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पिछली बार मैंने तुम्हें बताया था कि कैसे नीलेश मेरे पीछे पड़ा, कैसे उसने हमारे घर का नंबर ढूँढ़ निकाला, कैसे मेरे भाई से दोस्ती कर ली, और एग्जाम खत्म होते ही उस होटल के कमरे में पहली बार मुझे चोदा। उस दिन के बाद छह महीने तक हम मिलते रहे — कभी उसी होटल में, कभी किसी और कमरे में, कभी किसी के खाली पड़े घर में।
अगर आपने मेरी पिछली कहानी नहीं पढ़ी है तो पढ़े की कैसे एग्जाम के बाद होटल में मेरे बॉयफ्रेंड ने मुझे पहली बार चोदा
उन छह महीनों में नीलेश ने मेरी देह को इतना जान लिया था, जितना मैं खुद नहीं जानती थी। उसे पता था कि मेरी गर्दन के नीचे, कंधे के ठीक पीछे एक जगह है, जहाँ होंठ रखते ही मेरी आँखें अपने-आप बंद हो जाती हैं। उसे पता था कि मेरे बाएँ निप्पल को दाँतों से हल्का काटने पर मैं कैसे काँपती हूँ। उसे पता था कि मेरी गांड के ऊपर हाथ फेरते ही मेरी कमर अपने-आप उसकी तरफ उठ जाती है। उसे मेरे शरीर का पूरा नक्शा याद था — हर रास्ता, हर मोड़, हर वह जगह जहाँ छूने भर से मैं पिघल जाती थी।
और फिर वह वक्त आया, जिसका हम दोनों को डर था।
उसकी पढ़ाई खत्म हो गई। दिल्ली में उसे नौकरी मिल गई। उसके पापा ने उसे बुला लिया। और हम दोनों जानते थे — जो चीज़ मोहल्ले की दो गलियों के बीच पली हो, वह पाँच सौ किलोमीटर दूर नहीं चलती।
आखिरी रात हम फिर उसी होटल में गए। वही कमरा, वही छत का पंखा जो धीरे-धीरे घूमता था, वही खिड़की, वही सफेद चादर। जैसे कमरा भी जानता था कि आज कुछ खत्म हो रहा है।
उस रात नीलेश ने मुझे पहले से भी ज्यादा आराम से चोदा। जैसे कोई आखिरी बार किसी चीज़ को छू रहा हो, और उसकी हर बनावट अपनी उँगलियों में बसा लेना चाहता हो। उसने मेरी कुर्ती के बटन एक-एक करके खोले, मेरी ब्लाउज़ के पीछे की डोरी खोली, और मेरे दूध बाहर निकालकर उन्हें अपने दोनों हाथों में भर लिया। फिर उसने बारी-बारी से दोनों निपल्स चूसे — पहले दायाँ, फिर बायाँ, फिर फिर दायाँ — जब तक मेरे निप्पल सख्त होकर गुलाबी से लाल नहीं हो गए।
फिर उसने मेरी सलवार खींची, मेरी चड्डी उतारी, और मेरे पैरों के बीच घुटने टेककर मेरी चूत पर अपना मुँह रख दिया।
वह मेरी बुर को ऐसे चूसता था, जैसे कोई प्यासा वर्षों बाद पानी पी रहा हो। जीभ से वह मेरे भगशिश्न को सहलाता, होंठों से मेरी चूत के होंठ चूसता, और उँगलियाँ अंदर डालकर मेरे भीतर की दीवारों को छूता। मैं बिस्तर पर पसर गई, और मेरी साँसें उसकी जीभ की गति से भागने लगीं।
फिर उसने अपनी पैंट खोली, अपना लंड बाहर निकाला — जो उस वक्त पत्थर जैसा सख्त खड़ा था — और मेरी चूत के मुँह पर रख दिया। बिना कोई जल्दी किए, धीरे-धीरे, इंच-इंच करके वह मेरे अंदर उतरा। मेरी चूत उसके लंड को इतनी आसानी से ले लेती थी, जैसे वह उसी के लिए बनी हो। जब वह पूरा अंदर आ गया, तो हम दोनों एक साथ साँस लेकर रुक गए — जैसे किसी पूजा की शुरुआत में।
और फिर वह हिला। पहले धीरे, फिर थोड़ा तेज़, फिर और तेज़। उसके हर झटके पर उसकी जाँघें मेरी जाँघों से टकरातीं और एक प्यारी-सी आवाज़ निकलती। मेरी गांड उसके नीचे दबती, मेरे दूध उसके सीने से रगड़ खाते, मेरे निपल्स उसके बालों से चुभते, और मेरी चूत उसके लंड को कसकर जकड़े रहती।
