virgin chut chudai kahani
मेरा नाम रजनी है। मैं अभी 34 साल की हूं। मेरा रंग गोरा है, बदन छरहरा और कमर चिकनी-चिकनी।
आज भी जब मोहल्ले के लोग मुझे देखते हैं तो उनकी नजरें टिक जाती हैं और मुंह से पानी टपकने लगता है।
मेरे परिवार में मेरा 14 साल का बेटा और 10 साल की बेटी है। पति ज्यादातर काम-काज के सिलसिले में बाहर रहते हैं। Virgin Chut Chudai Kahani
मैं घर पर रहकर बच्चों को पढ़ाती हूं और घर संभालती हूं। लेकिन यह कहानी उस समय की है जब मेरी शादी अभी नहीं हुई थी
और मेरी पहली बार कौमार्य भंग हुई थी। उस वक्त मैं और मेरी सहेली मोना दोनों नई-नई जवानी में कदम रख चुके थे। मोना मुझसे थोड़ी ज्यादा चतुर और नटखट थी।
वह पहले से ही कई लड़कों के साथ अफेयर कर चुकी थी, जबकि मैं बिल्कुल सीधी-सादी लड़की थी। हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थीं।
मेरे घर में मम्मी-पापा थे। मैं उनकी इकलौती संतान थी। वे मुझे बहुत नाजों से पालते थे और पढ़ाई पर पूरा जोर देते थे।
उनके इज्जत को ठेस न पहुंचे, इसलिए मैं कभी किसी लड़के से बात तक नहीं करती थी। बस चुपचाप अपनी किताबों में डूबी रहती थी।
मोना के घर में उसके माता-पिता के अलावा एक बड़ा भाई था, शैलेश। उसकी उम्र हमसे करीब पांच साल ज्यादा थी।
मैं उसे शैलेश भैया कहकर बुलाती थी और वह मुझे अपनी छोटी बहन की तरह मानता था। जब पढ़ाई में कोई दिक्कत होती तो हम दोनों उससे पूछ लेते थे।
वह बहुत धैर्य से, प्यार से सब समझा देता था।
एक दिन मैं घर पर अपनी किताबें खोले बैठी पढ़ रही थी। सामने मम्मी-पापा बैठे मेरी शादी की बातें कर रहे थे।
पापा कह रहे थे, “एक लड़का देख रखा है। अच्छा परिवार है। जल्द ही उसके घरवालों से बात करके शादी पक्की कर देंगे।”
तभी मोना मेरे घर आई और यह सारी बात उसने सुन ली। वह मुस्कुराई और मुझे आंख मारकर इशारा किया।
मम्मी ने मोना को देखकर कहा, “आओ बेटी, बैठो। कहां जा रही हो? दिन भर बस खेलते-कूदते रहते हो?”
मोना ने हंसते हुए जवाब दिया, “अरे चाची, अभी तो उम्र है न। थोड़ा खेल-कूद लेने दो। शादी हो जाएगी तो कहां मिलेगा मौका।
आज बाग में झूला लगा है। हम आम के पेड़ के नीचे झूला झूलने जा रहे हैं।”
मम्मी का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया। वे मोना को अच्छी तरह जानती थीं। मोना की नटखट हरकतें और लड़कों से ज्यादा घुलना-मिलना उन्हें पसंद नहीं था। इसलिए वे मुझे मोना से दूर रखना चाहती थीं।
फिर भी मम्मी ने कहा, “अच्छा ठीक है। लेकिन शाम होने से पहले घर लौट आना। और ज्यादा झूला मत झूलना, गिर जाओगी।”
मैं बहुत खुश हो गई। सावन का महीना था। गांव में चारों तरफ हरे-भरे बाग-बगीचे थे। आम के पेड़ लदे हुए थे।
सखियां वहां झूला झूलने जाती थीं। हम दोनों बाग पहुंचे। वहां पहले से कई लड़कियां झूला झूल रही थीं। हमने भी अपना झूला लगाया और झूलने लगे। पास ही कुछ लड़के खेल रहे थे। जहां लड़कियां होती हैं, वहां लड़के जरूर होते हैं।
उनमें नितेश नाम का लड़का था। वह मोना को बहुत चाहता था और हमेशा उसे देखता रहता था। मोना भी उसे मन ही मन पसंद करती थी,
हालांकि उसका किसी और लड़के के साथ अफेयर चल रहा था। फिर भी नितेश को वह दूर नहीं कर पाती थी।
मोना ने नितेश को झूला लगाने के लिए बुलाया। नितेश ने झूला ऊंचा करने के बहाने मोना से बातें शुरू कर दीं। मोना हंस-हंसकर जवाब दे रही थी।
मैं भी पास थी, लेकिन तभी नितेश के दो-तीन दोस्त आ गए और वे मुझ पर भी लाइन मारने लगे। मैं बिल्कुल बात नहीं करना चाहती थी। इसलिए चुपचाप झूला झूलती रही। लेकिन मोना नितेश से चिपकी हुई थी।
नितेश उसे पीछे से जोर-जोर से झूलाता और जब झूला पीछे आता तो उसकी कमर या कंधे को पकड़ लेता। मोना खुश होकर हंस रही थी।
इस तरह मोना और नितेश ने खूब मजे किए। फिर हम दोनों घर लौट आए। शाम को मैं और मोना छत पर बैठकर बातें कर रही थीं। तभी शैलेश भैया नीचे से गुजरे। मैंने उन्हें आवाज दी, “शैलेश भैया!”
