंजली ने हवेली को देखा। वह बिल्कुल वैसी ही थी जैसी वह बचपन में थी – पुरानी लकड़ी की गंध, दीवारों पर पुराने चित्र, और वह शांति।
“दादा, मैं दस दिनों के लिए आई हूँ,” अंजली ने कहा, “मेरे कॉलेज की छुट्टियाँ हैं और मम्मी-पापा दिल्ली गए हैं किसी काम से। इसलिए मैंने सोचा आपके साथ रहूँ।”
वीरेंद्र जी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। “बहुत अच्छा किया बच्ची। अब यहीं रहो।”
शाम को अंजली ने खाना बनाया। वह रसोई में व्यस्त थी और वीरेंद्र जी उसे देख रहे थे।
उन्हें याद आया कि कैसे उनकी पत्नी भी इसी रसोई में खाना बनाती थीं। अंजली की हरकतें, उसकी मुस्कान, सब कुछ उनकी पत्नी जैसा लग रहा था।
“दादा, खाना तैयार है,” अंजली ने आवाज़ दी।
वे दोनों छत पर बैठकर खाना खाने लगे। गर्म हवा चल रही थी लेकिन अंजली की मौजूदगी में वीरेंद्र जी को गर्मी महसूस नहीं हो रही थी।
“दादा, आप अकेले रहते हैं तो क्या करते हैं?” अंजली ने पूछा।
“बस यहीं, समय बीत जाता है,” वीरेंद्र जी ने कहा।
“मैं आपके साथ रहूँगी तो आपको बोर नहीं होने दूँगी,” अंजली मुस्कुराई।
रात को अंजली ऊपर वाले कमरे में सोने गई जो उसके बचपन में उसका कमरा था। वीरेंद्र जी नीचे अपने कमरे में लेटे।
उन्हें नींद नहीं आ रही थी। उनके मन में अजीब सी भावनाएँ उठ रही थीं। अंजली को देखकर उनका शरीर उत्तेजित हो रहा था।
वह खुद को डांटने लगे – “यह क्या सोच रहा हूँ मैं? वह तो मेरी पोती है।”
लेकिन विचार बार-बार आ रहे थे। अंजली के विकसित स्तन, उसकी पतली कमर, उसके गोल होंठ – सब कुछ उन्हें मोह रहा था।
अगले कुछ दिन अंजली और वीरेंद्र जी के बीच एक अनोखा रिश्ता विकसित होने लगा। वे सुबह साथ में टहलने जाते, दोपहर को साथ में खाना खाते, और शाम को छत पर बैठकर बातें करते।
अंजली बहुत खुलकर रहती थी। वह अपने कॉलेज की दोस्तों के बारे में बताती, अपने सपनों के बारे में बताती। वीरेंद्र जी उसकी हर बात ध्यान से सुनते।
एक शाम अंजली ने कहा, “दादा, मैं आपको मालिश कर दूँ?”
“नहीं बच्ची, तुम थक जाओगी,” वीरेंद्र जी ने मना किया।
“अरे नहीं, मुझे अच्छा लगेगा,” अंजली ने कहा।
वे नीचे आ गए। अंजली ने वीरेंद्र जी के पैरों की मालिश की। फिर उसने कहा, “दादा, आप लेट जाइए, मैं पीठ की मालिश करती हूँ।”
वीरेंद्र जी लेट गए। अंजली ने उनकी कमीज़ उतार दी और तेल लगाकर मालिश करने लगी। उसके नरम हाथ वीरेंद्र जी की पीठ पर फिसल रहे थे। वीरेंद्र जी को बहुत अच्छा लग रहा था।
“दादा, आपकी पीठ तो बहुत मजबूत है,” अंजली ने कहा।
