slut hr group fuck story
इंटर्न का नाम इशिता था।
बाईस साल। मार्केटिंग टीम में, तीन महीने का इंटर्नशिप। कॉलेज के आख़िरी साल में थी। और पहले दिन से ही पूरे फ़्लोर पर उसका ज़िक्र होने लगा — किसी ने कहा ‘लंबी है’, किसी ने कहा ‘खिलाड़ी लगती है’, किसी ने कहा ‘बैडमिंटन खेलती है, स्टेट लेवल तक’।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे एच आर नैना की ग्रुप में मस्त चुदाई
लंबी सच में थी। मेरे से पूरी चार इंच ऊँची। दुबली, मगर दुबली नहीं — दुबली-मज़बूत, जैसे तैराक हो। घुँघराले बाल, कंधों तक, जो वो हमेशा पीछे की तरफ़ बाँधती थी। रंग साँवला, चमकदार। गाल पर एक छोटा सा तिल। और आँखों में वो चीज़ जो छोटे शहर से आए लोगों की आँखों में होती है — जल्दी कुछ कर जाने की, जल्दी कुछ बन जाने की।
पहले दिन उसने पैंट्री में पानी भरते वक़्त मुझसे पूछा — “आप आदित्य हैं ना? जो कैंपेन चलाते हैं?”
“हाँ,” मैंने कहा।
“मुझे आपका काम पसंद आया,” उसने कहा। “कल वाला ऐड, वो अच्छा था।”
“तुमने देखा?”
“इंटर्न हूँ, आदित्य,” उसने कहा। “काम देखना मेरा काम है।”
और फिर वो मुस्कुराई और चली गई। मगर जाते वक़्त उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। बस एक बार।
उस रात नैना ने मुझे फ़ोन किया।
“आदित्य।”
“हाँ।”
“नई इंटर्न,” नैना ने कहा।
“हाँ, इशिता,” मैंने कहा।
“तुमने नाम भी याद रख लिया,” नैना ने कहा।
मैं चुप रहा।
“आदित्य,” नैना ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मुस्कान साफ़ सुनाई दी जो अब मैं पहचानता था। “अब तक सब कुछ रिया चला रही थीं। नैना ने तो बस हाँ भर दी थी।”
“तो?”
“तो अब मेरी बारी,” नैना ने कहा। “इसको मैं चलाऊँगी।”
“और रिया?”
“रिया ने कहा — ‘तेरी बारी, तेरा नियम।'”
और फिर उसने फ़ोन काट दिया।
नैना ने उस हफ़्ते सब कुछ अलग तरीक़े से किया। न वाइन, न डिनर, न चार लोगों वाला ‘बैठकर बात करेंगे’ वाला ड्रामा।
उसने सीधे इशिता को बुलाया।
बुधवार को, ऑफिस के बाद, नैना इशिता के पास गई और बोली — “इशिता, तू अकेली रहती है?”
“हाँ, हॉस्टल में,” इशिता ने कहा।
“कल कुछ प्लान है?”
“नहीं।”
“तो कल शाम आदित्य के घर आ जा। चार लोग हैं — मैं, आदित्य, कबीर और रिया। बस मिलना है।”
“रिया मैम?” इशिता ने कहा। “वो तो जॉब छोड़ चुकी हैं ना?”
“वो भी आ रही हैं,” नैना ने कहा। “दोस्त हैं।”
“और कबीर सर?” इशिता ने कहा। “टीम लीड?”
