first time x story
मेरा नाम रिधिमा है। आज मैं इकतीस साल की हो चुकी हूँ, लेकिन जब भी कोई मुझसे पूछता है कि तुम्हारी सबसे पहली चुदाई कैसी थी, तो मेरे चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान आ जाती है, और मेरी आँखें कहीं दूर, उन्नीस सौ चौदह वाले किसी पुराने कमरे की ओर भटक जाती हैं।
मेरे मोहल्ले के लड़के आज भी मुझे “रंडी भौजी” कहकर चिढ़ाते हैं। कारण भी तो है — जो लड़का मेरे पीछे पागल था, उसी से मेरी पहली बार चुदाई हुई थी, और उसके बाद जो हुआ, वह पूरे मोहल्ले को पता चल गया। बस, तभी से यह नाम मेरे साथ चिपक गया। अब बुरा क्या लगे, जब सच ही है।
मैं तब इंटर के क्लास में पढ़ती थी। उस समय मेरी उम्र 18 साल के आसपास रही होगी। उस समय मेरी बॉडी का नाप था — बस्ट तीस, कमर अट्ठाईस, और हिप बत्तीस। यानी 30-28-32। मेरी लंबाई पाँच फुट दो इंच थी।
न छोटी, न बहुत लंबी — बिल्कुल वैसी लड़की, जिसे देखकर मोहल्ले के लड़कों की नींद उड़ जाए। मैं दिखने में बहुत खूबसूरत थी। गोरा रंग, बड़ी-बड़ी काली आँखें जिनमें काजल की एक पतली लकीर हमेशा रहती थी, घनी भौहें, लंबी काली चोटी जो कमर से नीचे तक लटकती थी, और होंठ जो हमेशा हल्की लालिमा लिए रहते थे।
सलवार-कुर्ता पहनती तो भी मेरी बॉडी की बनावट कपड़े के नीचे से साफ झलक जाती थी। मेरे घर के आस-पास के सभी लड़के मुझ पर मरते थे — कोई कॉलेज के गेट पर खड़ा रहता, कोई मंदिर के मोड़ पर, कोई नल के पास बहाना बनाकर आ जाता।
लेकिन एक लड़का था, जिसने मुझ पर पूरी तरह से हाथ डाल दिया था और मेरे पीछे पड़ गया था। बाकी सब तो बस देखकर रह जाते थे, मुस्कुराकर गुज़र जाते थे — यह लड़का नहीं रुका।
सन् 2004 की बात है। उस समय मोबाइल फोन सिर्फ अमीर लोगों के पास हुआ करता था। हमारे जैसे मध्यमवर्गीय घरों में फोन का मतलब था — घर की दीवार पर लगा वह काला बक्सा, जिसे हम “टेलीफोन लाइन” कहते थे।
घर में अगर लैंडलाइन हो, तो समझो घर कुछ दौलतमंद है। हमारे घर भी थी। वह लाल रंग का पुराना रोटरी फोन, जिसे उँगली से घुमाकर नंबर डायल करते थे, और घंटी बजने पर पूरा घर दौड़ता था। उस फोन की घंटी मेरे जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित होने वाली थी — यह मुझे तब क्या पता था।
वह लड़का मेरे घर का नंबर ढूँढ़ निकाला। कैसे ढूँढ़ा, यह भी एक कहानी है — उसने मोहल्ले के पान की दुकान वाले से पूछा, मेरे पिताजी के दोस्त से पूछा, किसी तरह हमारे घर का नंबर ले लिया। और फिर शुरू हुआ वह सिलसिला — रोज शाम छह बजे की घंटी।
पहले तो पापा उठते। “हेलो, कौन?” दूसरी तरफ से आवाज आती, “नमस्ते अंकल, मैं नीलेश बोल रहा हूँ।”
पापा पूछते, “कौन नीलेश?” वह कहता, “अंकल, आपके बेटे का दोस्त हूँ।” पापा फोन मेरे भाई को दे देते।
भाई उठाता, “हाँ नीलेश, क्या हुआ?” और बातें शुरू हो जातीं — क्रिकेट, पढ़ाई, सिनेमा, बैंगलोर की गलियाँ, और धीरे-धीरे… मैं।
धीरे-धीरे उसने मेरे भाई से दोस्ती कर ली, ताकि वह हमारे घर आ-जा सके। यही उसकी चाल थी। भाई को क्या पता था कि उसका नया दोस्त उसकी बहन को देखकर पागल हो रहा है। पहले वह हफ्ते में एक बार आता, फिर तीन दिन में एक बार, फिर रोज। मेरी माँ कहतीं, “यह नीलेश बड़ा सुशील लड़का है, तेरे भाई की अच्छी संगत है।” मैं अंदर ही अंदर मुस्कुराती, क्योंकि मुझे पता था — वह भाई की संगत के लिए नहीं, मेरे लिए आता है।
मुझे उसका नाम पता चला — नीलेश। उसकी लंबाई पाँच फुट आठ इंच थी। वह दिखने में बहुत खूबसूरत था — गेहुँए रंग, मज़बूत जबड़ा, हल्की दाढ़ी जो दोपहर तक फिर से उग आती, घुंघराले काले बाल, और वह आँखें… वह आँखें, जो जब मुझे देखतीं, तो लगता कि वे मुझे नहीं, मेरे अंदर की किसी छिपी हुई चीज़ को देख रही हैं।
उसकी उम्र चौबीस साल रही होगी। वह बैंगलोर में पढ़ता था। यानी पढ़ा-लिखा, समझदार, बात करने में सलीका रखने वाला, और मुझसे 6 साल बड़ा। एक 18 साल की लड़की के लिए इससे खतरनाक बात और क्या हो सकती है?
