सात लोगों से चुदवाकर रंडी बन गयी

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उस शनिवार की सुबह मैं जल्दी उठी। सूरज भी ठीक से नहीं उठा था और मैं रसोई में थी। आज रात सात लोग होंगे — और मैं उन सबकी मेज़बान होने वाली थी। यह सोचकर मेरी बुर में वही पुरानी झुरझुरी दौड़ गई जो चार महीने पहले नीरज को पहली बार देखकर हुई थी।

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे एक दिन ग्रुप में चुदवाते हुए मेरे पति ने पकड़ लिया

रोहन भी जल्दी उठा। वह स्नान करके आया और मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने मेरी कमर पर हाथ रखा और मेरे कंधे पर ठुड्डी टिका दी।

“घबरा रही है?” उसने पूछा।

“थोड़ा,” मैंने कहा।

“क्यों? तू तो सबको जानती है।”

“तुम्हें नहीं जानती,” मैंने कहा। “इस रूप में। आज तुम्हें पहली बार सबके सामने देखूँगी। और पहली बार… तुम किसी और को छुओगे।”

रोहन ने मेरे कान पर चूमा। “डर किस बात का? छह महीने से मेरी बीवी दूसरों के नीचे रह रही है। आज मैं भी थोड़ा हिस्सा लूँगा।”

“और रितिका?” मैंने पूछा।

“वह तेरी दोस्त है,” उसने कहा। “उससे तो डर नहीं।”

“वह बहुत सुंदर है,” मैंने कहा। और यह सच था — और सच यह भी था कि मुझे थोड़ी जलन भी थी। छोटी सी, मीठी सी।

“तो?” रोहन ने कहा। “तू भी सुंदर है। और आज तीन तेरे दोस्त और दो नए लोग तेरे लिए आ रहे हैं। हिसाब तो तेरे पक्ष में है।”

मैं हँस दी और उसने मुझे घुमाकर चूम लिया। लंबा, गहरा, आज की रात का पहला चुम्बन।

दिन भर हमने तैयारी की। मैंने खाना बनाया — पूरा भोज, जैसे कोई त्योहार हो। रोहन ने मदिरा निकाली, गिलास निकाले, और ड्राइंग रूम में लाइट धीमी कर दीं। बेडरूम में हमने बड़ी चादर बिछाई — एक साफ़, नई, जो पहली बार इस्तेमाल होगी। और बेडसाइड पर रख दिए — तेल, तौलिए, पानी, और एक छोटी सी बोतल।

“इतना तेल?” रोहन ने पूछा।

“आज सात लोग हैं,” मैंने कहा। “तेल कम पड़ गया तो बुरा लगेगा।”

वह हँसा। “सही है।”

शाम सात बजे से लोग आने लगे। पहले नीरज, फिर गणेश और सुखप्रीत साथ। फिर कबीर और रितिका। सबने रोहन से हाथ मिलाया — और मैंने देखा कि रोहन किस तरह सबको गले लगा रहा है, किस तरह सबको बैठा रहा है, किस तरह सबको चाय पिला रहा है। जैसे वह मेज़बान हो, और सब उसके घर आए हों। और वह था भी। यह उसका घर था। और वह अपनी पत्नी की पूरी दुनिया को अपने घर में बुला रहा था।

रितिका मेरे पास आई और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “आज तेरा दिन है,” उसने फुसफुसाया।

“हमारा दिन,” मैंने कहा।

“नहीं,” उसने कहा। “आज तेरा। क्योंकि आज तेरे पति पहली बार देखेंगे।”

और उसने मेरे कान में जोड़ा, “और पहली बार छुएँगे भी।”

हम सब खाने बैठे। सात लोग एक लंबी मेज़ पर। और मैं बीच में — क्योंकि सबने मुझे बीच में बिठाया। एक तरफ़ रोहन, दूसरी तरफ़ रितिका। सामने नीरज, उसके दोनों तरफ़ गणेश और सुखप्रीत, और कबीर रितिका के पास।