“हाँ बच्ची, अभी भी जवान हूँ,” वीरेंद्र जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
अंजली ने उनकी गर्दन और कंधों की भी मालिश की। वीरेंद्र जी की आँखें बंद थीं। अंजली के हाथों की स्पर्श से उनका शरीर उत्तेजित हो रहा था। उनका लौड़ा खड़ा होने लगा था।
अगले दिन बारिश हुई। गर्मी कम हो गई। शाम को अंजली और वीरेंद्र जी बरामदे में बैठे थे। अंजली ने सफेद रंग की साड़ी पहनी हुई थी जो गीली हो गई थी बारिश में। वह साड़ी उसके शरीर से चिपक गई थी और उसके स्तन साफ झलक रहे थे।
वीरेंद्र जी उसे देखते रहे। उनका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। अंजली ने नोटिस किया कि दादा उसे देख रहे हैं। वह शर्मा गई लेकिन अंदर ही अंदर उसे भी अच्छा लग रहा था।
“दादा, मैं कपड़े बदलकर आती हूँ,” अंजली ने कहा।
“हाँ बच्ची, जाओ,” वीरेंद्र जी ने कहा।
अंजली ऊपर गई। कुछ देर बाद वह नीचे आई। उसने एक हल्की गुलाबी नाइटी पहनी थी जो उसके घुटनों तक थी। वह पानी की बोतल लाने आई थी।
जैसे ही वह पानी की बोतल रखने झुकी, उसकी नाइटी का ऊपरी हिस्सा थोड़ा खिसक गया और वीरेंद्र जी को उसके स्तनों का ऊपरी हिस्सा दिख गया। वह सफेद और कोमल थे। वीरेंद्र जी का लौड़ा पूरी तरह से खड़ा हो गया।
अंजली ने देखा कि दादा उसे देख रहे हैं। वह उठी और दादा के पास आई। “दादा, क्या देख रहे हैं?”
वीरेंद्र जी घबरा गए। “कुछ नहीं बच्ची।”
अंजली ने उनका हाथ पकड़ा। “दादा, मैं जानती हूँ आप अकेले हैं। मैं भी अकेली हूँ। पापा-मम्मी के पास समय नहीं होता मेरे लिए।”
वीरेंद्र जी ने उसका हाथ सहलाया। “तुम तो मेरी प्यारी पोती हो।”
“बस पोती ही?” अंजली ने पूछा।
वीरेंद्र जी ने उसकी आँखों में देखा। उसमें कुछ अलग था – एक चाहत, एक प्यास।
रात को अंजली दादा के कमरे में आई। वह एक घेरे हुए कमरे में थी। वीरेंद्र जी लेटे हुए थे।
“दादा, मुझे नींद नहीं आ रही,” अंजली ने कहा, “क्या मैं यहीं सो सकती हूँ?”
वीरेंद्र जी ने जगह दी। अंजली उनके बगल में लेट गई। कुछ देर बाद अंजली ने अपना हाथ दादा की छाती पर रख दिया।
“दादा, आपका दिल तेज़ धड़क रहा है,” अंजली ने कहा।
“हाँ बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
अंजली ने अपना सिर उनकी छाती पर रख दिया। उसके स्तन दादा की बाँह से टकरा रहे थे। वीरेंद्र जी ने हिम्मत करके अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया।
“दादा,” अंजली ने धीरे से कहा, “मैं आपसे कुछ माँगूं?”
“क्या बच्ची?”