वह मुझे चोदने के लिए बेचैन था। मुझे तब भी अंदाज़ा था, लेकिन पूरा यकीन नहीं था। उसकी आँखें जब मेरे गले के नीचे रुकतीं, जब मेरे कूल्हों पर टिकतीं, जब मेरी चोटी पर से फिसलकर मेरी कमर पर आ जातीं — तो मेरी साँसें भारी हो जातीं। और वह यह भी जानता था कि वह मेरी साँसें भारी कर रहा है।
यह वह समय था जब मोहल्ले में लड़की और लड़के की दोस्ती को लोग शक की नज़र से देखते थे। अगर कोई लड़की किसी लड़के से दो शब्द ज्यादा बोल दे, तो पूरा मोहल्ला तय कर लेता कि दोनों में कुछ चल रहा है।
और हमारे बीच तो सिर्फ “कुछ” नहीं चल रहा था — हमारे बीच बिजली चल रही थी, जिसकी तारें एक-दूसरे की आँखों से जुड़ी हुई थीं।
पहली बार जब मैंने उसे करीब से देखा, वह हमारे घर की छत पर खड़ा था। भाई उसके साथ क्रिकेट की बात कर रहा था और मैं नीचे आँगन में सूखे कपड़े उतार रही थी।
तभी किसी ने ऊपर से आवाज़ दी, “भाभी!” — और मैं चौंक गई।
भाई ने नीचे झाँका और हँसकर कहा, “यह नीलेश भाई, इसे तेरी शादी की फिक्र है, इसलिए तुझे भाभी बुला रहा है।” वह शरमा गया, मैं लाल हो गई।
उस दिन के बाद वह मुझे हमेशा “भाभी” ही बुलाता रहा — लेकिन उसके मुँह से “भाभी” शब्द जब निकलता, तो उसमें एक मीठी मज़ाक और एक छिपी हुई चाहत दोनों होती थीं।
फिर शुरू हुआ हमारा खेल। जब वह घर आता, तो मैं चाय बनाने में ज्यादा वक्त लगाती। जब वह चाय पीता, तो अपनी उँगलियों को गिलास पर इस तरह फिराता कि लगता वह मेरी उँगलियों को छू रहा है।
एक दिन जब उसने गिलास मुझे वापस दिया, तो उसकी उँगली मेरी उँगली से टकरा गई — और वह एक सेकंड के लिए वहीं रुकी रही। एक सेकंड।
लेकिन उस एक सेकंड में मेरी पूरी देह में झुरझुरी दौड़ गई। मैंने झट से हाथ खींच लिया और किचन में भाग गई। दीवार से टिककर अपने दिल की धड़कन सुनी — तेज़, तेज़, बहुत तेज़।
उसने पहली बार मुझे फोन पर बात करने का बहाना बनाया। एक शाम भाई बाहर गया था, और फोन बजा।
माँ ने पूछा, “रिधिमा, देख ना कौन है।”
मैंने रिसीवर उठाया — दूसरी तरफ वह। “हेलो?” — और मेरी आवाज़ काँप गई।
वह बोला, “भाभी, भाई है?”
मैंने कहा, “नहीं, बाहर गया है।” वह कुछ सेकंड चुप रहा, फिर बोला, “तो भाभी, तुम ही बात कर लो।”
और फिर हमारी पहली असली बातचीत हुई — उस रात, उस लाल रोटरी फोन पर, दीवार से लगी तार के सहारे। उसने बैंगलोर के बारे में बताया, अपने कॉलेज के बारे में, अपने सपनों के बारे में।
और आखिर में बोला, “भाभी, तुम्हारी आवाज़ बहुत मीठी है।” मैंने पूछा, “कैसी मीठी?” वह हँसा और बोला, “गुड़ जैसी। और मुझे गुड़ बहुत पसंद है।”
उस रात के बाद फोन पर बात करना हमारी आदत बन गई। जब भी घर में सब सो जाते, जब भी भाई बाहर होता, वह फोन करता और हम घंटों बातें करते। धीरे-धीरे बातें निजी होने लगीं। वह पूछता, “भाभी, तुम्हें कैसा लड़का पसंद है?”
