पड़ोसन की बुर चुदाई

padosan ki chudai

मेरे परिवार में पापा, मम्मी और मैं हूँ। मेरा एक छोटा भाई है जो Hostel में रहता है।

ये 3 साल पहले की बात है जब हमारे सोसाइटी में एक नई फैमिली शिफ्ट हुई।

उनके परिवार में सिर्फ एक महिला थी – रेखा आंटी, उनके पति की कुछ साल पहले ही बीमारी से मौत हो चुकी थी।

रेखा आंटी की उम्र करीब 38 साल थी और उनकी एक बेटी थी जो 18 साल की थी और कॉलेज में पढ़ती थी।

रेखा आंटी दिखने में बेहद खूबसूरत थीं। उनकी हाईट 5’6″ थी, गोरा रंग, लंबे काले बाल और आंखें जैसे कोहल से लिखी हों। उनका फिगर 36-30-38 था – पूरी तरह से भरा हुआ और जवानी से लबालब। वो साड़ी पहनती थीं और उनकी कमर में जो लचक थी, वो देखते ही बनती थी।

मैं उस समय MBA की तैयारी कर रहा था, उम्र 24 साल। मेरा स्टडी रूम बालकनी की तरफ था और रेखा आंटी का बेडरूम उसी के सामने। शाम को जब वो अपनी बालकनी में कपड़े सुखातीं या बस खड़ी होकर हवा खातीं, तो मेरी नज़र बस उन्हीं पर टिकी रहती।

एक दिन मम्मी ने सोसाइटी की किटी पार्टी में रेखा आंटी को इनवाइट किया और वहाँ से हमारी दोस्ती शुरू हुई। रेखा आंटी बहुत पढ़ी-लिखी और बातचीत करने वाली थीं। जल्दी ही वो मम्मी की अच्छी दोस्त बन गईं और हमारे घर आने-जाने लगीं।

मैं उनके घर भी जाता था, कभी-कभी उनकी बेटी प्रिया को ट्यूशन पढ़ाने या कंप्यूटर में कुछ हेल्प करने। रेखा आंटी अक्सलर अकेली रहती थीं क्योंकि प्रिया सुबह कॉलेज चली जाती और शाम को लेट आती।

एक दिन रात को करीब 11 बजे, मैं अपनी बालकनी में टहल रहा था तो देखा कि रेखा आंटी की बालकनी में लाइट जल रही है और वो रो रही थीं। मैंने पूछा, “आंटी, क्या हुआ?” तो वो रोते हुए बोलीं, “कुछ नहीं बेटा, तुम सो जाओ।”

मगर मैं चुप नहीं बैठा। मैं उनके घर गया और दरवाजा खटखटाया। जब उन्होंने दरवाजा खोला तो उनकी आंखें लाल थीं। वो अपने पति की याद में रो रही थीं – उस दिन उनकी Anniversary थी।

मैंने उन्हें चाय बनाकर दी और बैठकर उनकी बात सुनी। वो बोलीं, “तुम्हारी उम्र में मेरे पति थे, अब अकेली रह गई हूँ। कोई है ही नहीं जिससे दिल की बात कह सकूँ।”

मैंने उनका हाथ पकड़कर कहा, “आंटी, मैं हूँ ना।”

उस रात हम दोनों घंटों बात करते रहे। उनकी बेटी प्रिया तो अपने Friend के यहाँ सोने गई थी।

धीरे-धीरे मेरी और रेखा आंटी की दोस्ती गहरी होती गई। हम रोज़ फोन पर बात करने लगे, कभी-कभी मैं उन्हें बाइक पर बैठाकर मार्केट घुमाने ले जाता।

एक दिन जब मैं उनके घर गया तो वो साड़ी में नहाकर आई थीं, गीले बाल, गीला ब्लाउज – मेरा दिल धड़क उठा। वो मुझे देखकर मुस्कुराईं और कहा, “क्या देख रहे हो?”

मैंने हिम्मत करके कह दिया, “आपको… आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं आंटी।”

उनका चेहरा लाल हो गया। उन्होंने कहा, “पागल हो गए हो? मैं तुम्हारी आंटी हूँ।”

“नहीं,” मैंने कहा, “आप मेरी दोस्त हैं, और मैं… मैं आपसे प्यार करता हूँ रेखा जी।”

वो चौंक गईं। उन्होंने मुझे डांटा, “ये क्या बकवास कर रहे हो? तुम्हारी उम्र मेरी बेटी जितनी है। चले जाओ यहाँ से।”

मैंने उनसे कहा, “मैं जानता हूँ ये सोसाइटी के लिए सही नहीं है, लेकिन मेरा दिल आपके लिए धड़कता है। मैं प्रिया को अपनी बहन मानता हूँ और आपको…”

“बस!” उन्होंने रोक दिया, “अब ये बात दोबारा मत उठाना।”

कुछ दिनों तक मैं उनके घर नहीं गया। फिर एक रात फोन आया, रेखा आंटी का। उनकी आवाज़ कांप रही थी, “राहुल, मुझे… मुझे कुछ बात करनी है।”

मैं तुरंत उनके घर गया। वो बैठी थीं और मेरे आते ही मेरे गले लग गईं। “मैंने तुम्हें भगाने की कोशिश की, लेकिन तुम्हारे बिना मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं भी… मैं भी तुम्हें चाहती हूँ।”

