दोस्त की बीवी पहले लंड चुसी, बुर चुदवाई और गांड मरवाई

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सुबह सात बजे ही मेरी आँख खुल गई, और फ़ोन उठाते ही उसका मैसेज मिला — रात तीन बजे का भेजा हुआ।

“सो गए होंगे। पर मैं जाग रही हूँ। खिड़की खोलकर बैठी हूँ, चाय ठंडी हो गई है। जुल्फी ने पाँच मिनट फ़ोन किया, कहा कि क्लाइंट मीटिंग है। उसने पूछा भी नहीं कि मैं कैसी हूँ। तूने कल रात पूछा था कि डर लग रहा है क्या। आज किसी ने नहीं पूछा।”

मैंने लिखा: “आज पूछता हूँ। डर लग रहा है?”

जवाब दो मिनट बाद आया: “नहीं। अब सिर्फ़ बेचैनी है।”

“कैसी बेचैनी?”

“ऐसी कि अभी निकलकर तेरे घर आ जाऊँ।”

मैं उठकर बैठ गया। दो बजे का इंतज़ार करना मुश्किल था। मैंने उसे फ़ोन लगाया और वो पहली रिंग में उठा लिया।

“अभी नहीं आ सकती,” उसने कहा, बिना नमस्ते के। “मम्मी आ रही हैं ग्यारह बजे।”

“तो दो बजे,” मैंने कहा।

“दो बजे,” उसने कहा। फिर रुकी और बोली, “साहिल, होटल ऐसा जहाँ शोर न हो।”

“मिल जाएगा।”

“और बाथटब?”

“उसके साथ।”

उसने साँस छोड़ी, जैसे कुछ भारी उतर गया हो। “ठीक है। मुझे लोकेशन भेज दे। और साहिल — एक बात।”

“कहो।”

“कल रात जो मैंने कहा, वो सब सच था। तेरा लंड मुँह में चाहिए, गांड में पेलवाना है। पर मुझे पता है कि गांड में दर्द होता है। तो ज़्यादा ज़ोर मत करना, जितना मैं कहूँ उतना।”

“जितना तुम कहो, उतना,” मैंने दोहराया।

“अच्छा लड़का,” उसने कहा और काट दिया।

“अच्छा लड़का।” मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।

मैंने दो घंटे लैपटॉप पर बिताए। शहर के किनारे, एक पुरानी हवेली से बना बुटीक होटल मिला — पत्थर की दीवारें, लकड़ी की छतें, और कमरों में बड़े पत्थर के बाथटब। फ़ोटो में एक कमरा ऐसा था जिसमें बाथटब खिड़की के सामने था और बिस्तर चार पोस्ट वाला, सफ़ेद मच्छरदानी के साथ। नाम था — “हवेली 41″।

मैंने फ़ोन किया। रिसेप्शन पर एक बूढ़ी आवाज़ थी।

“सर, आज के लिए सुइट है, पर एक ही है।”

“वो दे दीजिए।”

“चेकइन दो बजे से, चेकआउट कल बारह बजे।”

“ठीक है।”

“नाम?”

मैंने दो सेकंड सोचा। “साहिल खान।”

फिर मैंने लोकेशन भेज दी। उसने सिर्फ़ एक इमोजी भेजा — नीला दिल — और फिर लिखा: “दो बजे। बिल्कुल दो बजे।”

मैं डेढ़ बजे पहुँच गया, कमरा देखा, और समझ गया कि यह जगह सही है। पत्थर का बाथटब इतना बड़ा था कि दो लोग आराम से बैठ सकें। मैंने उसमें गरम पानी भरा, एक जड़ी-बूटी वाला साबुन डाला जो रिसेप्शन पर रखा था, और मोमबत्तियाँ जलाईं — इस कमरे में पहले से रखी हुई थीं, पत्थर की खिड़की पर।

दो बजकर दो मिनट पर दरवाज़ा खटखटाया।

मैंने खोला। वो खड़ी थी — इस बार सफ़ेद कुर्ती, बिना आस्तीन, बहुत छोटी, और नीचे भी सफ़ेद ही पतला पाजामा। हाथ में छोटा बैग और एक प्लास्टिक का थैला।

“अंदर आओ,” मैंने कहा।

वो आई और दरवाज़ा बंद करके मेरी तरफ़ देखा। कमरे में भाप थी, मोमबत्तियों की रोशनी, और गरम पानी की खुशबू।

वो कुछ सेकंड खड़ी रही, फिर बोली, “तूने सब तैयार कर रखा है।”

“तुमने कहा था,” मैंने कहा। “बाथटब।”

उसने थैला उठाया। “मैं भी लाई हूँ। तेल। बादाम का।”

“तो फिर शुरू करें?”

