मेरी बहन की बुर, मेरे पति का लंड

sister chudai kahani

महीने के आख़िरी शुक्रवार को हम निकले। सुबह पाँच बजे। अँधेरा था, सड़कें खाली थीं, और सुरेश की गाड़ी में पीछे की सीट पर दो बैग रखे थे — एक मेरा, एक निधि का। निधि शुरू में पीछे बैठी थी। फिर आधे घंटे बाद उसने कहा, “जीजू, आगे बैठूँ? पीछे उल्टी हो रही है।”

अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे मेरी और मेरी छोटी बहन की मेरे हस्बैंड ने बुर चोदी

सुरेश ने गाड़ी रोकी। निधि आगे आकर बैठ गई। मैं पीछे। और फिर अगले चार घंटों तक मैंने आगे की सीट का वो दृश्य देखा जो मुझे जाना-पहचाना लगा — सुरेश का दाहिना हाथ गियर पर, बायाँ हाथ निधि की जाँघ पर। शुरू में सिर्फ़ टिका हुआ। फिर थोड़ा ऊपर। फिर निधि का हाथ उस हाथ पर, उँगलियाँ फँसी हुईं।

घाट का रास्ता शुरू हुआ। बाएँ तरफ़ खाई, दाएँ तरफ़ पहाड़, और नीचे घाटी में बादल भरे पड़े थे। निधि ने खिड़की खोली और बाहर हाथ निकाल दिया। हवा उसके बाल उड़ा ले गई। वो हँसी — बच्चों जैसी हँसी, और सुरेश ने उसे देखा।

“क्या?” निधि ने पूछा।

“कुछ नहीं,” सुरेश ने कहा।

“फिर देखते क्यों हो?”

“इसलिए कि आज तीन दिन तेरे हैं,” सुरेश ने कहा। “देखने का मौक़ा कल कम मिलेगा।”

निधि चुप हो गई। फिर उसने खिड़की से हाथ अंदर किया, सुरेश की कलाई पकड़ी, और उसे अपनी जाँघ पर रख दिया। पूरे घाट उतरने तक हाथ वहीं रहा।

रास्ते में एक ढाबे पर रुके। पराँठे, दही, अचार, और चाय। ढाबे के पीछे एक छोटी नदी बह रही थी। निधि पानी के पास गई, पैर डुबोए, और पलटकर मुस्कुराई। उसने पहने थे — पीली कॉटन कुर्ती और लाल जींस। सुरेश उसे देखते रहे, और चाय का गिलास हाथ में लिए भूल गए कि वो पी रहे हैं।

“सुरेश,” मैंने पास जाकर कहा, “चाय ठंडी हो रही है।”

“अच्छा,” उन्होंने कहा, और आँखें नहीं हटाईं।

“अच्छा क्या,” मैंने कहा। “अच्छा, चाय पी लो।”

उन्होंने गिलास पिया। और मैं मुस्कुराते हुए पीछे हट गई। आठ साल में पहली बार मैंने अपने पति को किसी और को देखते हुए इतना जवान पाया था। और ये जवानी उस लड़की ने दी थी जो नदी में पैर डुबो रही थी — मेरी बहन ने।

दोपहर बारह बजे हम पहुँचे।

रिज़ॉर्ट नदी के किनारे था — चार कॉटेज, एक रिसेप्शन, और बाक़ी सिर्फ़ जंगल। कॉटेज लकड़ी का था, ढालू छत वाला, और उसके पीछे एक बालकनी थी जो सीधे नदी के ऊपर झुकी हुई थी। कमरे में एक बड़ा बेड, एक पुराना टेबल, दो कुर्सियाँ, और एक खुला बाथरूम जिसकी दीवार के पीछे पेड़ दिखते थे।

रिसेप्शन वाले ने बुकिंग देखी और पूछा, “तीन लोग, एक कमरा — बेड एक है। ठीक है ना?”

निधि ने झट से कहा, “ठीक है।”

मैंने और सुरेश ने एक-दूसरे को देखा और चुप रहे।

कमरे में जाकर निधि ने पहले बालकनी का दरवाज़ा खोला। बाहर नदी की आवाज़ आई — गहरी, लगातार, नीचे पत्थरों पर पानी के गिरने की। हवा में गीली मिट्टी की महक थी। आसमान पर बादल थे, और दूर पहाड़ पर बारिश का पर्दा दिख रहा था।

निधि बालकनी की रेलिंग पर हाथ रखकर खड़ी हो गई। पीछे से उसकी कमर, उसके कूल्हे, और उसकी पीठ — सब सामने था। सुरेश कमरे के बीच में खड़े होकर उसे देख रहे थे।

“तीन दिन,” निधि ने बिना पलटे कहा। “और तुम दोनों मुझे कुछ नहीं पूछोगे?”