मैं पूछती, “तुम्हें कैसी लड़की?” एक दिन उसने सीधे कह दिया, “मुझे तुम जैसी लड़की पसंद है।” मेरी साँस रुक गई। मैंने पूछा, “जैसी मैं हूँ, वैसी या बस मैं?” वह बोला, “बस तुम। सिर्फ तुम।” उस रात मैं बिस्तर पर लेटी तो बार-बार उसकी आवाज़ कानों में गूँज रही थी — “बस तुम। सिर्फ तुम।”
अब वह घर आता, तो हमारी नज़रें टकरातीं और दोनों झट से दूसरी तरफ देखने लगते — जैसे कुछ गलत कर रहे हों। माँ सामने होती तो हम दोनों बहुत संजीदा हो जाते। लेकिन माँ के जाते ही माहौल बदल जाता। वह मेरी तरफ देखता, हल्का मुस्कुराता, और उसकी आँखें कहतीं वे सब बातें जो हम ज़ुबान से नहीं कह पाते थे।
एक दिन की बात है — घर में कोई नहीं था। भाई बाहर, माँ-पापा रिश्तेदारी में। वह आया, और हम दोनों ड्राइंग रूम में बैठे। टीवी पर कुछ चल रहा था, लेकिन हमारा ध्यान टीवी पर नहीं था। उसने पूछा, “भाभी, डरती हो?” मैंने पूछा, “किससे?” वह बोला, “मुझसे?” मैंने झूठ बोला, “नहीं।”
वह मुस्कुराया और बोला, “अच्छा, तो हाथ दो।” मैंने हाथ बढ़ाया। उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया — और मेरे हाथ की हथेली में उसके हाथ की गर्मी सीधे मेरे दिल तक पहुँच गई। उसने मेरी हथेली पर अपना अंगूठा धीरे-धीरे फेरा, फिर मेरी कलाई पर, फिर मेरी बाँह पर। मेरी बाँह के रोंगटे खड़े हो गए।
उसने देखा और हँसकर बोला, “देखो, डर तो लग ही रहा है।” मैंने कहा, “यह डर नहीं है।” उसने पूछा, “तो क्या है?” और मैं चुप हो गई — क्योंकि जो था, उसका नाम मुझे खुद नहीं पता था।
उस दिन के बाद हमारे बीच की दूरी मिट गई। वह आता, तो मेरे बालों को हल्का सहलाता। मैं उसके कॉलर को ठीक करने का बहाना बनाती। एक बार उसने मेरी चोटी पकड़कर धीरे से खींचा और बोला, “यह चोटी मुझे बहुत पसंद है।” मैंने कहा, “तो काट के ले जाओ।” वह बोला, “चोटी काट के ले जाऊँगा, और तुम्हें भी साथ ले जाऊँगा।” मेरा दिल धक् से रह गया।
यह थी हमारी केमिस्ट्री — न कोई इज़हार, न कोई प्रपोज़ल, बस आँखों की भाषा, हाथों की हरकतें, और फोन पर वे आधी रात की बातें जिनमें सब कुछ कहा जाता था, बिना कुछ कहे।
फिर आया वह समय जो हर स्टूडेंट के लिए खौफ का समय होता है — इंटर की बोर्ड परीक्षा। मेरे पापा सख्त आदमी थे। परीक्षा के दिनों में मेरा घर से बाहर निकलना मुश्किल था। और नीलेश को तो जैसे आग लगी हुई थी — वह हर दिन फोन पर कहता, “भाभी, परीक्षा खत्म होते ही कुछ तो करना पड़ेगा।”
मैंने पूछा, “क्या करना पड़ेगा?”
वह चुप हो गया, फिर बोला, “तुम बताओ।”
मैंने कहा, “तुम बताओ।”
आखिरकार एक रात उसने हिम्मत करके कह दिया, “भाभी, परीक्षा खत्म होने के बाद एक दिन बाहर चलेंगे। सिर्फ तुम और मैं।”
मेरी साँस अटक गई। “कहाँ?”
वह बोला, “शहर में एक होटल है, स्टेशन के पास। अच्छा-सा है। वहाँ चलेंगे, चाय पिएँगे, बातें करेंगे।”
“बस?”
वह हँसा और बोला, “बस नहीं, भाभी। बहुत कुछ।”
मैंने पूछा, “घरवालों को क्या बताऊँगी?”
वह बोला, “कह देना सहेली के साथ गई थी। सहेली के घर वालों को कौन पूछने जाएगा?”
प्लान तैयार था। और उस रात से लेकर परीक्षा के आखिरी पेपर तक, मेरे दिल में एक ही बात घूमती रही — होटल। वह होटल, जहाँ मुझे उसके साथ अकेले जाना था। जहाँ शायद… शायद पहली बार मेरी चुदाई होने वाली थी।
परीक्षा के दिन गुज़रते गए। हर पेपर के बाद वह फोन करता, “कैसा गया?” मैं कहती, “ठीक।” वह कहता, “ठीक नहीं, बहुत अच्छा गया होगा। मेरी भाभी तो पढ़ाकू है।” और फिर हम दोनों चुप हो जाते, क्योंकि दोनों को पता था कि अगले पेपर के बाद क्या होने वाला है।
आखिरी पेपर वाली सुबह मैंने नहाकर, अपनी सबसे अच्छी सलवार-कुर्ता पहनी — वह हल्के नीले रंग की, जिसे पहनकर मैं सबसे खूबसूरत लगती थी। बालों में तेल डालकर चोटी बनाई, हल्का काजल लगाया, और बिना लिपस्टिक के ही अपने होंठों को जरा-सा दबाकर लाल किया। पापा से कहा कि सहेली रीना के साथ जा रही हूँ, रीना से पहले ही बात करा ली थी। माँ ने कहा, “जल्दी आ जाना।” मैंने सिर हिलाया — और मन ही मन कहा, “जल्दी आना किसे कहते हैं, यह आज पता चलेगा।”
पेपर खत्म हुआ। कॉलेज के गेट पर वह खड़ा था — सफेद शर्ट, नीली पैंट, हाथ में एक छोटा-सा बैग। मुझे देखते ही उसका चेहरा खिल उठा। पास आया और बोला, “चलो भाभी।”
मैंने पूछा, “कहाँ?”