उसने बैग और थैला कुर्सी पर रखा, और फिर मेरे पास आकर मुझे गले लगा लिया। उसका पूरा शरीर मुझसे चिपका — गरम, भारी, और उसने अपना चेहरा मेरी गर्दन में दबा दिया।

“दिन भर तेरा नाम लिया,” उसने धीमे से कहा। “मम्मी के सामने भी एक बार मुँह से निकल गया, मैंने संभाल लिया।”

“क्या कहा?”

“कहा, ‘साहिल रुको’ — मम्मी ने पूछा कौन साहिल?”

“तो क्या कहा?”

“कहा, जुल्फी का दोस्त है, कल फ़ोन आया था।”

“झूठ नहीं बोला,” मैंने कहा। “आधा सच है।”

वो हँसी और मेरी गर्दन पर होंठ रखे। फिर कान पर। फिर कान के नीचे वाली जगह पर उसने दाँत लगाए — इस बार वो मुझ पर हमला कर रही थी।

“कपड़े उतारो,” मैंने कहा।

“तू उतार,” उसने कहा, और मेरे होंठ चूमती रही।

मैंने उसकी कुर्ती ऊपर खींची और उसने हाथ उठाए। कुर्ती गिरी। नीचे कोई ब्रा नहीं थी — बस खुला शरीर, और दोनों दूध भारी होकर झूल गए, निपल्स कड़े।

“ब्रा नहीं पहनी?” मैंने पूछा।

“तुझे आसान करने के लिए,” उसने कहा।

मैंने उसे घुमाया और पाजामे का नाड़ा खोला। वो भी गिरा, फिर पैंटी। अब वो पूरी नंगी थी, और सामने की भाप में उसका शरीर धुँधला दिख रहा था।

मैंने उसका हाथ पकड़कर उसे बाथटब तक ले गया। वो पत्थर के किनारे पर बैठी, फिर पैर अंदर डाले। पानी गरम था — उसने साँस भरी और फिर पूरी उतर गई।

“बैठ जाओ,” उसने कहा। “सामने।”

मैं भी उतरा। पानी हमारी कमर तक आया। वो अपने घुटने मेरी कमर के दोनों तरफ़ करके बैठी और मेरी तरफ़ झुकी।

“अब पूछो,” उसने कहा।

“क्या पूछूँ?”

“कल रात तूने पूछा था कि डर लग रहा है क्या। आज भी पूछ।”

“डर लग रहा है?” मैंने पूछा।

“हाँ,” उसने कहा। “बहुत। पर इस बार डर अच्छा लग रहा है।”

उसने मेरा चेहरा पकड़ा और मुझे चूमा — गहरा, गीला, पानी की भाप में। फिर उसका हाथ पानी के नीचे गया और मेरे लंड पर बैठ गया। उसने उसे सहलाया, धीमे, और फिर उँगलियों से उसका आकार नापा — जैसे कुछ तौल रही हो।

“कल रात तूने कहा था कि अब बड़े का नाम भूल गई,” मैंने कहा।

“हाँ,” उसने कहा। “और आज सुबह एक बात और पता चली।”

“क्या?”

“कि मुझे नाप से कोई मतलब नहीं, पर तेरा लंड मुझे घर जैसा लगता है।” वो मुस्कुराई। “भरा हुआ, पर दर्द नहीं। ज़्यादा नहीं, कम नहीं।”

मैंने उसकी कमर पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींचा। पानी दोनों तरफ़ बहा। मैंने उसके दूध पकड़े — पानी में वो और भारी लगे, और उनका वज़न हथेली पर फैल गया। मैंने उन्हें दबाया और वो आगे झुक गई, मेरे मुँह के पास अपना निप्पल ले आई।

मैंने उसे मुँह में लिया। पानी की वजह से कपड़ा नहीं, सीधा मांस — और स्वाद नमकीन था। मैंने चूसा और वो मेरे बालों में हाथ डालकर मेरा सिर दबाने लगी।

“हाँ,” वो फुसफुसाई। “आज ज़ोर से चूस। आज दर्द कर।”

मैंने दाँत लगाए। उसने तेज़ साँस ली, पर पीछे नहीं हटी। मैंने निप्पल को दाँतों के बीच पकड़कर खींचा और वो कराही। फिर दूसरा। फिर दोनों को हाथों से मिलाकर दबाया, ऊपर उठाया, छोड़ा — पानी में छपाक।

उसका हाथ नीचे मेरे लंड पर चलता रहा। फिर उसने उसे पकड़ा और अपनी चूत पर रगड़ा — पानी के नीचे, गरम पानी और उसकी गरमी दोनों। उसने कमर आगे-पीछे की। मैं अंदर जाने वाला था कि उसने हाथ से रोक दिया।

“नहीं,” उसने कहा। “आज पहले मुँह में।”

वो पानी में नीचे बैठ गई — घुटनों के बल, बाथटब के फ़र्श पर, पानी उसकी छाती तक। मेरा लंड पानी से बाहर था और वो उसके सामने।