मदिरा चली। हँसी चली। कहानियाँ चलीं। गणेश ने अपनी जिम की कहानी सुनाई, सुखप्रीत ने अपनी गाड़ी की, कबीर ने अपने कॉलेज के दिनों की। रोहन ने नीरज की तारीफ़ की और नीरज शरमा गया। और बीच-बीच में कोई न कोई मेरी तरफ़ देख लेता — कोई मेरी गर्दन पर, कोई मेरे होंठों पर, कोई मेरे सीने पर।

मैंने उस रात एक गहरी लाल साड़ी पहनी थी — बिना ब्लाउज़ के नीचे कुछ और, और बिना पेटीकोट के। ताकि जब पल्ला खिसके, तो सब सामने हो। और पल्ला खिसक ही रहा था — हर बार जब मैं झुकती या हँसती।

गणेश ने एक बार कहा, “दीदी, आज तो पूरा इंतज़ाम है।”

“कैसा इंतज़ाम?” रोहन ने पूछा।

“भाई,” गणेश ने कहा, “आप देखते जाइए।”

खाना ख़त्म हुआ। मदिरा के गिलास भी ख़ाली हुए। और फिर वह सन्नाटा आया — जो हर बड़ी रात से पहले आता है। जिसमें सब जानते हैं कि अब क्या होने वाला है, पर कोई पहला क़दम नहीं उठाता।

और फिर रोहन उठा।

रोहन ने अपना गिलास रखा और वह मेरे पास आया। उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे खड़ा किया — सबके सामने। छह जोड़ी आँखें हम पर थीं। और रोहन ने बिना एक शब्द कहे मेरी साड़ी का पल्ला खींच दिया।

पल्ला फ़र्श पर गिरा। फिर उसने मेरी कमर की डोरी खोली और साड़ी खिसक गई। अब मैं बस पतली सी डोरी में खड़ी थी — मेरी चूचियाँ लगभग खुली, मेरे निपल्स डोरी के आर-पार साफ़, और मेरी बुर नीचे से झलकती हुई।

कमरे में एक लंबी साँस गूँजी। गणेश ने धीरे से कहा, “हे भगवान।” सुखप्रीत ने सीटी बजाई। कबीर मुस्कुराया। और नीरज — नीरज ने बस मुझे देखा, और उसकी आँखों में वह गर्व था जो मालिक की आँखों में होता है।

रोहन ने मुझे घुमाया — एक बार पूरा चक्कर — ताकि सब मेरी गाँड़ देख सकें। जब मैंने पीठ दिखाई, तो गणेश ने एक धीमी सी कराह निकाली। मेरी गाँड़ बाहर निकली हुई थी, गोल, और उस पतली डोरी में बस डोरी ही थी।

“देखा?” रोहन ने कहा। “मेरी बीवी है।”

“है,” नीरज ने कहा। “और इसीलिए हम सब यहाँ हैं।”

रोहन मुझे लेकर बेडरूम में गया। सब पीछे-पीछे आए। और जब सब अंदर आ गए, तो रोहन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

और फिर उसने मेरी डोरी खींच दी।

रोहन ने मुझे बिस्तर पर लिटाया और वह पीछे हटकर खड़ा हो गया। उसने सबको देखा और कहा, “पहले ये दोनों।”

“दोनों?” सुखप्रीत ने कहा।

“हाँ,” रोहन ने कहा। “आज पहले ये दोनों। औरतें। हम बाद में।”

रितिका मेरे पास आई। उसने अपनी सलवार-कुर्ता उतारी और वह भी नंगी हो गई। उसका जिस्म दुबला, चमकता, गोल चूचियाँ, पतली कमर, गोल गाँड़। उसने मुझ पर खुद को डाल दिया और मुझे चूम लिया — सबके सामने, बिना झिझक।

और कमरे में सात साँसें एक साथ रुक गईं।

रितिका ने मेरे होंठ चूमे, मेरी गर्दन चूमी, और फिर मेरी चूचियों पर आई। उसने मेरा निप्पल मुँह में लिया और चूसा। दूध निकली और उसके मुँह में गई। उसने पिया और फिर वह मुझे दिखाने के लिए मुड़ी — मुँह खोलकर, जैसे कह रही हो, “देखो, इससे दूध निकलता है।”