वे रुक गए और ऊपर देखकर बोले, “क्या बात है रजनी?”
मैंने कहा, “भैया, गणित में थोड़ी हेल्प चाहिए।”
शैलेश भैया मुस्कुराए, “अच्छा। शाम को आता हूं। दोनों को साथ में पढ़ा दूंगा।”
मैं बहुत खुश हो गई। मैंने जल्दी से खाना बनाया, मम्मी-पापा को खिलाया और कहा कि शैलेश भैया से पढ़ाई करनी है इसलिए दालान में जा रही हूं।
हमारे घर में एक साइड कमरा था जिसे दलान कहते थे। वहां कोई आसानी से डिस्टर्ब नहीं करता था। शाम को शैलेश भैया और मोना दोनों आ गए। हम तीनों फर्श पर चटाई बिछाकर बैठ गए और पढ़ाई शुरू कर दी।
मम्मी को शैलेश भैया पर पूरा भरोसा था। वे जानती थीं कि भैया घर के काम भी संभालते हैं और पढ़ाई में भी मदद करते हैं।
शैलेश भैया हम दोनों के बीच में बैठे थे। मोना पढ़ाई में कमजोर थी। उसे जल्दी नींद आने लगती थी। भैया उसे डांटते, “मोना, ध्यान से पढ़ो। सो मत जाओ।”
मैं होशियार थी इसलिए भैया मुझे बहुत प्यार से समझाते थे। उस दिन मोना को नींद आ ही गई। वह बगल में लेट गई और सो गई।
शैलेश भैया ने कहा, “ठीक है, सो जाने दो। पढ़ाई हो जाएगी तो जगा देंगे।”
फिर वे मुझे पढ़ाने लगे। मैं बहुत गौर से सुन रही थी। बीच-बीच में मेरी किताब में कुछ लिखते हुए उनका हाथ मेरे हाथ को छू जाता।
मैं थोड़ा शरमा जाती लेकिन कुछ कहती नहीं। तभी भैया रुक गए। मैंने देखा तो उनकी नजर मेरी चूचियों पर टिकी हुई थी। मैं झुकी हुई थी इसलिए ब्लाउज से मेरी गहराई साफ दिख रही थी।
मैं एकदम शरमा गई। मेरे गाल लाल हो गए। हमारी आंखें मिलीं। दोनों ही घबरा गए। भैया जल्दी से नजरें नीचे कर लीं और मैंने भी किताब की तरफ देखना शुरू कर दिया।
फिर पढ़ाई चालू हो गई। हम बातें करते रहे। भैया कभी-कभी दूसरे मजेदार विषय भी छेड़ देते।
मैं मजे से सुनती और सवाल पूछती। वे बहुत प्यार से समझाते। बीच-बीच में मेरे गाल खींच देते या कंधे पर हल्का हाथ रख देते। हम दोनों मुस्कुरा देते। रात करीब दस बजे तक पढ़ाई चलती रही। फिर मैं सोने चली गई। शैलेश भैया ने मोना को जगाया और उसे घर ले गए।
ऐसे ही कई दिन बीत गए। धीरे-धीरे शैलेश भैया का व्यवहार बदलने लगा। अब वे मुझसे ज्यादा मजाक करने लगे थे।
बातों के दौरान मेरे करीब सट जाते। कभी मेरी कमर को हल्के से छू देते, कभी मेरे बालों में उंगलियां फेर देते। मैं हंसकर टाल देती थी लेकिन मन ही मन कुछ अजीब-सा महसूस होने लगा था।
एक दिन मैं घर पर मम्मी के साथ उनके काम में हाथ बटा रही थी। मैं बर्तन मांज रही थी और मम्मी आटा गूंथ रही थीं।
तभी दरवाजे पर मोना आ गई। वह हंसते हुए अंदर आई और बोली, “चलो ना रजनी, हम लोग बाग में थोड़ा झूला झूलने चलते हैं। आज मौसम भी कितना अच्छा है।”
मम्मी ने हम दोनों को थोड़ा गुस्से भरी नजरों से देखा। उनका चेहरा सख्त हो गया। फिर उन्होंने गहरी सांस लेकर कहा, “लगता है जल्द ही तुम्हारी शादी करनी पड़ेगी रजनी। अब तो बस खेल-कूद ही सूझता है।”
इस पर मोना ठहाका लगाकर हंस पड़ी। वह बोली, “हां चाची, अब तो जल्दी से रजनी के लिए कोई अच्छा दूल्हा ढूंढ ही लो। नहीं तो यह बेचारी झूला ही झूलती रह जाएगी, शादी का नाम तक नहीं लेगी।”
