मेरी दादी ने मेरे तीन दोस्तों से ग्रुप में चुदवाई

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उस शनिवार की सुबह दादी पाँच बजे उठ गईं। मुझे नींद नहीं आई थी, इसलिए मैं भी जागा हुआ था। मैं दरवाज़े की दरार से देख रहा था।

उन्होंने पहले आँगन के नल पर पानी डाला — ठंडा पानी, पूरे जिस्म पर, एक-एक लोटा। फिर बेसन और हल्दी का उबटन बनाया और अपने चेहरे पर, गर्दन पर, बाँहों पर, और फिर — मुझे ये देखकर मज़ा आया — अपनी चूचियों पर भी लगाया।

दोनों हाथों से, ऊपर से नीचे तक, गोल-गोल। जैसे कोई मूर्ति को चमका रहा हो।

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे मैंने अपनी दादी को पोर्न मूवीज की तरह चोदा।

फिर उन्होंने बाल धोए। नारियल के तेल से भिगोए, कंघी की, और एक ढीली गाँठ बनाई। फिर वो आईने के सामने खड़ी हुईं।

और मैंने देखा कि वो खुद को नाप रही थीं।

पहले उन्होंने अपनी चूचियाँ ऊपर उठाईं, दोनों हाथों से, और फिर छोड़ दीं। वो भारीपन में नीचे गिरीं, हल्की सी हिलीं, फिर ठहर गईं। पैंसठ साल की औरत, जिसने शायद बीस साल से अपनी चूचियों को इस तरह नहीं देखा था। फिर उन्होंने बगल में से झाँका और अपनी कमर देखी — चौंतीस इंच, अब भी वही। फिर वो मुड़ीं और अपनी गांड देखी — बयालीस इंच, गोल, भारी, और अब भी ऊपर उठी हुई। उन्होंने अपनी गांड पर हाथ फेरा, दबाया, और मुस्कुराईं। फिर बालों में सफ़ेद तारों को देखा, चेहरे की झुर्रियों को देखा, और कुछ सोचा।

तभी उन्होंने आईने में मेरी परछाईं देख ली।

“देख रहा है?” उन्होंने बिना मुड़े पूछा।

“हाँ,” मैंने कहा।

“क्या देख रहा है?”

“आपको।”

वो मुड़ीं। पूरी तरह मुड़ीं। तौलिया शरीर पर था, लेकिन ऊपर से खुला हुआ। “बता,” उन्होंने कहा, “आज रात तेरे दोनों दोस्त देखेंगे मुझे। तो सच बता — कहीं वो सोचें कि ये बूढ़ी औरत हमें क्यों दे रही है?”

मैं उठकर उनके पास गया। पीछे से उन्हें जकड़ लिया। दोनों हाथ उनकी कमर पर, ठुड्डी उनके कंधे पर, आँखें आईने में उनकी आँखों से मिलीं। “देखो,” मैंने कहा, “आईने में देखो। कौन कहेगा कि ये औरत पैंसठ की है? कौन कहेगा कि इन चूचियों को हाथ लगाने का हक़ एक लड़के को नहीं है? कौन कहेगा कि ये गांड किसी जवान लड़की की गांड से कम है?”

उन्होंने आईने में खुद को देखा। फिर मेरी तरफ देखा। फिर धीरे से कहा, “आज तेरे दोनों दोस्त आएंगे। और आज तू मुझे बच्चों की तरह मत सम्हालना।”

“तो कैसे सम्हालूँ?”

“आज तू भी उनके जैसा बन जा,” उन्होंने कहा। “आज कोई रिश्ता नहीं। आज बस तीन लंड और एक बुर।”

दोपहर में मैंने कमरा तैयार किया। बिस्तर की चादर बदली — सफ़ेद चादर, जो गीली होने पर भी अच्छी लगती है। तकियों की गिनती बढ़ाई — तीन लड़के और एक औरत के लिए चार तकिये। फिर मैंने फर्श पर एक मोटी दरी बिछाई, क्योंकि मुझे पता था कि चारपाई एक बार टूटेगी ज़रूर — तीन लड़कों का वज़न और एक औरत की चीखें, पुरानी लकड़ी कहाँ संभालेगी। मैंने दो मोमबत्तियाँ रख दीं — क्योंकि बिजली का भरोसा नहीं था, और सच कहूँ तो मुझे अँधेरा ही चाहिए था। मैंने पास में एक कटोरी नारियल का तेल भी रख दी। और एक साफ़ तौलिया। और एक जग पानी।

फिर मैंने दोनों को फोन किया।

रोहित पहले उठा। “क्या हुआ भाई?”

