brother sister sex story
मई, 2005। जयपुर में गर्मी अपने पूरे ज़ोर पर थी।
एक दोपहर माँ ने चाय की ट्रे रखते हुए बहुत हल्के लहजे में कहा — “काशिश, अजमेर से रिश्ता आया है।”
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे बहन की ख़ुशी के लिए ग्रुप में चुदवाया
काशिश के हाथ से कप फिसल गया। चाय मेज़ पर फैल गई।
“कौन?” मैंने पूछा, आवाज़ को जितना सामान्य रख सका, रखा।
“शर्मा जी के देवर का लड़का। इंजीनियर है, अजमेर में सरकारी नौकरी। उम्र छब्बीस। घर अच्छा है, लड़का सीधा है।” माँ ने काशिश की तरफ़ देखा। “बड़ा अच्छा रिश्ता है बेटा।”
काशिश कुछ नहीं बोली। बस कप रखा और उठ कर अपने कमरे में चली गई। सीढ़ियों पर उसके पाँव की आवाज़ सुन कर माँ ने मुझे देखा।
“कुछ बोली नहीं,” माँ ने कहा।
“शायद सोच रही है,” मैंने कहा।
“हूँ,” माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो ‘हूँ’ था जिसमें पूरा इतिहास छिपा होता है।
रात ग्यारह बजे काशिश मेरे कमरे में आई। दरवाज़ा बंद किया, चाबी घुमाई, और बिना कुछ कहे बेड पर बैठ गई। उसने सलवार-कुर्ता पहना था, बाल खुले, और चेहरे पर वो थकान थी जो सोचने से आती है।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“तू जानता है क्या हुआ।”
“रिश्ता।”
“हाँ।”
“तो?”
काशिश ने मेरी तरफ़ देखा। आँखें चमक रही थीं, पर आँसू नहीं गिरे — वो अब रोने वाली उम्र नहीं थी।
“राकेश,” वो बोली, “अगर मेरी शादी हो गई, तो ये सब बंद हो जाएगा?”
और मैं चुप हो गया।
यह सवाल मैंने ख़ुद से कभी नहीं पूछा था, क्योंकि जवाब डरावना था। दो साल से हम जो कर रहे थे, वो हमने “आज” में जिया था। “कल” की फ़िक्र नहीं की थी। और अब “कल” सामने खड़ा था — अजमेर के एक इंजीनियर की शक्ल में।
“बंद क्यों होगा?” मैंने आख़िर कहा।
“क्योंकि शादी के बाद औरत अपने पति के घर चली जाती है। और भाई से मिलने आएगी तो दो दिन के लिए। और उन दो दिनों में क्या होगा — भाई-बहन वाली चाय? या ये?” उसने अपने सलवार की तरफ़ इशारा किया।
“तेरी मर्ज़ी,” मैंने कहा।
“मेरी मर्ज़ी?” वो उठ खड़ी हुई। कमरे में पंखा घूम रहा था, बाहर गली का कुत्ता भौंक रहा था, और वो मेरे सामने खड़ी थी — आँखों में पूरा जयपुर। “तूने कभी सोचा कि तू मुझसे शादी कर ले?”
पंखे की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई।
“भाई-बहन की शादी?” मैंने कहा, बेवकूफ़ों की तरह।
“कज़न वाली नहीं, भाई-बहन वाली। कानून में कोई रोक नहीं है। हिंदू मैरिज एक्ट में भी नहीं। बस लोगों को बताना पड़ेगा — और लोगों को क्या? मौसी, बुआ, चाचा, सब पहले ही शक कर रहे हैं। जब तू मुझे देखता है तो आँखें बदल जाती हैं। जब मैं तुझे देखती हूँ तो आँखें बदल जाती हैं। माँ तो तीन महीने से बस ‘हूँ’ कह रही हैं।”
मैंने हाथ बढ़ाया और उसे अपनी तरफ़ खींचा। वो मेरी गोद में बैठ गई — पूरा वज़न मुझ पर, बाल मेरे चेहरे पर।
मैंने उसकी गर्दन में मुँह रख कर कहा, “तो तू ये सब इसलिए कर रही थी? मुझे फँसाने के लिए?”
“हाँ,” उसने कहा, बिना झिझक। “दो साल से फँसा रही हूँ। और तू फँसा ही नहीं।”
“अब फँस गया।”
वो हँसी — उस रात की पहली हँसी। फिर उसने मेरे होंठ काटे और बोली, “अभी फँसा है, ये साबित करना पड़ेगा।”
“कैसे?”