गणेश ने धीरे से कहा, “साली, दोनों पी रही हैं।”

“चुप,” सुखप्रीत ने कहा। “देखने दे।”

रितिका ने दोनों चूचियाँ चूसीं, दबाईं, और दूध पिया। फिर वह नीचे उतरी और उसने मेरी टाँगें खोलीं। मेरी बुर सामने आई — गीली, खुली, सात लोगों के सामने। और रितिका ने उस पर मुँह रख दिया।

मैंने कराह दबा ली। सबके सामने कराहना अलग लग रहा था। पर रितिका ने जान-बूझकर तेज़ चाटा। उसकी जीभ मेरी बुर पर दौड़ी — तेज़, चालाक, लगातार। उसने मेरे होंठ चूसे, अंदर जीभ डाली, और ऊपर वाले हिस्से पर रगड़ा। और मैं सबके सामने कराहने लगी।

रोहन बिस्तर के पास आया और वह बैठ गया — ठीक मेरे सिर के पास। उसने मेरे बाल सहलाए और मेरे माथे पर चूमा। और उसकी आँखों में वह चमक थी जो पहली रात थी, तेरह साल पहले। वह अपनी पत्नी को देख रहा था — एक और औरत की जीभ के नीचे — और वह मुस्कुरा रहा था।

“अच्छा लग रहा है?” उसने पूछा।

“बहुत,” मैंने कहा।

“तो करने दे,” उसने कहा। “आज रुकना मत।”

रितिका ने मुझे किनारे तक ले जाकर रोका। फिर उसने मुझे उठाया और मुझे उसके ऊपर बिठा दिया। अब मैं उसके ऊपर थी और उसकी बुर मेरे सामने। मैंने झुककर उसे चूमा, उसकी चूचियाँ दबाईं, और फिर मैंने भी उसकी बुर पर मुँह रख दिया।

अब हम दोनों एक-दूसरे की बुर चाट रही थीं, साथ-साथ, सात लोगों के सामने। और कमरे में सिर्फ़ हमारी जीभों की आवाज़ और मर्दों की साँसें थीं।

फिर हम पलटीं और हमने वह किया जो हमने पहले किया था — टाँगें मिला दीं, अपनी बुरें एक-दूसरे पर रख दीं, और रगड़ने लगीं। मेरी बुर उसकी बुर से रगड़ खा रही थी — गीली, गर्म, चिकनी। हमारी चूचियाँ एक-दूसरे से टकरातीं, हमारे निपल्स रगड़ खाते, और मेरी दूध उसके पेट पर गिरती।

गणेश ने कहा, “भाई, ये तो कमाल है।”

“देखते रहो,” नीरज ने कहा। “अभी शुरू हुआ है।”

रितिका पहले आई। उसकी बुर मेरी बुर पर काँपी और उसने चीख दबा ली। और उसके काँपने से मैं भी आ गई। हम दोनों एक साथ काँपीं, एक-दूसरे की बाज़ुओं में, सबके सामने, बिना शरम।

फिर रोहन उठा। और वह रितिका के पास गया।

मेरा दिल धक्-धक् करने लगा। यह वह पल था जिसका मुझे सबसे ज़्यादा इंतज़ार था — और सबसे ज़्यादा डर भी।

रोहन ने रितिका की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसने पहले उसका चेहरा छुआ, फिर उसकी गर्दन, फिर उसका कंधा। जैसे कोई नई चीज़ सीख रहा हो। तेरह साल में पहली बार उसने किसी और औरत को छुआ था।

रितिका ने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपनी चूची पर रख दिया। रोहन की आँखें बड़ी हो गईं। उसने दबाया — और रितिका ने कराह ली।

“कैसा लगा?” रितिका ने पूछा।

“अलग,” रोहन ने कहा।

“अच्छा अलग या बुरा अलग?”