“आज रात रुक जाओ,” मैंने कहा।

“क्यों?”

“कुछ है।”

“क्या है?”

“आके देख लेना। लेकिन एक बात — अंडरवियर साफ़ पहनकर आना।”

वो हँसा। “क्यों? कहीं दादी माँ हमारी पैंट उतारने वाली हैं?”

“पता नहीं,” मैंने कहा, “शायद।”

उसकी हँसी अचानक बंद हो गई। “सच में?”

“आ जाओ। सात बजे।”

आकाश को भी वही कहा। आकाश ने पूछा, “भाई, सीधा बता — तेरी दादी और तेरे बीच कुछ है क्या?”

“है,” मैंने कहा।

“और आज हम दोनों को भी?”

“देखते हैं,” मैंने कहा। “लेकिन तुम दोनों को एक शर्त बतानी है। जो भी हो, शरमाना नहीं। औरत को शरमाते हुए देखकर उसे और शरम आती है। अगर तुम दोनों खुल गए, तो वो भी खुल जाएँगी।”

“भाई,” आकाश ने कहा, “तेरी दादी को देखकर मैं तो पहले ही खुला हुआ हूँ।”

वो दोनों सात बजे आए। रोहित मिठाई लाया — बेसन के लड्डू। आकाश ने दो बोतल ठंडी बीयर लाई। और दोनों ने साफ़ कपड़े पहने थे — रोहित ने नीली शर्ट, आकाश ने सफ़ेद। दोनों ने बाल संवारे हुए थे, दोनों की जेब में फोन, दोनों की आँखों में वो ख़ास चमक — जो एक लड़के की आँख में तभी आती है जब उसे पता हो कि आज कुछ होने वाला है।

दादी रसोई में थीं। मैंने दोनों को बैठाया, पानी दिया, और बातें शुरू कीं। लेकिन दोनों की नज़र बार-बार रसोई के दरवाज़े पर जा रही थी।

फिर वो बाहर आईं।

और मैंने देखा — उन्होंने वो हरा सिल्क का साड़ी पहना था। वो साड़ी जो उन्होंने शादी के बाद कभी नहीं पहनी थी, जो उनके संदूक में सालों से बंद थी। हरे रंग की, चमकती हुई। ब्लाउज़ तंग थी — इतनी तंग कि उनकी चूचियाँ ऊपर से उठी हुई दिख रही थीं, और ब्लाउज़ के बटन के बीच से उनका सफ़ेद दूध जैसा हिस्सा झाँक रहा था। पल्लू उन्होंने कंधे पर रखा था, छाती पर नहीं — इसलिए पूरी छाती खुली दिख रही थी। कमर पर साड़ी ठीक से बँधी थी, और नीचे का हिस्सा उनकी गांड पर इतनी कसा हुआ था कि हर कदम पर वो हिलती थी। पैरों में चप्पल। हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ। गले में मंगलसूत्र। और बाल — वही ढीली गाँठ।

वो खाना लेकर आईं — पूरी, आलू की सब्ज़ी, और कढ़ी। थाली मेज़ पर रखी।

रोहित ने देखा और उसकी साँस एक सेकंड के लिए रुकी। आकाश ने मेरी तरफ देखा और धीरे से पैर से मुझे मारा — “साले, तूने बताया ही नहीं।”

दादी ने थाली रखी, फिर झुककर आलू की कटोरी बीच में रखी — और झुकते वक़्त उनकी चूचियाँ नीचे लटकीं, और ब्लाउज़ की गर्दन से उनकी चूचियों की दरार दिखी। रोहित की आँखें उसी दरार पर टिक गईं। वो झुके हुए थे, इसलिए उन्हें पता भी नहीं चला कि कोई देख रहा है। लेकिन जब वो सीधी हुईं, तो उन्होंने रोहित की आँखों में देखा और कुछ नहीं कहा — बस मुस्कुरा दीं।