“क्या पूछें?” मैंने कहा।

“कि मुझे क्या चाहिए।” वो पलटी। “दीदी, तुमने मेरी लिस्ट पढ़ी थी। आज सबसे पहला नंबर आएगा — दोपहर, बारिश, और खुली बालकनी।”

“बारिश तो अभी दूर है,” सुरेश ने कहा।

निधि ने आसमान की तरफ़ देखा। “दूर नहीं है।”

और सच में, वो दूर नहीं थी।

सामान खोला, नहाए, खाना खाया। तीन बजे निधि बालकनी में बैठी थी और सुरेश कुर्सी पर, और मैं चारपाई पर लेटी थी। बातें चल रही थीं, पर आधी। नीचे नदी की आवाज़ हर शब्द के बीच घुस रही थी।

फिर हवा बदली। अचानक। पहले झोंका आया — ठंडा, गीला — और कमरे के पर्दे उड़ गए। निधि ने उठकर देखा। दूर, पहाड़ के पीछे से एक सफ़ेद पर्दा खिसक रहा था, और उसके नीचे नदी की सतह पर बूँदों के गोले बन रहे थे।

“आ गई,” निधि ने कहा।

और फिर बारिश टूट पड़ी।

पहले मोटी बूँदें, फिर बार-बार, फिर ऐसा पानी जैसे कोई ऊपर से बाल्टियाँ उलट रहा हो। छत पर गड़गड़ाहट, पत्तों पर चटकारे, नदी पर एक सफ़ेद परत। और बालकनी की लकड़ी पर पानी ऐसे गिरने लगा जैसे कोई झरना बह रहा हो।

निधि बालकनी के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने पलटकर देखा। उसकी कुर्ती पहले से पतली थी, और हवा में वो शरीर से चिपक गई थी — दोनों दूध की गोलाई, और नीचे पेट की लकीर। उसके निपल्स कपड़े के नीचे खड़े दिख रहे थे।

“जीजू,” उसने कहा, “आओ।”

सुरेश उठे। मैं भी उठी।

निधि बाहर बालकनी में गई। बारिश उस पर गिरी। पहले सिर पर, फिर कंधों पर। उसने आँखें बंद कर लीं और पूरा शरीर ढीला कर दिया। पाँच सेकंड में उसकी कुर्ती पूरी भीग गई और उसके शरीर से चिपककर उसकी हर लकीर दिखाने लगी। फिर उसने कुर्ती नीचे से ऊपर की और सिर से निकाल दी, और उसे रेलिंग पर लटका दिया।

अब वो ब्रा में थी। गीली। और फिर ब्रा भी खोल दी। दोनों दूध बाहर आए — भारी, पानी से भीगे, निप्पल पर पानी की बूँदें लटकती हुईं। फिर जींस। भीगी जींस निकालना मुश्किल था, और वो हँसते-हँसते लड़खड़ाते हुए निकाली, और फिर पैंटी भी। और वो पूरी नंगी, बारिश में, नदी के ऊपर खड़ी हो गई।

सुरेश ने अपनी कमीज़ उतारी। फिर पैंट। फिर शॉर्ट्स। और उनका लंड आधा खड़ा, भीगा हुआ, बाहर आ गया।

मैंने अपनी साड़ी के हुक खोले और वो भीगी साड़ी, ब्लाउज़, सब बालकनी की रेलिंग पर लटक गए। और फिर तीनों नंगे, बारिश में, एक लकड़ी की बालकनी पर खड़े थे।

निधि ने रेलिंग पकड़ी और झुक गई। हाथ रेलिंग पर, घुटने ज़रा मुड़े, कमर ऊपर। और पीछे से उसकी बुर साफ़ दिखने लगी — पानी से भीगी, और भीतर से गीली।

“जीजू, ऐसे ही करो,” उसने कहा। “जैसे सुबह बालकनी में किया था। पर इस बार बारिश में।”

सुरेश पीछे आए। उन्होंने अपने लंड को उसके नितंबों के बीच रखा और एक बार रगड़ा। फिर दबाया।

बारिश की आवाज़ में निधि की कराह दब गई। लंड अंदर गया — धीरे, पर पूरा। और निधि ने रेलिंग को दोनों हाथों से जकड़कर सिर नीचे कर लिया। पानी उसकी पीठ पर बहता हुआ कमर से नीचे जा रहा था, और सुरेश का लंड उसी पानी के बीच अंदर-बाहर हो रहा था।

फिर मैं सामने गई।

बालकनी छोटी थी, पर दो लोगों की जगह थी। मैं निधि के सामने खड़ी हो गई — इतनी पास कि हमारे पेट एक-दूसरे से टिक जाएँ। निधि ने सिर उठाकर मुझे देखा। बारिश उसकी पलकों पर गिर रही थी और वो पलकें झपका रही थी।

“दीदी,” वो हाँफी, “तुम सामने हो।”

“हाँ,” मैंने कहा।

“तो दोनों तरफ़ से भर दो।”

और फिर हम दोनों ने वो किया। निधि के पीछे सुरेश, और आगे मैं। सुरेश पीछे से धक्के मार रहे थे, और मैं आगे से अपने दोनों दूध निधि के दूध पर रगड़ रही थी। चार दूध, चार निपल्स, सब एक-दूसरे पर चिपके, बारिश में फिसलते हुए। निधि के निपल्स मेरे निपल्स से रगड़ खा रहे थे और हर धक्के पर उसका पूरा शरीर मुझ पर आगे आ जाता था।

मैंने निधि का चेहरा दोनों हाथों में थामा और उसके होंठ चूसे। बारिश का पानी हमारे बीच से बहता हुआ हमारे मुँह तक आ रहा था। निधि मेरे होंठ चूसते हुए भी कराह रही थी, और सुरेश पीछे तेज़ हो रहे थे।

फिर मैंने हाथ नीचे किया और निधि की बुर के ऊपर वाली गाँठ पर उँगली रखी, और धक्कों की ताल पर उसे रगड़ने लगी।

निधि चीख पड़ी। “दीदी! दोनों तरफ़ से मत करो!”

“क्यों?”

“टूट जाऊँगी!”