उसने पहले देखा। फिर दोनों हाथों से पकड़कर धीरे से सहलाया, सिरे को अंगूठे से रगड़ा। एक बूँद निकली और उसने उसे अंगूठे से फैला दिया।

“कल रात से सोच रही हूँ,” उसने कहा। “कि इसे मुँह में कैसे लूँगी।”

“अब पता चलेगा,” मैंने कहा।

वो हँसी और अपना मुँह खोलकर सिरे को अंदर लिया।

गरमी फैली — मुँह की गरमी, पानी की गरमी से अलग। मैंने साँस रोकी। उसने बस सिरा मुँह में रखा और जीभ से उसे छुआ, धीमे, ऊपर-नीचे।

“अच्छा लग रहा है?” उसने मुँह से निकालकर पूछा।

“बहुत,” मैंने कहा। “और अंदर लो।”

वो फिर झुकी और इस बार ज़्यादा अंदर लिया — आधे तक, फिर और। उसने गला ढीला किया और मुँह से आवाज़ निकली, गीली। उसका हाथ नीचे बाकी हिस्से पर चल रहा था।

मैंने उसके बाल पकड़े — सिर्फ़ पकड़े, खींचा नहीं। उसने आँखें ऊपर उठाकर मुझे देखा, और मुँह भरे हुए भी मुस्कुराई। फिर उसने गति बढ़ाई। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे, होंठ कसे हुए, जीभ नीचे की तरफ़।

मेरे घुटने काँपने लगे। मैंने उसकी गर्दन पर हाथ रखा और धीरे से दबाया, और वो समझ गई — और और अंदर ले लिया। मेरा लंड लगभग पूरा उसके मुँह में था और उसका गला उसे दबा रहा था।

वो निकली, साँस लेने के लिए, और उसके होंठ लाल और गीले थे, ठुड्डी पर लार।

“तेरा लंड मुँह में भर जाता है,” उसने हाँफते हुए कहा। “पूरा अंदर जाता है।”

“और तुम्हें अच्छा लगता है,” मैंने कहा।

“हाँ,” उसने कहा, बिना शरम के। “बहुत अच्छा लगता है।”

उसने फिर मुँह में लिया। इस बार वो तेज़ चलने लगी, अपनी लय में, और एक हाथ से मेरी गांड पकड़ ली। मैंने उसका सिर दोनों हाथों में ले लिया और उसकी लय के साथ अपनी कमर हिलाने लगा — हल्के धक्के, मुँह के अंदर।

वो कराह रही थी, और कराह उसके गले से आती हुई मेरे लंड पर कंपन बनकर पहुँच रही थी।

“निकल जाऊँगा,” मैंने कहा।

उसने मुँह से निकाला, मुझे देखा और बोली, “निकलो। पर अंदर।”

“मुँह में?”

“मुँह में,” उसने कहा और फिर से ले लिया।

मैंने उसका सिर पकड़ा और तेज़ धक्के दिए — तीन, चार, और फिर मैं टूट गया। मैंने उसके मुँह में छोड़ा और वो रुकी नहीं। निगलती रही, गला हिलता रहा, और एक बूँद उसके होंठ से फिसलकर ठुड्डी पर आ गई।

वो धीरे से निकली, मुँह पोंछा और ऊपर देखकर हँसी।

“पाँच पॉइंट दो,” उसने कहा। “मुँह में भी पूरा।”

हम बाथटब से निकले और उसने तौलिया लपेट लिया। फिर थैले से तेल की बोतल निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

“अब?” उसने पूछा।

“अब,” मैंने कहा।

उसने तौलिया खोला और बिस्तर पर पेट के बल लेट गई। फिर कमर के नीचे तकिया रखकर अपनी गांड ऊपर उठा ली। भारी, गोल, दोनों तरफ़ फैली — और इस पोज़ में और भी बड़ी दिख रही थी।

मैंने तेल हाथ में लिया और गरम किया। फिर उसकी गांड पर हाथ रखा और फैलाया। उसने साँस भरी।

“ठंडा है?” मैंने पूछा।

“नहीं,” उसने कहा। “बस… अजीब है। पहली बार है।”

“पहली बार?” मैंने रुककर पूछा।

“हाँ,” उसने कहा, चेहरा तकिये में। “जुल्फी ने कभी नहीं किया। उसे लगता है गंदा है।”

मैंने झुककर उसकी गांड पर होंठ रखे — बिना किसी जल्दी के, बस एक चुंबन। वो काँपी।

“गंदा नहीं है,” मैंने कहा। “आपकी गांड सबसे सुंदर हिस्सा है।”

उसने हँसी, फिर हँसी दब गई जब मैंने तेल वाली उँगली उसके छेद पर रखी।

मैंने पहले बस दबाया। गोल घुमाया। उसने कमर हिलाई। फिर मैंने उँगली धीरे से अंदर डाली — बस पहला पोर। वो कस गई।