“मुझे प्यार चाहिए। वो प्यार जो एक औरत को चाहिए होता है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी समझ गए। उन्होंने अंजली का चेहरा उठाया और उसके माथे पर चूमा। फिर उन्होंने उसके गालों पर चूमा। अंजली ने आँखें बंद कर लीं।
वीरेंद्र जी ने धीरे से उसके होंठों पर चूमा। अंजली ने भी प्रतिक्रिया दी। उसने अपने होंठ दादा के होंठों पर रख दिए। वे दोनों एक-दूसरे को चूमने लगे।
वीरेंद्र जी और अंजली एक-दूसरे को चूम रहे थे। वीरेंद्र जी का लौड़ा पूरी तरह से खड़ा था और उनकी नाइटी में एक टेंट बन गया था। अंजली ने यह महसूस किया और उसने अपना हाथ वहाँ रख दिया।
“दादा, यह क्या है?” अंजली ने शरमाते हुए पूछा।
“मेरा लौड़ा है बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा, “तुम्हें देखकर खड़ा हो गया है।”
अंजली ने उनकी नाइटी के ऊपर से ही उसे सहलाया। वह बहुत मोटा और कड़क था। वीरेंद्र जी ने अंजली की नाइटी उठाई और उसके पैरों को देखने लगे। उसके पैर गोरे और कोमल थे।
“बच्ची, तुम बहुत सुंदर हो,” वीरेंद्र जी ने कहा।
अंजली ने उठकर अपनी नाइटी उतार दी। वह अब सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। उसके स्तन ब्रा में भरे हुए थे और उभार साफ दिख रहा था। वीरेंद्र जी उसे देखते रहे।
“दादा, आप भी तो कुछ उतारेंगे नहीं?” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने अपनी नाइटी उतार दी। उनका शरीर अभी भी मजबूत था। छाती पर थोड़े बाल थे और पेट थोड़ा निकला हुआ था। लेकिन उनका लौड़ा बहुत मोटा और लंबा था – करीब सात इंच का और गोल।
अंजली ने उसे देखकर कहा, “दादा, आपका तो बहुत मोटा है।”
“क्या तुम सहन कर पाओगी?” वीरेंद्र जी ने पूछा।
“आप धीरे से कीजिएगा,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने अंजली को बिस्तर पर लेटाया। वे उसके पैरों के बीच में आ गए। उन्होंने अंजली की पैंटी उतारी। उसकी बुर दिख गई। वह बिल्कुल साफ शेव की हुई थी और गुलाबी रंग की थी। उसकी बुर की फाँकें बंद थीं।
“क्या सुंदर बुर है तुम्हारी,” वीरेंद्र जी ने कहा।
उन्होंने अपनी उँगली अंजली की बुर पर रखी। वह गीली हो चुकी थी। उन्होंने धीरे से उँगली अंदर डाली। अंजली की साँसें तेज़ हो गईं।
“दादा, थोड़ा दर्द हो रहा है,” अंजली ने कहा।
“पहली बार है इसलिए,” वीरेंद्र जी ने कहा, “धीरे-धीरे मजा आएगा।”
उन्होंने अपनी उँगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया। अंजली की बुर गीली होती जा रही थी। कुछ देर बाद उन्होंने उँगली बाहर निकाली और अपना मुँह वहाँ रख दिया।
“दादा, यह क्या कर रहे हैं?” अंजली ने शर्माते हुए पूछा।
“तुम्हारी बुर चाट रहा हूँ बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
उन्होंने अपनी जीभ निकाली और अंजली की बुर पर लगाई। अंजली की कमर उठ गई। वह बहुत उत्तेजित हो रही थी।
“ओह दादा, बहुत मजा आ रहा है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने उसकी बुर को अपने होंठों से पकड़ा और चूसना शुरू कर दिया। उन्होंने उसके बुर के दाने को भी जीभ से चाटा। अंजली पागल हो रही थी। वह अपने सिर को पकड़कर बिस्तर पर पटक रही थी।
“ओह हाँ दादा, ऐसे ही करो,” अंजली चिल्लाई, “मेरी बुर को चाटो।”
वीरेंद्र जी लगभग दस मिनट तक उसकी बुर चाटते रहे। अंजली की बुर से पानी निकलने लगा था। वह झड़ने वाली थी।
“दादा, मैं झड़ने वाली हूँ,” अंजली ने कहा।