“तो टूट जा,” मैंने कहा। “आज तेरा दिन है।”

और वो टूटी। बारिश में, नदी के ऊपर, दो जिस्मों के बीच फँसी हुई। उसकी टाँगें काँपीं, उसने रेलिंग पकड़कर खुद को सँभाला, और उसकी बुर ने सुरेश के लंड को लंबे-लंबे ऐंठन के साथ जकड़ लिया।

सुरेश ने धक्के तेज़ किए। दस, बीस, तीस — और फिर वो भी झड़ गए, निधि के अंदर, बारिश की आवाज़ में दबी हुई एक गहरी आवाज़ के साथ।

दोनों ढीले पड़े। निधि रेलिंग पर झुकी रही, हाँफती हुई। सुरेश उसकी पीठ पर अपना माथा टिकाए खड़े रहे। और मैं सामने, निधि के भीगे चेहरे को देखती हुई।

कुछ सेकंड बाद निधि ने आँखें खोलीं और बहुत धीरे से कहा, “दीदी।”

“हाँ।”

“लिस्ट का पहला नंबर पूरा।”

फिर वो हँसी — भीगी, थकी, खुश। और उसने मेरा हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख दिया, जहाँ उसका दिल धड़क रहा था।

रात को हमने कॉटेज के बाहर खाना खाया — चूल्हे पर बनी रोटी, साग, और गरम पानी में अदरक की चाय। बारिश रुक गई थी और आसमान में तारे खुल गए थे। नदी अब भी बह रही थी, पर उसकी आवाज़ ज़रा नरम थी।

खाने के बाद निधि ने अपना फोन मेज़ पर रखा और उस लिस्ट को खोला।

“दीदी, दूसरा नंबर।”

“याद है,” मैंने कहा।

“आज रात।”

“अभी?”

“अभी।”

और वो उठकर अंदर चली गई।

कमरे में लैंप जल रहा था — पीला, कमज़ोर। निधि ने कपड़े उतारे, बेड पर बैठ गई, और फिर सुरेश के सामने घुटनों के बल बैठ गई। वही जगह — बेड के किनारे, पैरों के पास। बिल्कुल वैसे ही जैसे अपने घर में बैठी थी।

सुरेश बेड पर बैठे थे। उनका लंड अभी आधा खड़ा था। निधि ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, जड़ पर हाथ रखा, और ऊपर देखकर बोली, “जीजू, आज निकालने का हिसाब बदलेगा।”

“क्या हिसाब?”

“आज मुँह में नहीं।” उसने अपनी उँगली से अपने गाल को छुआ। “यहाँ। और जब तक मैं न कहूँ, मुँह धोने नहीं देना।”

सुरेश ने उसके बालों में हाथ डाला। “और अगर गिर जाए?”

“गिरने दो,” निधि ने कहा। “पर पहले चूम लेना।”

फिर उसने लंड मुँह में लिया।

पिछली बार से वो बदल गई थी। अब वो रुकती नहीं थी, डरती नहीं थी। अब वो जानती थी कि कहाँ तक जाना है और कहाँ रुकना है। अब वो लंड को गले तक ले जाती, वहाँ दो सेकंड रुकती, गले की मांसपेशी से उसे दबाती, और फिर धीरे-धीरे ऊपर आती। लार लंड पर लगकर नीचे बहती, उसकी ठुड्डी पर आती, और उसके दूध पर गिरती।

सुरेश की साँसें छोटी हो गईं। मैं बेड के दूसरी तरफ़ बैठी देख रही थी और मेरे अंदर भी कुछ हिल रहा था।

आठ मिनट बाद सुरेश ने हाँफकर कहा, “निधि, निकलने वाला हूँ।”

निधि ने लंड मुँह से निकाला — चट से — और उसे दोनों हाथों से ऊपर सीधा किया। फिर आँखें बंद कर लीं और चेहरा ज़रा ऊपर किया। मुँह खुला, जीभ थोड़ी बाहर, और होंठों पर लार।

“अब,” उसने कहा।

सुरेश की कमर कसी। पहला झटका उसके माथे पर गिरा। दूसरा दाएँ गाल पर। तीसरा होंठों पर, और चौथा ठुड्डी पर। निधि हिली नहीं। वो वैसे ही चेहरा ऊपर किए रही — आँखें बंद, मुँह खुला — जब तक सुरेश की कमर ढीली नहीं हुई।

फिर सुरेश रुके, लंड अब भी हाथ में, और उन्होंने नीचे देखा।

निधि का पूरा चेहरा भरा हुआ था। माथे पर, दोनों गालों पर, नाक के पास, होंठों पर, ठुड्डी पर — सफ़ेद, गाढ़ा, और एक लंबी लकीर उसकी गर्दन तक बहकर आ गई थी। और वो आँखें बंद किए बैठी रही, जैसे कोई मूर्ति।

“दीदी,” उसने बिना आँख खोले कहा, “कहा था ना — पहले चूम लेना।”

मैं उठी। बेड पर घुटनों के बल आकर निधि के सामने बैठी, और उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। और फिर एक-एक जगह चूमने लगी — माथा, बायाँ गाल, दायाँ गाल, नाक, और आख़िर में होंठ। हर चुंबन में मुझे वो स्वाद मिला जो मेरे पति का था, पर मेरी बहन के चेहरे पर।

निधि ने आँखें खोलीं। उसकी पलकों पर भी कुछ लगा था और वो झपका नहीं पाई, इसलिए मैंने जीभ से उसकी पलकें साफ़ कीं।

“अब धो सकती है,” मैंने कहा।

“नहीं,” निधि ने कहा। “थोड़ी देर और लगा रहने दो।”

वो उठी, आईने के सामने गई, और अपना चेहरा देखकर हँस पड़ी। “हे भगवान, ऐसा लग रहा है जैसे कोई चित्र बना रहा हो।”

“और,” सुरेश ने पीछे से कहा, “आज तक मेरी किसी औरत ने मुँह में नहीं लिया था।”

निधि रुक गई। धीरे से पलटी। “क्या?”