वह बोला, “जहाँ तुम्हें ले जाना है।”
हम ऑटो में बैठे। दोनों के बीच में एक-एक इंच की दूरी थी, और उस एक इंच में एक पूरी दुनिया ठुसी हुई थी। ऑटो की हर झटके पर हमारे कंधे टकराते, और दोनों झट से अलग हो जाते, फिर हँसते। ड्राइवर ने आईने में देखकर मुस्कुराया। मैंने सोचा, सब जानते हैं।
होटल आया। बड़ा नहीं था, लेकिन साफ-सुथरा था। लाल रंग की इमारत, सामने छोटा-सा गेट, और ऊपर “अतिथि गृह” लिखा था। वह रिसेप्शन पर गया, फॉर्म भरा, चाबी ली। क्लर्क ने पूछा, “कितने लोग?” वह बोला, “दो।” क्लर्क ने मुझे देखा और बिना पूछे ही बोला, “बीवी?” वह हँसा और बोला, “हाँ, बीवी।” मैं सुनकर लाल हो गई। उसने मेरी तरफ देखा और धीरे से बोला, “आज बीवी ही बन जाओ।”
कमरा नंबर 203। सीढ़ियों से ऊपर। हर सीढ़ी पर मेरा दिल एक बार धड़कता। हर कदम पर लगता जैसे किसी नए जीवन की ओर बढ़ रही हूँ।
दरवाज़ा खुला। कमरा छोटा-सा था — एक पलंग, एक पंखा, एक खिड़की जिससे दोपहर की रोशनी आ रही थी, और एक पुराना टेबल। पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था, और उसकी खड़खड़ाहट कमरे में गूँज रही थी।
वह पीछे आया और दरवाज़ा बंद कर दिया। कड़क।
दरवाज़े की आवाज़ के साथ ही लगा जैसे बाहर की पूरी दुनिया बंद हो गई — मोहल्ला, माँ-पापा, भाई, सहेलियाँ, सब। बस हम दोनों, और यह कमरा।
वह मेरे सामने खड़ा था। मैंने पलटकर उसे देखा। दोनों की आँखें मिलीं, और इस बार कोई भागा नहीं। दोनों वहीं रुके रहे।
“भाभी,” उसने धीरे से कहा।
“हाँ,” मैंने कहा — आवाज़ भारी।
“तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो।”
“रोज नहीं लगती?”
“रोज लगती हो,” वह मुस्कुराया, “लेकिन आज कुछ ज्यादा।”
वह मेरे पास आया। एक कदम, दो कदम। और फिर हमारे बीच की वह आखिरी दूरी भी मिट गई।
उसने पहले मेरा हाथ पकड़ा। फिर मेरी कलाई, फिर मेरी बाँह, फिर मेरा कंधा। हर स्पर्श के साथ मेरी देह में एक नई तरंग दौड़ती। उसने मेरी आँखों में देखते हुए धीरे से पूछा, “डर लग रहा है?”
मैंने सच बोला, “थोड़ा।”
“किससे?”
“अंजान चीज़ से।”
वह मुस्कुराया। “मैं हूँ ना।”
और फिर उसने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में भर लिया। उसके हाथ ठंडे थे और मेरा चेहरा तप रहा था। उसने अपना माथा मेरे माथे से लगाया। हमारी साँसें एक-दूसरे से टकराने लगीं। वह बहुत देर ऐसे ही खड़ा रहा — जैसे पहले मेरे दिल की सबसे छोटी धड़कन तक गिन लेना चाहता हो।
फिर उसने मेरे होठों को चूमा।
पहला चुंबन। एकदम हल्का, जैसे तितली किसी फूल को छूकर उड़ जाती है। लेकिन उस हल्के स्पर्श ने मेरे पूरे शरीर को जला दिया। मेरे घुटने कमज़ोर हो गए, और मैं उससे टिक गई। उसने मेरी कमर पर हाथ रखकर मुझे सँभाला।
फिर दूसरा चुंबन। इस बार गहरा। उसने मेरे निचले होंठ को धीरे से चूसा, और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। तीसरा चुंबन — अब वह मेरे होंठों को खोलकर अंदर तक चूम रहा था, और मेरी जीभ उसकी जीभ से लिपट गई। उसका स्वाद कॉफी और पान जैसा था। मैंने अपनी बाँहें उसके गले में डाल दीं, और उसने मुझे कसकर अपने से चिपका लिया।
हमारी देहें टकराईं। मेरे सीने पर उसके सीने का दबाव महसूस हुआ, और मेरे दूध उसके सीने से चपटे हो गए। मेरे निप्पल उसके शर्ट के कपड़े से रगड़ खा रहे थे और मैंें अंदर तक काँप रही थी।
वह मुझे पलंग तक ले गया और धीरे से बिठा दिया। फिर मेरे सामने घुटनों पर बैठ गया — जैसे कोई पुजारी मूर्ति के सामने बैठता है।
“भाभी,” उसने कहा, “तुम्हें आराम से करने दो। जहाँ तक आराम न लगे, बोल देना।”
मैंने सिर हिलाया।
उसने पहले मेरी चोटी खोली। उँगलियों से धीरे-धीरे पिन निकाली, और मेरे बाल खुलकर कंधों पर बिखर गए। फिर उसने उन बालों में अपना चेहरा छुपा लिया और उन्हें सूँघा। “मेरे भाग्य में यही सुगंध लिखी थी,” उसने धीरे से कहा।
फिर उसके हाथ मेरी गर्दन पर आए। गर्दन से नीचे, कॉलरबोन तक। उसने मेरी कुर्ता के बटन खोलने शुरू किए — एक-एक करके, बहुत सँभलकर। जैसे कोई कीमती तोहफा खोल रहा हो।
कुर्ता खुला, और मेरी ब्लाउज़ सामने आई। उसने उसे देखा और उसकी आँखें भर आईं। “रिधिमा,” उसने पहली बार पूरा नाम लेकर बुलाया, “तुम इतनी सुंदर क्यों हो?”