“झड़ जाओ बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
अंजली झड़ गई। उसकी बुर से पानी निकला और वीरेंद्र जी ने उसे पी लिया। फिर वे ऊपर आए और अंजली के होंठों पर चूमे।
अब वीरेंद्र जी ने अपना लौड़ा अंजली के सामने किया। वह पूरी तरह से खड़ा था और लाल हो रहा था।
“बच्ची, इसे चूसोगी?” वीरेंद्र जी ने पूछा।
“हाँ दादा, मैं कोशिश करती हूँ,” अंजली ने कहा।
अंजली उठकर बैठ गई। उसने वीरेंद्र जी का लौड़ा अपने हाथ में लिया। वह बहुत गरम था। उसने उसे अपने मुँह में ले लिया और चूसना शुरू कर दिया।
“ओह बच्ची, बहुत अच्छा कर रही हो,” वीरेंद्र जी ने कहा।
अंजली ने उनके लौड़े के टोपे को जीभ से चाटा। फिर वह धीरे-धीरे अंदर लेने लगी। वीरेंद्र जी ने उसके सिर को पकड़ा और अपना लौड़ा उसके मुँह में पेलना शुरू किया।
“गला खोलो बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
अंजली ने पूरी कोशिश की और उनका आधा लौड़ा अपने गले तक ले लिया। वीरेंद्र जी बहुत उत्तेजित हो रहे थे। उन्होंने अंजली के मुँह में अपना लौड़ा अंदर-बाहर करना शुरू किया।
कुछ देर बाद उन्होंने अपना लौड़ा बाहर निकाला और कहा, “अब मैं तुम्हारे दूध चूसना चाहता हूँ।”
अंजली ने अपनी ब्रा खोल दी। उसके स्तन बाहर आ गए। वह गोरे और कोमल थे। निप्पल गुलाबी और कड़क थे।
वीरेंद्र जी ने एक स्तन अपने हाथ में लिया और दबाया। फिर उन्होंने उसे अपने मुँह में ले लिया और चूसना शुरू कर दिया।
“ओह दादा, बहुत मजा आ रहा है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने उसके निप्पल को कसकर पकड़ा और चूसा। फिर दूसरे स्तन को भी चूसा। अंजली के स्तन बहुत नरम थे और वीरेंद्र जी को बहुत मजा आ रहा था।
“दादा, अब और नहीं रुकता जा रहा,” अंजली ने कहा, “अपना लौड़ा मेरी बुर में डाल दो।”
वीरेंद्र जी ने अंजली को बिस्तर पर लेटाया और उसकी टाँगें फैला दीं। उन्होंने अपने लौड़े को उसकी बुर के मुँह पर रखा।
“बच्ची, धीरे से डालूँगा,” वीरेंद्र जी ने कहा।
“हाँ दादा, कीजिए,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने धीरे से धक्का लगाया। उनके लौड़े का टोपा अंजली की बुर में चला गया। अंजली की साँसें फूल गईं।
“दर्द हो रहा है दादा,” अंजली ने कहा।
“बस थोड़ी देर और,” वीरेंद्र जी ने कहा।
उन्होंने थोड़ा और धक्का लगाया और आधा लौड़ा अंदर चला गया। अंजली की बुर बहुत टाइट थी और उनके लौड़े को कस रही थी।
“ओह दादा, बहुत मोटा है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने रुककर उसके स्तनों को सहलाया। फिर उन्होंने एक जोर का धक्का लगाया और पूरा लौड़ा अंदर घुसा दिया।
“आह!” अंजली चीखी।
वीरेंद्र जी रुके हुए थे। कुछ देर बाद अंजली को मजा आने लगा। वह अपनी कमर उठाने लगी।
“अब मजा आ रहा है दादा,” अंजली ने कहा, “चोदो मुझे।”
वीरेंद्र जी ने अपने लौड़े को अंदर-बाहर करना शुरू किया। बिस्तर की चरपराहट गूँजने लगी। अंजली की बुर से आवाज़ें आ रही थीं।
“फच्… फच्… फच्…”
“ओह दादा, बहुत मजा आ रहा है,” अंजली चिल्लाई, “और जोर से चोदो।”
वीरेंद्र जी ने अपनी स्पीड बढ़ा दी। वह जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे। अंजली की टाँगें हवा में थीं और वीरेंद्र जी उनके बीच में थे।
“बच्ची, तुम्हारी बुर बहुत टाइट है,” वीरेंद्र जी ने कहा।
“और आपका लौड़ा बहुत मोटा है दादा,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने लगभग बीस मिनट तक उसे बिस्तर पर चोदा। अंजली दो बार झड़ चुकी थी। अब वीरेंद्र जी झड़ने वाले थे।