“हाँ,” सुरेश ने कहा। “संध्या को पसंद नहीं था।”

निधि ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधे उचकाए। “आठ साल से चूसने में आलस आता था।”

निधि कुछ सेकंड चुप रही। फिर वो मेरे पास आई, मेरा चेहरा पकड़ा, और माथे पर चूम लिया। “दीदी, तो आज से ये भी बदल जाएगा।”

“कैसे?”

“देख लेना,” निधि ने कहा।

रात एक बजे। निधि ने लिस्ट का तीसरा नंबर निकाला।

“दीदी,” उसने कहा, “अब तुम जीजू के ऊपर बैठो। और मैं देखूँगी।”

मैं हँसी। “तू देखेगी?”

“बिल्कुल देखूँगी।” उसने पास आकर बेड पर लेट गई, अपनी कोहनी पर सिर टिकाया। “मुझे देखना है कि तुम कैसे चलाती हो। आठ साल में तुमने जीजू को क्या बनाया है।”

सुरेश पीठ के बल लेट गए। लंड अभी भी उठा हुआ — तेतीस की उम्र, और निधि ने उसे आज तीन बार निकलवाया था। पर वो खड़ा था। ऐसे ही हैं वो।

मैं उनके ऊपर चढ़ी। निधि बिल्कुल बग़ल में लेटी थी, इतनी पास कि उसकी साँस मेरी जाँघ पर लग रही थी। मैंने सुरेश का लंड पकड़ा, उठाया, और अपनी बुर पर रखा — जो उस वक़्त पहले से गीली थी, आठ साल की आदत के साथ।

और मैं नीचे बैठी। पूरी। एक बार में।

निधि की साँस रुक गई। “दीदी,” वो बोली, “तुमने तो बिना रुके ले लिया।”

“आठ साल,” मैंने कहा। “अब रुकना नहीं पड़ता।”

और फिर मैं चलने लगी।

मैं निधि से अलग तरीक़े से चलती हूँ। वो उछलती है। मैं बैठकर घुमाती हूँ — कूल्हे गोल, कमर आगे-पीछे, और अंदर की मांसपेशियाँ लगातार दबाती हुई। सुरेश की आँखें बंद हो गईं और उनके हाथ मेरी कमर पर आ गए।

निधि ने देखा। उसने हाथ बढ़ाकर मेरे दूध पकड़े और निप्पल को अँगूठे-उँगली में लेकर दबाया। फिर वो मेरी बुर की तरफ़ झुकी — जहाँ मेरा शरीर सुरेश के लंड पर ऊपर-नीचे हो रहा था — और उसने उँगली से मेरी बुर के ऊपर वाली गाँठ को छुआ।

मैं काँप गई।

“दीदी,” उसने कहा, “अब तुम कराहो। मैंने सुना था, तुम कराहती नहीं।”

“कौन कहा?”

“जीजू ने कहा था। पहली रात में।”

मैंने सुरेश की तरफ़ देखा। वो आँखें बंद किए मुस्कुरा रहे थे। “तूने शिकायत की थी?”

“नहीं,” सुरेश ने कहा। “बताया था।”

और फिर निधि ने अपनी दो उँगलियाँ मेरी बुर के ऊपर रखकर ताल बनाई — और मैं कराहने लगी। पहली बार, आठ साल में, किसी और के हाथ से। और कराह इतनी तेज़ निकली कि मुझे खुद हैरानी हुई।

निधि हँसी। “मिल गई आवाज़।”

फिर तीनों मिलकर चले। मैं ऊपर, सुरेश नीचे, और निधि बग़ल में — जो निप्पल मिले, दबा लिए, जो गाँठ मिली, रगड़ ली। दो मिनट में मैं झड़ पड़ी, और झड़ते वक़्त मैंने सुरेश के ऊपर झुककर उनका चेहरा पकड़ा और उनके होंठ चूसे।

और जब मैं हटी, तो निधि वहीं थी। उसने मेरी जाँघ से नीचे बहते हुए तरल को उँगली पर लिया, और देखा, जैसे कोई नमूना परख रही हो।

“दीदी,” उसने कहा, “अब पता चला जीजू को क्यों तुम्हारी आदत है।”

अगले दिन निधि ने चौथा नंबर निकाला। और ये सबसे बड़ा था।

“जीजू,” उसने सुबह नाश्ते की मेज़ पर कहा, “आज तुम्हें तोड़ना है।”

“किसको?”