वह मेरी ब्लाउज़ की डोरियाँ खोलने लगा। मेरे पीछे हाथ डालकर उसने धीरे-धीरे गाँठें खोलीं, और फिर ब्लाउज़ ढीली होकर मेरे सीने से सरक गई। उसने उसे उतारा और अलग रख दिया।
अब मेरे सामने सिर्फ मेरी पतली-सी बनियान थी, और उसके नीचे मेरे दूध अपनी पूरी बनावट में दिख रहे थे। मेरे निप्पल बनियान के कपड़े के नीचे से उभरे हुए, सख्त। वह उन्हें देखता रहा, फिर झुककर बनियान के ऊपर से ही एक निप्पल को अपने होंठों से छुआ।
मैं करंट की तरह झटके से सिकुड़ गई। “आह…” मेरे मुँह से निकल गया।
उसने बनियान उतारी। अब मेरे दोनों दूध पूरी तरह खुले थे — गोल, भरे, और उनके बीच में मेरे गुलाबी निपल्स जैसे दो फूल खिले हुए। हवा लगते ही मेरे निपल्स और सख्त हो गए, और वे देखने में एकदम उठे हुए लग रहे थे।
उसने पहले दाएँ निप्पल को अपने होंठों में लिया। धीरे-धीरे चूसा, फिर जीभ से घुमाया, फिर दाँतों से बहुत हल्का काटा। मेरी पीठ कमान बन गई।
मैंने उसके बालों को पकड़ लिया। फिर उसने बाएँ निप्पल के साथ भी वही किया, और उसके हाथ मेरे दोनों दूधों को दबाने लगे — एक को मुँह में लेकर चूसता, दूसरे को हाथ से मसलता। बारी-बारी। मेरे निपल्स लाल हो गए, और मेरे शरीर से पसीने की बूँदें निकल आईं।
“ऐसा लगता है जैसे दूध निकल आएगा,” मैंने धीरे से कहा।
वह हँसा और बोला, “निकल आए तो मैं पी लूँगा।” और फिर और जोर से चूसने लगा। मैं हँसी, लेकिन मेरी हँसी हकलाहट में बदल गई जब उसने अपनी एक उँगली मेरी नाभि पर रखी और धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकाई।
अब वह मेरी सलवार की तरफ बढ़ा। उसने नाड़ा खोला। एक-एक गाँठ। फिर सलवार मेरे कूल्हों से सरकने लगी। उसने उसे धीरे से खींचा, और मैंने पैर उठाकर उसे पूरी तरह उतार दिया।
अब मेरे सामने सिर्फ मेरी चड्डी थी — और उसके नीचे वह जगह जिसे मैंने कभी किसी को नहीं दिखाया था।
वह मेरे पैरों के बीच बैठ गया। उसने मेरे दोनों घुटनों पर हाथ रखा और धीरे-धीरे मेरी जाँघें खोलीं। मेरी साँस फूल गई। उसने झुककर मेरी चड्डी के ऊपर से, मेरी चूत पर एक हल्का-सा चुंबन किया। और उस हल्के से चुंबन से मेरी पूरी बुर में एक गर्म लहर दौड़ गई।
उसने चड्डी को किनारे से खींचा। अब मेरी चूत पूरी तरह खुली थी — और उसकी स्याही में उसका हाथ आ गया। उसने अपनी उँगली मेरी बुर के बाहरी होंठों पर फेरी और धीरे से बोला, “गीली हो रही हो।”
मैं शरमा गई। “तो?”