“घर में शादी की बात उठा। माँ से कह दे कि जब तक शादी नहीं होती, तब तक जो चाहे।”
“और तुझे क्या चाहिए?”
उसने मेरे कान में फुसफुसाया — बहुत धीरे, जैसे कोई राज़ दे रही हो।
“पाँच।”
“पाँच कौन?”
“तेरे चार दोस्त। और तू।” वो पीछे हुई और मुझे सीधे देखा। “और इस बार पूरा हिसाब। इस बार तू बस देखता नहीं रहेगा।”
और उस रात उसने मुझे तीन बार चुदवाया — पहले बेड पर, फिर बाथरूम में, फिर बेड पर वापस — और हर बार वो ऊपर थी, और हर बार वो मेरी छाती पर हाथ रख कर मुझे देखती रही, जैसे कोई मुहर लगा रही हो।
अगले हफ़्ते उसने नाम पूछा।
“चार तो तय हैं,” उसने कहा, कॉफ़ी पीते हुए, “आकाश, विक्रम, समर सर… और एक तू। तो पाँचवाँ कौन?”
“तू बता,” मैंने कहा।
“मैंने सोच लिया है।” उसने कप रखा। “जतिन।”
जतिन सिंह — मेरा जिम ट्रेनर। इकतीस साल, छह फुट दो इंच, सरदार, कंधे दरवाज़े से भरे हुए, बाजू मेरी जाँघ जितनी मोटी। जब वो वेट उठाता है तो पूरा जिम रुक कर देखता है। और उसका लंड — सात इंच का, लेकिन मोटाई में किसी की भी कलाई जितना। जिम में लड़के मज़ाक करते हैं, “जतिन भाई, तू कसरत करता है या हथौड़ा ढोता है?”
“जतिन को तूने कब देखा?” मैंने पूछा।
“पिछले महीने जब तू मुझे जिम ले गया था। वो बेंच पर लेटा था, और उसकी पैंट में…” वो रुकी, “…भाई, तू ख़ुद जानता है।”
“और उसने तुझे देखा?”
“उसने दो बार देखा,” काशिश ने कहा, “और दोनों बार मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे तोल रहा हो।”
“और?”
“और मैंने तेरे सामने ही उसकी तरफ़ देख कर मुस्कुरा दिया।”
तो तय हुआ। पाँच।
और उसके बाद काशिश ने एक चीज़ शुरू की जो मुझे बहुत पसंद आई — उसने अपने फ़ोन में एक नोट बनाया। नाम: “हिसाब।” उसमें तारीख़ें लिखती, कौन, कहाँ, कितनी बार। जब मैंने पूछा तो बोली, “बूढ़ी हो कर बैठूँगी तो पढ़ूँगी। और मज़ा आएगा।”
उस साल उसके नोट में तेरह लाइनें जुड़ीं। तेरह बार, तेरह तारीख़ें, और हर लाइन में सिर्फ़ मेरा नाम।
“तेरे अलावा कोई नहीं आया इस साल?” मैंने पूछा।
“तेरे अलावा किसी की ज़रूरत नहीं पड़ी,” उसने कहा, और यह बात उसने बहुत साधारण लहजे में कही — जैसे कोई रोज़ की बात हो।
चार फरवरी, दो हज़ार उनतीस। काशिश इक्कीस की।
इस बार उसने शर्त रखी — “घर में नहीं। जयपुर में नहीं। बाहर।”
तो हम गोवा गए। पहली बार हवाई जहाज़। काशिश खिड़की के पास बैठी और नीचे बादल देख कर बच्चों जैसे चहकी, और फिर मेरे कान में फुसफुसाई, “राकेश, अगर ये जहाज़ अभी गिर जाए, तो मैं अधूरी मरूँगी।”
“क्यों?”
