andolan me netaji ne hotel me choda
आंदोलन की थकान उतारने के नाम पर नेताजी ने होटल के सुइट में श्रुति की चूत और गांड दोनों को बेरहमी से चोदा। चुचियाँ चूसीं, मुँह में लंड ठूँसा, गांड फाड़ी और बार-बार वीर्य से भर दिया। असली नेता-कार्यकर्ता सेक्स स्टोरी।
मेरा नाम श्रुति है। उम्र चौबीस। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और पार्टी की युवा इकाई में काम करती हूँ। उस हफ्ते बड़ा आंदोलन चल रहा था। संसद के बाहर धरना, नारेबाजी, भीड़… सब कुछ। नेताजी खुद मैदान में थे। नाम है राजेश सिंह। उम्र पैंतालीस के आसपास, लंबा, गठीला, दाढ़ी में थोड़ा साँवलापन, आँखों में वह चमक जो सत्ता वालों में होती है।
तीसरे दिन की शाम को बारिश शुरू हो गई। भीड़ छटने लगी। नेताजी के पीए ने मुझे बुलाया, “श्रुति जी, नेताजी आपको होटल में बुलवा रहे हैं। कुछ जरूरी बात है आंदोलन को लेकर।”
मैं तैयार हो गई। काली जींस, सफेद शर्ट, बाल खुले। होटल पांच सितारा था। नेताजी का सुइट ऊपर के फ्लोर पर। दरवाजा खुलते ही अंदर की ठंडक और महंगी खुशबू ने घेर लिया। नेताजी सोफे पर बैठे थे। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले हुए। सीने के बाल साफ दिख रहे थे।
“आओ श्रुति,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। “बैठो। थक गई होगी भागदौड़ में।”
मैंने सामने वाली कुर्सी पर बैठना चाहा लेकिन उन्होंने हाथ बढ़ाकर अपने पास सोफे पर बिठा लिया। काफी करीब। उनकी जाँघ मेरी जाँघ से छू रही थी। उन्होंने खुद व्हिस्की का गिलास मेरे हाथ में थमाया।
“पिओ… आज की थकान उतारो।”
मैंने घूँट भरा। शराब के साथ उनकी नजरें मेरी चुचियों पर थीं। शर्ट के बटन के बीच से थोड़ी सी फांकी दिख रही थी। नेताजी ने सीधा कहा, “तुम आंदोलन में सबसे ज्यादा मेहनत कर रही हो। तुम्हें इनाम मिलना चाहिए।”
उनका हाथ मेरी पीठ पर आ गया। धीरे-धीरे कमर की तरफ सरकने लगा। मैंने गिलास नीचे रखा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। नेताजी ने मेरे चेहरे के करीब आकर कहा, “आज रात तुम यहीं रुको। सुबह तक आंदोलन की रणनीति बनाएँगे।”
फिर उन्होंने मेरे होंठ पकड़ लिए। पहले हल्के से, फिर जोर से। उनकी दाढ़ी मेरे गालों पर चुभ रही थी। जीभ मेरे मुँह में घुस गई। एक हाथ से उन्होंने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। तीन बटन खुलते ही मेरी चुचियाँ ब्रा में कैद नजर आ गईं। नेताजी ने ब्रा का हुक खोला और चुचियाँ बाहर निकाल लीं।
“बढ़िया माल है… बड़ी-बड़ी और सख्त निप्पल,” उन्होंने कहा और एक चुची मुँह में ले ली।
उनकी जीभ निप्पल पर घूम रही थी। दाँत हल्के से काट रहे थे। मैं कराह उठी। दूसरा हाथ जींस के बटन पर था। उन्होंने जिप नीचे की और हाथ अंदर डाल दिया। मेरी चूत पहले से गीली थी। उँगलियाँ पैंटी के अंदर घुस गईं।
“साली… आंदोलन में इतनी गीली रहती है क्या?” नेताजी हँसे।
उन्होंने दो उँगलियाँ मेरी चूत में डाल दीं। तेजी से अंदर-बाहर करने लगे। मैं सोफे पर पीछे की तरफ झुक गई। नेताजी मेरी दोनों चुचियाँ बारी-बारी से चूस रहे थे। उँगलियाँ चूत के अंदर मुड़-मुड़ कर उस जगह को कुरेद रही थीं जहाँ से मजा आता है।
मैंने उनकी पैंट का बटन खोला। अंदर से मोटा, लंबा लंड बाहर निकला। नसों से भरा हुआ, सिरे से पहले से पानी रिस रहा था। मैंने उसे हाथ में लिया और सहलाने लगी। नेताजी की साँसें तेज हो गईं।
“मुँह में ले… पूरा,” उन्होंने आदेश दिया।
मैंने सोफे से नीचे घुटनों के बल बैठकर लंड मुँह में ले लिया। पहले सिरा चूसा, फिर पूरा अंदर ले गई। गला तक। नेताजी ने मेरे बाल पकड़कर सिर आगे-पीछे करने लगे। लंड मेरे गले में बार-बार धँस रहा था। लार टपकने लगी। आँखों से पानी आने लगा लेकिन मैंने रोक नहीं।
थोड़ी देर बाद नेताजी ने मुझे उठाया। जींस और पैंटी एक झटके में नीचे खींच दी। मैं कमर से नीचे नंगी हो गई। उन्होंने मुझे सोफे पर लिटा दिया। टाँगें फैलाईं और खुद घुटनों के बल बैठकर मेरी चूत पर मुँह लगा दिया।