“वो भी दोस्त है,” नैना ने कहा।
“बहुत दोस्त हैं,” इशिता ने कहा, और हल्का सा शक़ जताया।
नैना ने कंधे उचकाए। “आ जा। पता चल जाएगा।”
और इशिता आ गई।
गुरुवार शाम सात बजे इशिता मेरे फ्लैट पर आई।
उसने उस दिन कुछ सादा पहना था — काला रिब्ड टॉप, वाइड-लेग ट्राउज़र, और बाल पीछे बँधे। पर सादगी में भी वो ऐसी लग रही थी कि कमरे की हवा बदल गई। लंबे कद की वजह से वो दरवाज़े पर ही सबसे ऊँची दिख रही थी।
वो अंदर आई, चारों तरफ़ देखा, और रुक गई।
क्योंकि कमरे में चार लोग बैठे थे — और चारों उसी तरह बैठे थे जैसे घर के लोग बैठते हैं। रिया सोफ़े के कोने में पैर समेटे, नैना फ़र्श पर कुशन लगाकर, कबीर कुर्सी पर, मैं रसोई के दरवाज़े पर।
और इशिता ने सबको एक-एक करके देखा।
“ये घर है?” उसने पूछा।
“किसका?” नैना ने कहा।
“यही तो पूछ रही हूँ,” इशिता ने कहा।
“तीन का,” रिया ने कहा। “आदित्य, कबीर और मेरा।”
इशिता ने मेरी तरफ़ देखा। फिर कबीर की तरफ़। फिर रिया की तरफ़।
“और आप?” उसने नैना से पूछा।
“मैं हफ़्ते में आती हूँ,” नैना ने कहा। “चार की है।”
इशिता ने एक गहरी साँस ली। और फिर बोली — “ठीक है, अब सब बताओ। शुरू से।”
और हमने बताया।
रिया ने शुरू किया। बीस मिनट में उन्होंने सब कुछ बताया — इंटरव्यू, ऑफिस, पहला डिनर, पहली रात, कबीर का पता चलना, तीन की रात, नियम, नैना का आना, चार होना, और जॉब छोड़ना। सब कुछ। बिना कुछ छिपाए।
इशिता पूरी बात सुनती रही। एक बार भी बीच में नहीं रोका।
और जब रिया खत्म कर चुकीं, तो इशिता ने पानी पिया, गिलास रखा, और पूछा —
“तो अब मुझे क्यों बुलाया?”
नैना ने आगे झुककर कहा — “क्योंकि तू हर बात नोटिस करती है।”
“कैसे पता?”
“क्योंकि तूने पहले ही पूछ लिया कि किसका घर है,” नैना ने कहा। “बाक़ी लोग डिनर खाकर चले जाते। तूने पहले सवाल पूछा।”
इशिता ने एक पल सोचा।
“और अगर मैं हाँ कर दूँ,” उसने कहा, “तो क्या बदलेगा?”
“कुछ नहीं बदलेगा,” नैना ने कहा। “और सब बदल जाएगा।”
“बहुत गोल-गोल जवाब है,” इशिता ने कहा।
“तो सीधा सुन,” नैना ने कहा। “तू जॉइन करेगी, तो हम पाँच हो जाएँगे। और तेरे पास हर चीज़ का हक़ होगा — रुकने का, बोलने का, माँगने का। और हर चीज़ की ज़िम्मेदारी भी।”
इशिता ने मेरी तरफ़ देखा।
“आप क्या कहते हैं?” उसने पूछा।
“मैं कहता हूँ कि एक बार आज़मा लो,” मैंने कहा। “और फिर बताओ।”
“आज़माने का मतलब आज ही?”
“आज ही,” नैना ने कहा।
इशिता ने अपने बालों का रबर बैंड निकाला, बाल खोल दिए, और बोली —
“तो फिर खाना पहले या बाद में?”
कबीर हँस पड़ा। “तू ठीक है।”
“मुझे पता है,” इशिता ने कहा।
खाना बाद में हुआ। पहले नैना ने माहौल बनाया।
उसने लाइट मद्धम कर दी, स्पीकर पर धीमा संगीत लगाया, और इशिता को सोफ़े पर बैठाकर उसके सामने फ़र्श पर बैठ गई।
“अब सुन,” नैना ने कहा। “जब तक मैं न कहूँ, तू अपने कपड़े नहीं उतारेगी। और न किसी को छुएगी। बस महसूस करेगी।”
“क्यों?” इशिता ने पूछा।
“क्योंकि इस बार तेरी बारी है,” नैना ने कहा। “और जो पहली बार होता है, वो जल्दी नहीं करना चाहिए।”
फिर नैना ने इशिता का पैर उठाकर अपनी गोद में रखा, और उसके पंजों से शुरू किया — अँगूठे से दबाते हुए। धीरे-धीरे ऊपर आई — पिंडली, घुटना, जाँघ। और जब जाँघ तक पहुँची, तो इशिता ने आँखें बंद कर लीं।
“कपड़े के ऊपर से ही?” इशिता ने पूछा।
“हाँ,” नैना ने कहा। “अभी सिर्फ़ हाथ।”
नैना ने उसकी जाँघ पर हाथ रखा और धीरे-धीरे ऊपर सरकाया। और जब हाथ उसके बीच पहुँचा, तो इशिता की साँस टूट गई।
“गीली हो,” नैना ने कहा।
“हाँ,” इशिता ने स्वीकार किया।
“कब से?”