मम्मी ने मोना को डांटते हुए कहा, “तू चुप रह मोना। तेरी वजह से ही तो यह भी बिगड़ रही है।”
लेकिन मैं और मोना दोनों हंसते हुए बाहर निकल आए। हम दोनों सहेलियां बाग में पहुंच गए। वहां झूला पहले से लगा हुआ था।
हमने झूला पकड़ा और जोर-जोर से झूलने लगे। हवा में सावन की ठंडक थी, आम के पत्ते सरसराते थे। मैं चारों ओर देखने लगी। नितेश कहीं नजर नहीं आ रहा था। “Virgin Chut Chudai Kahani”
मैंने मोना से पूछा, “मोना, आज तो तेरा यार कहीं दिख ही नहीं रहा है? हमेशा तो झूला देखते ही दौड़ा चला आता है।”
मोना ने होंठ सिकोड़कर कहा, “हां यार, आज तो झूलने में भी मजा नहीं आ रहा है। पता नहीं आज क्यों नहीं आया? शायद कोई काम पड़ गया होगा।”
तभी नितेश का एक दोस्त वहां आया। वह तेजी से मोना के पास पहुंचा और बोला, “मोना, नितेश तुम्हें खेतों में बुला रहा है।
उधर पश्चिम में जो ईख के खेत लगे हुए हैं, वो नितेश के ही हैं। वह उसी में मिलेगा तुम्हें। चली जाओ जल्दी।”
मैं तुरंत मोना को मना करने लगी। “नहीं मोना, उधर जाना ठीक नहीं होगा। अकेले खेतों में क्या करेगी? मम्मी को पता चला तो बहुत डांट पड़ेगी।”
पर मोना ने मेरी एक न सुनी। वह हंसकर बोली, “अरे रजनी, डर मत। नितेश है ना वहां। कुछ नहीं होगा। चल ना मेरे साथ।”
और वह मुझे हाथ पकड़कर खींचने लगी। मैं मना नहीं कर पाई और उसके साथ चल पड़ी। थोड़ी देर में हम लोग ईख के खेतों के पास पहुंच गए।
खेत हरे-भरे थे, ऊंची-ऊंची ईखें खड़ी थीं। बीच में नितेश हमें दिखाई दिया। वह मुस्कुराता हुआ खड़ा था।
उसने मोना को इशारे से अपने पास बुलाया। हम धीरे-धीरे खेतों के बीच में चले गए। खेतों के बीच में एक बड़ा सा आरामदायक खटिया डाला हुआ था।
उस पर सफेद चादर बिछी हुई थी। आसपास ईखों की वजह से छाया थी और हवा भी ठंडी-ठंडी चल रही थी।
नितेश ने मेरी तरफ देखकर कहा, “रजनी, तुम थोड़ा बाहर हम दोनों का वेट करोगी क्या? हम दोनों थोड़ा प्यार भरी बातें करेंगे। बस थोड़ी देर।”
मैंने मोना की तरफ देखा। मोना ने मुस्कुराकर मुझे जाने का इशारा कर दिया। उसकी आंखों में शरारत थी।
मैं मन मारकर बोली, “ठीक है, मैं बाहर ही हूं।” और वहां से बाहर निकल गई।
मैं खेत के किनारे बैठ गई। पास में कुछ ईखें तोड़ीं और चूसने लगी। मीठा रस मुंह में फैल रहा था। अंदर क्या हो रहा था, मुझे ज्यादा मतलब नहीं था।
मैं वहाँ बैठकर ईख चूस रही थी। मीठा रस मेरे होंठों पर फैल रहा था और मैं धीरे-धीरे उसे चाटते हुए आनंद ले रही थी। तभी नितेश का दोस्त आया। वह बिना कुछ कहे मेरे बिल्कुल पास आकर बैठ गया। उसकी मौजूदगी से हवा में एक अजीब-सी गर्माहट फैल गई।
वह मुस्कुराते हुए बोला, “और बताओ रजनी, तुम यहाँ बैठकर ईख चूस रही हो, और उधर तुम्हारी सहेली मोना पूरा जवानी का रस चूस रही है। देखा नहीं, कैसे वो नितेश के नीचे लेटी हुई है और दोनों एक-दूसरे में खोए हुए हैं।”
उसकी बात सुनकर मेरे गाल तमतमा उठे। मैं थोड़ा झिझकते हुए, आवाज़ को थामते हुए बोली, “तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बातें करते हुए?”