“साँस लो,” मैंने कहा। “छोड़ो।”

उसने साँस ली और छोड़ी, और मैंने उँगली थोड़ी और अंदर की। फिर अंदर-बाहर करने लगा — धीमे, तेल से चिकना। उसकी गांड के दोनों पाट मेरी हथेली से चिपके हुए थे।

“दर्द?” मैंने पूछा।

“जलन है,” उसने कहा। “पर अच्छी जलन है।”

मैंने दूसरी उँगली जोड़ी। इस बार उसने खुद कमर उठाई और उँगलियाँ अंदर चली गईं। वो कराही। मैंने दोनों उँगलियों को अंदर-बाहर करना शुरू किया, और अंगूठे से नीचे उसकी चूत सहलाता रहा, जो पहले से गीली थी।

कुछ मिनट बाद उसकी गांड ढीली हुई और उसकी साँस भारी हो गई। उसने कमर और ऊपर उठाई।

“अब,” उसने कहा। “अब लंड।”

मैंने तेल अपने लंड पर लगाया — खूब लगाया, फिर सिरा उसके छेद पर रखा।

“धीरे,” उसने कहा।

“बहुत धीरे,” मैंने कहा।

मैंने दबाया। छेद ने रोका। मैंने दबाया और रुका, फिर और दबाया। और फिर सिरा अंदर चला गया।

उसने आवाज़ निकाली — लंबी, ऊँची, जैसे कुछ चीर रहा हो। मैं पूरी तरह रुक गया।

“रुको,” उसने कहा। “बस रुको।”

मैं रुका। बस सिरा अंदर था और उसकी गांड उसे पकड़े हुए थी। मैंने उसकी कमर सहलाई, पीठ पर हाथ फेरा, और धीरे से बोला, “साँस लो, नूर। धीरे-धीरे।”

उसने साँस ली, छोड़ी, ली, छोड़ी। तीन बार। फिर बोली, “थोड़ा और।”

मैंने थोड़ा और डाला। आधा। फिर रुका। फिर और।

पूरा अंदर जाने में लगभग दो मिनट लगे। जब पूरा अंदर गया, तो मेरी जांघें उसकी गांड से चिपक गईं और उसने तकिये में मुँह दबाकर एक लंबी साँस छोड़ी।

“पूरा है?” उसने पूछा।

“पूरा,” मैंने कहा।

“बहुत भरा हुआ है,” उसने कहा। “पेट तक लग रहा है।”

मैंने बहुत धीमे से हिलना शुरू किया। पहले सिर्फ़ एक इंच बाहर, फिर वापस। गांड चूत से ज़्यादा टाइट है, और हर बाहर निकलने पर वो मेरे लंड को पकड़कर खींचती है।

उसने हाथ पीछे किया और मेरी जांघ पकड़ ली।

“अच्छा लग रहा है,” उसने कहा। “अजीब, पर अच्छा।”

“और चाहिए?”

“हाँ। थोड़ा और।”

मैंने गति बढ़ाई — अब पूरा बाहर नहीं, आधे तक, और धक्के लंबे। उसकी गांड हर धक्के पर फैलती और वापस आती। मैंने तेल और डाला — लंड पर, छेद पर — और आवाज़ आने लगी, चिकनी, गीली।

उसकी गांड पर हर धक्के पर ताली जैसी आवाज़ होती थी और वो हर बार हल्की चीखती थी, पर मना नहीं करती थी।

“और,” उसने कहा। “और ज़ोर।”

“दर्द नहीं होगा?”

“जो होगा देख लेंगे,” उसने कहा। “अब और ज़ोर।”

मैंने ज़ोर लगाया। उसकी गांड मेरे धक्कों से हिलने लगी, पूरी, और उसके दूध तकिये से रगड़ खा रहे थे। मैंने एक हाथ नीचे ले जाकर उसकी चूत पर रखा और उँगलियों से वो दाना दबाया। उसने पूरा शरीर झटके से उठाया।

“ओह…” वो चीखी। “वहाँ भी?”