“जब से अंदर आई,” इशिता ने कहा। “जब आपने कहा था कि ‘आज ही।'”
नैना मुस्कुराई। और फिर उठकर उसने इशिता का टॉप उतारा — धीरे से, नीचे से ऊपर। और फिर उसके ब्रा की हुक खोली।
इशिता के दूध बाहर आ गए — छोटे, तने हुए, और उनके निपल्स गहरे भूरे, बड़े, और पहले से सख़्त।
नैना ने उन्हें देखा, और फिर धीरे से एक निप्पल को अँगूठे और उँगली के बीच दबाया।
इशिता का पूरा शरीर काँप गया।
“ओह…” वो बस इतना बोली।
“अच्छा लग रहा है?” नैना ने पूछा।
“हाँ… और करो।”
नैना ने दोनों हाथों से दोनों दूध पकड़े और दबाए, और फिर झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया। इशिता ने नैना का सिर पकड़ लिया और पीछे सोफ़े पर सिर टिका दिया।
और अब रिया आईं।
रिया सोफ़े के पीछे से आईं, इशिता के पीछे खड़ी हुईं, और उसकी गर्दन पर होंठ रख दिए — कान के नीचे, फिर जबड़े की लाइन पर, फिर कंधे पर। उनके हाथ इशिता के कंधों पर थे, और वो उसे धीरे-धीरे सहला रही थीं।
अब इशिता के शरीर पर चार हाथ थे — नैना के हाथ और मुँह नीचे, रिया के होंठ ऊपर।
और कबीर सामने कुर्सी पर बैठा देख रहा था। मैं दीवार से टिका खड़ा था।
इशिता ने आँखें खोलकर मुझे देखा। और फिर वो बोली —
“आदित्य, आप बस देखोगे?”
“नैना ने कहा है कि तब तक नहीं छूना जब तक वो कहे,” मैंने कहा।
“तो उससे कहो कि कह दे,” इशिता ने कहा।
और नैना ने, इशिता के निप्पल को मुँह में रखे-रखे, हल्के से कहा — “अभी नहीं। अभी तू इंतज़ार कर।”
इशिता ने कराह मारी — इंतज़ार से ज़्यादा झुँझलाहट में।
आधे घंटे बाद नैना ने इशिता को उठाया और बेडरूम की तरफ़ ले गई। इशिता के नीचे अब सिर्फ़ पैंट थी, और वो भी ढीली हो चुकी थी।
बेडरूम में नैना ने उसे बिस्तर पर बिठाया, और फिर उसकी पैंट और पैंटी नीचे खींची। इशिता पूरी नंगी हो गई — लंबी, दुबली, मज़बूत, और बिल्कुल बेशर्म।
नैना ने उसके पैर फैलाए।
“देख,” नैना ने मुझे बुलाकर कहा। “देख इसकी बुर।”
मैं पास आया। इशिता की बुर साफ़-सुथरी थी, होंठ पतले और चमकते हुए, और ऊपर का छोटा हिस्सा साफ़ उभरा हुआ। पूरी गीली।
“आदित्य,” नैना ने कहा। “अब तू। जीभ से।”
मैं घुटनों पर बैठा और मुँह नीचे किया।
जैसे ही मेरी जीभ उसके होंठों को छू गई, इशिता ने ज़ोर से साँस ली और अपनी जाँघें मेरे कानों पर कस लीं। उसकी जाँघें मज़बूत थीं — खिलाड़ी की जाँघें — और उनकी पकड़ से लगा कि वो जाने नहीं देगी।
मैंने जीभ से ऊपर-नीचे किया, फिर गोल-गोल, फिर ऊपर वाले हिस्से पर टिककर। और साथ ही एक उँगली अंदर डाल दी।
इशिता ने एक लंबी आवाज़ निकाली — “आआह्ह्ह… आदित्य…”
और ऊपर से रिया उसके दूध चूसने लगीं और नैना उसकी जाँघों को सहलाने लगी।
तीन जगह, तीन लोग, और इशिता बीच में।
तीन मिनट में वो पहली बार आई — ज़ोर से, जाँघें काँपती हुई, और मेरे मुँह पर अपना हाथ दबाती हुई।
वो हाँफती हुई बिस्तर पर पड़ी रही।
“अब?” उसने पूछा, आँखें बंद किए हुए।
“अब तेरी बारी चुनने की,” नैना ने कहा। “किसके साथ शुरू करना है?”