“क्योंकि अभी पाँच बाक़ी हैं।”
चार दिन का ट्रिप। एक विला बुक किया — बाग़ के बीच, निजी पूल, बड़ा बेडरूम, ऊँची छत, और छत पर झूला। हम पाँच गए। आकाश, विक्रम, समर, जतिन — और मैं।
जतिन जब विला के दरवाज़े से अंदर आया, तो पूरा दरवाज़ा भर गया। वो सफ़ेद टीशर्ट में था और टीशर्ट के नीचे सब कुछ साफ़ दिख रहा था — छाती, बाजू, पेट, और पैंट में उभार। काशिश ने उसे देखा और फिर मेरी तरफ़ देख कर होंठ दबा लिए।
“काशिश,” जतिन ने कहा, आवाज़ भारी, “तुम तो हर साल और हसीन हो रही हो।”
“आप भी,” काशिश ने कहा, “हर साल और बड़े हो रहे हो।”
“बड़ा तो हूँ ही,” जतिन बोला, और ये बात इतनी सीधी कही कि चारों हँस पड़े।
पहला दिन बीच पर गया। काशिश ने सफ़ेद ड्रेस पहना था — बिना आस्तीन, गहरे कट का, और हवा में उड़ता हुआ। बाल खुले, काजल, होंठ गुलाबी। और जब वो समंदर के किनारे खड़ी हुई, तो पाँच आदमियों की आँखें उस पर टिक गईं — और वो जानती थी, और उसने किसी की नज़र हटाने की कोशिश नहीं की।
दूसरे दिन पूल। काशिश ने लाल बिकिनी पहनी। जब वो पूल के किनारे आई, तो कमरे में कोई नहीं बोला। उसकी कमर, उसकी गाँड, उसके दूध — बिकिनी में सब वैसे ही उभरे हुए जैसे किसी मूर्ति में।
“क्या देख रहे हो सब?” उसने पूछा।
“तुझे,” समर ने कहा।
“तो देखो,” वो बोली, और पूल में छलाँग लगा दी।
तीसरी रात। बारह बजे। सब नहा-धो कर आए। आकाश और विक्रम ने बीयर खोली, समर ने म्यूज़िक लगाया, जतिन पूल के किनारे बैठा था और उसके पैर पानी में थे।
काशिश आई — बिकिनी के ऊपर सिर्फ़ एक पतली शर्ट, जिसके बटन खुले थे। शर्ट भीगी थी। उसने सबको देखा और मुस्कुरा दी।
“आज पूल में,” उसने कहा।
“सब?” जतिन ने पूछा।
“पहले एक,” काशिश बोली, और मेरी तरफ़ देखा।
मैं उसके पीछे पानी में उतरा। पानी कमर तक था, गरम। उसने मेरी गर्दन में हाथ डाले और मुझसे चिपक गई — पूरा भीगा बदन, पानी में भारहीन, पर दबाव वैसा ही। उसके दूध मेरी छाती से दबे, और ठंडे पानी से उसके निप्पल कड़े हो कर मेरे सीने पर चुभ रहे थे।
“पहले यहाँ,” उसने कहा।
मैंने उसकी बिकिनी की नाड़ खोली और नीचे की चीज़ पानी में ही खींच दी। वो मेरे कंधों पर टाँगें डाल कर लटक गई। पानी की वजह से सब हल्का था — मैंने लंड निकाला, टिप रखी, और धीरे-धीरे उसके अंदर डाल दिया।
पानी के अंदर चुदाई का अपना ही मज़ा है। उसकी बुर पानी से भीगी थी और अंदर गरम — ठंडा बाहर, गरम अंदर। उसने मेरी गर्दन कस कर पकड़ ली और होंठ काट लिए, क्योंकि आवाज़ पानी में गूँजती थी।
चारों किनारे खड़े देख रहे थे। जतिन ने बीयर रख दी। समर ने म्यूज़िक धीमा कर दिया।
मैंने उसे पूल के किनारे लगाया — उसकी पीठ टाइल्स पर, और उसने कोहनी टिका कर ख़ुद को सँभाला। फिर मैंने झटके शुरू किए। पानी हमारे बीच फड़फड़ा रहा था। काशिश की कराह पूल की आवाज़ में घुल जाती थी।
दो मिनट में उसने कहा, “अब अंदर चलो। सबको बुला।”