उनकी दाढ़ी मेरी जाँघों के अंदर खुजली पैदा कर रही थी। जीभ ने पहले क्लिट को चूसा, फिर छेद के अंदर घुसकर घुमाया। दो उँगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिलाईं। मैं तकिया पकड़े हुए कराह रही थी।
“चाटो… और अंदर… अह्ह…” मेरी आवाज निकल रही थी।
नेताजी ने तब तक चाटा जब तक मैं पानी नहीं छोड़ दी। चूत से पानी उनकी दाढ़ी पर लग गया। फिर वे खड़े हुए। लंड हाथ में लिया और मेरे चूत के छेद पर सेट किया। एक जोरदार धक्का। पूरा लंड अंदर धँस गया।
“आह्ह्ह… इतना मोटा… धीरे…” मैं चीखी।
लेकिन नेताजी ने धीरे नहीं किया। दोनों हाथों से मेरी कमर पकड़ी और जमकर चोदने लगे। हर धक्का इतना जोरदार था कि सोफा चरमरा रहा था। मेरी चुचियाँ हवा में हिल रही थीं। नेताजी एक चुची मुँह में ले लेते और जोर-जोर से चूसते।
“आंदोलन में नारे लगाती थी न… अब चूत में नारे लगवा,” वे बोल रहे थे।
मैं कुछ बोल नहीं पा रही थी। सिर्फ कराहें निकल रही थीं। नेताजी ने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर चढ़ा लीं। कोण बदल गया। लंड और गहराई तक जा रहा था। हर धक्के के साथ मेरी चूत की आवाज आ रही थी—चप-चप।
थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड निकाला और मुझे घुमा दिया। अब मैं सोफे पर घुटनों के बल थी। गांड उनके सामने। नेताजी ने थूक लगाया और लंड को गांड के छेद पर रखा।
“गांड भी दूँगी न आज?” उन्होंने पूछा।
मैंने सिर्फ हाँ में कराह भरी। उन्होंने धीरे से दबाव दिया। छेद फैल रहा था। दर्द हो रहा था लेकिन मजा भी। पूरा लंड जब गांड में समा गया तो मैंने तकिया मुँह में दबा लिया। नेताजी ने गांड चोदनी शुरू कर दी। पहले धीरे, फिर बहुत तेज। एक हाथ से मेरी चूत में उँगली डाले हुए थे।
“क्या टाइट गांड है… फटने वाली है,” वे गुर्रा रहे थे।
मैं बार-बार चरम पर पहुँच रही थी। शरीर काँप रहा था। नेताजी ने गांड में ही छोड़ने का मन किया लेकिन निकाला और चूत में डाल दिया। कुछ जोरदार धक्के मारकर अंदर ही वीर्य छोड़ दिया। गर्म धारें मेरी चूत में भर गईं। मैं भी साथ में पानी छोड़ रही थी। दोनों हाँफते हुए गिरे।
लेकिन नेताजी रुके नहीं। आधा घंटा आराम करके फिर से शुरू हो गए। इस बार उन्होंने मुझे खिड़की के पास खड़ा कर दिया। शहर की लाइटें नीचे चमक रही थीं। नेताजी ने पीछे से आकर फिर से चूत में लंड डाल दिया। एक हाथ मेरी चुची पर, दूसरा क्लिट पर। जोर-जोर से धक्के।
“देख नीचे… तेरे आंदोलन वाले लोग… और तू यहाँ नेताजी की चूत बन रही है,” वे मेरे कान में बोल रहे थे।
शर्म और उत्तेजना दोनों से मेरी चूत और गीली हो गई। नेताजी की गति पागलों जैसी हो गई। बिस्तर पर ले जाकर उन्होंने मुझे मिशनरी में चोदा। फिर कुत्तिया बनाकर। फिर खुद नीचे लेट गए और मुझे ऊपर बैठा लिया। मैं उनकी छाती पर हाथ रखे हुए कमर हिला रही थी। चुचियाँ उनके मुँह में जा रही थीं।
रात भर यह सिलसिला चला। नेताजी ने तीन बार छोड़ा। एक बार चूत में, एक बार गांड में, एक बार मेरे मुँह में। मैंने सब निगल लिया। मेरी चूत और गांड दोनों सूज गई थीं। चुचियों पर दाँतों के निशान पड़ गए थे।
सुबह जब रोशनी आई तो नेताजी अभी भी मेरे अंदर थे। धीरे-धीरे हिल रहे थे। उन्होंने मेरे कान में कहा, “आज से तू सिर्फ आंदोलन की नहीं… नेताजी की भी है। जब बुलवाऊँगी, आ जाना। चूत गरम रखती रहना।”
मैंने सिर्फ सिर हिलाया। शरीर में जान नहीं बची थी लेकिन मजा इतना आया था कि मना करने का मन नहीं हुआ।
उस दिन के बाद से आंदोलन के हर बड़े कार्यक्रम के बाद नेताजी मुझे होटल बुलाते। कभी सुइट में, कभी दूसरी जगह। कभी अकेले, कभी उनके किसी और नेता के साथ। लेकिन पहली रात वाली वह चुदाई… जब उन्होंने पहली बार मेरी चूत और गांड दोनों को जमकर चोदा था… वह कभी नहीं भूली।
अब जब भी आंदोलन की बात आती है तो मेरी चूत खुद-बخود गीली हो जाती है। क्योंकि अब आंदोलन सिर्फ नारे नहीं रह गए। अब आंदोलन का मतलब है… नेताजी का मोटा लंड, मेरी चूत में, मेरी गांड में, मेरे मुँह में। और उनकी वह आवाज—“आज जमकर चोदूँगा तुझे।”
और वे चोदते हैं। हर बार। जमकर। बिना रुके। पूरी रात।
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