इशिता ने आँखें खोलीं। उसने चारों को देखा — रिया, कबीर, मुझे, नैना।
और फिर बोली — “कबीर।”
कबीर ने भौंहें उठाईं। “मैं?”
“आप सबसे बड़े हैं,” इशिता ने कहा। “और आप अब तक चुप बैठे थे। मुझे देखना है कि चुप बैठे आदमी कैसे होते हैं।”
कबीर हँस पड़ा। “ठीक है।”
उसने अपनी शर्ट उतारी, पैंट खोली, और बिस्तर पर आया। इशिता ने उसका लंड देखा और आँखें थोड़ी फैल गईं — क्योंकि कबीर मोटा था, और इशिता पहली बार किसी के साथ थी।
“घबरा गई?” कबीर ने पूछा।
“थोड़ी,” इशिता ने कहा। “पर करो।”
कबीर ने उसके पैर फैलाए, अपने लंड को उसकी बुर के होंठों पर रखा, और धीरे से अंदर डाला।
इशिता ने होंठ भींच लिए। उसकी उँगलियों ने चादर पकड़ ली। कबीर रुका, और फिर धीरे-धीरे अंदर गया — आधा, फिर पूरा।
“आह्ह्ह…” इशिता ने कहा।
“लगा?” कबीर ने पूछा।
“हाँ… पर अच्छा है,” इशिता ने कहा। “और करो।”
और कबीर ने धक्के मारने शुरू किए — धीमे, भरे हुए, गहरे।
और तभी नैना ने मुझे पास बुलाया।
“आदित्य, ऊपर आ जा,” उसने कहा। “इशिता, तू मुँह से ले।”
इशिता ने सिर घुमाया, और मैं उसके सिर के पास आकर खड़ा हो गया। उसने हाथ बढ़ाकर मेरा लंड पकड़ा, पास लाया, और मुँह में ले लिया।
अब वो दोनों तरफ़ से भरी हुई थी — नीचे कबीर, ऊपर मैं। और हर धक्के पर उसका सिर आगे-पीछे होता, और मेरा लंड उसके मुँह में और अंदर जाता।
रिया ने इशिता के दूध पकड़े और निपल्स को अँगूठों से दबाया। और नैना नीचे जाकर इशिता की बुर के ऊपर वाले हिस्से को उँगली से सहलाने लगी — जहाँ कबीर का लंड अंदर-बाहर हो रहा था, ठीक वहीं ऊपर।
इशिता पूरी घिरी हुई थी। चार लोग, चार जगह, और एक भी खाली जगह नहीं।
वो लगातार कराह रही थी — मेरे लंड को मुँह में लिए हुए, जिससे वो कराह एक कंपन बनकर मेरी रीढ़ तक जाती।
और पाँच मिनट बाद वो दूसरी बार आई — कबीर के अंदर, नैना की उँगली पर, और मेरे लंड को मुँह में लिए हुए।
उसका पूरा शरीर झटके खाने लगा। कबीर ने रुककर उसे झेलने दिया। और जब वो शांत हुई, तो उसने मेरा लंड मुँह से निकाला और बोली —
“अब आदित्य।”
कबीर निकल गया। इशिता पीठ के बल लेट गई और मेरी तरफ़ देखा।
“आओ,” उसने कहा।
मैं उसके ऊपर आया। उसके पैर फैलाए। और धीरे से अंदर डाला।
इशिता ने पहले कबीर को झेला था — मोटा, भरा हुआ। अब मेरा अंदर गया — लंबा, गहरा। और वो गहराई उसने पहले महसूस नहीं की थी।
उसकी आँखें खुल गईं।
“आदित्य…” उसने कहा। “तुम… तुम गहरे जाते हो।”
“अच्छा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“हाँ…” उसने हाँफते हुए कहा। “और करो… और अंदर…”
मैंने धक्के मारने शुरू किए — लंबे, गहरे, और हर बार पूरा निकलकर पूरा अंदर। इशिता ने अपनी लंबी टाँगें मेरी कमर पर लपेट लीं, और उसकी एड़ियाँ मेरी पीठ पर कस गईं।
और अब रिया ने अपनी जगह बनाई।