“तुम्हें।” उसने चाय का कप रखा। “आज मैं रुकूँगी नहीं। न ‘धीरे’, न ‘रुको जीजू’। जब तक तुम न कहो कि बस, तब तक।”

सुरेश ने उसे देखा। “निधि, तेरी बुर में दो दिन से लगातार दस इंच जा रहा है।”

“तो आज ग्यारहवें दिन की तरह जाओ,” निधि ने कहा। “जैसे आदत हो।”

और फिर वो दिन शुरू हुआ।

दोपहर ग्यारह बजे से। बेड पर। निधि ने पहले खुद को ढीला किया — मेरी जीभ से, फिर सुरेश की उँगलियों से। फिर वो बेड पर पेट के बल लेटी और सुरेश उसके पीछे आए, और बिना रुके अंदर डाल दिया। एक बार में, पूरा।

निधि ने चादर मुँह में भरी। पर नहीं रुकी।

सुरेश ने धक्के शुरू किए — लंबे, गहरे, और लगातार। हर धक्के पर निधि के कूल्हे आगे खिसकते और उसके दूध बेड पर दबते। उसके निपल्स चादर पर रगड़ खा रहे थे और वो उन्हें जानबूझकर रगड़ रही थी।

दस मिनट। पंद्रह। बीस।

मैं पास बैठी देख रही थी और अपनी बुर में उँगलियाँ डाले हुई थी। सुरेश की पीठ पर पसीना आ गया। उन्होंने रुककर साँस ली, पर निधि ने पीछे हाथ बढ़ाकर उनकी जाँघ पकड़ी और कहा, “नहीं। रुकना नहीं।”

“निधि,” सुरेश ने हाँफते हुए कहा, “आदमी है।”

“आदमी ही तो चाहिए,” निधि ने कहा।

फिर वो पलटी, घुटनों के बल आई, और सुरेश को बेड पर बैठा दिया। और उनके ऊपर चढ़कर बैठी। और इस बार वो उछली नहीं — वो बैठी, और अपनी बुर को उनके लंड पर गोल घुमाने लगी, जैसे मैं करती हूँ। मेरी चाल चुरा ली थी उसने।

सुरेश की आँखें बंद हो गईं।

“दीदी की चाल है,” मैंने कहा।

“चुरा ली,” निधि ने हाँफते हुए कहा। “बुरा?”

“नहीं,” मैंने कहा। “अच्छा किया।”

निधि ने पंद्रह मिनट और चलाया। सुरेश की गर्दन की नसें उभर आईं, उनकी जाँघें काँपने लगीं, और उन्होंने पहली बार कहा, “निधि, बस।”

निधि रुकी। “क्या कहा?”

“बस।”

“ठीक है,” निधि ने कहा। और फिर उठकर उनके ऊपर से हट गई — बिना निकलने दिए। सुरेश कराहे। “निधि!”

“अभी नहीं,” निधि ने कहा। “आज मैं तय करूँगी कि कब।”

और उसने आधे घंटे तक सुरेश को ऐसे ही रखा — कभी लंड मुँह में लेकर, कभी हाथ से, कभी जाँघों के बीच, कभी बुर में — और जब भी सुरेश करीब पहुँचते, वो हट जाती। सुरेश की हालत खराब थी। वो हँस रहे थे और कराह भी रहे थे।

“संध्या,” उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर कहा, “तेरी बहन ने मुझे बर्बाद कर दिया।”

“अच्छा ही किया,” मैंने कहा।

आख़िर में, तीन बजे, निधि ने खुद बेड पर पीठ के बल लेटकर टाँगें फैला दीं और कहा, “अब अंदर डालो, और जब तक निकलो, निकलने नहीं देना।”

सुरेश अंदर आए। पूरा, एक बार में। और फिर वो चले — धीमे, गहरे, और लगातार। निधि ने अपनी टाँगें उनकी कमर पर लपेट दीं और एड़ियाँ दबाकर उन्हें और अंदर खींच लिया।

पाँच मिनट। और फिर सुरेश की कमर टूटी। उन्होंने निधि के अंदर निकाला — गहरा, भरा हुआ — और झड़ते वक़्त उन्होंने निधि का नाम लिया। सिर्फ़ निधि का। और निधि ने उन्हें जकड़कर रोक लिया, और उसकी आँखों से पानी निकल आया — खुशी का, थकान का, और किसी और चीज़ का जिसका नाम उसे भी नहीं पता था।

फिर सुरेश बग़ल में गिरे और दस मिनट तक कुछ नहीं बोले।

और निधि उठकर मेरे पास आई, मेरी गोद में सिर रखकर लेट गई, और बोली, “दीदी, चारों नंबर पूरे।”

“पाँचवाँ बाक़ी है,” मैंने कहा।

“पाँचवाँ तो ये पूरा ट्रिप ही था,” निधि ने कहा।

“नहीं,” मैंने कहा। “पाँचवाँ बाक़ी है। और वो आज रात पूरा होगा।”

निधि ने सिर उठाकर मुझे देखा। “कौन-सा?”

“वो जो किसी की लिस्ट में नहीं था,” मैंने कहा। “वो हम तीनों का है।”

रात नौ बजे। बिजली चली गई — पूरे रिज़ॉर्ट की। जनरेटर दस मिनट में आने वाला था, पर निधि ने कहा, “मत चलाओ।” और उसने मेज़ पर चार मोमबत्तियाँ जला दीं।

कमरे में सिर्फ़ पीली, काँपती रोशनी थी। बालकनी का दरवाज़ा खुला था और नदी की आवाज़ अंदर आ रही थी।

हम तीनों बेड पर थे। और कुछ भी तय नहीं था। कोई लिस्ट नहीं, कोई नंबर नहीं।

निधि ने शुरू किया। उसने मुझे पीठ के बल लिटाया और मेरी गर्दन से नीचे चूमना शुरू किया — गला, कॉलरबोन, और फिर मेरे दूध। उसने एक निप्पल मुँह में लिया और दूसरे को उँगलियों से दबाया, और मैंने उसके बालों में हाथ डाल दिया।

सुरेश बग़ल में बैठे देख रहे थे। निधि ने बिना पलटे कहा, “जीजू, हाथ मत लगाना। पहले दीदी।”