वह हँसा, उसकी हँसी में एक शरारत भरी ध्वनि थी। “अरे इसमें शर्म की कौन-सी बात है रजनी? यही तो उम्र है, मजा लेने की। देखो न, कितना मज़ा आ रहा है दोनों को। तुम चाहो तो तुम्हें भी वैसा ही मजा मिल सकता है।”
यह कहते हुए उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं और पकड़ मजबूत। फिर वह अपना चेहरा मेरे चेहरे के और करीब लाया।
उसकी साँसें मेरे गालों पर, मेरे होंठों के पास गर्म-गर्म लग रही थीं। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जो मुझे सहमा रही थी। “Virgin Chut Chudai Kahani”
मैं घबरा गई। दिल की धड़कन तेज़ हो गई। मैंने झटके से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की। “छोड़ो मुझे,” मैंने कहा, लेकिन आवाज़ में कम्पन था।
वह फिर भी मुस्कुरा रहा था। “अरे रजनी, तुम तो बचकानी हरकत कर रही हो। क्या तुम्हें सच में मजा नहीं लेना? देखो न, तुम्हारी सहेली मोना कितनी खुश है।
नितेश के नीचे दबी पड़ी है, उसका पूरा बदन हिल रहा है। चलो, मैं तुम्हें पास से दिखाता हूँ, शायद तुम्हारा मन भी बदल जाए।”
उसकी बातें सुनकर मेरे अंदर गुस्सा और शर्म दोनों उमड़ आए। मैंने पूरे जोर से अपना हाथ खींचा, फिर तेज़ी से उसका गाल थप्पड़ मार दिया। आवाज़ चारों तरफ़ गूँज गई।
“दोबारा कभी ऐसी हरकत मत करना,” मैंने गुस्से से कहा। “मैं ऐसी वैसी लड़की नहीं हूँ।”
वह अपने गाल को मसलता हुआ मुझे घूरने लगा। उसकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिख रहा था। बिना कुछ और कहे वह उठा और वहाँ से चला गया।
मैं वहीं अकेली बैठी रह गई। ईख अब भी मेरे हाथ में थी, पर अब उसका स्वाद फीका लग रहा था। मेरे अंदर कुछ-कुछ होने लगा था।
ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे शांत मन में पत्थर मार दिया हो। मन अचानक अशांत हो उठा। बार-बार उसकी उँगलियों का मेरे हाथ पर दबाव याद आ रहा था। उसका बदन मेरे बदन से छूकर हुआ वह हल्का-सा टकराव। उसकी गर्म साँसें जो मेरे चेहरे पर लग रही थीं, वो सब कुछ मेरे दिमाग में घूम रहा था।
मेरी साँसें भी अब थोड़ी तेज़ चल रही थीं। शरीर में एक अजीब-सी कंपकंपी थी। मैंने आँखें बंद कीं, पर वो सारी सनसनी और भी तेज़ होकर मुझे विचलित कर रही थी।
मैं न चाहते हुए भी यह सब सोचने लगी। मन में बार-बार वही ख्याल घूमने लगा कि अभी अंदर मोना और नितेश क्या कर रहे होंगे।
क्या सच में नितेश ने मोना को पूरी तरह दबोच लिया होगा? क्या मोना वाकई उसके नीचे दबी पड़ी होगी, उसकी सिसकियाँ सुनाई दे रही होंगी?
मैं बार-बार इन विचारों को झटकने की कोशिश करती, पर वे और मजबूती से लौट आते। मेरा शरीर अब भी थरथरा रहा था। उस दोस्त की गर्म साँसों की याद, उसके हाथ का स्पर्श, सब कुछ मुझे बेचैन कर रहा था।
आखिरकार मुझसे सहन नहीं हुआ। मैं धीरे से उठी और चुपके-चुपके अंदर की ओर बढ़ने लगी। दिल की धड़कन कान में गूँज रही थी।
थोड़ी ही दूर गई थी कि मुझे दोनों दिखाई दिए। मैं एक पेड़ के पीछे छिपकर देखने लगी। मेरी साँसें रुक सी गईं। दोनों बिल्कुल नंगे थे। “Virgin Chut Chudai Kahani”
मोना घुटनों के बल बैठी हुई थी और नितेश का लंड अपने मुंह में लेकर जोर-जोर से चूस रही थी। नितेश खड़ा था,
उसने मोना के सिर को दोनों हाथों से पकड़ रखा था। उसकी आँखें बंद थीं और वह धीरे-धीरे कमर हिलाकर मोना के मुंह में धक्के दे रहा था।
मोना की आँखें भी बंद थीं, गाल फूले हुए थे और होंठ लंड के चारों ओर कसे हुए थे। उसकी जीभ बार-बार लंड की नोक पर घूम रही थी।
कुछ देर बाद मोना उठी और खटिया पर लेट गई। उसने अपनी टांगें फैला लीं। नितेश उसके बीच में आया। उसने अपना लंड हाथ में पकड़ा, मोना की बुर पर टिका और एक झटके में अंदर धकेल दिया।
मोना जोर से उछल पड़ी, उसका मुँह खुल गया और एक लंबी सिसकी निकली। फिर दोनों में तेज रफ्तार शुरू हो गई।
नितेश ने मोना के कंधों को मजबूती से पकड़ा और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ मोना का पूरा बदन हिल रहा था। उसके स्तन ऊपर-नीचे लहरा रहे थे। मोना की सिसकियाँ अब तेज हो गई थीं।
“आह… नितेश… और जोर से…” वह बड़बड़ा रही थी। नितेश भी पसीने से तर था, उसकी साँसें फूल रही थीं। दोनों का बदन एक-दूसरे से टकरा रहा था, चटक-चटक की आवाजें आ रही थीं।
मैं यह सब देख रही थी और मेरी साँसें तेज चल रही थीं। मैं जानती थी कि मोना पहले भी कई लड़कों के साथ सो चुकी है, पर आज पहली बार मैं उसे इतने करीब से चुदाई करते देख रही थी।