“नीलेश… रुक मत…” मैंने कराहते हुए कहा।
“क्यों रुकूँ?” वह हाँफते हुए बोला। “आज तो पूरा पी लेना है तुम्हें।”
उसने मेरी कमर दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर उठाई और मेरे नीचे तकिया रख दिया। इससे मेरी चूत उसके लंड के सामने और ऊपर उठ गई, और अब वह और गहरा अंदर जाने लगा। हर झटके में वह मेरे भीतर के उस गड्ढे को छू रहा था, जहाँ तक पहुँचने पर मेरी आँखों के आगे रोशनी फैल जाती थी।
और फिर वह हुआ। मेरी चूत ने अपने-आप कसना शुरू किया, मेरा पूरा शरीर काँपने लगा, और मैं उसके नीचे ही ढेर हो गई — पूरी तरह, बिना कोई शब्द, सिर्फ कराहते हुए।
वह मुझे ऐसे देखता रहा, जैसे किसी चमत्कार को देख रहा हो। फिर उसने मेरी गांड दोनों हाथों से पकड़ी, मुझे करवट नहीं लेने दिया, और अपनी रफ्तार बढ़ा दी। दस-पंद्रह झटके और, और फिर वह भी कराह उठा — “रिधिमा… मैं आ रहा हूँ…” — और मेरे अंदर ही गिर पड़ा। गर्म, भरा हुआ, धड़कता हुआ। उसका पूरा शरीर झटके खा रहा था और मेरी चूत उसे पी रही थी।
वह मेरे ऊपर ढेर हो गया। हम दोनों पसीने से भीगे, साँस-साँस के लिए तरसते, किसी और ही दुनिया में पहुँच चुके थे।
कुछ देर बाद उसने मेरे माथे पर चूमा और धीरे से बोला, “रिधिमा, तुम्हें भूल जाऊँगा नहीं।”
नीलेश दिल्ली चला गया। पहले महीने उसने चार बार फोन किया। हर बार वही आवाज़, वही हँसी, वही “भाभी” — लेकिन अब उस “भाभी” में वह बात नहीं थी। दूसरे महीने दो बार। तीसरे महीने एक बार। और फिर… फोन आना बंद हो गया।
मैंने भी बहुत बार उसे मिलाया। लेकिन दूरी कुछ ऐसी चीज़ है, जिसे प्यार हराता नहीं, वक्त हराता है। और वक्त हमें हरा गया।
अब मेरे शरीर को एक आदत पड़ गई थी। छह महीने में जो जगहें छुई गई थीं, वे अब खाली-खाली लगती थीं। रात को बिस्तर पर लेटती, तो मेरे निपल्स बेकार में सख्त हो जाते — जैसे किसी का इंतज़ार कर रहे हों। मेरी चूत बेकार में गीली हो जाती — जैसे उसे कोई चाहिए हो। और जब हवा मेरी गांड पर लगती, तो लगता कोई हाथ फिर से फेर दे।
छह महीने बाद, मेरे जीवन में आया — राकेश।
राकेश हमारे मोहल्ले के दर्जी का बेटा था। उम्र पच्चीस-छब्बीस साल। लंबा नहीं — मुझसे बस दो-तीन इंच ऊँचा। लेकिन बनावट मजबूत। हाथ चौड़े, कलाई मोटी, कंधे भरे हुए। जब वह सिलाई का काम करता, तो उसकी बाँहें ऐसे हिलतीं, जैसे कोई लोहार हथौड़ा चला रहा हो। और उसकी आँखें — स्याह, गहरी, और बोलने वाली।
वह हमारे घर सिलाई का काम लेकर आता था। माँ उसे बहुत मानती थीं — “यह लड़का ईमानदार है, बेटा।” वह आता, फर्श पर बैठकर अपनी मशीन खोलता, कपड़े नापता, सिलता, और चला जाता। लेकिन जब वह जाता, तो उसकी नज़र मेरी तरफ एक सेकंड के लिए रुक जाती। वह एक सेकंड काफी था — हमारी कहानी शुरू करने के लिए।
पहले महीने में उसने कुछ नहीं कहा। सिर्फ देखा। जब मैं चाय लेकर आती, वह दोनों हाथों से प्याला लेता और उसकी उँगलियाँ जानबूझकर मेरी उँगलियों को छूतीं। जब मैं उसके पास से गुज़रती, तो वह जानबूझकर कैंची गिरा देता, ताकि मुझे झुकना पड़े। और जब मैं झुकती, तो उसकी नज़र मेरी कुर्ती के गले से नीचे जाकर रुक जाती — वहाँ, जहाँ मेरे दूध झाँकते थे।