“अच्छा,” उसने कहा। “बहुत अच्छा।”

और फिर उसने झुककर रितिका का निप्पल मुँह में लिया। उसने चूसा — और जब उसे दूध नहीं मिली (क्योंकि रितिका में नहीं है), तो वह रुक गया और हैरानी से मेरी तरफ़ देखा।

“इसमें दूध नहीं है?” उसने पूछा।

“नहीं,” रितिका ने हँसकर कहा। “उसमें है। मुझमें नहीं।”

“तो मैं दोनों का चखूँगा,” रोहन ने कहा। और उसने रितिका को चूसना जारी रखा — बिना दूध के भी, बस उसका स्वाद।

फिर वह रितिका के नीचे उतरा। उसने उसकी टाँगें खोलीं और उसकी बुर को देखा — मेरी बुर से अलग, ऊपर से साफ़, होंठ चिपके हुए। उसने उँगली से छुआ और रितिका ने आँखें बंद कर लीं।

“गीली है,” रोहन ने कहा।

“तुम्हारे लिए,” रितिका ने कहा।

और रोहन ने उसकी बुर पर मुँह रख दिया। वह चाटने लगा — थोड़ा अनाड़ी, थोड़ा सँभलकर, पर पूरे मन से। रितिका ने उसके बाल पकड़ लिए और अपनी कमर उठा दी। और मैं वहीं बैठी देख रही थी — मेरा पति किसी और औरत की बुर चाट रहा था, और मुझे जलन नहीं हो रही थी। बस एक गर्म, मीठी सी खुशी हो रही थी।

नीरज मेरे पास आया और वह मेरे पीछे बैठ गया। उसने मेरी कमर पर हाथ रखा और मेरे कान में कहा, “देख, तेरे पति को भी मज़ा आ रहा है।”

“देख रही हूँ,” मैंने कहा।

“अच्छा लग रहा है?”

“बहुत,” मैंने कहा। “अजीब तरह से बहुत।”

“अजीब क्यों?”

“क्योंकि लग रहा है कि हम दोनों ने कुछ नया शुरू किया है,” मैंने कहा। “तुमने मुझे खोला, और अब उसने भी खुल गया।”

नीरज ने मेरी गर्दन पर चूमा। “अब हम पूरे हैं,” उसने कहा। “अब सात।”

रोहन ने रितिका को छोड़ा और वह मेरे पास आया। उसने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और मुझे चूम लिया — गहरा, लंबा, सबके सामने। उसके होंठों पर रितिका का रस था।

“अब तू,” उसने कहा।

“अब मैं क्या?” मैंने पूछा।

“अब तू बीच में,” उसने कहा। “और हम सब तेरे चारों तरफ़।”

और वे सब मेरे चारों तरफ़ आ गए। रोहन मेरी बुर के पास, नीरज मेरे सिरहाने, गणेश मेरी चूचियों के पास, सुखप्रीत मेरे पैरों के पास, कबीर रितिका के पास — और रितिका मेरे बग़ल में, मेरा हाथ पकड़े हुए।

फिर वे मुझे खोलने लगे। गणेश ने मेरी चूचियाँ पकड़ीं और निपल्स दबाए। दूध निकली और उसने पिया। सुखप्रीत ने मेरी टाँगों की मालिश की और फिर मेरी बुर पर हाथ फिराया। रोहन ने मेरे नीचे तकिया रखा और मेरी टाँगें फैलाईं। और नीरज ने मेरे बाल सहलाए, मेरे माथे को चूमा, और मेरे कान में कहा, “आज सँभाल लेना।”

रोहन पहले अंदर आया — अपने आठ इंच के लंड से। उसने धीरे-धीरे डाला और पूरा अंदर गया। मेरी बुर ने उसे पहचाना और पकड़ लिया। वह धीरे-धीरे चोदने लगा, और सब देखते रहे।

फिर सुखप्रीत मेरे पीछे आया। उसने मेरी गाँड़ पर तेल लगाया और अपना लंबा पतला लंड मेरी गाँड़ में डाल दिया। अब मेरी बुर में रोहन और गाँड़ में सुखप्रीत। दोनों एक लय में चलने लगे।