उस मुस्कान में पूरा खेल छिपा था।

हमने खाना खाया। बातें हुईं, हँसी हुई। रोहित ने दादी की तारीफ़ की — “दादी माँ, आज तो आप बहुत ही सुंदर लग रही हैं।” दादी ने कहा, “अब तुम दोनों आए हो, तो सजना तो बनता है।” और आकाश ने सीधे पूछ लिया, “सजना किसके लिए?” और दादी ने जवाब दिया, “जिसके लिए बनता है, उसके लिए।”

फिर ख़ामोशी। कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ चम्मच की आवाज़। और उस ख़ामोशी में सब कुछ कहा जा चुका था।

और ठीक साढ़े नौ बजे, जैसे किसी ने प्लान किया हो, बिजली गुल हो गई।

पूरा घर अँधेरे में डूब गया। बाहर मोहल्ले में कोई चिल्लाया, कोई हँसा, कोई फ्यूज़ ढूँढ़ने गया। और हम चारों वहीं बैठे रहे — मेज़ के चारों तरफ, अँधेरे में, एक-दूसरे की साँसें सुनते हुए।

मैं उठा और मोमबत्तियाँ जलाईं। मैंने एक मोमबत्ती मेज़ पर रखी और एक हाथ में लेकर अंदर के कमरे की तरफ बढ़ा। कमरे में जाकर मोमबत्ती रख दी। उसकी पीली, काँपती रोशनी पूरे कमरे में फैल गई — बिस्तर पर, दरी पर, दीवार पर।

फिर मैं बाहर आया और कहा, “बाहर मच्छर बहुत हैं। अंदर चलो।”

और हम चारों अंदर गए।

कमरा छोटा था। एक चारपाई, एक मेज़, एक दरी। तीन लड़के, एक औरत। पाँच जिस्मों के लिए ये कमरा बहुत छोटा था — या बिल्कुल सही था।

हम बैठ गए। रोहित चारपाई के कोने पर, आकाश दीवार के सहारे, मैं दरवाज़े के पास, और दादी — दादी बीच में, दरी पर, घुटनों के बल। मोमबत्ती की रोशनी में उनका चेहरा आधा रोशन, आधा छाया में। उनकी आँखें तीनों पर घूम रही थीं — एक-एक करके, हर एक को नापती हुईं, जैसे कोई रानी अपने तीनों नौकरों को देख रही हो।

फिर उन्होंने बात की।

“आज कुछ बातें तय कर लें,” उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत शांत थी, बिल्कुल शांत — जैसे किसी बैठक में नियम बताए जा रहे हों। “पहली बात — आज मैं किसी की दादी नहीं हूँ। आज मैं सिर्फ औरत हूँ। तुम तीनों आज मुझे नीलम बुलाओगे। कोई दादी माँ नहीं।”

रोहित ने धीरे से कहा, “नीलम।”

वो उसकी तरफ मुड़ीं और मुस्कुराईं। “हाँ। ऐसे ही।”

“दूसरी बात,” वो फिर बोलीं, “आज कोई शरम नहीं। मेरी उम्र पैंसठ है, तुम तीनों की उम्र सत्ताईस। लेकिन आज कोई बड़ा-छोटा नहीं है। जिसे जो करना है, करेगा। जो कहेगा, कहेगा। और जो माँगेगा — उसे मिलेगा।”

“तीसरी बात?” आकाश ने पूछा। उसकी आवाज़ थोड़ी भारी थी।

“तीसरी बात,” उन्होंने कहा और तीनों पर एक-एक करके नज़र डाली, “आज रात कोई जल्दी नहीं करेगा। पूरी रात है। और मैं थकी हुई नहीं सोऊँगी।”

फिर वो उठीं और चारपाई के किनारे आकर खड़ी हो गईं। और बोलीं, “अब जो करना है, शुरू करो। लेकिन पहले — मेरे कपड़े तुम तीनों उतारोगे। एक-एक चीज़। और धीरे-धीरे।”