वो इशिता के पास लेट गईं, इशिता का चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया, और उसे चूमने लगीं। इशिता ने रिया के होंठ चूमे, रिया की गर्दन पकड़ी, और रिया के शरीर से चिपक गई।
और नैना नीचे आकर इशिता के दूध चूसने लगी।
अब इशिता के शरीर में — अंदर मैं, मुँह पर रिया, दूध पर नैना, और कबीर पास बैठा देख रहा था और खुद को सहला रहा था।
इशिता ने रिया के होंठों के बीच से कहा — “रिया मैम…”
“मैम नहीं,” रिया ने कहा। “यहाँ रिया।”
“रिया,” इशिता ने कहा, “आप भी आओ। अंदर।”
रिया मुस्कुराईं। “बाद में। अभी आदित्य को झेल।”
और मैंने रफ़्तार बढ़ा दी।
बिस्तर चरमराने लगा। इशिता की साँस टूट गई। उसकी जाँघें मेरी कमर पर कस रही थीं, और उसके नाखून मेरी पीठ पर। वो लगातार ‘आदित्य… आदित्य…’ बोल रही थी, और रिया उसके बालों में उँगलियाँ फिरा रही थीं।
और फिर वो तीसरी बार आई — और इस बार वो चीखी, लंबी और टूटती हुई, और उसके अंदर का सिकुड़न मेरे लंड को कसकर पकड़ गया।
मैंने भी उसी पल छोड़ दिया — गहरे, और अंदर ही।
कुछ सेकंड हम वैसे ही रहे। फिर मैं निकल गया और उसके पास लेट गया।
इशिता हाँफ रही थी। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। और उसकी आँखों से एक आँसू निकल आया था — खुशी का, हैरानी का, पता नहीं।
“ठीक है?” नैना ने पूछा।
“मुझे नहीं पता,” इशिता ने कहा। “मुझे नहीं पता कि ये क्या हुआ।”
“पता चल जाएगा,” नैना ने कहा, और उसके माथे पर होंठ रखे।
उस रात इशिता ने दो और बार हुआ। एक बार नैना के साथ — जिसमें रिया और मैं और कबीर देखते रहे — और एक बार रिया के साथ, जब रिया ने उसके ऊपर आकर उसकी बुर को अपनी बुर से रगड़ा और इशिता दो मिनट में टूट गई।
और आख़िर में, तीन बजे, हम पाँच एक ही बिस्तर पर थे।
रिया बीच में। उनके एक तरफ़ कबीर, दूसरी तरफ़ मैं। और हम तीनों के ऊपर-नीचे फैली थीं नैना और इशिता — नैना रिया के पैरों के पास, इशिता उसके कंधे के पास।
बिस्तर छोटा पड़ गया था।
“कल बड़ा बिस्तर लेना पड़ेगा,” नैना ने कहा।
“कल किंग साइज़,” कबीर ने कहा।
“किंग साइज़ में पाँच नहीं आएँगे,” इशिता ने कहा।
“तो सुपर किंग,” मैंने कहा।
“तो पूरा बेडरूम ही बदल दो,” रिया ने कहा।
और हम सब हँस पड़े — थके हुए, बेवकूफ़, खुश।
फिर रिया ने कुछ सेकंड बाद धीरे से कहा —
“इशिता।”
“हाँ।”
“तू ठीक है?”
“हाँ।”
“सोच-समझकर बताना,” रिया ने कहा। “अभी रात है, कल दिन होगा। तू सोच ले। अगर तुझे नहीं करना, तो कोई बुरा नहीं मानेगा।”
इशिता ने एक पल सोचा। फिर उठकर बैठी, और चारों को देखा।
और फिर बोली — “एक शर्त है।”
“बता,” नैना ने कहा।
“मैं इंटर्न हूँ,” इशिता ने कहा। “तीन महीने बाद मेरा इंटर्नशिप खत्म हो जाएगा। और तब तक कंपनी में सबको पता नहीं चलेगा।”
“और अगर पता चल जाए?” कबीर ने कहा।
“तो कोई बात नहीं,” इशिता ने कहा। “पर जान-बूझकर बताना नहीं।”
“और अगर तुझे नौकरी मिल जाए बाद में?” मैंने पूछा।
“तो?” इशिता ने कहा।
“तो क्या तू रुकेगी?”