सुरेश ने हाथ ऊपर कर दिए, जैसे हार मान ली हो।

निधि मेरे निपल्स से नीचे आई — पेट, नाभि, और फिर मेरी जाँघों के बीच। उसने मेरी दोनों टाँगें खोलीं और मुँह लगा दिया। और उसने वही किया जो मैंने उसके साथ किया था — जीभ नीचे से ऊपर, फिर गाँठ पर गोल, फिर दो उँगलियाँ अंदर और ऊपर की तरफ़ दबाव।

मैं दो मिनट में कराहने लगी। और इस बार मैंने आवाज़ नहीं रोकी। इस बार मैंने ज़ोर से कराहा, और नदी की आवाज़ में मिला दिया।

“दीदी,” निधि ने मुँह उठाकर कहा, “तुम्हारी बुर इतनी गीली है।”

“तेरे जीजू की वजह से,” मैंने कहा।

“नहीं,” निधि ने कहा। “मेरी वजह से।”

और वो फिर झुक गई।

मैं झड़ी — मोमबत्ती की रोशनी में, निधि के मुँह पर। और जब झड़ रही थी तो मैंने अपनी बहन का सिर दोनों हाथों से पकड़कर अपनी बुर पर दबा दिया, और वो हँसते हुए पीछे हटी, मुँह चमकता हुआ।

फिर निधि ने पलटकर सुरेश को देखा। “अब तुम।”

सुरेश आगे आए। और फिर तीनों ने वो किया जो शायद पहली बार किसी ने किया था — निधि मेरे ऊपर लेट गई, मुँह मेरे मुँह पर, दूध मेरे दूध पर। और सुरेश निधि के पीछे आए और उसके अंदर डाल दिया।

अब हर धक्का तीनों तक पहुँच रहा था। सुरेश जब अंदर जाते, निधि आगे खिसकती, और निधि का पूरा वज़न मुझ पर आ जाता — उसके निपल्स मेरे निपल्स पर, उसका पेट मेरे पेट पर। और जब वो बाहर आते, निधि पीछे खिंचती, और उसके निपल्स मेरे निपल्स को खींच ले जाते।

तीन लोग, एक ताल, और एक ही हरकत में तीन शरीर।

मैंने निधि के होंठ चूसे और उसकी कमर पकड़ ली। निधि ने मेरी कमर पकड़ ली। और सुरेश ने निधि की। ऐसे जुड़े हुए, जैसे कोई ज़ंजीर।

आधे घंटे तक चला। बीच में दो बार रुके, पानी पिया, और फिर लौट आए। मोमबत्तियाँ छोटी हो गईं। और जब आख़िरी बार सुरेश निकाले, तो निधि ने पीछे हाथ बढ़ाकर उनकी जाँघ पकड़ ली और कहा, “दीदी के अंदर नहीं। मेरे अंदर।”

“क्यों?” सुरेश ने पूछा।

“क्योंकि आज मैंने तुम्हें तोड़ा था,” निधि ने कहा। “इनाम मेरा।”

और सुरेश उसके अंदर निकले — पूरा, गहरा, और आख़िरी। और निधि चीखी, और उसकी आवाज़ नदी की आवाज़ से ऊपर चली गई।

फिर तीनों ढीले पड़े। पसीने में लथपथ। निधि मेरे ऊपर से हटकर बीच में लेट गई। सुरेश एक तरफ़। मैं दूसरी तरफ़।

मोमबत्तियाँ बुझ गईं।

और अँधेरे में सिर्फ़ तीन साँसों की आवाज़ बची।

तीसरे दिन सुबह बारिश फिर आई। छोटी-सी। हम तीनों ने बालकनी में चाय पी — कंबल में लिपटे, चुप, और थके हुए। सुरेश की आँखों के नीचे हल्के घेरे थे। निधि के होंठ सूजे हुए थे। और मेरी कमर में एक अच्छा-सा दर्द था।

दस बजे निकले।

लौटते हुए निधि पीछे बैठी। शुरू में बातें हुईं, फिर बातें बंद हो गईं, और फिर सिर्फ़ सड़क की आवाज़ बची। घाट उतरते हुए सुरेश ने पीछे देखा — दोनों को, आईने से।

“क्या?” मैंने पूछा।

“कुछ नहीं,” उन्होंने कहा। “बस, अब वापस जाना है।”

और उस “वापस” में एक सवाल था जो तीनों के दिमाग़ में था — वापस कहाँ? उसी पुराने हिसाब में, या किसी नए में?

निधि ने आगे झुककर सुरेश की कंधे पर हाथ रखा। “जीजू।”

“हाँ।”

“तीन दिन खत्म।”

“हाँ।”

“अब?” निधि ने पूछा।

सुरेश ने कुछ देर सोचा। फिर बोले, “अब जो तू तय करे।”

और निधि ने पीछे मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

“दीदी,” उसने कहा, “तुमने पहले दिन एक बात कही थी। दो महीने पहले।”

“कौन-सी?”

“कि मैं बुरा नहीं मानूँगी — ये मेरी फ़िक्र होनी चाहिए थी।”

“हाँ,” मैंने कहा। “कहा था।”

“तो आज बताओ,” निधि ने कहा। “तुम बुरा मानती हो?”