तीनों उठे। तीनों उनके पास आए। और मैंने देखा कि पैंसठ साल की एक औरत के सामने तीन जवान लड़के खड़े थे, और तीनों की आँखों में वही एक चीज़ थी — भूख।

रोहित ने पहला कदम उठाया। वो उनके सामने आया और उनकी गर्दन पर हाथ रखा। फिर उन्होंने माथे पर, आँखों पर, गालों पर होंठ रखे — धीरे-धीरे, एक-एक करके। जब उसके होंठ उनके होंठों पर पहुँचे, तो दादी ने आँखें बंद कर लीं और उसके होंठ चूसने लगीं। आकाश पीछे आया और उनकी गांड पर दोनों हाथ रख दिए — साड़ी के ऊपर से, भर-भर के। दादी ने कराह निकाली। और मैं सामने आया, उनकी कमर पकड़ी, और उनकी चूचियों पर अपना मुँह रख दिया — ब्लाउज़ के ऊपर से, कपड़े के आर-पार।

अब तीन जगह हाथ थे। एक उनके होंठों पर, एक उनकी गांड पर, एक उनकी चूचियों पर। और एक औरत का पूरा जिस्म तीन लड़कों के बीच फँसा हुआ था।

फिर मैंने उनके ब्लाउज़ का पहला बटन खोला। धीरे से। फिर दूसरा। फिर तीसरा। रोहित ने पीछे से उनकी साड़ी की कमर की गाँठ खोली — इतनी आसानी से, जैसे बरसों से यही कर रहा हो। आकाश ने उनका पल्लू उतारा। और ब्लाउज़ खुल गया।

और उनकी चूचियाँ बाहर आ गईं।

अड़तीस इंच। भारी। गोल। नीचे को थोड़ी झुकी हुई। और उन पर बड़े, गहरे भूरे निपल्स — जो हवा लगते ही सख़्त हो गए, जैसे कोई फूल अँधेरे में खिल गया हो। रोहित ने देखा और उसकी साँस फूल गई। “भगवान,” वो फुसफुसाया, “नीलम, आपकी चूचियाँ…”

“क्या?” उन्होंने कहा।

“बहुत बड़ी हैं। बहुत सुंदर हैं।”

“पकड़ो,” उन्होंने कहा, “देखने से क्या होगा?”

और रोहित ने पकड़ लीं। दोनों हाथों से। उसके हाथ भर गए, और फिर भी दादी की चूचियाँ उसके हाथों से बाहर निकल आईं — इतनी भारी थीं। उसने उन्हें दबाया, ऊपर उठाया, नीचे किया। दादी ने आँखें बंद कर लीं और उसका सिर अपनी छाती पर दबा लिया।

आकाश ने उनकी साड़ी पूरी खोल दी। पेटीकोट खुला। और फिर उनकी गांड — बयालीस इंच, पूरी खुली हुई, मोमबत्ती की रोशनी में चमकती हुई। आकाश ने घुटनों के बल बैठकर दोनों हाथों से उनकी गांड पकड़ी और अपना चेहरा उसमें दबा दिया। दादी ने एक तेज़ आह भरी — “आह्ह्ह आकाश!”

फिर उन्होंने हमें रोका। “अब रुको,” उन्होंने कहा। “अब मैं तीनों को बारी-बारी देखूँगी।”

वो हमारे सामने घुटनों के बल बैठीं और हमारे कपड़े उतारने लगीं। पहले मेरी शर्ट। फिर रोहित की। फिर आकाश की। फिर पैंट। और जब तीनों की पैंट उतरी, तो वो रुकीं — और तीनों को ऊपर से नीचे तक देखा, बिना शरम, बिना झिझक।

मेरा लंड नौ पॉइंट चार इंच — सबसे बड़ा, सबसे मोटा। रोहित का सात इंच के आसपास — पतला, लंबा, सीधा। आकाश का आठ इंच — मोटा, भारी, झुका हुआ।

दादी ने तीनों को देखा, फिर धीरे से कहा — “आज रात भगवान ने मेरे लिए तीनों तरह के लंड भेजे हैं। एक लंबा, एक मोटा, एक बड़ा।”

फिर वो हमारे बीच घुटनों के बल बैठीं और उन्होंने अपने दोनों हाथ बढ़ाए — एक हाथ में रोहित का लंड, दूसरे में आकाश का। और मुँह में लिया मेरा।