“बच्ची, मैं झड़ने वाला हूँ,” वीरेंद्र जी ने कहा।
“अंदर ही निकाल दो दादा,” अंजली ने कहा, “मैं गर्भ नहीं ठहरा सकती, सेफ है।”
वीरेंद्र जी ने जोर से धक्के लगाए और अपना सारा वीर्य अंजली की बुर में छोड़ दिया। वह गरम-गरम वीर्य उसकी बुर में भर गया। वीरेंद्र जी थककर उसके ऊपर गिर पड़े।
अगली सुबह जब वीरेंद्र जी उठे तो अंजली पहले से ही जाग चुकी थी। उसने नहा लिया था और एक पारदर्शी साड़ी पहनी हुई थी जिसमें से उसका बदन साफ झलक रहा था।
“दादा, आज मैं आपको एक नई जगह पर चोदवाऊँगी,” अंजली ने कहा।
“कहाँ बच्ची?” वीरेंद्र जी ने पूछा।
“खाने की मेज़ पर,” अंजली ने कहा।
वे दोनों खाने वाले कमरे में गए। वहाँ एक लंबी लकड़ी की मेज़ थी। अंजली ने अपनी साड़ी उतार दी। वह नंगी हो गई। फिर वह मेज़ पर लेट गई।
“दादा, आइए,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने अपने कपड़े उतारे। उनका लौड़ा फिर से खड़ा था। वे अंजली के पास गए और उसकी टाँगें मेज़ के किनारे पर रख दीं। अंजली की बुर मेज़ के ऊपर थी और वीरेंद्र जी खड़े होकर उसे चोद सकते थे।
वीरेंद्र जी ने अपने लौड़े को अंजली की बुर पर रखा और धक्का लगाया। उनका लौड़ा आसानी से अंदर चला गया क्योंकि अब अंजली की बुर थोड़ी खुल चुकी थी।
“ओह दादा, इस पोजीशन में और भी मजा आ रहा है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी खड़े होकर उसे चोद रहे थे। उनके धक्के जोरदार थे। अंजली की कमर मेज़ पर टिकी हुई थी और उसकी टाँगें हवा में थीं।
“दादा, मेरे दूध पीजिए,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी झुके और उसके स्तनों को पकड़ लिया। वह एक स्तन को चूसते हुए उसे चोद रहे थे। अंजली की साँसें तेज़ हो रही थीं।
“ओह हाँ दादा, ऐसे ही,” अंजली चिल्लाई, “मेज़ पर फाड़ दो मेरी बुर को।”
वीरेंद्र जी ने और जोर से धक्के लगाए। मेज़ हिल रही थी। अंजली की बुर से आवाज़ें आ रही थीं।
“फच्… फच्… फच्…”
“बच्ची, मैं झड़ने वाला हूँ,” वीरेंद्र जी ने कहा।
“अंदर निकाल दो दादा,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने जोर से धक्के लगाए और अपना सारा माल अंजली की बुर में छोड़ दिया। फिर उन्होंने अपना लौड़ा बाहर निकाला और अंजली के पेट पर अपना वीर्य गिरा दिया।
दोपहर को जब बहुत गर्मी थी, तो वे दोनों बरामदे में बैठे थे। वहाँ एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी जिस पर वीरेंद्र जी अक्सर बैठते थे।
“दादा, इस कुर्सी पर भी चुदाई कर सकते हैं,” अंजली ने कहा।
“कैसे बच्ची?” वीरेंद्र जी ने पूछा।
“मैं बैठूँगी और आप मेरे ऊपर आ जाइए,” अंजली ने कहा।
अंजली ने अपनी साड़ी उतार दी। वह नंगी होकर कुर्सी पर बैठ गई। उसने अपनी टाँगें कुर्सी के दोनों किनारों पर रख दीं। उसकी बुर पूरी तरह से खुली हुई थी।
वीरेंद्र जी उसके सामने खड़े हो गए। उनका लौड़ा फिर से खड़ा था। उन्होंने अपने लौड़े को अंजली की बुर पर रखा और धक्का लगाया।
इस बार अंजली नीचे थी और वीरेंद्र जी ऊपर थे। अंजली ने अपने हाथों से कुर्सी पकड़ी हुई थी और वीरेंद्र जी उसे चोद रहे थे।
“ओह दादा, इस पोजीशन में आपका लौड़ा बहुत अंदर जा रहा है,” अंजली ने कहा।
“मजा आ रहा है बच्ची?” वीरेंद्र जी ने पूछा।