बेडरूम। बड़ा बेड, ऊँची छत, और खिड़की से समंदर की आवाज़। रोशनी बहुत कम — बस एक पीला लैंप और छत के पंखे की परछाईं।
पाँच आदमी कमरे में। एक काशिश।
उसने पहले अपनी शर्ट उतारी, फिर बिकिनी का ऊपरी हिस्सा खोला। दूध बाहर गिरे — भारी, गोल, और निप्पल अब भी कड़े। उसने पैंटी नीचे खींची और फिर पूरी नंगी, बेड के बीच खड़ी हो गई।
“आज कोई नहीं बोलेगा कि क्या करना है,” उसने कहा। “आज मैं बताऊँगी।”
और उसने बताया।
“जतिन, तू पहले। मुझे तेरा मोटा चाहिए।”
जतिन ने शर्ट उतारी। छाती पर बाल, पेट पर लकीरें, और जब उसने पैंट खोली, तो पूरे कमरे ने साँस रोक ली। उसका लंड बाहर आया — मोटा, भारी, नीचे की तरफ़ झूलता हुआ, और इतना मोटा कि काशिश ने पहली बार झिझक दिखाई।
“ये अंदर जाएगा?” उसने पूछा।
“जाएगा,” जतिन बोला। “तू बता, कितना डालूँ।”
काशिश बेड पर पीठ के बल लेटी। टाँगें खोलीं। जतिन ऊपर आया और अपनी टिप रखी। जब वो दबाया, काशिश की साँस फूल गई — क्योंकि मोटाई वहाँ पहुँचते ही रुकावट बनी।
“आराम से,” उसने कहा।
जतिन धीरे-धीरे चला। पहला इंच — काशिश ने चादर मुट्ठी में ली। दूसरा इंच — कराह। तीसरे पर उसने कहा, “और डाल।”
और जतिन ने पूरा डाल दिया।
काशिश चीख पड़ी — “आsshhhhhh!” — और उसकी गाँड बेड से उठ गई। जतिन की मोटाई ने उसकी बुर की हर दीवार को छुआ। वो रुका रहा, हिला नहीं, बस अंदर टिका रहा — और काशिश हाँफती रही।
“बहुत मोटा है,” उसने फुसफुसाया। “भगवान, बहुत मोटा है।”
“अच्छा लग रहा है?” जतिन ने पूछा।
“हाँ,” काशिश ने कहा, और फिर मेरी तरफ़ देख कर बोली, “राकेश, माफ़ करना, पर ये ज़्यादा अच्छा लग रहा है।”
“माफ़ी क्यों,” मैंने कहा। “मैं तो तेरे लिए लाया हूँ।”
जतिन हिलने लगा। धीरे-धीरे, लंबे झटके — हर बार पूरा निकल कर फिर पूरा अंदर। काशिश के दूध ऊपर-नीचे हो रहे थे, और वो हर झटके पर कराह रही थी। आकाश एक तरफ़ बैठ कर उसका दूध दबा रहा था, विक्रम पैर सहला रहा था, समर उसकी गर्दन चूम रहा था।
मैंने आगे बढ़ कर उसका हाथ पकड़ा। उसने उँगलियाँ कस लीं।
पहली बार में जतिन ने उसे कगार तक पहुँचा दिया। काशिश की साँस टूट गई, पेट कसा, और वो चीख पड़ी — “आsshhhhhh राकेश!!!” — और उसका पूरा शरीर झटके खाने लगा। जतिन भी रुक गया, क्योंकि उसकी बुर ने उसे जकड़ लिया था।
“निकल दूँ?” जतिन ने पूछा।
“नहीं,” काशिश ने कहा। “अभी नहीं। बाद में सब अंदर।”
फिर उसने पलट कर घुटनों के बल आने को कहा — और आकाश को पीछे बुलाया।
आकाश उसकी बुर में गया — मोटा, भारी, ऊपर की तरफ़ मुड़ा हुआ। और सामने विक्रम आ गया, जिसका लंबा पतला लंड उसके मुँह में गया। और काशिश ने दोनों हाथों से समर और जतिन को पकड़ लिया।