इशिता ने मेरी आँखों में देखा। फिर बोली — “नौकरी मिलेगी तो काम करूँगी। और यहाँ आती रहूँगी। दोनों अलग हैं।”
“समझदार,” रिया ने कहा।
और फिर इशिता ने एक और बात जोड़ी —
“और एक बात। आज रात के बाद, अगर किसी को किसी से जलन हो, तो बताना। वैसे ही जैसे नैना ने लिखा था।”
“तूने काग़ज़ पढ़ लिया?” नैना ने पूछा।
“पढ़ लिया,” इशिता ने कहा। “टॉयलेट में लगा था।”
और पाँचों हँस पड़े।
और फिर इशिता ने उस काग़ज़ पर, अपने हाथ से, नीचे लिख दिया —
“आठ — इशिता।”
सुबह छह बजे इशिता उठी — आदत से, खिलाड़ी की आदत से।
उसने मेरी शर्ट पहनी, रसोई में गई, और पाँच कप चाय बनाई। और जब हम बाक़ी चार उठे, तो टेबल पर पाँच कप रखे हुए थे और वो खिड़की के पास खड़ी थी।
“इतनी जल्दी?” नैना ने कहा।
“बैडमिंटन है,” इशिता ने कहा। “आठ बजे कोर्ट बुक है।”
“आज रविवार नहीं है,” मैंने कहा।
“तो?”
“तो रविवार को तो हम सब…”
“मुझे पता है,” इशिता ने कहा। “पर मैं पहले कोर्ट जाऊँगी, फिर आऊँगी। दोनों हो जाएगा।”
कबीर ने चाय उठाई और बोला — “ये लड़की ठीक है।”
और उस सुबह, चाय पीते हुए, रिया ने वो बात उठाई जो तीन हफ़्ते से टल रही थी।
“आदित्य,” उन्होंने कहा। “शादी की बात।”
कमरा थोड़ा शांत हो गया।
“हाँ,” मैंने कहा।
“मेरे घर वाले पूछ रहे हैं,” रिया ने कहा। “तीस हो गई। और उन्हें पता चल गया है कि मैं किसी से मिल रही हूँ।”
“किसी से?” मैंने कहा।
“हाँ। उन्हें लगता है एक से,” रिया ने कहा। “और वो एक तू है।”
“तो फिर दिक्कत क्या है?”
“दिक्कत ये है,” रिया ने कहा, “कि तेरे घर वालों को भी पता चलेगा। और तेरे घर वाले पूछेंगे — लड़की कौन है, क्या करती है, उम्र क्या है। और जब वो सुनेंगे कि नौ साल बड़ी है, तो पहला सवाल ये होगा — ‘और कोई नहीं मिली?'”
“तो हम जवाब देंगे,” मैंने कहा।
“क्या जवाब?”
“कि हाँ, मिली,” मैंने कहा। “और उससे बेहतर कोई नहीं थी।”
रिया ने एक पल मुझे देखा। फिर बोलीं — “और कबीर का क्या? और नैना का? और इशिता का? ये बात उन्हें कैसे बताएँगे?”
कमरे में चुप्पी छा गई।
और फिर इशिता ने कहा — “सबसे आसान तरीक़ा?”
“बता,” रिया ने कहा।
“मत बताओ,” इशिता ने कहा। “बस बुला लो। एक डिनर। और जब वो आ जाएँ, तो जो दिखेगा वो समझ जाएँगे।”
“और अगर न समझें?” कबीर ने कहा।
“तो उनकी दिक्कत,” इशिता ने कहा। “हम तो ठीक हैं।”
और रिया ने उसकी तरफ़ देखा — लंबे समय तक। फिर मुस्कुराईं और बोलीं —
“इशिता, तू तीन महीने की है। पर बातें साल भर की करती है।”
“मैं तेज़ हूँ,” इशिता ने कहा। “बैडमिंटन में भी।”
उस दिन बहुत कुछ तय हुआ।
रिया ने तारीख़ तय की — अगले साल, फ़रवरी। उससे पहले दोनों घरों को मिलाना है, बात करनी है, और एक डिनर रखना है जिसमें सब होंगे — मेरे माता-पिता, रिया के माता-पिता, और बाक़ी।
कबीर ने कहा कि वो शादी में ‘दोस्त’ बनकर आएगा। “बाक़ी बाद में,” उसने कहा।
नैना ने कहा कि वो शादी में साड़ी पहनेगी और फ़ोटो खिंचवाएगी। “बाक़ी वो जानते हैं,” उसने कहा।
और इशिता ने कहा — “मैं तो कॉलेज की होने की वजह से कजिन बन जाऊँगी।”
“किसकी कजिन?” रिया ने पूछा।
“आपकी,” इशिता ने कहा। “या आदित्य की। जो भी कहे।”
और सब हँस पड़े।
उस शाम इशिता चली गई — कोर्ट के लिए — और रात को लौटी। और उस रात हम पाँच थे, और अब पाँच होना अजीब नहीं लग रहा था।
बल्कि चार होना अजीब लगने लगा था।
रात के तीन बजे, जब सब सो गए, रिया ने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा —
“आदित्य।”
“हम्म।”
“डर लग रहा है।”
“किस बात का?”