“बहुत मजा आ रहा है दादा,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने जोर-जोर से धक्के लगाए। कुर्सी की आवाज़ गूँज रही थी। अंजली के स्तन हिल रहे थे और वीरेंद्र जी उन्हें बीच-बीच में पकड़कर दबाते थे।
“दादा, मैं झड़ने वाली हूँ,” अंजली ने कहा।
“मैं भी बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
दोनों एक साथ झड़ गए। वीरेंद्र जी का वीर्य अंजली की बुर में भर गया और अंजली का पानी उनके लौड़े पर निकला।
शाम को जब सूरज डूब रहा था, तो वे दोनों छत पर गए। हवा चल रही थी और मौसम सुहाना था।
“दादा, आज खड़े-खड़े चुदाई करते हैं,” अंजली ने कहा।
“कैसे बच्ची?” वीरेंद्र जी ने पूछा।
अंजली दीवार के पास गई और अपने हाथ दीवार पर रखे। उसने अपनी टाँगें थोड़ी फैला दीं और अपनी कमर पीछे को उठा दी। उसकी गोरी गांड और बुर दिख रही थी।
वीरेंद्र जी उसके पीछे गए। उन्होंने अपने लौड़े को उसकी बुर पर रखा और एक जोर का धक्का लगाया। उनका पूरा लौड़ा एक ही बार में अंदर चला गया।
“ओह दादा, बहुत अंदर चला गया,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने उसकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू किए। अंजली दीवार से सटी हुई थी और वीरेंद्र जी उसे पीछे से चोद रहे थे।
“ओह हाँ दादा, ऐसे ही चोदो,” अंजली चिल्लाई, “पीछे से फाड़ दो मेरी बुर को।”
वीरेंद्र जी ने और जोर से धक्के लगाए। उनके लौड़े से अंजली की बुर की आवाज़ आ रही थी। अंजली के स्तन हिल रहे थे और उसने एक हाथ से उन्हें पकड़ लिया।
“दादा, मेरे दूध दबाइए,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने झुककर उसके स्तनों को पकड़ लिया और चोदते हुए उन्हें दबाने लगे। अंजली की बुर बहुत टाइट थी और उनके लौड़े को कस रही थी।
“बच्ची, मैं झड़ने वाला हूँ,” वीरेंद्र जी ने कहा।
“अंदर निकाल दो दादा,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने जोर से धक्के लगाए और अपना सारा माल अंजली की बुर में छोड़ दिया। वे थककर उसकी पीठ से लिपट गए।
अगले दिन सुबह अंजली रसोई में खाना बना रही थी। उसने सिर्फ एक पेटीकोट और ब्लाउज पहना था। उसकी पीठ खुली हुई थी।
वीरेंद्र जी रसोई में आए और उसे पीछे से देखने लगे। अंजली की गांड पेटीकोट में बाहर को निकली हुई थी। वीरेंद्र जी उसके पास गए और पीछे से उसे गले लगा लिया।
“दादा, खाना बन रहा है,” अंजली ने शरमाते हुए कहा।
“बाद में बना लेना बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
उन्होंने अंजली को घुमाया और उसके होंठों पर चूमा। फिर उन्होंने उसे रसोई की मेज़ पर बिठाया। मेज़ पर बर्तन रखे थे लेकिन उन्होंने एक तरफ जगह बना ली।
वीरेंद्र जी ने अंजली का पेटीकोट उठाया और उसकी बुर देखी। वह गीली हो चुकी थी। उन्होंने अपने लौड़े को बाहर निकाला और उसकी बुर में डाल दिया।
“ओह दादा, रसोई में?” अंजली ने कहा।
“हाँ बच्ची, यहीं,” वीरेंद्र जी ने कहा।
वह उसे रसोई की मेज़ पर चोद रहे थे। अंजली के पैर हवा में थे और वीरेंद्र जी उसे जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे। बर्तनों की आवाज़ गूँज रही थी।
“दादा, कोई आ जाएगा,” अंजली ने कहा।
“कोई नहीं आएगा बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
उन्होंने और जोर से चोदना जारी रखा। अंजली की बुर से पानी निकल रहा था और मेज़ पर गिर रहा था।
शाम को अंजली नहाने गई। वीरेंद्र जी भी उसके पीछे-पीछे बाथरूम में घुस गए।
“दादा, आप भी?” अंजली ने कहा।