अब तस्वीर ऐसी थी — काशिश बीच में, चारों तरफ़ से भरी हुई, हर जगह कुछ। उसकी बुर में आकाश, मुँह में विक्रम, दोनों हाथों में समर और जतिन, और मैं पीछे खड़ा उसे देखता हुआ — और वो जानती थी कि मैं देख रहा हूँ, इसलिए वो जान-बूझ कर कराह रही थी, जान-बूझ कर अपनी कमर झुला रही थी, जान-बूझ कर मेरी तरफ़ देख कर हँस रही थी — मुँह भरा हुआ, फिर भी।
आधे घंटे बाद सबने एक-एक बार उसे चोदा। हर बार वो नई मुद्रा माँगती। हर बार वो कहती, “और गहरा,” या “और धीरे,” या “अब वहाँ।” और हर बार, किसी न किसी मोड़ पर, उसका हाथ मेरा पकड़ा हुआ रहता।
फिर आया वो हिस्सा जिसे उसने ख़ुद माँगा।
“समर सर, आप बुर में,” उसने कहा। “और विक्रम, तू पीछे।”
“दोनों?” विक्रम ने कहा।
“दोनों,” काशिश ने कहा। “पिछले साल जो किया था, वो आज फिर करो। और इस बार मैं डरूँगी नहीं।”
समर उसकी बुर में गया। विक्रम ने उसकी गाँड पर लार लगाई, उंगली से खोला, फिर टिप रखी। और धीरे-धीरे अंदर।
काशिश की साँस रुकी। पहला इंच — दाँत भींचे। दूसरा इंच — आँखों में पानी। और फिर वो अंदर गया, और अब उसके अंदर दो लंड थे — एक आगे, एक पीछे, बीच में सिर्फ़ एक पतली दीवार।
दोनों ने बारी-बारी से चलना शुरू किया। काशिश की आवाज़ अब लगातार थी — “आ… आ… आ…” — और उसने अपने निप्पल ख़ुद पकड़ कर मसलने शुरू कर दिए, क्योंकि दोनों हाथ ख़ाली थे और कुछ तो करना था।
जतिन और आकाश दोनों तरफ़ बैठ कर उसे देख रहे थे, और जतिन ने कहा, “बाई गॉड, ये लड़की मशीन है।”
“है,” मैंने कहा, और मुझे गर्व हुआ — वैसा गर्व जैसे कोई कहे “देखो, ये मेरी है।”
काशिश दो मिनट में फिर टूटी। इस बार वो चीखी भी नहीं — बस पूरी काँप गई, और उसकी आँखों से आँसू गिर गए। दोनों रुक गए।
“रुक गए क्यों?” उसने आँखें बंद रखते हुए कहा। “चलो।”
“तू रो रही है,” समर ने कहा।
“आँसू अच्छे होते हैं,” काशिश ने कहा। “चलो।”
और वो फिर चले, और उसने दूसरा झुकाव भी लिया — और उस बार उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूल के पानी की आवाज़ भी दब गई।
रात तीन बजे। सब थके हुए। पर किसी ने निकलना नहीं चाहा।
काशिश ने बेड के बीच लेट कर कहा, “अब आख़िरी। और आख़िरी तू करेगा, राकेश।”
“क्यों आख़िरी मैं?”
“क्योंकि मुझे तेरा आख़िर में चाहिए,” उसने कहा, बिना नज़र हटाए। “जैसे हर साल।”
चारों पीछे हट गए। बेड पर बस दो लोग बचे।
मैं उसके ऊपर आया। वो अब बहुत गरम थी, बहुत भीगी, और बहुत ढीली — चारों ने उसे खोल दिया था। मैंने टिप रखी और पूरा अंदर डाल दिया, एक ही झटके में। वो कराही नहीं, बस साँस छोड़ी और मेरी गर्दन पकड़ ली।
“धीरे,” उसने कहा। “आज धीरे कर। आज मुझे तेरा याद रखना है।”
और मैंने धीरे किया। बहुत धीरे। लंबे-लंबे, गहरे झटके — जैसे हम घर में थे, छत पर थे, पहली बार वाली रात में थे। उसने मेरी आँखों में देखा और कुछ नहीं कहा। पीछे चारों चुप थे।
फिर उसने फुसफुसाया, “राकेश, जब शादी होगी, तब भी ये चलेगा न?”
“चलेगा,” मैंने कहा।
“और अगर तेरे बच्चे हो गए?”
“तब भी चलेगा।”
“और अगर मेरे बच्चे हो गए?”