तीनों को एक साथ। पहले मेरा पूरा मुँह में — जितना अंदर जा सका, उतना। फिर निकाला, और रोहित की तरफ मुड़ीं, उसे चूसा। फिर आकाश की तरफ, उसे चूसा। फिर फिर मेरी तरफ। और ये सब करते हुए उनके हाथ दोनों लंडों पर ऊपर-नीचे चल रहे थे, एक ही ताल में, जैसे कोई संगीत बजा रहा हो।

“नीलम,” मैंने कहा, “आपने ये कहाँ से सीखा?”

उन्होंने लंड मुँह से निकाला, और मुस्कुराकर कहा, “जब तू सो जाता है, तो मैं तेरे फोन में वो मूवीज देखती हूँ जिनमें एक औरत तीन-चार लड़कों के साथ होती है। रोज़ देखती हूँ। और रोज़ सोचती हूँ — कभी मेरी भी बारी आएगी।”

“आ गई,” रोहित ने कहा।

“हाँ,” उन्होंने कहा, “आ गई। अब तुम तीनों बात मत करो। बस करो।”

उन्होंने हमें चारपाई पर लिटा दिया — खुद बीच में, और हम तीनों उनके चारों तरफ। जैसा उन्होंने पहले तय किया था। रोहित उनकी बुर में। मैं उनके मुँह में। आकाश उनकी चूचियों पर।

रोहित पहले झिझका। उसने कहा, “नीलम, मैं…”

“क्या?”

“आप बहुत सुंदर हैं। और मैं घबरा रहा हूँ।”

दादी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और कहा, “घबरा मत। अंदर डाल। और जो होगा, देख।”

रोहित उनकी टाँगों के बीच आया। उन्होंने खुद अपनी टाँगें खोल दीं — पूरी खोल दीं। और मोमबत्ती की रोशनी में उनकी बुर सामने आई। भरी हुई, मोटे होंठों वाली, ऊपर घने बालों का जंगल, और बीच से गीली, चमकती हुई। तेरह साल की तपस्या के बाद जो अब रोज़ खुलती थी — और आज तीन लड़कों के लिए खुलने वाली थी।

रोहित ने अपने लंड की नोक रखी और धीरे से आगे बढ़ाया। दादी ने आँखें बंद कर लीं। वो पूरा अंदर गया, और दादी ने एक लंबी साँस छोड़ी।

फिर वो चलने लगा। धीरे-धीरे, लेकिन लगातार। और मैं सामने से अपना लंड उनके मुँह में दे दिया। दादी ने उसे मुँह में भर लिया, और रोहित के धक्कों के साथ-साथ उनका मुँह भी मेरे लंड पर ऊपर-नीचे होने लगा। आकाश ने उनकी चूचियाँ पकड़ीं — दोनों हाथों से, और अपना मुँह उनके निपल्स पर रख दिया। वो चूसने लगा, काटने लगा, जीभ से खेलने लगा।

अब एक औरत के जिस्म पर तीन जगह हमला था। नीचे बुर में एक लंड, ऊपर मुँह में एक लंड, और दोनों चूचियों पर एक लड़के के हाथ और होंठ। दादी का पूरा जिस्म एक-एक करके काँप रहा था। उनकी गांड चारपाई पर उठ रही थी। उनकी एड़ियाँ मेरी पीठ से रगड़ खा रही थीं। और उनके मुँह से वो आवाज़ें निकल रही थीं जो मुँह भरा होने पर निकलती हैं — भारी, गुदगुदी, टूटती हुई।

रोहित ज़्यादा देर नहीं टिका। दो मिनट में उसकी साँस फूलने लगी। “नीलम,” उसने कहा, “मैं…”

“अंदर?” उन्होंने मेरा लंड मुँह से निकालकर पूछा।

“अंदर,” वो काँपते हुए बोला।

“तो अंदर छोड़ दे,” दादी ने कहा, “पहला बार में ही अंदर।”

और रोहित ने अंदर छोड़ दिया। एक लंबे, काँपते धक्के के साथ। वो उनके ऊपर ढह गया, साँस फूलती हुई। दादी ने उसका सिर सहलाया और कहा, “शाबाश। अच्छा किया।”