मेरी बुर में सनसनी दौड़ रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे पेट के नीचे कोई गर्म नल खुल गया हो। मेरी चूत गीली हो चुकी थी, रस धीरे-धीरे बह रहा था।
मेरी साँसें भारी हो गईं, मैंने अनजाने में अपनी जाँघें आपस में रगड़ लीं। दोनों की चुदाई अब चरम पर पहुँच रही थी। “Virgin Chut Chudai Kahani”
नितेश के धक्के और तेज हो गए थे। मोना की सिसकियाँ अब चीखों में बदल रही थीं। मैं समझ गई कि अब खत्म होने वाला है।
डरते-डरते मैं वहाँ से पीछे हटी और चुपचाप बाहर आकर अपनी जगह पर बैठ गई। थोड़ी देर बाद मोना बाल ठीक करती हुई, चेहरा लाल किए मेरे पास आई। उसकी आँखों में अभी भी वही चमक थी।
वह मुस्कुराई और बोली, “चलो रजनी, अब घर चलते हैं।”
हम दोनों घर लौट आए। शाम को शैलेश भैया फिर से पढ़ाने आए। उस दिन मेरा मन कतई पढ़ाई में नहीं लग रहा था। बार-बार वही दृश्य आँखों के सामने आ जाता। मोना आज भी जल्दी ही नींद के आगोश में चली गई और मेरे बगल में लेटकर सो गई।
शैलेश भैया ने मुझे इस हालत में देखा तो बोले, “रजनी, क्या हुआ है तुम्हें आज? तुम बिल्कुल भी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रही हो।”
मैं थोड़ी घबराई, पर खुद को संभालते हुए बोली, “ऐसी कोई बात नहीं भैया। मैं तो फोकस कर रही हूँ। बस आज पता नहीं क्यों मन नहीं लग रहा।”
शैलेश भैया ने मेरी ओर देखा, फिर हल्के से मुस्कुराए। उनकी आँखों में एक अलग-सी चमक थी। उन्होंने किताब बंद की और धीरे से बोले, “कोई बात नहीं। आज तुम्हें थोड़ा इंटरेस्टिंग टॉपिक पढ़ाता हूँ।”
फिर शैलेश भैया थोड़ा अलग अंदाज में पढ़ाने लगे। अब वे किताब से ज्यादा मेरे साथ बातें करने लगे थे। मुझे पढ़ाई में उतना आनंद नहीं आ रहा था,
लेकिन बीच-बीच में जो हंसी-मजाक चल रहा था, उसमें मुझे सच में अच्छा लग रहा था। उनकी बातों में एक अलग-सी मिठास थी, जो मुझे हल्का-हल्का छू रही थी।
पढ़ाते-पढ़ाते शैलेश भैया की पुरानी आदत थी कि वे मुझे छू लिया करते थे। कभी मेरी कमर पर हाथ फेर देते, कभी गाल को प्यार से खींच लेते, कभी जांघों पर हल्के से हाथ रखकर सहला देते।
मैं इन सब पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी, बस हंसकर टाल देती थी। हर बार जब मैं हंसती, शैलेश भैया मुझे बड़े प्यार भरी नजरों से देखते और मुस्कुराते हुए कहते, “पता है रजनी, तुम हंसते हुए बहुत ही प्यारी लगती हो। बहुत ज्यादा खूबसूरत हो जाती हो।”
उनकी तारीफ सुनकर मैं शर्मा गई। गालों पर लाली छा गई और मैं नजरें दूसरी तरफ कर ली। तभी शैलेश भैया मेरे और करीब सरक आए।
वे इतने पास बैठ गए कि हमारा बदन एक-दूसरे से सटा हुआ था। उन्होंने धीरे से मेरे चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया और मेरी नजरों को अपनी नजरों में कैद कर लिया। उनकी आँखों में एक गहरी चाहत थी।
वे धीमी, गहरी आवाज में बोले, “तुम सच में बहुत ज्यादा सुंदर हो रजनी। तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी आँखें, तुम्हारे होंठ… और तुम्हारे बदन की ये बनावट… सब कुछ मेरे दिल को तार-तार कर देता है। ऐसा लगता है जैसे तुमसे ज्यादा खूबसूरत कोई परी भी नहीं होगी।”
यह सब कहते हुए उन्होंने अपना चेहरा मेरे चेहरे के और पास ला दिया। उनकी गर्म साँसें मेरे गालों पर, मेरे होंठों पर लग रही थीं।
उनकी साँसों की गर्मी मेरे पूरे शरीर में फैल रही थी। मुझे पता नहीं क्या हो गया था। मैं उनकी आँखों में झांक रही थी और उनकी साँसों को महसूस करके एक अजीब-सा सुकून और उत्तेजना दोनों महसूस कर रही थी।
सुबह मोना और नितेश की चुदाई देखकर जो गर्मी मेरे अंदर जगी थी, वो अब फिर से भड़क रही थी। मेरी साँसें तेज चलने लगीं।
शैलेश भैया मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में थामे हुए थे। हम दोनों इतने सटे हुए थे कि उनकी छाती मेरी छाती से छू रही थी। “Virgin Chut Chudai Kahani”
मैं लड़खड़ाती आवाज में बोली, “शैलेश भैया… मोना यहीं पर सो रही है। अगर वो जाग गई और हमें इस हालत में देख लेगी तो क्या सोचेगी? हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। ये सब… पाप है। मैं ये सब नहीं करना चाहती।”
शैलेश भैया ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “पाप-वाप कुछ नहीं होता रजनी। जिंदगी मिली है तो मजे लेने के लिए। डर करके क्या मिलेगा?