मैंने कुछ देर सोचा। सच में सोचा — नाटक नहीं किया।

“नहीं,” मैंने कहा। “और ये झूठ नहीं है। पहली रात में थोड़ा-सा था — जब दरवाज़े पर खड़ी थी। फिर बेड पर आई, तो खत्म हो गया। और उसके बाद जो हुआ…” मैंने निधि की तरफ़ देखा। “उसके बाद ये सिर्फ़ सुरेश की चुदाई नहीं रही। ये तेरी और मेरी भी चीज़ बन गई।”

निधि की आँखें भर आईं। उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा।

“तो फिर तय करो,” सुरेश ने कहा, सड़क से आँखें हटाए बिना। “दोनों मिलकर। मैं सुनूँगा।”

निधि ने लंबी साँस ली।

“मैं ट्रांसफ़र माँगूँगी,” उसने कहा। “ट्रेनिंग खत्म होते ही। इसी शहर में।”

“और घर?” सुरेश ने पूछा।

“घर नहीं,” निधि ने कहा। “फ्लैट। तुमसे दो गली छोड़कर। ताकि मम्मी को कुछ कहने का मौक़ा न मिले, और मुझे रात में आने के लिए तुम्हारी इजाज़त न माँगनी पड़े।”

सुरेश हँसे। “और इजाज़त किसकी लेनी है?”

“दीदी की,” निधि ने कहा। “और दीदी की इजाज़त तो हमेशा है।”

मैंने पीछे से उसका गाल खींच लिया।

“और सुरेश?” मैंने पूछा।

“सुरेश के पास एक दो-रूम फ्लैट होगा, दो गली दूर,” निधि ने कहा। “जहाँ रात में एक बीवी आ सकती है, और एक दूसरी बीवी भी।”

“दूसरी बीवी?” मैंने कहा।

“यानी मैं,” निधि ने कहा। “काग़ज़ पर नहीं। बुर पर।”

और फिर तीनों हँस पड़े — पहली बार उस पूरे सफ़र में खुलकर।

उसी ढाबे पर रुके जहाँ आते वक़्त रुके थे। वही पराँठे, वही दही। और वही नदी, जिसमें निधि ने पहले पैर डुबोए थे।

इस बार निधि नदी के पास नहीं गई। इस बार वो बेंच पर बैठी रही, सुरेश के कंधे पर सिर रखकर, और मैं उनकी दूसरी तरफ़ बैठी रही, उनका हाथ पकड़े हुए।

ढाबे वाला चाय ले आया। उसने तीनों को देखा और बोला, “भैया, तीन कप चाय — बीवी और बहन के लिए?”

सुरेश ने कुछ कहना चाहा, पर निधि ने पहले कह दिया, “हाँ, बीवी और बहन।”

ढाबे वाला चला गया।

“और?” सुरेश ने धीरे से कहा।

“और क्या?” निधि ने कहा।

“बहन बोल दिया।”

निधि ने सुरेश के कान में फुसफुसाया, इतना धीरे कि मुझे भी नहीं सुनाई दिया — पर मैंने उसका होंठ हिलते देखा और सुरेश की गर्दन लाल हो गई।

“क्या कहा?” मैंने पूछा।

“कुछ नहीं,” दोनों ने एक साथ कहा।

“झूठे,” मैंने कहा, और चाय पीने लगी।

शहर लौटकर निधि दो दिन और रही। और उन दो दिनों में उसने बराबर वाले कमरे में सोया — जिसमें एक पुराना सिंगल बेड था।

पर एक भी रात उसने उस बेड पर पूरी नहीं की।

दोनों रातें वो हमारे बेड पर आई — चुपचाप, बिना पूछे, रात ग्यारह बजे, नाइटी में। पहली रात सुरेश ने उसके साथ की, और मैं बग़ल में लेटी देखती रही। दूसरी रात मैंने और निधि ने सुरेश को बीच में लिटाया और दोनों ने बारी-बारी उस पर चढ़कर खुद चलाया — जब तक सुरेश ने हार मानकर तकिया मुँह पर नहीं रख लिया।

तीसरे दिन सुबह निधि ने अपना बैग बाँधा। और बस स्टैंड पर, बस चढ़ने से पहले, उसने मेरे गले में हाथ डालकर कहा:

“दीदी, एक बात पूछूँ?”

“पूछ।”

“तुम्हारी शादी बीस साल की उम्र में हुई थी। तुमने कभी सोचा था कि आठ साल बाद तुम्हारी ज़िंदगी में ऐसा कुछ होगा?”

“नहीं,” मैंने कहा। “कभी नहीं।”

“और अब?”

मैंने सुरेश की तरफ़ देखा, जो गाड़ी में बैठे बस स्टैंड की भीड़ देख रहे थे। फिर निधि की तरफ़, जिसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

“अब लगता है,” मैंने कहा, “कि अच्छा हुआ।”

निधि ने मेरा हाथ दबाया। “मैं आऊँगी, दीदी। महीने में एक बार। और ट्रांसफ़र के बाद तो रोज़।”

“आ,” मैंने कहा। “पर एक शर्त है।”

“क्या?”