दूसरे महीने उसने बातें शुरू कीं। सिलाई के बहाने, नाप लेने के बहाने, कपड़े के रंग के बहाने। वह पूछता, “दीदी, यह रंग अच्छा है?” और मैं कहती, “कौन-सा?” और वह कहता, “जो तुमने पहना हुआ है।” और फिर हम दोनों मुस्कुरा देते।
तीसरे महीने उसने पहली बार मुझे छुआ। नाप लेते वक्त। कपड़ा नापने के लिए उसने मेरी कमर पर टेप रखा, और उसकी उँगली टेप के नीचे से मेरी कमर की चमड़ी को छू गई। मैं झटके से सिकुड़ गई। उसने तुरंत हाथ हटा लिया और कहा, “सॉरी दीदी।” मैंने कहा, “किस बात की सॉरी?” वह चुप हो गया। और उस चुप्पी में उसने बहुत कुछ कह दिया।
और फिर आई वह रात।
उस साल सर्दी जल्दी आ गई थी। माँ-पापा गाँव गए थे — किसी रिश्तेदार के यहाँ। भाई हॉस्टल में था। मैं घर में अकेली। बस मैं, और चार दीवारें।
रात के नौ बजे दरवाज़ा खटका। मैंने खोला। राकेश खड़ा था — हाथ में एक थैला, जिसमें कपड़े और टेप था। ठंड से उसके गाल लाल थे और साँस से भाप निकल रही थी।
“दीदी, आपके लिए ब्लाउज़ सिल रहा था ना। नाप लेना है। कल देना है,” उसने कहा।
मैं जानती थी कि यह बहाना था। दोपहर में भी नाप ले सकता था। लेकिन मैंने भी कुछ नहीं कहा। उसे अंदर आने दिया।
वह अंदर आया। दरवाज़ा बंद हुआ। और उस बंद दरवाज़े के साथ ही घर का पूरा माहौल बदल गया।
उसने मशीन की तरफ नहीं देखा। कपड़े भी नहीं खोले। वह सीधा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला, “दीदी, एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“आप रोज़ मेरे पास से गुज़रती हो। जानबूझकर गुज़रती हो, या इत्तेफाक से?”
मेरी साँस रुक गई। “क्यों पूछ रहे हो?”
“क्योंकि मैं रोज़ आपके लिए रुकता हूँ,” उसने कहा। “रोज़। और रोज़ आप देखती भी हो, और मुँह फेर लेती हो।”
मैं कुछ नहीं बोली।
“आज मुँह मत फेरना,” उसने धीरे से कहा।
और फिर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ गर्म था — दर्जी का हाथ, जिसमें सुई चलाने की मजबूती थी। उसने मेरी उँगलियाँ अपनी उँगलियों में जकड़ लीं और मुझे अपनी तरफ खींच लिया। मैं लड़खड़ाकर उसके सीने से जा टकराई। मेरे दूध उसके सीने से चपटे हो गए, और मेरे निपल्स उसके कुर्ते के कपड़े से रगड़ खाकर सख्त हो गए।
उसने एक हाथ मेरी कमर पर रखा, दूसरा मेरे बालों के पीछे। और फिर उसने मुझे चूमा।
नीलेश की चूमने की आदत सँभली हुई थी — धीरे, नपा-तुला, प्यार से। राकेश का चुंबन जंगली था। उसने सीधे मेरे होंठ खोल दिए, उसकी जीभ मेरे मुँह के अंदर घुस आई और मेरी जीभ से लिपट गई। उसने मेरे निचले होंठ को दाँतों से पकड़कर खींचा, फिर छोड़ा, फिर फिर पकड़ा। मेरे घुटने काँप गए।
वह मुझे सोफे तक ले गया और धीरे से बिठा दिया। फिर मेरे सामने घुटने टेककर बैठ गया। उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोला — एक झटके में, कोई गाँठ नहीं। फिर मेरी कुर्ती के बटन खोले — नीचे से ऊपर, जल्दी-जल्दी। फिर मेरी ब्लाउज़ की डोरी — बिना खोले, बस नीचे खींच दी।