मैं चीख पड़ी। “आह… रुको… रुको मत…”

“रुकेंगे नहीं,” सुखप्रीत ने कहा। “आज तुझे तोड़ना है।”

और फिर गणेश ने अपना मोटा लंड मेरे मुँह में डाल दिया। अब मैं तीन जगह भरी हुई थी।

गणेश ने मेरे बाल पकड़े और मेरा सिर नीचे-ऊपर किया। नीचे रोहन और सुखप्रीत एक लय में चोद रहे थे। और मैं बीच में कराह रही थी, आँखें बंद, पूरी भरी हुई।

रितिका मेरे हाथ में हाथ डालकर बैठी रही और मुझे देखती रही। कभी-कभी वह झुककर मेरी चूचियाँ दबा देती और दूध उसकी उँगलियों पर गिरता।

कबीर उसके पीछे आया और उसने रितिका को भी चोदना शुरू कर दिया — पीछे से, उसकी बुर में। अब दोनों औरतें एक साथ चोदी जा रही थीं, एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए। हमारी कराहें मिल गईं।

यह चला लंबे समय तक। पोज़िशन बदलती रहीं। कभी मैं घुटनों पर, कभी चारों पर, कभी ऊपर बैठी, कभी नीचे लेटी।

कभी किसी की बुर में, कभी किसी की गाँड़ में, कभी किसी का मुँह में। और बीच-बीच में कोई न कोई मेरी चूचियाँ चूसता रहता — और दूध बहती रहती। मेरे निपल्स इतने चूसे गए कि वे लाल और सूजे लगने लगे।

रोहन ने कभी जल्दी नहीं की। वह पूरे समय मुझे देखता रहा — मुझे और मेरे जिस्म को — और मुस्कुराता रहा।

जैसे वह किसी नए शहर में घूम रहा हो, जिसका नक़्शा उसके पास पहले से था पर जिसे वह पहली बार अपनी आँखों से देख रहा हो।

आख़िर में वे मुझे बीच में ले आए। रितिका नीचे लेटी और मैं उसके ऊपर। हमारी बुरें एक-दूसरे पर।

और चारों मर्द हमारे चारों तरफ़ — नीरज मेरी गाँड़ में, गणेश मेरी बुर में, सुखप्रीत रितिका की बुर में, कबीर रितिका की गाँड़ में। और रोहन… रोहन मेरे मुँह के पास आया और उसने अपना लंड मेरे होंठों पर रख दिया।

मैंने उसे मुँह में लिया। अब मेरे अंदर तीन लंड थे — बुर में, गाँड़ में, और मुँह में। और रितिका के अंदर दो। पाँच मर्द, दो औरतें, और सब एक कमरे में।

वे एक लय में चलने लगे। धीरे, फिर तेज़, फिर धीरे। हम दोनों औरतों की साँसें एक हो गईं। हमारी धड़कनें एक हो गईं। मुझे पता नहीं था कि कौन मेरे अंदर था और कहाँ — बस इतना पता था कि मैं भरी हुई हूँ, पूरी भरी हुई हूँ, और यही मेरी जगह है।

नीरज ने मेरे कान में कहा, “तेरी गाँड़ मेरी है।”

“है,” मैंने कहा।

गणेश ने कहा, “और तेरी बुर आज मेरी।”

“है,” मैंने कहा।

रोहन ने मेरे बाल पकड़े और कहा, “और तेरा मुँह मेरा।”

“है,” मैंने हाँफते हुए कहा। “सब तुम्हारा।”

“किसका?” नीरज ने कहा, और एक गहरा झटका दिया।

“सबका!” मैंने चीख दी। “सबका… पर सबसे ज़्यादा तुम्हारा।”

और वे हँसे — सब हँसे। और फिर उन्होंने गति बढ़ाई।

रितिका नीचे से मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में आँसू थे। मैंने उसका हाथ पकड़ा और दबाया। हम दोनों एक-दूसरे को पकड़े हुए थीं, जबकि पाँच मर्द हमें भर रहे थे।