“वहाँ भी,” मैंने कहा, और दबाता रहा।

अब वो लगातार कराह रही थी — शब्द नहीं, बस आवाज़ें। उसकी गांड लय में सिकुड़ रही थी, मेरे लंड को दबा रही थी। मैंने अपनी गति उसकी सिकुड़न के साथ मिला दी।

“साहिल…” वो हाँफी। “मैं… गांड से आ रही हूँ।”

“आ जाओ,” मैंने कहा और ज़ोर बढ़ाया।

वो चीखी और उसका शरीर अकड़ गया — पूरी पीठ मेहराब की तरह उठ गई, और उसकी गांड ने मेरे लंड को लगातार पकड़ा, छोड़ा, पकड़ा, छोड़ा। उसकी चूत से पानी निकलकर मेरी उँगलियों पर आ गया।

वो ढह गई — चेहरा तकिये में, साँस फटी हुई।

मैं अंदर ही रुका रहा, और धीरे-धीरे उसकी साँस के साथ हल्का हिलता रहा। एक मिनट बाद उसने चेहरा घुमाया, आँखें बंद, और बोली, “निकालो धीरे से।”

मैंने बहुत धीरे से निकाला। जब पूरा बाहर आया तो उसने लंबी साँस छोड़ी और करवट ले ली।

“अब कुछ नहीं,” उसने कहा। “अब बस लेटने दो।”

मैं उसके पास लेट गया और उसकी पीठ सहलाने लगा। वो मेरी तरफ़ मुड़ी और मेरी छाती में मुँह दबाकर हँसी।

“पहली बार में ही गांड से आ गई,” वो बोली। “यह कैसे हुआ?”

“क्योंकि तुमने खुद कहा कि और ज़ोर,” मैंने कहा।

“और तूने चूत भी साथ में दबाई।” उसने मेरी छाती में हल्का सा काटा। “तू चालाक है।”

“तुमने कहा था शादीशुदा लोग जो करते हैं वो चाहिए,” मैंने कहा। “यह भी वही है।”

वो हँसी और मेरे ऊपर पैर चढ़ा दिया।

आधे घंटे बाद उसकी साँस सामान्य हुई और वो उठकर बैठी। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे लंड की तरफ़, जो अभी भी गीला और आधा खड़ा था।

“यह अभी भी खड़ा है,” उसने कहा।

“तुम्हारे सामने रहता हूँ,” मैंने कहा।

वो मेरे ऊपर चढ़ आई और मुझे चूमा। फिर उसने अपनी कमर उठाई, मेरे लंड को पकड़ा और अपनी चूत पर रखा।

“अब यहाँ,” उसने कहा। “धीरे से।”

मैंने उसे अपनी तरफ़ खींचा और वो अंदर आ गया — आसानी से, क्योंकि वो पूरी गीली थी। वो मेरे ऊपर बैठकर हिलने लगी, धीमे, आँखें खुली, मुझे देखती हुई।

“मुझे यह पोज़ पसंद है,” उसने कहा। “क्योंकि इसमें मैं तुझे देख सकती हूँ।”

“और मैं तुम्हें,” मैंने कहा, और उसके दूध पकड़े।

वो हँसी और तेज़ हो गई। उसकी गांड मेरी जांघों पर पटक रही थी और उसकी चूत मेरे लंड को लगातार दबा रही थी। मैंने उसकी कमर पकड़कर मदद की, ऊपर-नीचे।

वो जल्दी ही फिर काँपने लगी। तीसरी बार उसके शरीर ने पहले से ज़्यादा देर ली, पर जब आई तो पूरी तरह आई — वो मेरे ऊपर ढह गई, मेरी गर्दन में चीखी, और उसकी चूत ने मेरे लंड को लय में निचोड़ा।

मैंने उसके साथ ही छोड़ दिया — गहरे, बार-बार, उसके अंदर।

फिर हम दोनों हिलने की हालत में नहीं थे। वो मेरे ऊपर पड़ी रही, मेरा लंड अंदर ही, और हमारी साँसें धीरे-धीरे साथ चलीं।

“अब सच में मर गई,” वो बोली।

“मैं भी,” मैंने कहा।

शाम को हमने कमरे में खाना मँगाया। वो मेरी कमीज़ पहनकर बैठी, बाल गीले, चेहरा शांत। खाना खाते वक़्त वो कुछ देर चुप रही, फिर बोली:

“साहिल, एक बात पूछूँ, और सच बताना?”

“पूछो।”

“तेरे साथ यह सब… सिर्फ़ यह सब है? या कुछ और भी है?”

मैंने काँटा रख दिया। “तुम्हें क्या लगता है?”

“मुझे लगता है कि और है,” उसने कहा। “क्योंकि तू मेरे दूध देखकर पागल नहीं होता, मेरी गांड देखकर भी नहीं। तू मेरी बात सुनता है। तूने कल रात पूछा कि डर लग रहा है क्या। आज तीन बार पूछा कि दर्द तो नहीं। कोई सिर्फ़ चोदने वाला यह नहीं पूछता।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा। “और है,” मैंने कहा। “बहुत है।”

उसने आँखें नीची कर लीं। “मुझे डर है कि यह सिर्फ़ दो दिन का नहीं रहेगा, और फिर मुझे घर में ऐसे जीना पड़ेगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं।”

“तो हम इसे दो दिन का नहीं रहने देंगे,” मैंने कहा।

“कैसे? जुल्फी कल रात लौट रहा है।”

“जुल्फी कल रात लौट रहा है,” मैंने दोहराया। “पर जुल्फी दिन में ऑफ़िस जाता है, और तुम दिन में स्टूडियो। हम दोपहर में मिलेंगे। हफ़्ते में दो बार, तीन बार।”

“और रातें?”