और मोना तो गहरी नींद में है, वो अभी नहीं उठने वाली। जब तक कोई उसे जगाएगा नहीं, वो सोती रहेगी।”
यह कहते हुए उन्होंने मेरे चेहरे को और पास खींच लिया। हमारे होंठ अब सिर्फ कुछ इंच दूर थे। कमरे में पूरी खामोशी छा गई थी।
सिर्फ हम दोनों की साँसों की आवाज सुनाई दे रही थी। मेरी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। शैलेश भैया के होंठ मेरे होंठों से हल्के से रगड़ खाने लगे। पहले तो सिर्फ छुअन थी, फिर धीरे-धीरे दबाव बढ़ने लगा।
मैं पूरी कोशिश कर रही थी कि उनका साथ न दूं, पर मेरे शरीर ने मेरी बात नहीं मानी। उनकी गर्म साँसें, उनके मुलायम होंठों की नरमी… सब कुछ मुझे खींच रहा था।
मैंने अनजाने में अपने होंठ भी उनके होंठों पर रगड़ दिए। शैलेश भैया ने मेरे निचले होंठ को अपने होंठों के बीच दबाकर धीरे से चूसना शुरू किया।
उनकी जीभ मेरे होंठों पर फिसलने लगी। मैं भी अब उनका साथ देने लगी थी। मेरे हाथ अनजाने में उनके कंधों पर जा टिके।
वे बड़े प्यार से मेरे होंठ चूस रहे थे। कभी ऊपरी होंठ, कभी निचले, कभी दोनों को एक साथ अपने मुंह में भर लेते। उनकी जीभ मेरे मुंह में घुस आई और मेरी जीभ से खेलने लगी।
हम दोनों की साँसें एक हो गईं। मेरी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। मेरे बदन में एक मीठी कंपकंपी दौड़ रही थी। थोड़ी देर हम एक-दूसरे के होंठ चूसते रहे। शैलेश भैया मेरे होंठों को बड़े प्यार से चूस रहे थे, उनकी जीभ मेरे मुंह में घुसकर मेरी जीभ से खेल रही थी।
साथ ही उनकी हथेलियाँ मेरे गालों पर फिसल रही थीं, हल्के-हल्के खरोच रही थीं। मेरे मुलायम गाल अब लाल हो चुके थे, जैसे किसी ने गुलाब की पंखुड़ियाँ रगड़ दी हों।
जब चुंबन खत्म हुआ तो हम दोनों शर्म से नजरें चुरा लीं। हमारी साँसें बुरी तरह तेज चल रही थीं, छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे हमने बहुत दूर तक दौड़ लगाई हो। “Virgin Chut Chudai Kahani”
तभी कमरे में हलचल हुई। मोना करवट बदल गई, उसकी साड़ी सरसराई। हम दोनों फट से अलग हो गए। शैलेश भैया जल्दी से अपनी किताब समेटने लगे,
मैंने भी अपनी किताब एक तरफ रख दी और बाल ठीक करने लगी। शैलेश भैया फिर मेरे पास आए। इस बार उन्होंने मुझे अपनी बाहों में कसकर दबोच लिया।
मेरी नरम छाती उनकी मजबूत छाती से दब गई। मेरा पूरा शरीर उनके शरीर से रगड़ खा रहा था। उनकी गर्म साँसें मेरे चेहरे पर, मेरे कान के पास पड़ रही थीं।
मैंने अनजाने में अपने दोनों हाथ उनके गले में डाल दिए। उन्होंने अपनी कमर मेरी कमर में लपेट ली, मुझे और करीब खींच लिया।
फिर से उनके होंठ मेरे होंठों पर आ गए। इस बार चुंबन और गहरा था। वे मेरे निचले होंठ को चूस रहे थे, ऊपरी होंठ को काटते हुए।
मैं भी अब उनका साथ दे रही थी, मेरी जीभ उनकी जीभ से उलझ रही थी। थोड़ी देर बाद हम अलग हुए। शैलेश भैया मेरे चेहरे को चूमते रहे – पहले गालों पर, फिर गर्दन पर, फिर फिर से होंठों पर।
उनके हर चुंबन से मेरे अंदर भूचाल मच गया था। मेरी बुर में गर्माहट फैल रही थी, रस पानी की तरह बह रहा था। मेरी चूत पूरी गीली हो चुकी थी,
जांघों के बीच सनसनी दौड़ रही थी। मैं बहुत तेज सनसनी महसूस कर रही थी, शरीर काँप रहा था। फिर हम अलग हुए। लगभग दस बज गए थे।
शैलेश भैया ने धीरे से कहा, “आगे का कार्यक्रम कल करेंगे।”
फिर उन्होंने मोना को हल्के से जगाया, कुछ बातें कीं और चले गए। मैं अकेली बिस्तर पर लेट गई, छटपटाती हुई, नींद नहीं आ रही थी। दूसरे दिन भी वैसा ही हुआ। सुबह हम दोनों झूला झूलने गए। उधर मोना नितेश के साथ रंगरेलियाँ मना रही थी। “Virgin Chut Chudai Kahani”