“अब,” नीरज ने कहा। “सब एक साथ।”

और उन्होंने एक साथ छोड़ा। मेरी बुर में, मेरी गाँड़ में, मेरे मुँह में, रितिका की बुर में, रितिका की गाँड़ में। पाँच गर्म धाराएँ। रितिका चीख पड़ी और उसका पूरा जिस्म काँप गया। मैं चीख पड़ी और मेरा पूरा जिस्म काँप गया। हम दोनों एक साथ आईं — एक-दूसरे के ऊपर, एक-दूसरे की बाज़ुओं में।

और फिर सन्नाटा। सिर्फ़ साँसें। और हमारे जिस्मों से बहता हुआ सब कुछ।

कुछ देर बाद सब हटे। मैं बिस्तर पर पसरी रही — पसीने, तेल, दूध और उनके पानी से लथपथ। मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों भरी हुई महसूस हो रही थीं। और मेरा पूरा जिस्म एक गीली, गर्म, थकी हुई चीज़ था।

रोहन मेरे पास आया और वह लेट गया। उसने मुझे करवट दिलाई और मेरे चेहरे को अपनी तरफ़ किया। फिर उसने मेरे माथे पर चूमा, मेरी आँखों पर, मेरे गालों पर, और मेरे होंठों पर।

“सिमरन,” उसने कहा।

“हाँ,” मैंने कहा।

“तू कमाल है।”

“तुम भी,” मैंने कहा। “आज तुमने किसी और को छुआ, और तुमने मुझे बर्बाद नहीं किया।”

“क्यों बर्बाद करता?” उसने कहा। “तेरा जिस्म तेरा है। और आज मैंने देखा कि तेरा जिस्म कितना बड़ा है। पाँच मर्दों में भी तू पूरी रही।”

“क्योंकि तुम सब मिलकर भी मुझे पूरा नहीं भर पाते,” मैंने कहा।

वह हँसा। “तो अगली बार छह लाएँ?”

“छह भी कम है,” मैंने कहा। और हम दोनों हँसे।

नीरज मेरे दूसरी तरफ़ आया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और चूमा। “थक गई?”

“बहुत,” मैंने कहा।

“अच्छा था?”

“बहुत अच्छा,” मैंने कहा। “पर तुम्हें पता है क्या अच्छा था?”

“क्या?”

“यह कि रोहन ने किसी और को छुआ,” मैंने कहा। “और मुझे जलन नहीं हुई। बस खुशी हुई। मतलब हम सब पूरे हो गए।”

नीरज ने मेरे माथे पर चूमा। “अब कोई राज़ नहीं,” उसने कहा।

“कोई राज़ नहीं,” मैंने कहा।

फिर सब उठे। और उस रात सात लोगों ने मिलकर उस छोटे से बाथरूम में मेरा और रितिका का जिस्म धोया। कोई मेरी पीठ रगड़ रहा था, कोई मेरी टाँगें। गणेश मेरी चूचियाँ धो रहा था और बार-बार निपल्स छू रहा था।

सुखप्रीत मेरी बुर के अंदर तक पानी भेज रहा था। और रोहन मेरे बालों में शैम्पू लगा रहा था — वैसे ही जैसे तेरह साल से लगाता आया था।

रितिका को कबीर धो रहा था और नीरज उसकी टाँगें। और मैं — मैं बीच में खड़ी हँस रही थी, क्योंकि पूरा बाथरूम भरा हुआ था और कोई किसी को जगह नहीं दे रहा था।

“जगह नहीं है,” गणेश ने कहा।

“तो निकल जाओ,” सुखप्रीत ने कहा।

“तू निकल,” गणेश ने कहा। “मैं तो दीदी की दूध के साथ नहाऊँगा।”

और उसने मेरी चूची दबाई और दूध की एक बूँद पानी में गिरी।

रात के डेढ़ बजे सब कपड़े पहनकर बैठ गए। मैंने सबके लिए चाय बनाई। सात कप। और हम ड्राइंग रूम में बैठे — थके हुए, हँसते हुए, और अजीब तरह से शांत।