अब बारी आकाश की थी। उसने दादी को पलटकर चारपाई पर लिटाया और खुद उनके ऊपर आया। लेकिन दादी ने उसे रोका। “नहीं,” उन्होंने कहा, “अब तेरी बारी मेरे मुँह की नहीं। अब तेरी बारी मेरी बुर की। और प्रांशु — तू अब पीछे।”

मैं पीछे गया। दादी ने अपनी गांड ऊपर उठाई और घुटनों के बल आ गईं — डॉगी में, आकाश के सामने, और मैं उनके पीछे। आकाश ने उनकी बुर में लंड डाला — मोटा, भारी, झुका हुआ। दादी ने चीख मारी। और फिर मैंने अपना लंड उनकी गांड के बीच, उस गड्ढे पर रखा जो मैंने पहले कभी नहीं छुआ था।

“नीलम,” मैंने कहा, “यहाँ?”

“हाँ,” उन्होंने कहा, “आज तीनों जगह। बुर, गांड, मुँह। और आज तेरी बारी है आख़िर की — तो पहले तू मेरी गांड खोलेगा।”

मैंने तेल उठाया। कटोरी से मुट्ठी भर के अपने लंड पर लगाया, और उनकी गांड पर भी। फिर धीरे से नोक रखी। दादी ने साँस रोक ली। मैंने धक्का दिया — आधा अंदर। दादी ने एक तेज़ चीख मारी और चादर को मुट्ठी में भर लिया।

“दर्द?” मैंने पूछा।

“हाँ… लेकिन अच्छा दर्द,” उन्होंने कहा, “और डाल।”

मैंने पूरा अंदर डाल दिया। दादी का पूरा जिस्म एक बार काँपा। और फिर — दोनों तरफ। आकाश सामने से उनकी बुर में, और मैं पीछे से उनकी गांड में। दोनों लंड, एक औरत के अंदर, एक-दूसरे से बस एक दीवार की दूरी पर। और हम दोनों धक्का दे रहे थे — एक आगे, एक पीछे, एक ताल में। जब मैं अंदर जाता, आकाश बाहर आता। जब वो अंदर जाता, मैं बाहर। जैसे कोई झूला।

दादी अब सिर्फ चीख रही थीं। “हे भगवान… हे भगवान… दोनों… दोनों एक साथ…”

रोहित सामने आया और उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपना लंड उनके मुँह के सामने रख दिया। दादी ने उसे भर लिया। अब तीनों लंड एक साथ उनके अंदर थे — एक बुर में, एक गांड में, एक मुँह में।

तीन लंड, एक औरत, पूरी तरह भरी हुई।

आकाश ने उनकी चूचियाँ नीचे से पकड़ीं और हर धक्के पर उन्हें दबाया। मैंने उनकी कमर पकड़ी और उनकी गांड को अपनी तरफ खींचा। रोहित उनके बालों को सहला रहा था। और दादी — दादी ने आँखें बंद कर लीं, और पूरी तरह अपने जिस्म के भरोसे छोड़ दिया।

आकाश दो मिनट में निकल गया। “मैं निकल रहा हूँ,” उसने कहा।

“अंदर ही,” दादी ने मुँह भरा हुआ कहा।

उसने अंदर छोड़ दिया। वो पीछे हटा, और फिर मैं अकेला बच गया — पीछे से उनकी गांड में। अब कोई जल्दी नहीं थी। रोहित ने उनके सामने घुटने टेके और उनकी चूचियाँ चूसने लगा। आकाश उनके पास लेट गया और उनका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया। और मैं — मैं उनकी गांड में धीरे-धीरे चलता रहा, बहुत धीरे, बहुत गहरा, और उनकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे लंड को जकड़े हुए थीं।

दादी ने इसी दौरान दो बार झड़प पाई। एक बार आकाश के साथ, एक बार मेरे साथ। दूसरी बार में उन्होंने मुझे अपनी गांड से इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि मुझे भी रुकना पड़ा।