“तो अच्छा है,” वह हँसा, “अंदर आने में आसानी होगी।”
फिर उसने अपनी जीभ मेरी चूत पर रख दी। जीभ से वह मेरी बुर के होंठों को चाटने लगा, ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर। फिर जब उसकी जीभ मेरे भगशिश्न पर पहुँची, तो मेरी कमर अपने-आप उठ गई। उसने उसे चूसा, फिर चारों तरफ घुमाया। मैंने दोनों हाथों से चादर भींच ली।
“नीलेश…” मैंने कराहते हुए कहा।
उसने सिर उठाकर देखा और मुस्कुराया। “पहली बार नाम लिया,” बोला, “अच्छा लगा।”
फिर उसने अपनी एक उँगली मेरी चूत के मुँह पर रखी और धीरे-धीरे अंदर सरकाने लगा। पहली उँगली। मेरी पूरी देह तन गई। फिर दूसरी उँगली। अब दोनों उँगलियाँ अंदर थीं और वह उन्हें अंदर-बाहर कर रहा था। एक तरल-सी आवाज़ आ रही थी — चटपट, चटपट। मेरी साँसें तेज़। मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग रहा था।
वह उँगलियाँ अंदर-बाहर करते हुए झुककर फिर मेरे निपल्स चूसने लगा। ऊपर से मुँह और नीचे से उँगलियाँ — मैं दो तरफ से जल रही थी।
फिर उसने अपनी उँगलियाँ निकालीं और मुझे देखा। उसकी उँगलियों पर मेरी गीलापन चमक रही थी। उसने उन्हें अपने होंठों से चाटा और बोला, “मीठी हो।”
अब उसने अपनी पैंट खोलनी शुरू की। मेरी आँखें उस पर टिक गईं। उसने बेल्ट खोली, बटन खोला, ज़िप खींची — और पैंट उतर गई। उसके नीचे उसकी कच्छी थी, जिसे उसने एक ही झटके में उतार दिया।
और तब मैंने पहली बार उसका लंड देखा।
सीधा, मोटा, और पूरी तरह खड़ा। उसका रंग गेहुँआ था, और उसका सिरा चमकदार। वह मेरी तरफ इस तरह उठा हुआ था जैसे किसी से शिकायत कर रहा हो कि इतनी देर क्यों लगाई। मैंने देखा और गला सूख गया।
“यह… यह अंदर जाएगा?” मैंने पूछा।
वह हँसा। “अंदर ही तो जाना है।”
वह मेरे ऊपर आया। मेरे घुटनों के बीच खुद को साधा। उसने अपने लंड को हाथ से पकड़ा और मेरी चूत के मुँह पर रखा। उसका सिरा मेरे भगशिश्न को छू रहा था और मैं वहीं झटके खा रही थी।
“तैयार हो?” उसने पूछा।
मैंने गहरी साँस ली। “हाँ।”
उसने दबाव डाला। पहले तो कुछ नहीं हुआ — बस मेरी चूत पर दबाव महसूस हुआ। फिर अचानक उसका सिरा अंदर सरक गया। मैंने होंठ भींचे। फिर वह धीरे-धीरे अंदर जाने लगा।
“आ… हाँ… रुको…” मैंने कहा।
वह वहीं रुक गया। “तकलीफ हो रही है?”
“हल्की-सी।”
“आराम से करते हैं।”
वह थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ता, फिर रुक जाता। जब तक उसका पूरा लंड अंदर नहीं चला, उसने सब्र से काम लिया। मुझे वह पल भी याद है जब पहली बार उसका सिरा मेरे अंदर किसी दीवार से टकराया — थोड़ा दर्द हुआ, मैंने हाथ से उसकी पीठ पर नाखून गड़ा दिए, और उसने मेरे माथे को चूमकर कहा, “अब बस थोड़ा-सा।”
फिर वह पूरा अंदर था। मेरी चूत उसके लंड से भर गई थी। मैं वहाँ लेटी थी, पूरी तरह खुली, पूरी तरह भरी हुई — और मेरे अंदर एक अजीब-सा, मीठा-सा भरा हुआ दर्द था।
उसने कुछ देर हिला, फिर धीरे-धीरे अंदर-बाहर होने लगा। पहला झटका। दूसरा झटका। तीसरा। मेरी साँसें उसकी गति से मिलने लगीं। दर्द जाता रहा और उसकी जगह एक गहरी खुजली आने लगी — जो हर झटके पर मिटती और फिर लौट आती।
“नीलेश… और करो…” मैंने कराहते हुए कहा।
वह तेज़ हुआ। अब वह जोर से अंदर जा रहा था और बाहर आ रहा था। हमारी देहों की टकराहट से चप-चप की आवाज़ आने लगी। पलंग चरमराने लगा। पंखा ऊपर धीरे-धीरे घूम रहा था और नीचे हम दोनों पसीने से भीग रहे थे।
उसने मेरे दोनों हाथ पकड़कर पलंग पर जमा दिए, और अब वह पूरे वजन से मुझे चोद रहा था। उसके लंड के हर झटके पर उसका पेट मेरे पेट से टकराता, और उसके सीने से मेरे दूध दब जाते। मेरे निपल्स उसके सीने से रगड़ खाकर लाल-सख्त हो गए थे।
उसका हर झटका सीधे मेरी चूत की गहराई में जाता और मेरे अंदर कहीं एक तार खींच देता जो मुझे काँपने पर मजबूर कर देता।
“भाभी… भाभी…” वह भी कराह रहा था। “तुम अंदर से इतनी कसी हुई क्यों हो… मर जाऊँगा…”
मैंने उसकी कमर में अपनी टाँगें कस लीं। वह और गहरा अंदर जाने लगा। मेरी बुर से रस बहकर उसकी जाँघों पर लग रहा था। मेरा पूरा शरीर जल रहा था — कहीं गर्मी, कहीं ठंडक, कहीं सिहरन।
फिर वह रुका। मेरे ऊपर से हटा और बोला, “पलट जाओ।”
“क्या?”