“मैं भी नहाऊँगा बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
अंजली नंगी होकर नहा रही थी। पानी की बूंदें उसके गोरे बदन पर गिर रही थीं। वीरेंद्र जी ने भी कपड़े उतारे और उसके पास गए।
उन्होंने अंजली को दीवार से सटाया और उसकी एक टाँग उठा दी। फिर उन्होंने अपना लौड़ा उसकी बुर में डाल दिया।
“ओह दादा, पानी में और भी मजा आ रहा है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने उसे दीवार से सटाकर चोदना शुरू किया। पानी की धार में वे दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए थे। वीरेंद्र जी के लौड़े से अंजली की बुर की आवाज़ गूँज रही थी।
“फच्… फच्… फच्…”
“दादा, मैं झड़ने वाली हूँ,” अंजली ने कहा।
“मैं भी बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
दोनों एक साथ झड़ गए। उनका वीर्य पानी के साथ बहकर नाली में चला गया।
रात को जब सब शांत था, तो वे दोनों आंगन में गए। चाँदनी रात थी और पूरा आंगन रोशनी से जगमगा रहा था।
अंजली ने आंगन में एक चारपाई बिछाई और उस पर लेट गई। उसने अपनी साड़ी उतार दी और पूरी तरह से नंगी हो गई।
“दादा, आज रात यहीं चोदिए मुझे,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी उसके पास गए। उन्होंने भी अपने कपड़े उतार दिए। उनका लौड़ा चाँदनी में चमक रहा था।
वह अंजली के ऊपर लेट गए और उसके होंठों पर चूमे। फिर उन्होंने अपना लौड़ा उसकी बुर में डाल दिया।
“ओह दादा, चाँदनी रात में चुदवाने का अलग ही मजा है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी ने धीरे-धीरे धक्के लगाए। वह उसे प्यार से चोद रहे थे। अंजली भी अपनी कमर उठा-उठाकर उनका साथ दे रही थी।
“दादा, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ,” अंजली ने कहा।
“मैं भी बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
उन्होंने लगभग आधे घंटे तक उसे चोदा। फिर दोनों एक साथ झड़ गए।
अगले कुछ दिन वे दोनों हर जगह और हर पोजीशन में चुदाई करते रहे।
एक दिन वीरेंद्र जी ने अंजली को घोड़ी बनाया और उसकी गांड मारी। अंजली पहले तो दर्द से चीखी लेकिन फिर मजा आने लगा।
“ओह दादा, गांड में भी बहुत मजा आता है,” अंजली ने कहा।
एक दिन अंजली उनके ऊपर चढ़कर बैठ गई और अपनी बुर में उनका लौड़ा ले लिया। वह ऊपर-नीचे उछल-उछलकर चुदवा रही थी।
“दादा, इस पोजीशन में मुझे पूरा कंट्रोल है,” अंजली ने कहा।
वीरेंद्र जी उसके स्तनों को दबाते हुए उसे चोद रहे थे।
एक दिन उन्होंने सोफे पर भी चुदाई की। अंजली सोफे पर लेटी हुई थी और वीरेंद्र जी उसे चोद रहे थे।
दस दिन बीत चुके थे। अंजली को वापस जाना था। उस रात वे दोनों बहुत देर तक चुदाई करते रहे।
वीरेंद्र जी ने उसे बिस्तर पर, मेज़ पर, कुर्सी पर, और खड़े-खड़े चोदा। वे थककर लेट गए।
“दादा, मैं आपको बहुत याद करूँगी,” अंजली ने कहा।
“मैं भी बच्ची,” वीरेंद्र जी ने कहा।
सुबह अंजली चली गई। लेकिन वह हर महीने आने लगी और दादा से चुदवाती रही।
अगले पार्ट में मैं बताऊंगी की कैसे दादा जी, रहीम अंकल, सुरेन्द्र अंकल, राजेश अंकल, और श्याम अंकल मिलकर मुझे चोदे …
NEXT PART: दादा ने पोती को ग्रुप चुदाई का मजा दिया
- गाँव की लड़की बनी गाँव की रंडी
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नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।
Maast dada ji
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