कुछ देर वो आराम करने के लिए लेटीं। हम तीनों उनके चारों तरफ बैठे थे, पसीने से भीगे, और उनकी तरफ देख रहे थे। मोमबत्ती अब आधी जल चुकी थी। बाहर मोहल्ले में कोई गाना बजा रहा था। और हमारे कमरे में बस भारी साँसें थीं।

फिर दादी उठकर बैठीं। पानी पिया। अपने बाल ऊपर किए। और बोलीं, “अब आख़िरी दौर।”

“आख़िरी?” आकाश ने कहा। “अभी तो पूरी रात बाकी है।”

“आख़िरी दौर नहीं,” उन्होंने कहा, “आख़िरी तरीका। आज तीन तरीके हो गए — एक मुँह में, एक बुर में, एक गांड में। अब आख़िरी चीज़ बाकी है जो मैंने तेरे फोन में देखी है।”

“क्या?” मैंने पूछा।

उन्होंने जवाब नहीं दिया। बस उठकर चारपाई से उतरीं, और दीवार के सहारे खड़ी हो गईं। फिर पलटीं, दोनों हाथ दीवार पर टिकाए, और अपनी गांड बाहर की तरफ निकाल दी — पूरी गांड, बयालीस इंच, मोमबत्ती की रोशनी में, और उसके नीचे उनकी बुर, जो अब भी गीली और लाल थी।

“खड़े-खड़े,” उन्होंने कहा। “तीनों बारी-बारी। और कोई जल्दी नहीं।”

रोहित पहले गया। वो उनके पीछे खड़ा हुआ, उनकी गांड पकड़ी, और अंदर डाल दिया। खड़े-खड़े में अंदर जाना और गहरा होता है, और दादी ने दीवार पर अपना माथा टिका दिया और कराहने लगीं। मैं सामने से उनकी चूचियाँ पकड़कर चूसने लगा, और आकाश उनके एक पैर को उठाकर उसके नीचे से अपना हाथ उनकी बुर पर रखकर रगड़ने लगा।

रोहित दो मिनट में निकल गया — दूसरी बार। फिर आकाश। फिर मैं।

और जब मेरी बारी आई, तो दादी ने पीछे मुड़कर मुझे देखा और कहा, “अब आख़िरी। और अंदर ही छोड़ना। कोई बाहर नहीं।”

मैंने उन्हें दीवार से हटाया और चारपाई पर लिटा दिया — पीठ के बल, टाँगें ऊपर, पूरी खुली हुई। मैं उनके ऊपर आया, और एक ही बार में पूरा अंदर डाल दिया। दादी ने चीख मारी और मेरी पीठ दोनों हाथों से पकड़ ली।

“आह प्रांशु…” वो फुसफुसाईं, “तू मेरी पहली नहीं, आख़िरी भी नहीं। तू मेरी हर रात है।”

“और ये दोनों?” मैंने धक्का देते हुए पूछा।

“ये दोनों मेरी नई सुबह हैं,” उन्होंने कहा।

मैं ज़ोर से चलने लगा। हर धक्के पर उनकी चूचियाँ हिलतीं, हर धक्के पर उनकी गांड चारपाई पर टकराती, हर धक्के पर उनके होंठ खुलते और कोई आवाज़ निकलती। रोहित ने उनका एक हाथ पकड़ा और चूमा। आकाश उनकी चूचियों को दबाता रहा। और मैं उनके अंदर, उनकी बुर में, जो मेरे लंड को ऐसे जकड़े हुए थी जैसे जकड़ने के लिए ही बनी हो।

और फिर वो आईं। तीसरी बार उस रात। पूरे जिस्म से, सिर से पाँव तक, काँपती हुई। उन्होंने दोनों टाँगें मेरी कमर पर कस लीं और मेरे लंड को अंदर जकड़ लिया। और उसी जकड़न में मैं भी निकल पड़ा। पूरा अंदर। गहरा। लंबा। और मैं उनके ऊपर ढह गया।

कुछ देर हम दोनों ऐसे ही रहे। मेरा लंड अंदर, उनकी बुर ने उसे पकड़े रखा। उनकी साँस मेरी गर्दन पर। और मेरी साँस उनके कान में।