गणेश पहले उठा। उसने मेरे माथे को चूमा और कहा, “दीदी, आज रात ज़िंदगी भर याद रहेगी।” फिर उसने रोहन की तरफ़ देखा और कहा, “भाई, आप भाग्यशाली हैं।”

“पता है,” रोहन ने कहा। और उसकी आवाज़ में गर्व था।

सुखप्रीत ने मेरा हाथ चूमा और कहा, “अगली बार तेल ज़्यादा लाऊँगा।” और वह मुस्कुराया — वही चालाक मुस्कान।

कबीर ने रितिका का हाथ पकड़ा और मेरी तरफ़ देखा। “सिमरन, आपने इसे बदल दिया। यह पहले इतनी खुली नहीं थी।”

“इसने भी मुझे बदला,” मैंने कहा।

रितिका ने मुझे गले लगाया और फुसफुसाया, “अगली बार सिर्फ़ हम दोनों। और फिर कभी सिर्फ़ हम दोनों और तेरे पति।”

“क्यों?” मैंने पूछा।

“क्योंकि उनकी आँखों में आज जो था,” उसने कहा, “वो सिर्फ़ तेरे लिए था।”

और फिर वे चले गए। नीरज आख़िर में रुका — वह हमेशा आख़िर में रुकता था। उसने रोहन से हाथ मिलाया और उससे गले लगा।

“कल?” नीरज ने मुझसे पूछा।

“कल,” मैंने कहा।

और वह गया।

रोहन ने दरवाज़ा बंद किया और वह मेरे पास आया। हम दोनों ड्राइंग रूम में खड़े थे। बाहर का शहर अभी सोया नहीं था — गाड़ियों की आवाज़ आ रही थी, और हमारी बालकनी से हल्की हवा।

“थक गई?” उसने पूछा।

“बहुत,” मैंने कहा।

“अब सो जा,” उसने कहा।

“तुम?” मैंने पूछा।

“मैं भी,” उसने कहा।

पर हम सोए नहीं। हम बिस्तर पर लेटे, और फिर रोहन ने मुझे अपनी तरफ़ खींचा। उसने मुझे चूमा — धीरे, गहरे। और फिर उसने मेरी चूची मुँह में ली और दूध पिया।

“अभी भी भूख है?” मैंने पूछा।

“हमेशा,” उसने कहा।

“पर तुम तो थके हो।”

“थका हूँ,” उसने कहा। “पर आज तेरे साथ सोने से पहले एक बार और करूँगा। सिर्फ़ तेरे साथ। बिना किसी और के।”

और उसने मेरी बुर में अपना लंड डाल दिया। धीरे-धीरे, बिना जल्दी। तेरह साल की पहचान के साथ। और यह उस रात की सबसे प्यारी चुदाई थी — क्योंकि इसमें कोई प्रदर्शन नहीं था, कोई मुक़ाबला नहीं था। बस वह और मैं।

वह धीरे-धीरे चोदता रहा और मैं उसकी बाज़ुओं में पिघलती रही। मेरी बुर ने उसे पकड़ा — जैसे पहली रात पकड़ा था।

और जब वह आया, तो उसने मेरे अंदर ही छोड़ा, और उसके बाद वह मेरे ऊपर लेटा रहा, बिना हटे।

“सिमरन,” उसने कहा।

“हाँ।”

“आज के बाद,” उसने कहा, “जब भी तू किसी और के साथ होगी, मुझे बताना।”

“बताऊँगी,” मैंने कहा।

“और जब मैं किसी और के साथ होऊँ?”

“तुम भी बताओ,” मैंने कहा। “पर…”

“पर?”