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मैंने उनके चेहरे को अपने हाथों में लिया और धीरे से उनके होंठों पर चूमा। वो पहले तो हिचकिचाईं, फिर पूरी तरह से मेरे साथ हो गईं।

हमने एक-दूसरे को कसकर गले लगाया। मेरे हाथ उनकी कमर पर थे और उनकी सांसें तेज़ हो रही थीं। मैंने धीरे से उनकी साड़ी का पल्लू हटाया और उनकी गर्दन पर चूमना शुरू किया।

“आह…” उनकी सिसकी निकली। “राहुल, धीरे…”

मैंने उनके ब्लाउज के ऊपर से ही उनके बूब्स दबाने शुरू किए। वो और भी ज़्यादा गर्म हो गईं। मैंने उनका ब्लाउज खोला और ब्रा के ऊपर से ही उनके निप्पल चूसने लगा।

“ओह गॉड… राहुल…” वो मेरे बालों में हाथ फेरने लगीं।

मैंने उन्हें उठाया और बेडरूम में ले गया। वो शर्मा रही थीं, “ये सही नहीं है… मेरी बेटी…”

“प्रिया कल सुबह आएगी,” मैंने कहा, “और आज रात सिर्फ हम दोनों हैं।”

मैंने उनकी साड़ी उतारी, फिर पेटीकोट। वो सिर्फ ब्रा और पेंटी में थीं। उनका गोरा बदन कमरे की रोशनी में चमक रहा था। मैंने उनकी ब्रा खोली तो उनके बड़े-बड़े बूब्स बाहर आ गए, निप्पल कड़े हो रहे थे।

मैंने उनके बूब्स चूसे, काटा, दबाया। वो आहें भर रही थीं। फिर मैंने उनकी पेंटी उतारी – उनकी चूत बिल्कुल साफ थी, थोड़ी सी झांटें थीं जो मुझे और भी उत्तेजित कर रही थीं।

मैंने उनकी टांगें फैलाई और उनकी चूत पर अपनी जीभ रखी। “ओह माई गॉड… राहुल… हां…” वो पागल हो रही थीं। मैंने उनकी चूत चाटी, अंदर जीभ डाली, क्लिट चूसा। वो 5 मिनट में ही झड़ गईं।

अब मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा 7 इंच का लंड देखकर वो घबरा गईं, “ये… ये तो बहुत बड़ा है।”

“डरो मत,” मैंने कहा, “आज मैं आपको असली मज़ा दूंगा।”

मैंने उनकी चूत पर अपना लंड रखा और धीरे से अंदर डालने लगा। वो करीब 2 साल से अकेली थीं, इसलिए थोड़ी टाइट थीं। “आह… धीरे राहुल… दर्द हो रहा है…”

मैंने धीरे-धीरे झटके लगाने शुरू किए। पहले धीरे, फिर तेज़। “फच… फच… फच…” की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी।

“हां… हां… और तेज़… चोदो मुझे…” रेखा अब पूरी तरह से मस्ती में आ चुकी थीं। उनकी चूत का पानी निकल रहा था जिससे लंड और भी आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था।

मैंने उनकी टांगें अपने कंधों पर रखीं और ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगा। “आह… राहुल… मैं झड़ने वाली हूँ…”

“मैं भी…” मैंने कहा और हम दोनों एक साथ झड़ गए। मैंने अपना सारा वीर्य उनकी चूत में ही छोड़ दिया।

थोड़ी देर आराम करने के बाद, रेखा ने मुझे कहा, “तुम्हें पता है, मेरे पति कभी मेरी गांड नहीं मार पाए। क्या तुम…”

मैंने उन्हें उल्टा किया और उनकी गोल-मटोल गांड पर अपना लंड रखा। थोड़ा थूक लगाया और धीरे से अंदर डाल दिया।

“आह… दर्द…” वो चीखीं, लेकिन मैंने उनका मुँह दबा दिया और धीरे-धीरे झटके लगाने लगा। 10 मिनट बाद वो भी मज़े लेने लगीं, “हां… मारो मेरी गांड… और तेज़…”

मैंने उनकी गांड ज़ोर-ज़ोर से मारी और अंदर ही अपना पानी छोड़ दिया।

उस रात हम तीन बार चुदे। सुबह जब मैं उठा तो रेखा मेरे बगल में थीं, मेरी बाहों में। उन्होंने मुझे किस किया और कहा, “मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ राहुल।”

6 महीने बाद हमने कोर्ट मैरिज कर ली। सोसाइटी वालों ने बहुत कुछ कहा, लेकिन हम पर कोई फर्क नहीं पड़ा। प्रिया भी खुश थी क्योंकि उसे एक भाई और एक पिता का प्यार दोनों मिल गए।

आज 2 साल हो गए हैं, और हमारा प्यार और भी गहरा हो गया है। रोज़ रात को हम एक-दूसरे को चोदते हैं, कभी-कभी तो दिन में भी जब प्रिया कॉलेज चली जाती है।

रेखा अब मेरी पत्नी है, और मैं उसका पति। उम्र का फर्क सिर्फ नंबरों में है, प्यार में नहीं।

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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