फिर मैं उतरा और उनके बगल में लेट गया। रोहित दूसरी तरफ लेट गया। आकाश सिरहाने पर बैठ गया। और दादी — दादी तीन लड़कों के बीच, चारपाई पर, पसीने से भीगी, बाल खुले, चूचियाँ खुली, और पूरी तरह शांत।

उन्होंने आँखें खोलीं और तीनों को एक-एक करके देखा। फिर धीरे से कहा — “अब किसी को कुछ बताने की ज़रूरत नहीं। अब बस होता रहेगा।”

वो रात हम चारों ने उसी कमरे में काटी। एक चारपाई, एक दरी, और एक चादर — जो चारों पर पूरी नहीं आई, लेकिन फिर भी हम चारों उसी के नीचे लेटे रहे। रोहित एक तरफ, आकाश दूसरी तरफ, मैं बीच में, और दादी मेरे ऊपर आधी लेटी हुई — उनका सिर मेरी छाती पर, उनका हाथ मेरे पेट पर, उनकी टाँग मेरी टाँग पर।

आधी रात को आकाश ने धीरे से कहा, “नीलम, आप सो रही हैं?”

“नहीं,” वो बोलीं।

“एक बात पूछूँ?”

“पूछ।”

“आज पहले जो हुआ,” उसने कहा, “उसमें आपको कैसा लगा?”

दादी हँसीं। अँधेरे में उनकी हँसी सुनाई दी। “अच्छा लगा,” उन्होंने कहा, “बहुत अच्छा लगा। लेकिन सबसे अच्छा ये लगा कि तीनों ने एक-दूसरे को जगह दी। कोई जल्दी नहीं की। कोई लड़ा नहीं। तुम तीनों सच में दोस्त हो।”

“और आप?” रोहित ने पूछा।

“मैं क्या?”

“आप हमारी क्या लगती हैं?” उसने पूछा। “दादी? या कुछ और?”

दादी कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “जब तक तुम्हें शादी की लड़की न मिल जाए, तब तक मैं तुम तीनों की औरत हूँ। और उसके बाद भी — जब मन करे, आ जाना। घर खुला है। और मैं भी खुली हूँ।”

फिर वो मेरी तरफ मुड़ीं और मेरे कान में धीरे से कहा, “और तू — तू तो रोज़ आएगा। तेरे बिना ये बूढ़ी औरत सो नहीं पाएगी।”

मैंने उनका माथा चूमा।

सुबह जब बिजली आई, तो पंखा चलने लगा और कमरे में ठंडी हवा आई। रोहित और आकाश उठे, नहाए, और चले गए। जाते-जाते आकाश ने मुझसे कहा, “भाई, अगले शनिवार भी।”

“पक्का,” मैंने कहा।

और जब वो दोनों गए, तो दादी रसोई में चाय बनाने लगीं। साड़ी वही हरी, बाल वही खुले, और गर्दन पर वो निशान — जो रात की गवाही दे रहा था। मैं दरवाज़े पर खड़ा उन्हें देख रहा था।

उन्होंने बिना मुड़े कहा, “क्या देख रहा है?”

“आपको,” मैंने कहा।

“अच्छा,” उन्होंने कहा, और चाय का कप मेरी तरफ बढ़ा दिया।

और उस सुबह की चाय में जो स्वाद था — वो किसी और चाय में नहीं है। क्योंकि वो चाय उस औरत ने बनाई थी, जिसे रात में तीन लड़कों ने चोदा था, और जो सुबह बिल्कुल उसी शांति से चाय बना रही थी — जैसे कुछ हुआ ही न हो।

लेकिन हुआ था। और आगे भी होता रहेगा।

क्योंकि नीलम यादव ने तेरह साल बर्बाद किए थे — और अब वो एक दिन बर्बाद नहीं करने वाली थीं।

अगली बार मिलते हैं — उस रात, जब दादी ने कहा था “अब बस होता रहेगा,” और हम तीनों ने मिलकर उसे पूरा कर दिया।

NEXT PART: दादी की बीमारी और फिर दिल्ली जाना और नीग्रो से चुदाई

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

1 thought on “मेरी दादी ने मेरे तीन दोस्तों से ग्रुप में चुदवाई”

  1. Lucknow ya aas paas se koi unsetisfaid female jo secret relationship banana chahti ho to msg karo sab secret rahega.

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