“अब तू गली की रन्डी नहीं है,” मैंने कहा। “अब तू घर की है।”

निधि की आँखें भर आईं। उसने सिर हिलाया और बस चढ़ गई।

खिड़की से उसने हाथ हिलाया। सुरेश ने हाथ हिलाया। और मैंने भी।

फिर बस चली गई।

दो महीने बाद निधि का ट्रांसफ़र हो गया।

उसने हमसे दो गली छोड़कर एक छोटा-सा फ्लैट लिया — एक कमरा, एक किचन, और एक बालकनी जो हमारे फ्लैट की बालकनी से दिखती थी। उसने वहाँ एक नीली एलईडी स्ट्रिप लगाई, क्योंकि उसे नीला पसंद है। और जब भी वो जलती थी, हमें पता चल जाता कि वो घर पर है और जाग रही है।

मम्मी को कभी पक्का पता नहीं चला। पर मम्मी बेवक़ूफ़ नहीं हैं।

एक बार वो हमारे घर आईं और रात रुकीं। सुबह उठकर उन्होंने देखा कि तीनों बेड पर सो रहे थे — और सिर्फ़ एक चादर थी। उन्होंने चश्मा पहनकर देखा, और बस इतना कहा, “हम्म।” और कुछ नहीं पूछा।

फिर दिवाली पर वो फिर आईं। और इस बार उन्होंने किचन में मुझसे पूछा, “संध्या, निधि इतनी बार यहाँ क्यों आती है? दो गली दूर रहती है, फिर भी हफ़्ते में तीन दिन तुम्हारे घर।”

“अकेली है, मम्मी,” मैंने कहा।

“अकेली,” मम्मी ने दोहराया। फिर धीरे से कहा, “और तेरा पति उसके लिए चाय बनाता है। खुद बनाता है। मेरे लिए कभी नहीं बनाई।”

“मम्मी,” मैंने कहा, “आपको क्या लगता है?”

मम्मी ने आँच बंद की, कपड़े से हाथ पोंछे, और मेरी तरफ़ देखा।

“मुझे लगता है,” उन्होंने कहा, “कि तू खुश है। और वो भी खुश है। बाक़ी मुझे समझना नहीं है।”

और वो सब्ज़ी काटने लगीं, जैसे कोई बड़ा रहस्य खुल गया हो और कोई बड़ी बात नहीं हुई हो।

दिवाली के दो दिन बाद। रात। मम्मी लौट चुकी थीं। निधि अपने फ्लैट में थी। और रात साढ़े ग्यारह बजे, मेरे फोन पर मैसेज आया:

“दीदी, नीली लाइट जल गई है।”

मैंने खिड़की से बालकनी की तरफ़ देखा। दो गली दूर, एक छोटी-सी नीली रोशनी जल रही थी।

सुरेश बेड पर लेटे थे, किताब पढ़ते हुए।

“सुरेश,” मैंने कहा।

“हाँ।”

“नीली लाइट जल गई है।”

उन्होंने किताब बंद कर दी। मेरी तरफ़ देखा। और बिना एक शब्द कहे उठ गए, कमीज़ पहनी, और चप्पल पहनने लगे।

“तुम आ रही हो?” उन्होंने पूछा।

“नहीं,” मैंने कहा। “आज तुम जाओ। मैं यहाँ रहूँगी।”

“अकेली?”

“अकेली अच्छा लगेगा,” मैंने कहा। “और तुम्हें भी अच्छा लगेगा। जाओ।”

वो दरवाज़े पर रुके और पलटकर देखा। “संध्या, तू अजीब है।”

“पता है,” मैंने कहा।

वो गए।

मैंने खिड़की से देखा। वो गली पार करके गए, उस इमारत की सीढ़ियाँ चढ़े, और फिर ऊपर की खिड़की में नीली रोशनी के सामने एक आकृति हिली — किसी ने दरवाज़ा खोला।

और फिर वो नीली लाइट पूरी जल उठी। बालकनी की लाइट। मतलब — दरवाज़ा बंद हो गया।

मैं बेड पर लौट आई, चादर ओढ़ी, और छत को देखा।

आठ साल तक मेरी शादी एक सीधी लकीर थी। दो लोग, एक बेड, हफ़्ते में एक रात। फिर मेरी छोटी बहन आई, और उस लकीर में एक तीसरी आकृति जुड़ गई — और लकीर टूटी नहीं, बल्कि त्रिकोण बन गई। और उस त्रिकोण के तीनों कोनों पर एक-एक आदमी नहीं था — तीनों कोनों पर हम तीन थे।

सुरेश, मैं, और निधि।

एक पति, उसकी बीवी, और उसकी बहन — जो अब किसी और के नाम से नहीं पुकारी जाती।

दो गली दूर, नीली लाइट जल रही थी। और मेरे पति उसके कमरे में थे। और मैं यहाँ अकेली लेटी थी — नाराज़ नहीं, बेचैन नहीं, सिर्फ़… पूरी।

मैंने फोन उठाया और निधि को एक मैसेज भेजा:

“आज पूरी रात रुक जाना। सुबह नाश्ता मेरे घर।”

जवाब तुरंत आया। एक ही शब्द था:

“पक्का।”

और मैंने फोन बग़ल में रख दिया, और आँखें बंद कर लीं।

तो यह थी कहानी मेरी, मेरी बहन और मेरे पति की। फिर कभी लिखूंगी की आगे क्या हुआ, लेकिन वादा नहीं करती हूँ की लिखूंगी अब लाइफ थोड़ा बिजी हो गया है।

अगर आप को मेरी कहानी अच्छी लगी तो कमेंट जरुर करिएगा………..

नोट: यहां पोस्ट की गई सभी कहानियां केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। कृपया इन्हें वास्तविक जीवन से जोड़कर न देखें। कहानी में दर्शाए गए किसी भी दृश्य, घटना या चित्र का वास्तविक जीवन में प्रयोग करना हानिकारक हो सकता है। इसके लिए न तो कहानी के लेखक और न ही प्रस्तुतकर्ता जिम्मेदार होंगे। इसलिए कृपया अपनी समझ, बुद्धि और विवेक का उपयोग करें।

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