“रातें फ़ोन पर,” मैंने कहा। “जब वो सो जाए।”

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, “और अगर पकड़े गए?”

“तब देखा जाएगा,” मैंने कहा। “पर पकड़े जाने से पहले हम जी लेंगे।”

उसने हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ा और उँगलियाँ फँसा दीं।

“ठीक है,” उसने कहा।

रात नौ बजे उसका फ़ोन बजा। स्क्रीन पर नाम था — “जुल्फी”।

वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई और फ़ोन उठाया।

“हाँ जी?” उसकी आवाज़ बिल्कुल बदल गई — घर वाली आवाज़। “हाँ, घर पर हूँ। खाना बना है। तुम कब पहुँच रहे हो?… ठीक है, आ जाओ… हाँ, ठीक हूँ। बस थकान है।”

कॉल काटकर उसने फ़ोन नीचे रखा और लंबी साँस छोड़ी।

“बस,” उसने कहा। “अब नूर बानो, जुल्फी की बीवी।”

“और साहिल की क्या?” मैंने पूछा।

वो मेरे पास आई और मेरी गोद में बैठ गई। “साहिल की नूर बानो सुबह दो बजे से मिलेगी।”

वो ग्यारह बजे तक रुकी। जाते वक़्त उसने मेरी कमीज़ उतारकर मुझे दे दी — यानी यह भी उसके पास जानी थी, मेरी खुशबू के साथ, जुल्फी के घर में।

दरवाज़े पर वो रुकी और बोली, “साहिल, कल सुबह तेरे पास एक मैसेज होगा। उसे पढ़कर मुस्कुराना, पर जवाब देना जब मैं लिखूँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि सुबह जुल्फी घर में होगा,” उसने कहा। “और मैं उसके सामने फ़ोन देखकर मुस्कुरा नहीं सकती।”

उस रात डेढ़ बजे मैसेज आया: “वो सो गया। दो मिनट में कॉल करती हूँ।”

कॉल आया और उसकी आवाज़ धीमी थी, दबी हुई — बाथरूम से, पानी चलाकर।

“सुन रहा है?” उसने पूछा।

“सुन रहा हूँ।”

“आज उसने मुझे गले नहीं लगाया,” उसने कहा। “बस बैग रखा, खाना खाया, टीवी देखा, सो गया। और मैं पूरी रात सोचती रही कि तेरी जांघें कैसी थीं।”

“मेरी जांघें?”

“हाँ,” उसने कहा। “जब तू मेरे पीछे था, तेरी जांघें मेरी गांड से चिपकी थीं। वो एहसास याद है।”

वो फुसफुसा रही थी और मैं छत को देख रहा था।

“कल कहाँ?” मैंने पूछा।

“कल नहीं,” उसने कहा। “कल वो घर पर रहेगा, रविवार है। परसों दोपहर।”

“परसों,” मैंने दोहराया।

“और साहिल — मुझे एक चीज़ चाहिए।”

“क्या?”

“जब हम मिलें, तो मुझे पहले कपड़ों के साथ चूमना। जूते भी उतारे बिना। दरवाज़े पर ही। मुझे वो चाहिए — कि कोई मेरे लिए इतना बेसब्र हो कि कमरे तक भी न ले जाए।”

“ठीक है,” मैंने कहा।

“और एक बात,” उसने कहा। “मैंने स्टूडियो में एक लड़की को बता दिया है।”

“क्या बता दिया?”

“कि मैं किसी से मिल रही हूँ। नाम नहीं लिया। पर उसने पूछा कि कैसा है, तो मैंने कहा — ‘अच्छा है।’ बस।”

“और तुम्हें अच्छा लगा बताकर?”

“हाँ,” उसने कहा। “अब यह सिर्फ़ हमारे बीच नहीं है। दुनिया में एक औरत जानती है।”

रविवार को हमने दिन में तीन बार बात की — छोटी-छोटी बातें, कुछ नहीं। फिर शाम छह बजे उसने लिखा:

“वो नहा रहा है। मैं रसोई में हूँ।”

“क्या बना रही हो?”

“कुछ नहीं। बस खड़ी हूँ। साहिल, मुझे तेरी याद आ रही है।”

“परसों तक?”

“परसों तक नहीं रुक पाऊँगी।”

“तो कल?”