और मेरे दूध बाहर निकल आए।
वह रुक गया। ठीक उसी तरह, जैसे नीलेश ने पहली बार रुका था। उसने देखा — मेरे भरे हुए दूध, उनके बीच की गड्ढा, और उन पर खड़े हो चुके मेरे निपल्स। ठंडी हवा लगते ही वे और सख्त हो गए और उभरकर चमकने लगे।
“दीदी…” उसने धीरे से कहा, जैसे किसी मंदिर में नाम ले रहा हो।
फिर उसने अपना मुँह बढ़ाया और मेरे बाएँ निप्पल को होंठों में ले लिया। पहले चूसा, फिर जीभ से घुमाया, फिर दाँतों से हल्का काटा। मैंने उसके बाल पकड़कर खींच लिए। उसने दायाँ निप्पल लिया और वही किया। उसके एक हाथ ने मेरे बाएँ दूध को पूरा भर लिया और दबाने लगा — इतने जोर से कि मेरे अंदर तक महसूस हुआ।
मैं कराह उठी।
उसने मेरे दोनों दूध मुँह और हाथ, दोनों से मिलकर मसले। मेरे निपल्स लाल हो गए, मेरे दूध पर उसकी उँगलियों के निशान पड़ गए। और फिर वह नीचे की तरफ बढ़ा।
उसने मेरी सलवार पूरी उतार दी, चड्डी खींच दी, और मेरे घुटने अलग करके मेरी चूत को देखा। ठंडी हवा मेरी गीली चूत से टकराई और मैं सिहर उठी।
“आप गीली हो दीदी,” उसने कहा। “बहुत गीली।”
“तो?” मैंने शरमाकर कहा।
“तो अच्छा है,” वह हँसा। “मेहनत कम करनी पड़ेगी।”
फिर उसने अपनी जीभ मेरी चूत पर रख दी।
वह जल्दी करता था — जल्दी, भूख से, जैसे कोई भूखा खाना खा रहा हो। उसने मेरी बुर के होंठों को चाटा, मेरे भगशिश्न को चूसा, और अपनी जीभ अंदर तक घुसाकर मेरी दीवारों को सहलाया। फिर उसने दो उँगलियाँ अंदर डालीं और तेज़-तेज़ अंदर-बाहर करने लगा। मैं सोफे पर पसर गई, मेरी कमर उठ गई, मेरे दूध उछलने लगे।
“राकेश…” मैंने कराहते हुए कहा।
वह सिर उठाकर मुस्कुराया — “नाम लिया आपने।” फिर और जोर से चाटने लगा।
और फिर उसने अपनी पैंट खोली।
जब उसने अपना लंड निकाला, तो मैं चौंक गई। मोटा। नीलेश से मोटा, और गाढ़ा। उसका सिरा चमक रहा था और वह पूरी तरह खड़ा था — ऊपर की तरफ उठा हुआ, किसी शिकायत की तरह।
“यह…” मैंने कहा।
“डरो मत,” उसने कहा। “आराम से करेंगे।”
वह मेरे ऊपर आया। उसने अपने लंड को मेरी चूत के मुँह पर रखा, एक बार ऊपर-नीचे रगड़ा — मेरी गीलापन उस पर लग गई — और फिर दबाव डाला।
मेरी चूत खुलने लगी। उसका मोटा सिरा अंदर सरका और मैंने होंठ भींच लिए। वह रुका, फिर और धकेला। इंच-इंच। उसने बहुत सब्र दिखाया — जितनी जल्दी उसकी जीभ चलती थी, उतना ही धीरा उसका लंड था।
जब वह पूरा अंदर आ गया, तो मेरी चूत पूरी भर गई थी। इतनी भर गई कि मुझे लगा, मेरे अंदर अब कोई और नहीं समा सकता। उसका लंड मेरी दीवारों से चिपक गया था, हर इंच पर उसका दबाव महसूस हो रहा था।
“तकलीफ?” उसने पूछा।
“अच्छा लग रहा है,” मैंने सच कहा।
और फिर वह हिला।
उसकी गति नीलेश से अलग थी — कम सँभली हुई, ज्यादा भूखी। हर झटका गहरा, हर झटका जोरदार। वह मेरे अंदर तक जाता और फिर लगभग पूरा बाहर निकल जाता, और फिर से घुस जाता। सोफा चरमराने लगा। मेरी गांड सोफे के कपड़े से रगड़ खाने लगी। मेरे दूध उसके सीने से टकराने लगे और मेरे निपल्स उसके पसीने से भीग गए।
उसने मेरे दोनों पैर अपने कंधों पर उठा लिए। अब मेरी चूत उसके लंड के सामने पूरी खुल गई, और वह और गहरा, और गहरा जाने लगा। हर झटके पर मेरे भीतर वह जगह छू जाती, जहाँ से मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं।