“पलट जाओ, भाभी। आज पूरा मज़ा दोनों तरफ से लेना है।”
मैं पेट के बल पलट गई। और तब जो हुआ, वह मेरे जीवन की सबसे शरमीली बात थी — मेरी गांड उसके सामने थी। उसने मेरे दोनों कूल्हों को अपने हाथों में भरा, थोड़ा ऊपर उठाया, और मेरी गांड पर अपने होंठ रख दिए। उसने एक कूल्हे को चूमा, फिर दूसरे को। फिर अपनी जीभ मेरी गांड के गड्ढे में फेर दी।
“आह… वहाँ क्यों?” मैंने पूछा।
“वहाँ भी तो बंदरगाह है,” वह हँसा।
फिर उसने अपना लंड फिर से मेरी चूत के मुँह पर रखा और एक ही झटके में अंदर घुसा दिया। इस बार गीली थी, तो चीख नहीं निकली, सिर्फ एक गहरी “आआह” निकली।
इस पोज़ीशन में वह और गहरा जा रहा था, और हर झटके पर मेरी गांड झटके से हिल जाती। मेरे दूध पलंग पर दब रहे थे, निपल्स चादर से रगड़ खा रहे थे।
उसने एक हाथ मेरे कूल्हे पर रखा और दूसरा मेरी कमर के नीचे लाकर मेरे भगशिश्न पर रख दिया। अब जब भी वह अंदर जाता, उसकी उँगली मेरे भगशिश्न को रगड़ती। ऊपर से उँगली, अंदर लंड, पीछे से उसका पेट मेरी गांड से टकराता — तीन जगह से मुझे चोदा जा रहा था और मैं पूरी तरह पिघल गई थी।
“नीलेश, और… और तेज़…” मैंने चादर में मुँह दबाकर कहा।
वह तेज़ हुआ। अब झटके एक लय में थे — तेज़, गहरा, तेज़, गहरा। पलंग की चरमराहट तेज़ हो गई। पंखा वैसे ही घूम रहा था, बेखबर। हमारी देहों की आवाज़ें कमरे की हर दीवार से टकरा रही थीं।
मुझे लगा कि मेरे अंदर कुछ जमा हो रहा है — जैसे कोई गाँठ कसती जा रही हो। कसती गई, कसती गई… और फिर अचानक खुल गई।
“नीलेश…!” मैंने चीख मारी और मेरा पूरा शरीर झटके खाने लगा। मेरी चूत उसके लंड को कसकर पकड़कर धड़कने लगी। मेरी आँखों के आगे रंग बिखर गए। मैं वहीं ढेर हो गई — पूरी तरह टूटी हुई, पूरी तरह भरी हुई।
वह मेरे अंदर का संकुचन महसूस करके और पागल हो गया। उसने मेरे कूल्हे पकड़कर तेज़-तेज़ चोदना शुरू किया — और फिर वह भी कराह उठा। “भाभी… मैं… रुक नहीं सकता…”
“अंदर ही करो,” मैंने कहा।
और फिर उसका पूरा शरीर तन गया। उसने आखिरी गहरा झटका दिया और मेरे अंदर गर्म-गर्म गिर पड़ा। एक झटका, दो झटके, तीन। हर झटके के साथ वह मेरे अंदर कुछ गिरा रहा था, और मेरी चूत उसे पी रही थी। उसने अपनी पूरी ताकत से मुझे भर दिया।
फिर वह मेरे ऊपर ही गिर पड़ा। हम दोनों लहूलुहान, पसीने से भीगे, और साँस-साँस के लिए तरसते। पंखा ऊपर घूमता रहा। बाहर शाम ढल रही थी और खिड़की से आती रोशनी सुनहरी हो चुकी थी।
कुछ देर ऐसे ही पड़े रहे। फिर वह मेरे ऊपर से हटा, लेकिन मुझसे अलग नहीं हुआ — मेरे बगल में लेटकर मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। उसका लंड अब भी थोड़ा भरा हुआ था, और उसकी गीलापन मेरी जाँघों से चिपकी हुई थी।
उसने मेरे माथे पर चुंबन किया। “तकलीफ तो नहीं?”
“अब नहीं,” मैंने कहा।
“खून?”
मैंने नीचे देखा। चादर पर एक छोटा-सा लाल धब्बा था। मेरी लड़कीपन की आखिरी निशानी। मुझे अजीब-सा लगा — न शरम, न गर्व, बस एक सुकून कि जो हुआ, वह ठीक हुआ।
वह भी वह धब्बा देखकर मुस्कुराया और बोला, “अब तो तुम पूरी हो गईं, भाभी।”
“पहले अधूरी थी?”