“कल दो बजे। मैं बहाना बना लूँगी।”

सोमवार दोपहर दो बजे मैंने दरवाज़ा खोला, और वो खड़ी थी — ऑफ़िस के कपड़ों में, हल्का मेकअप, हाथ में लंच बॉक्स।

“स्टूडियो से छूटी,” उसने कहा, “और घर नहीं गई।”

मैंने उसे अंदर खींचा और दरवाज़े पर ही उसके होंठों पर हमला कर दिया। जूते उतारे बिना। बैग उसके हाथ से फ़र्श पर गिरा। उसने मेरी गर्दन में हाथ डाल दिए और मेरे मुँह में जीभ डाल दी, और दरवाज़ा अभी पूरा बंद भी नहीं हुआ था।

मैंने उसे दीवार से टिका दिया। उसका सिर दीवार से टकराया और वो हँसी, फिर हँसी मेरे होंठों में दब गई।

“जूते,” वो हाँफी। “जूते निकाल दो।”

“बाद में,” मैंने कहा।

“नहीं, अभी,” उसने कहा। “क्योंकि मैं तुझे अभी चाहती हूँ और जूतों में खड़ी नहीं रह सकती।”

मैंने घुटनों के बल बैठकर उसके जूते निकाले, फिर उसकी एड़ियाँ चूमीं। वो दीवार से टिकी, ऊपर देखती हुई, और उसकी साँस तेज़ थी।

फिर मैं खड़ा हुआ और उसने खुद अपनी कमीज़ के बटन खोले — एक-एक करके, मुझे देखते हुए। जब सब खुल गए, उसने कमीज़ उतारकर फ़र्श पर गिरा दी, और मेरी तरफ़ देखकर बोली:

“आज जल्दी मत करना। आज मुझे सब कुछ याद रखना है।”

हम फ़र्श पर ही बैठ गए — दरवाज़े के पास, कालीन पर। वो मेरी गोद में बैठी और हम चूमते रहे। मैंने उसका ब्रा खोला और उसके दूध बाहर आ गए और मैंने उन्हें दोनों हाथों में भरकर दबाया।

वो कराही और मेरे होंठों को छोड़कर पीछे झुकी, अपने दूध मेरे मुँह के सामने ले आई।

“चूसो,” उसने कहा।

मैंने चूसा। वो मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर दबाने लगी। फिर उसने अपनी स्कर्ट उठाई और मेरा हाथ अंदर ले गई — पैंटी के ऊपर से ही।

“देखो कितनी गीली हूँ,” उसने कहा। “सिर्फ़ तेरे होने से।”

मैंने पैंटी किनारे से खींची और उँगली अंदर डाली। वो पूरी गीली थी, बहुत। मैंने उँगली अंदर-बाहर की और वो मेरी गोद में हिलने लगी।

“अब,” उसने कहा। “अब करो। फ़र्श पर।”

मैंने उसे कालीन पर लिटा दिया और उसकी स्कर्ट कमर तक खींच दी। पैंटी एक तरफ़ करके मैं अंदर गया — एक ही धक्के में, क्योंकि वो तैयार थी।

वो चीखी और उसने अपनी कमर उठा दी।

“हाँ,” वो बोली। “हाँ, साहिल, ऐसे ही।”

फ़र्श पर चुदाई अलग होती है — सख़्त, बिना किसी लचीलेपन के, हर धक्का सीधा। मैंने उसके दोनों हाथ सिर के ऊपर कर दिए और कलाइयाँ पकड़ लीं, और उसके ऊपर झुककर धकेलने लगा।

उसकी चूत से आवाज़ आ रही थी और वो मेरी आँखों में देख रही थी, पलक नहीं झपकाती हुई।

“तू मुझे तोड़ रहा है,” उसने कहा।

“तोड़ दूँ?”

“तोड़ दे,” उसने कहा। “आज तोड़ दे।”

मैंने गति बढ़ाई। उसकी कलाइयाँ मेरे हाथ में थीं और वो उछल रही थी, कालीन पर सरक रही थी। फिर उसने एक हाथ छुड़ाया और मेरी गांड पर हाथ रखकर मुझे और अंदर खींचने लगी।

जब वो आई तो उसने मेरा नाम तीन बार लिया — अलग-अलग तरह से। पहली बार चीख में, दूसरी बार साँस में, तीसरी बार फुसफुसाहट में। और मैं उसके साथ गिर गया।

कुछ देर हम फ़र्श पर पड़े रहे, हाँफते हुए, उसके दूध मेरी छाती से चिपके हुए।

“अब बिस्तर पर चलें,” उसने आख़िर में कहा।

बिस्तर पर वो अपने पेट के बल लेटी और मैंने उसकी पीठ पर होंठ रखे — कंधों से कमर तक, धीमे। फिर उसकी गांड पर। उसने कमर उठाई।

“फिर से?” उसने पूछा।

“तुम्हारी मर्ज़ी,” मैंने कहा।

“फिर से,” उसने कहा। “पर इस बार बहुत धीरे। मुझे लंबा चाहिए।”