“तब भी।” मैंने उसकी कमर पकड़ कर गहरा डाला और वो सिसकी। “अब बातें बंद कर।”
वो हँसी, फिर कराही, और फिर बस मेरी गर्दन में मुँह दबा कर लगी रही।
जब मैंने छोड़ा, तब वो तीसरी बार आ चुकी थी — और मेरे साथ ही, आख़िरी झटके पर। चारों ने देखा, चारों ने ताली बजाई, और काशिश ने बिना आँखें खोले हाथ उठा कर सबको शांत कर दिया।
उसके अंदर उस रात पाँचों का रस था — जतिन का, आकाश का, विक्रम का, समर का, और मेरा। पाँच, जैसा उसने माँगा था।
उसने आँखें खोलीं और मुझे देखा।
“पूरा हुआ?” उसने पूछा।
“पूरा।”
“अच्छा,” वो बोली, और मुस्कुराई। “अब नोट में लिख दूँगी।”
सुबह पाँच बजे मैं उठा। काशिश मेरी बाँह में सो रही थी — नंगी, थकी, बाल चेहरे पर। बाक़ी चार अलग-अलग कोनों में पड़े थे, कोई खर्राटे ले रहा था, कोई बेड के किनारे लटका हुआ।
मैंने उसे चादर ओढ़ाई और बालकनी में गया। समंदर अब भी वैसा ही था। लहरें आ रही थीं, जा रही थीं, और उन्हें किसी की परवाह नहीं थी।
फिर काशिश पीछे आई। चादर लपेटे हुए। नींद में चलती हुई-सी।
“सो नहीं रही?” मैंने पूछा।
“तेरी बाँह ख़ाली हो गई थी,” उसने कहा, और मेरे पीछे आकर मुझसे चिपक गई। उसने ठुड्डी मेरे कंधे पर रखी और समंदर देखने लगी।
कुछ देर चुप रहे।
फिर उसने कहा — “राकेश।”
“हूँ।”
“अजमेर वाला रिश्ता।”
“क्या?”
“मना कर दे।”
“क्यों?”
उसने मेरी कमर पर हाथ कसा और फुसफुसाई, “क्योंकि अगले साल छह चाहिए। और अगर मैं अजमेर चली गई, तो तू छह कहाँ लाएगा?”
मैं हँसा। फिर मुड़ा और उसे सामने से पकड़ कर अपने सीने से चिपका लिया। समंदर की हवा उसके बालों को उड़ा रही थी।
“ठीक है,” मैंने कहा। “मना कर दूँगा।”
“सिर्फ़ इसलिए नहीं कि छह है,” उसने कहा।
“तो?”
“इसलिए भी कि तू अच्छा है।” उसने मेरी छाती पर सिर रखा। “और इसलिए भी कि तेरा लंड नौ दशमलव सात इंच है।”
“तो सबसे बड़ी वजह यही है।”
“हाँ,” वो बोली, “सबसे बड़ी वजह यही है।” और फिर हँस कर मेरे होंठ चूम लिए।
मेरा नाम राकेश पांडेय है। जयपुर का रहने वाला। अब अट्ठाईस साल का।
और मेरी बहन काशिश पांडेय है। इक्कीस साल की। उसकी बॉडी अब बत्तीस-अट्ठाईस-चौंतीस से 36-32-38 हो चुकी है, और उसके दूध अब और भरे हैं, और उसके निपल्स अब भी वैसे ही कड़े हो जाते हैं जैसे उस पहली रात छत पर हुए थे।
अट्ठारह पर मैंने उसे चोद कर रंडी बनाया।
उन्नीस पर तीन आदमियों ने उसे चोदा।
बीस पर चारों ने एक साथ।
और इक्कीस पर पाँचों ने — और इस बार उसने ख़ुद बताया कि क्या करना है।
उसके फ़ोन के नोट में अब सौ से ज़्यादा लाइनें हैं। और हर लाइन में कहीं न कहीं मेरा नाम है — कभी “अकेले,” कभी “आकाश,” कभी “सब,” और कभी सिर्फ़ एक शब्द, जो वो हर बार लिखती है जब दिन ख़त्म होता है: “राकेश।”
कल रात उसने सोते से पहले कहा —
“अगले साल छह।”
“छह कौन?”
“जतिन का कोई दोस्त,” वो बोली, और फिर रुक कर मेरी तरफ़ मुड़ी। “या फिर कोई ऐसा जो तुझे पसंद हो। क्योंकि अब मुझे तेरे पसंद-नापसंद से मतलब है।”
“और शादी?”
“शादी की बात छोड़ दे।” उसने आँखें बंद कर लीं। “शादी होगी तब देखेंगे। अभी तो हम जवान हैं। और अभी तेरा लंड नौ दशमलव सात इंच ही है।”
और मैंने सोचा — ठीक है।
अगले साल फिर एक तस्वीर बनेगी।
और उसमें काशिश बीच में होगी, और मैं उसका हाथ पकड़े हुए — जैसे हमेशा।
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