“इसका,” रिया ने कहा। “कि इतना अच्छा चल रहा है। और अच्छी चीज़ें टूटती हैं।”
मैंने उनकी तरफ़ करवट ली। उनके चेहरे पर अंधेरे में भी कुछ दिख रहा था — थोड़ा डर, थोड़ा प्यार।
“रिया,” मैंने कहा। “जब हम चार थे, तो भी डर था। जब तीन थे, तब भी। और शुरू में तो सिर्फ़ दो थे और तब भी डर था।”
“तो?”
“तो डर रहेगा,” मैंने कहा। “पर हम रुकेंगे नहीं।”
रिया ने मेरी छाती पर सिर रख दिया। और कुछ देर बाद बोलीं —
“तू बीस का है। और बातें तीस साल की करता है।”
“तुमने ही तो सिखाया,” मैंने कहा।
“मैंने?”
“हाँ। बीस वाला था जब आया था। अब नहीं हूँ।”
और रिया ने मुझे गले लगा लिया।
अगले महीने का प्लान बन गया था — घर वालों का डिनर।
रिया के माता-पिता दिल्ली आ रहे थे। मेरे माता-पिता भी आने वाले थे। और एक शनिवार की शाम, एक होटल के प्राइवेट रूम में, दो परिवार मिलेंगे — और साथ में कबीर, नैना और इशिता।
रिया ने उस डिनर को ‘टेस्ट’ कहा।
“किसका टेस्ट?” मैंने पूछा।
“परिवारों का,” रिया ने कहा। “देखेंगे कौन कितना समझदार है।”
“और अगर न समझें?”
“तो हम उन्हें समझाएँगे,” रिया ने कहा। “और अगर वो भी न समझें — तो?”
“तो क्या?” मैंने पूछा।
“तो हम शादी कर लेंगे,” रिया ने कहा। “और वो बाद में समझ जाएँगे।”
और उस रात, सोने से पहले, इशिता ने अपने फ़ोन में एक नोट बनाया — जिसमें पाँच नाम थे, और नीचे लिखा था — “डिनर। शनिवार। सब तैयार रहें।”
और सबसे नीचे, छोटे अक्षरों में, उसने एक लाइन जोड़ी —
“और अगर घर वाले पूछें कि तुम लोग क्या हो, तो हम क्या कहेंगे?”
रिया ने वो लाइन पढ़ी, हँसीं, और फ़ोन वापस कर दिया।
“क्या कहेंगे?” नैना ने पूछा।
रिया ने आसपास देखा — कबीर, मैं, नैना, इशिता — और बोलीं —
“हम कहेंगे कि हम एक घर हैं।”
अगला भाग होगा — वो डिनर। दो परिवार, एक प्राइवेट रूम, और पाँच लोग जो एक-दूसरे को ऐसे देखते हैं जैसे कोई और नहीं देखता। रिया की माँ का वो सवाल जो किसी ने उम्मीद नहीं की थी। मेरे पिता का वो जवाब जिसने सब चौंका दिया। और डिनर के बाद वो रात जब पहली बार पाँचों ने किसी ‘बाहर वाले’ घर में — यानी रिया के माता-पिता के फ्लैट में — सोचा कि क्या करना है।
- तीन मर्दों ने मिलकर छः औरतों को चोदकर रंडी बनाए
- एच आर नैना की ग्रुप में मस्त चुदाई
- तलाकशुदा रंडी वाइफ को अपना बनाकर ग्रुप में चुदवाया
नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।
mera naam Sunita hai aur main ek randi hun. Delhi mein rahti hun. koi mujhe help karna chahe to main chudwane ke liye taiyar hun.
main tumhen chodunga Sunita aur tumhara khyal bhi rakhunga.
Patna se Koi aunty girl’s bhabhi hai kya jo chudai karwana chahti ho