मैंने तेल लिया और उसकी गांड तैयार की — उँगलियों से, धीमे, जब तक वो ढीली नहीं हुई। फिर अंदर गया, बहुत धीरे, और उसने साँस छोड़कर आँखें बंद कर लीं।

इस बार गति बहुत धीमी थी — लंबे, सुस्त धक्के, जैसे कोई रात भर चलने वाला हो। वो अपने दूध के नीचे तकिया रखकर लेटी रही और धीरे-धीरे कराहती रही।

बीस मिनट बाद वो फिर आई — इस बार शांत, बिना चीख, बस शरीर का लंबा कंपन और एक टूटी हुई साँस। मैं उसके थोड़ी देर बाद आया।

और फिर वो सच में हिल नहीं सकी। उसने आँखें बंद रखीं और मेरा हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख लिया।

“कुछ मत कहना,” उसने कहा। “बस यहीं रहना।”

हम एक घंटा ऐसे पड़े रहे।

जब वो उठी, तो पाँच बज रहे थे। उसने कपड़े पहने — धीरे-धीरे, बिना जल्दी के — और फिर मेरे सामने खड़ी होकर मेरे बाल पीछे किए।

“छह बजे तक घर पहुँचना है,” उसने कहा। “कहूँगी कि स्टूडियो में देर हो गई।”

“और आज रात?”

“आज रात,” उसने कहा, “मैं तुझे फ़ोन करूँगी, और तू मुझे सुनाना कि आज तूने क्या किया। एक-एक चीज़।”

वो दरवाज़े तक गई, फिर रुकी, और मुड़कर मुझे देखा।

“साहिल,” उसने कहा। “मैं अब घर में ठीक से रह नहीं पा रही।”

“कैसे?”

“कल रात खाना बनाते वक़्त मैंने सोचा कि तेरे हाथ कैसे हैं। टीवी देखते वक़्त सोचा कि तेरी आवाज़ कैसी है। जब वो मेरे पास आया, तो मैंने आँखें बंद कर लीं और तेरा चेहरा देखा।” वो रुकी। “यह ठीक है?”

“यह ठीक नहीं,” मैंने कहा। “यह बहुत अच्छा है।”

वो हँसी और चली गई।

उस रात डेढ़ बजे फ़ोन आया।

“सो गए?” उसकी आवाज़ दबी हुई थी।

“नहीं।”

“आज फ़र्श वाला हिस्सा याद है?”

“हर हिस्सा याद है,” मैंने कहा।

“मुझे भी,” उसने कहा। “और साहिल, मुझे एक नई चीज़ चाहिए।”

“क्या?”

“एक रात,” उसने कहा। “पूरी रात। न दो घंटे, न चार। पूरी रात — सोने के साथ। जागने के साथ। सुबह उठकर फिर।”

“जुल्फी?”

“अगले महीने उसका ऑफ़िस टूर है,” उसने कहा। “चार दिन।”

“चार दिन,” मैंने दोहराया।

“चार दिन,” उसने कहा। “और साहिल, इस बार मैं कुछ और माँगूँगी — जो अभी तक नहीं माँगा।”

“क्या?”

“जब मिलेंगे तब बताऊँगी,” उसने कहा। “पर डरना मत।”

वो हँसी और फिर गंभीर हो गई।

“साहिल, एक बात। आज दिन में एक पल आया जब मुझे लगा कि सब पकड़ा जाएगा। उसका फ़ोन आया और मैं तेरे बिस्तर पर थी। मैंने फ़ोन काट दिया और झूठ बोला। और झूठ बोलते वक़्त मेरा दिल नहीं धड़का।”

“तो?”

“तो मतलब यह सच है,” उसने कहा। “झूठ जब बिना डर के बोला जाए, तो सच बड़ा हो चुका होता है।”

वो चुप हुई। फिर बोली, “चार दिन का इंतज़ार करेगा?”

“करूँगा।”

“अच्छा लड़का,” उसने कहा, और फ़ोन काट दिया।

मैं छत पर गया। तारे उस रात ज़्यादा चमकीले लग रहे थे, या शायद मैं ज़्यादा देख रहा था।

चार दिन। और एक औरत जो अब घर में ठीक से रह नहीं पा रही।

मुझे पता था कि आगे कुछ टूटेगा — कुछ पकड़ा जाएगा, कुछ कहा जाएगा, और शायद कुछ छूटेगा भी। पर उस वक़्त, छत पर खड़े हुए, मुझे सिर्फ़ एक बात महसूस हो रही थी — कि उसने कहा था “पर डरना मत”, और मैं डर नहीं रहा था।

अगले हिस्से में: चार दिन, एक लंबी रात, वो चीज़ जो नूर बानो ने माँगी — और चौथे दिन की सुबह, जब जुल्फी ने लौटकर एक ऐसा सवाल पूछा जिसका जवाब नूर बानो के पास नहीं था।

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नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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