“राकेश… और… और जोर से…” मैंने हाँफते हुए कहा।
और वह और जोर से चोदने लगा।
मेरी चूत से चटपट की आवाज़ आने लगी — गीली, भीगी, चिकनी आवाज़। मेरे नीचे सोफा, ऊपर उसका शरीर, और बीच में मैं — पूरी तरह भरी हुई, पूरी तरह खुली हुई। मेरा पूरा शरीर पसीने से नहा गया, ठंडे कमरे में भी।
और फिर वह मेरे कान के पास झुका और धीरे से बोला, “दीदी, पलट जाओ।”
उसने मुझे घुमाया। मैं सोफे पर घुटनों और हाथों के बल आ गई। और मेरी गांड उसके सामने थी — उभरी हुई, गोल, उस ठंडी हवा में।
उसने मेरी गांड दोनों हाथों से पूरी भर ली। दबाया। फैलाया। फिर झुककर मेरी गांड के गड्ढे पर अपना मुँह रख दिया और जीभ फेरने लगा। मैं कराह उठी — नीलेश ने भी यह किया था, लेकिन राकेश ज्यादा भूख से कर रहा था। उसने मेरी गांड के दोनों कूल्हों को चूमा, दाँतों से हल्का काटा, और फिर अपनी जीभ अंदर तक फेर दी।
फिर उसने अपना लंड फिर से मेरी चूत में डाला — इस बार पीछे से। एक ही झटके में पूरा अंदर। मैंने चीख मारी। इस पोज़ीशन में वह और गहरा जा रहा था, और हर झटके पर उसकी जाँघें मेरी गांड से टकरातीं — धप, धप, धप।
उसने एक हाथ मेरी कमर पर रखा और दूसरा नीचे लाकर मेरे भगशिश्न पर। अब जब भी वह अंदर जाता, उसकी उँगली मेरे भगशिश्न को रगड़ती। अंदर लंड, ऊपर उँगली, पीछे उसका पेट — मैं तीन जगह से चोदी जा रही थी।
“रुक मत… रुक मत…” मैं बड़बड़ा रही थी।
वह तेज़ हुआ। उसकी रफ्तार अब पागल थी। मेरी चूत उसके लंड को जकड़ रही थी, छोड़ रही थी, फिर जकड़ रही थी। मेरे दूध सोफे पर दबे हुए थे और मेरे निपल्स कपड़े से रगड़ खा रहे थे।
और फिर वह आया।
मेरे अंदर कुछ जमा हो रहा था — कसता हुआ, बढ़ता हुआ। और फिर अचानक वह खुल गया। मेरा पूरा शरीर झटके खाने लगा। मेरी चूत ने उसके लंड को कसकर पकड़ लिया और धड़कने लगी — एक, दो, तीन बार। मैं सोफे पर ही ढेर हो गई, मुँह से लार बहने लगी, आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
राकेश ने मेरी गांड और कसकर पकड़ी और तेज़-तेज़ धकेला। दस-बारह झटके और, और फिर वह भी कराह उठा — “दीदी… दीदी…” — और मेरे अंदर गिर पड़ा। गर्म। बहुत गर्म। धड़कता हुआ। उसने एक-एक बूँद मेरे अंदर छोड़ी और मेरी चूत उसे पीती रही।
फिर वह मेरे ऊपर ढेर हो गया। उसकी साँसें मेरी गर्दन पर गर्म-गर्म पड़ रही थीं। कमरे में बस हमारी हाँफ और पुराने फ्रिज की घरघर बची थी।
उस रात वह ग्यारह बजे तक रहा। हमने दोबारा किया — इस बार चटाई पर, धीरे-धीरे, थोड़ा आराम से। इस बार उसने मेरे निपल्स मुँह में लेकर बातें कीं, मेरी गांड सहलाई, और मुझे ऊपर बिठाकर मेरी कमर खुद हिलवाई। मैं उसके ऊपर बैठी और मेरी चूत उसके लंड पर ऊपर-नीचे होती रही, और मेरे दूध उसके चेहरे के सामने झूलते रहे। उसने उन्हें पकड़ा, चूसा, दबाया — और मैं कराहती रही।
जाते वक्त उसने दरवाज़े पर रुककर कहा, “दीदी, अगली बार जल्दी आऊँगा।”
“कितनी जल्दी?” मैंने पूछा।
“कल,” वह हँसा।
और वह कल ही आया।