“पर हम दोनों में से कोई किसी और का नहीं होगा,” मैंने कहा। “हम बस कुछ और भी होंगे।”

रोहन ने मेरे माथे पर चूमा। “यही तो,” उसने कहा। “यही तो चाहिए था।”

और हम सो गए।

आज सुबह जब मैं उठी, तो रोहन अभी सो रहा था। उसका हाथ मेरी कमर पर था और उसकी साँस शांत थी।

मैं उठकर बालकनी में आई और चाय बनाई। सामने नीरज की बालकनी की लाइट जल रही थी — वह भी जाग गया था।

उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया। मैंने भी मुस्कुरा दिया।

और मैंने अपना हिसाब लगाया।

बत्तीस साल की उम्र। पुणे में पली, मुंबई में बसी। एक पति — रोहन, जो अच्छा है, ईमानदार है, और अब पूरा है।

एक आशिक़ — नीरज, जिसने मुझे खोला और जिसके साथ मेरी बुर और मेरी गाँड़ दोनों ने पहली बार पूरा भराव जाना।

तीन दोस्त — गणेश, सुखप्रीत, कबीर, जो मुझे तब चोदते हैं जब मन करता है। और एक सहेली — रितिका, जो मेरी बुर को मेरी ही तरह जानती है।

मेरी चूचियाँ अभी भी छत्तीस की हैं। मेरे निपल्स अभी भी संवेदनशील हैं। और मेरी चूचियों में दूध अभी भी है — जो सात लड़कों ने पिया था, और अब पाँच मर्द पीते हैं, और वह कभी ख़त्म नहीं होता।

मेरी कमर बत्तीस की है और मेरी गाँड़ चालीस की। और मेरी बुर — सात लड़कों और पाँच मर्दों के बाद भी — अभी भी तंग है, अभी भी गीली होती है, और अभी भी हर बार किसी नए को पकड़ना जानती है।

शादी से पहले सात लड़के थे। और मैंने सोचा था कि शादी के बाद सब ख़त्म। पर शादी ख़त्म नहीं थी — शादी शुरुआत थी। और घर के बाहर भी एक दुनिया थी।

रोहन उठा और वह बालकनी में आया। उसने पीछे से मेरी कमर पकड़ी और मेरे कंधे पर ठुड्डी टिका दी।

“क्या सोच रही है?” उसने पूछा।

“यह कि मैं भाग्यशाली हूँ,” मैंने कहा।

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे सब कुछ मिला,” मैंने कहा। “एक घर, एक पति, एक आशिक़, कुछ दोस्त, एक सहेली। और कोई झगड़ा नहीं।”

रोहन ने मेरी गर्दन पर चूमा। “और मुझे क्या मिला?”

“क्या?” मैंने पूछा।

“एक पत्नी जो ज़िंदा है,” उसने कहा। “और उस ज़िंदगी को देखने का मौक़ा।”

सामने नीरज ने अपनी चाय उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई — जैसे कह रहा हो, “एक घूँट?” और मैं हँस दी।

“आज क्या करें?” रोहन ने पूछा।

“आज?” मैंने कहा। “आज सुस्ताएँगे। कल से फिर।”

“और कल?”

“कल नीरज आएगा,” मैंने कहा। “और परसों रितिका। और फिर सब।”

रोहन ने हँसकर कहा, “तो यह सिलसिला चलेगा?”

“चलेगा,” मैंने कहा। “जब तक तुम रोको नहीं।”

“मैं नहीं रोकूँगा,” उसने कहा।

और हम दोनों वहीं बालकनी में खड़े रहे, सूरज निकल रहा था, और सामने की बालकनी में एक जवान लड़का अपनी चाय पी रहा था।

यह कहानी मेरी कहानी है — एक बत्तीस साल की हाउसवाइफ, जिसकी चूचियाँ छत्तीस की हैं, निपल्स संवेदनशील हैं, दूध भरा है, कमर बत्तीस की है और गाँड़ चालीस की। जिसकी बुर ने सात लड़के और पाँच मर्द जाने, और फिर भी तंग रही।

पर सबसे ज़्यादा यह कहानी उस बात की है जो शुरू में मैंने कही थी —

“मुझे किसी भी ग़ैर मर्द से चुदवाना अच्छा लगता है — एक नया रोमांस, एक नई पहचान।”

और शादी ने मुझे नहीं रोका। शादी ने मुझे रंडी बना दिया।

अपनी राय कमेंट में जरुर बताएं………आपकी रंडी सिमरन!

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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