मैंने उन्हें दूर से देखा – मोना नितेश की गोद में बैठी थी, दोनों हँस रहे थे, हाथ-पैर आपस में उलझे हुए थे। इससे मेरी बुर में फिर से भूचाल उठ गया।
शाम को पढ़ाई के दौरान मोना फिर सो गई। शैलेश भैया ने मुझे दबोचा, चुम्मा-चाटी शुरू कर दी। उनके हाथ मेरे बदन पर फिसल रहे थे, होंठ मेरे होंठों, गालों, गर्दन पर।
पर मैं बहुत डरी हुई थी। मैं नहीं चाहती थी कि आगे कुछ और हो। कई दिनों तक मैंने उन्हें सिर्फ इतना ही इजाजत दी – चुंबन, गले लगना, हल्की छुअन। उसके बाद वे चले जाते और मैं सो जाती। लेकिन मेरे मन में पाप का एहसास बढ़ता जा रहा था।
मैं अपनी सहेली के भैया से, जिन्हें मैं अपना भैया मानती थी, यह सब कर रही थी। मुझे अफसोस हो रहा था, पाप का बोझ लग रहा था।
मैं चाहती थी कि मेरा कौमार्य मेरे पति ही भंग करें। पर अब ऐसा संभव नहीं लग रहा था। एक दिन मैं किसी काम से मोना के घर गई।
पता चला कि मोना और उसके मम्मी-पापा रिश्तेदार के यहाँ कुछ घंटों के लिए गए हैं। घर पर सिर्फ शैलेश भैया थे।
जैसे ही मैं अंदर गई, शैलेश भैया मुझे देखकर बहुत खुश हो गए। उनकी आँखों में चमक आ गई। उन्होंने झट से मुझे अंदर बुलाया और दरवाजा बंद कर दिया। मुझे सोफे पर बैठाया और पास बैठ गए।
शैलेश भैया बोले, “बताओ रजनी, क्या बात है? तुम इस वक्त यहाँ आई हो, कुछ काम था क्या?”
मैं असमंजस में बोली, “हाँ… नहीं… बस ऐसे ही।”
शैलेश भैया हंसते हुए मेरे और करीब आ गए। वे बिल्कुल सटकर बैठे। उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा, धीरे से सहलाने लगे और बोले, “मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ। तुम मोना से मिलने आई हो। पर वो आज नहीं है। शाम को सब आएँगे। तब तक मेरे साथ बैठ सकती हो।”
मैं उठकर जाने लगी। तभी शैलेश भैया ने पीछे से मेरी कमर पकड़ ली। उनकी हथेलियाँ मेरी कमर पर कस गईं।
उन्होंने मेरी गर्दन पर होंठ रख दिए, धीरे-धीरे चूमने और चाटने लगे। मैं आहत हुई, छुड़ाने की कोशिश की। “भैया… छोड़िए… प्लीज…” पर वे कसकर पकड़े हुए थे। “Virgin Chut Chudai Kahani”
फिर उन्होंने मुझे अपनी तरफ घुमाना। उनकी बाहों में मुझे समेट लिया। मेरी छाती उनकी छाती से दब गई। उन्होंने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
मैं थोड़ी देर विरोध करती रही, हाथों से उन्हें धकेलने की कोशिश की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उनकी जीभ मेरे होंठों पर फिसल रही थी, गर्माहट मेरे बदन में फैल रही थी।
मेरा मन भी मचलने लगा। विरोध कमजोर पड़ गया। मैंने धीरे-धीरे उनके होंठ चूसने शुरू कर दिए। शैलेश भैया मेरे होंठ चूसते हुए अपनी हथेलियाँ मेरी कमर पर फेर रहे थे।
उनकी मजबूत उँगलियाँ धीरे-धीरे नीचे सरकती हुई मेरे नितंबों पर आ गईं। वे दोनों नितंबों को कसकर दबा रहे थे, मसल रहे थे।
उनकी हथेलियों की गर्मी मेरे पूरे शरीर में फैल रही थी, जैसे आग लग गई हो। मैं उनकी होंठ चुसाई में पूरा साथ दे रही थी। मेरी जीभ उनकी जीभ से उलझ रही थी,
साँसें एक हो रही थीं। फिर अचानक उन्होंने मुझे गोद में उठा लिया। मेरी टाँगें उनकी कमर के चारों ओर लिपट गईं।
वे मुझे बिस्तर पर ले गए और धीरे से लिटा दिया। फिर वे मेरे ऊपर चढ़ आए। उनका वजन मेरे ऊपर था, पर दबाव मीठा लग रहा था। वे मेरे गाल चूमते रहे, फिर होंठों पर लौट आए।
उनके होंठ मेरे होंठों को बार-बार चूस रहे थे, काट रहे थे, चाट रहे थे। मैं मजा ले रही थी, पर मन के किसी कोने में पाप का एहसास बार-बार चुभ रहा था।