“पहले भगवान के पास रखी हुई थी,” उसने कहा, “आज मेरे पास आ गईं।”
हम वहाँ बहुत देर लेटे रहे। बातें करते रहे। मैं उसकी छाती पर सिर रखकर उसके दिल की धड़कन सुनती रही — जो अब भी तेज़ थी। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में, मेरी कमर पर, मेरी पीठ पर धीरे-धीरे फिरती रहीं।
फिर हमने दूसरी बार की। इस बार धीरे-धीरे, आराम से, बिना जल्दबाज़ी। इस बार मैंने भी उसके ऊपर बैठकर उसे चोदा। पहली बार में जो दर्द था, दूसरी बार में वह सिर्फ मज़ा बन गया। मैंने उसके ऊपर बैठकर अपनी कमर हिलाई, और उसने मेरे दोनों दूध पकड़कर निपल्स मसले, और मैं कराहती रही, “नीलेश… नीलेश…” — और वह नीचे से मुझे ऊपर धकेलता रहा, हर झटके में मेरी चूत के अंदर तक।
शाम को जब हम होटल से निकले, तो मेरी चाल बदली हुई थी। मेरी टाँगों में एक मीठा-सा दर्द था, और मेरी चूत में अब भी उसके लंड की गर्मी बसी हुई थी। ऑटो में बैठी तो वह मेरा हाथ पकड़े रहा — और इस बार जब कंधे टकराए, तो कोई अलग नहीं हुआ।
घर पहुँची, माँ ने पूछा, “पेपर कैसा गया?”
मैंने कहा, “अच्छा गया, माँ। बहुत अच्छा।”
और माँ नहीं जानती थीं कि उनकी बेटी ने आज पेपर के बाद एक और इम्तिहान दिया है — और उसमें पूरे नंबर लिए हैं।
नीलेश के साथ वह सिलसिला छह महीने चला। हर महीने हम एक-दो बार मिलते — कभी उसी होटल में, कभी किसी और कमरे में। हमारी चुदाई अब पहले जैसी नहीं थी — अब उसमें जल्दबाज़ी कम और प्यार ज्यादा था। अब वह मेरे निपल्स को मुँह में लेकर बातें करता, मेरी गांड को पकड़कर मुझे ऊपर-नीचे करता, और मुझे चोदते हुए मेरे कान में धीरे-धीरे बोलता, “भाभी, तुम मेरी हो।” और मैं कराहते हुए कहती, “तेरी हूँ, बस तेरी हूँ।” हर बार वह मेरे अंदर ही गिरता — और मैं उसे पी जाती।
लेकिन फिर नीलेश की पढ़ाई खत्म होने का वक्त आया। उसे नौकरी के लिए दिल्ली जाना था। हम दोनों जानते थे — यह कभी टूटने वाला रिश्ता नहीं था, लेकिन आगे बढ़ने वाला भी नहीं था। वह गया, और हमारी बातें कम हो गईं, फिर और कम, फिर बस याद बनकर रह गईं।
और छह महीने बाद, मेरे जीवन में आया राकेश।
राकेश हमारे मोहल्ले के दर्जी का बेटा था। उसकी उम्र पच्चीस-छब्बीस साल रही होगी। वह लंबा नहीं था — मुझसे बस दो-तीन इंच ऊँचा। लेकिन उसका शरीर मज़बूत था, हाथ चौड़े, और आँखें… आँखें नीलेश से भी ज्यादा बोलने वाली। वह हमारे घर सिलाई का काम लेकर आता-जाता था। माँ उसे बहुत मानती थीं। और वह भी मुझ पर मरता था — यह मुझे पहले दिन से पता था।
पहली बार उसके साथ चुदाई उसी साल की सर्दियों में हुई। माँ-पापा गाँव गए थे, भाई हॉस्टल में था, और मैं घर में अकेली थी। वह रात नौ बजे माप लेने के बहाने आया। माप लेते-लेते वह मेरी कमर पर हाथ रख बैठा, और मैंने उसे रोका नहीं।
फिर वह मुझे सोफे पर ले गया, और उस रात उसने मुझे उसी जोश से चोदा जिस जोश से नीलेश ने पहली बार चोदा था — लेकिन अंदाज़ थोड़ा अलग था। राकेश जल्दी करता था, पूरी ताकत लगाता था, और हर झटके पर मेरी चूत को चीरता चला जाता था।
उसने मेरी गांड को दोनों हाथों से भरकर खींचा, मेरे निपल्स को मुँह में लेकर चबाया, और मेरे दूध इतने जोर से दबाए कि मुझे अगले दिन तक उनमें हल्का दर्द रहा। वह मेरे अंदर ही गिरा, और फिर मेरे ऊपर लेटकर हाँफता रहा।
उसके बाद वह भी मेरा बॉयफ्रेंड बन गया — मोहल्ले का पहला ऐसा लड़का, जिसके बारे में लोगों ने कहा, “अरे, रिधिमा तो दर्जी के लड़के के साथ रहती है।” और तभी से “रंडी भौजी” वाला नाम पक्का हो गया।
लेकिन सच कहूँ तो मुझे बुरा नहीं लगता। क्योंकि मुझे पता है — जो लड़की अपनी मर्ज़ी से अपने शरीर को जानती है, उसे लोग चाहे जो कहें, वह कभी “रंडी” नहीं होती। वह बस अपनी होती है।
आज इकतीस साल की उम्र में जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो वह पहला दिन याद आता है — वह लाल रोटरी फोन, वह छह बजे की घंटी, वह होटल का कमरा नंबर 203, वह चादर पर पड़ा लाल धब्बा। और मेरे होंठों पर फिर वही मुस्कान आ जाती है।
क्योंकि वह दिन सिर्फ मेरी पहली चुदाई नहीं था।
वह दिन था — जब रिधिमा, भौजी से रंडी भौजी बनी।
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