उसके बाद वह हर हफ्ते आने लगा — कभी सिलाई के बहाने, कभी नाप के बहाने, कभी बस आने के बहाने। और हर बार हमारी चुदाई पहले से ज्यादा जंगली होती गई। कभी रसोई में, खड़े-खड़े — मेरी सलवार उठाकर और उसकी पैंट नीचे करके। कभी छत पर, रात में, तारों के नीचे — चटाई पर लेटकर। कभी दोपहर में, जब माँ सो रही होती — दबे-दबे स्वर में, ताकि कोई न सुने, और वह दबा हुआ स्वर हमारी चुदाई को और मीठा बना देता।
वह मुझे “दीदी” कहता था, और चोदते वक्त भी “दीदी” ही कहता था — जिससे मुझे एक अजीब-सा, मीठा-सा शरम आता था।
और मोहल्ले को पता चल गया।
पहले तो लोगों ने देखा — राकेश का हमारे घर आना-जाना बढ़ गया था। फिर किसी ने छत पर पकड़ लिया। फिर किसी ने बाज़ार में हाथ पकड़े देख लिया। और बस, फिर तो सब तय हो गया।
और तभी से मोहल्ले के लड़के मुझे “रंडी भौजी” बुलाने लगे।
एक दिन मैंने राकेश से पूछा, “तुम्हें बुरा नहीं लगता, जब लोग मुझे रंडी भौजी कहते हैं?”
वह हँसा और बोला, “दीदी, जिसे पूरा मोहल्ला चाहता है, उसे रंडी ही कहेंगे ना। और सच कहूँ तो…” वह मेरे करीब आया, “…मुझे अच्छा लगता है। क्योंकि जब वे तुम्हें रंडी भौजी कहते हैं, तो मुझे याद आता है कि तुम्हारी चूत सिर्फ मेरी है।”
मैंने उसे गले लगा लिया।
यह कहानी यहीं खत्म हो जाती, अगर नीलेश वापस न आता।
लेकिन वह आया। एक साल बाद। दिल्ली से, छुट्टियों में। उसने फोन किया और बोला, “रिधिमा, मिलना है।”
और मैं उससे मिलने गई।
उसने मुझे देखा, और उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी। उसने पूछा, “कैसी हो?”
मैंने कहा, “ठीक हूँ।”
वह मुस्कुराया और बोला, “झूठ बोल रही हो। तुम्हारे चेहरे पर कोई और है।”
मैंने कुछ नहीं कहा। लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़ लिया — और उस हाथ पकड़ने में वह सब था, जो पिछले एक साल में कहा नहीं गया था।
और उस शाम, उसी होटल में, उसी कमरे में, नीलेश ने मुझे फिर चोदा। लेकिन इस बार मैं वह कच्ची लड़की नहीं थी। इस बार मैं जानती थी कि अपनी चूत को कैसे कसना है, अपनी गांड को कैसे उठाना है, और अपने निपल्स को उसके मुँह में कैसे डालना है। और नीलेश ने महसूस किया।
“तुम बदल गई हो,” उसने मेरे अंदर रुककर कहा।
“अच्छा बदली हूँ या बुरा?”
उसने मेरे कान में धीरे से कहा, “और मीठी हो गई हो।”
उस रात एक बात साफ हो गई — नीलेश का रास्ता दिल्ली था, और मेरा रास्ता यहीं। लेकिन जब-जब वह आता, वह होटल का कमरा हमारा होता।
और घर पर राकेश इंतज़ार करता रहता।
मैं दोनों के बीच झूलती रही — एक से प्यार, दूसरे से जुनून। एक धीमी आग, दूसरी तेज़ आग। और मैं दोनों में जलती रही।
आज इकतीस साल की उम्र में जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे कोई पछतावा नहीं। मोहल्ले के लड़के मुझे रंडी भौजी कहते हैं, और मैं हँसकर मान लेती हूँ। क्योंकि उन्हें क्या पता — मेरी चूत, मेरे दूध, मेरे निपल्स, मेरी गांड — सब पर एक-एक की कहानी लिखी हुई है।
और वह कहानी, किसी औरत के लिए, सबसे बड़ी दौलत होती है।
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Mera naam kasis hai mujhe ek aisa mard chahiye jo mujhe chode aur mera khyal rakhe.