मैं सोच रही थी कि यह बहुत गलत है, शैलेश भैया मेरे भैया हैं, पर शरीर अब उनकी बात मान रहा था। वे उठे और अपनी शर्ट उतार दी।
फिर पैंट भी उतारकर सिर्फ चड्डी में मेरे ऊपर लौट आए। उनकी छाती चौड़ी और गर्म थी। वे फिर मेरे होंठ चूसने लगे। बीच-बीच में कपड़े के ऊपर से मेरे स्तनों को दबा रहे थे।
मेरे निप्पल सख्त हो चुके थे, कपड़े के ऊपर से भी साफ महसूस हो रहे थे। फिर उन्होंने मेरे कपड़े उतारने शुरू किए। पहले कुर्ता, फिर ब्रा, फिर सलवार। मैं शर्म से चेहरा दोनों हथेलियों से ढक ली। वे मुझे पूरी तरह नंगा कर चुके थे। पहली बार मैं किसी के सामने इस तरह नंगी थी। “Virgin Chut Chudai Kahani”
मेरे स्तन हवा में उठे हुए थे, निप्पल सख्त और गुलाबी। मेरी कमर पतली, नितंब गोल। बहुत शर्म आ रही थी, मैं आँखें बंद किए पड़ी रही।
शैलेश भैया मेरे दोनों स्तनों पर झुक गए। उन्होंने एक नींबू मुंह में लिया और चूसने लगे। उनकी जीभ निप्पल के चारों ओर घूम रही थी, हल्के से काट रहे थे।
फिर दूसरे पर। मेरी सिसकियाँ निकल रही थीं। फिर वे नीचे की ओर गए। मेरे पेट पर, नाभि पर, कमर पर चूमते हुए मेरी बुर के पास पहुँचे। उन्होंने मेरी टाँगें फैलाईं। मेरी बुर पूरी गीली थी, रस बह रहा था। उन्होंने जीभ निकाली और मेरी बुर पर फेर दी। फिर जीभ अंदर डालकर चूसने लगे।
उनकी जीभ क्लिटोरिस पर घूम रही थी, बुर के अंदर-बाहर हो रही थी। मैं छटपटाने लगी। मेरी कमर उठ रही थी, टाँगें काँप रही थीं।
वासना इतनी बढ़ गई थी कि मैं सोचना बंद कर चुकी थी कि वे मेरे भैया हैं। मैंने अनजाने में उनके सिर को अपनी बुर में दबा दिया।
मैं कराहते हुए बोली, “उउउफ्फफ… मत करो भैया… यह सब गलत है…”
पर वे मेरी बात अनसुना करते हुए बुर चाटते रहे। उनकी जीभ तेज हो गई थी। मेरी सिसकियाँ अब चीखों में बदल रही थीं। फिर वे ऊपर आए। अपनी चड्डी उतारी। उनका लंड विशाल और सख्त था, नसें फूली हुईं। उन्होंने लंड को मेरी बुर पर रखा और धक्का देने लगे। “Virgin Chut Chudai Kahani”
मेरी बुर बहुत टाइट थी, लंड अंदर नहीं जा रहा था। उन्होंने थूक लगाया, फिर जोर का धक्का मारा। कुछ इंच अंदर चला गया।
मैं झटपटाई, दर्द से चीख पड़ी। आँसू बहने लगे। भैया मेरी चूचियाँ सहलाते रहे, गाल मसलते रहे, बहलाते रहे। “शांत हो जा मेरी जान… अभी मजा आएगा…”
वे कहते रहे और लंड धीरे-धीरे अंदर धकेलते रहे। मैं कराह रही थी, रो रही थी। दर्द असहनीय था। आखिरकार पूरा लंड अंदर उतर गया।
मेरी बुर फट गई लग रही थी। खून रिसने लगा, गर्म-गर्म महसूस हो रहा था। मैं रो रही थी। भैया मुझे चुप करा रहे थे, चूम रहे थे। दर्द इतना था कि मैं सह नहीं पा रही थी।
वे धीरे-धीरे लंड बाहर निकालते, फिर अंदर डालते। हर बार दर्द कम होता जा रहा था। उन्होंने पूरा लंड बाहर निकाला, जो खून से लाल था।
मैंने अपनी बुर देखी तो आँसू और बहने लगे। भैया उठे, लंड धोया। फिर मेरी बुर को गीले कपड़े से साफ किया। मेरी बुर में जलन हो रही थी, पर वे कहते रहे, “अभी मजा आएगा, प्लीज एक बार और… मेरी परी…”
वे मेरे बदन से खेलते रहे, स्तनों को सहलाते, निप्पलों को चूसते, गर्दन चाटते। थोड़ी देर बाद जलन शांत हुई। दर्द अब कम हो गया था।
मैं उनके बाहों में सिमट गई। सिसककर रो रही थी। पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वे मुझे प्यार से चूम रहे थे।
मैं उठी और कपड़े पहनने लगी। “Virgin Chut Chudai Kahani”
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